बृहस्पति के भिन्नाष्टकवर्ग का विवेचन | Analysis Of Bheenashtakvarga of Jupiter

अष्टकवर्ग में बृहस्पति के भिन्नाष्टकवर्ग द्वारा जातक को बृहस्पति से प्राप्त होने वाले शुभाशुभ परिणामों की विवेचना के लिए बिन्दुओं की संख्या का निर्धारण करने की आवश्यकता पड़ती है. बृहस्पति को समस्त ग्रहों में शुभ ग्रह माना गया है. इसी के साथ इन्हें ज्ञान, विवेक और धन का कारक माना जाता है. इस बात से यह सपष्ट होता है कि अगर कुण्डली में गुरू अधिक बिन्दुओं के साथ हो तो स्वभाविक ही वह शुभ फलों को देता है.

परंतु कुण्डली में 0 से 3 बिन्दुओं के साथ गुरू का स्थित होना शुभता में कमी के संकेत देता है. जातक को अपने मनोकुल फल नहीं मिल पाते हैं.

बृहस्पति के अष्टकवर्ग में 3 बिन्दुओं से कम बिन्दु पाने वाकी राशि में गुरू का गोचर शुभ फल नहीं देता है. इस गोचर से धन सम्पत्ति की हानि, स्वास्थ्य में कमी, सहयोगियों से मनमुटाव की स्थिति उभर सकती है.

बृहस्पति के अष्टकवर्ग में जिस राशि में 4 बिन्दु मिले हों उक्त राशि में बृहस्पति का गोचर औसत फल देता है. इसके विपरित 5 या 6 बिन्दुओं के साथ सफलता और धन सम्पति देता है.

जब बृहस्पति 7 से 8 बिन्दु वाली राशि में गोचर करता है तो उस समय विशेष में जातक प्रसिद्धि, खुशहाली को पाता है. गुरू जनों का साथ मिलता है, विद्वता में विकास होता है, सदगुणों में विकास होता है. कुण्डली में गुरू की अनुकूल स्थिति होने से जातक के लिए शुभता का आगमन होता है. जीवन में यश-कीर्ति पाता है.

अगर गुरू 6, 8 और 12वें भाव में 6 से अधिक बिन्दुओं के साथ स्थित हो तो जातक को राजा तुल्य जीवन जीने का अवसर मिलता है.

केन्द्र या त्रिकोण भाव में बृहस्पति 7 या 8 बिन्दुओं के साथ बुध व शुक्र को छोड़कर किसी ऎसे ग्रह के साथ युति में हो तो जातक को स्त्रियों से सुख व संतान दायक बनता है.

सामान्यत: जिस ग्रह के पास 5 बिन्दुओं से अधिक बिन्दु होते हैं वह ग्रह अपनी दशा या अन्तर्दशा में व गोचर में अच्छे फल देता है. एक अन्य स्थिति में गुरू के भिन्नाष्टक में जिस राशि में ज्यादा बिन्दु होते हैं उस राशि द्वारा दर्शाई गई दिशा में धन लाभ होता है.

बृहस्पति कुण्डली के 6, 8, व 12 भाव में 5 से अधिक बिन्दुओं के साथ होने पर आयु में वृद्धि करता है. शत्रुओं पर विजय मिलती है. लग्न से 6, 7, 8 भाव में स्थित गुरू लग्नाधियोग बनाता है इससे जातक दूसरों पर विजय पाता है. सप्तम भाव में होने से सामाजिक छवि बेहतर बनती है.

बृहस्पति से गृहीत राशि से पांचवें भाव में 5 या अधिक अंक हों तो गुरू को मजबूती प्राप्त होती है. जातक में चुम्बकीय आकर्षण आता है, नेतृत्व के गुणों का विकास होता है. गुरू यदि चंद्रमा के साथ युति में केन्द्र भाव में स्थित हो तो जातक के व्यक्तित्व में आकर्षण का भाव देखा जा सकता है. संतान से युक्त समृद्धि को पाता है.

बृहस्पति द्वारा प्राप्त होने वाले शुभाशुभ फलों में गुरू का स्वामि ग्रह महत्वपुर्ण भूमिका निभाता है. गुरू जिस राशि में स्थित है उस राशि का स्वामी ग्रह कुण्डली में किस स्थिति में है इस पर भी बृहस्पति द्वारा प्राप्त होने वाले फल निर्भर करते हैं. गुरू का राशिश जन्म कुण्डली में उच्च या स्वराशि का होकर केन्द्र अथवा त्रिकोण में 4 या उससे अधिक बिन्दुओं के साथ स्थित हो तो शुभ फलों की प्राप्ति है .

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शरीर में ग्रहों से संबंधित अंग और रोग

चिकित्सा ज्योतिष में हर ग्रह शरीर के किसी ना किसी अंग से संबंधित होता है. कुंडली में जब संबंधित ग्रह की दशा होती है और गोचर भी प्रतिकूल चल रहा होता है तब उस ग्रह से संबंधित शारीरिक समस्याओं व्यक्ति को होकर गुजरना पड़ सकता है. आइए ग्रह और उनसे संबंधित शरीर के अंग व होने वाले रोगों के बारे में जानने का प्रयत्न करते हैं.

सूर्य | Sun Planet

सूर्य को हड्डी का मुख्य कारक माना गया है. इसके अधिकार क्षेत्र में पेट, दांई आँख, हृदय, त्वचा, सिर तथा व्यक्ति का शारीरिक गठन आता है. जब जन्म कुंडली में सूर्य की दशा चलती है तब इन्हीं सभी क्षेत्रों से संबंधित शारीरिक कष्ट व्यक्ति को प्राप्त होते हैं. यदि जन्म कुंडली में सूर्य निर्बली है तभी इससे संबंधित बीमारियाँ होने की संभावना बनती है अन्यथा नहीं. इसके अतिरिक्त व्यक्ति को तेज बुखार, कोढ़, दिमागी परेशानियाँ व पुराने रोग होने की संभावनाएँ सूर्य की दशा/अन्तर्दशा में होने की संभावना बनती है.

