सूर्य के भिन्नाष्टकवर्ग की विवेचना | Analysis of Bheenashtakvarga of Sun

सूर्य के भिन्न्ष्टकवर्ग से जातक के शुभाशुभ परिणामों की विवेचना की जाती है. सूर्य को राजा का स्थान प्राप्त है. वह आत्मा है. यह आरोग्य व चेतना शक्ति को दर्शाता है. यदि जन्म कुण्डली में सूर्य बली होकर अधिक बिन्दुओं के साथ स्थित हो तो यह अच्छे फल देने में सक्षम होता है. भिन्नाष्टकवर्ग में सूर्य 0 से 8 तक कोई भी नम्बर किसी भी भाव में दे सकता है. इन अंकों के अनुसार सूर्य का गोचर अलग अलग फल देने में सक्षम होता है.

0 बिन्दु के साथ सूर्य का गोचर मृत्युतुल्य कष्ट देने वाला रह सकता है. इस समय जातक को परेशानियों से जूझना पड़ सकता है.

1 बिन्दु के साथ सूर्य का गोचर होने से जातक को व्यर्थ की चिंताएं सता सकती हैं. किसी कारण से कष्ट या रोग आपको परेशान कर सकता है.

2 बिन्दु के साथ सूर्य का गोचर होने पर धन संपदा का व्यय या हानि कही जाती है. इसके कारण अनावश्यक खर्चे बढ़ सकते हैं. चोरी का भय बना रह सकता है तथा राज्य से विवाद या परेशानी उठानी पड़ सकती है.

3 अंकों अर्थात बिन्दुओं के साथ व्यर्थ का भटकाव झेलना पड़ता है. काम में बार-बार विलंब की स्थिति उभर सकती है. बौद्धिक क्षमता प्रभावित रहती है.

4 बिन्दुओं के साथ सूर्य का गोचर जब प्रभाव डालता है तो जातक को मिले जुले फलों की प्राप्ति होती है. जीवन में कुछ शुभाशुभ फलों का आगमन होता ही है.

5 बिन्दुओं के साथ सूर्य का गोचर औसत से अच्छे फल देने में सहायक बन सकता है. शिक्षा में उच्च स्तर का प्रदर्शन करने की चाह पूर्ण होती है. धर्म कर्म के कार्यों की ओर आसक्ति जागृत होती है.

6 बिन्दुओं के साथ सूर्य का गोचर होने पर जातक को धन-संपत्ति की प्राप्ति होती है. उच्च स्थिति की प्राप्ति होने का मार्ग प्रशस्त होता है. व्यक्ति में साहस की वृद्धि होती है.

7 बिन्दुओं के साथ अधिकार की शक्ति फैसलों को लेने की ताकत आती है. स्वच्छंद होकर फैसले लेने की शक्ति मिलती है. उच्चपद की प्राप्ति होती है. सम्मान प्राप्त होता है. लोगों के मध्य आपका वर्चस्व बढ़ता है.

आठ बिन्दुओं के साथ सूर्य का गोचर अति शुभता देने वाला होता है. राज्य से सुख व सम्मान की प्राप्ति होती है. गौरव बढ़ता है व संबंधों में शालिनता बढ़ती है. गुरूजनों का साथ मिलता है.

यह सभी फल जो कहे गए हैं उन्हें हम यथावत न लेकर उनमें कुछ अन्य बातों को भी समझने की कोशिश करेंगे तो ही इन बिन्दुओं के प्रभावों को समझने में सक्ष्म होंगे. कोई भी ग्रह तभी शुभ फल देने में सक्षम होता है जब वह बली हो.

अपने भिन्नाष्टक वर्ग में 4 से कम बिन्दुओं के साथ होने पर सूर्य बलहीन हो जाता है. जिस कारण विपरित फल देता है.

इसी प्रकार यदि सूर्य अधिकतम बिन्दुओं के साथ लग्न में और शुभ स्थिति में हो तो शुभ फलों की प्राप्ति होती है. सामान्यत: तीसरे, छठे, दसवें और एकादश भाव में सूर्य पिडी़त न हो तो शुभ फल देता है. दशम भाव में बली स्थिति में होने पर 5 बिन्दुओं के साथ गोचर राजयोग देता है. इसी तरह से विभिन्न भावों में ग्रह की स्थिति बल व बिन्दुओं की संख्या जानकर ही फल का निर्धारण किया जा सकता है.

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मृत्यु भाग के ग्रह ऎसे बनते हैं मृत्यु तुल्य कष्ट कारण

वैदिक ज्योतिष में जीवन के हर पहलू का विश्लेषण किया गया है. जन्म से लेकर मृत्यु तक का फलकथन किया जाता है. जीवन की सभी घटनाओं की जानकारी का अध्ययन सूक्ष्मता से किया जा सकता है बशर्ते कि ज्योतिषी अत्यधिक कुशल हो. व्यक्ति को अपने भविष्य में होने वाली घटनाओं में बहुत रुचि रहती है.

कुछ व्यक्ति ऎसे भी हैं जिन्हें कई प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ता है तब उन्हें ज्योतिषीय सलाह की आवश्यकता पड़ती है. शारीरिक अथवा मानसिक परेशानी भी व्यक्ति के लिए घातक सिद्ध हो जाती है. बहुत बार अचानक से व्यक्ति को शारीरिक कष्ट का सामना करना पड़ता है. ऎसा क्या होता है कि व्यक्ति को अचानक बुरी बातों का सामना करना पड़ता है. ज्योतिषीय कारण ढूंढते हैम तो कई कारण नजर आते हैं. उस बुरी घटना के योग, प्रतिकूल दशा/अन्तर्दशा, प्रतिकूल गोचर और एक मुख्य कारण दशा/अन्तर्दशानाथ का मृत्यु भाग पर स्थित होना.

वैदिक ज्योतिष में सभी ग्रहों के मृत्यु भाग के अंश दिए गए हैं. सभी नौ ग्रहों के साथ लग्न और मांदी भी मृत्यु भाग पर स्थित होती है. ग्रहों के मृत्यु भाग के यह अंश स्थिर होते हैं. इनमें कोई बदलाव नहीं होता है. यदि जन्म समय में कोई ग्रह मृत्यु भाग अथवा मृत्यु भाग के अंशों पर स्थित है तब उस ग्रह से संबंधित दशा/अन्तर्दशा आने पर व्यक्ति को मानसिक अथवा शारीरिक परेशानियों का सामना करना ही पड़ता है. ग्रह जिस भाव का स्वामी है अथवा जिस भाव में मृत्यु भाग में स्थित है उस भाव से संबंधित कष्ट का सामना करना पड़ सकता है. मुख्यतया ज्योतिष में मृत्यु भाग के ग्रहों की गणना स्वास्थ्य के आंकलन के लिए की जाती है.

