बलहीन सूर्य का विभिन्न भावों में फल | Effects of Weak Sun in Different Houses

सूर्य को समस्त ग्रहों में राजा का स्थान प्राप्त है. वैदिक ज्योतिष सूर्य की महिमा को जगत की आत्मा का स्वरूप कहा गया है. इनसे जीवनदायी शक्ति का आधार माना गया है. इसी के साथ इसे पूर्वजों से भी संबंधित किया जाता है. इस कारण कुण्डली में इसका मजबूत स्थिति में होना कुण्डली को बल देने वाला होता है. परंतु जब यही ग्रह निर्बल हो जाता है तो कुण्डली की शक्ति भी प्रभावित होती है.

सूर्य पिता तथा पूर्वजों के अतिरिक्त राजा, राज्य, सरकार, देशों के प्रमुखों, उच्च पदों पर आसीन सरकारी अधिकारियों, राजनीतिज्ञों तथा कई अन्य व्यक्तियों और संस्थाओं का प्रतिनिधि करता है. सूर्य को प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा का, जीवन दायिनी शक्ति का, इच्छा शक्ति का, रोगों से लड़ने की शक्ति का, आँखों की रोशनी का, संतान पैदा करने की शक्ति का तथा नेतृत्व करने की क्षमता का अधिकार एवम नियंत्रण शक्ति का प्रतीक माना गया है.

सूर्य यदि निर्बल होकर लग्न भाव में हो तो जातक बल में कमजोर, रोगी हो सकता है, सरदर्द की शिकायत बनी रह सकती है. लग्न में स्थित कमजोर सूर्य के कारण जातक में हीन भावना रह सकती है उसमें अहंकार फलिभूत हो सकता है. नेत्र रोग की तकलिफ, व्यर्थ में भटकाव बना रह सकता है तथा नीच कार्यों में तत्पर रह सकता है.

सूर्य के दूसरे भाव में कमजोर होने के कारण धन का अभाव झेलना पड़ सकता है, जातक पुत्र से रहित हो सकता है. दुर्बलकाय, गरीब, व्यवहारिक ज्ञान से रहित और दुख भोगने वाला हो सकता है.

सूर्य के तृतीय भाव में कमजोर होने से वह भाईयों के लिए घातक, उनसे विच्छोह पाने वाला बन सकता है. साहस में कमी हो सकती है या संबंधों में तनाव की स्थिति झेलनी पड़ सकती है.

कमजोर सूर्य के चतुर्थ भाव में होने के कारण इस भाव संबंधित फलों में कमी आ जाती है, परिवार से दूर जाकर रहना पड़ सकता है. भू संपदा इत्यादि में कोई विवाद झेलना पड़ सकता है. सूर्य को विच्छेदकारक ग्रह माना गया है अत: निर्बल होकर यहां पर स्थित सूर्य कई प्रकार से अलगाव दे सकता है.

पंचम भाव में निर्बल सूर्य के होने के कारण शिक्षा में कमी या रूकावट आ सकती हैं संतान से विच्छोह की स्थिति उभर सकती है. संतान को कष्ट हो सकता है तथा यहां पर वह पितृ दोष की स्थिति भी दे सकता है.

छठे भाव में सूर्य के निर्बल होने पर वाद विवाद में हार मिल सकती है. माम पक्ष से नहीं बनेगी, शत्रु हावी बने रह सकते हैं. व्यक्ति स्वभाव से संकोची हो सकता है.

सप्तम में सूर्य के निर्बल होने से जीवन साथी के साथ तनाव की स्थिति बनी रह सकती है, सुख से वंचित रह सकता है, चंचल ह्रदय का पाप आचरण करने वाला हो सकता है.

अष्टम भाव में निर्बल सूर्य होने पर चंचलता और त्याग की भावना बनी रहती, सदैव रोगी होने की स्थिति बनी रह सकती है. नीच की सेवा में कार्यरत हो सकता है, चरित्रहीन व भाग्यहीन हो सकता है.

नवम भाव में सूर्य के निर्बल होने पर भाग्य भाव में कमी होती है. काम में रूकावट व व्यवधान हो सकता है, पिता के साथ दूरी या टकराव की स्थिति बनी रह सकती है.

दशम भाव में कमजोर सूर्य कार्यक्षेत्र में असफलता का सामना करना पड़ सकता है, अपने अधिकारियों से अनबन की स्थिति भी बनी रह सकती है. सरकार के साथ तनाव की स्थिति का बनी रह सकती है.

एकादश में सूर्य के निर्बल होने की स्थिति में लाभ में कमी कार्यों में खर्च अधिक लग सकता है, लाभ में रूकावट का सामना करना पड़ सकता है.

द्वादश भाव में निर्बल सूर्य के होने पर जातक मुर्ख, कामी, कठोर हृदय वाला हो सकता है. जन विरोधी कामों में लिप्त, शरीर से दुर्बल हो सकता है.

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इन कारणों से होता है चंद्रमा कमजोर

ग्रह कमज़ोर कब होता है इस बात का निर्धारण इससे किया जाता है कि कोई ग्रह कुण्डली में किस अवस्था में है यदि ग्रह नीच का है, वक्री है, पाप ग्रहों के साथ है या इनसे दृष्ट है, खराब भावों में स्थित है, षडबल में कमजोर है, अन्य अवस्थाओं में निर्बल हो इत्यादि तथ्यों से ग्रह के कमजोर होने कि स्थिति का पता लगाया जा सकता है. ग्रह के कमजोर या बलहीन होने पर उसके शुभत्व में कमी आती है और उक्त ग्रह अपने पूर्ण प्रभाव को देने में सक्षम नहीं हो पाता. इस प्रकार यदि चंद्रमा कृष्ण पक्ष का हो पाप ग्रहों से ग्रस्त हो, खराब स्थान में बैठा हो दिग्बल से हीन हो तो ऎसे स्थिति में होने पर उसका प्रभाव जातक के मानसिक एवं शाररिक स्वरूप पर बिलकुल पडे़गा.

