अष्टकवर्ग के द्वारा जन्म कुण्डली का निरीक्षण | Inspection of Birth Chart Through Ashtakavarga

ज्योतिष में फलकथन करने के बहुत से नियम व योग होते हैं. सभी का सूक्ष्मता से अध्ययन करने के बाद ही किसी नतीजे पर पहुंचना चाहिए. जन्म कुण्डली की विवेचना में अष्टकवर्ग की भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है.

अष्टकवर्ग के सिद्धांतो का सही प्रकार से उपयोग करने के बाद ही कुण्डली की विवेचना करनी चाहिए. सबसे पहले यह देखा जाना चहिए कि किस ग्रह ने कितने बिन्दु किस भाव में दिए हैं और ग्रह स्वयं जिस राशि में स्थित है वहाँ कितने बिन्दु हैं. जन्म कुण्डली में कोई भी ग्रह यदि अपने भिन्नाष्टक में 5 या अधिक बिन्दुओ के साथ होता है और सर्वाष्टक में 28 या अधिक बिन्दुओ के साथ होता है तब वह ग्रह बहुत ही श्रेष्ठ व उत्तम परिणाम देता है.

लेकिन आपको कुण्डली का अध्ययन करने के लिए अष्टकवर्ग के नियमों के साथ अन्य पराशरी नियम भी लगाने चाहिए कि ग्रह कब शुभ तो किन परिस्थितियो में अशुभ फल प्रदान करेगा. यदि ग्रह शुभ होकर नीच या अस्त है तब वह शुभ फल प्रदान नहीं करेगा.

कई बार कोई ग्रह किसी भाव में 4 या इससे भी कम अंक प्राप्त करता है और उसी भाव में अपनी उच्च में स्थित होता है तब भी ज्यादा शुभ परिणाम ग्रह से नहीं मिलते हैं. कई बार ग्रह अपनी नीच अथवा शत्रु राशि में 4 या इससे से भी कम बिन्दुओ के साथ होता है तब भी जातक को अशुभ परिणाम नहीं मिलते हैं. इसका क्या कारण हो सकता है आइए जाने. इसके लिए दशा/अन्तर्दशा  और व्यक्ति की कुण्डली में उस समय में चलने वाला गोचर देखा जाना चाहिए कि क्या है.

अष्टकवर्ग में ग्रहों का गोचर मुख्य भूमिका निभाता है. विशेषतौर पर शनि का गोचर. माना शनि गोचर में ऎसी राशि से गुजर रहा है जिसमें सूर्यादि ग्रह अपने भिन्नाष्टक वर्ग में कोई बिन्दु नहीं दे रहे हैं तब शनि का यह गोचर बिन्दु ना देने वाले ग्रहों के कारकत्व के अनुसार बीमारी, मृत्युतुल्य कष्ट या कोई अन्य बुरी घटना आदि देने का कारण बन सकते हैं.

उदाहरण के लिए सूर्य शारीरिक स्वास्थ्य की ओर इशारा करता है तब ऎसी राशि में शनि का गोचर, जहाँ सूर्य ने 0 बिन्दु दिए हैं, में शारीरिक समस्याओं को जन्म देगा. उदाहरण के लिए यदि जन्म कुण्डली में सूर्य द्वारा गृहीत राशि में और उससे नवम राशि में भी 0 बिन्दु है तब जिस समय शनि इस नवम भाव में गोचर करेगा उस समय व्यक्ति के पिता की चिन्ताएँ बढ़ सकती है, स्वास्थ्य हानि हो सकती हैं और यदि उस समय जातक की दशा भी प्रतिकूल चल रही हो तब मृत्यु अथवा मृत्युतुल्य कष्ट भी सहना पड़ सकता है.

शनि के गोचर का अष्टकवर्ग में जो उदाहरण सूर्य के लिए दिया गया है ठीक उसी प्रकार अन्य ग्रहों को भी इसी तरह से देखा जा सकता है. जैसे चंद्रमा माता का कारक होता है और बुध को चाचा-चाची या सगे संबंधियों के लिए देखा जाता है. मंगल को छोटे बहन-भाईयो के लिए लिया जाता है. इन सभी का अध्ययन भी सूर्य की भांति ही करेगें जिसका हमने ऊपर उदाहरण लिया है. ऎसा नहीं है कि अष्टकवर्ग से केवल अशुभ फल ही देखे जाते हैं. अष्टकवर्ग से हम जीवन के किसी भी क्षेत्र के फलों का अध्ययन कर सकते हैं. बृहस्पति के गोचर से शुभ फलों को जाना जा सकता है. नौकरी कब लगेगी, विवाह कब होगा आदि बहुत से प्रश्नो का उत्तर अष्टकवर्ग के द्वारा जाना जा सकता है.

अष्टकवर्ग में जिस ग्रह के पास जितने अधिक बिन्दु होते हैं वह उतने ही शुभ फल प्रदान करता है और परिणम उतना ही श्रेष्ठ भी होता है. माना किसी व्यक्ति की जन्म कुण्डली में द्वितीयेश के पास 5 से अधिक बिन्दु है और द्वितीयेश जिस राशि में स्थित है और द्वितीय भाव में 28 से अधिक बिन्दु है तब ऎसा व्यक्ति अवश्य ही अपने जीवन में धनवान बनता है.

अन्त में हम कहना चाहेगें कि आप सभी को अष्टकवर्ग का एक नियम सदा ध्यान में रखना चाहिए कि कोई भी ग्रह अपनी उच्च राशि में अथवा स्वराशि में होने पर भी तब तक शुभ फल नही देता है जब तक कि उसके भिन्नाष्टक में पर्याप्त बिन्दु उसे मिल नहीं मिल जाते हैं.

  • सभी ग्रह 0 से 3 बिन्दुओ के साथ स्थित होने पर निर्बल माने जाते हैं.
  • 4 बिन्दुओ के साथ स्थित ग्रह को सामान्य माना जाता है. ना शु भ और ना ही अशुभ.
  • 5 से अधिक बिन्दुओ के साथ स्थित होने पर ग्रह को बली माना जाता है.
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कुंडली पर ग्रहों का प्रभाव ऎसे बदल सकता है आपका जीवन

कुण्डली पर ग्रहों का प्रभाव विशेष रूप से पड़ता है. इनके बिना कुण्डली कि विवेचना का आधार नहीं किया जा सकता है. व्यक्ति की कुण्डली के योग ग्रह दशाओं में फल देते है. किसी व्यक्ति की कुण्डली में अगर शुभ व अशुभ स्थितियों के विषय में जानना हो तो सर्वप्रथम कुण्डली में ग्रहों कि स्थिति का आंकलन करने की आवश्यकता बहुत होती है. अनेक शुभ योग व धन योग बनने के बावजूद भी जातक वह साधारण सा जीवन व्यतीत कर रहा होता है तो समझना चाहिए की उस व्यक्ति को धन योग व राज योगों से जुडे ग्रहों की महादशाएं अभी तक नहीं मिली है. यदि व्यक्ति को केन्द्र व त्रिकोण की दशाएं उचित समय पर मिल जाती हैं तो जातक को जीवन में अच्छे परिणाम एवं सफलता की प्राप्ति हो पाती है. यह ग्रह दशाओं का ही खेल है की व्यक्ति राजा से रंक व रंक से राजा बन जाता है.

सूर्य शुभ स्थानों का स्वामी होने पर जातक को परिश्रम के कामों में सफलता प्रदान करने में सहायक बनता है. इसी प्रकार  व्यक्ति को इस शुभ स्थनों की दशा मिलने पर राज्य से उसे लाभ की प्राप्ति कराता है. नौकरी या सम्मान प्राप्त होता है. व्यक्ति के आय के क्षेत्रों में सफलता प्राप्त होती है. व्यक्ति मेहनत व लगन से काम करता है तथा अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने में सक्षम बनता है. परंतु सूर्य यदि अशुभ स्थान का स्वामी बने तो व्यक्ति के जीवन में अनेक प्रकार के कष्ट आ जाते हैं. अपने कार्य क्षेत्र के लोगों से मतभेद व बॉस जैसे बडे़ अधिकारियों के साथ तनाव की स्थिति झेलनी पड़ती है राज्य या कहें सरकार की ओर से परेशानियां सामने आने लगती हैं.

