जैमिनी ज्योतिष में राशियों पर ग्रहों की दृष्टि का परिणाम

जैमिनी ज्योतिष में राशियों पर ग्रहों की दृष्टि को काफी महत्वपूर्ण माना गया है. इस ज्योतिष विधि में कहा गया है कि किसी व्यक्ति के भविष्य कथन में ग्रहों की दृष्टि को महत्वपूर्ण कारक के रूप में देखना चाहिए. जैमिनी ज्योतिष में राशियों को तीन भागों में बांटा गया है जिन्हें चर, स्थिर और द्विस्वभाव राशि के रूप में नामित किया गया है. राशियों की दृष्टि के विषय में यह कहा जाता है कि चर राशि स्थिर राशि पर दृष्टि डालती है लेकिन, अपने दोनों तरफ की राशियों को नहीं देखती है. इसी तरह स्थिर राशि की दृष्टि चर राशि पर होती है लेकिन वह अपने दोनों तरफ की राशियों को नहीं देखती हैं.

राशियों की दृष्टियां | Aspect of Signs

जैमिनी ज्योतिष में कहा गया है कि मेष की दृष्टि कुम्भ, सिंह एवं वृश्चिक राशि पर होती है. वृष की कर्क, तुला और मकर पर दृष्टि होती है. मिथुन की दृष्टि धनु, मीन और कन्या पर होती है. कर्क राशि वृश्चिक, कुम्भ एवं वृष राशि को देखती है. सिंह राशि की दृष्टि तुला, मकर एवं मेष राशि पर होती है. कन्या राशि अपनी दृष्टि से धनु, मीन एवं मिथुन राशि को देखती है. तुला राशि कुम्भ, वृष एवं सिंह पर अपनी दृष्टि रखती है. वृश्चिक राशि की दृष्टि मकर, मेष व कर्क पर होती है. मीन राशि, मिथुन एवं कन्या राशि पर धनु की दृष्टि होती है. वृष, सिंह एवं वृश्चिक राशि को मकर देखता है. कुम्भ की दृष्टि मेष, कर्क और तुला पर होती है. मीन राशि की दृष्टि मिथुन, कन्या और धनु पर रहती है.

राशियों की दृष्टि के प्रकार | Types of Aspects of Signs

चर राशि अपने स्थान से पंचम, अष्टम एवं एकादश भाव को देखते हैं. स्थिर राशि की दृष्टि तृतीय, षष्टम एवं नवम भाव पर होती है. जबकि द्विस्वभाव राशियों की दृष्टि अपने स्थान से चतुर्थ, सप्तम एवं दसम घर पर होती है. राशियों की दृष्टि को डिग्री के आधार पर देखें तो ज्ञात होता है कि-

  • चर राशि अपने स्थान से 120 डिग्री, 210 डिग्री और 300 डिग्री देखती है.
  • स्थिर राशि अपने स्थान से 60 डिग्री, 150 डिग्री और 240 डिग्री देखती है.
  • द्विस्वभाव राशि अपने स्थान से 90 डिग्री, 180 डिग्री और 270 डिग्री देखती है.

राशियों की दृष्टि प्रभाव | Effects of Aspects of Signs

जैमिनी ज्योतिष में चर राशियाँ, स्थिर राशियों पर दृष्टि डालती है और स्थिर राशियाँ, चर राशियों पर दृष्टि डालती हैं. दोनो राशियाँ अपनी समीपवर्ती राशि पर दृष्टि नहीं डालती. जैसे मेष राशि की दृष्टि अपनी निकटतम राशि वृष पर नहीं मानी जाती. वह केवल 4,7,10 पर दृष्टिपात करती है. इस प्रकार कर्क राशि की दृष्टि सिंह राशि पर नहीं मानी जाती है और सिंह की दृष्टि कर्क पर नहीं मानी जाती है. बाकी राशियों की दृष्टि की गणना भी इसी प्रकार की जाती है.

जैमिनी में अनेकों राजयोगों का निर्माण राशियों एवं ग्रहों की दृष्टियों द्वारा संपन्न होता है. जैसे यदि कुण्डली में आत्मकारक तथा अमात्यकारक एक साथ किसी भाव में स्थित हों या दोनों की आपस में परस्पर दृष्टि हो तो यह जैमिनी का राजयोग होता है.  इसके अतिरिक्त कुण्डली में जब चन्द्रमा तथा शुक्र एक साथ स्थित हों अथवा परस्पर एक-दूसरे को देख रहें हैं तब यह उत्तम राजयोग माना जाता है.

Posted in Basic Astrology, Jaimini Astrology, Planets, Rashi, Signs, Transit | Tagged , , , , | Leave a comment

वक्री शनि होने पर यूं प्रभावित होगा आपका जीवन और व्यवसाय

वक्री ग्रहों को वैदिक ज्योतिष में शक्त अवस्था में माना गया है अर्थात वक्री ग्रह सबसे अधिक शक्तिशाली होते हैं. वक्री ग्रह बार-बार प्रयास कराते हैं. एक ही कार्य को करने के लिए व्यक्ति को कई बार प्रयास करने पर सफलता मिलती है. शनि ग्रह जब वक्री होते हैं तब व्यक्ति को मानसिक, आर्थिक तथा शारीरिक परेशानियाँ दे सकते हैं. शनि नौ ग्रहों में से सबसे धीमी गति से चलने वाले ग्रह हैं.

शनि के वक्री होने पर किसी भी प्रकार का कोई भी नया कार्य आरम्भ नहीं करना चाहिए अन्यथा उस कार्य की सफलता के लिए जातक को अनेकों बार प्रयास करने पड़ सकते हैं. शनि ग्रह किसी घटना का होना या बताना निश्चित करते हैं.

वक्री शनि में कोई भी नया कार्य शुरु नहीं करना चाहिए, अन्यथा आपको उसी एक काम को करने के लिए बार-बार प्रयास करने पडे़गें. कार्य चलने में व्यवधानों का सामना करना पड़ सकता है.  यदि कोई व्यक्ति व्यवसाय करता है तो व्यवसाय संबंधी निर्णय सावधानीपूर्वक लें. लेन-देन में सावधानी बरतें.

वक्री शनि के प्रभाव | Effects of Retrograde Saturn

भिन्न-भिन्न लग्न के लिए वक्री शनि का भिन्न-भिन्न फल होता है. यह आवश्यक नहीं कि सभी व्यक्तियों के लिए शनि वक्री होने पर अशुभ फल प्रदान करें. शनि ग्रह जब वक्री होते हैं तब यह आवश्यक नहीं कि वह बुरे फल देगें. व्यक्ति के लिए वक्री शनि का फल तब ही खराब होता है जब दशा में शनि का प्रभाव खराब हो और व्यक्ति विशेष की कुण्डली में भी शनि बुरे भावों का स्वामी होकर स्थित हो, अन्यथा शनि के वक्री होने का कोई बुरा प्रभाव नहीं होता है.

