आईये जानें अष्टकवर्ग में ग्रहों के कारक तत्वों के बारे में विस्तार से

अष्टकवर्ग में राहु-केतु को छोड़कर सभी सातों ग्रह और लग्न का उपयोग किया जाता है. अष्टकवर्ग में एक नियम सदैव लागू होता है कि कोई भी ग्रह अपनी उच्च राशि तथा स्वराशि में स्थित होने पर भी तब तक पूर्णरूप से शुभ फल नही दे पाता जब तक कि उसे अपने भिन्नाष्टक वर्ग में अनुकूल बिन्दु न मिले हों.

अष्टक वर्ग में सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, शुक्र, बृहस्पति और शनि का बहुत सूक्ष्मता से अध्ययन करने की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि ग्रहों के प्रभावों उनके कारक तत्वों को जानकर ही हम किसी निष्कर्ष तक पहुंच सकते हैं. इसलिए हम सर्वप्रथम ग्रहों के कारक तत्वों से परिच होंगे तभी हम वर्गों में प्राप्त हुए अंकों से उनका फलित निर्धारण कर सकने में सक्ष्म होंगे. सातों ग्रहों के कारक तत्व नीचे दिए जा रहे हैं जो इस प्रकार हैं:-

सूर्य | Sun Planet

सूर्य समाज में मिलने वाली प्रतिष्ठा को दर्शाता है यह हमारी आत्मा को अभिव्यक्त करता है, जिसके द्वारा हमारे व्यवहार का भी बोध होता है. सूर्य से पिता की स्थिति का पता चलता है. राज्य एवं वरिष्ठ अधिकारियों के साथ आपके संबंधों को अभिव्यक्त करता है. जातक के स्वास्थ्य की स्थिति उसकी आध्यात्मिकता, परिपक्वता इत्यादि के विषय में पता चलता है.

चंद्रमा | Moon Planet

चंद्रमा के द्वारा व्यक्ति की मानसिक स्थिति का ज्ञान हो पाता है. वैचारिक स्थिति से का पता चलता है, उसकी मन:स्थिति को समझा जा सकता है. बौद्धिकता की क्षमता को देखा जा सकता है. माता का सुख स्वास्थ्य भी इन्हीं से देखा जा सकता है.

मंगल | Mars Planet

मंगल का संबंध भू संपदा से जाना जाता है. जमीन जायदाद, छोटे-भाई बहन को समझ सकते हैं. उच्चपद, पराक्रम, साहस का पता चलता है. काम करने की क्षमता का भी पता इसी से चलता है. यौन शक्ति भी इसी से देखी जाति है.

बुध | Mercury Planet

बुध के कारक तत्वों में बौद्धिकता का पता चलता है. इसके साथ ही वाणी का संयोजन होता है इन्हीं के द्वारा मनोविनोद की अभिव्यक्त आती है. विचारों को समझने की क्षमता देता है. शिक्षा के स्तर की गंभीरता भी इसी से मिलती है.

बृहस्पति | Jupiter Planet

गुरू को ज्ञान का कारक समझा जाता है इसके द्वारा व्यक्ति के आचार-विचार का पता चलता है. धन, संपदा, संतान का सुख इसी से पता चलता है. गुरू जीवन में यश, किर्ति, सम्मान देने वाला बनता है. व्यक्ति में उच्च विचारों का आगमन होता है. विद्वानों का संग मिलता है, गुरू की कृपा प्राप्त होती है.

शुक्र | Venus Planet

शुक्र से विवाह एवं वैवाहिक जीवन का पता चलता है, यह सौंदर्य अभिव्यक्ति का कारक बनता है इसे वीर्य का कारक माना जाता है. व्यक्ति का कला के प्रति रूझान भी इसी से परिलक्षित होता है. वाहनों का सुख भी इसी से देखा जा सकता है. आकर्षक व्यक्तित्व, समस्त भौतिक सुखों को इसी से समझा जाता है.

शनि | Saturn Planet

शनि काल का कारक है, कठोर परिश्रम करने की क्षमता देता है. भौतिक सुखों को त्यागने की क्षमता इसी से मिलती है. आयु का कारक माना जाता है. सेवकों की प्राप्ति , दुखों की भुक्ति भी इसी से समझी जाती है. जनता पर आपका प्रभाव इसी से पता चलता है.

इसी प्रकार सभी ग्रहों के कारक तत्वों को समझते हुए ही कुण्डली में अष्टकवर्ग को जाना जा सकता है. किसी भी भाव की विवेचना करने से पूर्व ज्योतिष के सामान्य सिद्धांतो को जानना अत्यंत आवश्यक होता है.

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कुण्डली से प्रेम संबंधों का आंकलन | Analysis of Love Relationships in Astrology

ज्योतिष में ग्रहों की स्थिति और योग के निर्माण से प्रेम संबंधों के विषय में भी जाना जाता है. रिश्तों की मजबूती तथा स्थिरता को समझने में ज्योतिष एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. कुण्डली में प्रेम संबंधों को देखने के लिए भाव एवं ग्रहों की दशा को समझना अत्यंत आवश्यक होता है इनके सू़क्ष्म निरिक्षण से हम प्रेम संबंधों को समझने में सक्ष्म होते हैं.

पंचम भाव से प्रेम संबंध | Love relationship through fifth house

कुण्डली में पंचम भाव से प्रेम संबंधों का विश्लेषण किया जाता है. इसे रोमांस का भाव माना जाता है. यदि पंचम भाव में बैठे ग्रह की दशा चल रही है या पंचमेश की दशा चल रही है, तब इनके प्रभाव स्वरूप व्यक्ति का मन किसी की ओर आकर्षित हो सकता है तथा प्रेम संबंध स्थापित हो सकते हैं.