राशि/ग्रह लग्न सूर्य चंद्र मंगल बुध गुरु शुक्र शनि राहु केतु मांदी
मेष 1 20 26 19 15 19 28 10 14 8 23
वृष 9 9 12 28 14 29 15 4 13 18 24
मिथुन 22 12 13 25 13 12 11 7 12 20 11
कर्क 22 6 25 23 12 27 17 9 11 10 12
सिंह 25 8 24 28 9 6 10 12 24 21 13
कन्या 2 24 11 28 18 4 13 16 23 22 14
तुला 4 16 26 14 20 13 4 3 22 23 8
वृश्चिक 23 17 14 21 10 10 6 18 21 24 18
धनु 18 22 13 2 21 17 27 28 10 11 20
मकर 20 2 25 15 22 11 12 14 20 12 10
कुंभ 10 3 5 11 7 15 29 13 18 13 21
मीन 10 23 12 6 5 28 19 15 8 14 22

पाठकगणो को मृत्यु भाग के ग्रहों की तालिका भी हम उपलब्ध करा रहे हैं लेकिन इस सारणी को देखकर किसी तरह के वहम में ना पड़े क्योकि किसी एक योग से कुछ नही होता है. उसके लिए बहुत सी अन्य बातों पर गौर करना पड़ता है तब कहीं किसी नतीजे पर पहुंचा जाता है. जन्म कुण्डली में सबसे पहले तो लग्न/लग्नेश को देखा जाता है कि वह बली हैं या नहीं. अगर यह दोनो बली हो गए तब समस्या अगर आती भी है तो वह ज्यादा प्रभाव नहीं डाल पाएगी. आइए मृत्यु भाग के ग्रहों को स्वास्थ्य के नजरिए से देखने का प्रयास करते हैं.

  • जन्म कुण्डली में यदि लग्नेश बली है तब मृत्यु भाग में स्थित ग्रहों का प्रभाव ज्यादा नहीं होगा.
  • यदि लग्नेश कमजोर है तब मृत्यु भाग में स्थित ग्रह स्वास्थ्य के लिए हानि कर सकता है.
  • लग्नेश बलहीन है और मृत्यु भाग में स्थित ग्रह की दशा/अन्तर्दशा के साथ गोचर भी प्रतिकूल चल रहा है तब स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो सकती है.
  • कई बार मृत्यु भाग के ग्रह जातक की बजाय उसके संबंधी के लिए खराब हो सकते हैं अर्थात जिस भाव का स्वामी मृत्यु भाग में है उस भाव से संबंधित व्यक्ति को कष्ट हो सकता है. उदाहरण के लिए नवमेश यदि छठे भाव में मृत्यु भाव में स्थित है तब पिता का स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है.
  • जो ग्रह मृत्यु भाग स्थित हैं उनकी दृष्टि जिन भावों में स्थित है या जिन ग्रहों के साथ संबंध बना रहे हैं उन्हें भी पीड़ित कर देते हैं.
  • जन्म कुण्डली में लग्न के अंश मृत्यु भाग के अंशों पर स्थित है तब शारीरिक अथवा मानसिक दोनो ही प्रकार की परेशानियाँ हो सकती हैं.
  • लग्नेश अथवा आत्मकारक अगर मृत्यु भाग के अंशों पर स्थित है तब स्वास्थ्य संबंधी कोई ना कोई परेशानी बनी रह सकती है.
  • यदि जन्म कुण्डली में एक से अधिक ग्रह मृत्यु भाग पर स्थित है तब उस ग्रह की दशा/अन्तर्दशा में गंभीर बीमारी होने की संभावना बन सकती है.
  • कई बार बच्चे के जन्म समय में जो दशा/अन्तर्दशा मिलती है वह ग्रह मृत्यु भाग पर स्थित होने से जन्म से ही स्वास्थ्य संबंधी विकार दे देता है.
  • कोई ग्रह यदि मृत्यु भाग के अंशो के आसपास स्थित है तब भी वह अपनी दशा/अन्तर्दशा में कष्ट दे सकता है.
  • मृत्यु भाग वाला ग्रह जिस भाव में है उसके फलों में कमी करता है साथ ही ग्रह के अपने कारकत्व भी नष्ट होते हैं.
  • यदि जन्म कुण्डली में 6,8 या 12वें भावों से संबंधित ग्रह की दशा और मृत्यु भाग में स्थित ग्रह की अन्तर्दशा चल रही है तब स्वास्थ्य संबंधी कष्ट हो सकते हैं.
  • जन्म कुण्डली में यदि ग्रह मृत्यु भाग पर स्थित है और वह गोचर के पाप ग्रह से संबंध बना रहा है तब स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो सकती है.
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अभिनेता बनने के योग | Yogas For Becoming An Actor

फिल्म लाईन में जाने के लिए प्रमुख भाव | Primary Houses For Entering Film Industry

जन्म कुण्डली का हर भाव महत्वपूर्ण होता है. सभी की अपनी विशेषता होती है. कुण्डली के दशम भाव से व्यवसाय का आंकलन किया जाता है. इसलिए दशम भाव के स्वामी ग्रह, इसमें बैठे ग्रह और इससे संबंध बनाने वाले ग्रह मिलकर तय करते हैं कि व्यक्ति किस व्यवसाय को अपनी आजीविका के रुप में चुनेगा. वर्तमान समय में अभिनय की दुनिया में भी बहुत से युवक-युवतियाँ अपना भाग्य आजमाने के लिए प्रयास रहते हैं. बहुतों को सफलता मिलती है और बहुत से असफल भी रहते हैं. ऎसे कौन से योग होते हैं जिनके आधार पर व्यक्ति सफल रहता है! आइए जानने का प्रयास करें.

फिल्म अभिनेता हो या फिर टेलिविजन के पर्दे पर काम करने वाला छोटा कलाकार हो, दोनो ही में व्यक्ति का लग्न व लग्नेश अत्यधिक बली होना चाहिए क्योकि जब ये दोनो बली होगें तभी व्यक्ति दूसरों पर अपना प्रभाव छोडने में सक्षम होगा. व्यक्ति की कला और अभिनय को लोग लम्बे समय तक याद रख सकेगे. लग्न-लग्नेश के बली होने पर व्यक्ति लोगो पर अपनी अमिट छाप छोड़ने में कामयाब रहता है. इसलिए अभिनय के क्षेत्र में काम करने वालों का यही सबसे बड़ा गुण माना गया है.