कमजोर चंद्रमा के प्रथम भाव में होने पर जातक का मन विचलित रह सकता है वह भावनाओं में बहने वाला व भावुक प्रकृत्ति का हो सकता है. जातक कार्य बहुत जल्दी से आरंभ करता है किंतु जल्द ही उनसे उकता भी जाता है.

कमजोर चंद्रमा के द्वितीय भाव में होने पर जातक नेत्र रोग से ग्रस्त हो सकता है वाणी प्रभावित हो सकती है, चंचल व अस्थिरता से भरा रह सकता है.

तीसरे भाव में कमजोर चंद्रमा के होने पर जातक मन्द भाषी हो सकता है, भाई को कष्ट हो सकता है, शत्रु के समान आकृति वाला हो सकता है तथा व्यर्थ के भ्रमण में रत रह सकता है.

चौथे भाव में चंद्रमा के बलहीन होने पर जातक को सुख में कमी, माता से दूरी रह सकती है, रोग से ग्रस्त रह सकता है, दुग्ध के व्यापार से हानी हो सकती है. धन का व्यय करता है.

पांचवे भाव में कमजोर चंद्रमा होने के कारण जातक स्त्री तथा पुत्र संतान से वंचित रह सकता है,शि़क्षा में कमजोर हो सकता है.

छठे भाव में बलहीन चंद्रमा होने पर अनिष्टकारी होता है, सुखों से रहित कष्ट का अनुभव करने वाला हो सकता है. बाल अवस्था में व्याधि का डर बना रहता है.

सप्तम में बलहीन चंद्रमा होने के कारण सुख साधन का अभाव रहता जीवन साथी के साथ तनाव रह सकता है. जातक के साथी का स्वास्थ्य भी खराब रह सकता है.

अष्टम में बलहीन चंद्रमा के होने पर जातक के स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ सकता है. मन विचलित तथा बुरे प्रभाव में जल्द आ सकता है, मृत्यु तुल्य कष्ट पा सकता है. व्यस्नों से ग्रस्त हो सकता है.

नवम भाव में बलहीन चंद्रमा के होने पर भाग्य में कमी रहती है, पिता को तकलीफ रह सकती है. जातक निर्धन, कुमार्ग पर चलने वाला हो सकता है, गुणों से हीन तथा मूर्खता से पूर्ण कार्य करने वाला हो सकता है.

दशम भाव बलहीन चंद्रमा के होने पर रोगों से प्रभावित हो सकता है, श्वास रोग, दमा की शिकायत रह सकती है, दुर्बल काया वाला, कर्म हीन, पिता व पत्नी की संपत्ति से युक्त रहने वाला.

एकादश भाव में कमजोर चंद्रमा के होने पर जातक धन का अपव्यय करने वाला, मूर्खता पूर्ण कार्य वाला, सुख से रहित.

द्वादश भाव में क्षीण चंद्रमा के होने पर जातक दुर्बल, रोग ग्रस्त, माता से दूर, व्याधीयों से पिडी़त, बुरे लोगों की संगती से युक्त रहने वाला रह सकता है.

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वैदिक ज्योतिष में कान की बीमारी के योग | Yogas For Ear Problems in Vedic Astrology

वैदिक ज्योतिष में स्वास्थ्य से संबंधित बहुत से योगों का वर्णन मिलता है. हर बीमारी के होने की स्थिति के बारे में बताया गया है. हर ग्रह व भाव किसी ना किसी बीमारी से संबंधित होते ही है. आज के इस लेख में हम कान की बीमारी के बारे में बात करेगें कि जन्म कुंडली के वह कौन से भाव व ग्रह हैं जिनके पीड़ित होने से व्यक्ति को कान से संबंधित बीमारियों का सामना करना पड़ता है.

कान की बीमारी से जुड़े ग्रह व भाव | Planets and Houses Related To Ear Diseases

कान की बीमारी से संबंधित भाव तीसरा और एकादश भाव है. तीसरे भाव से दायाँ कान व एकादश भाव से बायाँ कान देखा जाता है. इसके अलावा तीसरे से सप्तम भाव और एकादश से सप्तम भाव का भी आंकलन किया जाता है. इस प्रकार हम कह सकते हैं कि जन्म कुंडली के तीसरे, पांचवें, नवम व एकादश भाव को कान की बीमारी के लिए देखा जाता है.

बुध व बृहस्पति को श्रवण शक्ति का नैसर्गिक कारक ग्रह माना जाता है. आइए अब कान की बीमारी से संबंधित योगों के बारे में जानने का प्रयास करें कि कब यह अपना फल दे सकते हैं.

  • जन्म कुंडली में शुक्र व बुध की स्थिति 12वें भाव में हो तब दाएँ कान से संबंधित रोग हो सकते हैं.
  • पाप ग्रह यदि जन्म कुंडली के तीसरे, पांचवें, नवम व एकादश में स्थित हों और कोई भी शुभ ग्रह देख नहीं रहा हो तब कान से जुड़े रोग हो सकते हैं.
  • जन्म कुंडली में शनि जहाँ स्थित है उससे चतुर्थ भाव में बुध छठे, आठवें या बारहवें भाव में स्थित हो.
  • तृतीयेश, चतुर्थेश व षष्ठेश तीनो एक साथ कुंभ राशि में स्थित हों तब भी कान से संबंधित बीमारी हो सकती है.
  • जन्म कुंडली के लग्न में कुंभ राशि में शुक्र स्थित हो और मंगल ग्रह शनि के साथ छठे भाव में हो.
  • कुंडली में शुक्र, वृष या धनु लग्न में स्थित हो और पीड़ित चंद्रमा शुक्र को देख रहा हो.
  • छठे भाव का स्वामी और बुध दोनो एक साथ छठे भाव में स्थित हों और शनि से दृष्ट भी हों.
  • व्यक्ति का यदि रात्रि का जन्म है, शुक्र पंचम भाव में व बुध छठे भाव में स्थित हो तब कान से जुड़ी बीमारी हो सकती है.
  • बुध व षष्ठेश दोनो चतुर्थ भाव में हो और शनि लग्न में हो तब व्यक्ति को कान के भीतर बीमारी बीमारी हो सकती है.
  • चंद्रमा, मंगल, बुध तीनो ही राहु/केतु अक्ष पर स्थित हों और यह संबंध तीसरे व एकादश भाव में बन रहा हो तब भी व्यक्ति को कान से संबंधित आंतरिक समस्या का सामना करना पड़ सकता है.
  • जन्म कुंडली में नीच का शुक्र राहु के साथ तीसरे या एकादश भाव में हो.
  • बुध तीसरे भाव में सूर्य के साथ 10 अंशो के भीतर स्थित हो या छठे भाव में स्थित हो या एकादश भाव में स्थित हो. साथ ही मंगल व शनि का परस्पर दृष्टि संबंध बन रहा हो.