मेष लग्न से शनि दशम तथा एकादश भाव का स्वामी है. इसलिए शनि मेष राशि के जातकों के लिए कार्यक्षेत्र तथा लाभ भाव का स्वामी हो जाता है शनि के वक्री होने से आपको अपने कार्य क्षेत्र में पहले से अधिक प्रयास करने पड़ सकते हैं. लाभ प्राप्ति के लिए एक से अधिक बार परिश्रम करना पड़ सकता है.

वृष लग्न से शनि नवम तथा दशम भाव का स्वामी हो जाता है. नवम स्थान से पिता व गुरुजनों तथा दशम भाव से कार्यक्षेत्र का विचार किया जाता है. शनि के वक्री होने से शिक्षा तथा कार्यक्षेत्र में अधिक परिश्रम करना पड़ सकता है. भाग्य साथ देने में थोडा़ अधिक समय लग सकता है. .

मिथुन लग्न से शनि अष्टम तथा नवम भाव का स्वामी होता है. शनि के वक्री होने से भाग्य साथ देने में कंजूसी कर सकता है. अष्टमेश होने से अचानक होने वाली घटनाएं हो सकती है. सुख को बनाए रखने के लिए आपको अधिक प्रयास करने पड़ सकते हैं.

कर्क लग्न से शनि सप्तम तथा आठवें भाव का स्वामी हो जाता है. शनि के वक्री होने से आपके प्रयास दोगुने हो सकते हैं. काम की सफलता के लिए बार-बार छोटी यात्राएं करनी पड़ सकती है अथवा कोई भी कार्य पहली बार में सफलता नहीं दिलाएगा. .

सिंह लग्न से शनि छठे भाव तथा सप्तम भाव का स्वामी होता है. स्थान परिवर्तन के योग बनते हैं. जीवनसाथी से विचारों में भिन्नता की संभावना बनती है. धन का खर्च अधिक हो सकता है. आपको किसी कार्य को करने के लिए ऋण लेना पड़ सकता है.

कन्या लग्न के लिए शनि पंचम भाव तथा छठे भाव का स्वामी होता है. बनते-बनते कार्यों में बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है. आपको अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए. छाती अथवा पेट संबंधी विकार हो सकते हैं.

तुला राशि से शनि चतुर्थ तथा पंचम भाव का स्वामी ग्रह होते हैं  शनि के वक्री होने से आपको घर के सुख को बनाए रखने के लिए घर के वातावरण को संतुलित बनाकर रखना पड सकता है. माता के स्वास्थ्य में कमी आ सकती है. शिक्षा के क्षेत्र में प्रयास अधिक करने पड़ सकते हैं.

वृश्चिक लग्न के लिए शनि तृतीय तथा चतुर्थ भाव के स्वामी बनते हैं. मित्रों तथा सहयोगियों के सुख में कमी हो सकती है. आपको गले तथा छाती से संबंधित समस्या हो सकती है.

धनु लग्न के लिए शनि द्वितीय और तृतीय भावों के स्वामी होते हैं. व्यर्थ की यात्राएं करनी पड़ सकती हैं. विचारों में भिन्नता होने से मतभेद होने की संभावना बनती है.

मकर लग्न के लिए शनि लग्न और द्वितीय भाव के स्वामी बनते हैं. अपनी वाणी पर नियंत्रण रखें. कुटुम्ब में कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है. धन संचय के लिए अधिक प्रयास करने पड़ सकते हैं. बेवजह मानसिक परेशानी हो सकती है.

कुम्भ राशि के जातकों के लिए शनि द्वादश और लग्न भाव के स्वामी होते हैं. शनि के वक्री होने से आपको मानसिक, आर्थिक तथा पारीवारिक समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है. आपके बनते हुए कार्यों में रुकावटें आ सकती हैं. आपके खर्चें बढ़ सकते हैं. कार्यक्षेत्र में बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है.

मीन लग्न के जातकों के लिए शनि एकादश तथा द्वादश भाव का स्वामी है. खर्चें बढ़ सकते हैं. दाम्पत्य जीवन में स्थायित्व की कमी रह सकती है. लाभ की प्राप्ति के लिए प्रयास दोगुने हो सकते हैं.

वक्री शनि के उपाय | Remedies for Retrograde Saturn

यदि शनि के वक्री होने से कठिनाइयाँ आती हैं तब वह शनि ग्रह से संबंधित मंत्र जाप करके शनि के दुष्प्रभाव को कम कर सकता है.

“ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:” तथा “ॐ शं शनैश्चराय नम:” मंत्रों के जाप प्रतिदिन संध्या काल में एक माला करें. इन मंत्रों के जाप करने से शनि के अशुभ प्रभावों में कमी आ सकती है.

प्रत्येक शनिवार के दिन संध्या समय में पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाने से शनि के अशुभ प्रभावों में कमी आएगी.

प्रत्येक शनिवार के दिन संध्या समय में ” दशरथ कृत शनि स्तोत्र ” का पाठ करें अथवा “शनि नील स्तोत्र ” का पाठ करें. इससे व्यक्ति को शनि के अशुभ फलों से राहत मिलेगी.

Posted in Ascendant, Basic Astrology, Planets, Rashi, Transit, Vedic Astrology, Yoga | Tagged , , , , | 1 Comment

राजाधिराज योग कैसे बनता है ओर उसका क्या प्रभाव होगा

वैदिक ज्योतिष अत्यधिक व्यापक क्षेत्र है. एक कुण्डली का विश्लेषण करना चुनौती भरा काम होता है. किसी भी कुण्डली में बनने वाले योगों को देखने के लिए बहुत सी बातों का विश्लेषण करके ही किसी नतीजे पर पहुंजा जा सकता है. कुण्डली विश्लेषण में कुण्डली के योग महत्वपूर्ण होते हैं. यदि किसी कुण्डली में शुभ योगों का निर्माण हो रहा है तब उन योगों में शामिल ग्रह की दशा/अन्तर्दशा में व्यक्ति को शुभ फलों की प्राप्ति अवश्य होती है. वैसे तो वैदिक ज्योतिष में अच्छे तथा बुरे हजारों योगों का जिक्र मिलता है. लेकिन इन योगों में राजयोग अधिकतर कुण्डलियों में मिल जाते हैं.