जन्म कुण्डली के पांचवें भाव का आंकलन मनोरंजन के लिए किया जाता है अर्थात अभिनेताओं की जन्म कुण्डली में पंचम का संबंध दशम से जरुर होना चाहिए. फिल्म इंडस्ट्री हो या नाट्यकला से संबधित क्षेत्र हो, कुंडली का पंचम भाव तथा पंचमेश यदि बलवान होकर दशम भाव व दशमेश से संबध बना रहा है तब व्यक्ति विशेष अभिनय के क्षेत्र से अपनी आजीविका अर्जित करता है. जन्म कुण्डली के पंचम भाव को मनोरंजन का भाव भी कहा जाता है. सिनेमा या अभिनय कला भी लोगों के मनोरंजन का जरिया है, इसलिए पंचम भाव मनोरंजन व दशम भाव आजीविका का भाव कहलाता है.

जन्म कुण्डली के तीसरे भाव से व्यक्ति के सभी प्रकार के शौक देखे जाते है. साथ ही कला से संबंधित कोई भी क्षैत्र हो उन सभी को इसी भाव से देखा जाता है. यदि इस भाव पर शुभ ग्रहों का प्रभाव ज्यादा होता है तब व्यक्ति कला से संबंध जरुर रखता है. ग्रहों की प्रकृति से व्यक्ति के शौक निर्धारित किए जा सकते हैं. तीसरे भाव से व्यक्ति में कला, रचनात्मकता तथा सृजनात्मकता का गुण आता है. तीसरे भाव का संबध पंचम भाव या पंचमेश व शुक्र से बनता है तब व्यक्ति अभिनय के क्षेत्र में अच्छा नाम कमाता है और उत्तम कोटि का अभिनय करता है. यदि व्यक्ति की जन्म कुण्डली में लग्न या लग्नेश से तीसरे भाव का संबध बनता है तब इसे काफी अच्छा समझा जाता है क्योकि तीसरे भाव से मीडिया तथा संचार के साधनों का भी विश्लेषण किया जाता है और इन्हीं साधनों के माध्यम से व्यक्ति लोकप्रियता हासिल करता है.

अंत में हम एक निष्कर्ष पर यह पहुंचते हैं कि बली लग्न-लग्नेश, बली पंचम-पंचमेश, बली तृतीय भाव व तृतीयेश तथा बली दशम भाव व दशमेश का आपस में जितना शुभ संबंध बनेगा उतना ही अच्छा कलाकार व्यक्ति बनेगा. इन सभी भावों का जितना कमजोर संबंध होगा व्यक्ति की अभिनय क्षमता भी उसी प्रकार से होगी.

अभिनय क्षेत्र से संबंधित ग्रह | Planets Related To The Field Of Acting

वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा को मन का कारक ग्रह माना गया है. यदि मन ही अच्छा नहीं होगा तो व्यक्ति आगे कैसे बढ़ सकता है. साथ ही चंद्रमा को कला से भी जोड़ा गया है. अभिनय के क्षेत्र को अपनी आजीविका बनाने के लिए व्यक्ति को अपना मन बली बनाना पड़ता है क्योकि हर कोई व्यक्ति अपने भावों को दूसरों के सामने प्रकट नहीं कर सकता है. इसलिए अभिनय के लिये व्यक्ति का मनोबल ऊँचा होना चाहिए तथा इच्छा शक्ति बली होनी चाहिए. इन दोनो का ही कारक ग्रह चंद्रमा माना गया है. अभिनय के क्षेत्र से जुड़ा दूसरा प्रमुख ग्रह शुक्र है. शुक्र के बिना कला आना मुश्किल है क्योकि यह ग्रह कला के क्षेत्र का मुख्य कारक है. शुक्र अभिनय, कला, नृत्य, संगीत, गीत आदि कारक है. अभिनय में इन सभी का होना जरुरी होता है.

शुक्र चमक-दमक का भी कारक माना गया है और फिल्म जगत बिना ग्लैमर के अधूरा होता है. यदि व्यक्ति की कुंडली में चंद्रमा अर्थात मन और शुक्र अर्थात कला, दोनो का संबंध संबध पंचम भाव तथा पंचमेश से स्थापित हो रहा है तब उसके अभिनय के क्षेत्र में जाने के बली योग बनते है. बुध को वाणी का कारक माना गया है इसलिए जन्म कुण्डली में यदि बुध का संबंध चन्द्र व शुक्र से संबध बन रहा है तब व्यक्ति अपनी वाणी का प्रभाव अपने अच्छे व सुंदर डायलाग बोलने से लोगों पर छोड़ता है. जनता बहुत समय तक उसके डायलॉग याद रखती है और उन्हें दोहराती है.

अभिनय के क्षेत्र को अपनी आजीविका बनाने के लिए जन्म कुण्डली में शुक्र को पीडित होना चाहिए क्योकि यदि शुक्र पर पाप प्रभाव नहीं होगा तब व्यक्ति अपनी कला का प्रदर्शन किसी के भी समक्ष नहीं कर पाएगा. वह शर्म महसूस कर सकता है या उसे सभी के सामने अपने आप को दिखाना पसंद ही नहीं होगा. व्यक्ति सर्व साधारण के सामने अपनी कला के प्रदर्शन में अपनी इज्जत नहीं समझेगा. अपनी इस झिझक के कारण ही वह अभिनय क्षेत्र को अपनी आजीविका भी नहीं बनाएगा. यह केवल उसके शौक तक ही सीमित रह जाएगा, वह भी ऎसा शौक जो बंद दरवाजों में ही दफन भी हो सकता है. सफल अभिनेताओ की कुंडली में शुक्र पर पाप प्रभाव बना ही होता है चाहे वह किसी भी रुप में हो. अधिकाँश सफल अभिनेताओ की कुंडली में शुक्र पर मंगल का प्रभाव पाया गया है क्योकि मंगल जोश व ऊर्जा प्रदान करता है, आगे बढ़ने के लिए साहस व पराक्रम देता है.

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बुध के कमजोर या खराब होने पर हो सकती है ये परेशानियां

ग्रह कमज़ोर कब होता है इस बात का निर्धारण इससे किया जाता है कि कोई ग्रह कुण्डली में किस अवस्था में है यदि ग्रह नीच का है, वक्री है, पाप ग्रहों के साथ है या इनसे दृष्ट है, खराब भावों में स्थित है, षडबल में कमजोर है, अन्य अवस्थाओं में निर्बल हो इत्यादि तथ्यों से ग्रह के कमजोर होने कि स्थिति का पता लगाया जा सकता है. ग्रह के कमजोर या बलहीन होने पर उसके शुभत्व में कमी आती है और उक्त ग्रह अपने पूर्ण प्रभाव को देने में सक्षम नहीं हो पाता. बुध के बलहीन होने पर जातक को वाणी से संबंधित विकार, पेट, गले या नर्वस तंत्र से संबंधित समस्याओं अथवा बिमारियों से प्रभावित होना पड़ सकता है. इसके अतिरिक्त बुध पर किन्हीं विशेष बुरे ग्रहों का प्रभाव होने पर जातक को आंतों से संबंधित बिमारी, दमा, त्वचा के रोग, अनिद्रा, मनोवैज्ञानिक रोग प्रभावित कर सकते हैं.

