विवाह और संतान-सुख में उपपद का महत्व

ज्योतिष में सामान्यत: विवाह सुख और संतान सुख का विचार सप्तम एवं पंचम भाव से किया जाता है, परंतु इसके साथ ही साथ विवाह एवं संतान के विचार के लिए उपपद को एक महत्वपूर्ण कारक माना जाता है. उपपद से दूसरे एवं सातवें घर एवं उनके स्वामियों का विवाह के संदर्भ में विचार किया जाता है. उपपद के अर्थ को सपष्ट करते हुए कहा गया है कि लग्न से द्वादश भाव का पद उपपद होता है. एक अन्य परिभाषा में कहा गया है कि लग्न से द्वितीय भाव का पद उपपद होता है. कुछ के अनुसार समलग्न में द्वितीय भाव और विषम लग्न में बारहवें भाव क अजो पद हो उसे उप पद कहा जाता है.

ज्योतिष रत्नाकर में कहा गया है कि उपपद के दूसरे स्थान सप्तम स्थान से दूसरी राशि तथा उपपद से सातवें भाव का स्वामी जिस राशि में हो उससे दूसरे राशि, उपपद से सप्तम की नवांश राशि से द्वितीय राशि और उपपद से सप्तम नवांश का स्वामी जिस राशि में हो उससे द्वितीय राशि के द्वारा स्त्री का विचार किया जाता है. यदि कुण्डली में उपपद स्थान पाप ग्रह की राशि में हो अथवा पाप ग्रहों से युक्त हो तो जातक सन्यास की ओर जा सकता है.

कुण्डली के दूसरे भाव घर में कोई ग्रह शुभ होकर स्थित हो व उसकी प्रधानता हो अथवा गुरु और चन्द्रमा कारकांश से सातवें घर में स्थित हो तो सुन्दर जीवनसाथी प्राप्त होता है. यदि द्वितीय भाव में कोई ग्रह अशुभ होकर स्थित हो तो एक से अधिक विवाह का संकेत मिलता है. कारकांश से सातवें भाव में बुध होने पर जीवनसाथी शिक्षित होता है. यदि चन्द्रमा कारकांश से सप्तम में हो तो विवाह विदेश में होनी की सशक्त संभावना बनती है.

द्वितीय भाव में अशुभ राशि स्थित होने पर अथवा इस पर किसी अशुभ ग्रह की दृष्टि होने पर जीवनसाथी के जीवन में संकट की आशंका बनी रहती है. शनि का कारकांश से सातवें घर में होना यह बताता है कि जीवनसाथी की उम्र अधिक होगी. राहु कारकांश से सातवें घर में होना दर्शाता है कि व्यक्ति का सम्पर्क उनसे हो सकता है जो जीवनसाथी को खो चुके हों और पुनर्विवाह की इच्छा रखते हों.

जैमिनी ज्योतिष में बताया गया है कि सूर्य अगर दूसरे घर में हो अथवा इस घर में सिंह राशि हो तो जीवनसाथी दीर्घायु होता है. इसी प्रकार दूसरे घर में आत्मकारक ग्रह हो या इस घर में बैठा ग्रह स्वराशि में हो तब भी जीवनसाथी की आयु लम्बी होती है. उपपद से दूसरे घर में बैठा ग्रह उच्च राशि में हो अथवा इस घर में मिथुन राशि हो तो एक से अधिक विवाह की संभावना रहती है. राहु एवं शनि की युति दूसरे घर में होने पर वैवाहिक जीवन में दूरियां एवं मतभेद होने की संभावना रहती है.

यदि पुरूष की कुण्डली में शुक्र और केतु उपपद से दूसरे घर में स्थित हो अथवा उनके बीच दृष्टि सम्बन्ध बन रहा हो तो उनके जीवन साथी को गर्भाशय से संबन्धित रोग होने की संभावना रहती है. बुध और केतु उपपद से दूसरे घर में होने पर अथवा उनके बीच दृष्टि सम्बन्ध होने पर जीवनसाथी को हड्डियों से सम्बन्धित रोग की आशंका बनती है. सूर्य, शनि और राहु उपपद से दूसरे घर में होने पर अथवा इनके बीच दृष्टि सम्बन्ध बनने पर जीवनसाथी को स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियों का सामना करना होता है.

उपपद से दूसरे घर में शनि और मंगल के बीच दृष्टि सम्बन्ध होने पर तथा दूसरे घर में मिथुन, मेष, कन्या या वृश्चिक राशि होने पर जीवनसाथी को कफ से सम्बन्धित गंभीर रोग होने की संभावना होती है. द्वितीय भाव में मंगल अथवा बुध की राशि हो और उस पर गुरू एवं शनि की दृष्टि हो तो जीवनसाथी को कान सम्बन्धी रोग सता सकते हैं. इसी प्रकार द्वितीय भाव में मंगल अथवा बुध की राशि हो तथा उस पर गुरू एवं राहु की दृष्टि हो तो जीवनसाथी को दांतों में तकलीफ हो सकती है. उपपद से दूसरे घर में कन्या या तुला राशि पर शनि और राहु की दृष्टि होने से जीवनसाथी को ड्रॉप्सी नामक रोग होने की आशंका रहती है. यह भी कहा गया है कि दूसरे घर में उपपद लग्न हो अथवा आत्मकारक तो वैवाहिक जीवन में मुश्किल हालातों का सामना करना होता है.

उपपद से संतान विचार | Upa pad and its association with Children

उपपद से सप्तम भाव, सप्तमभाव का नवांश और इनके स्वामीयों द्वारा संतान का विचार भी किया जाता है. यदि कुण्डली में उपपद सप्तम भाव या सप्तम भाव के नवांश और इन दोनों स्वामीयों से नवम स्थान पर बुध, शनि, शुक्र हों तो जातक को संतान सुख में बाधा या निसंतान होने का दुख झेलना पड़ सकता है. परंतु इसके विपरित यदि उक्त स्थानों पर से नवम में सूर्य, राहु और गुरू हों तो जातक की कई संताने होती हैं.

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तिथि क्या है और ज्योतिष में इसका महत्व क्यों है, जानिये.

ज्योतिष में तिथियों का एक महत्वपूर्ण स्थान है. हिन्दु धर्म में तिथियों के आधार पर मुहूर्त्त निकाले जाते हैं और उनके अनुसार विभिन्न कार्य किए जाते हैं. सभी कार्यों का मुहुर्त तिथियों के अनुसार बाँटा गया है.

प्रतिपदा तिथि | Pratipada Tithi

प्रतिपदा तिथि में गृह निर्माण, गृह प्रवेश, वास्तुकर्म, विवाह, यात्रा, प्रतिष्ठा, शान्तिक तथा पौष्टिक कार्य आदि सभी मंगल कार्य किए जाते हैं. कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा में चन्द्रमा को बली माना गया है और शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा में चन्द्रमा को निर्बल माना गया है. इसलिए शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा में विवाह, यात्रा, व्रत, प्रतिष्ठा, सीमन्त, चूडा़कर्म, वास्तुकर्म तथा गृहप्रवेश आदि कार्य नहीं करने चाहिए.