कुण्डली में राजाधिराज योग बनता है या नहीं और यह आपके जीवन को किस दिशा की ओर ले जाता है इस बात को इस प्रकार से समझा जा सकता है.  राजयोग के निर्माण में जन्म कुण्डली के मुख्य भावों की भूमिका आपकी जन्म कुण्डली में स्थित पहला, चौथा, सातवाँ और दसवाँ भाव विष्णु स्थान कहलाते हैं. इन स्थानों को वैदिक ज्योतिष में केन्द्र भाव के नाम से भी जाना जाता है. इसी प्रकार आपकी कुण्डली के पंचम भाव तथा नवम भाव को लक्ष्मी स्थान कहते हैं. वैदिक ज्योतिष में पंचम तथा नवम भाव को त्रिकोण स्थान के नाम से भी जाना जाता है.

विष्णु जी बिना लक्ष्मी के अधूरे जान पड़ते हैं. इसलिए जब केन्द्र अर्थात विष्णु स्थान का संबंध त्रिकोण अर्थात लक्ष्मी स्थानों से बनता है तब कुण्डली में राजयोग का निर्माण होता है. कुण्डली में स्थित राजयोगों को शुभ माना जाता है. यह राजयोग आपको तभी फल देगें जब आपके जीवन में इन राजयोगों में शामिल ग्रह की दशा/अन्तर्दशा आती है. कुण्डली के पहले भाव का स्वामी यदि पंचम या नवम भाव में स्थित है तब कुण्डली में उत्तम श्रेणी का राजयोग बनता है.

यदि जन्म कुण्डली में पहले भाव का स्वामी पंचमेश या नवमेश के साथ कुण्डली में एक साथ स्थित है तब यह एक शुभ तथा बली राजयोग है. पहले भाव के स्वामी का पंचमेश या नवमेश के साथ राशि परिवर्तन होने से एक अच्छा राजयोग बनता है.

यदि जन्म कुण्डली में पहले भाव के स्वामी का परस्पर दृष्टि संबंध पंचमेश या नवमेश के साथ स्थापित हो रहा है तब यह बली राजयोग कहलाता है. चतुर्थ, पंचम तथा नवम भाव से बनने वाला राजयोग कुण्डली के चतुर्थ भाव का स्वामी पंचम या नवम भाव में स्थित है तब राजयोग का निर्माण होता है. यदि कुण्डली में चतुर्थेश, पंचमेश या नवमेश के साथ स्थित है तब यह राजयोग बन रहा है.

जन्म कुण्डली में चतुर्थेश और पंचमेश या नवमेश का आपस में परस्पर दृष्टि संबंध स्थापित हो रहा है तब यह भी राजयोग माना जाता है. चतुर्थेश का राशि परिवर्तन पंचमेश या नवमेश के साथ होने पर राजयोग का निर्माण होता है.  सप्तम भाव का स्वामी पंचम या नवम भाव में स्थित है तब राजयोग का निर्मण कुण्डली में हो रहा है. सप्तमेश के नवम भाव में होने से आपका भाग्योदय विवाह के बाद हो सकता है.

सप्तम भाव का स्वामी पंचम भाव के स्वामी के साथ स्थित होने से कुण्डली में राजयोग बन रहा होता है. सप्तमेश यदि आपकी कुण्डली में नवमेश के साथ स्थित है तब यह अच्छा राजयोग माना जाता है. जीवन में भाग्य से बहुत कुछ हासिल हो सकता है. सप्तमेश का पंचमेश या नवमेश के साथ राशि परिवर्तन होने से भी राजयोग का निर्माण होता है. कुण्डली में सप्तमेश का परस्पर दृष्टि संबंध पंचमेश या नवमेश से होने पर राजयोग का निर्माण हो रहा होता है.

Posted in Planets, Rashi, Signs, Varga Kundli, Vedic Astrology, Yoga | Tagged , , , , | Leave a comment

व्यापार वृद्धि यंत्र – पूजन और स्थापित करने कि विधि स्वयं करें

यंत्र सर्वोपरि एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण होते हैं व्यापार वृद्धि यंत्र की संरचना बड़ी ही विचित्र है, इस यंत्र को धनदाता और सर्वसिद्धिदाता कहा गया है. व्यापार वृद्धि यंत्र की रचना तांबे, चांदी या सोने के पत्र पर या स्फटिक पर की जा सकती है. शास्त्रों के अनुसार स्फटिक या स्वर्णपत्र पर शुभ मुहूर्त में अंकित यंत्र सर्वोत्कृष्ट माना जाता है.

यह एक अत्यंत चमत्कारी यंत्र है लेकिन इसके चमत्कारी फलों का लाभ प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि इसकी रचना शुभ समय कि जाए. इसमें रेखांकन शुद्ध हो और इसकी साधना विधि विधान के साथ निष्ठापूर्वक की जाए. व्यापार वृद्धि यंत्र की प्राण प्रतिष्ठा करके उसकी पूजा प्रतिदिन करनी चाहिए. इससे दरिद्रता दूर रहती है व्यापार में सफलता प्राप्त होती है. यंत्र की पूजा करते समय मंत्र का जप करना चाहिए.

व्यापार वृद्धि यंत्र पूजा | Puja For Success In Business Yantra

शुक्ल पक्ष के किसी भी दिन शुभ मुहूर्त में व्यापार वृद्धि यंत्र के सम्मुख बैठकर माला जप करने से धन का आगमन बना रहता है. व्यापार वृद्धि यंत्र की पूजा नियमित रूप से करनी चाहिए और पूजा करते समय यंत्र के पर इत्र आदि का छिड़काव करना चाहिए तथा धूप, दीप, नैवद्य अर्पित करने चाहिए इससे रोजगार में वृद्धि होती है. इस यंत्र की नियमित रूप से पूजा पाठ एवं माला जप करने से लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है.

व्यापार वृद्धि यंत्र की पूजा फूल, लड्डू, नारियल इत्यादि से करनी चाहिए, व्यवसायियों, दुकानदारों को यंत्र की विधिवत प्राण प्रतिष्ठा कर उसे अपनी दुकान में विधिपूर्वक स्थापित करना चाहिए, व्यापार में यदि दिन-रात मेहनत करते रहने पर भी घाटा हो रहा हो तो उन्हें ऐसे में व्यापार वृद्धि यंत्र की स्थापना पूर्व अथवा उत्तर दिशा में करनी चाहिए, विधिवत प्राण प्रतिष्ठा कर स्थापित किए गया व्यापार वृद्धि यंत्र समस्त बाधाएं और कष्ट क्लेश दूर करता है.