चंद्रमा | Moon Planet

चंद्रमा को मुख्य रुप से मन का कारक ग्रह माना गया है. यह ह्रदय, फेफड़े, बांई आँख, छाती, दिमाग, रक्त, शरीर के तरल पदार्थ, भोजन नली, आंतो, गुरदे व लसीका वाहिनी का भी कारक माना गया है. इनसे संबंधित बीमारियों के अतिरिक्त गर्भाशय के रोग हो सकते हैं. नींद कम आने की बीमारी हो सकती है. बुद्धि मंद भी चंद्रमा के पीड़ित होने पर हो सकती है. दमा, अतिसार, खून आदि की कमी चंद्रमा के अधिकार में आती है. जल से होने वाले रोगों की संभावना बनती है. बहुमूत्र, उल्टी, महिलाओ में माहवारी आदि की गड़बड़ भी चंद्रमा के कमजोर होने पर हो सकती हैं. अपेन्डिक्स, स्तनीय ग्रंथियों के रोग, कफ तथा सर्दी से जुड़े रोग हो सकते हैं. अंडवृद्धि भी चंद्रमा के कमजोर होने पर होती है.

मंगल | Mars Planet

मंगल के अधिकार में रक्त, मज्जा, ऊर्जा, गर्दन, रगें, गुप्तांग, गर्दन, लाल रक्त कोशिकाएँ, गुदा, स्त्री अंग तथा शारीरिक शक्ति आती है. मंगल यदि कुंडली में पीड़ित हो तब इन्हीं से संबंधित रोग मंगल की दशा में हो सकते हैं. इसके अतिरिक्त सिर के रोग, विषाक्तता, चोट लगना व घाव होना सभी मंगल से संबंधित हैं. आँखों का दुखना, कोढ़, खुजली होना, रक्तचाप होना, ऊर्जाशक्ति का ह्रास होना, स्त्री अंगों के रोग, हड्डी का चटक जाना, फोडे़-फुंसी, कैंसर, टयूमर होना, बवासीर होना, माहवारी बिगड़ना, छाले होना, आमातिसार, गुदा के रोग, चेचक, भगंदर तथा हर्णिया आदि रोग हो सकते हैं. यह रोग तभी होगें जब कुंडली में मंगल पीड़ित अवस्था में हो अन्यथा नहीं.

बुध | Mercury Planet

बुध के अधिकार क्षेत्र में छाती, स्नायु तंत्र, त्वचा, नाभि, नाक, गाल ब्लैडर, नसें, फेफड़े, जीभ, बाजु, चेहरा, बाल आदि आते हैं. बुध यदि कुंडली में पीड़ित है तब इन्हीं क्षेत्रो से संबंधित बीमारी होने की संभावना बली होती है. इसके अलावा छाती व स्नायु से जुड़े रोग हो सकते हैं. मिर्गी रोग होने की संभावना बनती है. नाक व गाल ब्लैडर से जुड़े रोग हो सकते हैं. टायफाईड होना, पागलपन, लकवा मार जाना, दौरे पड़ना, अल्सर होना, कोलेरा, चक्कर आना आदि रोग होने की संभावना बनती है.

बृहस्पति | Jupiter Planet

बृहस्पति के अन्तर्गत जांघे, चर्बी, मस्तिष्क, जिगर, गुरदे, फेफड़े, कान, जीभ, स्मरणशक्ति, स्पलीन आदि अंग आते हैं. कुंडली में बृहस्पति के पीड़ित होने पर इन्हीं से संबंधित बीमारियाँ होने की संभावना बनती है. कानों के रोग, बहुमूत्र, जीभ लड़खड़ाना, स्मरणशक्ति कमजोर हो जाना, पेनक्रियाज से जुड़े रोग हो सकते हैं. स्पलीन व जलोदर के रोग, पीलिया, टयूमर, मूत्र में सफेद पदार्थ का आना, रक्त विषाक्त होना, अजीर्ण व अपच होना, फोड़ा आदि होना सभी बृहस्पति के अन्तर्गत आते हैं. डायबिटिज होने में बृहस्पति की भूमिका होती है.

शुक्र | Venus Planet

शुक्र के अन्तर्गत चेहरा, आंखों की रोशनी, गुप्तांग, मूत्र, वीर्य, शरीर की चमक व आभा, गला, शरीर व ग्रंथियों में जल होना, ठोढ़ी आदि आते हैं. शुक्र के पीड़ित होने व इसकी दशा/अन्तर्दशा आने पर इनसे संबंधित बीमारियाँ हो सकती है. किडनी भी शुक्र के ही अधिकार में आती है इसलिए किडनी से संबंधित रोग भी हो सकते हैं. आँखों की रोशनी का कारक शुक्र होता है इसलिए इसके पीड़ित होने पर नजर कमजोर हो जाती है. यौन रोग, गले की बीमारियाँ, शरीर की चमक कम होना, नपुंसकता, बुखार व ग्रंथियों में रोग होना, सुजाक रोग, उपदंश, गठिया, रक्त की कमी होना आदि रोग शुक्र के पीड़ित होने पर होते हैं.

शनि | Saturn Planet

शनि के अधिकार क्षेत्र में टांगे, जोड़ो की हड्डियाँ, मांस पेशियाँ, अंग, दांत, त्वचा व बाल, कान, घुटने आदि आते हैं. शनि के पीड़ित होने व इसकी दशा होने पर इन्हीं से संबंधित रोग हो सकते हैं. शारीरिक कमजोरी होना, मांस पेशियों का कमजोर होना, पेटदर्द होना, अंगों का घायल होना, त्वचा व पाँवों के रोग होना, जोड़ो का दर्द, अंधापन, बाल रुखे होना, मानसिक चिन्ताएँ होना, लकवा मार जाना, बहरापन आदि शनि के पीड़ित होने पर होता है.

राहु | Rahu Planet

राहु के अधिकार में पांव आते है, सांस लेना आता है, गरदन आती है. फेफड़ो की परेशानियाँ होती है. पाँवो से जुड़े रोग हो सकते हैं. अल्सर होता है, कोढ़ हो सकता है, सांस लेने में तकलीफ हो सकती है. फोड़ा हो सकता है, मोतियाबिन्द होता है, हिचकी भी राहु के कारण होती है. हकलाना, स्पलीन का बढ़ना, विषाक्तता, दर्द होना, अण्डवृद्धि आदि रोग राहु के कारण होते हैं. यह कैंसर भी देता है.

केतु | Ketu Planet

इसके अधिकार में उदर व पंजे आते हैं. फेफड़ो से संबंधित बीमारियाँ देता है. बुखार देता है, आँतों में कीड़े केतु के कारण होते हैं. वाणी दोष भी केतु की वजह से ही होता है. कानों में दोष भी केतु से होता है. आँखों का दर्द, पेट दर्द, फोड़े, शारीरिक कमजोरी, मस्तिष्क के रोग, वहम होना, न्यून रक्तचाप सभी केतु की वजह से होने वाले रोग होते हैं. केतु के कारण कुछ रोग ऎसे भी होते हैं जिनके कारणों का पता कभी नहीं चल पाता है.

