कुण्डली से जाने संबंधों में अलगाव का कारण | Reasons For Separation in Astrology

कुण्डली का सप्तम भाव विवाह का प्रमुख स्थान होता है. यदि आपकी कुण्डली में सप्तम भाव या सप्तमेश का संबंध लग्न या लग्नेश, पंचम भाव या पंचमेश और नवम भाव या नवमेश से नहीं बनता है तब प्रेम संबंध विवाह में नहीं बदल पाते हैं. जन्म कुण्डली में कई बार कुछ ऎसी स्थितियां दिखाई देती हैं जिनसे प्रेम संबंधों के होने तथा बनने का अंदेशा दिखाई पड़ता है इस कारण में हम देख सकते हैं कि जन्म कुण्डली के सातवें भाव से इस प्रकार की स्थिति को देखा जा सकता है, लेकिन जब स्थिति के फलित होने की बात होती है तो वह सामने नहीं आ पाती इसका कारण हमें वर्ग कुंडली में देखने पर मिल सकता है क्योंकि वर्ग कुण्डलियां तथ्यों की पुष्टि में मजबूती को दर्शाती हैं.

इसलिए जब हम नवाँश कुण्डली में इस तथ्य की पुष्टि करने की कोशिश करते हैं तो उसमें संबंधों का अलगाव दिखाई देता है तथा साथ ही साथ प्रेम संबंधों के भाव भी पीड़ि़त नज़र आते हैं, जिस कारण प्रेम संबंध विवाह के बंधन तक पहुंचने से पूर्व ही टूट जाते हैं या अलगाव की संभावना प्रबल होती नज़र आती है. कुण्डली में यदि पंचम भाव का स्वामी नवम भाव में स्थित है या नवम भाव का स्वामी पंचम भाव स्थित है तो भी प्रेम विवाह में बाधा आती है और वह परिणय बंधन में नहीं बंध पाते.

जन्म कुण्डली के कुछ भाव संबंधों के टूटने में अहम भूमिका निभाते हैं. इन भावों से साथ ग्रहों संबंध रिश्तों में दूरी को लाता है. कुण्डली के इन भावों में प्रमुखत: छठे भाव का रोल स्पष्ट दिखाई पड़ता है. कुण्डली का छठा भाव लडा़ई – झगडों का अदालती मुकद्दमों जैसी बातों का कारक होता है. इस भाव का संबंध यदि प्रेम संबंधित भावों के साथ बने तो प्रेम संबंधों में तनाव की स्थिति बनी रहती है. देखा जाता है कि यदि जातक की दशा में छठे भाव का प्रभाव चल रहा है तब प्रेम संबंध अकसर टूट जाते हैं. इसी तरह यदि अष्टम भाव की दशा चल रही हो अथवा इस भाव में बैठे ग्रह की दशा चल रही है तब अचानक ही प्रेम संबंधों में दरार आ जाती है और वह विच्छेद की ओर अग्रसर होने लगते हैं.

बारहवाँ भाव व्यय भाव है यहां से संबंध बनने का अर्थ है की किसी भी चीज का व्यय होना अत: इस भाव की दशा आने पर प्रेम का व्यय होता है और प्रेम संबंध टूटकर बिखर जाते हैं. इसी प्रकार जब शनि ग्रह का संबंध या शनि का प्रभाव दशा में आता है तब व्यक्ति का मन किसी बात से या किसी घटना से उचाट हो जाता है. इसी के साथ उसे प्रेम नीरस लगने लगता है. मन वैरागी हो जाता है और ऎसी स्थिति में बने हुए संबंध दूर होने लगते हैं. इस कारण एक दिन प्रेम संबंध धीरे-धीरे टूटने की कगार पर आ जाते हैं.

इसी के साथ यदि कुण्डली में पंचम भाव अत्यधिक पीड़ित हो या वह शनि, राहु, केतु या मंगल के  प्रभाव में हो तब प्रेम तो हो सकता है लेकिन यह प्रेम ज्यादा लम्बे समय तक नहीं चलता है और विवाह होने से पूर्व ही वह समाप्त हो जाता है. सूर्य को पृथकतावादी ग्रह माना गया है. सूर्य संबंधों को विच्छेद कराने का काम करता है. इसलिए यदि कुण्डली में सूर्य की दशा हो या पंचम भाव में सूर्य स्थित हो तब प्रेम संबंध अधिक समय तक नहीं रहते हैं.

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डायबिटिज (मधुमेह) होने के योग | Yogas in a Kundali for Diabetes

वैदिक ज्योतिष में मेडिकल ज्योतिष का अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान माना गया है. इसके द्वारा व्यक्ति की जन्म कुण्डली से उसके स्वास्थ्य का आंकलन बेहतर तरीके से किया जा सकता है.  कई बार चिकित्सक जातक की बीमारी को ढूंढ ही नहीं पाते हैं, ऎसे में एक कुशल ज्योतिषी जन्म कुण्डली का भली-भाँति निरीक्षण कर के बीमारी का अंदाजा लगा सकता है कि शरीर के किस भाग में पीड़ा नजर आती है. आज के इस लेख के माध्यम से हम मधुमेह रोग(डायबिटिज) के बारे में बात करेगें कि जन्म कुण्डली के वह कौण से योग हैं जिनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि व्यक्ति को मधुमेह की बीमारी हो सकती है.

बृहस्पति ग्रह को लीवर का कारक माना गया है और शुक्र ग्रह को पैन्क्रियाज का कारक माना गया है. डायबिटिज का संबंध पेट में होने वाली क्रियाओं से है तो पंचम भाव व छठे भाव का भी आंकलन किया जाता है. कुल मिलाकर हम जन्म कुंडली में गुरु,शुक्र, पंचम भाव तथा छठे भाव का अध्ययन करते हैं. यदि यह चारों अथवा एक से अधिक बाते नकारात्मक हो रही हैं तब व्यक्ति को डायबिटिज की बीमारी का सामना करना पड़ सकता है. आइए कुछ इस बीमारी के होने के लिए कुछ योगो पर एक नजर डालते हैं.