चन्द्र का शुभ भाव का स्वामी होने से व्यक्ति में निर्णय लेने की क्षमता अच्छी होती है. उत्तम भोजन की प्राप्ति होती है तथा वस्त्राभूषण व संतान से सुख भी प्राप्त होता है. परंतु इसके विपरित स्थिति में होने पर जातक का मन सदैव अशांत रहता है. मानसिक संताप में वृद्धि होती है.

मंगल के शुभ भावों का स्वामी होने पर इसकी दशा में जातक शत्रुओं पर विजय पाने में सफल होता है. व्यक्ति को भूमि, भवन से लाभ की प्राप्ति होती है. पराक्रम व साहस के बल पर सफलता मिलती है. मंगल अपनी दशा में मेहनत के कामों से भी सफलता देता है. लेकिन अशुभ मंगल की दशा में व्यक्ति अपने मित्रों का विरोध सहता है. उसका अपने भाईयों एवं संतान से मतभेद रहता है.

बुध शुभ भावों का स्वामी होने पर इस दशा में जातक को मित्रों के सहयोग से लाभ मिलता है. व्यापार एवं सरकारी पक्ष से आय में वृद्धि होती है. जातक में ज्ञान की वृद्धि होती है. लेकिन बुध अशुभ भावों के स्वामी होने पर अशुभ फल देते है. व्यक्ति को मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है. उसके बोलने और सोचने समझने की क्षमता पर प्रभाव पड़ता है.

गुरु शुभ भावों का स्वामी होने पर इनकी दशा में व्यक्ति की धार्मिक जागरूकता बढ़ती है. ज्ञान की जिज्ञासा तीव्र होती है.  धार्मिक गतिविधियों में उसकी उपस्थिति बनी रहती है. गुरु की अशुभ दशा में व्यक्ति को सरकारी से कष्ट की प्राप्ति होती है.  यह समय संतान पक्ष से भी कष्ट देता है. संतान से सुख व सहयोग में कमी आती है. व्यक्ति इस समय में अपने रिश्तेदारों से संबध विच्छेद पा सकता है. मानसिक क्लेश प्राप्त होते है. व्यक्ति के धैर्य में कमी आती है. जातक के अपने पिता व अपने गुरुओं से संबध खराब रहते हैं.

शुक्र शुभ भावों का स्वामी होकर अपनी दशा में व्यक्ति को भौतिक सुख-सुविधाएं देता है.उतम वाहनों का सुख मिलता है. इस समय में संगीत व कला के क्षेत्रों में भी रुचि बढ़ती है. स्त्रियों के सहयोग से लाभ मिलता है. वहीम इसके विपरित शुक्र अशुभ भावों का स्वामी होकर अपनी दशा में वाहनों से कष्ट व दुर्घटना होने की संभावनाएं बढा़ देता है. व्यस्नों में पड़ सकता है. व्यक्ति को अपने शत्रुओं से हार का सामना करना पडता है. मित्रों से भी संबन्धों में तनाव देता है.

शनि शुभ भावों का स्वामी होकर अपनी दशा में जातक को मेहनत व संघर्ष से सफलता की प्राप्ति कराता है. व्यक्ति को समाज में सम्मान मिलता है. सेवकों से लाभ की प्राप्ति होती है. परंतु यदि शनि अशुभ भावों का स्वामी हो तो इस दशा में व्यक्ति को धन की हानि होती है.सेवकों से कष्ट मिलता है. कानूनी नियमों का उल्लंघन करता है. राज्य से दण्ड मिल सकता है. व्यक्ति गलत कामों में रहता है और लक्ष्य से भटकने की संभावना बनी रहती है. जातक निराशावादी व आलसी बन जाता है.

राहु के शुभ फल की दशा में व्यक्ति के सम्मान में वृद्धि होती है. व्यक्ति की सभी योजनाएं पूरी होती है. उसे भूमि , भवन की प्राप्ति होती है. व्यक्ति अपनी नितियों की सफलता के फलस्वरुप धन का संचय करने में सफल रहता है. व्यक्ति को राजनिति में रुचि होने पर इस क्षेत्र में भी सफलता की प्राप्ति होती है. अशुभ राहु की दशा में व्यक्ति को संतान से कष्टों की प्राप्ति होती है. मानसिक अशान्ति व चिन्ताएं मिलती है. मेहनत के अनुरुप उसे सफलता नहीं मिलती है.

केतु के शुभ फल कि दशा में व्यक्ति अपने प्रतियोगियों पर विजय पाता है. परिश्रम के  कामों से लाभ की प्राप्ति होती है. विदेशों में सम्मान मिलता है. व्यक्ति का घर से दूर भाग्योदय होता है. लेखन व अध्ययन में रूझान बढ़ता है व सफलता ही मिलती है. केतु के अशुभ फल समय व्यक्ति के स्वास्थय में कमी आती है, मेहनत करने पर भी सफलता नहीं मिलती है. गुरु की नाराजगी झेलनी पडती है. साहस में भी कमी होती है.

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वर्षफल कुण्डली के लग्न में विभिन्न भावों के उदय होने का फल

वर्ष कुण्डली का अध्ययन बहुत सी बातों के आंकलन के लिए किया जाता है. लेकिन वर्ष कुण्डली का अपना स्वतंत्र महत्व ज्यादा नहीं होता है. जन्म कुण्डली की दशा और योगो को ध्यान में रखते हुए ही वर्ष कुण्डली का अध्ययन किया जाना चाहिए. जन्म कुण्डली और वर्ष कुण्डली दोनो को सामने रखकर सूक्ष्मता से इनका अध्ययन करना चाहिए तब उसके बाद किसी नतीजे पर पहुंचना चाहिए. वर्ष कुण्डली के अध्ययन में सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना गया है कि जन्म कुण्डली का कौन सा भाव वर्ष कुण्डली का लग्न बन रहा है क्योकि उस वर्ष व्यक्ति के जीवन में उसी भाव से संबंधित फलों का बोलबाला बना रहता है.

आइए आज आपको बताते हैं कि जन्म कुण्डली का जो भाव वर्ष कुण्डली का लग्न बनता है तब उस वर्ष किन-किन बातों का सामना व्यक्ति को करना पड़ सकता है और किन फलों की प्राप्ति हो सकती है.

प्रथम भाव | First House

यदि किसी वर्ष किसी व्यक्ति का जन्म लग्न ही वर्ष कुण्डली का लग्न बनकर उदय हो जाता है तब उसे “द्विवर्ष लग्न” कहते हैं. कई लोग इसे “पुनर्जन्म वर्ष” भी कहते हैं. इसे ज्यादा शुभ नहीं माना जाता है. यह वर्ष स्वास्थ्य के लिए हानिकर सिद्ध हो सकता है. बहुत से उतार – चढ़ाव का सामना इस वर्ष में करना पड़ता है. नौकरी में असंजस की स्थिति बनी रहती है. व्यवसाय की उन्नति रुक सी जाती है. इस वर्ष कोई नया काम करने का जोखिम नहीं उठाना चाहिए. यदि कोई व्यक्ति नौकरी करता हैं और उसे वह बदलना चाहता हैं तो पहले नई नौकरी ढूंढनी चाहिए फिर उसके बाद पुरानी को छोड़ना चाहिए.  इस वर्ष मानसिक परेशानी काफी ज्यादा बनी रहने की संभावना बनी रहती है. कार्य सिद्धि में रुकावटो तथा बाधाओं का सामना करना पड़ता है.