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सर्वाष्टकवर्ग में मंडल शोधन करने का तरीका | Method For Doing Mandal Shodhan in Sarvashtakavarga

जिस प्रकार हर ग्रह के भिन्नाष्टक में शोधन करके उसका शोध्य पिण्ड ज्ञात किया जाता है, उसी तरह से सर्वाष्टकवर्ग का भी शोध्य पिण्ड निकाला जा सकता है. परंतु यहां एक बात विशेष ध्यान देने योग्य होती है कि भिन्नाष्टक वर्ग में मंडल शोधन नहीं किया जाता यह केवल सर्वाष्टक वर्ग के लिए किया जाता है. इसलिए मंडल शोधन सर्वाष्टकवर्ग के तीनों शोधनों में से पहला शोधन होता है.

सर्वाष्टक वर्ग में मंडल शोधन करने का तरीका समझने के लिए हम यहां पर एक कुण्डली का उदाहरण लेंगे :-

कर्क लग्न की कुण्डली ली गई है इसके दूसरे भाव में मंगल स्थित है, पंचम भाव में सूर्य और बुध स्थित हैं, छठे भाव में राहू और शुक्र स्थित हैं, सप्तम भाव में चंद्रमा, एकादश भाव में बृहस्पति और बारहवें भाव में केतु स्थित हैं. इस कुण्डली का सर्वाष्टक वर्ग बनाकर इसका मंडल शोधन करेंगे :-

सीधे सर्वाष्टकवर्ग बनाया | Simple Method To Make Sarvashtak

राशि 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12
ग्रह
शनि 4 6 1 2 *3 4 4 4 3 3 4 4
गुरू 4 *2 1 1 2 3 4 2 4 2 4 7
मंगल 4 6 7 2 4 5 3 4 3 3 4 4
सूर्य 3 4 5 3 5 7 2 *3 3 3 3 2
शुक्र 4 4 2 3 4 3 6 3 *2 3 3 3
बुध 6 1 2 5 5 7 3 *3 1 5 2 6
चंद्रमा 2 2 5 2 2 2 3 7 1 *2 3 5
लग्न 6 7 1 *5 3 5 5 2 6 1 2 2
कुल 33 32 24 24 27 36 30 28 23 22 25 33

अब इस सर्वाष्टक वर्ग में मंडल शोधन किया जाएगा.

मंडल शोधन नियम | Rules for Mandal Shodhana

सर्वाष्टकवर्ग में प्राप्त प्रत्येक राशि के बिन्दुओं को 12 से भाग करके शेषफल को उस राशि में अंकित करते हैं. पर एक बात को ध्यान में रखना होगा कि किसी भी राशि में शून्य नहीं होना चाहिए. यदि किसी राशि में 12 के गुणक संख्या जैसे 12, 24, 36 इत्यादि आती है तो उक्त स्थिति में 12 से भाग देने पर शेषफल 0 आता है तो उक्त स्थिति में 0 के स्थान पर 12 को ही लिया जाएगा. अन्यथा कोई ओर संख्या के शेषफल आने पर शेषफल की संख्या को ही राशि में अंकित किया जाएगा.

इस सारिणी के अनुसार एक कुण्डली का खाका तैयार किया जाएगा जिसमें लग्न के अंकों से लिखते हुए सभी भावों में अंकों लिखा जाएगा. उदाहरण कुण्डली के सर्वाष्टकवर्ग के लग्न में 24 बिन्दु हैं, अब इन 24 बिन्दुओं को 12 से भाग देने पर शेषफल 0 आता है इसलिए इस शेषफल के स्थान पर 12 लिखा जाएगा. इसी प्रकार दूसरे भाव में 27 बिन्दु हैं इन्हें 12 से भाग करने पर शेषफल 3 बचता है इसलिए दूसरे भाव में मंडल शोधन के बाद 3 की संख्या लिखी जाएगी. ऎसे ही अन्य सभी भावों के बिन्दुओं अर्थात अंकों का शोधन करना होगा जिनसे मिलने वाले अंक इस प्रकार होंगे:-

भाव 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12
बिन्दु 24 27 36 30 28 23 22 25 33 33 32 24
भाजक 12 12 12 12 12 12 12 12 12 12 12 12
शेषफल 0(12) 3 0(12) 6 4 11 10 1 9 9 8 0(12)

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सर्वाष्टक बनाने का तरीका | Method to Create Sarvashtak

अष्टकवर्ग में ग्रहों का भिन्नाष्टकवर्ग बनाए बिना सीधे ही सर्वाष्टक वर्ग कैसे बनाया जाए इसके लिए सर्वाष्टकवर्ग सारणी का उपयोग करते हुए सर्वाष्टकवर्ग बनाया जाता है जिसका उल्लेख हम पहले ही कर चुके हैं. अब उन नियमों को कुण्डली में कैसे उपयोग किया जाए इस बात का उल्लेख यहां पर किया जा रहा है.