डॉ चरक के नियम | Dr. Charak’s Principles

  • जन्म कुंडली में बृहस्पति ग्रह 6,8 या 12वें भाव में स्थित हो या अपनी नीच राशि में स्थित हो तब व्यक्ति को डायबिटिज होने की संभावना बनती है.
  • जन्म कुण्डली में शुक्र छठे भाव में स्थित हो और बृहस्पति 12वें भाव में स्थित हो तब भी मधुमेह रोग हो सकता है.
  • पंचम भाव या पंचमेश का संबंध छष्ठ, षष्ठेश, अष्टम या द्वादश भाव से बन रहा हो तब भी यह बीमारी हो सकती है. यहाँ संबंध से हमारा भाव युति, स्थिति व दृष्टि से है.
  • छठे भाव का स्वामी 12वें भाव में स्थित हो द्वादशेश का संबंध गुरु से बन रहा हो.
  • छठे भाव के स्वामी और बारहवें भाव के स्वामी का आपस में राशि परिवर्तन हो रहा हो.
  • बृहस्पति ग्रह जन्म कुण्डली में शनि व राहु के प्रभाव में हो.
  • जन्म कुण्डली में बृहस्पति अस्त हो और राहु/केतु अक्ष पर स्थित हो.
  • जन्म कुण्डली में यदि बृहस्पति व शनि की युति बहुत नजदीकी अंशो पर हो रही हो अर्थात दोनो एक ही नवांश में स्थित हो.
  • बृहस्पति जन्म कुण्डली में छठे, आठवे या बारहवें भाव में पीड़ित हो.


डॉ बी.वी. रमण के नियम | Dr. B.V Raman’s Principles

  • जन्म कुण्डली में बली पाप ग्रह जन्म लग्न या आठवें भाव में स्थित हो तथा शुक्र व बृहस्पति या चंद्र बृहस्पति पीड़ित अवस्था में स्थित हैं तब भी मधुमेह रोग की संभावना बनती है.
  • जन्म कुण्डली में शुक्र आठवें भाव में पाप ग्रहों से दृष्ट हो तब भी डायबिटिज की संभावना बनती है.
  • कुण्डली में बृहस्पति ग्रह शनि की राशि – मकर या कुंभ में स्थित हो और अशुभ ग्रह से दृष्ट भी हो तब भी यह बीमारी हो सकती है.
  • बृहस्पति का संबंध अगर शनि से बन रहा हो तब भी यह बीमारी हो सकती है.
  • राहु का संबंध कुण्डली में अष्टमेश से बन रहा हो और यह संबंध आठवें भाव या त्रिकोण में बन रहा हो क्योकि जन्म कुण्डली में जब भी अष्टमेश का संबंध राहु से बनता है तब बीमारी की संभावना बनती है.
  • शनि का संबंध चंद्रमा से हो या कर्क राशि से हो तब भी मधुमेह रोग की संभावना बनती है.
  • मंगल, शनि, राहु या केतु जल राशि (4,8,12) में स्थित हो विशेषकर 6, 8 या 12वें भाव में तब भी मधुमेह रोग होने की संभावना बनती है.
    • बृहस्पति, राहु के नक्षत्र में हो और राहु से ही दृष्ट भी हो तब भी मधुमेह रोग की संभावना बनती है.
    • जन्म कुंडली में अशुभ बृहस्पति पीड़ित होकर छठे भाव में स्थित हो तब भी मधुमेह रोग की संभावना बनती है.
    • बृहस्पति ग्रह आठवें भाव में शनि से दृष्ट हो तब भी यह रोग हो सकता है.
    • लग्न किसी अशुभ ग्रह से पीड़ित हो रहा है और बृहस्पति भी पाप ग्रह से पीड़ित हो रहा हो तब भी डायबिटिज होने की संभावना बनती है.
    • सूर्य लग्न में स्थित हो और मंगल छठे भाव में हो तब भी यह रोग हो सकता है.
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अष्टकवर्ग में नक्षत्रों द्वारा गोचर की महत्ता | Significance of Transits Through Nakshatra in Ashtakavarga

नक्षत्रों द्वारा गोचर के महत्व को समझने में सहायता मिलती है. अष्टकवर्ग में इनका उपयोग करके फलित के संदर्भ को जाना जा सकता है. नक्षत्रों को क्रमश: जन्म, सम्पत, विपत, क्षेम, प्रत्येरि, साधक, वध, मित्र और अति मित्र के रूप में नौ वर्गों में बांटा जाता है. इस प्रकार से सभी सत्ताईस नत्रों का विभाज्न आसानी से हो जाता है. वर्गों के अनुसार 27 नक्षत्र तीन भागों में बंट जाते हैं. कुण्डली में इनकी स्थिति का अनुमान चंद्रमा से होता है. इनकी गिनती चंद्रमा द्वारा गृहीत नक्षत्र से प्रारंभ होती है. उदाहरण के तौर पर यदि किसी जातक का जन्म मकर राशि के उत्तरषाढा़ नक्षत्र में हुआ हो तो यह उक्त जातक का जन्म नक्षत्र कहलाएगा.

ज्योतिषी ग्रंथों में ग्रहों के विभिन्न नक्षत्रों में गोचर के फलों का उल्लेख विस्तारपूर्वक मिलता है. कुछ के अनुसार किसी भी ग्रह का जन्म नक्षत्र से तीसरे, पांचवें और सातवें नक्षत्र में गोचर काफी परेशानी देने वाला रह सकता है. यह तीन नक्षत्र विपत, प्रत्यरि और वध तारा हैं इनमें त्रिकोण समुह आता है जिसके अंतर्गत जब कोई शुभ ग्रह इन नक्षत्रों में गोचर करता है तो परिणाम अनुकूल नहीं होते तथा जब पाप ग्रह या क्रूर ग्रह का इन नक्षत्रों में गोचर होता है तो अनुकूल फलों की प्राप्ति हो सकती है.

ज्योतिष में विभिन्न ग्रहों का अलग-अलग नक्षत्र में गोचर का फल भिन्न-भिन्न होता है.

सूर्य | Sun Planet

सूर्य का जन्म नक्षत्र से पहले, चौदहवें और तेईसवें नक्षत्र पर गोचर अशुभ फल देने वाला बनता है. किंतु अन्य नक्षत्रों पर यह शुभ फलदायक होता है.