व्यापार वृद्धि यंत्र उपयोग | Use Of Success In Business Yantra

कोई नया व्यापार आरंभ करते समय, या किसी भी साझेदारी हेतु लेन-देन करते समय व्यापार वृद्धि यंत्र का पूजन और दर्शन करने से सफलता प्राप्त होती है. जो व्यापार में समृद्धि तथा संपन्नता देखना चाहते हैं और दरिद्रता आदि को समाप्त करना चाहते हों उन्हें पवित्र मन से व्यापार वृद्धि यंत्र के सम्मुख अग्नि में गाय के दूध का हवन और लक्ष्मी के मंत्र का जप करना चाहिए. प्रतिदिन रोज एक माला का हवन करे तो उसे लक्ष्मी की प्राप्ति होगी.

व्यापार वृद्धि यंत्र निर्माण | How To Establish Success In Business Yantra

व्यापार वृद्धि यंत्र बनवाने के लिए सर्वप्रथम भोजपत्र या समतल चांदी, सोने, तांबे या स्फटिक पतरा तैयार कर लें. इस प्लेट पर व्यापार वृद्धि यंत्र की आकृति के अनुसार उत्कीर्ण करके इसके तैयार होने पर स्वयं या फिर किसी ब्राह्मण से प्राणप्रतिष्ठा करवा लेनी चाहिए. इसके पश्चात संकल्प, करन्यास, ध्यान और हवन करना चाहिए. इस तरह विधि विधान से शोधन कर उसके मंत्र का जप, तप, हवन, तर्पण आदि करने से यह सिद्ध हो जाता है और व्यक्ति को किसी चीज का कोई अभाव नहीं रहता

व्यापार वृद्धि यंत्र महत्व | Significance Of Success In Business Yantra

व्यापार वृद्धि यंत्र को व्यापार से सम्बन्धित स्थल में स्थापित करने तथा नियमित शुद्ध मन से पूजा करने से व्यापार में आने वाली रूकावटों का अंत होता है तथा विकास में वृद्धि होती है, धन का आगमन होता हैं. व्यापार में निरन्तर घाटा होने की स्थिति में इस यंत्र को सम्मुख रखकर मंत्र जप ने से व्यापार में आश्चर्यजनक लाभ होता है. इस यंत्र की अचल प्रतिष्ठा करके व्यक्ति को अपने पास में रखने से अनेक तरह से व्यापार में लाभ होता है.

Posted in Basic Astrology, Profession, Remedies, Vedic Astrology, Yantra, Yoga | Tagged , , , , | Leave a comment

सूर्य यंत्र का पूजन और स्थापन खुद कैसे करें

ज्योतिषशास्त्र में सूर्य को प्रमुख ग्रह के रूप मान्यता प्राप्त है. सूर्य देव को नवग्रहों में सबसे शक्तिशाली ग्रह माना गया है इन्हें आत्म कारक कहा गया है. सभी ग्रह इन्हीं की परिक्रमा करते हैं. ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सम्पूर्ण विश्व राशि-नक्षत्र और ग्रहों से प्रभावित है. सूर्य पित्त प्रधान ग्रह हैं इनसे प्रभावित व्यक्ति बहुत जल्दी उग्र हो जाते हैं.  गंभीरता एवं आत्माभिमान भी इनसे प्रभावित व्यक्तियों में दिखाई देता है.  यह दृढ़ इच्छा शक्ति देता है और नेतृत्व की क्षमता प्रदान करता है.

सूर्य यदि मंदा हो तो पर व्यक्ति में अभिमानी होता है. छोटी छोटी बातों पर क्रोधित होकर लड़ने को तैयार रहता हैं.  अशुभ सूर्य हृदय को कठोर बनता है अर्थात मन में दया की भावना का अभाव होता है.  सूर्य नेत्रों,  हृदय एवं हड्डियों पर प्रभाव रखता है. आत्मिक बल, धैर्य, स्वास्थ्य के अधिकारी सूर्य हैं. सूर्य के कमजोर होने पर दुर्बलता, मानसिक अशांति, हृदय रोग एवं नेत्र सम्बन्धी रोगों की संभावना बन सकती है. ऐसी स्थिति में यदि सूर्य यंत्र का विधि-विधान पूर्वक पूजन किया जाए तो शुभता में वृद्धि होती है. सूर्य मजबूत और शुभ स्थिति में होने पर राज्याधिकारी एवं विशिष्ट पद दिलाता है.

सूर्य यंत्र की पूजा | Surya Yantra Puja

इस यंत्र की स्थापना रविवार या किसी शुभ मुहूर्त में कि जा सकती है. सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान आदि कर स्वच्छ एवं शुद्ध श्वेत वस्त्र धारण करने चाहिएं. यंत्र स्थापना से पूर्व सूर्य यंत्र को गंगाजल व गाय के दूध से पवित्र कर लेना चाहिए. पूर्व दिशा की ओर मुंह कर बैठना चाहिए तथा पीला रेशमी वस्त्र बिछाकर उस पर सूर्य यंत्र स्थापित करना चाहिए. सूर्य यंत्र पर चंदन, केसर, सुपारी व लाल पुष्प अर्पित करने चाहिए.

इस यंत्र का विधिपूर्वक पूजन करने के पश्चात सूर्य मंत्र का जप करना चाहिए:- “ॐ घृणि सूर्याय नम:।”

मंत्र जाप के पश्चात सूर्य यंत्र को पूजा स्थान पर रखे दें तथा प्रतिदिन इस यंत्र का पूजन-पाठ किया करें.  इस प्रकार इस यंत्र का पूजन करने से शीघ्र ही सूर्य संबंधी होने वाली समस्याएं समाप्त हो जाती हैं. जिन व्यक्तियों की कुंडली में सूर्य की महादशा या सूर्य की अंतरदशा चल रही हो, उनके लिए सूर्य यंत्र की पूजा लाभदायक होती है. सूर्य यंत्र दो प्रकार के होते हैं पहला नवग्रहों का एक ही यंत्र होता है दूसरा नवग्रहों का अलग-अलग पूजन यंत्र होता है. इस यंत्र को सामने रखकर उपासना करने से सभी प्रकार के कष्ट दूर होते हैं, आरोग्य प्राप्त होता है, व्यापार तथा नौकरी में सफलता मिलती है और यश तथा पद-प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है.