द्वित्तीया तिथि | Dwitya Tithi

विवाह मुहूर्त, यात्रा करना, आभूषण खरीदना, शिलान्यास, देश अथवा राज्य संबंधी कार्य, वास्तुकर्म, उपनयन आदि कार्य करना शुभ माना होता है परंतु इस तिथि में तेल लगाना वर्जित है.

तृतीया तिथि | Tritya Tithi

तृतीया तिथि में शिल्पकला अथवा शिल्प संबंधी अन्य कार्यों में, सीमन्तोनयन, चूडा़कर्म, अन्नप्राशन, गृह प्रवेश, विवाह, राज-संबंधी कार्य, उपनयन आदि शुभ कार्य सम्पन्न किए जा सकते हैं.

चतुर्थी तिथि | Chaturthi Tithi

सभी प्रकार के बिजली के कार्य, शत्रुओं का हटाने का कार्य, अग्नि संबंधी कार्य, शस्त्रों का प्रयोग करना आदि के लिए यह तिथि अच्छी मानी गई है. क्रूर प्रवृति के कार्यों के लिए यह तिथि अच्छी मानी गई है.

पंचमी तिथि | Panchami Tithi

पंचमी तिथि सभी प्रवृतियों के लिए यह तिथि उपयुक्त मानी गई है. इस तिथि में किसी को ऋण देना वर्जित माना गया है.

षष्ठी तिथि | Shashthi Tithi

षष्ठी तिथि में युद्ध में उपयोग में लाए जाने वाले शिल्प कार्यों का आरम्भ, वास्तुकर्म, गृहारम्भ, नवीन वस्त्र पहनने जैसे शुभ कार्य इस तिथि में किए जा सकते हैं. इस तिथि में तैलाभ्यंग, अभ्यंग, पितृकर्म, दातुन, आवागमन, काष्ठकर्म आदि कार्य वर्जित हैं.

सप्तमी तिथि | Saptami Tithi

विवाह मुहुर्त, संगीत संबंधी कार्य, आभूषणों का निर्माण और नवीन आभूषणों को धारण किया जा सकता है. यात्रा, वधु-प्रवेश, गृह-प्रवेश, राज्य संबंधी कार्य, वास्तुकर्म, चूडा़कर्म, अन्नप्राशन, उपनयन संस्कार, आदि सभी शुभ कार्य किए जा सकते हैं.

अष्टमी तिथि | Ashtami Tithi

इस तिथि में लेखन कार्य, युद्ध में उपयोग आने वाले कार्य, वास्तुकार्य, शिल्प संबंधी कार्य, रत्नों से संबंधित कार्य, आमोद-प्रमोद से जुडे़ कार्य, अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाले कार्यों का आरम्भ इस तिथि में किया जा सकता है.

नवमी तिथि | Navami Tithi

नवमी तिथि में शिकार करने का आरम्भ करना, झगडा़ करना, जुआ खेलना, शस्त्र निर्माण करना, मद्यपान तथा निर्माण कार्य तथा सभी प्रकार के क्रूर कर्म इस तिथि में किए जाते हैं.

दशमी तिथि | Dashmi Tithi

दशमी तिथि में राजकार्य अर्थात वर्तमान समय में सरकार से संबंधी कार्यों का आरम्भ किया जा सकता है. हाथी, घोड़ों से संबंधित कार्य, विवाह, संगीत, वस्त्र, आभूषण, यात्रा आदि इस तिथि में की जा सकती है. गृह-प्रवेश, वधु-प्रवेश, शिल्प, अन्न प्राशन, चूडा़कर्म, उपनयन संस्कार आदि कार्य इस तिथि में किए जा सकते हैं.

एकादशी तिथि | Ekadashi Tithi

एकादशी तिथि में व्रत, सभी प्रकार के धार्मिक कार्य, देवताओं का उत्सव, सभी प्रकार के उद्यापन, वास्तुकर्म, युद्ध से जुडे़ कर्म, शिल्प, यज्ञोपवीत, गृह आरम्भ करना और यात्रा संबंधी कार्य किए जा सकते हैं.

द्वादशी तिथि | Dwadashi Tithi

इस तिथि में विवाह, तथा अन्य शुभ कर्म किए जा सकते हैं. इस तिथि में तैलमर्दन, नए घर का निर्माण करना तथा नए घर में प्रवेश तथा यात्रा का त्याग करना चाहिए.

शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि | Shukla Paksha – Tryodashi Tithi

संग्राम से जुडे़ कार्य, सेना के उपयोगी अस्त्र-शस्त्र, ध्वज, पताका के निर्माण संबंधी कार्य, राज-संबंधी कार्य, वास्तु कार्य, संगीत विद्या से जुडे़ काम इस दिन किए जा सकते हैं. इस दिन यात्रा, गृह प्रवेश, नवीन वस्त्राभूषण तथा यज्ञोपवीत जैसे शुभ कार्यों का त्याग करना चाहिए.

चतुर्दशी तिथि | Chaturdashi Tithi

चतुर्दशी तिथि में सभी प्रकार के क्रूर तथा उग्र कर्म किए जा सकते हैं. शस्त्र निर्माण इत्यादि का प्रयोग किया जा सकता है. इस तिथि में यात्रा करना वर्जित है. चतुर्थी तिथि में किए जाने वाले कार्य इस तिथि में किए जा सकते हैं.

पूर्णमासी | Purnmasi

पूर्णमासी जिसे पूर्णिमा भी कहते हैं, इस तिथि में शिल्प, आभूषणों से संबंधित कार्य किए जा सकते हैं. संग्राम, विवाह, यज्ञ, जलाशय, यात्रा, शांति तथा पोषण करने वाले सभी मंगल कार्य किए जा सकते हैं.

अमावस्या | Amavasya

इस तिथि में पितृकर्म मुख्य रुप से किए जाते हैं. महादान तथा उग्र कर्म किए जा सकते हैं. इस तिथि में शुभ कर्म तथा स्त्री का संग नहीं करना चाहिए.

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श्री यंत्र प्रतिष्ठापन और पूजा की आसान विधि

श्री यंत्र देवी लक्ष्मी का यन्त्र होता है यह कष्टनाशक होने के कारण यह सिद्धिदायक और सौभाग्यदायक माना जाता है. लक्ष्मी कृपा हेतु श्रीयंत्र साधना के बारे में बताया जाता है. श्रीयंत्र की रचना पांच त्रिकोण के नीचे के भाग के ऊपर चार त्रिकोण के संयोजन से जिसमें 43 त्रिकोण द्वारा होती है. इन त्रिकोणों को दो कमल घेरे हुए होते हैं, पहला कमल अष्टदल का होता है और दूसरा बाहरी कमल षोडशदल का होता है.

इन दो कमलों के बाहर तीन वृत हैं इसके बाहर तीन चैरस होते हैं जिन्हें भूपुर कहते हैं.  इस यंत्र को तांबे, चांदी या सोने पर बनाया जा सकता है श्रीयंत्र पूजा विधि शुक्रवार या प्रतिदिन की जा सकती है. श्रीयंत्र पूजा से पूर्व कुछ बातों को ध्यान में रखना आवश्यक होता है. इनकी पूजा में स्वच्छ्ता का पूरा ध्यान रखना चाहिए, प्राण-प्रतिष्ठित द्वारा श्रीयंत्र की ही पूजा कि जानी चाहिए.