एक कुण्डली के उदाहरण द्वारा सीधे सर्वाष्टकवर्ग बनाने का तरीका | Let’s take an example of a kundali to create Sarvashtakavarga

यहां हम कर्क लग्न की कुण्डली ले रहे हैं, इसके लग्न में शनि स्थित है, मंगल दूसरे भाव में, सूर्य और बुध पंचम भाव में राहू और शुक्र छठे भाव में स्थित हैं, सप्तम भाव में चंद्रमा स्थित है, एकादश भाव में बृहस्पति और बारहवें भाव में केतू स्थित है.

सर्वप्रथम दिए गए प्रारूप के अनुसार हर ग्रह के लिए एक रिक्त तालिका बना लें यह कुल मिलाकर आठ रिक्त तालिकाएं बनेंगी जो नीचे दि गई हैं. जन्म कुण्डली के अनुसार ग्रह जिन जिन राशियों में स्थित हों उन-उन राशियों को विशेष चिन्ह द्वारा चिन्हित कर लें.

इस कुण्डली में शनि कर्क राशि में स्थित है इसलिए शनि के सामने कर्क राशि के खाने को विशेष चिन्ह से चिन्हित कर दिया है. इसी प्रकार मंगल सिंह राशि में स्थित है तो यहा तालिका में मंगल के सामने सिंह राशि के खाने को भी इसी प्रकार चिन्ह से चिन्हित कर लेंगे. यह विशेष चिन्ह यह दर्शाता है कि गणना यहां से प्रारंभ करनी है. इसी प्रकार अन्य सभी ग्रहों को क्रमानुसार चिन्हित करते जाएंगे. बृहस्पति के सामने वृष राशि के खाने को चिन्हित करना है तथा यहां पर सूर्य, बुध के लिए वृश्चिक राशि, शुक्र के लिए धनु राशि, चंद्रमा के लिए मकर राशि के खाने को चिन्हित करना होगा.

लग्न के लिए लग्न के सामने कर्क राशि के खाने को भी चिन्हित कर लें इस प्रकार उपरोक्त कार्य करने से जो तालिका बनती है वह नीचे दि गई है.

राशि 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12
ग्रह
शनि *
गुरू *
मंगल *
सूर्य *
शुक्र *
बुध *
चंद्रमा *
लग्न *

इस प्रकार प्रत्येक ग्रह के लिए एक – एक करके कुल सात तालिकाएं बनती हैं तथा एक लग्न तालिका होती है. इस तरह से सारिणी तैयार करने के उपरांत प्रत्येक ग्रह द्वारा प्रदत्त अंकों को इस सारिणी में लिखेंगे जो निम्न प्रकार से करेंगे:-

राशि 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12
ग्रह
शनि 4 6 1 3* 2 4 4 4 3 3 4 4
गुरू 4 2* 1 1 2 3 4 2 4 2 4 7
मंगल 4 6 7 2 4* 5 3 4 3 3 4 4
सूर्य 3 4 5 3 5 7 2 3* 3 3 3 2
शुक्र 4 4 2 3 4 3 6 3 2* 3 3 3
बुध 6 1 2 5 5 7 3 3* 1 5 2 6
चंद्रमा 2 2 5 2 2 2 3 7 1 2* 3 5
लग्न 6 7 1 5* 3 5 5 2 6 1 2 2
कुल 33 32 24 24 27 36 30 28 23 22 25 33

विशेष | Special Note

यहां इस बात का विशेष ध्यान रखना होता है कि गणना को जन्म कुण्डली में ग्रह द्वारा गृहित राशि जिसको कि तालिका में विशेष चिन्ह से दर्शाया गया हैं, वहां से प्रारंभ करनी होती है.

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छिद्र ग्रह की दशा | Dasha of Chhidra Planet

वैदिक ज्योतिष में अरिष्ट व प्रतिकूल घटनाओं का अध्ययन करने के लिए बहुत सी बातों का आंकलन किया जाता है. जन्म कुंडली, संबंधित वर्ग कुंडली, दशा/अन्तर्दशा तथा घटना के समय का गोचर देखा जाता है. इन सभी में एक महत्वपूर्ण पहलू और देखा जाता है वह छिद्र ग्रह की दशा. हर कुंडली में छिद्र ग्रह अलग होते हैं और यह किसी भी तरह शुभ नहीं होते हैं. इनका आंकलन सदा अशुभ का आंकलन करने के लिए किया जाता है. छिद्र ग्रह की दशा आने पर व्यक्ति को अरिष्ट घटनाओं का सामना करना पड़ता है. आइए जाने कि कुंडली में कौन से ग्रह छिद्र ग्रह कहलाते हैं.

  • जन्म कुंडली का अष्टमेश
  • अष्टमेश के साथ युत ग्रह
  • अष्टम भाव में स्थित ग्रह
  • अष्टम भाव को दृष्ट करने वाले ग्रह
  • 22वें द्रेष्काण का स्वामी
  • 64वें नवांश का स्वामी
  • अष्टमेश का अतिशत्रु

उपरोक्त सभी को छिद्र ग्रह कहा जाता है. यह ग्रह जातक की रक्षा करने में बिलकुल भी सक्षम नहीं होते हैं. जन्म कुण्डली में जब भी इन ग्रहों की दशा/अन्तर्दशा आती है तब व्यक्ति को मानसिक, शारीरिक व आध्यात्मिक कष्टों की प्राप्ति होती है. उपरोक्त सातों ग्रहों में से आइए आपको 22वें द्रेष्काण और 64वें नवांश की गणना का तरीका बता दें.

22वां द्रेष्काण | Lord of 22nd Dreshkan

जन्म कुण्डली के लग्न की डिग्री को अष्टम भाव में रख दें और फिर उसकी गणना द्रेष्काण कुंडली बनाने की तरह करें अर्थात यदि ग्रह 0 से 10 अंशो के मध्य है तब वहीं अष्टम भाव में रहेगा. अगर ग्रह 10 से 20 अंश के मध्य है तब अष्टम से पांचवें भाव का स्वामी 22वें द्रेष्काण का स्वामी बनता है. यह जन्म कुंडली का 12वाँ भाव होता है. यदि यह अंश तीसरे द्रेष्काण में आते हैं तब अष्टम भाव से नौवें भाव का स्वामी अर्थात जन्म कुंडली के चतुर्थ भाव का स्वामी ग्रह 22वें द्रेष्काण का स्वामी बनता है.