नवम भाव का विश्लेषण | Analysis of the ninth house

पंचम भाव से गणना करने पर नवम भाव, पंचम ही होता है. इसलिए यदि किसी की कुण्डली में नवम भाव में बैठे ग्रह या नवमेश की दशा चल रही है तब भी उस जातक के मन में प्रेम की अभिव्यक्ति तीव्र हो सकती है.

सप्तम भाव का विश्लेषण | Analysis of the seventh house

इसी के साथ सप्तम भाव भी प्रेम में अपनी भूमिका दर्शाता है क्योंकि इसे से साथी का संब्म्ध देखा जाता है तथा इससे विवाह का आंकलन किया जाता है. यदि किसी की कुण्डली में सप्तम भाव में बैठे ग्रह की या सप्तमेश की दशा चल रही हो तब भी उसके ह्रदय में किसी के प्रति प्रेम भावनाएँ उभरने लगती हैं. इसके आतिरिक्त जन्म कुण्डली में लग्नेश की दशा के समय भी व्यक्ति मन किसी की ओर आकर्षित हो सकता है.

प्रेम संबंधों में ग्रहों का योगदान | Contribution of Planets in Love Relationships

भावों के आधार पर प्रेम संबंध स्थापित होने की स्थिति के अतिरिक्त ग्रहों की स्थिति तथा उनके प्रभाव से भी प्रेम संबंधों को समझा जा सकता है. कुछ प्रमुख ग्रहों की दशा में प्रेम संबंध स्थापित होने की संभावना भी प्रबल होती है. जिसमें से प्रमुख रूप से शुक्र को स्थान प्राप्त है. शुक्र ग्रह का अवलोकन किया जाता है. शुक्र को ही भोग विलास का कारक माना गया है. यह प्रेम मुख्य कारक ग्रह माना जाता है. शुक्र की दशा के प्रभाव स्वरूप व्यक्ति प्यार की ओर स्वत: ही झुकाव महसूस करने लगता है.  इसी के साथ चन्द्र ग्रह जो मन का कारक ग्रह होता है और एक अत्यधिक चंचल ग्रह होता है. इसलिए चन्द्रमा की दशा में व्यक्ति का मन भटकने लगता है और उसके प्रेम संबंध स्थापित हो सकते हैं.

राहु की दशा का प्रभाव कुण्डली में चलने पर भी व्यक्ति के प्रेम संबंध अति शीघ्रता से स्थापित होते हैं. राहु अच्छे तथा बुरे के विषय में नहीं जानता. इसलिए इसकी दशा में बुद्धि भ्रमित सी रहती है तथा परंपरा से हटकर भी रिश्ते बन सकते हैं अर्थात आप किसी ओर जाती या धर्म के व्यक्ति से प्रेम कर सकते हैं. इसी प्रकार एक अन्य ग्रह बुध को भी प्रेम संबंधों के लिए कारक ग्रह माना जा सकता है. बुध ग्रह बुद्धि का कारक है. इसलिए इसकी दशा में बुद्धि अकसर चंचल हो जाती है. इसकी दशा में मन में भावनाओं की अभिव्यक्ति तेज हो जाती है और रोमांस स्थापित होने की संभावना बनती है.

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अष्टकवर्ग और गोचर | Ashtak Varga and Transits

ग्रह सदैव चलायमान रहते हैं और इस कारण सौरमण्डल में इनकी स्थिति निरंतर बदलती रहती है. ग्रहों कि यही चलायमान स्थिति गोचर कहलाती है. अष्टकवर्ग पद्धति गोचर अध्ययन की विभिन्न पद्धतियों में से एक है. इसके ज्ञान के लिए सर्वप्रथम ग्रहों की गति को समझना आना चाहिए. सभी ग्रह अलग-अलग समय तक एक राशि में रहते हैं. इसलिए इस बात का ज्ञान होना जरूरी है कि कौन सा ग्रह कितने समय के लिए एक राशि में विचरण करता है.

सभी ग्रहों का गोचर काल इस प्रकार से है सूर्य एक राशि में एक माह तक रहता है, चंद्रमा सवा दो दिन तक, मंगल 45 दिनों तक, बुध अठ्ठाइस दिनों तक, गुरू एक साल तक, शुक्र, तीस दिनों तक, शनि, ढा़ई साल और राहु-केतु डेढ़ साल तक के लिए एक राशि में गोचर करते हैं. गोचर को सामान्यत: चंद्रमा से ग्रहों की स्थिति देखकर बताया जाता है. यहां इस बात को शनि के गोचर से भी समझने कि आवश्यकता है क्योंकि सबसे लम्बे समय तक वहीं एक राशि में रहते हैं और क्या इतना लम्बा रहने पर उनका उक्त राशि पर प्रभाव कैसा रहेगा इस स्थिति में अष्टकवर्ग से सूक्ष्म विधि द्वारा हम इसके फलित तक काफी सटीक पहुंच सकते हैं.

जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि सात ग्रह व आठवाँ लग्न होता है अत: इन सभी द्वारा शुभ-अशुभ बिन्दु प्राप्त होते हैं. यदि सातों ग्रह व लग्न सभी एक-एक शुभ बिन्दु किसी भाव को प्रदान करते हैं तो कुल मिलाकर अधिकतम आठ शुभ बिन्दु किसी भाव को प्राप्त हो सकते हैं.  यदि सात शुभ बिन्दु हैं तो शुभफल का सातवां भाग होगा. इसी प्रकार दिए गर अंकों के आधार पर शुभाशुभ का निर्धारण किया जा सकता है. एक अन्य विधि से जन्मकालीन चंद्रमा या लग्न से गोचर का ग्रह 3, 6, 10, 11 में हो या मित्र, स्वराशि, उच्चता में हो अथवा उसमें चार से अधिक बिन्दु हों तो शुभफल में अधिकता आती है.