चंद्रमा | Moon Planet

चंद्रमा का जन्म नक्षत्र से 1, 2, 16 और 18 नक्षत्र पर गोचर अशुभ फलदायक होता है. अन्य नक्षत्रों में यह शुभ फलदायक होता है.

मंगल | Mars Planet

मंगल का जन्म नक्षत्र से 1, 8, 12, 15, 18, 21वें नक्षत्र पर गोचर अशुभ फलदायक माना गया है और इसके अतिरिक्त अन्य नक्षत्रों में इसका गोचर शुभ कहा गया है.

बुध | Mercury Planet

बुध का जन्म नक्षत्र से 1, 3, 7, 12, 18 एवं 19वें नक्षत्र पर गोचर अशुभ फल दायक रहता है और अन्य नक्षत्रों में यह शुभ फलदायक माना गया है.

बृहस्पति | Jupiter Planet

गुरू का जन्म नक्षत्र से 1, 3, 7, 12, 18 एवं 19वें नक्षत्र पर गोचर अशुभ फल दायक रहता है और अन्य नक्षत्रों में यह शुभ फलदायक माना गया है.

शुक्र | Venus Planet

शुक्र ग्रह का जन्म नक्षत्र से 1, 3, 7, 12, 18 एवं 19वें नक्षत्र पर गोचर अशुभ फल दायक रहता है और अन्य नक्षत्रों में यह शुभ फलदायक माना गया है.

शनि | Saturn Planet

शनि का जन्म नक्षत्र से 1, 7, 9, 11, 26 और 27वें नक्षत्र पर गोचर अशुभ फल दायक रहता है और अन्य नक्षत्रों में यह शुभ फलदायक माना गया है.

राहु | Rahu Planet

राहु का जन्म नक्षत्र से 1, 7, 9, 11, 26 और 27वें नक्षत्र पर गोचर अशुभ फल दायक रहता है और अन्य नक्षत्रों में यह शुभ फलदायक माना गया है.

केतु | Ketu Planet

केतु का जन्म नक्षत्र से 1, 7, 9, 11, 26 और 27वें नक्षत्र पर गोचर अशुभ फल दायक रहता है और अन्य नक्षत्रों में यह शुभ फलदायक माना गया है.

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सर्वाष्टक वर्ग बनाने की सारिणी | Procedure for Formulating Sarva Ashtak Varga

सर्वाष्टक बनाने के लिए आप प्रस्तारक वर्ग न बनाना चाहें तो यहां दि गई विधि से आप आसानी से सर्वाष्टक बना सकते हैं. कभी कभी किसी विशेष कार्य के लिए केवल सर्वाष्टकवर्ग की ही आवश्यकता होती है. इसलिए ऎसे में भिन्नाष्टक को बनाए बिना भी इस सारणी की सहायता से सीधे सर्वाष्टकवर्ग बनाया जा सकता है.

यहां दी गई सारिणी में ग्रहों द्वारा विभिन्न भावों में दिए गए बिन्दुओं को संख्या के रूप में दर्शाया गया है. इसे इस प्रकार से समझा जा सकता है कि जैसे सूर्य ग्रह अपने से 1, 2, 3, 4, स्थान में 3 अंक देता है. पांचवे स्थान में 2, छठे स्थान में 3, सातवें स्थान में 4, आठवें स्थान में 5, नवें में 3, दसवें में 5, ग्यारहवें में 7 और बारहवें में 2 बिन्दु अर्थात अंक देता है.

इस तरह से यह सारिणी में अन्य ग्रहों के द्वारा अपने स्थान से अलग जगहों पर दिए गए कुल शुभ अंकों को संख्या से दर्शाते हैं. सर्वाष्टकवर्ग बनाने के लिए सर्वप्रथम एक तालिका का निर्माण करें, जन्म कुण्डली में दिए ग्रहों  द्वारा गृहीत राशियों को विशेष चिन्ह से दर्शाएं. अब इस सारिणी की मदद से प्रत्येक ग्रह द्वारा दिए गए अंकों की संख्या को संबंधित लाईन में लिखकर सीधे सर्वाष्टकवर्ग बनाया जा सकता है. पर इस बात का विशेष ध्यान रखें की ग्रह जिस राशि में स्थित हो उसे सारिणी में चिन्ह लगा लें और वहां से अंक लिखना आरंभ करें. इस प्रकार सीधे सर्वाष्टक वर्ग बनाने की विधि को समुदाय अष्टकवर्ग भी कहा जाता है.

राशि 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12
ग्रह
शनि 3 2 4 4 4 3 3 4 4 4 6 1
बृहस्पति 2 1 1 2 3 4 2 4 2 4 7 4
मंगल 4 5 3 4 3 3 4 4 4 6 7 2
सूर्य 3 3 3 3 2 3 4 5 3 5 7 2
शुक्र 2 3 3 3 4 4 2 3 4 3 6 3
बुध 3 1 5 2 6 6 1 2 5 5 7 3
चंद्रमा 2 3 5 2 2 5 2 2 2 3 7 1
लग्न 5 3 5 5 2 6 1 2 2 6 7 1
योग 24 21 29 25 26 34 19 26 26 36 54 17


ग्रहों के लिए ग्रह गुणकर | Points for Planets

ग्रह सूर्य चंद्रमा मंगल बुध बृहस्पति शुक्र शनि
गुणाकर 5 5 8 5 10 7 5


राशियों के लिए राशि गुणाकर | Points for Signs

राशि 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12
गुणाकर 7 10 8 4 10 5 7 8 9 5 11 12


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अष्टकवर्ग कुंडली बनाने का नियम

अष्टकवर्ग कुण्डली बनाने के लिए आठ वर्ग कुण्डलियां बनाई जाती हैं. जिसमें सभी सात ग्रह होते हैं और लग्न होता है. इसे बनाने के लिए सबसे पहले ग्रहों का प्रस्तारक वर्ग बनाया जाता है. जिसमें सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि और इन सबका योग होता है सर्वाष्टक.