22वें द्रेष्काण की गणना का एक सरल तरीका यह है कि द्रेष्काण कुंडली के अष्टम भाव में जो राशि पड़ती हो उस राशि का स्वामी 22वें द्रेष्काण का स्वामी होता है. इसे खरेश भी कहा जाता है.

64वें नवांश का स्वामी | Lord of 64th Navansh

चंद्रमा के अंशों को चंद्रमा से अष्टम भाव में स्थापित कर दें. यहाँ से इसकी गणना उसी तरह से करनी है जिस तरह से नवाँश कुंडली बनाने के लिए करते हैं. माना किसी जन्म कुंडली में चंद्रमा 15 अंश और 20 मिनट पर स्थित है. अब इसके इन अंशों को चंद्रमा से अष्टम भाव में रख देगें. माना चंद्रमा वृष राशि में है और चंद्रमा से आठवें भाव में धनु राशि आती है और वहाँ हमने यह अंश रखे हुए हैं. अब यह देखेगे कि 15 अंश 20 मिनट पर कौन सा नवाँश आता है. यह पांचवाँ नवांश आता है और धनु में है तब गणना मेष से होगी. मेष से पांचवीं राशि सिंह होती है और सूर्य इसका स्वामी होता है. इस प्रकार सूर्य 64वें नवांश का स्वामी कहा जाएगा.

इसे हम नवांश कुंडली से भी देख सकते हैं. नवांश कुंडली में चंद्रमा जिस राशि में स्थित होता है उससे चतुर्थ भाव का स्वामी 64वें नवांश का स्वामी होता है.

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सिद्धा योगिनी दशा | Siddha Yogini Dasha

योगिनी दशा में अलगी दशा सिद्धा की आती है यह शुक्र की दशा होती है इसकी दशा अवधि सात वर्ष की होती है. यह शुभ दशा मानी गई है. इस दशा में व्यक्ति सुख, सौभाग्य को पाता है. उच्चपद व अधिकार की प्राप्ति होती है. शुक्र की इस दशा में व्यक्ति पर इसका प्रभाव स्पष्टत: दिखाई पड़ता है. यह दशा व्यक्ति में आसक्ति की भावना को दर्शाती है व्यक्ति में एक नई चेतना का आगमन होता है. उसके मन में नए नए विचार उत्पन्न होते हैं. वैदिक ज्योतिष में शुक्र को मुख्य रूप से स्त्री का प्रतीक तथा पत्नी का का कारक माना गया है. इसमें कोमलता के गुणों को देखा जा सकता है.

ज्योतिष में शुक्र से भौतिक सुख सुविधाओं इत्यादि को देखा जाता है. शुक्र से आराम पसन्द होने की प्रकृति, रसिकता, प्रेम, सुन्दरता, सजावट, कला, संगीत, गाना बजाना, विलासिता, मादक पदार्थ, कलात्मक गुण, आदि इन्हीं के प्रभाव से प्राप्त होते हैं. सिद्धा दशा में व्यक्ति कला की ओर झुकाव पाता है उसका मन अनेक नई आकर्षण से पूर्ण बातों की ओर झुकाव लिए होता है. यह दशा जीवन साथी के सुख प्रदान करने में भी सहायक बनती है क्योंकि पति- पत्नी का सुख देखने के लिए शुक्र की स्थिति को विशेष रुप से महत्व दिया जाता है.

शुक्र को सुंदरता, ऐश्वर्य तथा कला के साथ जुड़े क्षेत्रों का अधिपति माना जाता है. रंगमंच, चित्रकार, नृत्य कला तथा फैशन भोग-विलास से संबंधित वस्तुओं में व्यक्ति का रूझान बनता है वह इस ओर अपने की जुडा़ पाता है. शुक्र की प्रबल स्थिति व्यक्ति को इस दशा में शारीरिक रूप से सुंदर और आकर्षक प्राप्त होता व्यक्ति स्वयं को सौंदर्य की अनुभूति में पाता है तथा अपने पर इस आकर्षण को बनाए रखने के लिए प्रयासरत रहता है. शुक्र के प्रबल प्रभाव से महिलाएं अति आकर्षक होती हैं. सिद्धा दशा में जातक आम तौर पर फैशन जगत, सिनेमा जगत तथा ऐसे ही अन्य क्षेत्रों में रूचि रखने की चाह रख सकता है. यह दशा शारीरिक सुखों की भी कारक है प्रेम संबंधों में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका देखी जा सकती है.

सिद्धा दशा का प्रभाव व्यक्ति को रसिक बनाता है. बुरे प्रभाव के प्रभाव से जातक के वैवाहिक जीवन एवं प्रेम संबंधों में समस्याएं उत्पन्न भी हो सकती हैं. यह देखना अत्यंत आवश्यक होता है कि दशा में कितनी मजबूती है और वह अपना प्रभाव किस प्रकार से देने की क्षमता रखती है तभी उसके फलों के विषय में जाना जा सकता है क्योंकि अच्छा व बुरा सभी प्रकार का फल जातक को प्रभावित करेगा ही अब देखने की बात यह होगी की किस फल की कितनी प्रबलता बनती है उसके अनुरूप व्यक्ति को कुंडली में सिद्धा दशा का प्रभाव देखने को मिलता है.

क्योंकि इसके प्रभाव व्यक्ति को अपने लुभावों से जकड़ सकता है, वह एक आकर्षक जीवन की चाह रखने वाला हो सकता है. परिवार व समाज में अपनी सो छवी के अनुरूप दिखने की चाह उसमें प्रबल होती है इसलिए यह दशा यदि शुभता देती है, तो उस शुभता को एक सीमा तक संभालने की क्षमता भी चाहती है अन्यथा जातक को वासनाओं से भर भी सकती है.