इसके विपरीत यदि गोचर का ग्रह चंद्रमा से 3, 6, 10, 11 को छो़डकर अन्य स्थानों में हो तथा राशि में शुभ बिन्दुओं की अधिकता भी हो तो भी अशुभ फल ही मिलता है.  यदि ग्रह शत्रु क्षेत्र, नीच का अस्त हो व शुभ बिन्दु भी कम हों तो अशुभ फल की प्रबलता रहती है. भिन्नाष्टक वर्ग में प्रत्येक ग्रह के पास अधिकतम 8 अंक होते हैं और 0 निम्नतम बल होता है तथा 4 अंकों को मध्यम बली कहा जाता है. वहिं सर्वाष्टक वर्ग में ग्रहों के पास अधिकतम 56 अंकों का बल होता है और 28 अंक मध्य बल होता है.

इसी के साथ नक्षत्रों द्वारा गोचर की विवेचना देखनी होती है. जिन्हें नौताराओं के अन्तर्गत रखा गया है. यह नौ ताराएं हैं:- जन्म, सम्पत, विपत, क्षेम, प्रत्यरि, साधक, वध, मित्र, और अतिमित्र. इस प्रका सभी 27 नक्षत्र तीन भागों में विभाजित हो जाते हैं. ग्रहों का कक्ष्याओं में गोचर – अष्टकवर्ग पद्धति में ग्रहों  के गोचर का सूक्ष्म अध्ययन करने के लिए यह भी एक महत्वपूर्ण विधि है. इसी के साथ विभिन्न लग्नों के लिए तात्कालिक शुभ व अशुभ ग्रहों का ज्ञान होना भी आवश्यक होता है. परंतु इसी के साथ यह समझने की भी आवश्यकता होती है कि गोचर के परिणाम जन्म कुण्डली के योगों निर्मित प्रभावों को नकार नहीं सकते हैं.

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अष्टकवर्ग में उपयोग होने वाले शब्द | Terminologies used in Ashtak Varga

अष्टकवर्ग की पद्धति प्राचीन काल से ही ज्योतिषशास्त्र में अपनी एक सशक्त भूमिका दर्शाती आई है. इस विद्या के नियमों को समझने से पूर्व हमें यह जानने की आवश्यकता है कि हम इसमें उपयुक्त होने वाले शब्दों को समझें तभी हम इसके उपयोग को उचित प्रकार से समझ पाएंगे अष्टकवर्ग में बिन्दु, रेखा, कक्ष्या, प्रस्तारक, भिन्नाष्टक, सर्वाष्टक, समुदाय अष्टकवर्ग मुख्य नाम हैं. अष्टकवर्ग में प्रयुक्त होने वाले शब्दों को हम यहां विस्तार पूर्वक बता रहे हैं जो इस प्रकार हैं.

बिन्दु | Bindu

सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरू और शनि समस्त सातों ग्रह और लग्न अपनी शुभाशुभ ऊर्जा उत्सर्जित करते हैं, इस प्रकार ग्रह अपनी मूल स्थित से कुछ निश्चित स्थानों पर शुभ ऊर्जा व अशुभ ऊर्जा छोड़ता है. यही ऊर्जा यदि शुभ हो तो बिंदु कहलाती है. उत्तर भारत में शुभ स्थानों में प्राप्त ऊर्जा बिन्दु कहलाती है तथा अशुभ को रेखा कहा जाता है, वहीं दक्षिण भारत में इसके विपरित नियम हैं वहां शुभ को रेखा से दर्शाया जाता है.

कक्ष्या | Kakshya

कक्ष्या राशि का एक निश्चित भाग होता है तथा प्रत्येक कक्ष्या का स्वामी भी एक निश्चित ग्रह होता है. राशि की कक्ष्या के स्वामी ग्रह शनि, गुरू, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध, चंद्रमा तथा लग्न होते हैं. राशि का मान 30 डिग्री होता है. इसे आठ भागों में विभाजित करने पर आठ कक्ष्याएं बनती हैं. एक कक्ष्या का मान 3 डिग्री 45 मिनट का होता है. प्रत्येक ग्रह अपनी निश्चित कि हुई कक्ष्या में जन्म कुण्डली में अपनी स्थिति के अनुरूप निश्चित भाव में बिन्दु देता है.

प्रस्तारक चक्र | Prastarak Chakra

प्रस्तारक चक्र द्वारा सभी बारह भावों की आठ कक्ष्याओं में दिए बिन्दुओं के योग के को तालिका के रूप में दर्शाया जाता है और सभी ग्रहों के लिए अलग – अलग प्रस्तारक चक्र बनता है.

भिन्नाष्टक | Bhinna Ashtak

ग्रहों के प्रस्तारक चक्र में सभी ग्रह द्वारा सभी बारह भावों में दिए गए बिन्दुओं के कुल योग को भावों के अनुसार जन्म कुण्डली में लिखकर दर्शाया जाता है. इस तरह से सभी सातों ग्रहों का अपने- अपने प्रस्तारक चक्र के अनुसार भिन्न भिन्न वर्ग तैयार हो जाता है, जो उक्त ग्रहों का भिन्नाष्टक वर्ग कहलाता है.