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बुध के भिन्नाष्टक का विवेचन | Analysis of Bheenashtakvarga of Mercury

अष्टकवर्ग में बुध के फलों के बारे में जानने के लिए उसके भिन्नाष्ट वर्ग में प्राप्त बिन्दुओं की संख्या द्वारा समझना आसान होता है. किसी जातक की कुण्डली में 0 से 3 बिन्दुओं के साथ स्थित बुध निर्बल होता है तथा उसके परिणामों में शुभता नहीं रह पाती है. बुध की कमजो़र स्थिति के कारण जातक संपति का नुकसान, बैद्धिक क्षमता का कमजोर होना जैसी परेशानियों से गुजरना पड़ता है. पारीवारिक समस्याओं से दो चार होना पड़ता है. संबंधों में तनाव की स्थिति बनी रहती है.

बुध यदि जन्म कुण्डली के 6 या 8 भावा में बैठा हो और शुभ ग्रहों की दृष्टि उस पर नहीं हो तो जातक के लिए शुभ संकेत नहीं होता है. जातक के भीतर अविश्वास की भावना देखी जा सकती है. कुटिलता स्वभाव में विद्यमान रहती है. इसके विपरित यदि यही ग्रह 5 या 8 बिन्दुओं के साथ केन्द्र या त्रिकोण भावों में स्थित हो गुरू से दृष्ट भी हो तो जातक में बौद्धिकता आती है. बेहतरीन वक्ता बनता है.

बुध के जन्म कुण्डली के विभिन्न भावों और राशियों में स्थिति तथा प्राप्त बिन्दुओं के आधार पर जातक को कई प्रकार के फलों की प्राप्ति होती है. बुध 4 बिन्दुओं के साथ औसत स्तर के फल देता है इसमें न यह ज्यादा बली होता है और न अधिक कमजोर. इसमें जातक को संघर्ष की स्थिति से भी अधिक गुजरना पड़ता है. यदि बुध 4 बिन्दुओं के साथ मंगल की राशियों में स्थित हो और गुरू से दृष्ट हो रहा हो तो कुछ अच्छे फल की संभावनाएं बनती हैं.

बुध यदि 5 बिन्दुओं के साथ केन्द्र अथवा त्रिकोण में स्थित हो और गुरू से अथवा शनि से दृष्टि संबंध बना रहा हो तो इस स्थिति में जातक धर्म शास्त्रों का जानकार बनता है. जातक की रूचि धर्म शास्त्रों की ओर हो सकती है.

इसी प्रकार यदि बुध 5 बिन्दुओं के साथ गुरू और मंगल के साथ युति संबंध बनाता है तो जातक का रुझान विज्ञान विषयों की ओर हो सकता है.

बुध अगर 4 या उससे अधिक बिन्दुओं के साथ मंगल की राशि और शुक्र के नवांश में स्थित होकर गुरू से दृष्ट हो रहा हो तो जातक का साहित्य के प्रति रूचि रखने वाला होगा और इस क्षेत्र में कई कार्य करने की चाह रखेगा.

बुध के भिन्नाष्टकवर्ग में बुध से दूसरे भाव 4 या अधिक बिन्दु होने पर जातक को श्रेष्ठ वक्ता बनने में मदद मिलती है. इसी प्रकार अगर बुध से दूसरे भाव में 7 या अधिक बिन्दु हों तो जातक कवि बन सकता है. हम यहां इस बात को समझ सकते हैं कि बुध से दूसरे भाव में ग्रहों द्वारा मिले बिन्दुओं से व्यक्ति के स्वभाव व वाणी को समझा जा सकता है क्योंकि यदि यहां अशुभ ग्रहों द्वारा प्राप्त बिन्दु हों तो जातक अहंकारी व मिथ्या भाषी हो सकता है. पर यदि यह बिन्दु बृहस्पति से प्राप्त हों तो व्यक्ति को महानुभाव बनाते हैं. शुक्र द्वारा प्राप्त बिन्दु जातक को कलात्मक, रसिक बनाते हैं. विद्वता की प्राप्ति के लिए बुध से पंचम भाव से देखने पर पता चलता है कि वह कितना यश व सम्मान पाने में सफल होगा.

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मेष राशि और मेष जातक के बारे में जाने संपूर्ण जानकारी

वैदिक ज्योतिष का मुख्य आधार जन्म कुंडली और उसमें स्थापित नौ ग्रह, बारह राशियाँ व 27 नक्षत्र हैं. इन्हीं के आपसी संबंध से योग बनते हैं और इन्हीं के आधार पर दशाएँ होती है. ज्योतिष में बारह राशियों का अपना ही स्वतंत्र महत्व होता है. भचक्र में बारह राशियाँ एक कल्पित पट्टी पर आधारित हैं. यह काल्पनिक पट्टी भचक्र के दोनो ओर नौ – नौ अंशों की है. इसमें बारह राशियाँ स्थित होती है. मेष राशि को भचक्र की पहली राशि माना गया है. आज हम मेष लग्न के बारे में बात करेगें. मेष राशि के स्वरुप व उसकी विशेषताओं के बारे में बात करेगें.

मेष राशि की विशेषता | Characteristics of Aries Sign

मेष राशि भचक्र की पहली राशि के रुप में जानी जाती है और भचक्र पर इसका विस्तार 0 से 30 अंश तक माना गया है. यह अग्नितत्व राशि मानी गई है और मंगल ग्रह को इसका स्वामी माना गया है. यह राशि चर राशि के रुप में जानी जाती है इसलिए मेष लग्न के जातक सदा चलायमान रहते हैं. कभी एक स्थान पर टिककर बैठ नहीं सकते हैं.

मेष राशि का चिन्ह “मेढ़ा” माना गया है. यह तेज व बहुत ही पैना जानवर होता है जो पहाड़ी इलाको में पाया जाता है. इसलिए इस राशि को भी चरागाहों वाले पहाड़ी स्थान पसंद हो सकते हैं. इस राशि का रंग लाल माना जाता है तभी इनमें अत्यधिक तीव्रता होती है. यह राशि अत्यधिक ऊर्जावान राशि मानी जाती है और सदा जोश व चुस्ती भरी होती है.

मेष लग्न के जातक की विशेषता | Characteristics of Aries Natives

आइए अब मेष लग्न होने से आपकी विशेषताओं के बारे में जानने का प्रयास करें. आप साहसी व पराक्रमी होते हैं. आपके भीतर नेतृत्व का गुण होता है और आप अपनी टीम को बहुत अच्छे से चलाने की क्षमता भी रखते हैं. मेष लग्न चर लग्न है और अग्नितत्व भी है इसलिए आप सदा जल्दबाजी में रहते हैं और निर्णय लेने में एक पल नहीं लगाते हैं जबकि आपको एक बार दूरगामी परिणामो पर ही एक नजर डालनी चाहिए.