दूसरा भाव | Second House

जिस वर्ष व्यक्ति विशेष की जन्म कुण्डली का दूसरा भाव वर्ष कुण्डली का लग्न बनता है तब वह वर्ष कुछ बातों के लिए अनुकूल तो कुछ के लिए प्रतिकूल भी हो सकता है. इस वर्ष व्यक्ति को सम्पत्ति से लाभ मिल सकता है, आय के नए स्तोत्र उभरकर सामने आ सकते हैं. आर्थिक दृष्टि से तो यह वर्ष अनुकूल रहता है लेकिन इस वर्ष दुर्घटना होने की भी संभावना बनती है. इस वर्ष कुछ सामान्य से रोग भी व्यक्ति को घेरे रह सकते हैं और बहुत सी मानसिक चिन्ताओं से भी व्यक्ति त्रस्त रहता है.

तीसरा भाव | Third House

जिस वर्ष जन्म कुण्डली का तीसरा भाव वर्ष कुण्डली का लग्न बनता है उस वर्ष व्यक्ति विशेष के पराक्रम में वृद्धि होती है. भाईयों की उन्नति व तरक्की होती है और उनकी कीर्ति चारो ओर फैलती है व उन्हें यश भी मिलता है. इस वर्ष व्यक्ति स्वयं भी ऎसा काम करता है जो समाज के हितों के लिए होता है और उस काम के करने से व्यक्ति को ख्याति मिलती है और सम्मान भी बढ़ता है.

चतुर्थ भाव | Fourth House

यदि जन्म कुण्डली का चतुर्थ भाव वर्ष कुण्डली का लग्न बनता है तब उस वर्ष व्यक्ति विशेष को जीवन में प्रसन्नता मिलती है. उसके सुख में वृद्धि होती है. इस वर्ष व्यक्ति नया वाहन ले सकता है. सुख उपभोग की नई वस्तुओं पर व्यय कर सकता है. घर को संवारने में धन खर्च हो सकता है. ऎश्वर्य, सुख, सम्मान, सौभाग्य, धन लाभ आदि सभी प्रकार से यह वर्ष अनुकूल रहने की संभावना बनती है.

पंचम भाव | Fifth House

यदि जन्म कुण्डली का पंचम भाव वर्ष कुंडली का लग्न बनता है तब वह वर्ष अनुकूल होता है. व्यक्ति को सुखों की प्राप्ति होती है. उस वर्ष विवाह, संतान अथवा अन्य कोई मांगलिक काम संपन्न होने की संभावना बनती है. मनोनुकूल काम बनते हैं, मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है तथा विद्यार्थियों को परीक्षा में सफलता मिलती है. यह वर्ष उद्यमी वर्ष कहलाता है और व्यक्ति अपने प्रयासों तथा मेहनत के बल पर सफलताएँ पाता है और आगे बढ़ता है.

छठा भाव | Sixth House

यदि जन्म कुण्डली का छठा भाव वर्ष कुण्डली का लग्न बनता है तब उस वर्ष मुकदमे आदि का सामना करना पड़ सकता है अथवा व्यक्ति के उस वर्ष बहुत से शत्रु बन सकते हैं.  प्रतिस्पर्धाओ का सामना करना पड़ सकता है. हर क्षेत्र में प्रतिद्वंद्वी खड़े हो सकते हैं. रोग, ऋण तथा शत्रु हर समय हावी रहने का प्रयास करते हैं. व्यक्ति को बहुत सी बाधाओं और संघर्षो का सामना करना पड़ता है. इस वर्ष व्यक्ति को धन हानि, शत्रुओ की चिन्ता, घर में कलह का सामना करते रहना पड़ता है. इस वर्ष व्यक्ति को पश्चाताप भी रहता है.

सप्तम भाव | Seventh House

यदि जन्म कुण्डली का सप्तम भाव वर्ष कुण्डली का लग्न बनता है तब उस वर्ष मांगलिक काम संपन्न होने की संभावना बनती है. यदि व्यक्ति अविवाहित है तब उसके विवाह की संभावना बनती है. इस वर्ष मनोवांछित फलों की प्राप्ति जातक होती है. इस वर्ष हर क्षेत्र में व्यक्ति को विजय हासिल होती है और उसकी लोकप्रियता भी बढ़ती है.

अष्टम भाव | Eighth House

यदि जन्म कुण्डली का आठवाँ भाव वर्ष कुण्डली का लग्न बनता है तब उस वर्ष व्यक्ति को कष्ट उठाना पड़ता है. उस वर्ष अचानक होने वाली घटनाओं का समावेश उसके जीवन में रहता है. बीमारी का भी सामना व्यक्ति को करना पड़ता है. जीवन के सभी क्षेत्रों में असफलता हाथ लगती है. सम्मान हानि हो सकती है तथा व्यक्ति को आर्थिक कष्टो का भी सामना करते रहना पड़ सकता है.

नवम भाव | Ninth House

यदि जन्म कुण्डली का नवम भाव वर्ष कुण्डली का लग्न बनता है तब ऎसा वर्ष “भाग्योदय वर्ष” कहा जाता है. ऎसे वर्ष व्यापार में सफलता मिलती है. यदि व्यक्ति नौकरी करता है तब नौकरी में वृद्धि व उन्नति मिलती है. सुख सुविधाएँ बढ़ती हैं और कार्य संपन्न होते हैं. जीवन के सभी क्षैत्रों में सफलताएँ मिलती हैं. समाजिक तथा धार्मिक कामों में व्यक्ति भाग लेता है और सम्मान पाता है.

दशम भाव | Tenth House

यदि जन्म कुण्डली का दशम भाव वर्ष कुण्डली का लग्न बनता है तब वह वर्ष व्यक्ति के लिए सफल वर्ष कहलाता है. इस वर्ष व्यक्ति के राजकीय सेवा में जाने की संभावना बनती है. यदि व्यक्ति सरकार से संबंधित काम नही करता है तब उसके कार्यक्षेत्र में ही उसे उन्नति, तरक्की, वृद्धि तथा सफलता मिलती है. व्यक्ति जिस भी क्षैत्र में काम करता है उस क्षेत्र से उसे मान सम्मान मिलता तथा पुरस्कार आदि मिल सकता है.

एकादश भाव | Eleventh House

यदि जन्म कुण्डली का एकादश भाव वर्ष कुण्डली का लग्न बनता है तब उस वर्ष व्यापार करने वालो को सफलताएँ अधिक मिलती हैं. बेरोजगारों को रोजगार के नए अवसर मिलते हैं. आर्थिक चिन्ताएँ दूर होती हैं. यदि व्यक्ति का पहले का कोई पैसा रुका हुआ है तब उसे वह वापिस मिलने की संभावना बनती है. आकस्मिक रुप से धन लाभ हो सकता है.

द्वादश भाव | Twelfth House

यदि जन्म कुण्डली का द्वादश भाव वर्ष कुण्डली का लग्न बनता है तब उस वर्ष बहुत सारे व्यय बने रहते हैं. व्यक्ति को झूठी चिन्ताओं का सामना करना पड़ सकता है. वासनाओं में लिप्त रह सकता है और इसकी पूर्त्ति के लिए अनैतिक संबंध स्थापित कर सकता है और पैसे का भी अपव्यय कर सकता है. धन का अपव्यय इतना अधिक हो जाता है कि व्यक्ति ऋण से ग्रस्त हो जाता है. मानसिक तथा आर्थिक परेशानियाँ हर समय व्यक्ति को घेरे रहती हैं.

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आईये जाने कैसा रहता है जन्म कुंडली के बारह भावों पर शनि का प्रभाव

आज के संदर्भ में शनि के विषय में जो भी धारणाएं बनाई गई हैं वह ज्योतिष की कसौटी पर कितनी उचित ठहरती है इस का अनुमोदन करने की आवश्यकता है. वर्तमान समय में कई भ्रांतियां इसके साथ जोड़ दि गई ज्योतिष शास्त्रों में शनि के विकृत रुप की व्याख्या अधिक की गई है पर वास्तविक रुप में ऎसा नहीं है. ज्योतिष शास्त्र के अलग- अलग ग्रन्थों में शनि का अलग- अलग वर्णन किया गया है.