अष्टकवर्ग कुण्डलियों को बनाने की विधि में आपको नीचे दि गई सारणियों का उपयोग करना होगा. यह सारिणी प्रत्येक ग्रह द्वारा अपने और लग्न समेत अन्य ग्रहों के संदर्भ में प्रदत्त किए जाने वाले शुभ बिन्दुओं के स्थान विशेष को दर्शाती है. इस सारनी के उपयोग से आप अष्टकवर्ग को बना सकते हैं बिना इनके आप इसे समझने में सफल नहिं हो पाएंगे.

सूर्य :- के लिए 48 अंक दिए गए हैं | There are 48 bindus for Sun

ग्रह भाव कुल अंक
शनि 1, 2, 4, 7, 8, 9, 10, 11 8
बृहस्पति 5, 6, 9, 11 4
मंगल 1, 2, 4, 7, 8, 9, 10, 11 8
सूर्य 1, 2, 4, 7, 8, 9, 10, 11 8
शुक्र 6, 7, 12 3
बुध 3, 5, 6, 9, 10, 11, 12 7
चंद्रमा 3, 6, 10, 11 4
लग्न 3, 4, 6, 10, 11, 12 6


चन्द्रमा के लिए कुल अंक 49 हैं | There are 49 bindus for Moon

ग्रह भाव कुल अंक
शनि 3, 5, 6, 11 4
बृहस्पति 1, 4, 7, 8, 10, 11, 12 7
मंगल 2, 3, 5, 6, 9, 10, 11 7
सूर्य 3, 6, 7, 8, 10, 11 6
शुक्र 3, 4, 5, 7, 9, 10, 11 7
बुध 1, 3, 4, 5, 7, 8, 10, 11 8
चंद्रमा 1, 3, 6, 7, 10, 11 6
लग्न 3, 6, 10, 11 4


मंगल के लिए 39 अंक दिए गए हैं | There are 39 bindus for Mars

ग्रह भाव कुल अंक
शनि 1, 4, 7, 8, 9, 10, 11 7
बृहस्पति 6, 10, 11, 12 4
मंगल 1, 2, 4, 8, 10, 11 7
सूर्य 3, 5, 6, 10, 11 5
शुक्र 6, 8, 11, 12 4
बुध 3, 5, 6, 11 4
चंद्रमा 3, 6, 11 3
लग्न 1, 3, 6, 10, 11 5


बुध के लिए 54 अंक हैं | There are 54 bindus for Mercury

ग्रह भाव कुल अंक
शनि 1, 2, 4, 7, 8, 9, 10, 11 8
बृहस्पति 6, 8, 11, 12 4
मंगल 1, 2, 4, 7, 8, 9, 10, 11 8
सूर्य 5, 6, 9, 11, 12 5
शुक्र 1, 2, 3, 4, 5, 8, 9, 11 8
बुध 1, 3, 5, 6, 9, 10, 11, 12 8
चंद्रमा 2, 4, 6, 8, 10, 11 6
लग्न 1, 2, 4, 6, 8, 10, 11 7


शुक्र ग्रह के लिए कुल 50 अंक हैं | There are 50 bindus for Auspicious Planets

ग्रह भाव कुल अंक
शनि 3, 4, 5, 8, 9, 10, 11 7
बृहस्पति 5, 8, 9, 10, 11 5
मंगल 3, 5, 6, 9, 11, 12 6
सूर्य 8, 11, 12 3
शुक्र 1, 2, 3, 4, 5, 8, 9, 10, 11/td> 9
बुध 3, 5, 6, 9, 11 5
चंद्रमा 1, 2, 3, 4, 5, 8, 9, 11, 12 9
लग्न 1, 2, 3, 4, 5, 8, 9, 11 8


बृहस्पति के लिए कुल 52 अंक हैं | There are 52 bindus for Jupiter

ग्रह भाव कुल अंक
शनि 3, 5, 6, 12 5
बृहस्पति 1, 2, 3, 4, 7, 8, 10, 11 8
मंगल 1, 2, 4, 7, 8, 10, 11 7
सूर्य 1, 2, 3, 4, 7, 8, 9, 10, 11 9
शुक्र 2, 5, 6, 9, 10, 11 6
बुध 1, 2, 4, 5, 6, 9, 10, 11 8
चंद्रमा 2, 5, 7, 9, 11 5
लग्न 1, 2, 4, 5, 6, 7, 9, 10, 11 9


शनि के लिए कुल अंक 39 हैं | There are 39 bindus for Saturn

ग्रह भाव कुल अंक
शनि 3, 5, 6, 11 4
बृहस्पति 5, 6, 11, 12 4
मंगल 3, 5, 6, 10, 11, 12 6
सूर्य 1, 2, 4, 7, 8, 10, 11 7
शुक्र 6, 11, 12 3
बुध 6, 8, 9, 10, 11, 12 6
चंद्रमा 3, 6, 11 3
लग्न 1, 3, 4, 6, 10, 11 6


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अष्टक वर्ग का शोध्य पिण्ड | Shodhya Pinda of Ashtakavarga

अष्टकवर्ग के नियमों के अनुसार हर ग्रह के भिन्नाष्टक में दोनों शोधनों त्रिकोण शोधन और एकाधिपत्य शोधन एवं मंडल शोधन को करने के बाद शोध्य पिण्ड की गणना करनी पड़ती है. ग्रहों के शोध्य पिण्ड निकालने के लिए प्रत्येक ग्रह के भिन्नाष्टकवर्ग में प्रत्येक राशि में शेष बची राशियों की संख्या को राशि गुणाकर तथा जिन भावों में ग्रह स्थित हैं उन भावों के बिन्दुओं को ग्रह से गुणा करना पड़ता है. दोनों विधियों से प्राप्त ग्रहों के बिन्दुओं का योग करके उनका शोध्य पिण्ड प्राप्त कर लिया जाता है.