मेष लग्न होने से आप आदेश सुनना कतई पसंद नहीं करते हैं और अपनी मनमानी ही चलाते हैं लेकिन आप बात सभी की सुनेगे लेकिन करेगें वही जो आपके मन में होता है.

आपको किसी के दबाव में रहना नही भाता है और स्वतंत्र रुप से रहना पसंद करते हैं. अपनी स्वतंत्रता के साथ किसी तरह का कोई समझौता आप नहीं करते हैं. आपको अति शीघ्र ही क्रोध भी आता है और आप एकदम से आक्रामक हो जाते हैं. यहाँ तक की मरने – मारने तक पर आप उतारू हो जाते हैं लेकिन आपके भीतर दया की भावना भी मौजूद रहती है.

आप दृढ़ निश्चयी होते हैं, आप व्यवहार कुशल भी होते हैं. आप जो भी बात कहते हैं उसे बिना किसी लाग लपेट के स्पष्ट शब्दों में कह डालते हैं. चाहे किसी को अच्छा लगे या बुरा लगे. इससे कई बार आपको लोग अव्यवहारिक भी समझते हैं. आप बहुत जिद्दी होते हैं और आवेगी भी होते हैं और आवेश में कई बार मुसीबत भी मोल ले लेते हैं. आपको अपनी इस कमी को नियंत्रित करना चाहिए.

मेष लग्न के लिए शुभ ग्रह | Auspicious Planets For Aries Ascendant

अब हम मेष लग्न के लिए शुभ ग्रहो की बात करेगें कि कौन से ग्रह इस लग्न के अच्छे फल दे सकते हैं. मेष लग्न के लिए मंगल लग्नेश होने से शुभ ही माना जाएगा. हालांकि मेष लग्न में मंगल की दूसरी राशि वृश्चिक अष्टम भाव में होती है जो कि एक अशुभ भाव है और बाधाओं का भाव माना गया है.

मेष राशि मंगल की मूल त्रिकोण राशि भी है और केन्द्र में है इसलिए बेशक मंगल की दूसरी राशि अष्टम भाव में स्थित हो पर मंगल आपके लिए शुभ ही माना जाएगा. आपका लग्न मेष होने से आपके लिए सूर्य भी शुभ होगा क्योकि सिंह राशि पंचम भाव में स्थित होती है और यह एक शुभ त्रिकोण माना गया है.

आपके लिए बृहस्पति को भी शुभ माना जाएगा क्योकि इसकी मूल त्रिकोण राशि धनु नवम भाव में स्थित होती है और नवम भाव आपका भाग्य भाव होता है और सबसे बली त्रिकोण भी है. चंद्रमा मेष लग्न के लिए सम होगा क्योकि इसकी राशि चतुर्थ भाव, केन्द्र में पड़ती है और केन्द्र तटस्थ माने जाते हैं.

मेष लग्न के लिए अशुभ ग्रह | Inauspicious Planets For Aries Ascendant

मेष लग्न के कौन से ग्रह अशुभ हो सकते हैं आइए उनके बारे में जाने. आपके लिए शुक्र अशुभ माना जाएगा. शुक्र आपकी कुंडली में दूसरे व सप्तम भाव का स्वामी होने से प्रबल मारक हो जाता है. इसलिए इसे अशुभ ही माना जाता है.

आपकी कुंडली में शनि भी दसवें और एकादश का स्वामी होने से अशुभ ही माना जाता है. दसवाँ भाव केन्द्र होने से तटस्थ हो जाता है और एकादश भाव त्रिषडाय भावों में से एक है. आपकी कुंडली में शनि बाधक का काम भी करता है क्योकि यह एकादश भाव का स्वामी है. आपकी कुंडली के लग्न में चर राशि मेष स्थित है और चर लग्न के लिए एकादशेश बाधक होता है. आपकी कुंडली के लिए बुध अति अशुभ है क्योकि यह तीसरे और छठे भाव का स्वामी होता है.

मेष लग्न के लिए पूजा व रत्न | Remedies and Gemstones For Aries Ascendant

आइए अंत में अब हम मेष लग्न के जातको के लिए पूजा व रत्नों के बारे में बता दें कि उनके लिए क्या उचित रहेगा. आपके लिए हनुमान जी की पूजा करना अत्यंत लाभदायक होगा. आपको नियमित रुप से हनुमान जी की पूजा करनी चाहिए. इसके लिए आप हनुमान चालीसा आदि का पाठ कर सकते हैं. मंगलवार के दिन सुंदरकांड का पाठ भी आपके लिए शुभ रहेगा.

आपकी जन्म कुंडली में सूर्य पांचवें भाव का स्वामी होता है और पांचवां भाव त्रिकोण भाव है. इस भाव से हम संतान, शिक्षा व प्रेम संबंध देखते हैं. इसलिए आपको सूर्य को जल अवश्य देना चाहिए और आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करना आपके लिए शुभ होगा.

आपकी जन्म कुंडली में आपके भाग्य भाव के स्वामी बृहस्पति देव हैं. यदि भाग्य अगर कमजोर है तब विष्णु जी की पूजा नियमित रुप से आपको करनी चाहिए. आप नियमित रुप से विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ भी करें. यह आपके लिए अत्यंत लाभदायक होगा. मेष लग्न होने से आपके लिए मूंगा, माणिक्य और पुखराज शुभ रत्न हैं. आप इन्हें धारण कर सकते हैं.

इसके अतिरिक्त कुंडली में जिस ग्रह की दशा चल रही होती है उसके मंत्रों का जाप अवश्य करना चाहिए क्योकि जन्म कुंडली में जिस ग्रह की दशा चलती है उसी के अनुसार जीवन में फलों की प्राप्ति होती है.

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जन्म कुंडली में कैंसर रोग के कारण | Causes for Cancer Disease in Janam Kundli

किसी भी रोग के होने की संभावना को एक कुशल ज्योतिषी अपने पूर्वानुमान से बता सकता है लेकिन इसके लिए कुंडली में मौजूद बहुत सी बातों का मिलना जरुरी है. पाठको को किसी एक बात को लेकर किसी भी प्रकार का भ्रम नहीं पालना चाहिए. आज इस लेख के माध्यम से आपको कैंसर रोग होने के योगों के विषय में बताया जाएगा. इस रोग के होने में ग्रहों के साथ भाव भी पीड़ित होना चाहिए. फिर दशा/अन्तर्दशा का आंकलन किया जाना चाहिए, उसके बाद अंत में गोचर देखा जाना चाहिए.