बुध के प्रथम भाव में बलहीन होने पर जातक का वर्ण पिला पन लिए हुए, चंचलता से युक्त हो सकता है उसे कार्य करने में अधिक एकाग्रता की आवश्यकता रहेगी. जातक को कम भोजन करने की आदत हो सकती है. जातक में विलास की इच्छा रह सकती है तथा परदेस गमन में व्यस्त रह सकता है.

द्वितीय भाव में बलहीन बुध के होने पर जातक को वाणी संबंधि विकार हो सकता है, बोलने में हकलाहट या कोई अन्य परेशानी हो सकती है. परिवार से दूर भी रह सकता है तथा संपत्ति को व्यर्थ के कामों में व्यय भी कर सकता है.

तृतीय भाव में बलहीन बुध के होने पर जातक में साहस की कमी रह सकती है परंतु व विवाद में भी फंस सकता है. हृदय से कठोर हो सकता है. अपने कार्यों में लगातार परिश्रम करना पड़सकता है.

चतुर्थ भाव में कमज़ोर बुध के होने पर जातक दूसरों का हक मारने वाला हो सकता है. अपने बंधुओं से दू र्हो सकता है, माता के स्वास्थ्य के लिए अनुकूल नहीं, स्वयं में रोग से प्रभावित रह सकता है.

पंचम भाव में कमज़ोर बुध के होने पर शिक्षा पर प्रभाव पड़ता है. पढा़ई में बाधा या एकाग्रता में कमी बनी रह सकती है.

षष्ठ भाव में बलहीन बुध के होने पर जातक को शत्रु पक्ष से भय बना रह सकता है, वाद विवाद में हार का मुख देखना पड़ सकता है.

सप्तम भाव में कमजो़र बुध के होने पर जातक की बुद्धि चंचल रह सकती है, जीवन साथी के साथ तनाव व साझेदारी के कार्यों में हानि की संभावना रह सकती है.

अष्टम में कमज़ोर बुध के होने पर जातक अपनी बातों में घुमावदार हो सकता है, आर्थिक रूप से कई उतार चढाव भी झेलने पड़ सकते हैं. कार्यों में काफी कठोर हो सकता है तथा पाप कर्म की ओर उन्मुख भी रह सकता है.

नवम में स्थित बलहीन बुध के होने पर जातक को पिता से दूरी या तनाव झेलना पड़ सकता है. जीवन में अचानक बदलाव की स्थिति आ सकती है, यात्रा में परेशानी झेलनी पड़ सकती है. पथ भ्रष्ट भी हो सकता है.

दशम भाव में कमज़ोर बुध के होने पर कार्य क्षमता प्रभावित हो सकती है. व्यवसाय की प्रगत्ति में बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है. कभी-कभी अचानक लिए गर निर्णय खराब सिद्ध हो सकते हैं जिस कारण असुविधा एवं हानि उठानी पड़ सकती है.

एकादश भाव में बलहीन बुध के होने पर जातक के निर्णयों पर असर दिखाई पड़ता है. जातक को अपने कार्यों में अचानक से घाटा भी उठाना पड़ सकता है.

द्वादश भाव में कमज़ोर बुध के होने पर जातक को अपमान की स्थिति से गुजरना पड़ सकता है.

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शोध्य पिण्ड निकालने का तरीका | Method To Calculate Shodhya Pinda

अष्टकवर्ग के सर्वाष्टक में मंडल शोधन, शोधनों त्रिकोण शोधन और एकाधिपत्य शोधन करने के पश्चात शोध्य पिण्ड की गणना कि जाती है. ग्रहों के शोध्य पिण्ड निकालने का नियम हम पहले ही आपको बता चुके हैं जिसके अनुसार प्रत्येक ग्रह के और प्रत्येक राशि में शेष संख्या को राशि गुणाकर तथा जिन भावों में ग्रह स्थित हैं उन भावों के बिन्दुओं को ग्रह से गुणा करना पड़ता है. दोनों विधियों से प्राप्त ग्रहों के बिन्दुओं का योग करके उनका शोध्य पिण्ड प्राप्त कर लिया जाता है.

सर्वाष्टक वर्ग में तीनों शोधनों के बाद शेष शुभ बिन्दुओं की संख्या को राशि गुणाकर और ग्रह गुणक से गुणा करके सर्वाष्टक वर्ग का शोध्य पिण्ड प्राप्त किया जाता है. यहां हम नीचे शोध्य पिण्ड निकालने का तरीका बत रहें हैं जो इस प्रकार है:-

राशि गुणाकर | Rashi Gunakar

हर ग्रह को एक निश्चित इकाई संख्या के रूप में दी गई है जो इस राशि विशेष की राशि गुणक कहलाती है. यह संख्या बदलती नहीं है और हर स्थिति में समान रहती है:-

राशि गुणाकर
मेष 7X6=42
वृषभ 10 X 0 = 0
मिथुन 8 X 4 = 32
कर्क 4 X 8 = 32
सिंह 10 X 0 = 0
कन्या 5 X 4 = 20
तुला 7 X 5 = 35
वृश्चिक 8 X 0 = 0
धनु 9 X 8 = 72
मकर 5 X 2 = 10
कुम्भ 11 X 0 = 0
मीन 12 X 0 = 0
कुल 243

ग्रह गुणाकर | Planet Gunakar

इसी तरह से ग्रह को ही एक निश्चित इकाई संख्या के रूप में प्राप्त है, जो उक्त ग्रह विशेष की ग्रह गुणक कहलाती है. यह संख्या भी राशि गुणक के समान अपरिवर्तनीय है और प्रत्येक स्थिति में समान रहती है.

ग्रह गुणाकर
सूर्य 5 X 0 = 0
चंद्रमा 5 X 2 = 10
मंगल 8 X 0 = 0
बुध 5 X 0 = 0
बृहस्पति 10 X 0 = 0
शुक्र 7 X 8 = 56
शनि 5 X 8 = 40
Total 106
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एकाधिपत्य शोधन | Ekadhipatya Shodhan

त्रिकोण शोधन करने के उपरांत दुसरा शोधन एकाधिपत्य शोधन कहलाता है. इस एकाधिपत्य शोधन से तात्पर्य होता है कि एक ही ग्रह का अधिपति या स्वामी होना. यह शोधन उन दो राशियों के लिए करते हैं जिनका स्वामी एक ही ग्रह हो. इस तथ्य के संदर्भ में यहां इस बात पर भी ध्यान देना होता है कि सूर्य व चंद्रमा की एक-एक राशियां होती हैं उन्हें इन्हीं का अधिपत्य प्राप्त है. इस कारण से सिंह और कर्क राशियों का शोधन नहीं होता है. ऎसे में मंगल, बुध, गुरू, शुक्र और शनि ग्रह को दो राशियों का अधिपत्य प्राप्त है जिस कारण इन्हीं की राशियों में यह शोधन किया जाता है.

