नवग्रह स्त्रोत के प्रयोग से स्वयं ही ग्रह शांति कैसे करें

नवग्रहों का व्यक्ति के जीवन पर पूर्ण रुप से प्रभाव देखा जा सकता है. इन नवग्रहों की शांति द्वारा जीवन की अनेक समस्याओं को दूर करने में सहायक हो सकते हैं. नवग्रहों के विषय में अनेक तथ्यों को बताया गया है जिनमें मंत्रों का महत्व परिलक्षित होता है. इस विषय में ज्योतिष में अनेक सिद्धांत प्रचलित हैं. नव ग्रह स्त्रोत इसी के आधार स्वरुप एक महत्वपूर्ण मंत्र जाप है जिसके द्वारा समस्त ग्रहों की शांति की जा सकती है. नवग्रह स्त्रोत में मंत्र तथा दान-पुण्य करके इन ग्रहों की शांति की जा सकती है. कुंडली में स्थित इन नवग्रहों की शांति के लिए भी इस नवग्रह स्त्रोत का बहुत महत्व रहता है.

नवग्रह पूजन | Navagraha Pujan

नवग्रह पूजन का विशेष महत्व पुराणों में वर्णित है. नवग्रह-पूजन के लिए सर्वप्रथम ग्रहों का आह्वान करके उनकी स्थापना की जाती है. मंत्रो उच्चारण करते हुए ग्रहों का आह्वान करते हैं. धूप, अगरबत्ती, कपूर, केसर, चंदन, चावल, हल्दी, वस्त्र, जल कलश, पंच रत्न , दीपक, लौंग, श्रीफल, धान्य व दूर्वा इत्यादि वस्तुओं को पूजा में रखा जाता है.

सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शानि, राहु एवं केतु इन नवग्रहों की पूजा के लिए सर्वप्रथम नवग्रह मण्डल निर्मित करना चाहिए जिसमें नौ कोष्ठक होते हैं. इन कोष्ठकों में नव ग्रहों को स्थापित किया जाता है दिशा के अनुरूप मध्य वाले कोष्ठक में सूर्य, आग्नेय कोण में चंद्र, दक्षिण में मंगल, ईशान में बुध, उत्तर में गुरू , पूर्व में शुक्र, पश्चिम में शानि, नैऋत्य में राहु और वायस्क में केतु ग्रह की स्थापना कि जानी चाहिए.

स्थापना तथा आवाहन पश्चात नवग्रहों का षोडशोपचार पूजा करना चाहिए. ग्रहों के अनुरुप उन्हें वस्तुएं अर्पित करनी चाहिए जैसे सूर्य की अनुकूलता प्राप्त करने के लिए गेहूं, गुड़ आदि का उपयोग करना चाहिए इनका उपयोग करने से सूर्य देव प्रसन्न होते हैं.

चंद्रमा मन और माता का कारक होता है अत: चंद्रमा की प्रसन्नता एवं शांति हेतु चीनी, दूध और दूध से बने पदार्थ और सफेद वस्तुओं को उपयोग में लाना तथा दान करना उत्तम होता है. इसके अतिरिक्त चमेली का इत्र या सुगंध चंद्रमा की शांति के लिए बहुत अनुकूल माने जाते हैं.

मंगल ग्रह की पूजा एवं शांति के लिए गुड़, मसूर की दाल, अनार, जौ और शहद का उपयोग एवं दान करना चाहिए. लाल चंदन से बने इत्र, तेल मंगल देव को प्रसन्न करने हेतु बहुत शुभ होते हैं.

बुध ग्रह की पूजा एवं शांति के लिए इलायची, हरी वस्तुएं चंपा, मटर, ज्वार, मूंग उपयोग में लाने चाहिए. चंपा का इत्र तथा तेल का प्रयोग बुध की शुभता के लिए उपयोगी होते हैं.

बृहस्पति ग्रह की पूजा एवं शांति के लिए चना, बेसन, मक्का, केला, हल्दी, पीले वस्त्र और फलों का उपयोग करना चाहिए पीले फूलों की सुगंध, केसर और केवड़े की सुगंध भी गुरू के शुभ फलों में वृद्धि करती है.

शुक्र ग्रह के लिए चीनी, कमलगट्टा, मिश्री, मूली और चांदी का उपयोग करना उत्तम होता है सफेद फूल, चंदन और कपूर की सुगंध भी अतिशुभ मानी गई है.

शनि ग्रह की पूजा एवं शांति हेतु काले तिल, उड़द, कालीमिर्च, मूंगफली का तेल, लौंग तथा लोहे का उपयोग करना चाहिए कस्तुरी या सौंफ की सुगंध शनि देव को भेंट करनी चाहिए.

राहु और केतु की पूजा के लिए उड़द, तिल और सरसों का प्रयोग लाभदायक होता है. कस्तुरी की सुगंध से शुभ फलों की प्राप्ति होती है

नवग्रह स्त्रोत | Navagraha Stotra

जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम ।
तमोSरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोSस्मि दिवाकरम ।।

दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णव सम्भवम ।
नमामि शशिनं सोमं शंभोर्मुकुट भूषणं ।।

धरणी गर्भ संभूतं विद्युत्कान्ति समप्रभम ।
कुमारं शक्ति हस्तं तं मंगलं प्रणमाम्यहम ।।

प्रियंगुकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम ।
सौम्यं सौम्य गुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम ।।

देवानां च ऋषीणां च गुरुं का चनसन्निभम ।
बुद्धि भूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पितम ।।

हिम कुन्दमृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम ।
सर्वशास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम ।।

नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम ।
छायामार्तण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्चरम ।।

अर्धकायं महावीर्य चन्द्रादित्यविमर्दनम ।
सिंहिकागर्भ संभूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम ।।

पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रह मस्तकम ।
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम ।।

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शुक्र ग्रह और ज्योतिष

ज्योतिष के अनुसार कुण्डली में शुक्र ग्रह की शुभ स्थिति जीवन को सुखमय और प्रेममय बनाती है तो अशुभ स्थिति चारित्रिक दोष एवं पीड़ा दायक होती है. शुक्र के अशुभ होने पर व्यक्ति में चारित्रिक दोष उत्पन्न होने लगते हैं. व्यक्ति बुरी आदतों का शिकार होने लगता है.

शुक्र के अशुभ होने पर वैवाहिक जीवन में कलह की स्थिति उत्पन्न होने लगती है और इस कलह से अलगाव या तलाक की नौबत भी आ सकती है. जीवन में धन संपत्ति, सुख – साधन सभी वस्तुओं के होने पर भी आप इन सभी के उपभोग का सुख न ले पाए तो यह भी शुक्र के खराब होने के लक्षण हो सकते हैं.