सर्वाष्टक वर्ग में तीनों शोधनों के बाद शेष शुभ बिन्दुओं की संख्या को राशि गुणाकर और ग्रह गुणक से गुणा करके सर्वाष्टक वर्ग का शोध्य पिउण्ड प्राप्त किया जाता है. यहां हम नीचे राशि व ग्रहों की गुण्डक संख्या का उल्लेख कर रहे हैं जो इस प्रकार हैं:-

राशि गुणाकर | Rashi Gunakar

हर ग्रह को एक निश्चित इकाई संख्या के रूप में दी गई है जो इस राशि विशेष की राशि गुणक कहलाती है. यह संख्या बदलती नहीं है और हर स्थिति में समान रहती है:-

राशि गुणाकर
मेष 7
वृषभ 10
मिथुन 8
कर्क 4
सिंह 10
कन्या 5
तुला 7
वृश्चिक 8
धनु 9
मकर 5
कुम्भ 11
मीन 12


ग्रह गुणाकर | Planet Gunakar

इसी तरह से ग्रह को ही एक निश्चित इकाई संख्या के रूप में प्राप्त है, जो उक्त ग्रह विशेष की ग्रह गुणक कहलाती है. यह संख्या भी राशि गुणक के समान अपरिवर्तनीय है और प्रत्येक स्थिति में समान रहती है.

ग्रह गुणाकर
सूर्य 5
चंद्रमा 5
मंगल 8
बुध 5
बृहस्पति 10
शुक्र 7
शनि 5
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कुण्डली के दूसरे भाव में ग्रहों प्रभाव | Effects of Planets in the Second House of Kundli

जन्म कुण्डली में दूसरे भाव के फलों को जानने के लिए उनमें सभी विभिन्न भावों में बैठे हुए ग्रहों के कारकों को समझना आना चाहिए तभी उनके फलों को समझना आवश्यक होगा. ग्रह अपने कारक तत्व के अनुसार फल देने में सक्ष्म होते हैं. इसमें से कुछ इस प्रकार हैं कि यदि भाव स्व राशि का स्वामी हो अथवा शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो उत्तम व बलिष्ठ होता है, इसी के द्वारा जातक को अच्छे फलों की प्राप्ति होती है. विभिन्न लग्नों की कुण्डलियों में ग्रह भिन्न-भिन्न फलदायक होते हैं. कुण्डली के बलिष्ठ होने के लिए ग्रह यदि वह उच्चता युक्त या स्वराशि में स्थित हो तो वह शुभ परिणामदायक होंगे.

कुण्डली के दूसरे भाव को द्वितीय भाव भी कहते है. यह भाव पनफर भाव, मारक स्थान भी कहलाता है. द्वितीय भाव को धनभाव, कुटुम्ब स्थान, वाणी स्थान के नाम से भी जाना जाता है. धन भाव होने के कारण इससे धन-संपति का विचार करते हैं. इसके अतिरिक्त वाणी, विचार, कुनबा, संचित सम्पति, शिक्षा, प्रथम स्कूली शिक्षा, दाईं आखं, स्वयं के द्वारा संचित धन, धन से जुडे मामले इत्यादि बातें देखी जाती हैं. दूसरे भाव का कारक ग्रह गुरु हैं, इस भाव में परिवार और धन का प्रतिनिधित्व करते हैं. व्यक्ति की वाणी के लिए बुध का विचार किया जाता है. शुक्र-परिवार, सूर्य और चन्द्रमा से व्यक्ति की आंखों का विश्लेषण किया जाता है.

सूर्य ग्रह | Sun Planet

सूर्य धन भाव में होने पर वाणी में ओज, कुटुंब से धन की आस, लोहे या तांबे की वस्तुओं से धनार्जन करने की ओर प्रवृत रहता है. व्यवहारिक ज्ञान से रहित होता है.

चंद्र ग्रह | Moon Planet

चन्द्र के दूसरे भाव में होने पर व्यक्ति त्याग की भावना युक्त, बुद्धिमान, चंचल मन वाला, सौंदर्य युक्त, यश पाने वाला तथा सहनशील बनता है.

मंगल ग्रह | Mars Planet

मंगल के दूसरे भाव में होने के कारण व्यक्ति सहनशीलता का परिचय देता है बोलने में चतुर हो सकता है, प्रवास से धन प्राप्त कर सकता है, धातु विद होता है. पराक्रम के कार्यों में प्रवृत रहने की कोशिश करने वाला हो सकता है.

बुध ग्रह | Mercury Planet

दूसरे भाव में बुध के स्थित होने से व्यक्ति पितृ भक्त होता है, सुव्यवस्थित होता है, पाप से भयभीत, लम्बे केशवाला, गौरवर्ण वाला होता है. परदेस में निवास करता है. वाणी में मधुरता होती है. लोगों को प्रभावित करने में सक्षम तथा वाचाल होता है.

बृहस्पति ग्रह | Jupiter Planet

दूसरे भाव में बृहस्पति स्थित हो तो व्यक्ति प्रसन्नचित होता है, मित्र की राशि में होने पर सुंदर भार्या को पाता है.

शुक्र ग्रह | Venus Planet

शुक्र के दूसरे भाव में होने पर सौंदर्यवान, आभूषणों एवं वस्त्रों का शौकिन, धनाढ्य, बालक के समान कोमल, मधुरभाषी, दुर्बल, संतती युक्त होता है.

शनि ग्रह | Saturn Planet

शनि के दूसरे भाव में होने के कारण व्यक्ति सहनशील, धन से युक्त होता है. चंचल नेत्रों वाला, चोरी जैसे कामों कि ओर उन्मुख हो सकता है.

राहु ग्रह | Rahu Planet

धन भाव में राहु के होने पर जातक मोह से ग्रस्त रहने वाला, अत्यंत दुख पूर्ण, झूठ बोलने की प्रवृत्ति हो सकती है. मत्स्य व्यापार द्वारा शन पाता है.

केतु ग्रह | Ketu Planet

केतु के दूसरे भाव में होने के सरकार से हानि मिल सकती है, व्यक्ति रोग ग्रस्त व परिवार का विरोधी बन सकता है. परंतु यदि यह कुण्डली में स्वग्रही या उत्तम स्थिति में हो तो अनुकूल फल देने वाला बनता है.