नियम | Rules of Ekadhipatya Shodhan

1- सूर्य और चंद्रमा को एक – एक राशि का स्वामित्व होता है सिंह और कर्क का इस कारण सिंह और कर्क राशि का यह शोधन किया जाता है.

2- अगर किसी ग्रह की दोनों राशियों में से किसी एक भी राशि में पहले से ही 0 अंक हों तो उस ग्रह की राशियों का शोधन नहीं होता है.

3- इसी प्रकार यदि किसी ग्रह की दोनों ही राशियों में राहू केतु को छोड़कर यदि अन्य कोई ग्रह बैठा हो तो इन परिस्थितियों में उन राशियों में यह शोधन नहीं होता है. इसे हम इस प्रकार समझ सकते हैं कि यदि वृष और तुला राशियों का स्वामी शुक्र है और यदि इन दोनों राशियों में ग्रह स्थित हों तो इस स्थिति में इन राशियों में यह एकाधिपति शोधन नहीं किया जाएगा. साथ ही साथ इस बात को भी ध्यान में रखना आवश्यक होगा कि राहू-केतु को ग्रह के रूप में नहीम माना जाता है. इसलिए अगर राहु केतु स्थित हों तो शोधन होगा.

नोट:- किसी भी राशि में ग्रह का होना उस राशि की मजबूती में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इस कारण उक्त राशि बली मानी जाती है. ऎसी स्थिति में उसका बल ही उस राशि के शोधन को रोकता है.

4- अगर किसी ग्रह की दोनों राशियों में से एक भी राशि में कोई ग्रह हो और किसी भी राशि में 0 नहीं हो तो उसके शोधन में तीन बातों को ध्यान में रखना होगा.

(i)- ग्रह रहित राशि के बिन्दु की संख्या, ग्रह युक्त राशि के बिन्दुओं की संख्या से अधिक हो सकती है तो इस स्थिति में ग्रह रहित राशि की संख्या को ग्रहयुत राशि की संख्या के बराबर कर देंगे.

(ii)- ग्रह रहित राशि के बिन्दुओं की संख्या, ग्रह युत राशि के समान हो सकती है.

(iii) – ग्रह सहित राशि के बिन्दुओं की संख्या ग्रह युत राशि से कम हो सकती है.

इन दोनों स्थितियों में ग्रह युत राशि की संख्या में शोधन नहीं होगा. जिससे उस संख्या में कोई भी परिवर्तन नहीं होगा परंतु ग्रहरहित राशि के बिन्दुओं की संख्या 0 हो जाती है.

5- किसी ग्रह की दोनों राशियों में कोई भी ग्रह नहीं हो और किसी भी राशि में बिन्दुओं की संख्या 0 नहीं हो तो यहां पर दो बातों पर ध्यान देने की आवश्यकता है.

(i)- यदि दोनों राशियों की संख्या समान हो तो दोनों ही 0 हो जाएंगे.

(ii)- दूसरा नियम यह कि यदि दोनों की संख्या समान नहीं है तो जो बडी़ संख्या है उसको छोटी संख्या के बराबर कर देंगे. यानि के दोनों राशियों में समान संख्या हो जाएगी.

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एकाधिपत्य शोधन करने का तरीका | Method to Calculate Ekadhipatya Shodhan

त्रिकोण शोधन करने के उपरांत दूसरा शोधन एकाधिपत्य शोधन कहलाता है. इस एकाधिपत्य शोधन से तात्पर्य होता है कि एक ही ग्रह का अधिपति या स्वामी होना. यह शोधन उन दो राशियों के लिए करते हैं जिनका स्वामी एक ही ग्रह हो. इस तथ्य के संदर्भ में यहां इस बात पर भी ध्यान देना होता है कि सूर्य व चंद्रमा की एक-एक राशियां होती हैं उन्हें इन्हीं का अधिपत्य प्राप्त है. इस कारण से सिंह और कर्क राशियों का शोधन नहीं होता है. ऎसे में मंगल, बुध, गुरू, शुक्र और शनि ग्रह को दो राशियों का अधिपत्य प्राप्त है जिस कारण इन्हीं की राशियों में यह शोधन किया जाता है.

नियम | Rules of Ekadhipatya Shodhan

1- सूर्य और चंद्रमा को एक – एक राशि का स्वामित्व होता है सिंह और कर्क का इस कारण सिंह और कर्क राशि का यह शोधन किया जाता है.

2- अगर किसी ग्रह की दोनों राशियों में से किसी एक भी राशि में पहले से ही 0 अंक हों तो उस ग्रह की राशियों का शोधन नहीं होता है.

3- इसी प्रकार यदि किसी ग्रह की दोनों ही राशियों में राहू केतु को छोड़कर यदि अन्य कोई ग्रह बैठा हो तो इन परिस्थितियों में उन राशियों में यह शोधन नहीं होता है. इसे हम इस प्रकार समझ सकते हैं कि यदि वृष और तुला राशियों का स्वामी शुक्र है और यदि इन दोनों राशियों में ग्रह स्थित हों तो इस स्थिति में इन राशियों में यह एकाधिपति शोधन नहीं किया जाएगा. साथ ही साथ इस बात को भी ध्यान में रखना आवश्यक होगा कि राहू-केतु को ग्रह के रूप में नही माना जाता है. इसलिए अगर राहु केतु स्थित हों तो शोधन होगा.

नोट:- किसी भी राशि में ग्रह का होना उस राशि की मजबूती में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इस कारण उक्त राशि बली मानी जाती है. ऎसी स्थिति में उसका बल ही उस राशि के शोधन को रोकता है.

4- अगर किसी ग्रह की दोनों राशियों में से एक भी राशि में कोई ग्रह हो और किसी भी राशि में 0 नहीं हो तो उसके शोधन में तीन बातों को ध्यान में रखना होगा.

(i)- ग्रह रहित राशि के बिन्दु की संख्या, ग्रह युक्त राशि के बिन्दुओं की संख्या से अधिक हो सकती है तो इस स्थिति में ग्रह रहित राशि की संख्या को ग्रहयुत राशि की संख्या के बराबर कर देंगे.

(ii)- ग्रह रहित राशि के बिन्दुओं की संख्या, ग्रह युत राशि के समान हो सकती है.

(iii)- ग्रह सहित राशि के बिन्दुओं की संख्या ग्रह युत राशि से कम हो सकती है.