लक्ष्मी का स्मरण कर सुख, सौभाग्य और समृद्धि की कामना की पूर्ति के लिए श्रीयंत्र पूजा की जाती है. श्री यंत्र की पूजा नवरात्रि में बहुत ही शुभ फलदायी मानी जाती है. व्यावसाय में सफलता, सुखी जीवन, आर्थिक मजबूती एवं पारिवारिक सुख-समृद्धि की वृद्धि होती है.

श्री यंत्र पूजन विधि | Sri Yantra Puja Vidhi

प्रात: काला स्नान इत्यादि से निवृत्त होकर श्रीयंत्र पूजा की तैयारी करनी चाहिए. श्रीयंत्र को लाल कपड़े पर स्थापित करके इसे गंगाजल और दूध द्वारा पूजना चाहिए. श्री यंत्र को पूजा स्थान या व्यापारिक स्थान तथा अलमारी में शुद्ध स्थान पर रखा जा सकता है. श्रीयंत्र का पंचामृत, दुग्ध, दही, शहद, घी और गंगाजल से स्नान करा कराएं.

तत्पश्चात लाल चंदन, लाल फूल, अबीर, रोली, अक्षत से उसकी पूजा करें फिर श्री यंत्र पर लाल चुनरी चढ़ाएं तथा धूप, दीप से श्री यंत्र की आरती उताएं. लक्ष्मी मंत्र, श्रीसूक्त, दुर्गा सप्तशती का पाठ करें तथा बोग लगाएं. श्रद्धापूर्ण एवं भक्ति भाव द्वारा पूजा संपन्न करें और श्री यंत्र की स्थापना करें. स्थापना होने पर नियमित रुप से श्री यंत्र के समक्ष पूजा पाठ किया करें.

श्री यंत्र मंत्र | Shri Yantra Mantra

श्रीयंत्र के समक्ष “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं नम:” एवं “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्री ह्रीं श्री ॐ महालक्ष्म्यै नम:”मंत्रों का जाप करना चाहिए. श्रीयंत्र को श्रेष्ठ माना गया है इनकी अधिष्ठात्री देवी मां लक्ष्मी जी हैं. श्रीयंत्र को सभी यंत्रों में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है.

श्रीयंत्र का महत्व | Significance of Shri Yantra

मंत्रों से सिद्ध श्रीयंत्र असीमित धन-संपत्ति प्रदान करता है. श्रीयंत्र लक्ष्मी को आकर्षित करने वाला शक्तिशाली यंत्र है. श्री यंत्र को दक्षिण भारत के विश्वप्रसिद्ध मंदिर तिरूपति बालाजी भी स्थापित किया गया है. श्रीयंत्र के माध्यम से आर्थिक स्थिति मजबूत होती है. पूजा पाठ एवं नियमित मंत्र साधना द्वारा श्रीयंत्र को क्रियाशील बनाया जा सकता है, श्रीयंत्र को ज्यादा शक्तिशाली बनाने के लिए नवरात्रों, शिवरात्रि, होली, दीवाली जैसे समय में मंत्रों द्वारा इसे अभिमंत्रित एवं उर्जावान बनाया जा सकता है.

महालक्ष्मी की कृपा प्राप्ति के लिए श्रीयंत्र की पूजा प्रभावशाली होती है. इस यंत्र की पूजा करने से समृद्धि एवं ऎश्वर्य की प्राप्ति होती है. श्रीयंत्र चांदी, सोना या तांबे पर बनवाना उत्तम होता है. इस यंत्र को भोजपत्र पर भी बनवा सकता है. शुभ मुहूर्त में यंत्र का निर्माण गुरू या रवि पुष्य योग या नवरात्र, दीपावली में किया जाए तो शुभ फलदायक होता है. श्रीयंत्र को घर, ऑफिस में बने पूजा स्थान पर रख सकते हैं तथा प्रतिदिन इसके सम्मुख धूप, दीप एवं मंत्र जाप करने से समृद्धि, वैभव, सौभाग्य की प्राप्ति होती है.

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ज्योतिष में चाप योग क्या होता है

लग्नेश के उच्च राशिस्थ होने के साथ-साथ दशमेश और चतुर्थेश के मध्य विनिमय परिवर्तन योग होने पर निर्मित होता है. चाप योग की परिभाषाओं में कुछ भिन्नता देखने को मिलती है. यदि कुण्डली में चतुर्थ और दशम स्थानों के स्वामी एक दूसरे के स्थान में हों अर्थात चतुर्थेश दशम में और दशमेश चतुर्थे में तथा लग्नेश अपनी उच्च राशि में स्थित हो तो चाप योग की संरचना होती है.

“बन्धु कर्म गृहाधीशैरन्यो न्यक्षेत्रमाश्रितै:।
लग्नेशे स्वोच्चराशिस्थे चापयोग इतीरित:।।
नृप: स वीरो विख्यातो सेनाधिक्यो धनाधिप:
कुरूते कार्मुके जातो द्वादशाब्दात् परं मुनि: ।।”

इसके अतिरिक्त जन्म कुण्डली में यदि धनु लग्न में जन्म हुआ हो और उपयुक्त ग्रह स्थिति हो तो चाप योग का निर्माण होता है. एक दूसरे प्रकार से चाप योग निर्माण देखा गया है जिसके अनुसार कुंभ लग्न के जन्मांग में शुक्र के लग्नस्थ होने अथवा मंगल के तृतीय भावस्थ होने तथा गुरू के लाभ भाव अथवा धन भव में स्थित होने पर बनता है.

मानसागरी अनुसार:-

“शुक्रे घटे कुजे मेषे स्वस्थो देवपुरोहित:।
तदा राजा भवेन्नूनं चाप: सौध्यति दिड़्मुख:।।”

कुण्डली में यदि शुक्र कुम्भ में स्थित हो, मंगल मेष राशि में स्थित हो तथा गुरू स्वस्थान धनु या मीन में स्थित हो तो चाप योग की रचना संभव हो पाती है.

ज्योतिषतत्वम अनुसार :-

“कुम्भे कवौ तीव्रविलोचनेजे स्वरर्चितांघ्रौ स्वगृहं प्रयाते।
चापाभिधानं कथयन्ति योग महानुभावा: ||”

इस परिभाष के अनुसार कुम्भ में शुक्र, मेष में मंगल और गुरू के स्वराशि में स्थित हों तो चाप योग का निर्माण होता है. इन परिभाषाओं के द्वारा इस तथ्य का बोध होता है कि कुंभ राशिगत शुक्र के साथ मेष राशिगत मंगल और मीन अथवा धनु राशिगत गुरू के होने पर चाप योग की रचना होती है, क्योंकि कुंभ लग्न के जन्मांग में शुक्र योगकारक होता है और चतुर्थेश तथा नवमेश होने के कारण शुक्र का प्रभाव उत्तम माना जाता है. इसी प्रकार चाप योग में गुरू का स्वराशि का होन अभी आवश्यक होता है क्योंकि कुम्भ लग्न के जातक के लिए बृहस्पति धनेश एवं लाभेश होकर धनकारक बनता है.