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अष्टकवर्ग से ऎसे होता है फलकथन:भविष्यफल

जिस प्रकार लग्न व चंद्रमा से ग्रहों के द्वादशभाव शुभाशुभ फल बताए गए हैं उसी प्रकार अन्य ग्रहों से भी भावों के शुभाशुभ फल कहे गए हैं इसलिए सूर्य व अन्य ग्रह तथा लग्न द्वारा इन आठों के क्रम से अशुभ स्थान को बिन्दुरूप से और शुभ भाव को रेखा रूप से अष्टकवर्ग में बताया गया है. ज्योतिष शास्त्र एक ऎसी विद्या है जिसमें ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति देखकर व्यक्ति के जीवन में होने वाली घटनाओं को जानने में सहायक होता है. मानव कल्याण हेतु ऋषि मुनियों ने ज्योतिषशास्त्र की ऎसी अनेक सरल पद्धतियों का निर्माण किया जिनके द्वारा फलित कथन सुगम हो पाया. इसी में अष्टवर्ग एक अत्यंत सरल विधि है जिसके द्वारा व्यक्ति के जीवन में होने वाली घटनाओं को जाना जा सकता है. इसके विषय में पराशर ऋषि कहते हैं कि :-

यथा लग्नाच्च चन्द्राच्च ग्रहाणां भावजं फलम।
तथाऽन्येभ्योऽपि खेटेभ्यो विचिन्त्यं दैवविद्वरै:।।

अतो र्व्यादिखेटानां सल्ग्नानां पृथक -पृथक ।
अष्टानां सर्वभावोत्थं यथोक्तमशुभं शुभम् ।।

ज्ञात्वाऽदौ करणं स्थानं बिन्दुरेखोपलक्षितम् ।
क्रमादष्टकवर्गस्य वाच्यं स्पष्टफलं यथा ।।

महर्षि पाराशर ने फलित ज्योतिष के नियमों को प्रतिपादित करते हुए अष्टक वर्ग नाम की विधि का भी वर्णन किया है. इसमें ग्रहों की स्थिति को मजबूति से दिखाया जाता है. इस विधि में ग्रहों की स्थिति के आधार पर ही बिन्दु व रेखा का निर्धारण किया जाता है. यद्यपि सही फलादेश के लिए गोचर का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है और अष्टकवर्ग पद्धति गोचर के विषय की ही विवेचना करने की एक विद्या है.

विभिन्न ग्रहों की दशा अन्तर्दशा के फलों को जानने हेतु अष्टकवर्ग की महत्ता भली भांति प्रतिपादित होती है. इसे इस तथ्य से समझा जा सकता है कि अधिकतम बिन्दुओं के मिलने कि स्थिति में उच्च का ग्रह भी शुभ फल नहीं दे पाता है. इसके विपरित यदि कोई ग्रह अपने भिन्नाष्टक वर्ग में बिन्दु रहित वाली राशि में गोचर करता है तो बहुत खराब फल देता है और इस स्थिति में अशुभ ग्रह का गोचर कष्टकारी सिद्ध होता है.

एक अन्य तथ्य के अनुसार कोई भी ग्रह उच्च का हो, स्वराशि का हो या मूल त्रिकोण अथवा शुभ स्थानों में स्थित होकर बली अवस्था में ही क्यों न हो परंतु यदि वह पच्चीस से कम बिन्दुओं के साथ स्थित है तो वह अधिक प्रभावशाली नहीं हो पाता है. जो राशि अष्टकवर्ग में अनुकूल हो वह शुभ फलदायी रहती है. अष्टकवर्ग शुद्धि देखना अत्यंत आवश्यक है इसलिए कार्यों की शुभता देखने हेतु अष्टकवर्ग शुद्धि देखना अच्छा रहता है. अष्टकवर्ग की सहायता को मुख्य महादशा के समय शन एवं गुरू के गोचर से संयुक्त विवेचना द्वरा फलिभूत किया जाता है.

किसी भी ग्रह का गोचर चंद्रमा व लग्न से देखा जाता है और अष्टकवर्ग इस्में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका दर्शाता है. यह ग्रहों एवं लग्न द्वारा व्यक्त की गई उर्जा से हम इसे समझ पाते हैं. इनके शुभ व अशुभ सभी पकार की सू़क्ष्म विवेचना में अष्टकवर्ग काफी महत्वपूर्ण होता है. सामान्यत: गोचर का कोई भी गह कुण्डली के चंद्रमा से शुभ स्थान पर हो लेकिन कुण्डली में अपनी स्थिति के साथ अन्य ग्रहों से भी कैसी स्थिति में है इन सभी स्थितियों का संयुक्त शुभ एवं अशुभ प्रभाव जानने में अष्टकवर्ग हमारी सहायता करता है. स्पष्टतौर पर अष्टकवर्ग पद्धति कुण्डली में ग्रहों की मूल स्थिति के संदर्भ में गोचरवश ग्रहों का सू़क्ष्मबल दर्शाती है.

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रत्न पहनने के फायदे और धारण विधि

ज्योतिष हो, हस्तरेखा हो, अंकशास्त्र हो या फिर अन्य विद्या हो, सभी में ग्रहों की भूंमिका ही मुख्य मानी गई है. ग्रह मनुष्य जीवन पर प्रत्यक्ष रुप से अपना प्रभाव डालते हैं. व्यक्ति का जीवन उतार-चढ़ाव से भरा होता है लेकिन कई बार परिस्थितियाँ ज्यादा खराब हो जाती है और व्यक्ति के सभी कामो में रुकावटे आना आरंभ हो जाती है. ऎसे में कई विद्वान रत्न धारण करने की सलाह देते हैं. लेकिन इन्हें धारण करने के लिए कुछ आवश्यक बातों का ध्यान रखना जरुरी है. आइए आज इस वेबकास्ट में हम ग्रहो और उससे संबंधित रत्नो के बारे में चर्चा करते हैं.

ग्रह और उनसे संबंधित रत्न | Planets and Gemstones related to them

माणिक्य(Ruby) को सूर्य का रत्न और मोती को चंद्रमा का रत्न माना गया है. मूंगा(coral) रत्न मंगल का और पन्ना(emerald) बुध के लिए होता है. पुखराज(Yellow saphire) बृहस्पति के लिए और हीरा शुक्र के लिए पहना जाता है. शनि के लिए नीलम(Blue Sapphire), राहु के लिए गोमेद(Hassonite), और केतु के लिए लहसुनिया(Cats Eye) पहना जाता है.