सिद्धा में अन्य दशाओं का अंतर

  • सिद्धा दशा में सिद्धा की अंतरदशा होने पर व्यक्ति को सभी कामों में सिद्धि की प्राप्ति होने लगती है. व्यक्ति को कार्यों में देर-सबेर सफलता मिलती ही है. अपने लोगों के साथ प्रेम पूर्वक संबंध बनते हैं. बच्चों का सुख मिलता है.
  • सिद्धा में संकटा दशा का अंतर परेशानी बढ़ाने वाला होता है. इस समय आपकी बचत प्रभावित होती है. खर्च में वृद्धि होती है. सरकार की ओर से चिंताएं बढ़ सकती हैं. इस दशा समय पर व्यक्ति को परदेश गमन भी करना पड़ सकता है.
  • सिद्धा में मंगला दशा की अंतरदशा व्यक्ति को आनंद देने वाला होती है. इस समय पर व्यक्ति अपने प्रयासों से लाभ भी पाता है. परिवार का सहयोग मिलता है.
  • सिद्धा दशा में पिंगला दशा का आरंभ व्यक्ति में क्रोध की अधिकता देने वाला बनता है. व्यक्ति अपनों के साथ लड़ाई करता है और उनके साथ अलगाव सहना पड़ता है.

  • सिद्धा दशा में धान्या दशा की अंतर दशा आने के कारण व्यक्ति अपने पूर्व जन्मों के शुभ फलों का भोग करता है. उसकी अधूरी इच्छाओं की पूर्ति का मौका मिलता है.
  • सिद्धा दशा में भ्रामरी दशा का आगमन व्यक्ति को यात्राएं करवाने वाला होता है. व्यक्ति को अपने निवास स्थान को बदलना भी पड़ता है. गलत चीजों के प्रति जातक का आकर्षण बढ़ता है. कई मामलों में दान करने की प्रवृत्ति भी उसमें आने लगती है.
  • सिद्धा दशा में भद्रिका दशा की अंतर दशा व्यक्ति को आस्थावान बनाती है. शिक्षा का लाभ मिलता है. उसके शुभ गुणों में वृद्धि होती है. अभी तक जो काम अटके थे वे अब आगे बढ़ते हैं.
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    सूर्य गोचर का फल: कुंडली से जानें

    कुण्डली में सूर्य गोचर में कैसा फल प्रदान करेंगे इस विषय के बारे में समझने के लिए यह समझना होगा की गोचर में सूर्य कुण्डली के सभी भावों में अलग- अलग फल देते हैं. जन्म कुण्डली में चंद्रमा जिस भाव में स्थित होता है, उस भाव को लग्न मानकर गोचर के ग्रहों का फलकथन कहा जाता है. चन्द्र लग्न से सूर्य का गोचर 3, 6,10 और 11वें भाव में होने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है.

    इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि गोचर के ग्रहों के प्रभाव उनके राशि परिवर्तन के साथ साथ बदलते रहते हैं. गोचर के सूर्य का भ्रमण चन्द्र लग्न में जब गोचर वश सूर्य भ्रमण कर रहा होता है तो शारीरिक स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता. मानसिक तनाव की स्थिति बनी रहती है. रक्तचाप, हृदय रोग, उदर विकार, नेत्रविकार आदि होने की संभावना बन सकती है.

    प्रत्येक कार्यों में विलम्ब होता है, मान-समान में कमी होती है. विवादों के कारण मानसिक व्यथा बनी रह सकती है. दुष्ट व बुरे लोगों की संगति का प्रभाव तब देखने को मिल सकता है जब गोचर का सूर्य चन्द्रमा से दूसरे भाव में भ्रमण कर रहा हो. व्यापार और सम्पति में हानि का भय बना रहता है. मित्रों व सम्बन्धियों से विवाद हो सकता है.

    गोचर का सूर्य जब तीसरे भाव में आता है तो उच्च राज्याधिकारियों व सज्जनों से मुलाकात के योग अपने आप पैदा हो जाते हैं. पुत्रों तथा मित्रों से सम्मान मिलता है. शत्रुओं पर विजय मिलती है और धन-मान प्रतिष्ठा प्राप्त होती है. पद लाभ के साथ-साथ आर्थिक लाभ भी मिलता है.

    सूर्य का जन्मकालीन चंद्रमा से चतुर्थ स्थान के ऊपर से गोचर का सूर्य भ्रमण करता है तब मानसिक व शारीरिक व्यथा बढ़ जाती है. सुखों में कमी का कारण घरेलू झगडे़ बन जाते है. जमीन -जायदाद संबंधी अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं. अनावश्यक यात्रा करनी पड़ती है तथा असुरक्षा का भय बना रहता है.

    चंद्रमा से पंचम भाव में सूर्य का गोचर आपको मानसिक भ्रम की स्थिति में डाल सकता है. स्वयं और संतान को स्वास्थ्य कष्ट पैदा हो सकता है. बेवजह राज्याधिकारियों अथवा सरकार से वाद-विवाद की स्थिति आ सकती है.

    चंद्रमा के छठे स्थान पर जब गोचर का सूर्य भ्रमण करने पर आपके कार्त सिद्ध होते हैं, आपके सम्मान में वृद्धि कराता है. सभी प्रकार के सुख की प्राप्ती हो सकती है. अन्न-वस्त्र इत्यादि का लाभ मिलता है, मन व शरीर स्वस्थ रहता है.

    गोचर के सूर्य का जन्मकालीन चंद्रमा से सप्तम में भ्रमण दाम्पत्य जीवन वैमनस्य का भाव पैदा करता है.

    आपके अधिकाँश कामों में असफलता प्राप्त होती है. व्यवसाय या काम में बाधाएं उत्पन्न होती हैं. कष्टकारी यात्राएँ करनी पड़ सकती हैं. धन व मानहानि हो सकती है.