परिवार में रिश्तों के मध्य टकराव की स्थिति आ रही हो या सास और बहु के संबंधों में सदैव कलह होता रहे यह सभी कुछ शुक्र अशुभ होने की निशानियाँ हो सकती है. परिवार में स्त्री के कारण किसी भी प्रकार से धन की हानि हो रही हो तो यह भी खराब शुक्र के लक्षण को दर्शाता है.

व्यक्ति को वैवाहिक जीवन का सुख न मिल पाए, पति-पत्नी के संबंधों में मधुरता न रहे या दोनों में से किसी की कमी उनकी इच्छा की पूर्ति करने में सक्षम न हो रही हो तब शुक्र का ही अशुभ प्रभाव हो सकता है. स्त्री को गर्भाश्य से संबंधित रोग परेशान करें या संतति संबंधी परेशानि हो तो यह भी शुक्र की अशुभता का संकेत देते हें.

शुक्र के बुरे प्रभाव के कारण व्यक्ति के जीवन में भी बदलाव देखा जा सकता है. उसके व्यवहार में चालबाजी, धोखेबाजी जैसे अवगुण उभरने लगते हैं तथा वह उसकी कथनी और करनी में अंतर आ सकता है. शुक्र के पीड़ित होने के कारण व्यक्ति गुप्त रोगों से पीड़ित होने लगता है. उसकी अपनी गलतियां या अनैतिक कार्यों द्वारा वह अपनी सेहत खराब भी कर सकता है.

शुक्र के अशुभ होने के कारण व्यक्ति कम उम्र में ही नशे की लत या रोगों का शिकार होने लगता है उसके अंदर नशाखोरी एवं गलत कार्यों द्वारा होने वाले रोग उत्पन्न होने लगते हैं. जब कोई व्यक्ति अपना दोहरा व्यक्तित्व अपना लेता है अर्थात दोहरी जिंदगी जीने लगता है तब यह शुक्र के अशुभ होने के लक्षण होते हैं.

शुक्र को शुभ करने के उपाय | Remedies for an inauspicious Venus

शुक्र की अशुभता दूर करने के लिए सामर्थ्य अनुसार रुई और दही को मंदिर में दान करना चाहिए.शुक्र को शुभ करने के लिए आप को गाय को हरा चारा खिलाना चाहिए और सच्चे मन एवं श्रद्धा भाव के साथ उसकी सेवा करनी चाहिए.

स्त्री एवं अपनी पत्नी का कभी भी अपमान या निरादर नहीं करना चाहिए उन्हें सदैव आदर और सम्मान देने का प्रयास करना चाहिए. चांदी से बनी ठोस गोली सदैव अपने पास रखा करें ऎसा करने से शुक्र की शुभता में इजाफा होगा.

शुक्र की शुभता के लिए शुक्रवार का व्रत करना चाहिए तथा नियमित रुप से मंदिर में जाकर माथा टेकना चाहिए.

मन और हृदय पर काबू रखना चाहिए और भटकाव की ओर जाने से रोकना चाहिए. शुक्र के सम्बन्ध में मन और इन्द्रियों को नियंत्रित रखने पर विशेष बल देता है. गाय को हरी चरी खिलानी चाहिए इससे शुक्र की अशुभता में कमी आएगी. गाय का पीला घी मंदिर में दान करने से भी शुक्र को बल मिलता है.

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बगलामुखी यंत्र | Baglamukhi Yantra | Importance of Baglamukhi Yantra

माँ बगलामुखी स्तंभव शक्ति की अधिष्ठात्री मानी जाती  हैं. यह अपने भक्तों के भय को दूर करके शत्रुओं और बुरी शक्तियों का नाश करती हैं. माँ बगलामुखी यंत्र धार्मिक कार्यो में शुभ माना जाता है. धर्मशास्त्रो के अनुसार बगलामुखी यंत्र तत्काल लाभ देने वाला होता है, यह यंत्र स्तम्भन करने हेतु उपयोग में लाया जाता है, इस यंत्र के प्रयोग से प्रेतबाधा व यक्षिणीबाधा का नाश होता है.

यह यंत्र मनोवांछित फल देने वाला होता है यह यन्त्र अन्य कार्यो के लिए भी काफी उपयोगी माना जाता है बुरी शक्तियों से बचाव तथा कार्यों में उन्नति के लिए इस यंत्र को उपयोग में लाया जाता है. मान्यता है कि बगलामुखी यंत्र व्यक्ति को परेशानियों से निवारण तथा जन्म और मृत्यु के चक्र से निकाल कर मुक्त भी करता है.

बगलामुखी यंत्र पूजा | Baglamukhi Yantra Puja

बगलामुखी यंत्र को उपयोग में लाने से पूर्व इसे पंचामृत से  स्नान कराया जाना चाहिए. मंदिर में स्थापित कर अष्ठसुगंध या कुन्दा फूल, नारियल, अक्षत हल्दी इत्यादि से पूजा करनी चाहिए. इसकी पूजा में उचित मंत्र जप करना चाहिए तथा यंत्र को अभिमंत्रित किया जाना चाहिए क्योंकि इस प्रक्रिया से यंत्र मे दिव्य शक्ति का संचार होता है.

बगलामुखी यंत्र स्थापना क्रिया रात मे करनी चाहिए इस समय यंत्र की उर्जा अधिक शक्तिशाली और प्रभावी होती है. इसका निर्माण महाशिव रात्रि, होली अथवा दीपावली के दौरान बेहतर होता है. बगलामुखी देवी रत्नजडित सिहासन पर विराजती होती हैं रत्नमय रथ पर आरूढ़ हो शत्रुओं का नाश करती हैं. देवी के भक्त को तीनो लोकों में कोई नहीं हरा पाता. वह जीवन के हर क्षेत्र में सफलता पाता है.

बगलामुखी यंत्र निर्माण | Establishment of Baglamukhi Yantra

यंत्र धारण करने से पहले इसे पूर्ण रुप से शुद्ध एवं पवित्र मन द्वारा अभिमंत्रित करना चाहिए इस यंत्र को रक्षा कवच रुप में भी धारण किया जा सकता है. यंत्र को सोने या चांदी की धातु में पहनना चाहिए. यदि यंत्र का निर्माण स्वयं करना हो तो यंत्र के रेखाचित्र बनाने के लिए लाल, पीला या नारंगी रंगों का उपयोग करना चाहिए. देवी बगलामुखी का रंग स्वर्ण के समान पीला होता है अत: साधक को माता बगलामुखी यंत्र की आराधना करते समय पीले वस्त्र ही धारण करने चाहिए.

