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विंशोत्तरी दशा गणना एवं इसका आप पर प्रभाव - How to Calculate Vimshottari Dasha and its Effect on Your Life

वैदिक ज्योतिष के ग्रंन्थों में अनेक दशाओं का वर्णन किया गया हैं परन्तु सरल, लोकप्रिय, सटीक एवं सर्वग्राह्य विंशोत्तरी दशा ही है. कृ्ष्णमूर्ति पद्धति में भी इसी दशा का प्रयोग किया जाता है.सूर्य आत्मा का, चन्द्रमा मन का, मंगल बल का, बुध बुद्धि का, गुरु जीव का, शुक्र स्त्री का और शनि आयु का कारक है. फलादेश देश, काल और परिस्थिति को ध्यान में रखकर करना चाहिए फलादेश में परिस्थिति का ध्यान रखना आवश्यक है. जब एक यात्री जंगल से, रेगिस्तान से, नदी से और शहरों की सड़कों एवं गलियों से गुजरता है तो तरह-तरह के मनोभावों का अनुभव करता है. उसी प्रकार हम जन्म से मृ्त्यु तक ग्रहों के प्रभाव से विभिन्न प्रकार की सुखद एवं दु:खद घटनाओं से प्रभावित होते है.

ग्रह उच्च राशि में हो तो नाम, यश प्राप्त होता है तथा ग्रहों के अशुभ होने पर कष्ट प्राप्त होता है. जन्म नक्षत्र से दशा स्वामी किस नक्षत्र में है ये देखना आवश्यक है. यदि वह क्षेम, सम्पत्त, मित्र या अतिमित्र तारें में है तो शुभ फल प्राप्त होते है.

विंशोत्तरी दशा की गणना (Calculating Vimshottari Dasha)
जन्म के समय कितनी दशा शेष है इसकी गणना चन्द्र स्पष्टीकरण से की जाती है (The balance of dasha at birth is calculated through Moon's longitude). माना जन्म समय चन्द्र मेष राशि में 10 डिग्री 15 मिनट का है. मेष राशि में अश्विनी नक्षत्र 0 से 13 डिग्री 20 मिनट तक रहता है. अर्थात चन्द्र अश्विनी नक्षत्र के 10 डिग्री 15 मिनट तक भोग चुका है. शेष 3 डिग्री 5 मिनट भोगना बचा है. अश्विनी नक्षत्र का स्वामी केतु है जिसकी दशा 7 वर्ष की है. अत: दशा वर्ष शेष = 3 डिग्री 5 मिनट = 185 मिनट


गणना में घटी पल का उपयोग नहीं किया गया है. डिग्री मिनट का उपयोग आधुनिक व सरल है. हमने 13 डिग्री 20 मिनट को मिनटों में बदल दिया तो हमें 800 मिनट मिलते है.

महादशा के वर्ष (Mahadasha Years)

  • सूर्य = 6 वर्ष

  • चन्द्र = 10 वर्ष

  • मंगल = 7 वर्ष

  • बुध = 17 वर्ष

  • गुरु = 16 वर्ष

  • शुक्र = 20 वर्ष

  • शनि = 19 वर्ष

  • राहु = 18 वर्ष

  • केतु = 7 वर्ष

अन्तर दशा की गणना (Calculating the Antar Dasha)
माना शुक्र में शुक्र का अन्तर निकालना है तो महादशा वर्ष x महादशा वर्ष करें. इकाई का तीन गुना दिन होगा शेष माह होगें. जैसे 20 x 20 = 400, 0 दिन = 40 माह अर्थात 3 वर्ष 4 माह का अन्तर होगा. शुक्र में सूर्य का अन्तर भी इसी प्रकार होगा 20 x 6 = 120 दिन = 12 माह = 1 वर्ष

  • शुक्र में चन्द्र का अन्तर = 20 x 10 = 200 दिन = 20 माह = 1 वर्ष 8 माह

  • शुक्र में मंगल का अन्तर = 20 x 7 = 140 दिन = 14 माह = 1 वर्ष 2 माह

  • शुक्र में राहु का अन्तर = 20 x 18 = 360 दिन = 36 माह = 3 वर्ष

  • शुक्र में गुरु का अन्तर = 20 x 16 = 320 दिन = 32 माह = 2 वर्ष 8 माह

  • शुक्र में शनि का अन्तर = 20 x 19 = 380 दिन = 38 माह = 3 वर्ष 2 माह

  • शुक्र में बुध क अन्तर = 20 x 17 = 340 दिन = 34 माह = 2 वर्ष 10 माह

  • शुक्र में केतु का अन्तर = 20 x 7 = 140 दिन = 14 माह = 1 वर्ष 2 माह

प्रत्यन्तर दशा की गणना (Calculating the Pratyantara Dasha)
यह तृ्त्तीय स्तर की गणना है. जिस प्रकार 120 वर्ष में समान अनुपात में गणना की जाती है, उसी प्रकार अन्य स्तर की भी गणना की जाती है. शुक्र में शुक्र का अन्तर 3 वर्ष 4 माह अर्थात 40 माह है. 120 वर्ष में 20 वर्ष शुक्र के हैं अत: 1 वर्ष में 20 / 120 = 1/ 6 अत: 40 माह में = 40 x 1/ 6 = 6 माह 20 दिन
इसकी सीधे तरीके से गणना करें तो --

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दशा फल (Vimshottari Dasha Effect)

कई बार जन्म कुण्डली शुभ होने पर भी जातक को शुभ फल प्राप्त नहीं होते कभी दशा, कभी अन्तर्दशा व कभी गोचर में ग्रहों की ऎसी विषम स्थिति बन जाती है कि जातक व्याकुल हो जाता है. ऎसी परिस्थिति में उसमें आशा व उमंग जगाना ही ज्योतिषी की परीक्षा है.