चाप योग का फल | Results of Chaap yoga

चाप योग के प्रभाव स्वरुप यह जिस भी कुण्डली में बनता है वह जातक सेनानी, वीर, साहसी और विजेता बनता है. ऎसे जातक का भाग्योदय 19वें वर्ष के पश्चात होता हुआ देखा जा सकता है. कुछ के अनुसार आयु के 18वें वर्ष के उपरांत जातक को उच्च पदों की प्राप्ति होती है. ज्योतिष शास्त्रों में चाप योग की परिभाषा को इस प्रकार बतया गया है कि यदि लग्नेश उच्च हो और चतुर्थेश दशमस्थ हो एवं दशमेश चतुर्थस्थ हो तो चाप योग का निर्माण देखा जाता है. जिसमें जातक को राज्य से सम्मान एवं पद प्राप्ति होती है ओर उसके बल में वृद्धि होती है.

चाप योग की परिभाषाओं के अनुसार और इसके प्रभावों को देखते हुए कहा जा सकता है कि चतुर्थेश और दशमेश के मध्य परिवर्तन हो और लग्नेश उच्च राशिस्थ एवं बली हो तो व्यक्ति को राज से प्रतिष्ठा प्राप्ति होती है, यदि यह योग बली रुप में स्थित हो तो जातक को जीवन में कुछ अच्छे अवसर प्राप्त हो सकते हैं. जातक को कोषाध्यक्ष या मंत्री पद भी मिल सकता है. ऎसा जातक उत्तम अधिकार पाने वाला बनता है, परंतु यदि योग निर्बल बन रहा हो तो व्यक्ति को छोटे पदों की प्राप्ति होती है.

ज्योतिष ज्ञाताओं के अनुसार चाप योग का वास्तविक स्वरुप इस प्रकार देखा जा सकता है कि अधिकतर जातक इस योग के प्रभाव से बैंक जैसे क्षेत्रों अथवा वित्त विभाग में कार्यरत देखे जा सकते हैं.

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मंत्र जाप से बदल सकता है आपका जीवन, ऐसे

प्राचीन धर्म ग्रन्थों में मंत्र जाप के महत्व को बहुत विस्तार पूर्वक बताया गया है. भारतीय संस्कृति में मंत्र जाप की परंपरा पुरातन काल से ही चली आ रही है. प्राचीन वेद ग्रंथों में सहस्त्रों मंत्र प्राप्त होते हैं जो उद्देश्य पूर्ति का उल्लेख करते हैं. मंत्र शक्ति का आधार हमारी आस्था में निहीत है. मंत्र के जाप द्वारा आत्मा, देह और समस्त वातावरण शुद्ध होता है.यह छोटे से मंत्र अपने में असीम शकित का संचारण करने वाले होते हैं. इन मंत्र जापों के द्वारा ही व्यक्ति समस्त कठिनाईयों और परेशानियों से मुक्ति प्राप्त कर लेने में सक्षम हो पाता है. प्रभु के स्मरण में मंत्र अपना प्रभाव इस प्रकार करते हैं कि ईश्वर स्वयं हमारे कष्टों को दूर करने के लिए तत्पर हो जाते हैं.

मंत्र शक्ति प्राण उर्जा को जागृत करने का प्रयास करती है. साधु और योगी जन इन्हीं मंत्रों के उच्चारण द्वारा प्रभु को प्राप्त करने में सक्षम हो पाते हैं. मंत्र गूढ़ अर्थों का स्वरुप होते हैं संतों ने मंत्र शक्ति काअनुभव करते हुए इन्हें रचा जैसे मार्कण्डेय ऋषि जी ने महामृत्युंजय मंत्र को सिद्ध किया और विश्वामित्र जी ने गायत्री मंत्र को रचा इसी प्रकार तुलसीदास जी एवं कालिदास जी ने कई मंत्रों की रचना की. जाप के समय माला के द्वारा जाप करने क अभी विचार है, मंत्रों में असीम शक्ति होती है,  मंत्र जाप में प्रयोज्य वस्तुओं का ध्यान अवश्य रखना चाहिए  आसन, माला, वस्त्र, स्थान, समय और मंत्र जाप संख्या इत्यादि का पालन करना चाहिए. मंत्र साधना यदि विधिवत की गई हो तो इष्‍ट देवता की कृपा अवश्य प्राप्त होती है. मंत्र के प्रति पूर्ण आस्था होनी चाहिए,

मंत्रों में शाबर मंत्र,  वैदिक मंत्र और तांत्रिक मंत्र आते हैं.  मन, वचन अथवा उपाशु जप द्वारा मंत्रों को किया जाता है. स्पष्‍ट मंत्रों को उच्चारण करते हुए वाचिक जप कहलाता है, धीमी गति में जिसका श्रवण दूसरा नहीं कर पाता वह उपांशु जप कहलाता है और मानस जप जिसमें मंत्र का मन ही मन में चिंतन होता है. मंत्र  सिद्धि के लिए आवश्यक है कि मंत्र को गुप्त रखना चाहिए, ग्रहण के समय किया गया जप शीघ्र लाभदायक होता है. ग्रहण काल में जप करने से कई सौ गुना अधिक फल मिलता है।

मंत्र जाप करते समय सावधानियां | Precaution to take while chanting mantras

मंत्र जाप करते समय कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक होता है. मंत्र पाठ करते समय मंत्रों का उच्चारण सही तरह से करना आवश्यक होता है तभी हमें इन मंत्रों का पूर्ण लाभ प्राप्त हो सकता है. मंत्रोच्चारण से मन शांत होता है, मंत्र जपने के लिए मन में दृढ विश्वास जरूर होना चाहिए, तभी मंत्रों के प्रभाव से हम परिचित हो सकते हैं. वेदों में देवों के पूजन हेतु मंत्र उपासना को बताया गया है. मंत्र जप द्वारा शक्ति, शांति, लंबी आयु, यश प्राप्त होता है.

मंत्र जाप करने से पूर्व साधक को अपन मन एवं तन की स्वच्छता का पूर्ण ध्यान रखना चाहिए. मन को एकाग्रचित करते हुए प्रभु का स्मरण करन अचाहिए तथा ॐ का उच्चारण करना चाहिए.  जाप करने वाले व्यक्ति को आसन पर बैठकर ही जप साधना करनी चाहिए. आसन ऊन का,  रेशम का,  सूत, कुशा निर्मित या मृगचर्म का इत्यादि का बना हुआ होना चाहिए. आसन का उपयोग इसलिए आवश्यक माना जाता है क्योंकि उस समय जो शक्ति हमारे भीतर संचालित होती है वह आसन ना होने से पृथवी में समाहित होकर हममें उक्त उर्जा से वंचित कर देती है.

साधक मंत्र का जाप श्रद्धा और भक्तिभाव से करे तो पूर्ण लाभ कि प्राप्ति होती है. जप साधना को सिद्धपीठ,  नदी पर्वत, पवित्र जंगल, एकांत स्थल, जल में, मंदिर में या घर पर कहीं भी किया जा सकता है. मंत्र जाप करते समय दीपक को प्रज्जवलित करके उसके समक्ष मंत्र जाप करना शुभ फलों को प्रदान करने वाला होता है.