इन दोनों स्थितियों में ग्रह युत राशि की संख्या में शोधन नहीं होगा. जिससे उस संख्या में कोई भी परिवर्तन नहीं होगा परंतु ग्रहरहित राशि के बिन्दुओं की संख्या 0 हो जाती है.

5- किसी ग्रह की दोनों राशियों में कोई भी ग्रह नहीं हो और किसी भी राशि में बिन्दुओं की संख्या 0 नहीं हो तो यहां पर दो बातों पर ध्यान देने की आवश्यकता है.

(i)- यदि दोनों राशियों की संख्या समान हो तो दोनों ही 0 हो जाएंगे.

(ii)- दूसरा नियम यह कि यदि दोनों की संख्या समान नहीं है तो जो बडी़ संख्या है उसको छोटी संख्या के बराबर कर देंगे. यानि के दोनों राशियों में समान संख्या हो जाएगी.

यहां पर उदाहरण कुण्डली की सहायता से आपको एकाधिपत्य शोधन करने का तरीका बताया जा रहा है जिसके नियम जो उपर दिर गर हैं उन्हें इस कुण्डली में लगाकर यह शोधन किया जाएगा. इस कुण्डली में सूर्य व चंद्रमा को एक एक राशि का अधिपत्य प्राप्त है अत: इनके अंकों में कोई परिवर्तन किए बिना ही हम इन्हें ऎसी ही लिख लेंगे इनमें कोई शोधन नहीं किया जाएगा.

मंगल की राशियों में मेष राशि में 6 और वृश्चिक राशि में 0 अंक है क्योंकि एक राशि में पहले से ही 0 है इसलिए यहां भी कोई शोधन नहीं होगा.

बुध की राशियों मिथुन और कन्या में से मिथुन राशि में 11 अंक हैं और कन्या में 4 अंक हैं तथा दोनों राशियां ग्रहों से रहित इसलिए मिथुन राशि की संख्या कन्या राशि के बराबर 4 हो जाएगी.

बृहस्पति की राशियां धनु में 8 अंक हैं और मीन में 5 अंक हों साथी साथ धनु राशि में ग्रह स्थित है परंतु मीन में कोई भी ग्रह नहीं है. इसलिए धनु राशि संख्या का शोधन नहीं होगा, पर मीन राशि 0 हो जाएगी.

शुक्र की राशियों में वृष को 0 अंक मिले हैं और तुला को 5. यहां एक राशि में पहले से ही 0 अंक हैं इसलिए कोई शोधन नहीं होगा.

शनि की राशियों में से मकर को 2 और कुंभ को 0 अंक मिले हैं चूंकि एक राशि में यहां भी पहले से 0 अंक हैं इसलिए यहां भी शोधन नहीं किया जाएगा.

इस प्रकार से एकाधिपत्य शोधन करने पर हमें यह अंक प्राप्त होते हैं.

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कमज़ोर मंगल का प्रभाव | Effects of Weak Mars in Different Houses

ग्रह कमज़ोर कब होता है इस बात का निर्धारण इससे किया जाता है कि कोई ग्रह कुण्डली में किस अवस्था में है यदि ग्रह नीच का है, वक्री है, पाप ग्रहों के साथ है या इनसे दृष्ट है, खराब भावों में स्थित है, षडबल में कमजोर है, अन्य अवस्थाओं में निर्बल हो इत्यादि तथ्यों से ग्रह के कमजोर होने कि स्थिति का पता लगाया जा सकता है. ग्रह के कमजोर या बलहीन होने पर उसके शुभत्व में कमी आती है और उक्त ग्रह अपने पूर्ण प्रभाव को देने में सक्षम नहीं हो पाता.

मंगल के कमज़ोर होने पर जातक की शारीरिक तथा मानसिक उर्जा प्रभावीत होती है. जातक रक्त-विकार संबधित बिमारियों अन्य ऐसे बिमारीयों से पीडित हो सकता है जिसके कारण शल्य चिकित्सा करानी पडे़. बुरे प्रभाव के कारण किसी दुर्घटना अथवा लड़ाई में अपने शरीर का कोई अंग भी गंवा सकता है. इसके अतिरिक्त मंगल की बलहीनता जातक को सिरदर्द, थकान तथा निर्णय लेने में कमी जैसी समस्याओं से भी प्रभावित करती है.

लग्न भाव में यदि बलहीन मंगल हो तो बाल्यकाल में जातक को उदर या दातों से संबंधित परेशानियों का सामना करना पड़ सकत है. जातक मन से चंचल हो सकता है, मलिन वस्त्रों को धारण करने वाला व चुगलखोर भी हो सकता है.

दूसरे भाव में बलहीन मंगल के होने पर जातक में सहनशक्ति अधिक नहीं होगी. व्यक्ति कि अपने कुटुबं से दूरी बनी रह सकती है. सट्टेबजी से धनार्जन के कार्यों में लिप्त रह सकता है.

तीसरे भाव में कमजोर का मंगल साहस एवं कर्मठता में कमी लाता है, जातक सुख में कमी पाता है, यात्राओं में असुविधा तथा खेद की स्थिति बन सकती है. सर्वसंपन्न होने पर भी सुख में कमी बनी रहती है. पिता के प्रेम में कमी पाता है.

चौथे भाव में बलहीन मंगल के होने पर जातक बंन्धुरहित हो सकता है. दुसरों पर आश्रित रहने वाला व पर स्त्री आसक्त रहने वाला हो सकता है. भ्रमण शील रह सकता है.

पांचवें भाव में कमज़ोर मंगल के प्रभाव स्वरूप संतान से कष्ट या संतान को कष्ट की स्थिति हो सकती है. शिक्षा के क्षेत्र में कुछ परेशानियों का भी सामना करना पड़ सकता है.

छठे भाव में स्थित मंगल दुर्घटनाओं का संकेत देता है, जातक को शल्य चिकित्सा से भी गुजरना पड़ सकता है. शत्रुओं से भय बना रहता है. हृदय से विकल और क्रूर कार्यों को करने वाला रह सकता है.

सप्तम भाव में कमजोर मंगल के होने पर जातक को स्त्री से कष्ट होता है या उसका वियोग सहना पड़ सकता है. यहां का मंगल मांगलिक सुख में तनाव को भी दर्शाता है.

अष्टम में बैठा कमजोर मंगल जातक को व्याधियां दे सकता है, जातक को जल से खतरा या भय रह सकता है. मांगल्य सुख में कमी लाता है.

नवम में बलहीन मंगल के होने पर भाग्य में रूकावटों का सामना करना पड़ सकता है. जातक रोग से ग्रस्त रह सकता है.

दशम में बलहीन मंगल के होने पर जातक को कार्यक्षेत्र में कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना प़ सकता है उसे अधिक परिश्रम करना पड़ता है. भूमि के क्षेत्र में विवादों को झेलना पड़ सकता है क्योंकि चौथे पर दृष्टि भी देता है.