बगलामुखी यंत्र उपयोग | Use of Baglamukhi Yantra

बगलामुखी यंत्र की नियमित रुप से धूप और दिप प्रज्जवलित कर पूजा करना चाहिए. यंत्र की पूजा पीले वस्त्र धरण कर,पीले आसन पर बैठकर तथा पीले फूलों के साथ की जानी चाहिए. इसे पूजा घर में रखने के साथ साथ गले में भी पहना जा सकता है. यंत्र की पूजा पीले दाने,पीले वस्त्र,पीले आसन पर बैठकर मंत्र जप करते हुए करनी चाहिए. पीले फूल और नारियल चढाने से देवी प्रसन्न होतीं हैं. देवी को पीली हल्दी के ढेर पर दीप-दान करें, देवी की मूर्ति पर पीला वस्त्र चढाने से बड़ी से बड़ी बाधा भी नष्ट होती है, बगलामुखी देवी के मन्त्रों से दुखों का नाश होता है.

बगलामुखी यंत्र लाभ | Baglamukhi Yantra Benefits

बगलामुखी महायंत्र की शक्ति का उपयोग शत्रु को परास्त और नियंत्रित करने के लिए किया जाता है. बगलामुखी यंत्र विजय प्राप्त करने,कानूनी कार्यवाही, कोर्ट कचहरी और मुकद्दमों में सफलता पाने के लिए किया जाता है. बगलामुखी की साधना में नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक होता है. बगलामुखी साधना के लिए सूर्य मकर राशिस्थ हो, मंगलवार को चतुर्दशी का दिन सर्वश्रेष्ठ माना गया है. क्योंकि इसी अर्द्धरात्रि के समय देवी श्री बगलामुखी प्रकट हुई थीं. माता के मंत्र जाप में  “ॐ ह्लीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलय बुध्दिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा।”मंत्र का जाप करना चाहिए.

बगलामुखी यंत्र का महत्व | Significance of Baglamukhi Yantra

शास्त्रों में देवी बगलामुखी दसमहाविद्या में आठवीं महाविद्या हैं यह स्तम्भन की देवी हैं. संपूर्ण ब्रह्माण्ड की शक्ति का समावेश हैं माता बगलामुखी शत्रुनाश, वाकसिद्धि, वाद विवाद में विजय के लिए इनकी उपासना की जाती है. इनकी उपासना से शत्रुओं का नाश होता है तथा भक्त का जीवन हर  प्रकार की बाधा से मुक्त हो जाता है. अत: बगलामुखी यंत्र का महत्व सर्व उपयोगी होता है. इस यंत्र में मां के अलौकिक सौंदर्य और स्तंभन शक्ति के समाहीत होती है. इनकी आराधना मात्र से साधक के सारे संकट दूर हो जाते हैं, शत्रु परास्त होते हैं और श्री वृद्धि होती है.

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अगर आपकी कुण्डली में भी है शनि दोष तो इन उपायों को करने से मिलेगी राहत

कुंडली में मौजूद सभी ग्रह अच्छे या बुरे फल देने वाले सिद्ध हो सकते हैं. शनि यदि कुंडली में शुभ भावों के स्वामी हैं तब वह बुरा फल नहीं देते. यदि शनि कुण्डली शुभ होकर निर्बल है तब उसे बल देना आवश्यक है. यदि शनि कुंडली में बुरे भावों का स्वामी है जैसे कर्क लग्न और सिंह लग्न के लिए शनि अशुभ माना जाता है अत: इस स्थिति में हमें शनि मंत्र जाप के द्वारा शनि शांति के उपाय करने चाहिए.

यदि कोई साढेसाती अथवा शनि की ढैय्या से पीड़ित हो तो उसे अपने कर्मों का भुगतान करना ही होगा चाहे वह कितना भी उपाय क्यूँ ना कर ले. इस समय शनि उन्हें अपने और पराये का फर्क बताने का काम करता है. व्यक्ति को आग में तपाकर सोना बनाता है.

शनि के लिए तेल का दान | Donating Oil for Saturn

शनिदेव का उपचार करते हुए कुछ बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है. सबसे पहले तो यह ध्यान रखना चाहिए कि कभी भी शनिवार के दिन तेल नहीं खरीदें. तेल को पहले से ही खरीदकर घर में रखें और उसे शनि मंदिर में अर्पित करें. जब शनिदेव की मूर्ति पर तेल अर्पित करें तब कभी भी उनकी आंखों में ना देखें क्यूंकि उनकी दृष्टि को ही खराब माना गया है. शनि देव जी के चरणों में देखते हुए तेलार्पण करें.

शनिवार के दिन तेल मांगने वाले को भी तेल दान कर सकते हैं. यह तेल दान छाया दान के रुप में भी दिया जा सकता है. एक कटोरी में थोड़ा सा तेल लेकर उसमें अपनी परछाई देखकर उसे दान कर दें, इसे छाया दान कहा गया है. साथ में एक सिक्का भी अवश्य दान करना चाहिए.

शनि देव के लिए मंत्र उपचार | Mantras for Saturn

यदि कुंडली में शनि ग्रह की महादशा चल रही हो तो व्यक्ति को शनि मंत्र जाप अवश्य करने चाहिए. चाहे शनि ग्रह उनकी कुंडली के लिए शुभ हो अथवा अशुभ हो. जब भी किसी ग्रह की महादशा आरंभ होती है तब फल उस महादशा को देने होते हैं और महादशा घर में आए मेहमान की भांति होती है. मेहमान का स्वागत ना किया जाए तो वह रुष्ट हो जाता है. इसी तरह यदि महादशानाथ का पूजन ना किया जाए तब शुभ फल मिलने में विलम्ब हो सकता है.

यदि अशुभ ग्रह की दशा है तब वह और अधिक अशुभ हो सकती है. इसलिए महादशानाथ के मंत्र जाप अवश्य करने चाहिए. शनि की महादशा के लिए शनि के मंत्रों का जाप करना चाहिए. शुक्ल पक्ष के शनिवार से संध्या समय में मंत्र जाप आरंभ करने चाहिए. स्वच्छ वस्त्र पहन कर शुद्ध आसन पर बैठना चाहिए. उत्तर अथवा पूर्व की ओर मुख करना चाहिए. उसके बाद शुद्ध मन से शनिदेव को याद करके मंत्र जाप शुरु करना चाहिए. मंत्र जाप की संख्या 108 होनी चाहिए.

यदि शनि की महादशा आरंभ होते ही 19,000 मंत्रों का जाप यदि कर लिया जाए तो अशुभ फलों में कमी आ सकती है. महादशा शुरु होने के बाद जब तक शनि की प्रत्यंतर दशा चलती है तब तक 19,000 हजार मंत्रों का जाप पूरा किया जा सकता है. उसके बाद हर शनिवार को एक माला की जा सकती है. मंत्र है :- “ॐ शं शनैश्चराय नम:”

शनि मंत्र के साथ शनि स्तोत्र का जाप भी किया जा सकता है शनि स्तोत्र में दशरथ कृत्त शनि स्त्रोत्त का जाप अत्यंत लाभकारी माना जाता है शास्त्रों के अनुसार इस स्त्रोत की रचना भगवान राम के पिता दशरथ जी ने शनि देव को प्रसन्न करने हेतु की थी जिससे प्रसन्न होकर शनिदेव ने उन्हें कष्ट से मुक्ति प्रदान की.