रत्नो से संबंधित उपरत्न | Semi-Gemstones related to Gemstones

माणिक्य का उपरत्न सूर्यकान्त मणि और गार्नेट है. मोती का उपरत्न मूनस्टोन है. मूंगा का उपरत्न लाल तामड़ा और पन्ना का उपरत्न एक्वामरिन और हरा जर्कन होता है. पुखराज का उपरत्न सुनैहला(Topaz) और डायमंड का जर्कन और ओपल होता है. नीलम का उपरत्न नीली और लाजवर्त है और गोमेद का अम्बर और तुरसावा तथा लहसुनिया का उपरत्न मार्का है.

रत्नो से संबंधित धातुएँ | Metals related to Gemstones

सूर्य का रत्न माणिक्य सोने में धारण किया जाता है और चंद्रमा का रत्न मोती चाँदी में पहना जाता है. मंगल का रत्न मूंगा सोने या लाल तांबे में और बुध का रत्न पन्ना सोने या कांसा धातु में पहना जाता है.

बृहस्पति के रत्न पुखराज को सोने में और शुक्र के रत्न हीरे को चांदी में पहना जाता है. शनि का रत्न नीलम लोहे या सीसा धातु में और राहु का रत्न गोमेद और केतु का रत्न लहसुनिया पंचधातु में पहना जाता है.

रत्नो और उपरत्नो के बारे मैं तो आपने जान लिया है लेकिन इन रत्नो को किस धातु में पहना जाए यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न होता है. आइए अब आपको बताए कि कौन सा रत्न किस धातु में पहना जाता है.

रत्नो को धारण करने का आधार | Principles for wearing Gemstones

रत्नो को धारण करने के बारे मैं सभी के मत भिन्न है. कई विद्वान तो ऎसे हैं जिनका मत है कि कुण्डली में जिस ग्रह की दशा चल रही है उससे संबंधित रत्न पहन लेना चाहिए बेशक वह आपकी कुण्डली के लिए अशुभ ही क्यूं ना हो, लेकिन आप ऎसा नही करें. जन्म कुण्डली के अनुसार केन्द्र/त्रिकोण के स्वामियों के रत्न धारण करने चाहिए.

जन्म कुण्डली में केन्द्र व त्रिकोण के स्वामियो को शुभ माना जाता है, इसमें भी त्रिकोण के स्वामियो को ज्यादा शुभ माना गया है. यदि आपकी जन्म कुण्डली में शुभ स्थान का स्वामी ग्रह कमजोर है तब आप उससे संबंधित रत्न पहन सकते हैं. ग्रह षडबल में कमजोर है, नीच राशि में है या अशुभ ग्रहो के प्रभाव में है अथवा अशुभ भाव में स्थित है तब वह कमजोर कहलाता है.

जन्म कुण्डली के अशुभ भावो के स्वामी का रत्न आप धारण नही करें उन्हें शांत रखने के लिए आप मंत्र जाप करें.

आप में से बहुत से व्यक्ति ऎसे भी होगे जिन्हें अपनी जन्म तारीख तो पता है लेकिन जन्म समय नहीं पता है. ऎसे में जन्म कुण्डली नहीं बनती है तब आपको अपने साथ होने वाली परेशानियों को पहचान कर उससे संबंधित रत्न धारण करना चाहिए. जैसे बिजनेस नहीं चल रहा है या आत्मविश्वास कम है या नौकरी में संतोष नहीं है तब सुख समृद्धि के लिए पन्ना रत्न धारण किया जा सकता है. लेकिन यह तभी करें जब आपकी जन्म कुण्डली नही हैं. यदि जन्म कुण्डली है तब उसके अनुसार रत्न पहनें.

कई विद्वान ऎसे भी हैं जो जन्म कुंडली के ना होने पर हस्त रेखाओ के आधार पर रत्न धारण करने की सलाह देते हैं.

रत्नो को पहनने का समय और तरीका | Right Way and Time to Wear Gemstones

आइए अंत में रत्नो को धारण करने का तरीका भी जान लेते हैं. सभी रत्नो को शुक्ल पक्ष में पहना जाता है. अमावस्या के बाद और पूर्णिमा तक का समय शुक्ल पक्ष कहा जाता है.

हर ग्रह से संबंधित वार भी होता है. जिस दिन जो रत्न पहनना हो उस दिन उस ग्रह की होरा में उसे धारण करना चाहिए. जैसे सूर्य का रत्न शुक्ल पक्ष के रविवार को सूर्य की होरा में पहनना चाहिए. सुबह सूर्योदय से एक घंटे तक संबंधित वार से संबंधित ग्रह की होरा प्रतिदिन होती है. जैसे सोमवार को चंद्रमा और मंगलवार को मंगल की होरा होती है. बाकी ग्रहों की होरा भी इसी तरह होती है. राहु का रत्न शनि की होरा में और केतु का रत्न मंगल की होरा में पहना जाता है.

जिस ग्रह का रत्न धारण करना है वह ग्रह गोचर में भी शुभ राशि में चल रहा हो तब उसका रत्न पहनना चाहिए. यदि ग्रह शुभ राशि में नहीं है तब आप उसके शुभ नवांश में होने पर रत्न पहन सकते हैं.

आप कोई भी रत्न धारण करने से पहले स्नान अवश्य करें तथा स्वच्छ वस्त्र धारण करके पूर्व या उत्तर की ओर मुँह करके एक स्वच्छ आसन पर बैठे.

रत्न को पंचामृत से स्नान कराकर, उसे धूप – दीप दिखाएं, फिर रत्न से संबंधित ग्रह के मंत्र का 108 बार जाप करें. जाप करने के बाद शुद्ध मन से उसे पहन लें.