एकादश भाव में बलहीन चंद्रमा के होने पर व्यक्ति के स्वभाव में क्रोध कि अधिकता होती है. वह अनेक प्रकार के कामों से लाभ पा सकता है. लेकिन कार्यों में परंपरा से हटकर भी छाप होती है. कार्यों में लोभ की भावना अधिक रहती है.

द्वादश में कमजोर मंगल के होने पर जातक दूसरे के धन पर आश्रित रहने वाला या उसका लोभ रखने वाला हो सकता है.

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विवाह मिलान में अगर इन बातों का रखेंगे ध्यान तो नहीं होगा तलाक/अलगाव

विवाह के सन्दर्भ में कुंडली मिलान का जिक्र आता ही है. कुंडली मिलान वह प्रक्रिया है जिसे लड़का और लड़की की कुंडली मिलाकर पूरा किया जाता है. कुंडली मिलान में मुख्य रुप से गुण मिलान और मांगलिक योग देखा जाता है. गुण कुल 36 होते हैं जिनमें से कम से कम 18 गुण तो मिलने ही चाहिए. जितने अधिक गुण मिलते हैं उतना अच्छा मिलान माना जाता है. इसई तरह से मांगलिक योग को भी देखा जाता है. यदि दोनों में से कोई एक मांगलिक है तब मिलान उचित नहीं माना जाता है.

आज हम उपरोक्त दोनो मिलान से अलग मिलान की प्रक्रिया के बारे में बताएंगें क्योकि उपरोक्त मिलान के बावजूद भी वैवाहिक जीवन में समस्याएँ आ जाती है.

ग्रहों का भावों की स्थिति के अनुसार मिलान | Position of Planets according to Houses

कुंडली मिलान को आज हम एक अन्य रुप में बताने का प्रयास कर रहे हैं. लड़का और लड़की की कुंडली का मिलान भावों के आधार पर भी होना बहुत जरुरी है क्योकि जन्म कुंडली का हर भाव महत्व रखता है. सभी नौ ग्रह कुंडली में अपना स्वतंत्र महत्व रखते हैं.

जब भी कुंडली मिलान की बात आए तो यह देखें कि दोनो की जन्म कुंडली के भाव एक – दूसरे से 6,8 या 12 नहीं होने चाहिए. छठा भाव रोग, ऋण तथा शत्रुओं का माना जाता है. आठवें भाव को अनिष्टकारी माना जाता है. 12वाँ भाव व्यय का है. इसलिए इन तीनों को ही अशुभ माना गया है.

जैसे लड़के की जन्म कुंडली के जिस भाव में सूर्य है उससे गिनती करते हुए लड़की की कुंडली का सूर्य देखें कि वह किस भाव में स्थित है.

माना लड़के की जन्म कुण्डली में सूर्य दूसरे भाव में है और लड़की की कुंडली में सूर्य नवम भाव में है तो यह एक्-दूसरे से षडाष्टक योग बनाते हैं जो कि शुभ नहीं माना जाता है. यदि दोनो की कुंडली के सूर्य एक्-दूसरे से 6,8 या 12 वें भाव में स्थित है तब इसे शुभ नहीं माना जाता है.

इसी तरह सभी नौ ग्रहों का आंकलन किया जाएगा और जितने अधिक से अधिक ग्रह एक – दूसरे से शुभ स्थित होगें उतना मिलान अच्छा होगा.

राशि के अनुसार ग्रहों की स्थिति | Position of Planets according to Astrological Signs

अब हम राशियों के आधार पर ग्रहों के मिलान की चर्चा करेगें. मिलान का तरीका भाव मिलान की तरह ही है इसमें हम राशि में स्थित ग्रह को लेते हैं. इस मिलान में हम लड़का और लड़की की कुंडली के ग्रहों को राशि के अनुसार देखते हैं कि कौन सा ग्रह कौन सी राशि में स्थित है.

लड़के की जन्म कुंडली में जिस राशि में जो ग्रह है, वही ग्रह लड़्की की कुंडली में किस राशि में गया है, यह देखना है. माना लड़के की कुंडली में गुरु वृष राशि में स्थित है और लड़की की कुंडली में तुला राशि में स्थित है, अब यह देखेगे कि दोनो राशियों का आपस में क्या संबंध बन रहा है.

दोनो की जन्म कुण्डली में गुरु जिन राशियों में स्थित वह एक – दूसरे से 6/8 अ़क्ष पर स्थित है अर्थात वृष राशि से तुला राशि छठे भाव में आति है और तुला राशि से वृष राशि आठवें भाव में आती है. अत: दोनों की जन्म कुण्डली में गुरु की स्थिति एक्-दूसरे से सही नहीं है.

अब हम इसी तरह से बाकी ग्रहों को भी देखेगें कि वह एक्-दूसरे से क्या संबंध बनाते हैं. जो ग्रह जिन राशियों में स्थित है वह यदि 6,8 या 12 वें भाव में स्थित है तब उचित मिलान नही माना जाएगा. इस मिलान में भी जितने अधिक ग्रह एक्-दूसरे से सही दिशा में स्थित होगें उतना मिलान भी अच्छा होगा.

लग्न का मिलान | Matching Ascendant

आइए अब हम लड़के और लड़की की जन्म लग्न की बात करते हैं. लड़के व लड़की की कुंडली का लग्न एक सा नहीं होना चाहिए. उदाहरण के लिए यदि एक का लग्न मेष है तो दूसरे का लग्न भी मेष नही होना चाहिए.

यदि दोनों का एक सा लग्न होगा तब दोनो में कमियाँ भी एक जैसी ही होगी. एक को क्रोध आएगा तो दूसरे को भी उतना ही आएगा. इससे दोनों में अकसर तनाव बने रहने की संभावना बनी रह सकती है.

माना दोनों का अग्नितत्व लग्न है तो क्रोध की मात्रा एक सी होगी और दोनों में हर बात को लेकर जल्दबाजी रह सकती है और कई बार जल्दबाजी में लिए निर्णय गलत भी सिद्ध हो सकते हैं.

यदि दोनो का वायुतत्व लग्न है तब दोनों में व्यवहारिकता की कमी हो सकती है. हर समय ख्यालों में ही रहना आप दोनो की आदत हो सकती है. आप हर बात के लिए अत्यधिक चिन्तन मनन करेगें और निर्णय लेने की क्षमता का अभाव रहेगा.

यदि दोनो का जलतत्व लग्न है तब आप दोनो अत्यधिक भावुक होगे और हर बात का निर्णय दिल से लेगें. भावनाओं में बहकर लिए गए निर्णुय अकसर गलत भी हो जाते हैं.