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बुध ग्रह के ये चमत्कारी मंत्र दिला सकते आपको सफलता

गोचर में जब ग्रह अनिष्ट फल दे रहा हो या फिर दशा में कष्ट देने कि स्थिति में हों ऎसे में ग्रह के उपाय करना हितकारी रहता है. जन्म कुण्डली में जब किसी ग्रह का सहयोग प्राप्त न होने की स्थिति में उस ग्रह से जुडे उपाय करने से ग्रह का शुभ सहयोग प्राप्त होता है. यह उपाय ग्रह से संबन्धित कार्यो में भी किये जा सकते है.

बुध की वस्तुओं का स्नान करने के लिये स्नान के पानी में साबुत चावल के दाने डालकर स्नान किया जाता है. तांबे के बर्तन में जल भरकर रात भर रखने के बाद इस जल को ग्रहण किया जाता है ऎसा करने पर तांबे के गुण जल के साथ व्यक्ति के शरीर में प्रवेश करते है. तथा बुध से जुडे रोगों होने पर यह उपाय करने पर लाभ प्राप्त होता है. इस उपाय को करते समय बुध के मंत्र का जाप करने पर उतम फल प्राप्त होते है

बुध के लिये किये जाने वाली वस्तुओं में हरी मूंग की दाल आती है. बुध की वस्तुओं में तांबे का दान भी किया जा सकता है. बुध की वस्तुएं दान करने पर बुद्धि व शिक्षा कार्यो में सफलता मिलती है. ये दान प्रत्येक बुधवार को किये जा सकते है. दान कि मात्रा अपने सामर्थ्य के अनुसार लेनी चाहिए.

बुध मंत्र में “ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नम:”  का जप करना चाहिए.  इस मंत्र का एक माला अर्थात 108 बार जाप करने से बुध ग्रह की शान्ति होती है. बुध ग्रह जब गोचर में व्यक्ति के अनुकुल फल नहीं दे रहा हों तो इस मंत्र का जाप प्रतिदिन करना चाहिए. बुध की महादशा के शुभ फल पाने के लिये बुध की महादशा अन्तर्दशा में नियमित रुप से इस मंत्र का जाप करना लाभकारी रहता है.

बुध ग्रह को ग्रहों में राजकुमार की उपाधि दी गई है लेकिन जन्म कुंडली में यदि बुध अशुभ ग्रहों के साथ है तो यह अशुभ होता है और यदि शुभ ग्रहों के प्रभाव में है तो यह शुभ फल प्रदान करता है. बुध भगवान पीला वस्त्र धारण किए सिर पर सोने का मुकुट तथा गले में सुन्दर पुष्प माला पहने हुए कांति युक्त दिखाई देते हैं. हाथों  में तलवार, ढाल, गदा और वरमुद्रा धारण किये हैं. बुध देव का वाहन सिंह है यह श्वेत रथ और प्रकाश से दीप्त हैं. नवग्रह में इनकी पूजा ईशानकोण में की जाती है इनका प्रतीक वाण है तथा रंग हरा है.

बुध के मंत्र जाप करने चाहिए. सुबह अथवा शाम किसी भी समय में बुध के मंत्र जाप किए जा सकते हैं. बुध के मंत्र कई प्रकार है.

बुध का वैदिक मंत्र | Vedic Mantra

ॐ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रतिजागृहि त्वमिष्टापूर्ते स सृजेथामयं च ।
अस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन्विश्वे देवा यजमानश्च सीदत ।।

बुध का पौराणिक मंत्र | Puranic Mantra

प्रियंगुकलिकाश्यामं रुपेणाप्रतिमं बुधम ।
सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम ।।

बुध गायत्री मंत्र | Mercury Gayatri Mantra

“ॐ चन्द्रपुत्राय विदमहे रोहिणी प्रियाय धीमहि तन्नोबुध: प्रचोदयात ।”

बुध के तांत्रोक्त मंत्र | Tantrokta Mantra

  • ॐ ऎं स्त्रीं श्रीं बुधाय नम:
  • ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:
  • ॐ स्त्रीं स्त्रीं बुधाय नम:

बुध का नाम मंत्र | Naam Mantra

“ॐ बुं बुधाय नम:”

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महामृत्युंजय यंत्र की स्थापना कर सकती है आपकी हर समस्या का समाधान

यंत्रों में शक्ति सदा विराजमान रहती है जिसके कारण यंत्र शीघ्र ही अपने प्रभावों को पूर्णतः स्पष्ट कर देते हैं. ऎसा की एक यंत्र महामृत्यंजय यंत्र है. महामृत्यंजय यंत्र अकाल मृत्यु के भय को दूर करता है तथा रोग को दूर करके व्यक्ति को दिर्घायु का वरदान देता है. इस यंत्र के माध्यम से भगवान शंकर की स्तुति की जाती है ,रोगों की निवृत्ति के लिये एवं दीर्घायु की कामना के लिये यह यंत्र उपयोग में लाया जाता है.

शास्त्रों में महामृत्युंजय यंत्र को उच्च स्थान प्राप्त है. यह यंत्र अभेद्य कवच के समान कार्य करता है. अकालमृत्यु से मुक्ति दिलाता यह यंत्र बीमारी में अथवा दुर्घटना इत्यादि से बचाव करता है. महामृत्यंजय यंत्र समस्त प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक कष्टों का नाश करता है. इस यंत्र की पूजा करने के विशेष फल मिलते हैं तथा कष्टों से मुक्ति प्राप्त होती है.

महामृत्युंजय यंत्र निर्माण और उपयोग | Formation and Uses of Maha Mrityunjaya Yantra

महामृत्युंजय यंत्र का निर्माण करना एक तांत्रिक प्रणाली है इसे बनाने के लिए रेखा गणित के प्रमेय, निर्मेय, त्रिकोण, चतुर्भुज आदि जैसी आकृति बनाकर उनमें प्रत्येक स्थान पर बीज मंत्र या शक्ति संख्या लिखी जाती है. मान्यता है. यंत्र देवता का निवास स्थल होते हैं अतः प्रत्येक देवता और उसकी शक्ति के अनुसार यंत्रों का लेखन किया जाता है. महामृत्यंजय यंत्र का निर्माण शुभ समय पर तथा शुद्ध चित किया जाना चाहिए. इसका निर्माण भोजपत्र पर, कागज पर या किसी धातु की वस्तु पर किया जा सकता है.