कैंसर एक लम्बी अवधि तक होने वाला रोग हैं. इसलिए छ्ठे भाव व अष्टम भाव का संबंध बनना आवश्यक है क्योकि छठा भाव रोग और आठवाँ भाव लम्बी अवधि तक होने वाले रोग हैं. शनि और राहु लम्बे समय तक चलने वाले रोगो की सूचना देते हैं. इसलिए इन दोनो ग्रहों की भूमिका भी कैंसर रोग के होने में मुख्य होती है. कैंसर रोग का संबंध राहु, पीड़ित चंद्रमा, पीड़ित बृहस्पति या शनि से होता है और यह मेष, वृष, कर्क, तुला और, मकर राशियों से संबंधित होता है. किसी व्यक्ति की कुण्डली में चंद्रमा जब षष्ठेश या अष्टमेश होकर पीड़ित होता है और साथ ही दशा भी प्रतिकूल चल रही हो तब व्यक्ति को कैंसर रोग होने की संभावना बनती है.

जन्म कुंडली में जब एक भाव पर ही अधिकतर पाप ग्रहों का प्रभाव होता है, विशेषकर शनि, राहु व मंगल से तब उस संबंधित भाव वाले अंग में कैंसर होने की संभावना बनती है. जन्म कुंडली में यदि नेप्च्यून  व यूरेनस आमने-सामने हो तब इसे अत्यधिक अशुभ माना जाता है और यह बहुत ही घातक परिणाम देने वाले सिद्ध हो सकते हैं. यदि जन्म कुंडली में दशानाथ पीड़ित होता है तब इस रोग के होने की संभावना अधिक होती है.

कैंसर रोग जिस दशा में होता है, उसके बाद आने वाली दशाओं का आंकलन किया जाना चाहिए. यदि यह दशाएँ शुभ ग्रहों की है या अनुकूल ग्रह की है या योगकारक ग्रह की दशा आती है तब रोग का पता आरंभ में ही चल जाता है और उपचार भी हो जाता है. रोग होने की स्थिति में जन्म कुंडली के साथ नवांश कुंडली, षष्टियाँश कुंडली और अष्टमांश कुंडली का भी भली-भाँति विश्लेषण करना चाहिए उसके बाद किसी नतीजे पर पहुंचना चाहिए.

राहु को कैंसर का कारक माना गया है लेकिन शनि व मंगल भी यह रोग देते हैं. गुरु को वृद्धि का कारक ग्रह माना जाता है और कैंसर शरीर के किसी अंग में अवांछित वृद्धि से ही होता है और साथ ही यदि यह षष्ठेश या अष्टमेश होकर पीड़ित है तब कैंसर की संभावना बनती है.

कैंसर रोग होने के योग | Yogas For Cancer Disease

  • यदि जन्म कुंडली में मंगल, चंद्रमा और षष्ठेश की युति हो और साथ में सूर्य भी शामिल है तब व्यक्ति को कैंसर रोग होने की संभावना बनती है.
  • चंद्रमा व शनि छठे भाव में स्थिति है तब व्यक्ति को पचपन वर्ष की उम्र पार करने के बाद रक्त कैंसर हो सकता है.
  • जन्म कुंडली में बृहस्पति, शनि व केतु की युति कैंसर का कारण बनती है.
  • आश्लेषा नक्षत्र, लग्न या छठे भाव से संबंधित होने पर और मंगल से पीड़ित होने पर कैंसर होने की संभावना बनती है.
  • डॉ वी.बी. रमन के मत से छठे भाव का स्वामी पाप ग्रह होकर लग्न में स्थित हो या आठवें भाव में स्थित हो या दसवें भाव में स्थित हो तब कैंसर रोग होने की संभावना बनती है.
  • शनि छठे भाव में राहु के नक्षत्र में स्थित हो और पीड़ित हो तब कैंसर रोग की संभावना बनती है.
  • शनि और मंगल की युति छठे भाव में आर्द्रा या स्वाति नक्षत्र में हो रही हो.


त्वचा का कैंसर | Yogas For Skin Cancer

  • मंगल और राहु छठे या आठवें भाव को पीड़ित कर रहे हों तब त्वचा का कैंसर हो सकता है.
  • छ्ठे भाव में मेष राशि हो या स्वाति या शतभिषा नक्षत्र पड़ रहा हो और शनि छठे भाव को पीड़ित कर रहा हो तब त्वचा कैंसर का रोग हो सकता है.


पेट का कैंसर | Yogas For Stomach Cancer

  • जन्म कुंडली में राहु या केतु लग्न में षष्ठेश के साथ हो.
  • छठा भाव पीड़ित हो और राहु या केतु, आठवें या दसवें भाव में स्थित हो.


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अगर आपकी कुंडली में हैं ये योग तो जा सकते हैं विदेश

जन्म कुंडली में बहुत से शुभ – अशुभ योगो के साथ विदेश यात्रा के योग भी मौजूद होते हैं. जब अनुकूल ग्रहों की दशा/अन्तर्दशा कुंडली में चलती है तब व्यक्ति विदेश जाता है. वर्तमान समय में विदेश जाना सम्मान की बात भी समझी जाने लगी है और अधिक पैसे की चाहत में भी लोग विदेश यात्रा करने लगे हैं. बहुत बार व्यक्ति विदेश जाने की इच्छा तो रखता है लेकिन जा नहीं पाता है. आइए उन योगों के बारे में जाने जिनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि इस कुंडली में “विदेश जाने के योग” बनते हैं. उसके बाद उन दशाओं की भी बात करेगें, जिनकी दशा में व्यक्ति विदेश जा सकता है.