मंत्र साधना का विधान शिव संकल्प, आस्था व शुचिता, दृढ़इच्छाशक्ति, आसन, माला एकाग्रता, जप, हवन एवं धैर्य से ही पूर्ण हो पाता है.

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ऊं नम: शिवाय मंत्र जाप की सही विधि (सही फल प्राप्ति के लिये)

“ॐ नमः शिवाय” मंत्र भगवान शिव की महिमा एवं उनके स्वरुप को दर्शाता है. ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप भक्त के हृदय की गहराइयों में पहुंचकर उसका साक्षात्कार शिव से कराता है. यह मंत्र भक्तों का सरल लोकप्रिय मंत्र है यह मंत्र पाँच अक्षरों का प्रभुत्व दर्शाता है अतः इसे पंचाक्षर स्तोत्र कहते हैं.  “ॐ” के प्रयोग से यह मंत्र छः अक्षर का बनता है. ॐ इस एकाक्षर मंत्र में शिव प्रतिष्ठित हैं. यह मंत्र में पंचब्रह्मरूपधारी भगवान शिव इसमें वाच्य और वाचक भाव से विराजमान हैं.

यह मंत्र शिव तथ्य है जो सर्वज्ञ, परिपूर्ण और स्वभावतः निर्मल है. शिव के इस निर्मल वाक्य पच्चाक्षर मंत्र का प्रणयन जीवन को पूर्ण करता है. इस विमल षड़क्षर मंत्र का सर्वज्ञ है, इसके समान अन्य कोई नहीं है. हृदय में ‘ॐ नमः शिवाय’ यह षड़क्षर मंत्र समाहित होने पर संपूर्ण शास्त्र ज्ञान एवं शुभ कृत्यों का अनुष्ठान स्वयं ही प्राप्त हो जाता है. यह मंत्र जिसके मन में विद्यमान हो जाए तो उसका जीवन मानो सफल हो जाता है.

जब सृष्टि का विस्तार संभव न हुआ तब शिव अ‌र्द्धनारीश्वर रूप में प्रकट हुए और उन्होंने अपनी देह के अ‌र्द्धभागसे शक्ति को अलग कर दिया यह शक्ति ही प्रकृति बनी जिन्हें निर्विकार स्वरुप ज्ञान रुप में जानते हैं.

शिव पुराण में यह उल्लेखित है कि प्राणियों के जीवन कल्याण हेतु भगवान शिव ने ‘’ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का अनुमोदन किया यह षड़क्षर मंत्र समस्त ज्ञान का बीज है. अत्यंत सामान्य एवं सूक्ष्म होने पर भी यह मंत्र महान अर्थ से परिपूर्ण है.

सृष्टि की रचना के लिए शिव दो भागों में विभक्त हुए. शिव पांच तरह के कार्य करते हैं जिसमें सृष्टि निर्माण, सृष्टि पालन, सृष्टि नाश, परिवर्तन एवं मोक्ष प्रदान करना. सृष्टि संचालन के लिए शिव ने अनेक रुप धारण किए हुए हैं. इसी प्रकार उनके इस मंत्र में उन्हीं का चराचरभाव समाहित दिखाई देता है. शिव और मंत्र का भाव अनादिकाल से रहा है. शिवपुराण के अनुसार, भगवान शंकर का सर्वाधिक प्रभावी एवं सरल मंत्र पंचाक्षर-नम: शिवाय है .यह पंचाक्षर मंत्र सभी के लिए फलदायी माना गया है. इस मंत्र के अक्षरों में पंचानन महादेव की समस्त शक्तियां सन्निहित हैं. इसके जाप से देह की शुद्धि होती है.

भगवान शिव जीव को सांसारिक दोषों से मुक्त करते हैं और उसे मोक्ष का मार्ग दिखलाते हैं.  अतः जीव को संसार सागर से उद्धार करने वाले स्वामी अनादि सर्वज्ञ परिपूर्ण सदाशिव के इस मंत्र जाप से वह हमारे भीतर विद्यामान रहते हैं. आदि और अंत से रहित हैं, निर्मल, सर्वज्ञ एवं परिपूर्ण शिव हैं. अपने इस मंत्र द्वारा सृष्टि की रचना में सौंदर्यबोध को जन्म देने में सहायक हैं. आदि गुरू शंकराचार्य ने पंचाक्षर मंत्र के प्रत्येक अक्षर की महिमा का प्रतिपादन करने के लिए श्रीशिव पंचाक्षर स्तोत्र का निर्माण किया था. यह पच्चाक्षर मंत्र शिवस्वरूप होने के कारण सिद्धि प्रदान करने वाला माना गया है.

इस मंत्र में छहों अंगों सहित संपूर्ण वेद और शास्त्र विद्यमान हैं, इसके समान दूसरा कोई मंत्र नहीं है. यह मंत्र उसी प्रकार भिन्न है, जैसे वृत्ति से सूत्र यदि भगवान भोलेनाथ नहीं होते तो यह जगत अंधकारमय हो जाए. जीवात्मा अज्ञानी हो जाए. यह प्रकाश प्रदान र्ने वाले हैं तथा इनके मंत्र जाप द्वारा सभी बंधन छूट जाते हैं और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होने लगता है, शिव बिना प्राणियों की सिद्धि नहीं है. भगवान शिव को प्रसन्न करने के अत्यंत सरल है. इस मंत्र का जाप प्रतिदिन रुद्राक्ष की माला से जप करने से भगवान आशुतोष समस्त कामनाओं को पूर्ण करते हैं. भगवान शंकर का पंचाक्षर मंत्र – ॐ नमः शिवाय मंत्र  अमोघ फलदायी है,

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सिंहासन योग अगर आपकी कुंडली में है तो यूं बदलेगी आपकी ज़िन्दगी

दशमेश के केन्द्र, त्रिकोण, अथवा धन भाव में स्थित होने से निर्मित होता है सिंहासन योग. जन्म कुण्डली में दशम भावाधीश केन्द्र, त्रिकोण अथवा द्वितीय इनमें से किसी एक स्थान पर भी स्थित हो तो ऎसा जातक उच्च स्थान पाता है. वह राज सिंहासन पर सुशोभित होने वाला राजा समान होता है, उसकी कीर्ति सभी ओर फैलती है तथा उसकी सेना हाथी इत्यादि सदैव परिपूर्ण रहती है.

दशमभवननाथे केन्द्रकोणे धनस्थे ।
वनिपतिबलयाने शस्तसिंहासनेषु ।।
स भवति नरनाथो विश्वविख्यात कीर्ति।
मर्दगलितकपोलै: सद् गजै: सेव्यमान:

दशमेश यदि केन्द्र, त्रिकोण या धन भाव में से किसी में भी स्थित होने पर जातक समृद्धशाली, यशस्वी और कीर्तिवान बन सकता है. व्यक्ति को जीवन में उच्च पद की प्राप्ति होती है तथा सौभाग्य में वृद्धि पाता है. दशमेश की शुभ स्थिति होने पर कर्म स्थान बल पाता है.

द्वितीय प्रकार का सिंहासन योग | Second type of Sinhasan Yoga

सातों ग्रहों के द्वितीय भाव तथा त्रिक भावों में स्थित होने से यह बनता है. द्वितीय, अष्टम, षष्ठ और व्यय में सब ग्रह हों तो व्यक्ति की कुण्डली में सिंहासन योग का निर्माण होता है.