इसको लिखने के लिए रक्त चंदन की स्याही तथा बेल या अनार की कलम का उपयोग किया जाना चाहिए. भोजपत्र के ऊपर रक्त चंदन की स्याही तथा बेल या अनार की कलम से मंत्र लिखकर इसे धूप-दीप से पूजन करना चाहिए. अब इसे किसी ताबीज में डालकर धारण किया जा सकता है. इसे धारण करने से समस्त रोग शांत होते हैं तथा स्वास्थ्य लाभ की प्राप्ति होती है. इस यंत्र को धारण करने से नकारात्मक उर्जा नष्ट होती है.

शुद्ध चित से किया गया महामृत्युंजय यंत्र एवं मंत्र प्रयोग व्यक्ति को दुर्घटना, अकालमृत्यु एवं प्राणघातक रोगों से बच सकता है.

महामृत्युंजय यंत्र पौराणिक कथा | Maha Mrityunjaya Yantra Story

महामृत्युंजय यंत्र के विषय में धार्मिक ग्रंथों में एक कथा का वर्णन है, जो इस प्रकार है:- ऋषि मुकुंद संतानहीन थे इस कारण वह सदैव चिंतातुर रहते थे तब मुकुंद मुनि और उनकी पत्नी ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की उनकी तपस्या से प्रसन्न हो कर भगवान शिव ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान प्रदान किया किंतु बालक को अल्पआयु प्राप्त थी. मुकुंद मुनि पुत्र प्राप्ति से बहुत प्रसन्न थे उन्होंने पुत्र का नाम मार्कण्डेय रखा. लेकिन बालक की अल्पआयु होने का उन्हें बहुत दुख था पिता को चिंतित देख पुत्र ने उनसे चिंता का कारण पूछा तो बालक को अपनी स्थिति का बोध हुआ. तब बालक पिता मुकुंद से कता है कि भगवान शिव को अपनी भक्ति से प्रसन्न करके उनसे पूर्णायु का वरदान प्राप्त करुंगा

तत्पश्चात बालक भक्ति भाव के साथ शिवलिंग की पूजा तथा मृत्युंजय स्तोत्र का पाठ करता है. जब बालक की आयु पुर्ण होने का समय आता है तो यमराज उसे लेने के लिए आते हैं किंतु बालक उनके साथ जाने से मना कर देता है और शिवलिंग से लिपट जाता है यम उसके प्राणों का हरण करने के लिए उद्यत होते हैं तब बालक की रक्षा करने के लिए भगवान शिव स्वयं काल पर प्रहार करते हैं, अत: यमराज हार मानकर वहां से चले जाते हैं. भगवान शिव, बालक मार्कण्डेय को अमर होने का वरदान देते हैं और उनके द्वारा जपे महामृत्यंजय मंत्र को यंत्र एवं मंत्र रुप में प्राणियों लिए उपयोगी बनाते हैं.

मृत्यंजय यंत्र लाभ और महत्व | Benefits and Importance of Maha Mrityunjaya Yantra

महामृत्युंजय यंत्र भगवान मृत्युंजय यानी शिव से सम्बन्धित है. शिव अनेक रूप धारण करने वाले हैं वे आरोग्य के देवता भी हैं. अपने भक्तों को आरोग्य तथा दीर्घायु प्रदान करने वाले हैं. महामृत्युंजय यंत्र को धारण अथवा यंत्र पूजन तथा स्थापना करने के रुप में उपयोग किया जा सकता है. महामृत्युंजय यंत्र को सम्मुख रखकर रूद्र सूक्त का पाठ एवं महामृत्युंजय मंत्र का जप करने से लाभ होता है. महामृत्युंजय यंत्र को प्राण-प्रतिष्ठित करके उपयोग में लाया जाता है. महामृत्युंजय यंत्र स्वास्थ्य लाभ के साथ साथ धन, यश, बुद्धि, विद्या को प्रदान करने वाला होता है.

इस यंत्र साधना से साधक को रोग से मुक्ति मिलती है तथा स्वास्थ्य उत्तम रहता है. महामृत्युंजय यंत्र का प्रयोग उपासना और मंत्र-जप के अतिरिक्त इसे कवच के रूप में भी धारण किया जा सकता है. महामृत्युंजय मंत्र एवं यंत्र, मंत्रों एवं यंत्रों में श्रेष्ठ है, अत्यंत फलदायी है, महामृत्युंजय यंत्र अभेद्य कवच है, बीमारी की अवस्था में एवं दुर्घटना इत्यादि से मृत्यु के भय को नष्ट करता है यह  शारीरिक पीड़ा को ही नहीं बल्कि मानसिक पीड़ा को भी नष्ट करता है.

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ये आसान से मंगल मंत्र दिला सकते हैं हर प्रकार के मंगल दोष से मुक्ति

ज्योतिष में सभी नौ ग्रह का अपना विशिष्ट महत्व होता है. सभी ग्रह अपनी दशा/अन्तर्दशा में अपने फल प्रदान करने की क्षमता रखते हैं. इसी के अन्तर्गत मंगल ग्रह उग्र स्वभाव वाला ग्रह माना गया है. यह मेष तथा वृश्चिक राशि राशि का स्वामी होता है. मकर में यह उच्च होता है एवं कर्क में नीच.यह सूर्य, चन्द्र और गुरू के साथ मित्रता और शुक्र, शनि एवं राहु के साथ समभाव रखता है. मंगल बुध और केतु से वैर भाव रखता है. सूर्य बुध की युति होने पर मंगल शुभ फल देता है. शनि के साथ मंगल समभाव होता है परंतु सूर्य और शनि की युति होने पर मंगल अशुभ फल देता है.टेवे में राहु जब मंगल पर दृष्टि डालता है तब मंगल नेष्ट हो जाता है.

यदि ग्रह शुभ होकर पीड़ित है तब उन्हें कई प्रकार से बली बनाया जा सकता है और यदि ग्रह कुंडली में अशुभ भाव का स्वामी है तब भी उसका उपचार किया जा सकता है. मंगल का तरूणावस्था पर विशेष रूप से प्रभाव रखता है.शरीर में मज्जा, रक्त, यकृत, होंठ, पेट, छाती एवं बाजू पर मंगल का प्रभाव होता है.बल, पराक्रम, अहंकार, क्रोध, झूठ, द्वेष, गर्व एवं साहस मंगल के अधिकार क्षेत्र में हैं.यह तमोगुण वाला ग्रह है अत: इससे प्रभावित व्यक्ति में तमोगुण पाया जाता है.

मंगल का रिश्तेदार भाई होता है अत: शुभ मंगल होने पर भाईयों को इसका लाभ मिलता है जबकि मंदा होने से भाई को कष्ट एवं परेशानी का सामना करना होता है. ग्रह को शुभ अथवा बली बनाने के लिए कई प्रकार के उपाय किए जाते है. सबसे आसान एवं सरल आने वाला उपाय होता है मंत्र जाप. इसमें आपका थोड़ा सा समय लगता है और फल बहुत अच्छे और शुभ प्राप्त होते हैं.