कुंडली के अनुसार विदेश यात्रा के योग | Yogas For Foreign Travel According To Horoscope

  • जन्म कुंडली में सूर्य लग्न में स्थित हो तब व्यक्ति विदेश यात्रा करने की संभावना रखता है.
  • कुंडली में बुध आठवें भाव में स्थित हो.
  • कुंडली में शनि बारहवें भाव में स्थित हो तब भी विदेश यात्रा के योग बनते हैं.
  • लग्नेश बारहवें भाव में स्थित है तब भी विदेश यात्रा के योग बनते हैं.
  • जन्म कुंडली में दशमेश और उसका नवांशेश दोनो ही चर राशियों में स्थित हो.
  • लग्नेश, कुंडली में सप्तम भाव में चर राशि में स्थित हो तब भी विदेश यात्रा के योग बनते हैं.
  • दशमेश, नवम भाव में चर राशि में स्थित हो तब भी विदेश यात्रा के योग बनते हैं.
  • सप्तमेश अगर नवम भाव में स्थित है तब भी व्यक्ति विदेश जा सकता है.
  • कुंडली में बृहस्पति चतुर्थ, छठे, आठवें या बारहवें भाव में स्थित है तब भी विदेश यात्रा के योग होते है.
  • द्वादशेश और नवमेश में राशि परिवर्तन होने से भी व्यक्ति विदेश यात्रा करता है.
  • जन्म कुंडली में बारहवाँ भाव या उसका स्वामी अष्टमेश से दृष्ट हो.
  • कुंडली में चंद्रमा ग्यारहवें या बारहवें भाव में स्थित हो तब भी विदेश यात्रा के योग बनते हैं.
  • शुक्र जन्म कुंडली के छठे, सातवें या आठवें भाव में स्थित हो.
  • राहु कुंडली के पहले, सातवें या आठवें भाव में स्थित हो.
  • छठे भाव का स्वामी कुंडली में बारहवें भाव में स्थित हो.
  • दशम भाव व दशमेश दोनो ही चर राशियों में स्थित हों.
  • लग्नेश और चंद्र राशिश दोनो ही चर राशियों में स्थित हो तब भी व्यक्ति विदेश यात्रा करता है.
  • बारहवें भाव का स्वामी नवम भाव में स्थित होने पर भी विदेश यात्रा होती है.
  • लग्नेश और नवमेश दोनो में आपस में राशि परिवर्तन होने पर भी विदेश यात्रा होती है.
  • नवमेश व द्वादशेश दोनो ही चर राशियों में स्थित हो तब भी व्यक्ति विदेश यात्रा करता है.
  • यदि कुंडली के चतुर्थ भाव में बारहवें भाव का स्वामी बैठा हो तब व्यक्ति विदेश में शिक्षा ग्रहण करता है.


विदेश यात्रा का समय | Period For Foreign Travel

  • जन्म कुंडली में यदि उच्च के सूर्य की दशा चल रही हो तब व्यक्ति के विदेश जाने के योग बनते हैं.
  • यदि उच्च के चंद्रमा या उच्च के ही मंगल की भी दशा चल रही हो तब भी व्यक्ति विदेश यात्रा करता है.
  • उच्च के बृहस्पति की दशा में भी व्यक्ति की विदेश यात्रा होती है.
  • यदि मंगल बली होकर लग्न में स्थित है या सूर्य से संबंधित है तब मंगल की दशा में भी विदेश यात्रा होने की संभावना बनती है.
  • कुंडली में यदि नीच के बुध की दशा चल रही है तब भी विदेश यात्रा हो सकती है.
  • बृहस्पति की दशा चल रही हो और वह सातवें या बारहवें भाव में चर राशि में स्थित हो.
  • शुक्र की दशा चल रही हो और वह एक पाप ग्रह के साथ सप्तम भाव में स्थित हो.
  • शनि की दशा चल रही हो और शनि बारहवें भाव में या उच्च नवांश में स्थित हो.
  • राहु की दशा कुंडली में चल रही हो और राहु कुंडली में तीसरे, सातवें, नवम या दशम भाव में स्थित हो.
  • जन्म कुंडली में सूर्य की महादशा में केतु की अन्तर्दशा चल रही हो तब भी विदेश जाने की संभावना बनती है.
  • यदि केतु की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा चल रही हो और कुंडली में सूर्य, केतु से छठे, आठवें या बारहवें भाव में स्थित हो.
  • केतु की महादशा में चंद्रमा की अन्तर्दशा चल रही हो और केतु से चंद्रमा केन्द्र/त्रिकोण या ग्यारहवें भाव में स्थित हो.
  • कुंडली में शुक्र की महादशा में बृहस्पति की अन्तर्दशा चल रही हो तब भी विदेश यात्रा की संभावना बनती है.
  • कुंडली में राहु की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा चल रही हो और राहु से सूर्य केन्द्र/त्रिकोण या ग्यारहवें भाव का स्वामी हो.
  • शनि की महादशा में बृहस्पति की अन्तर्दशा चल रही हो और शनि से बृहस्पति केन्द्र/त्रिकोण या दूसरे या ग्यारहवें भाव का स्वामी हो.
  • बुध की महादशा में शनि की अन्तर्दशा चल रही हो और बुध से शनि छठे, आठवें, या बारहवें भाव में स्थित हो.
  • शनि की महादशा में केतु की अन्तर्दशा चल रही हो और केतु की लग्नेश से युति हो.
  • बृहस्पति की महादशा में बुध की अन्तर्दशा चल रही हो और बृहस्पति से बुध छठे, आठवें या बारहवें भाव में स्थित हो तब विदेश जाने की संभावना बनती है.
  • मंगल की महादशा में बुध की अन्तर्दशा चल रही हो और बुध व मंगल की युति हो रही हो.
  • मंगल की महादशा में शनि की अन्तर्दशा चल रही हो और मंगल से शनि केन्द्र/त्रिकोण अथवा ग्यारहवें भाव में स्थित हो तब विदेश जाने की संभावना बनती है.


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काम बनेगा या नहीं: खुद जाने कुंडली से

वैदिक ज्योतिष में बहुत सी बातों का अध्ययन करने के बाद ही किसी नतीजे पर पहुंचा जा सकता है. किसी एक बात के आधार पर फलित करना किसी की जान को खतरे में डालने जैसा काम हो सकता है. इसलिए फलकथन कहने के लिए जितनी भी आवश्यक शर्ते होती हैं उन सभी का ध्यान से विश्लेषण करना चाहिए. फलकथन के लिए कुंडली के योग, दशा, घटना से संबंधित भाव और संबंधित वर्ग कुंडलियाँ, घटना के समय का गोचर व उस वर्ष की वर्ष प्रवेश कुंडली अवश्य देखनी चाहिए ताकि होने वाली घटना की अधिक से अधिक पुष्टि हो सकें. आज इस वेबकास्ट में हम घटनाओं के घटने के समय का अनुमान लगाने का प्रयास करेगें कि व्यक्ति को फल कब मिलेगें.

घटना के घटने के लिए आवश्यक तथ्य | Some Important Principles for An Incident

किसी भी व्यक्ति विशेष के जीवन में किसी भी घटना के घटने के लिए उसकी जन्म कुंडली में उन योगो का होना आवश्यक है.