ज्योतिष ग्रन्थों के मिले-जुले वर्णन के अनुसार शनि काफी बलवान प्रकृति के, कठोर, दुष्ट ग्रह हैं. इसके साथ साथ इस बात पर भी ग्रन्थ एकमत है कि जब व्यक्ति पर शनि की कृपा होती है तो व्यक्ति के पास इतना धन आता है कि वह संभाले नहीं संभलता है. परन्तु जब शनि रुष्ट होते है तो व्यक्ति को एक वक्त का भोजन भी नसीब नहीं होता है. प्रत्येक व्यक्ति के लिये शनि समान नहीं हो सकते है. शनि के प्रभाव से मिलने वाले फल जन्म कुण्डली के ग्रह-योग व महादशा- अन्तर्दशा पर काफी हद तक निर्भर करते हैं.

शनि को लेकर कई प्रकार की कथाएं एवं मान्यताएं ज्योतिष और हिन्दु शास्त्रों में है. सभी ने शनि को पीड़ादायक और कष्टकारी ग्रह के रूप में ही बताया है. इस धारणा के कारण शनि के प्रति लोगों के मन में एक भय बना रहता है परंतु वास्तव में शनि न्याय के ग्रह हैं और जो भी कुछ वह हमें देते हैं वह हमारे किए गर कर्मों का ही फल होता है. कुण्डली बारह भावों में शनि की उपस्थिति का आंकलन इस प्रकार समझा जा सकता है.

ज्योतिष के अनुसार शनि जब लग्न में होता है तब यह शारीरिक कष्ट देता है और अनावश्य धन हानि का कारण बनता है.

कुण्डली में शनि द्वितीय भाव में होता है उन्हें राजकीय क्षेत्र से पीड़ा या उनसे परेशानी होती है, इन्हें सरकार से दंड या यातना मिलने की भी संभावना रहती है.द्वितीय भाव का शनि कार्यों में बाधा और असफलता देता है.

शनि का तीसरे भाव में होना शुभ रहता है.इस भाव में शनि धन की स्थिति को मजबूत बनाता है और आर्थिक लाभ देता है. राजकीय पक्ष में सफलता एवं सरकार से सहयोग दिलाने में तीसरे भाव का शनि मददगार होता है. शनि इस भाव में अधर्म से बचाता है और धार्मिक विचारों का संचार करता है.

चतुर्थ भाव सुख का घर कहा जाता है. चतुर्थ भाव में जिनके शनि होता है उनके जीवन का सकुन छिन जाता है. धन का व्यय होता रहता है और व्यक्ति को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ सकता है. शारीरिक रूप से क्षीण एवं बुरी आदतों की ओर झुकाव भी देता है.

पांचवें भाव में शनि के प्रभाव स्वरूप चोरी का डर, आर्थिक तंगी और रोग से की आशंका भी बनी रहती है. पांचवां भाव संतान का भाव होता है इस भाव में शनि के होने से संतान पक्ष से व्यक्ति को कष्ट होता है.

शनि का षष्टम भाव में होना धन लाभ दिलाता है एवं शत्रु पीड़ा से बचाव करता है. कुछ मामलों में काफी सुखद स्थिति देता है. सप्तम भाव में शनि का संबंध गृहस्थ जीवन की असफलता की ओर भी संकेत करता है.

अष्टम भाव का शनि एक अपवाद है जिसमें उसे शुभ कहा जाता है पर यह शुभता व्यक्ति की आयु के संदर्भ में ही होती है जिसमें उसे लम्बी आयु की प्राप्ति होती है परंतु साथ ही शारीरिक और मानसिक कष्ट भी व्यक्ति को प्राप्त होता है. आर्थिक मामलों के लिए भी इस भाव का शनि अनुकूल नहीं होता.

नवम भाव में शनि की उपस्थिति से भाई बहनों को तकलीफ होती है. पिता से तनाव भी दे सकती है. दशम भाव में स्थित शनि आर्थिक पक्ष से कमज़ोर बनाता है. धन के लिए इस भाव का शनि शुभ फलदायी नहीं होता.

एकादश भाव का शनि धन की स्थिति को मजबूत करता है और जीवन में आर्थिक कष्ट महसूस नहीं होने देता. इस भाव का शनि मित्रों से सहयोग एवं लाभ दिलाने वाला होता है.

द्वादश भाव खर्च का घर होता है इस भाव में शनि की स्थिति का मतलब अत्यधिक व्यय होना है. द्वादश भाव का शनि खर्च तो करवाता है परंतु यह कार्यों में सफलता भी दिलाता है.

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वर्षफल में मुंथा विचार | Analyzing Muntha in Varsha Kundali

आइए आज आपको वर्ष कुंडली के एक और महत्वपूर्ण पहलू मुंथा के बारे में जानकारी देने का प्रयास करें. मुंथा का उपयोग वर्ष कुंडली में किया जाता है. जन्म के समय मुंथा लग्न भाव में मौजूद होती है और एक वर्ष तक वही रहती है. उसके बाद एक भाव आगे बढ़ जाती है और इस प्रकार जब बच्चा बारहवें साल में प्रवेश करता है तब वह जन्म कुण्डली के बारहवें भाव में होती है. माना जन्म के समय लग्न में कन्या राशि उदय होती है तो मुंथा लग्न में कन्या राशि में होगी. अगले वर्ष की जब वर्ष कुण्डली बनाई जाएगी उसमें मुंथा एक भाव आगे अर्थात जन्म कुण्डली के दूसरे भाव तुला राशि में होगी. वर्ष कुण्डली में तुला राशि जिस भाव में पड़ेगी मुंथा उसी भाव में मानी जाएगी.

मुंथा का विचार वर्षफल में किया जाता है. वर्षफल के चतुर्थ, छठे, सप्तम, अष्टम और बारहवें भाव में मुंथा की स्थिति को अच्छा नहीं माना गया है. इन भावों में मुंथा जीवन में कुछ ना कुछ परेशानी पैदा करती है. वर्ष कुंडली में मुंथा के साथ मुंथा स्वामी का भी विचार किया जाता है कि वह कुण्डली में किस हालत में है. आइए वर्ष कुण्डली के विभिन्न भावों में मुंथा फल का विचार करें.

प्रथम भाव में मुंथा फल | Muntha in First House

वर्ष कुंडली के यदि पहले भाव अर्थात लग्न में ही मुंथा स्थित होती है तब उसका फल ना तो बहुत अच्छा होता है और ना ही बहुत खराब होता है. वर्ष सामान्य सा ही रहता है.  व्यक्ति यदि परिश्रम करता है तो कुछ लाभ उसे हो जाता है और कुछ धन लाभ मिल जाता है. लेकिन स्वास्थ्य की दृष्टि से लग्न की मुंथा को अच्छा नही माना गया है. लग्न में होने से यह बेकार की चिन्ताएँ और क्लेश पैदा करति है.

मुंथा फल दूसरे भाव में | Muntha in Second House

यदि वर्ष कुण्डली के दूसरे भाव में मुंथा स्थित है तब व्यक्ति नए उद्योग अथवा व्यवसायों में धन का निवेश करता है. जातक पूरे वर्ष अत्यधिक परिश्रम व कठोर मेहनत करता है. व्यक्ति प्रतिकूल परिस्थितियों को भी अपने परिश्रम से अपने अनुकूल बनाने में सफलता पाता है. धन प्राप्ति में बहुत सी बाधाओं और संकटो का सामना करना पड़ता है.

मुंथा फल तीसरे भाव में | Muntha in Third House

वर्ष कुण्डली के तीसरे भाव में अगर मुंथा स्थित है तब व्यक्ति अपनी नवीन योजनाओं से आगे बढ़ता है और सफलता पाता है. समाज में उसे मान-सम्मान मिलता है और आदर की दृष्टि से देखा जाता है. व्यक्ति ऎसा कुछ काम करता है कि उसे समाज में प्रसिद्धि मिलती है. लेकिन तीसरे भाव की मुंथा निजी जीवन के लिए शुभ नहीं मानी जाती है. पारीवारिक कलह पैदा होता है. भाई से मतभेद होता है और कलह इतना बढ़ सकता है कि भाईयों में तनाव होकर घर का बंटवारा तक हो सकता है. पारीवारिक कलह के कारण मुकदमा आदि भी हो सकता है.