मंगल की दशा में नीचे लिखे मंत्रों में से किसी एक मंत्र का जाप किया जा सकता है. आप किसी भी एक मंत्र का  चुनाव अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं. रात्रि समय में ही मंगल के मंत्र का जाप करें तो बेहतर होता है.  किसी भी मंत्र की एक माला का जाप करें. एक माला अर्थात 108 बार मंत्र जाप करना.

मंगल के लिए वैदिक मंत्र | Vedic Mantra

“ॐ अग्निमूर्धादिव: ककुत्पति: पृथिव्यअयम। अपा रेता सिजिन्नवति ।”

मंगल के लिए तांत्रोक्त मंत्र | Tantrokta Mantra

  • “ॐ हां हंस: खं ख:”
  • “ॐ  हूं श्रीं मंगलाय नम:”
  • “ॐ  क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नम:”

मंगल का नाम मंत्र | Naam Mantra

  • “ॐ अं अंगारकाय नम:”
  • “ॐ  भौं भौमाय नम:”

मंगल का पौराणिक मंत्र | Puranic Mantra

“ॐ धरणीगर्भसंभूतं विद्युतकान्तिसमप्रभम । कुमारं शक्तिहस्तं तं मंगलं प्रणमाम्यहम ।।”

मंगल गायत्री मंत्र | Mars’s Gayatri Mantra

“ॐ क्षिति पुत्राय विदमहे लोहितांगाय धीमहि-तन्नो भौम: प्रचोदयात”

मंगल शक्तिशाली स्वभाव का ग्रह है. यह व्यक्ति की नाभी पर निवास करता है जिस व्यक्ति कि कुण्डली में मंगल शुभ होता है वह अपने पराक्रम का प्रयोग शुभ कर्यों में करता है जबकि मंगल अशुभ होने पर व्यक्ति अपनी शक्ति एवं पराक्रम का इस्तेमाल असामाजिक कार्यों में करता है.कमज़ोर मंगल वाले व्यक्ति में साहस एवं पराक्रम का अभाव होता है. इसलिए मंगल की शुभता हेतु यदि इन मंत्रों का जाप किया जाए तो अवश्य लाभ प्राप्त होता है.

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इन आसान तरीकों से कर सकते हैं, कुण्डली के कमजोर सूर्य को बलवान

कुण्डली में ग्रह पीडा होने पर गोचर का जो ग्रह व्यक्ति को पीडा दे रहा हो तो उक्त ग्रह से संबंधित उपाय करने पर कुछ शुभ पभावों को प्राप्त किया जा सकता है. सूर्य कुण्डली में आरोग्य शक्ति व पिता के कारक ग्रह होते है अत: जब जन्म कुण्डली में सूर्य के दुष्प्रभाव प्राप्त हो रहे हों या फिर सूर्य पीडित हो तो सूर्य उपाय करना लाभकारी रहता है. विशेष कर यह उपाय सूर्य गोचर में जब शुभ फल न दे रहे हों तो भी उपाय किया जा सकता है. इसके अलावा जब सूर्य गोचर में छठे घर के स्वामी या सांतवें घर के स्वामी पर अपनी दृ्ष्टी डाल उसे पीडित कर रहा हो तब भी इनके उपाय करने से व्यक्ति के कष्टों में कमी होती है.

कुण्डली में सूर्य अगर नीच का है अथवा पीड़ित अवस्था में है तो सूर्य की शांति के लिए आप दान कर सकते हैं. शास्त्रों के अनुसार दान का फल उत्तम तभी होता है जब यह शुभ समय में सुपात्र को दिया जाए. सूर्य से सम्बन्धित वस्तुओं का दान रविवार के दिन दोपहर के समय करना चाहिए. सूर्य ग्रह की शांति के लिए रविवार के दिन व्रत करना चाहिए. गाय को गेहुं और गुड़ मिलाकर खिलाना चाहिए. किसी ब्राह्मण अथवा गरीब व्यक्ति को गुड़ का खीर खिलाने से भी सूर्य ग्रह के विपरीत प्रभाव में कमी आती है.

गुड़, सोना, तांबा और गेहूं का दान भी सूर्य ग्रह की शांति के लिए उत्तम माना गया है. सूर्य से सम्बन्धित रत्न का दान भी उत्तम होता है. कुण्डली में सूर्य कमज़ोर है तो पिता एवं अन्य बुजुर्गों की सेवा करनी चाहिए इससे सूर्य देव प्रसन्न होते हैं. प्रात: उठकर सूर्य नमस्कार करने से भी सूर्य की विपरीत दशा से आपको राहत मिल सकती है.

सूर्य से संबन्धित वस्तुओं का दान, जप, होम मन्त्र धारण व सूर्य की वस्तुओं से जल स्नान करना भी सूर्य के उपायों में आता है. सूर्य की शान्ति करने के लिये इन पांच विधियों में से किसी भी एक विधि का प्रयोग किया जा सकता है. गोचर में सूर्य के अनिष्ट प्रभाव को दूर करने में ये उपाय विशेष रुप से उपयोगी हो सकते है.

सूर्य वस्तुओं का दान एवं स्नान द्वारा उपाय | Remedies related to baths and donations

गोचर में यदि सूर्य अनिष्ट कारक हो तो व्यक्ति को स्नान करते समय जल में खसखस या लाल फूल या केसर डाल कर स्नान करना शुभ रहता है. खसखस, लाल फूल या केसर ये सभी वस्तुएं सूर्य की कारक वस्तुएं है तथा सूर्य के उपाय करने पर अन्य अनिष्टों से बचाव करने के साथ-साथ व्यक्ति में रोगों से लडने की शक्ति का विकास होता है. सूर्य की वस्तुओं से स्नान करने पर सूर्य की वस्तुओं के गुण व्यक्ति के शरीर में प्रवेश करते हैं तथा उसके शरीर में सूर्य के गुणों में वृ्द्धि करते है.

सूर्य की वस्तुओं से स्नान करने के अतिरिक्त सूर्य की वस्तुओं का दान करने से भी सूर्य के अनिष्ट से बचा जा सकता है. सूर्य की दान देने वाली वस्तुओं में तांबा, गुड, गेहूं, मसूर दाल दान की जा सकती है. यह दान प्रत्येक रविवार या सूर्य संक्रान्ति के दिन किया जा सकता है.  सूर्य ग्रहण के दिन भी सूर्य की वस्तुओं का दान करना लाभकारी रहता है.

इस उपाय के अन्तर्गत सभी वस्तुओं का एक साथ भी दान किया जा सकता है. दान करते समय वस्तुओं का वजन अपने सामर्थय के अनुसार लिया जा सकता है. दान की जाने वाली वस्तुओं को व्यक्ति अपने संचित धन से दान करें तो अच्छा रहता है.