सर्वाष्टक | Sarva Ashtak

ग्रहों द्वारा सभी बारह भावों में दिए गए बिन्दुओं या कहें कि शुभ अंकों के कुल योग को सर्वाष्टक वर्ग कहा जाता है. प्रत्येक ग्रह द्वारा अपने भिन्नाष्टक वर्ग में भाव विशेष में दिए गए बिन्दुओं को जोड़कर एक वर्ग बनाया जाता है जो सर्वाष्टक का काम करता है. सर्वाष्टवर्ग को समुदाय वर्ग के नाम से भी जाना जाता है परंतु इसमें एक अंतर अवश्य आता है, जो इस प्रकार से परिलक्षित होता है कि भिन्नाष्टक वर्ग बनाए बिना भी सर्वाष्टक वर्ग बनाया जा सकता है जिसे समुदाय अष्टकवर्ग कहते हैं.

रेखा सर्वाष्टकवर्ग | Rekha Sarva Ashtak Varga

किसी भी भाव को सभी सात ग्रह व लग्न आठ प्रकार की ऊर्जाएं देते हैं. इस प्रकार प्रत्येक भाव में कुल 56 अंक होते हैं. यदि शुभ अंकों को 56 से घटाते हैं तो उस भाव में ग्रहों द्वारा दिए गए अशुभ अंक शेष बचते हैं. जिन्हें उत्तर भारत में रेखा के नाम से जाना जाता है.

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अष्टकवर्ग – एक परिचय | Ashtak Varga – an Introduction | Ashtakavarga

अष्टक वर्ग भावों और ग्रहों के बल को जानने की एक विधि है. यह एक गणितिय संरचना है जिसमें ग्रहों को अंक प्राप्त होते हैं और उनका बलाबल निकलता है. अष्टकवर्ग का शाब्दिक अर्थ आठ से होता है जिसमें लग्न एवं सात ग्रहों का समावेश होता है. इसके द्वारा गोचर के शुभ तथा अशुभ प्रभावों का आंकलन करने में मदद मिलती है. यह ग्रहों की शक्ति का आंकलन करने की महत्वपूर्ण विधि है. इसके द्वारा फलित करने में काफी हद तक उचित मार्गदर्शन प्राप्त होता है. अष्टक व्रग एक उत्तम ज्ञान है जिसके द्वारा भावों की शक्ति को जाना जा सकता है. इससे जातक की सुख संपन्नता एवं समृद्धि का पता चलता है. इसके द्वारा जातक की कुण्डली के विष्य में सही मार्गदर्शन एवं जानकारी प्राप्त होती है.

ज्योतिष शास्त्र की विभिन्न विधाओं में से एक अष्टकवर्ग एक ऎसी विद्या है जो जन्मकुण्डली का आंकलन एवं फलित करने की दृष्टि से उत्तम रहती है. यह एक विलक्ष्ण प्रतिभा है जो कुण्डली के फलित को बताने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. यह इस बात की भी पुष्टि करती है कि इस ज्ञान का आधार हमारे ऋषि मुनियों का अथक प्रयास एवं गहन अध्य्यन है जिसके द्वारा हम ज्योतिष के फलित को इस आधार से भी उचित प्रकार से जानने में संतुष्ट होते हैं. अष्टकवर्ग में कुण्डली के ग्रहों की शक्ति जानने के लिए उदाहरण स्वरूप हम यदि चंद्रमा की स्थिति को समझें तो यह इस प्रकार से अभिव्यक्त होगी

बली एवं मजबूत स्थिति एवं भाव का चंद्रमा जातक को हृदय से काफी दयालु एवं भावनाओं से पूर्ण बनाता है. ऎसा जातक समाज की भलाई के कार्यों को करने की चाह रखने वाला होगा. मन से साफ एवं कोमल होगा. लोगों की भलाई के कार्यों में रूचि लेगा तथा मानवता के लिए शुभ कर्मों को करने वाला होगा. मनसिक शांति और सुख की अनुभूति प्राप्त करने में सफल होगा. किंतु यही चंद्रमा जब पिडित एवं निबल अवस्था में होत है तो जातक को मानसिक परेशानियों एवं संताप का सामना करना पड़ता है. उसकी सोचने समझने की क्षमता प्रभावित होती है.

इसी प्रकार एक अन्य उदाहरण देंखे तो सूर्य की उच्च स्थिति एव्म अनुकूल स्थानों पर उपस्थिति होने से जातक उचाईयों को पाता है. जीवन में उसे आत्मिक मजबूति एवं स्थिरता प्राप्त होती है. उसमें नेतृत्व करने की योग्यता देखी जा सकती है. सफलताओं से घबराता नहीं है. कुण्डली में बली सूर्य के होने से बौद्धिकता प्राप्त होती है क्योंकि बली सूर्य के अभाव में जीवन में उच्चता एवं साहस तथा सफलता पाना अत्यंत कठिन सा होता है. इसलिए कुण्डली में ग्रहों के शुभ अंक होना एवं स्थित का विचार अष्टकवर्ग से करने में काफी हद तक फलित का निर्धारण किया जाता है.

कुण्डली के सही फलादेश के लिए अनुकूल रूप से गोचर का ज्ञान अत्यंत आवश्यक माना गया है. कई अनुसंधान एवं गणितीय पद्धती से इसके विषय में कई प्रकार से अनुमोदन किया गया है. जिसमें अष्टकवर्ग ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका दर्ज करवाई है. यह पद्धति गोचर के ग्रहों के विषय में सुक्ष्मता से विवेचन करने में बहुत सहायक होती है.