मुंथा फल चतुर्थ भाव में | Muntha in Fourth House

चतुर्थ भाव की मुंथा को ज्यादा शुभ नही माना गया है. यह मिश्रित फल प्रदान कर सकती है. मन व्याकुल तथा बेचैन रह सकता है. घर में कलह क्लेश बने रह सकते हैं. साल भर आपको अनिष्ट फलों का सामना करना पड़ सकता है. स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ भी व्यक्ति को घेरे रह सकती है. शरीर में दर्द की शिकायत, हड्डियों में दर्द, वायु संबंधी विकार, शत्रुओं से चिन्ता आदि बातों से परेशानी होने की संभावना बनती है. इस वर्ष व्यक्ति को झूठी बदनामी का भी खतरा बना रह सकता है.

चतुर्थ भाव की मुंथा नौकरी अथवा व्यापार में भी अड़चने अटकाने का काम कर सकती है. मुंथा के इस स्थान में होने से स्थान परिवर्तन भी हो सकता है जिसे व्यक्ति नहीं चाहता है. बिना मन के स्थान परिवर्तन से दुख और अधिक बढ़ जाते हैं.

मुंथा फल पंचम भाव में | Muntha in Fifth House

वर्ष कुण्डली के पांचवें भाव की मुंथा को शुभ माना गया है. इस वर्ष व्यक्ति को सुख शांति मिलती है, वह उन्नति प्राप्त करता है. विद्यार्थियों को परीक्षा में सफलता मिलती है. संतान प्राप्ति होती है अथवा संतान की उन्नति होती है. इस भाव में मुंथा की स्थिति से व्यक्ति को आर्थिक लाभ होता है. नौकरी तथा व्यापार में उन्नति के अवसर मिलते हैं. मान प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है. पंचम भाव को धर्म त्रिकोण भी कहा गया है इसलिए जिस वर्ष पंचम भाव में मुंथा होती है उस वर्ष व्यक्ति को धर्म संबंधी कामों में रुचि रह सकती है, व्यक्ति तीर्थ यात्राएँ करता है. विवाह अथवा अन्य शुभ मांगलिक कार्य संपन्न होते हैं. सुख सौभाग्य में वृद्धि भी होती है.

छठे भाव में मुंथा फल | Muntha in Sixth House

वर्ष कुण्डली के छठे भाव में मुंथा का स्थित होना शुभ नही माना गया है. छठे भाव की मुंथा व्यक्ति को बुरे काम की ओर प्रेरित करती है. व्यक्ति बुरे व्यसनो और दुष्कर्म में लिप्त हो सकता है. लड़ाई झगड़े कर सकता है और इस कारण मुकदमें आदि में भी फंस सकता है. मन में बुरे ख्याल पनप सकते हैं. बुरी आदतों का शिकार होने से बदनामी भी हो सकती है. व्यक्ति के स्वभाव में चिड़चिड़ापन समा सकता है. हर छोटी बात पर वह परेशान हो जाएगा. मन में हर समय उत्तेजना व अशांति बनी रहेगी. शरीर में आलस्य की मात्रा बढ़ सकती है और अकसर सिरदर्द की शिकायत भी बनी रह सकती है. इस वर्ष व्यक्ति अनैतिक संबंधो में भी फंस सकता है और उनके कारण बदनामी होने की भी संभावना बनती है.

सप्तम भाव में मुंथा फल | Muntha in Seventh House

जिस वर्ष कुण्डली के सप्तम भाव में मुंथा होती है उस वर्ष स्त्री को रोग होने की संभावना बनती है यदि स्त्री की कुण्डली है तब उसके पति को बीमारी होने की संभावना बनती है. इस वर्ष व्यर्थ के व्यय बने रह सकते हैं. भाईयों से परेशानी अथवा हानि की संभावना बनती है. परिवार में आपस में विरोध तथा वैर की भावना बढ़ सकती है. व्यक्ति झूठे मुकदमों में फंस सकता है. मान हानि का सामना करना पड़ सकता है. मन में उद्वेग्निता बनी रह सकती है. अधर्म की ओर रुचि बढ़ सकती है. उत्साह की कमी रह सकती है. व्यक्ति जुए और सट्टे अदि जैसी बातों में भी संलग्न रह सकता है. इस वर्ष भाग्य आपसे रूष्ट रह सकता है और आपके बने हुए काम बिगड़ सकते हैं.

अष्टम भाव में मुंथा फल | Muntha in Eighth House

वर्ष कुण्डली के आठवें भाव में भी मुंथा की स्थिति को शुभ नहीं माना गया है. आठवें भाव की मुंथा व्यक्ति को बिना उद्देश्य  भटकाने का काम करती है. सम्पत्ति का नुकसान हो सकता है या व्यापार में हानि होने की भी संभावना बनती है. बुरे कार्यों की ओर रुझान हो सकता है और इस कारण आर्थिक हानि भी होती है और बाद में आपको इस बात का पश्चाताप भी हो सकता है. व्यक्ति को शारीरिक व मानसिक पीड़ा दोनो ही बनी रह सकती हैं. व्यक्ति शरीर से दुर्बल हो सकता है और रोगों की बढ़ोतरी हो सकती है. स्थान परिवर्तन हो सकता है.

नवम भाव में मुंथा फल | Muntha in Ninth House

नवम भाव की मुंथा को शुभ माना गया है. वर्ष कुण्डली के जिस वर्ष में मुंथा नवम भाव में होती है उस वर्ष व्यक्ति का भाग्योदय होने की संभावना बनती है. इस वर्ष इच्छाएँ पूरी होने की संभावना भी बनती है. यदि व्यक्ति अपना व्यवसाय करता है तो उस वर्ष उसका व्यवसाय फलता-फूलता है. यदि व्यक्ति नौकरी करता है तब उस वर्ष व्यक्ति को नौकरी में प्रमोशन व तरक्की मिलती है. व्यक्ति शुभ तथा मांगलिक कार्यों में संलग्न रह सकता है. तीर्थ यात्राएँ भी कर सकता है. श्रेष्ठ पद की प्राप्ति भी होती है और समाज में सम्मानित भी होता है.

दशम भाव में मुंथा फल | Muntha in Tenth House

यदि दशम  भाव में मुंथा हो तब उस वर्ष व्यक्ति को पद लाभ मिलता है, प्रमोशन मिलती है और सरकार की ओर से सम्मान भी मिलता है. व्यक्ति तरक्की पाता है. मन में जिन कार्यों को करने की ईच्छा होती है वह पूरे होते हैं. व्यवसाय उन्नति की ओर अग्रसर होता है. व्यक्ति को सुयश व सम्मान मिलता है. इस भाव की मुंथा व्यक्ति को ऎश्वर्य और पूरा सुख उपभोग प्रदान करती है.

एकादश भाव में मुंथा फल | Muntha in Eleventh House

वर्ष कुण्डली के एकादश भाव में अगर मुंथा होती है तब वह वर्ष आर्थिक दृष्टि से श्रेष्ठ रहता है. इस वर्ष व्यक्ति को आकस्मिक धन लाभ होने की संभावना बनती है. साथ ही विभिन्न अन्य स्त्रोतो से भी आय के साधन बनने की संभावना बनती है. सरकार से लाभ मिल सकता है. रुका हुआ पैसा वापिस मिलने की संभावना बनती है. व्यक्ति के आमोद-प्रमोद में वृद्धि होती है. व्यक्ति सभी प्रकार के मनोरथ सिद्ध होने की संभावना बनती है.

द्वादश भाव में मुंथा फल | Muntha in Twelfth House

बारहवें भाव की मुंथा को शुभफलदायी नही माना गया है. इस वर्ष यह व्यक्ति को अनिष्टकारी फल प्रदान करने वाली हो सकती है. इस वर्ष आपके व्यय अधिक हो सकते हैं और आपका संचित धन भी खर्च हो सकता है. कार्य बनने में बाधाओं का सामना करना पड़ता है. इस भाव की मुंथा दुष्ट लोगो का संग करा सकती है. चित्त में चंचलता बनी रह सकती है. व्यक्ति धर्म विरुद्ध काम कर सकता है और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ भी परेशानी उत्पन्न करती है.