सूर्य मन्त्र जाप | Sun’s Mantra

सूर्य के उपायों में मन्त्र जाप भी किया जा सकता है. सूर्य के मन्त्रों में “ॐ घृणि: सूर्य आदित्य: ” मन्त्र का जाप किया जा सकता है.  इस मन्त्र का जाप प्रतिदिन भी किया जा सकता है तथा प्रत्येक रविवार के दिन यह जाप करना विशेष रुप से शुभ फल देता है. सूर्य से संबन्धित अन्य कार्य जैसे हवन इत्यादि में भी इसी मंत्र का जाप करना अनुकुल रहता है.

सूर्य यन्त्र स्थापना | Sun’s Yantra

सूर्य यन्त्र की स्थापना करने के लिये सबसे पहले तांबे के पत्र पर या भोजपत्र पर विशेष परिस्थितियों में कागज पर ही सूर्य यन्त्र का निर्माण कराया जाता है. सूर्य यन्त्र में समान आकार के नौ खाने बनाये जाते हैं इनमें निर्धारित संख्याएं लिखी जाती हैं. ऊपर की तीन खानों में 6,1,8  क्रमशा अलग- अलग खानों में होना चाहिए. मध्य के खानों में 7,5,3 संख्याएं लिखी जाती है. तथा अन्तिम लाईन के खानों में 2,9,4 लिखा जाता है. यन्त्र की संख्याओं की यह विशेषता है कि इनका सम किसी ओर से भी किया जाए उसका योगफल 15 ही आता है. यह एक उपयोगी यंत्र होता है जिसके पूजन द्वारा सूर्य शांति प्राप्त होती है.

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जीव और ईश्वर का संबंध | Relationship between Humans and God

भारतीय वेद शास्त्रों में जीव और ईश्वर के संबंध को एक गहन रुप से परिभाषित किया गया है. धर्म ग्रंथों में आत्मा के ब्रह्म से मिलने और उसी में समा जाने के तथ्य को व्यक्त करते हुए कहा गया है कि स्वयं को परब्रह्म का अंश अनुभव करने पर भी आत्मा उसे सहज रूप से देख नहीं पाती है, अभी भी उस पर आवरण तो व्याप्त ही होता है परंतु मोह का पूर्ण त्याग हो जाने पर ही आत्मा परमात्मा को प्राप्त कर पाती है और यही जीव का सार तत्व है.

ब्रह्म ज्ञान बोध | Lord Brahma’s knowledge

ब्रह्म ज्ञान बोध के लिए मोह का त्याग अतिआवश्यक है, प्रभु द्वारा ही माया का प्रादुर्भाव हुआ है और उन्हीं की साधना ध्यान द्वारा इस मोह को त्यागा जा सकता है, साधक अपने योगक्षेम द्वारा आत्मा को जान पाता है उसे इस ज्ञान मार्ग से ब्रह्म की प्राप्ति होती है परंतु अब भी कुछ बाकी रह जाता है इस शरीर का मोह एवं अहंकार दूर होने पर ही उसे ब्रह्म का सच्चा अनुभव होता है.

सामान्यत: जीव, साधक – अविनाशी एवं अविचल माया का ही ध्यान करते हैं जिसे प्रभु ने ही उत्पन किया है वही परमात्मा का अंश है परंतु साधक उस माया में सम्मिलित, व्याप्त परमात्मा का अनुभव नहीं कर पाता और न ही उस पर अपना ध्यान केन्द्रित करता है जो उसके लिए आवश्यक है. वह उसे गौण पाता है जिस कारण उसे ब्रह्म के पूर्ण दर्शन नहीं हो पाते और उस साधक पर एक महीन आवरण छाया ही रहता है.

शुरूआत में चारों ओर शून्य अंधकार व्याप्त था परंतु सूर्य के प्रकाश रूप में वस्तुएं स्पष्ट हुई और चारों ओर ज्ञान उत्पन्न हुआ ब्रह्म जीव का विकास हुआ, सृष्टि की रचना की तब उसी के साथ माया का भी आगमन हुआ और इस माया ने सभी को अपनी ओर आकर्षित किया साधु, संन्यासियों द्वारा इसी के महत्व का उल्लेख किया गया और वेदों, उपनिषदों में इसी के बारे में कहा गया है.भृगु और भार्गव जैसे ऋषियों ने इस माया को जाना और ब्रह्म से साक्षात्कार किया.

वैदिक चिंतन | Vedas

सभी धर्म ग्रंथों में परमात्मा के स्वरूप को अनेक रूपों में प्रकट किया उसी के व्यक्त-अव्यक्त, सूक्ष्म-विराट द्वैत एवं अद्वैत जैसे रूपों का बखान किया. सभी के ज्ञान मन्त्रों का मर्म ब्रह्म ही रहा है. परमात्मा को सृष्टि का कर्ता, ब्रह्मचारी, अडिग, संसार में समस्त श्रीवृद्धि को प्रदान करने वाला इस संसार को चलाने वाला तथा सृष्टि रूपी छकड़े को खींचने वाला कहा है जहां ब्रह्म ही सभी का निर्माता है.

सम्पूर्ण जड़ एवं चेतन तत्व ब्रह्म में ही समाए हुए हैं जैसे चारों ओर बहती हुई छोटी-छोटी नदियां मिलकर समुद्र में विलीन हो जाती हैं उनका अस्तित्व समुद्र होता है वैसे ही सम्पूर्ण सृष्टि उसी से निर्मित एवं ब्रह्म में ही विलीन होती है, जैसे पानी का बुलबुला पानी से उत्पन्न हो जल में ही समा जाता है उसी तरह से संपूर्ण जीव, पदार्थ ब्रह्म से ही जन्म लेते हैं तथा अंत में उसी में लय हो जाते हैं और साधक एवं ज्ञानीजन उसी ब्रह्म को जानते हैं जो भी ब्रह्मवेत्ता उस ब्रह्म को जानते हैं, वह उसी में लीन हो जाते हैं, उसमें लीन होकर वे अव्यक्त रूप से सुशोभित होते हैं.

माया के महत्व एवं उसके बारे में वेदों, उपनिषदों में भी बताया गया है उसी माया मोह को त्याग कर जीव, ब्रह्म का साक्षात्कार प्राप्त करता है, भौतिक सुख जो माया का रूप है उसे त्याग के ही विषय वासनाओं से मुक्त होकर ही परमात्मा को पाया जा सकता है शुद्ध आत्मिक चिंतन ही इस तथ्य से अवगत करा पाता है जिससे मोक्ष का मार्ग सरल हो जाता है जीवन के आवागन से मुक्ति प्राप्त होती है और प्रभु का आश्रय प्राप्त होता है.