रत्न धारण करने के लिए मंत्र | Mantras for Wearing Gemstones

  • सूर्य का रत्न या उपरत्न धारण करने के लिए “ऊँ घृणि सूर्याय नम:” का मंत्र है.
  • चंद्रमा के लिए “ऊँ सों सोमाय नम:” का मंत्र है.
  • मंगल के लिए “ऊँ अं अंगारकाय नम:” का मंत्र है.
  • बुध के लिए “ऊँ बुं बुधाय नम:” का मंत्र है.
  • बृहस्पति के लिए “ऊँ बृं बृहस्पतये नम:” का मंत्र है.
  • शुक्र के लिए “ऊँ शुं शुक्राय नम:” का मंत्र है.
  • शनि के लिए “ऊँ शं शनैश्चराय नम:” का मंत्र है.
  • राहु के लिए “ऊँ रां राहवे नम:” का मंत्र है.
  • केतु के लिए “ऊँ कें केतवे नम:” का मंत्र है.

रत्न धारण करने से पहले संबंधित ग्रह का 108 बार मंत्र जाप करना चाहिए.

रत्न किस अंगुली में पहने | In which Finger Should You Wear A Gemstone

किस रत्न को किस अंगुली में पहना जाए यह एक आवश्यक जानकारी है. वैसे तो रत्नो को दाएं हाथ में पहना जाता है लेकिन यदि एक अंगुली में दो रत्न धारण करने पड़े तब आप बाएं हाथ में दूसरा रत्न पहन सकते हैं.

रत्न धारण करते समय यह ध्यान रखें कि वह आपकी त्वचा को छू रहा हो, तभी उस रत्न से संबंधित ग्रह की सकारात्मक ऊर्जा आपके भीतर प्रवेश करेगी और आपको लाभ होगा.

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कैसा होता है तीसरे भाव में सभी नौ ग्रहों का फल ?

जन्म कुण्डली में किसी भी घटनाओं को अध्ययन करने के संदर्भ में प्रत्येक भाव का आंकलन किया जाता है. कुण्डली से संबंधित फलों को जानने के लिए उनमें सभी विभिन्न भावों में स्थित ग्रहों के कारकों का फल देखना होता है जिसके अनुसार वह अपने फल देने में सक्ष्म होते हैं.

सूर्य ग्रह | Sun Planet

ज्योतिष अनुसार तीसरे भाव में सूर्य के स्थित होने से व्यक्ति अपने लोगों का प्रिय होता है. सम्माननीय व्यक्ति होता है.धन वैभव से संपन्न होता है. स्वस्थ धैर्यशील एवं सहिष्णु होता है, संभ्रांत स्त्रियों से प्रीति रखने वाला होता है.

चंद्र ग्रह | Moon Planet

चन्द्र के प्रभाव स्वरूप सुख पाने वाला, सभी की इच्छाओं को समझने वाला, संपत्तिवान होगा, शास्त्रों एवं काव्य में रूचि रखने वाला हो सकता है. परंतु पाप ग्रहों एवं पाप राशि से ग्रस्त होने पर काफी कष्टकारी भी बन जाता है.

मंगल ग्रह | Mars Planet

मंगल ग्रह के तीसरे भाव में होने पर व्यक्ति संघर्ष करने वाला साहस से पुर्ण होता है, प्रयासों में तत्पर रहता है. प्रभाव स्वरूप जातक भाईयों के मध्य सबसे बडा़ या सबसे छोटे हो सकता है. परंतु यदि शत्रु राशि में हो तो धन व सुख से रहित होता है.

बुध ग्रह | Mercury Planet

तृतीय भाव में बलिष्ठ बुध हो तो जातक साहसी होता है, स्वजनों से प्रेम करने वाला होता है. मलिन हृदय वाला होता है. अपने कार्यों की सिद्धि में तत्पर रहने वाला तथा निपुण होता है.

बृहस्पति ग्रह | Jupiter Planet

बृहस्पति के तृतीय भाव में होने के फलस्वरूप जातक अपने भाई बहनों का सुख पाने वाला होता है, धन से संपन्न होता है, परंतु धन का खर्च करने वाला होता है. जातक में कुछ आलस्य भी हो सकता है लेकिन काम के प्रति सहज भाव से लगा रहने वाला होता है.

शुक्र ग्रह | Venus Planet

शुक्र के बलिष्ठ होने पर व्यक्ति मोह से ग्रस्त रहने वाला होता है, दूसरों के प्रति आसक्ति रखने वाला हो सकता है. कला से युक्त होता है, व्यक्ति में कलात्मक समझ होती है, जीवन में प्रेम व सौंदर्य की अभिव्यक्ति बनी रहती है. भाई बहनों का साथ पाता है तथा उनसे प्रेम की प्राप्ति होती है, सुंदर वस्त्रों को धारण करने की चाह रखने वाला होता है. प्रकृति से प्रेम व यात्रा इत्यादि से लाभ और आनंद की प्राप्ति होती है.

शनि ग्रह | Saturn Planet

शनि के तृतीय भाव में होने के कारण जातक भाई बहनों से प्रेम में कमी पाता है, उसे साथ मिलने में कमी मिलती है, धन की प्राप्ति में निपुण होता है और संतान को पाने वाला तथा अपने वैभव का सुख भोगने की चाह रखने वाला होता है. बलिष्ठ होने पर जिम्मेवार व्यक्ति व दर्शन शास्त्र का जानकार बन सकता है. अध्ययन और लेखन से लाभ पाता है, अशुभ होने पर भाईयों से तनाव हो सकता है. सफलता पाने के लिए कठोर परिश्रम करता है.

राहु ग्रह | Rahu Planet

राहु के होने पर व्यक्ति अपने भाई बहनों के मध्य छोटा या सबसे बडा़ होगा. कभी कभी इसे भाई नाशक भी कहा जाता है, संबंधों में तनाव की स्थिति हो सकती है. धन एवं सुख की प्राप्ति होती है, राहु यदि उच्च का हो तो व्यक्ति दान करने वाला बनता है, साहसी व निर्भय होगा. भाग्यशाली, शुभ कामों से लाभ पाने वाला हो सकता है.

केतु ग्रह | Ketu Planet

स्वराशि और उच्चता युक्त होने पर शत्रु का नाश करने वाला, विवाद में विजय दिलाने में सहायक हो सकता है. ऎश्वर्य की प्राप्ति होती है. परंतु साथ ही साथ चिन्ता तथा उद्वेग बना रह सकता है.

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