दोनो का पृथ्वीतत्व होने से दोनों ही ज्यादा ही व्यवहारिक होगें और हर बात को नाप तौल कर करेगें. यह इनकी एक बड़ी कमी हो सकती है. यह जल्दबाजी में कोई निर्णय नहीं लेगें अपितु कुछ ज्यादा ही सोच लेगें. इन्हें जीवन में बदलाव की बजाय ठहराव अधिक पसंद होगा और इस कारण यह आसानी से स्वयं को नए परिवेश अथवा परिस्थितियों में ढ़ाल नहीं पाएंगें.

कुछ अन्य महत्वपूर्ण बातों का आंकलन | Other Important Things to Consider

आइए जन्म कुंडली में स्थित कुछ अन्य महत्वपूर्ण पहलुओ की चर्चा करें. लड़के और लड़की की जन्म कुंडली का स्वतंत्र रुप से अध्ययन भी अपना महत्व रखता है. मिलान से पहले तो यही देखना चाहिए कि व्यक्ति की अपनी स्वयं की कुंडली के योग क्या हैं. यदि वह सही नही है तब आप अपनी कमियों को जानते हुए स्वभाव में बदलाव कर सकते हैं.

व्यक्ति विशेष की जन्म कुण्डली में यह देखना चाहिए कि उसकी कुंडली के लग्नेश और सप्तमेश की आपस में क्या स्थिति है? माना किसी की जन्म कुंडली में लग्नेश दूसरे भाव में है और सप्तमेश तीसरे भाव में स्थित है. ऎसी स्थिति में दोनो का द्विद्वार्दश संबंध माना जाएगा. यह संबंध ज्यादा अच्छा नही है. इसका अर्थ है कि यह व्यक्ति अपने साथी के साथ समझौता करके रहेगा और उसके साथ आरामदायक महसूस नहीं करेगा.

इसी तरह से यदि किसी की जन्म कुंडली में लग्नेश और सप्तमेश आपस में षडाष्टक योग बना रहे हैं तब यह स्थिति बहुत खराब मानी गई है.

किसी व्यक्ति विशेष की जन्म कुंडली में शुक्र से 12वें भाव में पाप ग्रह नहीं होना चाहिए अन्यथा व्यक्ति को संबंधों में तनाव बना रह सकता है या व्यक्ति के शैय्या सुख में कमी रहती है अथवा व्यक्ति अपने साथी से शारीरिक सुख की कमी का अनुभव कर सकता है, कारण कुछ भी हो सकता है.

जन्म कुंडली में शुक्र का बहुत महत्व है क्योकि यह भोग का कारक है. शुक्र जिस राशि में स्थित है उसका स्वामी ग्रह अगर वक्री है तब भी संबंधों में लचीलापन नहीं रहता है. माना शुक्र गुरु की राशि में है और गुरु जन्म कुंडली में वक्री अवस्था में है तब उस व्यक्ति को संबंधों में ज्यादा रुचि नहीं रहेगी.

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त्रिकोण शोधन करने का तरीका | Method To Compute Trikon Shodhan

सर्वाष्टकवर्ग में मंडल शोधन करने के पश्चात त्रिकोण शोधन करना होता है. जन्म कुण्डली में स्थित बारह राशियों को अग्नि, पृथ्वी, वायु और जल के आधार पर चार वर्गों में विभाजित किया जाता है. इस तरह से हर एक वर्ग में तीन-तीन राशियां आती हैं जो आपस में त्रिकोण भाव की राशियां होती हैं यह (1-5-9), (2-6-10), (3-7-11) और (4-8-12) के वर्गों में बंटती हैं, यह चार वर्ग की राशियां निम्न हैं :-

  • अग्नि तत्व वाली राशियां हैं – मेष, सिंह और धनु
  • पृथ्वी तत्व वाली राशियां हैं – वृषभ, कन्या और मकर
  • वायु तत्व वाली राशियां हैं – मिथुन, तुला और कुम्भ
  • जल तत्व वाली राशियां हैं – कर्क, वृश्चिक और मीन

नियम | Rules

  • अगर किसी भी तत्व की तीनों राशियों में प्राप्तांकों की संख्या एक समान नहीं है तो सबसे कम संख्या को तीनों राशियों की संख्याओं से अलग अलग घटाएं शेष जो संख्याएं बची हो उनको संबंधित राशि वाले स्थान में लिखें.
  • यदि तीनों राशियों में से किसी भी एक राशि को शून्य अंक मिले हों तो उस तत्व की राशियों का शोधन नहीं होगा.
  • अगर तीनों राशियों में से किसी भी दो राशियों के प्राप्तांक शून्य हैं तो तीसरी राशि का अंक भी शून्य में परिवर्तित हो जाएगा.
  • अगर तीनों राशियों के अंक समान हों तो शोधन के पश्चात तीनों राशियों के अंक शून्य हो जाएंगे.

अब हम यहां पर किसी एक कुण्डली में इस नियम को लगाकर इसे समझने का प्रयास करेंगे.

अब हम इन नियमों को अपनी उदाहरण कुण्डली द्वारा समझाने का प्रयास करेंगे. इस उदाहरण कुण्डली में मंडल शोधन करने के पश्चात प्रथम भाव अर्थात लग्न में 12 अंक या बिन्दु आए हैं, दूसरे भाव में 3 अंक आए हैं, तीसरे भाव में 12 अंक हैं, चौथे में 6, पांचवें भाव में 4, छठे भाव में 11, सातवें भाव में 10, आठवें भाव में 1, नवें भाव में 9, दशम भाव में 9, एकादशभाव में 8 और बारहवें भाव में 12 बिन्दु हैं.

इन सभी बिन्दुओं का त्रिकोण शोधन इस प्रकार होगा.

अग्नि तत्व राशियों का शोधन | Shodhan for Fire Signs

राशि मेष सिंह धन
बिन्दु 9 3 11
न्यूनतम अंक से घटाएंगे 3 3 3
शोधन से प्राप्तांक 6 0 8

पृथ्वी तत्व राशियों का शोधन | Shodhan for Earth Signs

राशि वृष कन्या मकर
बिन्दु 8 12 10
न्यूनतम अंक से घटाएंगे 8 8 8
शोधन से प्राप्तांक 0 4 2

वायु तत्व राशियों का शोधन | Shodhan for Air Signs

राशि मिथुन तुला कुंभ
बिन्दु 12 6 1
न्यूनतम अंक से घटाएंगे 1 1 1
शोधन से प्राप्तांक 11 5 0

जल तत्व राशियों का शोधन | Shodhan for Water Signs

राशि कर्क वृश्चिक मीन
बिन्दु 12 4 9
न्यूनतम अंक से घटाएंगे 4 4 4
शोधन से प्राप्तांक 8 0 5

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