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श्री महालक्ष्मी यंत्र का महात्म्य और स्थापित करने कि सही विधि

श्री महालक्षमी यंत्र, की अधिष्ठात्री देवी कमला हैं,  इस यंत्र के पूजन एवं स्मरण मात्र से वैभव एवं सुख की प्राप्ति होती है. महालक्ष्मी यन्त्र की पूजा एवं स्थापना द्वारा व्यक्ति को अपने निवास स्थान में लक्ष्मी का स्थाई निवास प्राप्त होता है. श्री महालक्षमी यंत्र का पूजन से समस्त सुखों एवं धन की प्राप्ति संभव हो पाती है. श्वेत हाथियों के द्वारा स्वर्ण कलश से स्नान करती हुयी कमलासन पर विराजमान देवी लक्ष्मी इस यंत्र रुप में निवास करती हैं. इस यंत्र के विषय में पुराणों में वर्णित है कि इसकी स्थापना से देवी कमला की प्राप्ति होती है और भक्त क अजीवन सभी कष्टों से मुक्त हो जाता है.

इस यंत्र में लक्ष्मी जी वास माना गया है. सभी यंत्रों में श्रेष्ठ स्थान पाने के कारण इसे यंत्रराज भी कहते हैं. पौराणिक कथा के अनुसार एक बार लक्ष्मी जी पृथ्वी से बैकुंठ धाम चली जाती हैं, इससे पृथ्वी पर संकट आ जाता है तब प्राणियों के कल्याण हेतु वशिष्ठ जी लक्ष्मी को वापस लाने का प्रयास करते हैं. पृथ्वी पर ‘‘श्री महालक्ष्मी यंत्र’’ की साधना करते हैं और इसे स्थापित कर, प्राण-प्रतिष्ठा एवं पूजा करते हैं उनकी इस पूजा एवं स्थापना द्वारा लक्ष्मी जी वहां उपस्थित हो जाती हैं.

इस यंत्र की संरचना विचित्र है, यंत्रों में जो भी अंक लिखे होते हैं या जो भी आकृतियां निर्मित होती हैं वह देवी देवताओं की प्रतीक होती हैं. यंत्र-शक्ति द्वारा वातावरण में सकारात्मक उर्जा का प्रवाह होत है. श्री यंत्र को पास रखने से शुभ कार्य सम्पन्न होते रहते हैं. इस यंत्र को सर्व सिद्धिदाता, धनदाता या श्रीदाता कहा गया है. इसे सिद्ध या अभिमंत्रित करने के लिए लक्ष्मी जी का मंत्र अति प्रभावशाली माना जाता है.

महालक्ष्मी यंत्र निर्माण | Establishment Mahalakshmi Yantra

यंत्र विविध प्रकार में उपलब्ध होते हैं जैसे कूर्मपृष्ठीय यंत्र, धरापृष्ठीय यंत्र, मेरुपृष्ठीय यंत्र, मत्स्यपृष्ठीय यंत्र, इत्यादि यह यंत्र स्वर्ण, चांदी तथा तांबे के अतिरिक्त स्फटिक एवं पारे के भी होते हैं. सबसे अच्छा यंत्र स्फटिक का कहा जाता है यह मणि के समान होता है. यंत्रों में मंत्रों के साथ दिव्य अलौकिक शक्तियां समाहित होती हैं. इन यंत्रों को उनके स्थान अनुरूप पूजा स्थान, कार्यालय, दुकान, शिक्षास्थल इत्यादि में रखा जा सकता है. यंत्र को रखने एवं उसकी पूजा करने से धन-धान्य में वृद्धि होती है और सफलता प्राप्त होती है. श्रीयंत्र विभिन्न आकार के बनाए जाते हैं जैसे अंगूठी, सिक्के, लॉकेट या ताबीज रुप इत्यादि में देखे जा सकते हैं.

महालक्ष्मी यंत्र में षटकोण वृत अष्टदल एवं भूपुर की संरचना की होती है, किसी शुभ मुहूर्त्त जैसे दिपावली, धनतेरस, रविपुष्य, अभिजीत मुहूर्त्त एवं इसी प्रकार के शुभ योगों में इसकी स्थापना की जानी चाहिए.  इस यन्त्र की स्थापना से लक्ष्मी का आशिर्वाद एवं स्थाई निवास प्राप्त होता है. धन वृद्धिकारक श्री महालक्ष्मी यंत्र को घर, कार्य स्थल या अपने पास रखने से आर्थिक संकट दूर होते हैं तथा मान सम्मान में वृद्धि होती है.

महालक्ष्मी यंत्र पूजा | Mahalakshmi Yantra Puja

महालक्ष्मी शक्ति स्वरूपा हैं. देवी भागवत, श्रीमद् भागवत, मार्कण्डेय पुराण इत्यादि में महालक्ष्मी जी की महिमाओं क अवर्णन किया गया है. महालक्ष्मी यंत्र की पूजा के लिए इसे स्वयं भी बनाया जा सकता है. इस यंत्र को सोने, चांदी या स्फटीक पर बनवा जा सकता है. लक्ष्मी जी के बीज मंत्र से विनियोग, न्यास, ध्यान आदि द्वारा इसकी प्राण-प्रतिष्ठा करनी चाहिए. इस यंत्र को पूजा स्थल पर स्थापित करने के पश्चात नित्य रुप से मंत्र जाप करना चाहिए. यंत्र को स्थायी रूप से अपने घर, कार्य स्थल अथवा पूजा स्थल में स्थापित करें  और नियमित पूजा अवश्य करें इस प्रकार, इस सिद्ध मंत्र के प्रभाव में आपका वर्ष आनंद से बीतेगा और मां लक्ष्मी की कृपा मिलेग

महालक्ष्मी यंत्र मंत्र | Mahalakshmi Yantra Mantra

श्री महालक्ष्मी यंत्र के जाप एवं पूजन के साथ साथ इस यंत्र के मंत्र का जाप भी करना चाहिए मंत्र की प्रतिदिन एक माला करने से धन की प्रप्ति होती है.यह यंत्र एक अद्भुत एवं शक्तिशाली यंत्र है जिससे जीवन में धन और सफलता की प्राप्ति होती है. इस यंत्र को स्थापित करके देवी के नामों का नियमित जप करना चाहिए. महालक्ष्मी यंत्र की पूजा में लक्ष्मी जी का मंत्र अवश्य पढ़ना चाहिए. महालक्ष्मी मंत्र जाप के लिए कमलगट्टे की माला या मूंगे की माला का उपयोग करना उत्तम होता है. महालक्ष्मी जहां स्थापित होता है वहां महालक्ष्मी का स्थायी वास होता है.  महालक्ष्मी यंत्र मंत्र – “ॐ ह्रीं ह्रीं श्रीं श्रीं, ह्रीं ह्रीं फट्”

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