आकाशवासै: सकलैर्निधाननिमीलनाराह्यवसानयातै:।
वदन्ति सिंहासन नामयोगं सिंहासनं तत्र विशेन्नृपस्य।।

ज्योतिष में सिंहासन योग का निर्माण हो तो शुभ प्रभाव जातक को अच्छी क्षमता, वाक कुशलता, संचार कुशलता, नेतृत्व करने की क्षमता, मान, सम्मान, प्रतिष्ठा देने वाला होता है. अधिकतर जातक इस योग से मिलने वाले शुभ फलों को प्राप्त करते हैं यह जातक के जीवन को प्रभावशाली स्वरुप प्रदान करने में सहायक है. इस योग के द्वारा प्रदान होने वाली विशेषताएं कुछ विशेष जातकों में ही देखने को मिलती हैं. कुंडली में इस योग का निर्माण निश्चित करने के लिए कुछ अन्य तथ्यों के विषय में विचार कर लेना भी आवश्यक है. किसी कुंडली में किसी भी शुभ योग के बनने के लिए यह आवश्यक है कि उस योग का निर्माण करने वाले सभी ग्रह कुंडली में शुभ रूप से काम कर रहे हों क्योंकि अशुभ ग्रह शुभ योगों का निर्माण नहीं करते अपितु अशुभ योगों अथवा दोषों का निर्माण करते हैं.

तृतीय प्रकार का सिंहासन योग | Third type of Sinhasan Yoga

सातों ग्रहों के वृश्चिक, वृष, कन्या और मीन का राशिगत होने से या मिथुन, धनु और कुंभ राशिगत होने से इस योग की रचना होती है.
विश्वे खगा अलिवृषेत्थसिकन्यकासु ।
यद्धा नृयुग्महरि कुम्भहयेषवशेषा:।

यदि कुण्डली में वृश्चिक, वृष, मीन और कन्या इन राशियों में समस्त ग्रह हों अथवा मिथुन, सिंह, कुंभ और धनु राशियों में सभी ग्रह हों तो इस सिंहासन योग का निर्माण देखा जाता है. सिंहासन योग एक अच्छा योग मान अजाता है जो कुण्डली को बल प्रदान करने वाला होता है. इस योग में उत्पन्न जातक राजा के समान सम्मान और पद पाने वाला होता है उसे वाहनों का सुख प्राप्त होता है, इस प्रकार सिंहासन योग का स्वरुप अनेक प्रकार से देखा जा सकता है उसके

कुंडली में योग का निर्माण होने पर इस योग से संबंधित शुभ फलों में ग्रहों के अस्त हो जाने के कारण कमी आ सकती है जिससे इस योग की फल प्रदान करने की क्षमता प्रभावित होती है. कुंडली के किसी बलहीन घर में बनने वाला योग भी अपेक्षाकृत कम शुभ फल प्रदान करेगा तथा किसी कुंडली में अशुभ ग्रह का प्रभाव होने के कारण भी इस योग का शुभ फल कम हो जाता है. योग के किसी कुंडली में बनने तथा इसके शुभ फलों से संबंधित विषयों पर विचार करने से पूर्व इस योग के निर्माण तथा फलादेश से संबंधित सभी महत्वपूर्ण तथ्यों पर भली भांति विचार कर लेना आवश्यक होता है.

कुण्डली में बनने वाले सिंहासन योग के लाभ

कुण्डली में बनने वाला सिंहासन योग मुख्य तीन प्रकार से बनता है, जिसका वर्णन ऊपर दिया गया है. अब इस योग की महत्ता इस बात पर निर्भर होती है की ये योग कब व्यक्ति को फल देगा. व्यक्ति को फल की प्राप्ति उन ग्रहों के समय पर मिलती है जिन के आधार पर इस योग का निर्माण होता है. अगर जातक को दशा उन ग्रहों एवं भावों से संबंधित मिलती है तो व्यक्ति को इस योग का फल मिलता है. आईये जानते हैं की सिंहासन योग का लाभ –

  • जिस जातक की कुण्डली में सिंहासन योग बनता है उसे अपने परिश्रम द्वारा कार्यक्षेत्र में बहुत सम्मान मिलता है.
  • व्यक्ति अपने काम के प्रति जिम्मेदार होता है और उसमें मेहनत करने की योग्यता भी होती है.
  • जातक अपने परिवार के भाग्य का निर्माता भी बनता है. अपने कर्म से वो परिवार को भी सम्मानित स्थान दिलाता है.
  • आर्थिक क्षेत्र में उसे बहुत अधिक परेशानियां नहीं उठानी पड़ती हैं.
  • जातक में रचनात्मकता होती है पर सही मार्गदर्शन मिलने पर ही वह बाहर आती है.
  • मित्रों के साथ मिलकर रहने वाला और हर परिस्थिति में साथ निभाने वाला होता है.
  • शिक्षा के क्षेत्र में आगे रहता है.
  • व्यक्ति बहुत अधिक परिवर्तन पसंद नही होता है.
  • जातक बौद्धिकता के बल पर काम करने में भी कुशल होता है.
  • अच्छा वक्ता होता है और सलाहकार भी बन सकता है.
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    कुण्डली के बारह भावों में मुंथा

    वर्ष कुण्डली में मुंथा का अत्यधिक उपयोग किया जाता है. जन्म कुण्डली में मुन्था सदैव लग्न में स्थित रहती है और प्रत्येक वर्ष मुंथा एक राशि आगे बढ़ जाती है. मुंथा नवग्रहों के समान ही महत्व रखती है. मुंथा  विचार द्वारा कुण्डली के अनेक प्रभावों का वर्णन किया जा सकता है. मुथा गणना को वर्ष कुण्डली में करके जातक के जीवन में घटने वाली घटनाओं को बताया जा सकता है.

    वर्षफल तभी शुभ होगा जब मुंथेश उच्च युक्त या स्वराशि से युक्त हो. मुन्थेश शुभ ग्रहों से युक्त या उनसे प्रभावित है तो परिणाम अच्छे प्राप्त हो सकते हैं. 2, 9 10, 11 भाव में मुंथा होने पर आर्थिक पक्ष मजबूत होता है.  भाव 4, 6, 8, 12  और सप्तम भाव में मुन्था शुभ नहीं मानी जाती, इस प्रकार यदि मुन्था षष्ठेश, अष्टमेश अथवा द्वादशेश युक्त हो तो शुभ परिणाम प्रदान करने वाली होती है.

    बारह भावों में मुंथा का प्रभाव | Effect of Muntha on twelve house of a kundali

    मुंथा शुभ स्थिति तथा शुभ प्रभाव से युक्त होने पर जिस भाव में स्थित हो उसे बल प्रदान करने वाली बनती है. मुंथा सामान्यत: कुण्डली के बारह भावों अलग-अलग प्रभाव उत्पन्न करने वाली होती है. परंतु इसके यह प्रभाव ग्रहों के योग एवं प्रभाव से बदल सकते हैं.