सूर्य यंत्र की स्थापना | Surya Yantra Establishment

सूर्य यंत्र को स्थापित करने से प्राप्त होने वाले लाभ पूर्ण रूप से तभी प्राप्त हो सकते हैं जब स्थापित किया जाने वाला सूर्य यंत्र शुद्धिकरण, प्राण प्रतिष्ठा की प्रक्रिया के माध्यम से विधिवत बनाया गया हो. शुद्धिकरण के पश्चात सूर्य यंत्र को सूर्य ग्रह के मंत्रों की सहायता से एक विशेष विधि के माध्यम से उर्जा प्रदान की जाती है जो सूर्य ग्रह की शुभ उर्जा के रूप में इस यंत्र में संग्रहित हो जाती है. क्योंकि विधिवत प्रकार से सूर्य यंत्र को स्थापित नहीं करने से विशेष लाभ प्रदान करने में कमी आ जाती है.

विधिवत बनाया गया सूर्य यंत्र प्राप्त करने के पश्चात आप इसे ज्योतिषि के परामर्श के अनुसार घर में पूजा स्थान अथवा पर्स या गले में धारण कर सकते हैं. उत्तम फलों की प्राप्ति के लिए सूर्य यंत्र को रविवार वाले दिन स्थापित करना चाहिए तथा घर में स्थापित करने की स्थिति में इसे पूजा के स्थान में स्थापित करना चाहिए. इस यंत्र से शुभ फल प्राप्त करने हेतु इस यंत्र की नियमित रूप से पूजा करनी होती है. सूर्य बीज मंत्रों के उच्चारण के पश्चात अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए प्राथना करनी चाहिए. यंत्र की नियमित रूप से पूजा करने से साधक और यंत्र के मध्य संबंध स्थापित हो जाता है जिसके कारण यह यंत्र आपको अधिक से अधिक लाभ प्रदान करने के लिए प्रेरित होता है.

सूर्य यंत्र उपयोग | Use of Surya Yantra

सूर्य यंत्र के सम्मुख सूर्य मंत्र जाप प्रतिदिन जप करने से सूर्य का बुरा प्रभाव नष्ट हो जाता है. सूर्य यंत्र का प्रयोग सामान्यतया सूर्य के अशुभ प्रभावों को कम करने के लिए किया जाता है. सूर्य यंत्र अपने जातक को सूर्य की सामान्य विशेषताओं से प्राप्त होने वाले लाभ प्रदान करने में सक्षम होता है. इस यंत्र को स्थापित करने से सरकार अथवा न्यायालयों से जुड़े किसी प्रकार के मामलों का सामना करने का बल मिलता है तथा स्थापित किया गया सूर्य यंत्र सरकारी पक्ष से आने वाले निर्णयों को व्यक्ति के पक्ष में कर सकता है.

सूर्य यंत्र महत्व | Surya Yantra Significance

सूर्य की अशुभता के कारण व्यक्ति को सूर्य की सामान्य तथा विशिष्ट विशेषताओं से संबंधित हानि हो सकती है. जिसके निवारण हेतु सूर्य यंत्र को स्थापित करना एक अच्छा उपाय है विशेषकर उस स्थिति में जब सूर्य अशुभ अथवा नकारात्मक रूप से काम कर रहा हो.

Posted in Dashas, Yantra | Tagged , , , , , | Leave a comment

होरा शास्त्र क्या है और इसमें क्या लिखा है

होरा शास्त्र से जातक की धन सम्पदा सुख सुविधा के विषय में विचार किया जाता है. संपति का विचार भी होरा लग्न से होता है, राशि, होरा, द्रेष्काण, नवमांश, षोडश वर्ग, ग्रहों के दिग्बल, काल बल, चेष्टा बल, दृष्टिबल, ग्रहों के कारकत्व, योग, अष्टवर्ग, आयु, विवाह योग, मृत्यु प्रश्न एवं ज्योतिष के फलित नियम होरा शास्त्र के अंतर्गत आते हैं.

होरा लग्न या तो सूर्य का होता है या चन्द्रमा है यदि जातक सूर्य की होरा में उत्पन्न होता है तो वह पराक्रमी, स्वाभिमानी एवं बुद्धिमान दिखाई देता है. होरा में सूर्य के साथ यदि शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के ग्रह हों तो जातक को जीवन के आरम्भिक समय में संघर्ष का सामना करना पड़ सकता है.

यदि सूर्य की होरा में पाप ग्रह हों तो जातक को परिवार एवं आर्थिक लाभ में कमी का सामना करना पड़ता है. कार्य क्षेत्र में भी अत्यधिक परिश्रम करना पड़ता है. यदि जातक चन्द्रमा की होरा में होता है तथा शुभ ग्रहों का साथ मिलने पर व्यक्ति को सम्पदा,वाहन एवं परिवार का सुख प्राप्त होता है. परंतु चंद्र की होरा में यदि पाप ग्रह हों तो मानसिक तनाव का दर्द सहना पड़ सकता है.

ज्योतिष में होराशास्त्र का महत्व | Significance of Hora Shastra In Astrology

होरा शास्त्र ज्योतिष का महत्वपूर्ण अंग होता है. होरा शास्त्र के प्रमुख ग्रन्थों में हमें इसके विस्तार रुप के दर्शन होते हैं. होरा शास्त्र में प्रसिद्ध ग्रन्थों के नामों में वृहद पाराशर होरा शास्त्र, सारावली, जातकालंकार, वृहत्जातक,  मानसागरी, जातकाभरण, चिन्तामणि, ज्योतिष कल्पद्रुम, जातकतत्व होरा शास्त्र इत्यादि प्रमुख माने गए हैं. होरा शास्त्र के प्रमुख आचार्यों के नामों में पाराशर, कल्याणवर्मा, दुष्टिराज, मानसागर, गणेश, रामदैवज्ञ, नीपति आदि रहे हैं जिन्होंने अपनी विद्वता के द्वारा होरा शास्त्र की महत्ता को प्रदर्शित करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

होरा शास्त्र का प्रभाव | Effect of Hora Shastra

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार एक अहोरात्र अर्थात दिन-रात में 24 होराएं होती हैं जिन्हें हम 24 घंटो के रूप में जानते हैं जिसके आधार पर हर एक घंटे की एक होरा होती है जो किसी ना किसी ग्रह की होती है. प्रत्येक वार की प्रथम होरा उस ग्रह की होती है जिसका वार होता है जैसे यदि रविवार है तो पहली होरा सूर्य की ही होगी जब आप होरा का निर्धारण करते हैं.

होरा का क्रम ग्रहों के आकार के क्रम पर स्वत: ही निर्धारित हो जाता है. जैसे गुरु को देखें कि वह आकार में सबसे बडा़ ग्रह है उसके बाद होरा स्वामी मंगल होता है. मंगल के बाद शनि और इस तरह से सभी ग्रह क्रम से अपने आकार के अनुसार चलते हैं. सभी अपने में महत्ता को दर्शाते हैं.