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अष्टकवर्ग में अंकों का महत्व | Importance of Numbers in Ashtak Varga

अष्टक वर्ग में ग्रहों के अच्छे फलों की प्राप्ति में यह अंक बहुत निर्णायक भूमिका अदा करते हैं और आने वाले गोचर के निष्पादन हेतु  प्रक्रिया में सहायक होते हैं. समस्त ग्रह 0 से 3 बिन्दुओं के साथ स्थित होने पर कमजोर मान लिए जाते हैं. इसी के साथ चार बिन्दुओं के साथ स्थित ग्रह को सामान्य या कहें अनुकूल माना जाता है. वह न अधिक अशुभ होता है और न ही अधिक शुभ प्रभाव देने में सक्षम होता है. पांच से अधिक बिन्दुओं या अंकों के साथ होने पर ग्रह मजबूत स्थिति पाता है जिससे जातक को शुभ फलों की प्राप्ति में लाभ मिलने की संभावना बनी रहती है और उसके काम को शुभता तथा सौम्यता भी प्राप्त होती है.

अष्टकवर्ग के सिद्धांतो का सही प्रकार से उपयोग करने के बाद ही कुण्डली की विवेचना करनी होती है. सबसे पहले यह देखा जाना चहिए कि किस ग्रह ने कितने अंक अर्थात बिन्दु किस भाव में दिए हैं और ग्रह स्वयं जिस राशि में स्थित है वहाँ कितने बिन्दु हैं. जन्म कुण्डली में कोई भी ग्रह यदि अपने भिन्नाष्टक में पांच या अधिक बिन्दुओं के साथ होता है और सर्वाष्टक में अठाईस या अधिक बिन्दुओं के साथ होता है तब वह ग्रह बहुत ही श्रेष्ठ व उत्तम फल देता है.

कुण्डली का जांचते हुए इसके नियमों के साथ पराशर जी के नियम भी लगाने चाहिए कि ग्रह कब शुभ तो किन स्थितियों में खराब परिणाम दिया करेगा. परंतु ग्रह शुभ होकर नीच या अस्त है तो उक्त शुभ फल देने में कमी कर सकता है उसका पूर्ण बल नहीं मिल पाता. अनेक बार जब कोई भी ग्रह किसी भाव में चार या उससे भी कम अंक देता है तथा उसी भाव में अपनी उच्च स्थित में स्थित होता है तो उक्त स्थिति में अंकों की कमी से परिणाम में कमी आ जाती है और ग्रहों से शुभ फल मिलने में कमी का अनुभव होता है. अंकों का इस अष्टक वर्ग में बहुत महत्व होता है इन्हीं के आधार पर अष्टक वर्ग के सिद्धांतों को समझा जा सकता है.

कई बार ग्रह अपनी नीच अथवा शत्रु राशि में चार या इससे से भी कम बिन्दुओं के साथ होता है तब भी जातक को अशुभ परिणाम नहीं मिलते हैं. इसका क्या हमें इस अष्टक वर्ग के गोचर को समझने में आ सकता है. ग्रह कि दशा या अन्तर्दशा में कुण्डली में उस समय में चलने वाला गोचर देखा जाना आवश्यक होता है क्योंकि अष्टकवर्ग में ग्रहों का गोचर मुख्य भूमिका निभाता है. इसमें भी सबसे मुख्य शनि का गोचर माना जाता है. यदि शनि गोचर में जिस भी किसी ऎसी राशि से गुजर रहा है होता है जिसमें सूर्यादि ग्रह अपने भिन्नाष्टक वर्ग में कोई बिन्दु नहीं दे रहे हों तो उस स्थिति में शनि का यह गोचर बिन्दु ना देने वाले ग्रहों के कारकत्व के अनुसार जातक को अनेक प्रकार के कष्ट और परेशानियां दे सकता है.

ऎसी ही अन्य ग्रहों को भी गोचर में इसी प्रकार से देखा जा सकता है. अष्टकवर्ग से जातक के जीवन के किसी भी क्षेत्र के फलों का अध्ययन किया जा सकता है. इसी प्रकार से गुरू के गोचर द्वारा ग्रहों के शुभ फलों की प्राप्ती को जाना जा सकता है. अष्टकवर्ग में जिस ग्रह के पास जितने अधिक अंक अर्थात बिन्दु होते हैं वह उतने ही शुभ फल देने में सक्षम होता है.

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अष्टकवर्ग से जाने कैसी होगी आपकी आर्थिक स्थिति

अष्टकवर्ग के द्वारा हम बहुत सी बातों के बारे में जानकारी हासिल करते हैं. उसके बिन्दुओ से हमें व्यक्ति के जीवन के सुख व दुख के बारे में पता चलता है. जीवन का कौन सा काल खण्ड शुभ रहेगा और कौन सा काल खण्ड अशुभ रहेगा आदि बातो की जानकारी हमें अष्टकवर्ग के द्वारा काफी कुछ मिल जाती है. आइए जानने का प्रयास करें कि जीवन के किस भाग में हमें क्या मिल सकता है.

जन्म कुण्डली में स्थित राशियों के अनुसार आप कुण्डली को तीन भागों में बांटे. आइए वर्गीकरण करें.

  • सबसे पहले मीन राशि से मिथुन राशि तक के भावो को लें, यह व्यक्ति का बचपन है.
  • अब कर्क राशि से तुला राशि तक के भाव ले, यह युवावस्था का समय है.
  • अंत में वृश्चिक राशि से कुंभ राशि तक के भावों को ले, यह वृद्धावस्था का समय है.