    प्रथम भाव (लग्न) | Muntha in the first house

    प्रथम भाव में अर्थात लग्न में मुंथा स्थित होने पर शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है. उच्च पद एवं व्यवसाय में वृद्धि प्राप्त होती है. नौकरी में उच्च अधिकारियों का सहयोग मिलता है, आर्थिक लाभ और उत्तम स्वाथ्य की प्राप्ति होती है.

    द्वितीय भाव | Muntha in the second house

    दूसरे भाव में मुंथा होने पर आयु में वृद्धि होती है, आर्थिक संपन्नता एवं खुशहाली प्राप्त होती है. समृद्धि एवं भोग विलास के साधन भी प्राप्त होते हैं.

    तृतीय भाव | Muntha in the third house

    तीसरे भाव में मुंथा हो तो विजय प्राप्त होती है, भाई बंधुओं द्वारा सहायता मिलती है और आनंद की अनुभूति प्राप्त होती है. धार्मिक यात्राएं करने के अवसर मिलते हैं.

    चतुर्थ भाव | Muntha in the fourth house

    चौथे भाव में मुंथा होने से रोग एवं अस्वस्थता मिलती है, शाररिक सुख में कमी आती है संबंधों में तनाव एवं गलतफहमी उत्पन्न होने लगती है. कार्यों में अनेक प्रकार की बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है.

    पंचम भाव | Muntha in the fifth house

    पांचवें भाव में मुंथा होने पर संतान सुख की प्राप्ति होती है, धर्म क्रम के कार्यों को करने अवसर प्राप्त होते हैं. सरकार से लाभ एवं सम्मान की प्राप्ति होती है. विद्या का लाभ एवं नए कार्यों से लाभ मिलता है.

    षष्ठम भाव | Muntha in the sixth house

    छठे भाव में मुंथा चोरी का भय एवं शाररिक कष्ट देती है. शत्रु भय और मानसिक चिंताओं का कारण बनती है. कर्ज , दुर्घटना या कोर्ट कचहरी का भय प्रदान करती है.

    सप्तम भाव | Muntha in the seventh house

    सातवें भाव में मुंथा शुभ नहीं होती, यह भार्या से गलतफहमी देती है, बन्धुओं से कलह-क्लेश उत्पन्न कराने वाली होती है. साझेदारी में नुकसान देती है. असफलता, रोग तथा मानसिक चिंता दे सकती है.

    अष्टम भाव | Muntha in the eighth house

    आठवें भाव में मुंथा होने से दुर्घटनाओं का भय रहता है, निराशा, वाद-विवाद, और मुकद्दमेंबाजी का कारण बन सकती है. रोगों का भय, अपव्यय प्रदान करती है.

    नवम भाव | Muntha in the ninth house

    नौवें भाव में मुंथा शुभ फल प्रदान करने वाली होती है. जातक के भाग्य में वृद्धि करती है. आर्थिक लाभ और शुभ तत्वों को प्रदान करने वाली होती है. नौकरी में उन्नति, व्यापार में लाभ और पारिवारिक सुख को प्रदान करती है.

    दशम भाव | Muntha in the tenth house

    दसवें भाव में मुंथा होने पर उच्च पद की प्राप्ति होती है. मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. नाम एवं प्रतिष्ठा प्राप्त होती है.

    एकादश भाव | Mutha in the eleventh house

    ग्यारहवें भाव में मुंथा हो तो पारिवारिक सुख की प्राप्ति होती है, मित्रों द्वारा सहायत अप्राप्त होती है, राजनीति में सफलता मिलती है. इच्छापूर्ति, सुख एवं व्यापार कार्यो से लाभ प्राप्त होती है.

    द्वादश भाव | Muntha in the twelfth house

    बारहवें भाव में मुंथा होने से रोग , दुर्घटना होने का डर बना रहता है. कारावास एवं कानूनी कार्यवाही का भय बना रह सकता है. हानि, धन का अपव्यय होता है.

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    शुक्र अगर वक्री हो जाये तो क्या होगा? देखिये

    शुक्र ग्रह मान सम्मान, सुख और वैभव, दांपत्य सुख एवं भोग विलासिता के प्रतीक माने जाते हैं. साधारणत: यदि यह पाप ग्रह से युक्त या दृष्ट न हों तो जातक को हंसमुख एवं विनोद प्रिय बनाते हैं. जातक मिलनसार और सभी को साथ लेकर चलने वाला होता है. परंतु वक्री शुक्र के होने पर जातक के भीतर इन गुणों का लोप होता है. जातक समाज में अधिक घुल मिल नहीं पाता वह अधिक एकाकी रहना पसंद करता है.

    व्यक्ति में अलगाव की भावना देखी जा सकती है. जातक की परिवार एवं आसपास के माहौल पर अनासक्ति का एहसास रहता है. व्यक्ति कभी कभी गैर पारंपरिक रुप से अपना प्रेम दर्शाता है. यदि जन्मांग में शुक्र वक्री होकर द्वादश भाव में स्थित हो तो जातक भोग विलास से दुरी ही बनाए रखता है. कभी कभी विलासिता से विमुख होकर सन्यास की ओर भी प्रवृत होने लगता है.

    शुक्र ग्रह की कुण्डली में शुभ स्थिति जीवन को सुखमय और प्रेममय बनाती है तो वक्री स्थिति खुशियों में कमी लाती है. शुक्र को सबसे चमकीला और सुन्दर ग्रह कहा गया है. इसे प्रेम और वासना का अधिपति माना गया है.

    सप्तम भाव में यह जिस ग्रह के साथ सम्बन्ध बनाता है उसे अपना प्रभाव दे देता है. इसे परिवार और गृहस्थी का कारक माना गया है.पुरूष की कुण्डली में यह पत्नी और स्त्री की कुण्डली में पति की स्थिति को दर्शाता है.यह कुण्डली में अकेला होने पर अहित नहीं करता है और इससे प्रभावित व्यक्ति किसी को परेशान नहीं करता है वक्री होने की स्थित में धन की हानि होती है एवं पिता से अच्छे सम्बन्ध नहीं रह पाते हैं.शुक्र जब बारहवें घर में होता है तब धन और उच्चपद प्रदान करता है.

    शुक्र विवाह एवं वैवाहिक सुख सहित सम्बन्ध विच्छेद का भी कारक होता है. शुक्र प्रभावित व्यक्ति आशिक मिज़ाज का होता है. सुन्दरता एवं कला का प्रेमी होता है जिस पुरूष की कुण्डली में शुक्र शुभ और उच्च का होता है वह श्रृंगार प्रिय होता है. शुक्र वक्री होने पर पारिवारिक एवं गृहस्थ जीवन में अशांति और कलह पैदा करता है. त्वचा सम्बन्धी रोग शुक्र की निशानी कही गयी है.

    वक्री शुक्र के उपाय | Remedy For Retrograde Venus

    शुक्र के उपाय करने से वैवाहिक सुख की प्राप्ति की संभावनाएं बनती है. यह उपाय करते समय व्यक्ति को अपनी शुद्धता का ध्यान रखना चाहिए तथा उपाय करने कि अवधि के दौरान शुक्र देव का ध्यान करने से उपाय की शुभता में वृ्द्धि होती है. शुक्र मंत्र का जाप करने से भी शुक्र के उपाय के फलों को सहयोग प्राप्त होता है. शुक्र की दान देने वाली वस्तुओं में घी एवं चावल का दान किया जाता है.