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ग्रहों का दशा प्रभाव | Effects of Dasha of Planets

ज्योतिष में ग्रहों की दशाओं का महत्वपूर्ण स्थान है. इन्हीं ग्रहों के द्वारा व्यक्ति के जीवन में अनेक प्रकार के उतार-चढा़व आते हैं जिससे कभी सुख व कभी दुख की धूप छांव जीवन में मौजूद रहती है तथा व्यक्ति के जीवन के संपूर्ण घटनाक्रम में यह अपना विशेष प्रभाव डालती हैं. यह दशाएं ग्रहों द्वारा गत जन्म के कर्मफलों को इस जन्म में दर्शाने का माध्यम है. महादशाओं के गणना की पद्धति में नक्षत्रों पर आधारित दशा पद्धतियाँ अधिक लोकप्रिय हैं. वेदांग ज्योतिष में चंद्रमा जिस नक्षत्र में उस दिन होते हैं वह उस दिन का नक्षत्र कहलाता है व उस नक्षत्र का जो स्वामी ग्रह कहा गया है, उसकी महादशा जन्म के समय मानी जाती है. क्रम अनुसार प्रत्येक नक्षत्र या ग्रह की महादशा जीवन में आती रहती है.

कौन से ग्रह की महादशा पहले मिलेगी यह जन्म समय चंद्रमा जिस नक्षर में होता है उस नक्षत्र के स्वामी ग्रह से ज्ञात होता है और जातक की महादशा आरंभ होती है. दशाओं के सभी काल क्रम में आपकोअनेक प्रकार के परिवर्तन देखने को मिलते हैं. जन्म में अगर कोई दशा चल रही है तो यह कतई नहीं माना जाना चाहिए कि उस ग्रह से संबंधित समस्त कर्मों का फल मिल चुका है बल्कि यह संभव है कि संपूर्ण कर्मों का केवल कुछ प्रतिशत ही उस दशा में मिला हो

ग्रहों के दशा क्रम में सर्वप्रथम विंशोत्तरी दशा का आगमन होता है जो एक ग्रह की पूर्ण दशा होती है और इसमें अन्य ग्रहों की अन्तर दशा, प्रत्यन्तर दशा, सूक्ष्म दशा, प्राण दशाएं आती हैं. प्रत्येक ग्रह महादशा के काल में सभी ग्रह अपनी-अपनी अंतर्दशा लेकर आते हैं. इसमें प्राण दशा सबसे कम अवधि की होती है और महादशा सबसे अधिक अवधि की मानी जाती है. महादशाओं का चक्र एक सौ बीस वर्ष में पूरा होता है. इन दशाओं में पहली दशा तो जन्म नक्षत्र पर आधारित है.

दशा प्रभाव | Effects of Dasha

ज्योतिषी के अनुसार सभी ग्रह अपनी दशा-अन्तर्दशा में सभी प्रकार का फल प्रदान करते हैं. ग्रह सर्वशक्ति संपन्न हैं और अच्छा-बुरा कोई भी फल दे सकते हैं. यह सत्य है कि वे अपनी दशा में आकर ही अपने संपूर्ण अच्छे-बुरे फलों का दर्शन कराती हैं. महादशा शब्द का अर्थ है वह विशेष समय जिसमें कोई ग्रह अपनी प्रबलतम अवस्था में होता है और कुंडली में अपनी स्थिति के अनुसार शुभ-अशुभ फल देता है.  स्वग्रह, मूल त्रिकण या उच्च के ग्रह की दशा शुभ मानी जाती होती है. वैदिक ज्योतिष में अनेक दशाओं का वर्णन किया गया हैं परन्तु सरल, लोकप्रिय, सटीक एवं सर्वग्राह्य विंशोत्तरी दशा ही है. सूर्य आत्मा का, चन्द्रमा मन का, मंगल बल का, बुध बुद्धि का, गुरु जीव का, शुक्र स्त्री का और शनि आयु का कारक है. अत: इनकी महादशाओं का फलादेश देश, काल और परिस्थिति को ध्यान में रखकर करना चाहिए फलादेश में परिस्थिति का ध्यान रखना आवश्यक है.

एक ग्रह की महादशा में अन्य ग्रहों की दशाएं आती हैं, जिसे अन्तर्दशा कहा जाता है. मुख्य ग्रह के साथ अन्तर्दशा के स्वामी ग्रह का भी प्रभाव फल का अनुभव होता है. जिस ग्रह की महादशा होगी, उसमे उसी ग्रह की अन्तर्दशा पहले आएगी अधिक सूक्ष्म गणना के लिए अन्तर्दशा में उन्ही ग्रहों की प्रत्यंतर दशा भी निकली जाती है, जो इसी क्रम से चलती है. इससे अच्छी-बुरी घटनाओं का पता लगाया जा सकता है. किसी ग्रह की महादशा में उसके शत्रु ग्रह की, पाप ग्रह की और नीचस्थ ग्रह की अन्तर्दशा अशुभ होती है. शुभ ग्रह में शुभ ग्रह की अन्तर्दशा अच्छा फल देती है.

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कुंडली से जानें रोग का कारण

ज्योतिष में एक अच्छे स्वास्थ्य के लिए बहुत सी बातों का आंकलन किया जाता है.  जन्म कुण्डली में लग्न, लग्नेश चंद्रमा और चंद्र राशिश की स्थिति देखी जाती है. अगर यह चारों बली हैं तब व्यक्ति को स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना कम करना पड़ता है. जन्म कुण्डली के साथ नवांश कुण्डली, द्रेष्काण कुण्डली, द्वादशांश कुण्डली और त्रिशांश कुण्डली का विश्लेषण किया जाता है. इन सभी का बारी-बारी से अध्ययन इस लेख में किया जाएगा कि किस तरह से इन्हें स्वास्थ्य के लिए देखा जाए.

जन्म कुण्डली | Janma Kundali

जन्म कुण्डली के लग्न की की स्थिति देखी जाती है. यदि इस पर शुभ ग्रहों का प्रभाव है तब आप शारीरिक रुप से बली रहेगें. यदि लग्नेश भी बली है तब आप शारीरिक रुप से और अधिक बली बन जाते हैं. लेकिन इन पर पाप और कुण्डली के अशुभ ग्रहों का प्रभाव आता है तब आप शारीरिक रुप से अस्वस्थ रह सकते है. लग्न या लग्नेश यदि मृत्यु भाग के अंशो पर स्थित है तब भी स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से होकर गुजरना पड़ सकता है.

इसी तरह से चंद्रमा और चंद्र राशिश का अध्ययन किया जाता है कि कुण्डली में इनकी स्थिति क्या है. यदि दोनो बली है तब आपका मन कमजोर नहीं होगा. दिल-दिमाग से आप स्वस्थ रहेगें. विपरीत परिस्थितियों में भी कभी आपका आत्मविश्वास डगमगायेगा नहीं.

नवांश कुण्डली | Navansh Kundali

जन्म कुण्डली यदि शरीर है तो नवांश कुण्डली उसकी आत्मा है. जन्म कुण्डली के लग्न, चंद्र, लग्नेश और चंद्रेश की स्थिति यहाँ देखी जाएगी कि क्या ये सब यहाँ भी बली हैं. यदि बली है तब आपको स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ नहीं होगी. यदि जन्म कुण्डली में बली हैं और नवांश कुण्डली में बली नहीं है तब आपको स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ कभी-कभी घेरे रह सकती हैं. यदि ये चारो जन्म कुण्डली और नवांश कुण्डली में भी कमजोर हैं तब आपको स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ हो सकती है.