अब आप प्रत्येक समूह की राशियों को मिले बिन्दुओ का कुल योग करें. अब आप देखे कि तीनो समूह में से किस समूह का कुल जोड़ अधिक है और किसका कम. जिस समूह का जोड़ अधिक है उस समूह में आया जीवन काल व्यक्ति का अच्छा माना गया है और जिस समूह में बिन्दु कम है उस समय का जीवन कुछ संघर्षमय हो सकता है. यदि तीनो समूहो में आपस में अंतर ज्यादा नही होता है तब ऎसा व्यक्ति अपने जीवन में ज्यादा उतार-चढ़ाव नहीं देखता है.

डॉ. पी. एस़ शास्त्री का मत उपरोक्त मत से कुछ भिन्न है. उनका मत निम्नलिखित है :-

  • प्रथम चतुर्थ, सप्तम और दशम भाव के बिन्दुओ का जोड़ करें यह समूह बचपन कहा जाता है.
  • दूसरे, पांचवे, आठवें और एकादश भाव के बिन्दुओं का जोड़ करें. यह समूह युवावस्था का कहलाता है.
  • तीसरे, छठे, नवम और द्वादश भाव के बिन्दुओ का जोड़ करें. यह समूह वृद्धावस्था कहलाता है.

फलकथन वही होगा कि सबसे अधिक बिन्दुओ वाले समूह का समय ज्यादा अच्छा होगा.

समृद्धि की दिशा | Direction of Prosperity

अष्टकवर्ग के बिन्दुओ से हम व्यक्ति के जीवनकाल में होने वाली समृद्धि की दिशा का भी अनुमान लगा सकते हैं. इसका अर्थ है कि व्यक्ति किस दिशा में ज्यादा उन्नति व तरक्की कर सकता है. राशियो के आधार पर ही इनका भी वर्गीकरण किया जाएगा.

  • मेष, सिंह और धनु – पूर्व दिशा
  • वृष, कन्या और मकर – दक्षिण दिशा
  • मिथुन, तुला और कुंभ – पश्चिम दिशा
  • कर्क, वृश्चिक और मीन – उत्तर दिशा

अब आप प्रत्येक समूह में आई राशियो के बिन्दुओ का कुल जोड़ करें. जिस भी समूह की दिशा का जोड़ अधिक होगा और साथ ही अगर उन राशियों में शुभ ग्रह भी ज्यादा हों तब वही दिशा जातक के लिए अच्छी मानी जाएगी. व्यक्ति को ज्यादा बिन्दु वाली दिशा में उन्नति के अवसर अधिक मिलेगें.

मतांतर से कुछ शास्त्रो में विद्वानो ने राशि के स्थान पर भावों को लिया है, यह गणना निम्नलिखित प्रकार से होती है :-

  • पहले, पांचवें और नवम भाव के बिन्दुओ का कुल जोड़ करें. यह समूह पूर्व दिशा के अन्तर्गत आएगा.
  • दूसरे, छठे और दसवें भाव के बिन्दुओ का जोड़ करें, यह समूह दक्षिण दिशा कहलाता है.
  • तीसरे, सातवें और एकादश भाव का जोड़ करें. यह समूह पश्चिम दिशा कहलाता है.
  • चतुर्थ, अष्टम और द्वादश भाव के बिन्दुओ का जोड़ करे, यह समूह उत्तर दिशा कहलाता है.
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जानिये। अपनी कुंडली में राहु का फल

राहु ग्रह को विच्छेद कराने वाले ग्रह के रुप में जाना जाता है. वास्तविक रुप में राहु बिन्दू मात्र है. ज्योतिषशास्त्र के अनुसार राहु का प्रभाव व्यक्ति के जीवन पर बहुत गहरा पड़ता है जिस कारण इन्हें ग्रह की तरह ही माना जाता है. यह राहु व्यक्ति को परम्परा व संस्कारों से हटाने की ओर उन्मुख करता है. जातक अपने व्यवहार में परंपराओं से अलग जाने की चाह रखने लग सकता है इसके प्रभाव का यदि ल्ग्न अर्थात प्रथम भाव पर स्थित हो तो जातक पारम्परिक कार्यो से हतकर अन्य गैर पारंपरिक कामों में रुचि लेने की चाह रखता है. रीति-रिवाजों से दूर वह अपने नियम चाहता है

ज्योतिष में कुछ लोग राहु की दृष्टि को महत्व देते हैं तो कुछ लोग उसकी दृष्टि को नहीं मानते. ज्योतिष पद्धति में राहु का प्रभाव जानने हेतु कुण्डली में राहु पर किस ग्रह की दृष्टी पड़ रही होती है या वह किस भाव से रहकर कौन से ग्रह के साथ युति बना रहा हो उस ग्रह को देखना चाहिए. क्योंकि राहु अपने साथ स्थित ग्रह की युति के अनुसार फल देता है उस पर किस ग्रह की दृष्टि है वह उसके अनुसार फल देता है. जो ग्रह राहु के साथ स्थित हो उस ग्रह के अनुसार फल प्राप्त होने की संभावनाएं बनती है. तत्पश्चात राहु जिस राशि में स्थित हो उस राशि के स्वामी के अनुसार फल देता है. अत: राहु के साथ अन्य ग्रहों के संबंधों से ही उसके फल की व्याख्या अनुकूल रूप से की जाती है.

राहु वक्री चाल में रहने वाला ग्रह रहा है इसका कारण इनका सदैव वक्री होना है इस कारण से राहु के विषय में फलादेश करते समय सावधानी का प्रयोग करना चाहिए.  राहु को सर्प का मुख कहा गया है. विषैले रसायनों में राहु की उपस्थिति मानी गई है. जहर या जहर के प्रयोग से होने वाले कार्यो में राहु का प्रभाव माना जाता है.  राहु के स्वभाव में विश्वास की कमी रहती है अर्थात, कुण्डली के जिस भाव पर राहु की स्थिति हो उस भाव से संबन्धित फलों पर संश्य बना रहता है तथा जातक को सदैव ही दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है.