होरा स्वामी दो समूहों में बांटे गए हैं. पहले समूह में बुध, शुक्र तथा शनि आते हैं. दूसरे समूह में सूर्य, चन्द्रमा, मंगल तथा गुरु आते हैं. जब होरा का समूह प्रश्न के समय बदल रहा हो तब प्रश्न से संबंधित कोई मुख्य बदलव हो सकते हैं. इस तरह से जिस ग्रह की होरा चल रही है उस ग्रह से संबंधित फल प्राप्त हो सकते हैं. यदि होरेश अर्थात होरा स्वामी पीड़ित है तब कार्य सिद्धि में अड़चने भी आ सकती हैं.

Posted in Varga Kundli, Vedic Astrology | Tagged , , , , | 1 Comment

कन्या लग्न होने पर धन योग कैसे बनता है

भौतिक समृद्धि के लिए लक्ष्मी की कृपा दृष्टि सदैव आवश्यक होती है. कन्या लग्न में जन्में जातक की कुण्डली में यदि बुध बलवान होकर स्थित हो तो जातक बुद्धिमान, बलवान, कुशल वक्ता तथा सुंदर गुणों से युक्त होता है. उसे संगीत का शौक तथा मनोविनोद में रुचि लेने वाला होता है. परंतु यदि बुध निर्बल या पीड़ित होने पर रोग, चर्म रोग तथा वाणी में दोष जैसे विकार प्रभावित कर सकते हैं.

इस लग्न के व्यक्ति अच्छे औषधि विक्रता बन सकते है. यह वित्त से सम्बन्धित सलाहकार बन सकते है. व्यापारी, किसान, पानी के क्षेत्र से जुडे इंजिनियर बन सकते है. वृश्चिक राशि को रहस्यमयी राशि कहा गया है इसलिये इस लग्न के व्यक्ति मनोचिकित्सक बन यश व आय दोनों प्राप्त कर सकते है.

बुध का प्रभाव होने से जातक बुद्धिमान होते हैं, व्यक्तित्व ऎसा होता है कि कोई भी सहजता से आकर्षित हो जाता है. रचनात्मक विचारों पर कार्य करने का स्वभाव बनता है. कार्य को करने के लिए रणनीति का इस्तेमाल अवश्य करते हैं. प्रत्येक कार्य की लाभ-हानि सोचकर ही कार्य करते हैं.

इस लग्न के व्यक्ति शल्य चिकित्सक बनने की योग्यता रखते है. रिसर्च व अध्ययन के कामों के लिये भी यह लग्न अच्छा समझा जाता है. इसलिये व्यक्ति अनुसंधान में रुचि ले सकता है. कन्या लग्न बुध की राशि होने के कारण व्यक्ति अंकेक्षक बनने या कर निर्धारण करने की योग्यता भी रखता है.

द्विस्‍वभाव लग्‍न होने से जातक का मन एक जगह स्‍थिर नहीं रहता, यदि जातक एक सोच रख कर कार्य करे तो प्रत्‍येक क्षेत्र में अच्‍छी सफलता पाने वाले होता है. बुध प्रधान लग्‍न होने के कारण व्यक्ति का बौद्धिक स्‍तर अच्‍छा होता है.

लग्‍नेश की स्थिति दशम भाव में हो तो जातक पैतृक कार्य को आगे बढा सकता है तथा पिता के व्‍यापार में सहयोगी बन अच्छा लाभ भी कमा सकता है. बुध स्‍वराशिस्‍थ होने से भद्र योग का निर्माण व्यक्ति को उच्चाइयां प्रदान करने में सहायक होता है और इसी के साथ साथ व्यक्ति राजनीति में भी अपनी पैठ बनाने में कामयाबी पा सकता है.

द्वितीय भाव | Second House

यदि कुण्डली के द्वितीय भाव में तुला राशि स्थित हो तो शुक्र को नवम भाव का स्वामी होने के कारण व्यक्ति को अचानक धन लाभ की प्राप्ति हो सकती है.

नवम भाव | Ninth House

नवम भाव में यदि वृषभ राशि में होने पर शुक्र यदि बली अवस्था में स्थित हो तो वह अपनी दशा में खूब धन देने वाला बनता है.

दशम भाव | Tenth House

दशम भाव में मिथुन होने पर बुध लग्नेश तथा दशमेश होने के कारण शुभ होता है तथा अपनी दशा में यदि बली हो तो अचानक राज्यपद की प्राप्ति यश की प्राप्ति होती है.

एकादश भाव | Eleventh House

मिथुन होने पर बुध एकादश तथा द्वितीय भावों का स्वामी बनता है यह दोनो भाव धन कारक होते हैं. यदि बुध बलवान हो तो धन संपदा प्राप्त होती है. राहु-केतु यदि एकादश या द्वादश भाव में स्थित हों और बुध भाग्य अथवा पंचम भाव में शुभ दृष्टि हो तो अपनी दशा में लॉटरी इत्यादि से धन की प्राप्ति होती है.

Posted in Basic Astrology, Dashas, Planets, Rashi, Remedies, Yoga | Tagged , , , , | Leave a comment

प्रश्न कुण्डली से जानिये कि आपकी यात्रा फलेगी या नहीं

प्रश्न कुण्डली व्यक्ति द्वारा पूछे प्रश्न पर आधारित होती है. जिस समय किसी व्यक्ति विशेष द्वारा कोई प्रश्न किया जाता है उसी समय की एक कुण्डली बना ली जाती है. इसे ही प्रश्न कुण्डली कहा गया है. प्रश्न कुण्डली द्वारा यात्रा के संदर्भ में भी जाना जा सकता यात्रा में उसकी स्थिति उसके लाभ हानि इत्यादि सभी बातों को जानने का प्रयास किया जा सकता है. प्रश्न कुण्डली का ज्योतिषियों द्वारा काफी उपयोग किया जाता है. प्रश्न कुण्डली में ताजिक योगों तथा ताजिक दृष्टियों का बहुत महत्व है. इनके बिना प्रश्न कुण्डली का आधार नहीं है.

प्रश्न कुण्डली में एक बात का ध्यान यह रखना आवश्यक है कि प्रश्न करने और बताने का समय एक ही होना जरूरी है और प्रश्नकर्त्ता यदि ज्योतिषी के पास जाकर स्वयं प्रश्न करता है तो अधिक उचित है. प्रश्न कुण्डली में एक बात विशेष ध्यान देने योग्य यह है कि प्रश्न कुण्डली का लग्न पुष्प होता है. चन्द्रमा को उसका पराग कहा जाता है. नवांश को फलरुप कहते हैं.