    इसके अतिरिक्त शुक्र क्योकि भोग-विलास के कारक ग्रह है. इसलिये सुख- आराम की वस्तुओं का भी दान किया जा सकता है. बनाव -श्रंगार की वस्तुओं का दान भी इसके अन्तर्गत किया जा सकता है यह दान व्यक्ति को अपने हाथों से करना चाहिए. दान से पहले अपने बडों का आशिर्वाद लेना उपाय की शुभता को बढाने में सहयोग करता है.

    शुक्र के अशुभ गोचर की अवधि या फिर शुक्र की दशा में शुक्र मंत्र एवं श्लोक का पाठ प्रतिदिन या फिर शुक्रवार के दिन करने पर इस समय के अशुभ फलों में कमी होने की संभावना बनती है. शुक्र की शुभता के लिए कुछ सामान्य उपायों में पत्नी का सम्मान करना चाहिए. शुक्रवार का व्रत करना चाहिए और मन और हृदय पर काबू रखना चाहिए, सात प्रकार के अनाज और चरी का दान करना चाहिए, शुक्र के सम्बन्ध में मन और इन्द्रियों को नियंत्रित रखने पर विशेष बल देता है.

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    बृहस्पति के वक्री होने पर ये हो सकता है

    नवग्रहों में बृहस्पति ग्रह सबसे बड़ा और प्रभावशाली माना गया है. गुरू को शुभ ग्रहों के रूप में मान्यता प्राप्त है. गुरू को शुभता, सत्यता, न्याय, सद्गुण व सुख देने वाला गह माना गया है. इस ग्रह को कुण्डली में द्वितीय, पंचम, नवम, दशम एवं एकादश भाव का कारक माना जाता है. ज्योतिष के अनुसार यह पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रों का स्वामित्व रखते हैं. यह बारह महीनों में चार महीने वक्री रहते हैं. यह अस्त होने के एक मास बाद उदित होता, इसके चार मास बाद वक्री और फिर चार महीने बाद मार्गी और फिर सवा चार मास के बाद अस्त हो जाता है. बृहस्पति ग्रह एक राशि में लगभग एक वर्ष रहता है और 12 राशियों का चक्र पूरा करने में लगभग तेरह वर्ष का समय लेता है.

    ज्योतिषशास्त्र के अनुसार जो व्यक्ति बृहस्पति से प्रभावित होते हैं वे कफ प्रकृति के होते हैं और वे मोटे होते हैं. इनकी आवाज़ भारी होती है और आंखें एवं बाल भूरे अथवा सुनहरे रंग के होते हैं. बृहस्पति से प्रभावित व्यक्ति धार्मिक, आस्थावान, दर्शनिक, विज्ञान में रूची रखने वाले एवं सत्यनिष्ठ होते हैं.

    कुण्डली में बृहस्पति से पंचम, सप्तम और नवम भावों पर इसकी पूर्ण दृष्टि होती है. बृहस्पति की दृष्टि जिन भावों पर होती है उस भाव से सम्बन्धित उत्तम फल की प्राप्ति होती है लेकिन जिस भाव मे यह स्थित होता है उस भाव की हानि होती है. धनु और मीन में यह योगकारक होता है इस स्थिति में होने पर यह जिस भाव में होता है एवं जिन भावों पर दृष्टि डालता है लाभ प्रदान करता है. कन्या एवं मिथुन लग्न वालों के लिए यह बाधक माना जाता है.

    वक्री गुरू का प्रभाव | Effects of Retrograde Guru

    साधारणत: गुरू ज्ञान, विवेक, प्रसन्नता के स्वरुप हैं कुण्डली में गुरू का वक्री होना, व्यक्ति को अदभुत दैवी शक्ति प्रदान करने में सहायक होता है. जो कार्य अन्य लोगों के सामर्थ्य में नहीं होता वह कार्य वक्री ग्रह से प्रभावित जातक करने में सहयक होता है. असंभव कार्यों को पूर्ण करते हुए यश और सम्मान की प्राप्ति होती है.

    चतुर्थ भावस्थ वक्री गुरू साथियों का मनोबल बढा़ने वाला होता है जातक दूरदृष्टि से अपने कार्यों को उचित प्रकार से निर्वाह करने का प्रयास करता है. वक्री बृहस्पति के प्रभाव स्वरुप जातक अधिकांशत: जोखिम उठाकर भी सफलता प्राप्त करता है. विपत्ति के समय उसकी विशेष क्षमता को देखा जा सकता है.

    वक्री गुरू के उपाय | Remedies for Retrograde Jupiter

    वक्री गुरु के प्रभावों से बचने के लिए कुछ उपाय किए जा सकते हैं. उपाय करने से पर बृहस्पति के अशुभ प्रभाव को कम किया जा सकता है. जिससे गुरु अच्छा फल देने वाले तथा सभी काम पूरे करने वाले बनेंगे. जब गुरु के वक्री शुभ फल प्राप्त न होने की स्थिति में गुरु के उपाय करना लाभकारी रहता है. गुरु सबसे शुभ ग्रह है, इसलिये इनकी शुभता की सबसे अधिक आवश्यकता होती है. गुरु धन, ज्ञान व संतान के कारक ग्रह है. इसलिये गुरु के उपाय करने पर धन, ज्ञान व संतान का सुख प्राप्त होने कि संभावनाएं बनती हैं.

    प्रतिदिन पीपल के वृक्ष पर जल चढ़ाएं और सात परिक्रमा करें. घर में पीले रंग के फूल का पौधा लगाएं, प्रतिदिन विष्णु मंदिर जाएं और ब्राह्मण या अन्य किसी जरूरत मंद को धन का दान करें. गुरुवार का व्रत रखें,  भगवान विष्णु को गुड़-चने की दाल का प्रसाद अर्पित करें, घी, दही, आलू और कपूर का दान करें, हल्दी एवं पीले चंदन से भगवान विष्णु-लक्ष्मी की पूजा करें, केसर का तिलक लगाएं।

    इस उपाय के लिये गंगाजल में पीली सरसों या शहद दोनों को मिलाकर स्नान किया जाता है, स्नान करते समय गुरु मंत्र का जाप करना लाभकारी रहता है. तथा इसके बाद शुद्ध जल से स्नान कर लिया जाता है.

    बृहस्पति वस्तुओं का दान करने से भी व्यक्ति को लाभ प्राप्त होते है. दान की जाने वाली वस्तुओं में नमक, हल्दी की गांठें, नींबू आदि का दान किया जा सकता है, इनमें से किसी एक वस्तु या फिर सभी वस्तुओं का दान गुरुवार को किया जा सकता है.

    गुरु की शुभता प्राप्त करने के लिये गुरु मंत्र का जाप किया जा सकता है. ” ऊं गुं गुरुवाये नम: ” इस मंत्र का जाप प्रतिदिन एक माला या एक से अधिक माला प्रतिदिन करना शुभ रहता है. इसके अलावा गुरु का जाप गुरुवार के दिन करना भी लाभकारी रहता है. जिस अवधि के लिये यह उपाय किया जा रहा है उस अवधि में हवन कार्यो में इस मंत्र का जाप किया जा सकता है.

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