    जन्मकालीन चंद्रमा से अष्टम भाव में सूर्य का भ्रमण होने पर जुर्माना, मुकदमा ,गिरफ्तारी आदि की संभावना रहती है. अपमान का भय रहता है. शत्रुओं से झगड़ा व शरीर में पीड़ा आदि रहने की सं भावना रहती है.

    जन्मकालीन  चंद्रमा से नवम स्थान पर जब गोचर में सूर्य भ्रमण करता है तब राज्य की ओर से परेशानी उठानी पड़ती है. मित्रों व पुत्रों से मतभेद हो सकता है. भाग्य साथ नहीं देता.

    चन्द्र लग्न से दशम भाव में सूर्य के भ्रमण से सभी कार्य सरलता से पूर्ण हो जाते हैं. गृह सुख मिलता है.

    उच्चअधिकारी प्रसन्न रहते हैं, सरकार की ओर से धन व सम्मान प्राप्त होता है. यहाँ तक कि नौकरी में पदोन्नति हो जाती है.

    जन्मकालीन  चंद्रमा से ग्यारहवें भाव में जब सूर्य भ्रमण करता है तब आपको व्यापार में लाभ होता है और आपकी आमदनी में वृद्धि हो जाती है. इस दौरान उत्तम भोजन की प्राप्ती होती है. मित्रों के साथ अच्छा समय व्यतीत होता है.

    चन्द्र लग्न से द्वादश भाव में सूर्य जब भ्रमण करता है तो किसी कारण से आपका शारीरिक कष्ट बढ़ सकता है धन की हानि होती है, मानसिक चिंताएं और अधिक बढ़ जाती हैं. दुर्घटनाओं का भय बना रह सकता है.

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    चिकित्सा ज्योतिष में वर्ग कुण्डलियों का महत्व | Importance of Varga Kundalis in Medical Astrology

    चिकित्सा ज्योतिष में हम जन्म कुण्डली का अध्ययन तो करते ही है साथ ही वर्ग कुण्डलियाँ भी बहुत महत्व रखती हैं. कई बार जन्म कुण्डली में स्वास्थ्य के नजरिये से कोई परेशानी दिखाई नहीं देती है लेकिन जब हम वर्ग कुण्डली को देखते हैं तब उसमें बहुत सी बाते स्पष्ट होती हैं. स्वास्थ्य के लिए जिन वर्ग कुण्डलियों को देखा जाता है वह है – नवांश कुण्डली, द्रेष्काण कुंडली, द्वादशांश कुंडली और त्रिशांश कुण्डली. इन चारों का चिकित्सा जगत में अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान माना गया है. किसी भी व्यक्ति के अरिष्ट को देखने के लिए जन्म कुंडली के साथ इन चारों वर्ग कुंडलियों का भी अध्ययन किया जाना आवश्यक होता है. उसके बाद जाकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाता है. आइए इन वर्ग कुण्डलियों के विषय में जानने का प्रयास करें.

    नवांश कुंडली | Navansh Kundali

    जन्म कुण्डली की तरह ही इस कुंडली का अध्ययन भी जीवन के सभी पहलुओं को देखने के लिए किया जाता है. इसके बलाबल का अध्ययन किया जाएगा. लग्नेश की जो स्थिति जन्म कुंडली में है क्या वही नवांश में भी है आदि बातों का अध्ययन किया जाता है. जो शुभ ग्रह जन्म कुंडली में बली है और अगर वह नवांश में बलहीन है तब ग्रह कमजोर माना जाता है. यदि कोई ग्रह जन्म कुंडली में तो कमजोर है लेकिन नवांश में बली हो गया है तब उस ग्रह को बल मिल जाता है और अपनी दशा/अन्तर्दशा आने पर अशुभ फलों में कमी कर देता है.

    नवांश कुंडली का निर्माण 30 अंशों के 9 बराबर भाग करने पर होता है. एक भाग 3 अंश 20 मिनट का होता है. इसकी गणना कई प्रकार से की जाती है.

    द्रेष्काण कुंडली | Dreshkan Kundali

    इस कुंडली का निर्माण 30 अंश के 3 बराबर भाग करने पर होता है. एक भाग 10 अंश का होता है. स्वास्थ्य के संदर्भ में यह वर्ग कुंडली भी अपना महत्व रखती है. इस कुंडली के लग्न और लग्नेश का अध्ययन किया जाता है. अष्टम और अष्टमेश का अध्ययन किया जाता है. जन्म कुण्डली के लग्न की राशि द्रेष्काण में किस भाव में गई है, यह देखा जाता है. जन्म कुंडली के लग्नेश की द्रेष्काण में स्थिति देखी जाती है. यदि यह सभी बली अवस्था में है तब व्यक्ति का स्वास्थ्य अच्छा रहता है. साथ ही दशा/अन्तर्दशानाथ का अध्ययन भी आवश्यक है. यदि दशा/अन्तर्दशानाथ की स्थिति यहाँ अनुकूल नहीं है तब उस समय व्यक्ति को सचेत रहना चाहिए. स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है.

    द्वादशांश कुंडली | Dwadshansh Kundali

    इस कुंडली का निर्माण 30 अंशों के 12 बराबर भाग करने पर होता है. इस कुंडली का अध्ययन भी द्रेष्काण कुंडली की तरह ही होता है. जन्म कुंडली के लग्न/लग्नेश की इस कुंडली में स्थिति देखी जाएगी. द्वादशांश कुंडली का अपना लग्न और लग्नेश भी देखा जाएगा. यदि यह सभी यहाँ बली है तब स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ कम आती है और आती भी हैं तब जल्द ही व्यक्ति ठीक भी हो जाता है. इस कुंडली में भी दशा/अन्तर्दशानाथ स्वामी का आंकलन किया जाता है. यदि अच्छी हालत में है तो अच्छे फल मिलते हैं और अगर बुरी हालत में है तब बुरे फल मिलने की संभावना बनती है.