भाव प्रश्न के फलों के भोग को दर्शाता है. इससे प्रश्न के समय कुछ शकुन – अपशकुन का पता चलता है. प्रश्नकर्त्ता की भाव – भंगिमाओं से प्रश्न की सफलता – असफलता का भी पता चलता है. प्रश्न कुण्डली बताने तथा प्रश्न का उत्तर देने का तरीका भारतीय ज्योतिष में भिन्न – भिन्न है. प्रश्न कुण्डली का अध्ययन करने का तरीका सभी स्थानों पर भिन्न है. इस प्रकार कई विधियाँप्रश्न कुण्डली के लिए प्रचलित हैं.

प्रश्न कुण्डली – यात्रा में शुभता का भाव | Prashna Kundali – House for an auspicious journey

यात्रा पर जने वाले की वापसी की कुशलता को देखने के लिए कुण्डली में चंद्रमा, गुरू और शुक्र का बली होना शुभ माना जाता है. यदि प्रश्न कुण्डली में यह ग्रह बलवान होकर शुभ स्थान से दृष्टि दाल रहे हों तथा किसी भी पाप ग्रह की दृष्टि इन्हें प्रभावित नहीं कर रही हो तो यात्रा अच्छे से होती है तथा यात्रा पर जाने वाला कुशलतापूर्वक घर वापस आ जाता है.

प्रश्न कुण्डली – यात्रा में लगने वाला समय | Prashna Kundali – Amount of time spent on a journey

यदि प्रश्न कुण्डली में सूर्य और चंद्रमा को कोई पाप ग्रह देख रहा हो तो यात्रा में अधिक समय लग सकता है तथा यात्रा पर जाने वाला व्यक्ति काफी दिनों बाद वापसी करता है. परंतु यदि सूर्य या चंद्रमा लग्न पर दृष्टि न डाल रहे हों पर एक देसरे पर दृष्टि डाल रहे हों तो यात्रा लंबी अवधी की हो सकती है.

प्रशन कुण्डली से यात्रा में अशुभ प्रभाव का विचार | Prashna Kundali – An inauspicious journey

सूर्य यदि लग्न में स्थित हो तथा शुभ ग्रह कमजोर होकर अशुभ स्थानों में स्थित हों तो यात्रा में परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है. इसी के साथ यदि प्रश्न कुण्डली के लग्न, षष्ठम या अष्टम भाव में चंद्रमा स्थित हो तो यात्रा में कठिनाईयां आ सकती हैं. लग्न में शुक्र और मंगल का स्थित होना यात्रा में शत्रु पक्ष से सामना दर्शाता है.

प्रशन कुण्डली – यात्रा में विश्राम | Prashna Kundali – Rest in a Journey

प्रश्न कुण्डली में यदि चर लग्न हो तथा वह शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो यात्रा में विश्राम का अवसर कम ही प्राप्त होता है . एक नियम अनुसार जितने भी शुभ ग्रह बली होकर लग्न पर दृष्टि डाल रहे होते हैं उतना ही अधिक स्थान पर उसे रुकने के अवसर प्राप्त होंगे. प्रश्न कुण्डली के लग्न से पंचम, षष्टम, सप्तम और नवम भाव स्थान में शुभ ग्रह हों तो यात्री को मार्ग में प्रसन्नता एवं खुशी प्राप्त होती है. अष्टम भाव में शुक्र, बुध होने पर सुख की प्राप्ति होती है.

Posted in Ascendant, Dashas, Planets, Prashna Shastra, Rashi, Signs, Transit, Yoga | Tagged , , , , | 1 Comment

मुन्था और विभिन्न ग्रहों का प्रभाव

मुन्था वर्षफल में उपयोग की जाती है. मुन्था में प्रत्येक ग्रह का अपना प्रभाव फलिभूत होता है. सभी ग्रह अपने अनुसार फल प्रदान करते हैं.

मुन्था सूर्य से युक्त | Muntha including Sun

यदि मुन्था सूर्य से प्रभवैत होती है तो जातक को शुभ स्थिति प्राप्त होती है. जातक शाररिक रुप से बलिष्ठ होता है उसे राज्य से सम्मान की प्राप्ति होती है तथा राजनीतिक सफलता मिलती है. परंतु यदि सुर्य पीड़ित हो तो परिणाम इसके विपरित हो सकते हैं.

मुन्था चंद्रमा से युक्त | Muntha including Moon

चम्द्रमा द्वारा मुन्था प्रभावित होने पर धन सम्रद्धि की प्राप्ति होती है. सामाजिक जीवन तथा संबंधों में सुख की अनुभूति मिलती है. लेकिन यदि चंद्रमा पिड़ित हो तो मानसिक अशांति और अवसाद कि स्थिति प्रभावित कर सकती है.

मुन्था मंगल से युक्त | Muntha including Mars

मुन्था मंगल से प्रभवित होने पर दुर्घटना की स्थिति उत्पन्न कर सकती है इस दौरान शल्य चिकित्सा का भय भी सता सकता है तथा शस्त्रों से क्षति का सामना करना पड़ सकता है.

मुन्था बुध युक्त | Muntha including Mercury

बुध से युक्त होने पर व्यक्ति को कला तथा व्यवसाय में सफलता प्राप्त हो सकती है. व्यक्ति का मन हास्य विनोद में रमा रह सकता है. परंतु यदि मुन्था अशुभ ग्रहों से प्रभावित होगी तो हानि का सामना अधिक करना पड़ सकता है.

मुन्था बृहस्पति से युक्त | Muntha including Jupiter

गुरु से युक्त मुन्था संतान सुख, सफलता, प्रसिद्धि प्रदान करने वाली होती है.

शुक्र से युक्त मुन्था | Muntha including Venus

मुन्था शुक्र से युक्त होने पर विवाह का सुख तथा स्त्री से सुख एवं सहयोग प्रदान करने वाली होती है.

शनि से युक्त मुन्था | Muntha including Saturn

निराशा, शोक , संघर्ष की स्थिति देने वाली होती है, इस दौरान सम्मान एवं प्रतिष्ठा में कमी तथा शाररिक कष्ट का अनुभव हो सकता है.

राहु युक्त मुन्था | Muntha including Rahu

मुन्था यदि रहु के मुख में हो तो अच्छे प्रभाव देने वाली मानी जाती है और इसके साथ ही साथ यदि यह शुभ ग्रहों जैसे गुरू ओर शुक्र से युक्त हो तो धन तथा सम्मान देने वाली हो सकती है. परंतु यदि मुन्था राहु के पिछले भाग में स्थित हो तो संकट एवं देरी को दर्शाने वाली हो सकती है.