उदाहरण के लिए जन्म कुंडली में संतान जन्म की घटना को देखने के लिए सबसे पहले ये देखेगे कि क्या कुंडली में संतान प्राप्ति के योग मौजूद हैं.यदि जन्म कुंडली में योग ही नहीं होगें तब बाकी बाते देखना निष्फल होगा. इसलिए किसी भी घटना के होने के लिए कुंडली में प्रोमिस होना आवश्यक है. जन्म कुंडली में किसी घटना के योग मिलने के बाद यह देखा जाएगा कि किस दशा/अन्तर्दशा में घटना घट सकती है. उसे नोट कर लेना चाहिए.

जब हमें दशा पकड़ में आ जाती है तब हम शनि और गुरु का दोहरा गोचर देखेगे कि क्या वह संबंधित भाव को अपनी दृष्टि से सक्रिय कर रहा है? जन्म कुंडली में किसी भी घटना के घटने में शनि व गुरु ग्रह का दोहरा गोचर आवश्यक होता है. बिना इनके दोहरे गोचर के जीवन में कोई घटना घटित नही होती है.

शनि को काल कहा गया है. काल का अर्थ है – समय अर्थात शनि का गोचर किसी घटना के लिए समय निर्धारित करता है. गुरु को जीव कहा गया है और यह शनि द्वारा तय किए समय पर अपनी अनुमति की मोहर लगाते हैं. इस तरह से जिस घटना का समय शनि ने ढ़ाई वर्ष के लिए तय किया है उसे गुरु ने 12 महीने में बांध दिया है.

इसके बाद संबंधित घटना को मंगल का गोचर 45 दिन तक के लिए सीमित कर देता है और सूर्य का गोचर संबंधित घटना को 30 दिन में बांध देता है. अंतिम सहमति चंद्रमा की होती है जो दो से ढ़ाई दिन में काम होने का संकेत देता है. जिस भाव से संबंधित फल जिस दिन मिलते हैं उस दिन उस भाव के आसपास ही अधिकतर ग्रहों का गोचर होता है.

संबंधित वर्ग कुंडली | Related Varga Kundali

आइए अब हम संबंधित वर्ग कुंडलियों की चर्चा भी कर लें. जन्म कुंडली में जिस भाव से संबंधित फल मिलने हैं उनकी पुष्टि वर्ग कुंडलियों में अवश्य करनी चाहिए. बहुत बार जन्म कुंडली में योग मौजूद होते हैं लेकिन संबंधित वर्ग कुंडली में योग मौजूद नही होते हैं.

उदाहरण के लिए यदि व्यवसाय संबंधी प्रश्न है तब जन्म कुंडली के दशम भाव के साथ दशमांश कुंडली को भी देखना चाहिए कि उसमें क्या योग हैं. यदि दशमांश कुंडली में योग अच्छे नहीं हैं तब व्यक्ति को व्यवसाय में दिक्कत हो सकती है और तब दशा व गोचर भी ज्यादा शुभ फल नहीं दे पाएंगें.

बहुत बार ऎसा भी होता है कि जन्म कुंडली किसी घटना के होने का प्रोमिस करती है लेकिन वर्ग कुंडली नहीं करती तब ऎसे में व्यक्ति परेशान ही रहता है. यदि जन्म कुंडली में योग हैं और वर्ग कुंडली में नही है तब घटना के घटित होने में विलम्ब व बाधाओ का सामना करना पड़ता हैं.

वर्ष कुंडली का अध्ययन | Analysis of Varsha Kundali

आइए अब हम एक नजर वर्ष कुंडली पर भी डालने का प्रयास करते हैं. जिस वर्ष सभी बाते किसी घटना के होने का संकेत दे रही है तब उस वर्ष का वर्षफल देखे कि उसमें दशा/अन्तर्दशानाथ की क्या स्थिति है और संबंधित भाव किस हाल में है.

वर्षफल में इस घटना की पुष्टि करने का प्रयास करें कि क्या उसकी पुष्टि हो रही है. यदि वर्ष कुंडली में पुष्टि नही हो रही है तब उस घटना के होने में कुछ विलम्ब हो सकते हैं. वर्ष कुंडली में किसी भी घटना के घटने की पुष्टि स्पष्ट तौर पर नजर आती है.

उदाहरण | Example

आइए एक उदाहरण से समझने का प्रयास करते हैं. माना किसी जतक का विवाह होना है तब सबसे पहले यह देखेगे कि क्या कुंडली में विवाह के योग स्थित हैं? सप्तम भाव से व्यक्ति का विवाह देखा जाता है. इसकी पुष्टि नवांश कुंडली में भी करेगें. अब दशा को देखेगे कि किस दशा/अन्तर्दशा में व्यक्ति का विवाह होने की सबसे अधिक संभावना बनती है. फिर उन दशाओं की पुष्टि नवांश कुंडली में भी करेगें. इसके बाद यह देखेगे कि क्या शनि व गुरु का दोहरा गोचर सप्तम भाव या सप्तमेश पर हो रहा है. यदि हाँ तब विवाह होने की अति बली संभावना बन जाएगी. उसके बाद वर्ष कुंडली में देखेगे कि सप्तमेश व लग्नेश का क्या संबंध है? क्या दोनो का इत्थशाल हो रहा है और वर्ष कुंडली के अधिकतर ग्रहों का प्रभाव सप्तम भाव या सप्तमेश पर होना चाहिए.

विवाह के लिए दशा/अन्तर्दशा तय करते समय सावधानी बरतनी चाहिए. सप्तमेश की दशा, सप्तम में बैठे ग्रह की दशा, द्वित्तीय व द्वितीयेश की दशा, पंचम व पंचमेश की दशा में विवाह होता है. सप्तम या सप्तमेश को प्रभावित करने वाले ग्रहो की दशा में विवाह संपन्न हो जाता है. इस तरह से नवांश कुंडली के लग्न्/लग्नेश और सप्तम/सप्तमेश की दशा में विवाह होता है.

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मंगल के भिन्नाष्टकवर्ग का विवेचन | Analysis of Bheenshastakvarga of Mars

मंगल के भिन्नाष्टकवर्ग द्वारा कुण्डली का अध्ययन करके जातक को मंगल के शुभाशुभ प्रभावों को बताया जा सकता है. मंगल के भिन्नाष्टकवर्ग द्वारा प्राप्त अंकों से जातक की अनुकूल और विपरित परिस्थितियों को समझने का पूर्ण प्रयास किया जा सकता है. निचे दिए गए संयोजनों द्वारा हम इसे समझने का प्रयास करेंगे.

कुण्डली में मंगल के भिन्नाष्टक में यदि 0 से 3 बिन्दु प्राप्त हों तो यह स्थिति निर्बलता को दर्शाती है. एक ओर मंगल शारीरिक शक्ति, बल का प्रतिक होता है ऎसे में जब यही कम अंकों के साथ कुण्डली में स्थित हो तो, इसमें कमी को दर्शाता है व्यक्ति के साहस में कमी आती है, अक्षमता आती है, जातक नकारात्मक सोच की ओर उन्मुख होता है. भू संपत्ति से परेशानी हो सकती है.