द्रेष्काण कुण्डली | Dreshkan Kundali

चिकित्सा ज्योतिष में स्वास्थ्य संबंधी बातो का आंकलन करने के लिए इस कुण्डली का अध्ययन किया जाता है. इस कुण्डली के लग्न और लग्नेश का अध्ययन किया जाता है कि उनकी क्या स्थिति है. उसके बाद जन्म कुण्डली के लग्न, लग्नेश की स्थिति यहाँ देखी जाती है. वह शुभ भावो व शुभ ग्रहों से संबंध बना रहे हैं अथवा अशुभ भावों व अशुभ ग्रहों से संबंध बना रहे हैं. यदि शुभ संबंध ज्यादा बनता है तब स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ कम होगी और अशुभ से संबंध ज्यादा बनता है तब स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ ज्यादा होगी.

द्वादशांश कुण्डली | Dwadshansh Kundali

द्रेष्काण कुण्डली की ही तरह इस वर्ग कुण्डली के भी लग्न और लग्नेश का अध्ययन किया जाता है और फिर जन्म कुण्डली के लग्न, लग्नेश का अध्ययन किया जाता है. यदि यह चारो बली है तब आप सदा स्वस्थ रहेगें. यदि मिश्रित फल हैं तब स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना समय-समय पर करते रहने पड़ सकता है. यदि चारों ही कमजोर हैं तब अकसर स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ घेरे रह सकती हैं.

त्रिशांश कुण्डली | Trishansh Kundali

स्वास्थ्य के संबंध में यह कुंडली सबसे अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है. इस कुण्डली का हर तरह से निरीक्षण किया जाता है. इस कुण्डली के लग्न, लग्नेश, जन्म कुण्डली के लग्न,लग्नेश, चंद्रमा और चंद्र राशिश आदि का आंकलन किया जाता है. जिस ग्रह की दशा/अन्तर्दशा कुण्डली में चल रही होती है उसका भी यहाँ निरीक्षण किया जाता है. यदि वह इस त्रिशांश कुण्डली में पीड़ित है तब उस समय आपको स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है.

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स्वास्थ्य पर ग्रहों का प्रभाव | Effect Of Planets on Health

अच्छा स्वास्थ्य सफलता की कुंजी माना जाता है. यदि व्यक्ति शारीरिक तथा मानसिक दोनों ही रुपों से स्वस्थ हैं तो वह सभी समस्याओं और कठिनाईयों से पार पा सकने में सक्षम होता है. कुण्डली के द्वारा स्वास्थ्य के विषय में अनेक बातों का अध्ययन किया जा सकता है. ज्योतिषी की सहायता से स्वास्थ्य का ज्ञान किया जा सकता है. आपकी कुण्डली में यदि लग्न तथा लग्नेश दोनों ही बली तथा शुभ अवस्था में है, तब आप हमेशा स्वस्थ रहेगें. यदि दोनों में से एक पीड़ित है तब आपका स्वास्थ्य मध्यम बली रहेगा.

अच्छे स्वास्थ्य के लिए लग्न तथा लग्नेश का संबंध कुण्डली के छठे, आठवें अथवा बारहवें भाव से नहीं होना चाहिए. दोनों में से किसी का संबंध इन भावों से बनता है तब आपको स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना प्रतिकूल दशाओं में करना पड़ सकता है.

सभी ग्रह शरीर के किसी न किसी अंग का प्रतिनिधित्व करते हैं. नौ ग्रहों में से जब कोई भी ग्रह पीड़ित होकर लग्न, लग्नेश, षष्ठम भाव अथवा अष्टम भाव से सम्बन्ध बनाता है. तो ग्रह से संबंधित अंग रोग प्रभावित हो सकता है. प्रत्येक ग्रह के पीड़ित रहने पर या कोई ग्रह छठे स्थान का स्वामी होकर लग्न भाव या किसी अन्य भाव में कौन सी बीमारी दे सकता है.

किसी भी रोगी जातक की कुंडली का विश्लेषण करते समय सबसे पहले तीसरे, छठे और आठवें भाव के ग्रहों की शक्ति का आंकलन करना चाहिए. चिकित्सा ज्योतिष के  में कुछ नियम वेद – पुराणों में भी दिए गए हैं. विष्णु वेद-पुराण में कहा गया है की भोजन करते समय अपना मुख पूर्व दिशा, उतर दिशा में रखना चाहिए. उससे पाचन क्रिया उत्तम रहती है.

जन्म पत्रिका और हस्त रेखाओं का अध्ययन करने के बाद ज्योतिषी यह बताने का प्रयत्न करते हैं की उक्त व्यक्ति को भविष्य में कौन सी बीमारी होने की संभावना है. जैसे जन्म कुण्डली में तुला लग्न या राशि पीड़ित हो तो व्यक्ति कि कमर के निचले वाले भाग में समस्या होने की संभावना रहती है. जन्मपत्रिका में बीमारी का घर छठवां स्थान माना जाता है और अष्टम स्थान आयु स्थान है.

तृतीय स्थान अष्टम से अष्टम होने से यह स्थान भी बीमारी के प्रकार की और इंगित करता है. जैसे तृतीय स्थान में चंद्र पीड़ित हो तो टी.बी. की बीमारी की संभावना रहती है और तृतीय स्थान में शुक्र पीड़ित हो तो मधुमेह की संभावना रहती है. उपरोक्त ग्रहों में जो ग्रह छठे भाव का स्वामी हो या छठे भाव के स्वामी से युति सम्बन्ध बनाए उस ग्रह की दशा में रोग होने के योग बनते हैं. छठे भाव के स्वामी का सम्बन्ध लग्न भाव लग्नेश या अष्टमेश से होना स्वास्थ्य के पक्ष से शुभ नहीं माना जाता है.

वर्ग कुण्डली प्रभाव | Influence of Varga Kundali

जन्म कुण्डली के साथ वर्ग कुण्डलियों का निरीक्षण अति महत्वपूर्ण होता है. केवल जन्म कुण्डली के आधार पर स्वास्थ्य के बारे में कुछ नहीं कहना चाहिए. स्वास्थ्य संबंधित वर्ग कुण्डलियों का विश्लेषण अवश्य करना चाहिए. जन्म कुण्डली के लग्नेश की स्थिति नवाँश कुण्डली में अवश्य देखनी चाहिए. यदि जन्म कुण्डली का लग्नेश नवाँश कुण्डली में बली है तब स्वास्थ्य अच्छा रहेगा.

स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण त्रिशाँश कुण्डली मानी जाती है. इस कुण्डली में जन्म कुण्डली के लग्न और लग्नेश की स्थिति देखी जाती है. त्रिशाँश कुण्डली के लग्न और लग्नेश की स्थिति भी देखी जाती है. यदि यह चारों बली अवस्था में है तब स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ नहीं होती हैं. यदि इनमें से अधिकतर कमजोर हैं तब स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ व्यक्ति को घेरे रहती हैं.

जन्म कुण्डली के तीसरे भाव को सूक्ष्म आयु स्थान कहा जाता है. इसलिए द्रेष्काण कुण्डली से भी स्वास्थ्य का अनुमान लगाया जाता है. जन्म कुण्डली के लग्नेश की स्थिति द्रेष्काण कुण्डली में कैसी है, यह देखा जाता है. यदि लग्नेश कमजोर है तब स्वास्थ्य पर ध्यान देना चाहिए. द्वादशाँश कुण्डली से भी स्वास्थ्य का आंकलन किया जाता है. द्वादशाँश कुण्डली के लग्नेश और जन्म कुण्डली के लग्नेश दोनो की स्थिति देखी जाती है. बली होने पर स्वास्थ्य अच्छा रहेगा.