राहु का प्रभाव होने से व्यक्ति में सत्यता के गुण की कमी देखी जा सकती है. राहु को स्वभाव से क्रूर कहा जाता है तथा इसमें अहित करने की भावना मुख्यरूप से मानी गई है. राहु को अकेले रहना पसन्द है. अत: समाज के नियमों को मानने में आनाकानी बनी रहती है. राहु को कटू वचन बोलने वाला कहा गया है. उसके स्वभाव में विश्वास की कमी होने के कारण शक का भाव बना रहता है. राहु पर जिस ग्रह की दृष्टि हो वह उसके अनुसार फल देता है. राहु का प्रभाव धर्म भाव से होने पर व्यक्ति की धार्मिक भावना में कमी देखी जा सकती है. विचारों के मतभेद उत्पन्न होने की आशंका राहु से प्रभावित होने पर अधिक ही रहती है.

परंतु इसके यदि कुछ अच्छे पहलुओं पर भी विचार बनता है क्योंकि राहु के कुण्डली में बारह भावों के फल जानने के लिए उसके विभिन्न भावों में स्थित कारकों का फल देखना होता है जिसके अनुसार वह अपने फल देने में सक्ष्म होते हैं. इसमें से कुछ ऎसा भी यदि राहु योगकारक ग्रह के साथ हो अथवा अपनी उच्च राशि में हो केन्द्र त्रिकोण भावों में हो तो राहु के प्रभावों में शुभता देखी जा सकती है.

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आठवां भाव बनता है अचानक से होने वाली घटनाओं का कारक

अष्टम भाव आयु भाव है इस भाव को त्रिक भाव, पणफर भाव और बाधक भाव के नाम से जाना जाता है. आयु का निर्धारण करने के लिए इस भाव को विशेष महत्ता दी जाती है. इस भाव से जिन विषयों का विचार किया जाता है. उन विषयों में व्यक्ति को मिलने वाला अपमान, पदच्युति, शोक, ऋण, मृत्यु और इसके कारण है. इस भाव से व्यक्ति के जीवन में आने वाली रुकावटें देखी जाती है. आयु भाव होने के कारण इस भाव से व्यक्ति के दीर्घायु और अल्पायु का विचार किया जाता है.

अष्टम भाव आयु को दर्शाता है यह भाव क्रिया भाव भी है. इसे रंध्र अर्थात छिद्र भी कहते हैं क्योंकि यहा जो भी कुछ प्रवेश करता है वह रहस्यमय हो जाता है. जो वस्तु रहस्य में होती है वह परेशानी व चिंता का कारण स्वत: ही बन जाती है. बली अष्टम भाव लम्बी आयु को दर्शाता है. साधारणत: अष्टम भाव में कोई ग्रह नही हो तो अच्छा रहता है. यदि कोई भी ग्रह आठवें भाव में बैठ जाये चाहे वह शुभ हो या अशुभ  कुछ न कुछ बुरे फल तो अवश्य ही देता है.

ग्रह कैसे फल देगा यह तो ग्रह के बल के आधार पर ही निर्भर करता है. इस अवस्था में अगर किसी ग्रह को आठवें भाव में देखा जाए तो वह उस भाव का स्वामी ही हो. कोई भी ग्रह आठवें भाव में बैठता है तो अपने शुभ स्वभाव को खो देता है. ऎसे में शनि को अपवाद रूप में आठवें भाव में शुभ माना गया है. क्योंकि वह आयु प्रदान करने में सहायक बनता है. अष्टमेश आठवें भाव की रक्षा करता है. अष्टमेश की मजबूती का निर्धारण उस पर पड़ने वाली दृष्टियों अथवा संबंधों के द्वारा होता है.

कुछ अन्य तथ्यों द्वारा देखा जाए तो अष्टमेश अचानक आने वाले प्रभाव दिखाता है. यह भाव जीवन में आने वाली रूकावटों से रूबरू कराता है. जहां – जहां अष्टमेश का प्रभाव पड़ता है उससे संबंधित अवरोध जीवन में दिखाई पड़ते हैं. अष्टमेश जिस भाव में स्थित होता है उस भाव के फल अचानक दिखाई देते हैं और वह अचानक से मिलने वाले फलों को प्रदान करता है.

व्यक्ति अपने जीवन में जो उपहार देता है, उन सभी की व्याख्या यह भाव करता है. इस भाव से व्यक्ति के द्वारा कमाई, गुप्त धन-सम्पति, विदेश यात्रा, रहस्यवाद, स्त्रियों के लिए मांगल्यस्थान, दुर्घटनाएं, देरी खिन्नता, निराशा, हानि, रुकावटें, तीव्र, मानसिक चिन्ता, दुष्टता, गूढ विज्ञान, गुप्त सम्बन्ध, रहस्य का भाव देखा जा सकता है.

अष्टम भाव का कारक ग्रह शनि है. आयु के लिए इस भाव से शनि का विचार किया जाता है.  अष्टम भाव से स्थूल रुप में मुख्य रुप में आयु का विचार किया जाता है. अष्टम भाव सूक्ष्म रुप में जीवन के क्षेत्र की बाधाएं देखी जाती है. अष्टमेश व नवमेश का परिवर्तन योग बन रहा हों, तो व्यक्ति पिता की पैतृक संपति प्राप्त करता है. अष्टमेश व दशमेश आपस में परिवर्तन योग बना रहा हों, तो व्यक्ति को कार्यों में बाधा, धोखा प्राप्त हो सकता है. उसे जीवन में उत्तार-चढाव का सामना करना पडता है.