केतु से युक्त मुन्था | Muntha including Ketu

केतु से युक्त मुन्था शुभता में कमी लाती है. यह मानसिक तनाव तथा हानि को दर्शाती है.

मुन्था और मुन्थे से संबंधित विवेचन | Other points of discussion related to Muntha

जन्म कुण्डली में तथा वर्ष कुण्डली में यदि मुन्थेश एक राशि में स्थित हों तथा यह पीड़ित न हो तो वर्ष के आरंभ तथा अंत में अच्छे शुभ परिणाम प्राप्त हो सकते हैं.

यदि मुन्थेश लग्न से चौथे, आठवें अथवा बारहवें भाव में स्थित हो और इसके साथ ही साथ अशुभ ग्रहों द्वारा प्रभावित हो तो जातक को रोग तथा आर्थिक हानि प्रदान कर सकने वाली हो सकती है.

यदि मुन्थेश अष्टमेश से युक्त अथवा प्रभावित हो तो परिणाम अशुभता से भरे हो सकते हैं. मुन्थेश से रोग होने का पता लगाया जा सकता है. यदि मुन्थेश का संबंध छठे, लग्न अथवा आठवें भाव से हो रहा हो तो रोग से कष्ट की स्थिति उत्पन्न हो सकती है.

जन्म कुण्डली में मुन्था यदि शुभ ग्रहों से युक्त अथवा प्रभवित हो तथा उक्त वर्ष कुण्डली में यह शुभ ग्रहों के प्रभाव से पूर्ण न हो तो वर्ष का पूर्वार्द्ध शुभ फलों को देने वाला हो सकता है. परंतु यदि वर्ष कुण्डली में मुन्था अथवा मुन्थेश शुभ ग्रहों से संबंधित हो तो शुभ परिणाम वर्ष के उत्तरार्द्ध में प्राप्त हो सकते हैं.

Posted in Ascendant, Basic Astrology, Prashna Shastra, Varsha Kundali, Vedic Astrology | Tagged , , , , | Leave a comment

गणेश यंत्र को स्थापित करने की सही विधि (स्वयं करें)

अभिष्ट फलों की प्राप्ती हेतु यंत्र साधना का प्रतिकात्मक या चित्रात्मक रुप में उपयोग बहुत लाभदायक होता है. गणेश यंत्र सबसे महत्वपूर्ण, शुभ और शक्तिशाली यंत्र होता है जो न केवल लाभ देता है तथा व्यक्ति के लिए शुभ फलदायक होता है. गणेश भगवान को विघ्नहर्ता तथा सर्वकार्यों में प्रथम पूज्य माना जाता है, इन्हीं के यंत्र स्वरुप को अपनाकर व्यक्ति सभी कष्टों से मुक्ति एवं सुख तथा समृद्धि पाता है. यह यंत्र समस्त सांसारिक इच्छाओँ को पूरा करने का स्रोत है. किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करनी हो तो भगवान गणेश की पूजा उत्तम फल प्रदान करने वाली होती है. भगवान गणेश का पूजन यंत्र के रूप में करने से शुभ फलों में वृद्धि होती है.

गणेश यंत्र का उपयोग | Use of Ganesha Yantra

श्री गणेश यंत्र को चल एवं अचल दोनों तरह से प्रतिष्ठित किया जाता है. गणेश यंत्र के पूजन से जीवन में धन व समृद्धि की प्राप्ति होती है, यंत्र को गंगाजल से स्नान करा कर शुद्ध कर लेना चाहिये. धूप-बत्ती दिखाकर श्री गणेश मंत्र जप व पाठ करना चाहिये, प्रतिदिन श्रीगणेश यंत्र की विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए संकटनाशक गणेश स्त्रोत का पाठ करने से संकट दूर होते हैं. नित्य गणेश मंत्र का जप समस्त कामनाओं को पूर्ण करता है.

गणेश यंत्र पूजा | Ganesha Yantra Puja

श्री गणेश यंत्र के सामने गाय के घी से मिश्रित अन्न की आहुतियाँ देने से समृद्धि की कमी नहीं होती. अष्टद्रव्यों से प्रतिदिन आहुति देने से व्यक्ति धनवान बनता है. भगवान श्रीगणेश यंत्र की स्थापना करने पर यंत्र के समक्ष  सुबह-शाम दीपक व भोग लगाएं तथा आरती किया करें. श्रीगणेश यंत्र की स्थापना ईशाण कोण में करें. स्थापना इस प्रकार करें कि यंत्र का मुख पश्चिम की ओर रहे.

गणेश यंत्र पर दुर्वा व ताजे फूल चढ़ाएं स्थापना स्थल पर पवित्रता का ध्यान रखें तथा स्थापना के पश्चात यंत्र को इधर-उधर न रखें. प्रतिदिन मूलमन्त्र ॐ गं गणपतयै नम: से तर्पण करने से मनो वांछित फल की प्राप्ति होती है. धर्म ग्रंथों में इस संबंध में कई नियम बताए गए हैं, यदि इन नियमों के अनुसार भगवान श्रीगणेश यंत्र की स्थापना व पूजन प्रतिदिन करें व कुछ सावधानियों को ध्यान रखें तो श्रीगणेश यंत्र पूजन का मनोवांछित फल मिलता है.

गणेश यंत्र महत्व और लाभ | Benefits and Significance of Ganesh Yantra

यंत्र की पूजा, साधना की एक ऐसी विधि है, जिसका उल्लेख शास्त्रों में दिया गया है. यंत्र स्तोत्र का पाठ करने मात्र से इनकी आराधना हो जाती है साधक को आसन पर बैठकर दीपक जलाकर यज्ञ करना चाहिए इससे उसके सारे मनोरथ पूर्ण होंगे इसकी आराधना करने से साधक के शत्रुओं का शमन तथा कष्टों का निवारण होता है. यों तो गणेश यंत्र की उपासना सभी कार्यों में सफलता प्रदान करती है.

परंतु विशेष रूप से बुद्धि, शास्त्रार्थ और प्रतियोगिता में विजय प्राप्त करने, सर्वश्रेष्ठ, प्रभावी एवं उपयुक्त मानी गई है. असाध्य रोगों से छुटकारा पाने, संकट से उद्धार पाने और नवग्रहों के दोष से मुक्ति के लिए भी इस मंत्र की साधना की जा सकती है.  वैदिक एवं पौराणिक शास्त्रों में इनका वर्णन अनेक स्थलों पर मिलता है. इसका जप नित्य नियत संख्या में ही करना चाहिए जप का दशांश हवन, तर्पण करके ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए.

Posted in Basic Astrology, Dashas, Yantra | Tagged , , , , , | Leave a comment