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जन्म कुण्डली से जानें अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्यक शर्तें

अच्छे स्वास्थ्य के लिए जन्म कुण्डली में बहुत सी बातो का आंकलन किया जाता है जो निम्नलिखित है :-

  • सबसे पहले तो लग्न, लग्नेश का बली होना आवश्यक है. यदि अशुभ भाव का स्वामी जन्म लग्न में स्थित है तब स्वास्थ्य संबंधी परेशानियो से होकर गुजरना पड़ सकता है.
  • आठवें भाव से ज्यादा बली लग्न होना चाहिए तब स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ कम होती है.
  • केन्द्र में बैठे शुभ ग्रह स्वास्थ्य के लिए अच्छे माने जाते हैं लेकिन यदि यही शुभ ग्रह वक्री हो जाते हैं तब स्वास्थ्य के लिए सुरक्षा नहीं देगें.
  • लग्न में गुरु कई हजार दोषो को खतम करता है लेकिन यदि यह वक्री है तब कोई सुरक्षा प्रदान नहीं करेगा.
  • लग्नेश का 6,8 या 12वें भाव में स्थित होना स्वास्थ्य के लिए शुभ नहीं होता है.
  • सूर्य आत्मा का और चंद्रमा मन का कारक ग्रह है. इसलिए इन दोनो के बली होने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है.
  • लग्न यदि राहु/केतु अक्ष पर स्थित है तब स्वास्थ्य के लिए शुभ नहीं है.
  • लग्नेश यदि राहु/केतु अक्ष पर स्थित है तब यह भी स्वास्थ्य के लिए शुभ नहीं है.
  • लग्न या चन्द्र गंडात में स्थित है तब स्वास्थ्य के लिए शुभ नहीं हैं.
  • लग्न या लग्नेश का संबंध 22वें द्रेष्काण के साथ नहीं होना चाहिए.
  • लग्न या लग्नेश का संबंध 64वें नवांश से होने पर स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ आती हैं.
  • केन्द्राधिपति दोष के साथ ही 22वें द्रेष्काण या 64वें नवांश से भी संबंध बनता है यब यह स्वास्थ्य के लिए अच्छा नही माना जाता है.
  • छिद्र ग्रहों को भी स्वास्थ्य के लिए अशुभ माना जाता है.

उपरोक्त योगो के अलावा कुछ और भी योग हैं जिनमें ग्रह यदि स्थित है तब स्वास्थ्य संबंधी परेशानी आती है.

सर्प द्रेष्काण | Sarpa Drekkana in Jyotish

  • जन्म कुण्डली में कोई ग्रह यदि कर्क राशि में दूसरे द्रेष्काण या तीसरे द्रेष्काण में स्थित है तब स्वास्थ्य संबंधी परेशानियो से गुजरना पड़ सकता है.
  • जन्म कुण्डली में कोई ग्रह यदि वृश्चिक राशि के पहले या दूसरे द्रेष्काण में स्थित  है तब स्वास्थ्य के लिय यह अनुकूल स्थिति नहीं मानी जाती है.
  • जन्म कुण्डली में लग्नेश यदि मीन राशि के तीसरे द्रेष्काण में स्थित है तब यह स्वास्थ्य के लिए शुभ स्थिति नहीं मानी जाती है.

पाश द्रेष्काण | Pash Drekkana in Jyotish

  • जन्म कुण्डली में यदि कोई ग्रह वृष राशि के पहले द्रेष्काण में स्थित है तब यह पाश द्रेष्काण में माना जाएगा. इस द्रेष्काण में होने से व्यक्ति बंधन में रहता है.
  • जन्म कुण्डली में यदि कोई ग्रह सिंह राशि के पहले द्रेष्काण में है तब यह पाश द्रेष्काण में होगा जो कि शुभ स्थिति नहीं मानी जाती है.
  • जन्म कुण्डली में कोई ग्रह कुंभ राशि के पहले द्रेष्काण में स्थित है तब यह पाश द्रेष्काण में माना जाता है और यह शुभ स्थिति नहीं मानी जाती है.
  • जन्म कुण्डली में कोई ग्रह तुला राशि में पहले या तीसरे द्रेष्काण में स्थित है तब यह शुभ स्थिति नहीं मानी जाती है.
  • मकर राशि में कोई ग्रह यदि पहले या तीसरे द्रेष्काण में स्थित है तब यह शुभ स्थिति नहीं मानी जाती है.

कुण्डली में स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ तभी होगी जब उनके होने के योग होगें और उन्ही से संबंधित दशा/अन्तर्दशा भी कुण्डली में चल रही होगी. साथ ही गोचर भी अनुकूल नहीं होगा अन्यथा परेशानी नहीं होगी.

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उल्का योगिनी दशा | Ulka Yogini Dasha | Ulka Yogini Dasha in Astrology

योगिनी दशा क्रम के अगले चरण में उल्का दशा आती है.  उल्का दशा की समय अवधि 6 वर्ष की मानी गई है. इस समय के अनुसार जातक को योगिनी दशा फलों की प्राप्ति होती है. शनि से संबंधित इस दशा में व्यक्ति को संघर्ष की स्थिति का सामना करना करना पड़ सकता है और जातक में गुस्से की स्थिति बनी रहती है.

उल्का योगिनी दशा में शनि का जुडा़व होने से विद्वानों ने इस दशा में देह कष्ट, मनोव्यथा व जैसी समस्याओं का अनुमोदन किया है. ज्योतिष विद्वानों नें शनि को एक पाप ग्रह की संज्ञा दी है. इस कारण उल्का योगिनी दशा में जातक को अनेक प्रकार की शनि से संबंधित प्रभावों को भी अपने में देखना मिल जाता है.  उल्का दशा में जातक के मन में द्वंद की स्थिति देखी जा सकती है. अनैतिक आचरण और गलत कामों द्वारा धन कमाने की ओर अग्रसर रह सकते हैं. इसी के साथ कुसंगति में होने पर धन का नाश व मान समान की हानि का सामना करना पड़ सकता है. जो व्यक्ति के लिए संताप को बढा़ने वाला हो सकता है.

कुछ विद्वान उल्का दशा का संबंध अग्नि संबंधि दुर्घटनाओं, वरिष्ठ जनों के सहयोग से होने वाले कामों में सफलता मिलना, न्याय करने वाला होना, काम के प्रति रात दिन को एकाकार कर देना, धन की प्राप्ति, भ्रमण इत्यादि से जोड़ते हैं. इसी के साथ साथ यह समय राजा एवं सेवक से हानी देने वाला भी बन सकता है. परिवार से संताप मिलता है व कष्ट की अनुभूति बढ़ जाती है.

दया व परोपकारित के कामों में उन्मुख होना तथा अधिकार एवं सत्ता के सुख व सेवकों को पाना भी उल्का दशा के दौरान हो सकता है. इन दो विचधारों के मध्य उल्का दशा एक तथ्य को तो अवश्य दर्शाती है कि शनि से संबंधित फलों के मिलने की दशा प्रबल होती है इस समय में उल्का योगिनी दशा में व्यक्ति अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग रहने की आवश्यकता है.

व्यक्ति में कान या पांव से संबंधित तकलीफ हो सकती है. उदर एवं दांतों में तकलीफ हो सकती है. व्यक्ति में क्रोद्ध करने की प्रवृत्ति अधिक बढ़ सकती है और शांति से कार्यों को निपटाने की शक्ति क्षिण होने लगती है. जिसके कारण मन अशांत रहने लगता है और शुभता में कमी आने लगती है. यह दशा उपद्रव व अशांति को बढा़ती है. कभी कभी अग्नि एवं दुर्घटना से भय दिलाती है. इस अवधि में अशुभता के लक्ष्णों को अधिकता में बताया गया है.

वैदिक ज्योतिष में अनेक दशाओं का वर्णन किया गया हैं  सूर्य आत्मा का, चन्द्रमा मन का, मंगल बल का, बुध बुद्धि का, गुरु जीव का, शुक्र स्त्री का और शनि आयु का कारक है. अत: इनकी महादशाओं का फलादेश देश, काल और परिस्थिति को ध्यान में रखकर करना चाहिए फलादेश में परिस्थिति का ध्यान रखना आवश्यक है.

जन्म से मृत्यु तक ग्रहों के प्रभाव से विभिन्न प्रकार की सुखद एवं दु:खद घटनाओं से प्रभावित होते है. ग्रह उच्च राशि में हो तो नाम, यश प्राप्त होता है तथा ग्रहों के अशुभ होने पर कष्ट प्राप्त होता है. जन्म नक्षत्र से दशा स्वामी किस नक्षत्र में है ये देखना आवश्यक होता है.

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