    त्रिशांश कुंडली | Trishansh Kundali

    स्वास्थ्य के आंकलन में इस कुंडली का सर्वाधिक महत्व माना गया है. इस कुण्डली की गणना का तरीका अलग होता है. इसमें सम/विषम राशियों के आधार पर गणना की जाती है और 30 अंशों के 6 बराबर भाग किए जाते हैं. फिर उसी के हिसाब से ग्रहों को बिठाया जाता है. इस कुंडली में सभी ग्रहों का अध्ययन किया जाता है. ग्रह की अवस्था क्या है अर्थात वह पीड़ित है या नहीं. बली है या बलहीन है. जन्म कुंडली के लग्न/लग्नेश का अध्ययन किया जाएगा कि वह यहाँ किस स्थिति में है. त्रिशांश कुंडली के लग्न की स्थिति देखी जाएगी और लग्नेश का विश्लेषण किया जाएगा. फिर उसके बाद दशा/अन्तर्दशानाथ की स्थिति का अवलोकन किया जाएगा कि वह किस हालात में है. उसके बाद कहीं जाकर किसी नतीजे पर पहुंचा जाएगा.

    उपरोक्त सभी पहलुओं का सूक्ष्मता से अध्ययन करने के बाद ही किसी व्यक्ति की कुंडली के बारे में कुछ कहना उचित होता है, केवल जन्म कुंडली के आधार पर कुछ गलत नहीं कहना चाहिए.

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    अष्टकवर्ग में फलित के नियम | Rules for Results in Ashtakavarga

    पराशर होरा शास्त्र में महर्षि पराशर जी कहते हैं कि विभिन्न लग्नों के लिए तात्कालिक शुभ और अशुभ ग्रह होते हैं जिनके द्वारा फलित को समझने में आसानी होती है. यह कई बार देखने में आता है कि ग्रह किसी विशेष लग्न के लिए शुभ या अशुभ फल देने वाला होता है. इस लिए किसी भी ग्रह के परिणामों को जानने के लिए जन्म कुण्डली में उसके स्वामित्व का ध्यान रखना जरूरी होता है. ग्रहों के शुभाशुभ का निर्णय निम तरह से कर सकते हैं.

    • लग्नेश चाहे नैसर्गिक शुभ ग्रह हो अथवा अशुभ हो, हमेशा शुभ ही माना जाता है. जैसे मकर और कुम्भ के लिए शनि सदैव शुभ होते हैं.
    • इसी प्रकार त्रिकोणेश भी सदैव शुभ माने जाते हैं. केन्द्र और त्रिकोण के स्वामी कर्क और सिंह लग्नों के लिए मंगल, वृष और तुला लग्न के लिए शनि तथा मकर व कुम्भ लग्न के लिए शुक्र योगकारक होकर शुभ होते हैं.
    • केन्द्राधिपति दोष के कारण केन्द्र के स्वामी होने पर अशुभ ग्रह अपनी अशुभता छोड़ देते हैं. जबकी शुभ ग्रह अपनी शुभता भूल जाते हैं या कहें ग्रह अपनी सम स्थिति को पाते हैं.

    दृष्टियां | Aspects

    अष्टकवर्ग की विवेचना में दृष्टियां भी बहुत महत्वपूर्ण होती है. अष्टकवर्ग के गोचर के में ग्रह पर शुभ ग्रहों की दृष्टि शुभता में वृद्धि करती है. जबकी अशुभ ग्रहों की दृष्टि अशुभता दर्शाने वाली होती है. और ग्रह द्वारा प्रदान करने वाले अच्छे प्रभावों को खराब करते हैं.

    वक्री ग्रहों का प्रभाव | Effect of Retrograde Planets

    नैसर्गिक शुभ ग्रह का अपने अनु भाव में वक्री होकर गोचर करना उक्त भाव संबंधि शुभ फलों में वृद्धिकारक होता है. जबकि प्रतिकूल भाव का गोचर परिणामों में कम शुभता लाता है. नैसर्गिक अशुभ ग्रह का वक्री गोचर कष्टदायक होता है.

    दशानाथ का प्रभाव | Effect of Dashanath

    शुभ ग्रह की दशा में ग्रह जब अनुकूल भावों में गोचर करता है तो अनुकूल परिणामों को देने के योग्य बनता है. लेकिन जब प्रतिकूल भावों में गोचर करता है तो शुभ फलों में कमी आती है. इसके अतिरिक्त अशुभ ग्रह की दशा में उस ग्रह विशेष का अशुभ भावों में गोचर अनिष्ट कारक हो जाता है जबकि शुभ भावों में गोचर इन फलों में कमी लाता है.

    अस्तगत प्रभाव | Effect of Astagat

    ग्रह का प्रतिकूल स्थानों में गोचर करते हुए अस्त होना अथवा राहु केतु से ग्रस्त होना अशुभ फलदायक बनता है.

    पाप कर्तरी या शुभ कर्तरी में होना | Being in Malefic and Benefic Kartari

    गोचर करते हुए कोई ग्रह दो पाप ग्रहों के मध्य आता है तो वह पाप कर्तरी में स्थित होता है और यदि ग्रह अनुकूल भावों में गोचर करते हुए इस योग में शामिल होता हो तो उसके द्वारा प्रदान किए शुभ फलों में कमी आ जाती है. यदि प्रतिकूल भावों में गोचर करते हुए इस योग में शामिल हो तो इसके अशुभ फलों की वृद्धि होती है. शुभ कर्तरी में होने से इसके विपरित प्रभाव मिलते हैं. इन सभी के अतिरिक्त इन बातों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता होती है कि गोचरवश जब कोई ग्रह कुण्डली में स्थित अपने भोगांश को पार करता है तो कोई शुभाशुभ धटना अवश्य देता है. इस प्रकार से कई सूक्ष्म बिन्दुओं का अवलोकन करके हम अष्टकवर्ग के फलित को जानने में सक्ष्म हो सकते हैं.

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