शुभ फलदायी दशा (Dasha with positive results)
जो ग्रह जन्म कुण्डली में केन्द्र, त्रिकोण, लाभ या धन भाव में ( 1,2,4,5,7,9,10,11वें भाव ) स्थित हो या इन भावों के स्वामी हो तो इनकी दशा शुभ फल देती है. (The planets located in Kendras, Trikon, Labh or Dhana bhava, or if it is the lord of these bhavas will give good results in its dasha)
ग्रह उच्च राशि, स्वराशि या मित्र राशि में हो. ग्रह शुभ ग्रहों से युक्त अथवा दृष्ट हो तो शुभ फलों में वृ्द्धि करते हैं.
ग्रह भाव मध्य में स्थित हो या षडबल में बली हों तो उनकी दशा अन्तर्दशा, प्रत्यन्तर दशा व सूक्ष्म दशा में धन ,स्वास्थ्य, सुख व सम्मान मिलता है.
त्रिषडाय या त्रिक भाव में स्थित पाप ग्रह ( सूर्य, मंगल, शनि, राहु ) अथवा दु:स्थान के स्वामी ग्रह यदि दु:स्थान में हो तो भी अपनी दशा व अन्तर्दशा मे शुभ फल दिया करते हैं.

राहु / केतु भी शुभ फलदायी (Positive results from Rahu and Ketu)
राहु या केतु केन्द्र में स्थित हो और त्रिकोणेश से सम्बन्ध बना रहे हो तो राजयोग बनाते है. इसी प्रकार राहु या केतु त्रिकोण में स्थित हो और केन्द्रेश से सम्बन्ध बना रहे हों तो भी राजयोग बनाते है. राहु या केतु केन्द्र, त्रिकोण के अलावा जन्म कुण्डली में किसी भी भाव में केन्द्रेश और त्रिकोणेश से सम्बन्ध बना रहे है शुभ फलदायी होते है. ये सम्बन्ध युति से, दृ्ष्टि से किसी भी प्रकार से बन सकते है.

पाप ग्रह शुभ युक्त या शुभ दृ्ष्ट होने पर शुभ (Malefic planets are auspicious when in association with benefic planets)
नैसर्गिक पाप ग्रह ( सुर्य, शनि, मंगल, राहु ) यदि पाप भाव ( तृ्त्तीय, षष्ठ, अष्टम व द्वादश भाव ) में स्थित हों तो अपनी दशा में भाई बहन का स्नेह सहयोग, रोग ऋण का नाश, बाधा व कष्ट की समाप्ति तथा मान वैभव की वृ्द्धि दिया करते है.
इसी प्रकार पाप भाव या दुष्ट भाव (3,6,8,12 भाव ) के स्वामी कहीं भी बैठ कर यदि शुभ ग्रह या शुभ भावों के स्वामी से युक्त या दृ्ष्ट हों तो वह दुष्ट ग्रह भी अप्नी दशा या भुक्ति में रोग, पीडा़, भय , कष्ट से मुक्ति दिलाकर धन वैभव बढा़एंगे.

शुभ ग्रहों का दशा फल विचार (Understanding results from benefic planets)
प्राय: शुभ ग्रह सबसे पहले उस भाव के फल देते हैं जिस भाव में ये स्थित हैं. मध्य में ये जिस राशि में स्थित है उसके अनुसार फल देते है. अन्त में जिन ग्र्हों से दृ्ष्ट होते हैं उन दृ्ष्ट ग्रहों का फल भी देते है.

अशुभ ग्रहों का दशा फल विचार (Results from Malefic planets)
अशुभ ग्रह सबसे पहले राशि सम्बन्धी फल देगा जिस राशि में ये ग्रह स्थित है. उसके बाद उस भाव के कारकत्व सम्बन्धी फल देगा जिसमें ये पाप ग्रह स्थित है. अन्त में विभिन्न ग्रहों की इस दशा नाथ या अन्तर्दशा नाथ पर पड़ने वाली दृ्ष्टि के अनुसार फल मिलेगा.

उच्च ग्रह की दशा (Dasha of exalted planet)
उच्च ग्रह की दशा में जातक को मान सम्मान तथा यश की प्राप्ति होती है.

नीच ग्रह की दशा (Dasha of debilitated planet)
नीच ग्रह की दशा में जातक को संघर्षों का सामना करना पड़ता है. परन्तु यदि ये नीच ग्रह तीसरे भाव, छठे भाव या एकादश भाव में स्थित हैं और इनका नीच भंग भी हो रहा है तो ये राजयोग देते है. इसे नीचभंग राजयोग कहते है.

वक्री ग्रह की दशा (Dasha of retrograde planet)
वक्री ग्रह जिन भावों में स्थित है और जिन भावों के स्वामी हैं उन भावों के कारकत्वों में कमी ला देते हैं. वक्री ग्रह बार-बार प्रयास कराते है. वक्री ग्रह की दशा में जातक के जीवन में उतार-चढाव काफी रहते है.

मंगल नीच (Debilitated Mars)
कर्क राशि में मंगल को नीच माना जाता है. परंतु कर्क लग्न के लिये मंगल योगकारी ग्रह है. अपनी मेष राशि से चतुर्थ ( सुख भाव ) में होने से व वृ्श्चिक से भाग्य भाव में ( नवम भाव )होने से व्यापार , व्यवसाय तथा मान सम्मान की वृ्द्धि तथा भाग्योदय किया करता है. मंगल की दशा अन्तर्दशा में जातक लाभ और प्रतिष्ठा पाता है.

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