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अष्टकवर्ग से राजयोग | Analysis of Rajyoga Through Ashtakvarga

जन्म कुण्डली में अष्टकवर्ग की गणना बहुत महत्व रखती है. इसके द्वारा बहुत सी बातों का विश्लेषण किया जा सकता है. जीवन खण्ड का कौन सा भाग शुभ होगा और कौन सा भाग अशुभ होगा आदि बाते देखने के साथ अष्टकवर्ग द्वारा राजयोग भी देखा जाता है. आइए अष्टकवर्ग के योगो से बनने वाले राजयोगो को जानने का प्रयास करें.

  • जन्म कुण्डली में मंगल और शुक्र उच्च राशि में हो, शनि व बृहस्पति त्रिकोण भाव में हो और लग्न में 40 से अधिक बिन्दु स्थित हो तब इसे राजयोग माना जाता है.
  • यदि लग्न, चन्द्र लग्न और सूर्य लग्न तीनो में ही 30 बिन्दु स्थित है तब व्यक्ति अपने प्रयासों से जीवन में उन्नति करता है और आगे बढ़ता है.
  • यदि सूर्य और बृहस्पति अपनी-अपनी उच्च राशियों में 30 बिन्दुओ के साथ स्थित है और लग्न के बिन्दुओ की संख्या, अन्य भावों के बिन्दुओ से अधिक है व्यक्ति राजा के समान जीवन जीने वाला होता है.
  • जन्म कुण्डली के चतुर्थ और एकादश दोनो भावों में प्रत्येक में 30-30 बिन्दु हो तब व्यक्ति 40 वर्ष की उम्र में समृद्ध होता है.
  • जन्म कुण्डली के लग्न, चन्द्र राशि, दशम और एकादश भाव में प्रत्येक में 30-30 बिन्दु हो और लग्न अथवा चंद्रमा, बृहस्पति से दृष्ट हो तब ऎसा व्यक्ति राजा के समान माना गया है.
  • जन्म कुण्डली में मंगल तथा शुक्र अपनी-अपनी उच्च राशियों में हों, शनि कुंभ्ह में हो और बृहस्पति धनु राशि में 40 बिन्दुओ के साथ लग्न में हो तब इसे राजयोगकारी माना गया है.
  • जन्म कुण्डली में उच्च का सूर्य लग्न में और चतुर्थ भाव में बृहस्पति 40 बिन्दुओ के साथ हो तब यह स्थिति भी राजयोगकारी मानी गई है.
  • जन्म कुण्डली में शुभ ग्रह केन्द्र अथवा त्रिकोण में स्थित हों और उनसे संबंधित सर्वाष्टकवर्ग के भावों में प्राप्त बिन्दुओ की संख्या द्वारा इंगित आयु का समय जातक के लिए अच्छा माना गया है.
  • पति-पत्नी की जन्म कुण्डलियों में एक-दूसरे की चंद्र राशि में 28 बिन्दु से अधिक होने पर वैवाहिक जीवन अच्छा होता है.

उपरोक्त राजयोगों के अलावा हम आपको सर्वाष्टकवर्ग में दिए गए कुल बिन्दुओ के फल के बारे में भी बताने का प्रयास कर रहे हैं जो निम्नलिखित हैं :-

बिन्दु परिणाम
14 बिन्दु कष्टकारी और मृत्युभय देने वाले
15 बिन्दु सरकार से भय रहने की संभावना बनती है
16 बिन्दु दुर्भाग्य
17 बिन्दु बीमारी अथवा स्थान की हानि
18 बिन्दु धन हानि
19 बिन्दु सगे संबंधियों से लड़ाई-झगडे की संभावना
20 बिन्दु व्यय अधिक होगा और जातक कुकर्मो में लिप्त रहेगा
21 बिन्दु बीमारी अथवा धन की हानि
22 बिन्दु स्मरण व विवेक शक्ति की हानि, कमजोरी व सगे संबंधियो से परेशानी
23 बिन्दु मानसिक चिन्ताएँ, कष्ट और हानि
24 बिन्दु अचानक हानि अथवा अतिव्ययता से धनहानि
25 बिन्दु दुर्भाग्य
26 बिन्दु परेशानियाँ, शिथिलता, स्वभाव में अस्थिरता
27 बिन्दु व्यय अधिक, व्याकुलता, अस्पष्ट विचार और दुविधाजनक मस्तिष्क
28 बिन्दु धन लाभ लेकिन संतोषजनक नही
29 बिन्दु व्यक्ति सम्मान पाता है.
30 बिन्दु यश, कीर्ति व सम्मान मिले
31 से 33 बिन्दु प्रयास अच्छे व मान-सम्मान की प्राप्ति
34 से 40 बिन्दु व्यक्ति सभी प्रकार की भौतिक सुख-समृद्धि पाता है
41 बिन्दु उत्तम धन संपत्ति और अन्य कई स्तोत्रो से आय
42 बिन्दु भौतिक सुख, धार्मिक, धनवान, प्रेम व सम्मान की जातक को प्राप्ति हो
43 बिन्दु धन संपत्ति और खुशी मिलें
44 – 45 बिन्दु एक से अधिक स्तोत्रो से धनलाभ, मान – सम्मान
46 – 47 बिन्दु व्यक्ति सभी गुणो तथा सुखो से युक्त, पवित्र व श्रेष्ठ कार्य करे
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