यदि कुण्डली में मंगल 4 बिन्दुओं के साथ स्थित हो तो वह औसत स्तर का फल देने वाला बनता है. और इससे एक दो अंक अधिक होने पर जातक को शुभता में अधिकता प्राप्त होती है. व्यक्ति उन्नती को पाता है. उच्च पद और धन संपदा की प्राप्ति होती है. अचानक से फल प्राप्ति भी होती है, जातक में साहस उत्पन्न होता है और वह नेतृत्व का भाव पाता है.

इसी प्रकार यदि मंगल 7 या 8 बिन्दुओं के साथ केन्द्र अथव अत्रिकोण भावों के साथ अपनी उच्च राशि में या स्वराशि में स्थित हो तो मंगल से शुभ फलों की प्राप्ति अधिक होती है. जातक को सफलता तथा संघर्ष में विजय मिलती है. संपति से धनवान बनता है, ओजस्वी भाव में वृद्धि होती है. सम्मानित व्यक्तियों से सम्मान की प्राप्ति होती है. यहां एक अन्य बात भी ध्यान देने योग्य बनती है कि यदि मंगल 4 बिन्दुओं के साथ मेष, सिंह, वृश्चिक, धनु अथवा मकर राशि का होकर लग्न में स्थित हो तो उक्त स्थिति में भी वह शासक बनने की योग्यता पाता है.

यदि मंगल 4 बिन्दुओं के साथ लग्न, चतुर्थ, पंचम, नवम या दशम भाव में स्थित हो तो उसे श्रेष्ठ फल की प्राप्ति संभवत: हो ही जाती है और अगर इन्हीं भावों में जातक को और अधिक बिन्दु मिले जैसे की 7 या 8 तो ऎसे में जातक को चहुंमुखी सफलता मिलती है.

जब मंगल अधिकतम बिन्दु वाली राशि में गोचर करता है तो उस समय जमीन-जायदाद खरीदने के लिए सबसे अच्छा समय माना जाता है. यह लाभ की स्थिति को बताता है और हानि को दूर रखने की संभावना दर्शाता है.

बिन्दु से हीन कक्ष्या में मंगल के गोचर करने से स्वास्थ्य और व्यक्तिगत सुरक्षा को खतरा हो सकता है. ज्योतिष के ग्रंथ अनुसार जब मंगल किसी राशि विशेष में गोचर करता है जिसमें उसे 7 या 8 बिन्दु मिले हों तो जातक को भूमि, मकान इत्यादि का सुख अवश्य मिलता है, शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है.

यदि कुण्डली में अधिकतम बिन्दुओं के साथ स्थित मंगल राहु से युति कर रहा हो या राहु के नक्षत्र में हो तो ऎसा जातक प्रशासनिक अधिकारी अथवा सुरक्षा बल या सेना अधिकारी जैसे काम में जा सकता है. मंगल के भिन्नाष्टक वर्ग में मंगल से तीसरे भाव में शोधन से पूर्व प्राप्त बिन्दुओं की संख्या से जातक के भाई बहनों की संख्या का पता भी लगाया जा सकता है. ऎसे ही कई और नियमों के द्वारा भी मंगल के भिन्नाष्टकवर्ग का फल कथन करने में आसानी होती है.

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चंद्रमा का भिन्नाष्टक और उसका फलकथन

चंद्रमा के भिन्नाष्टकवर्ग द्वारा जातक के शुभाशुभ फलों के बारे में बताया जा सकता है. कुण्डली में 4 बिन्दुओं के साथ स्थित चंद्रमा औसत स्तर का फल देने वाला बनता है. परंतु यदि यह 5 से 8 बिन्दुओं के साथ हो तो जातक को जीवन में राजसी सुख की प्राप्ति हो सकती है, मन से प्रसन्नत का अनुभव होता है, समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त होती है.

जन्म कुण्डली चंद्रम का 0 से 3 बिन्दुओं के साथ स्थित होना उसके कमजोर पक्ष को दर्शाता है. चंद्रमा के इस प्रकार से होने पर जातक मन से व्याकुल, तनाव ग्रस्त और चिंतित रह सकता है, मान हानि का भय बना रह सकता है. माता को भी कई प्रकार से स्वास्थ्य हानि हो सकती है.

चंद्रमा 6 या 8 बिन्दुओं के साथ केन्द्र में स्थित हो तो जातक बुद्धिमान व समृद्धि को पाता है. मन से संतुष्ट रहने वाला तथा प्रेम प्रिय होता है.

3, या 3 से कम बिन्दुओं के साथ चंद्रमा बृहस्पति से 6, 8 या 12वें भाव में स्थित हो तो जातक विषाद से ग्रस्त हो सकता है उसे रोग व शत्रु का भय बना ही रहता है.

चंद्रमा के भिन्नाष्टकवर्ग में जिस राशि में अधिक बिन्दु होते हैं उससे प्रभावित जातक के लिए यह लाभकारी सिद्ध होते हैं. लेखकों कला से संबंधि जातकों की कुण्डली अधिकतम बिन्दुओं के साथ स्थित चंद्रमा अच्छा रहता है. इसके कारण व्यक्ति कला जगत में अच्छा नाम कमा सकता है.

केन्द्र अथवा त्रिकोण भावों में 6 या 8 बिन्दुओं के साथ स्थित होने पर जातक को जीवन में उच्च स्तर का रहन सहन, शिक्षा प्राप्त होते हैं. धन व ऎश्वर्य को पाने हेतु चंद्रमा का शुभ होना अत्यंत आवश्यक होता है. इसके साथ ही इस पर गुरू की दृष्टि होना और भी शुभता बढा़ता है.

नीच राशिगत चंद्रमा 0 से 3 बिन्दुओं के साथ जिस भाव में भी स्थित होता है उस भाव के नैसर्गिक तत्वों को खराब कर देता है. इस प्रकार जिस दिन चंद्रमा जब ऎसी किसी राशि में गोचर करता है जिस राशि में वह अपने भिन्नाष्टक वर्ग में 0 बिन्दु देता हो तो उक्त दिन में किसी भी शुभ कार्य को टालना ही अच्छा होता है.

जन्म कुण्डली में चंद्रमा अपने भिन्नाष्टक वर्ग में 3 और कम बिन्दुओं के साथ स्थित हो तो ऎसे जातक को सेहत से संबंधि परेशानियां हो सकती हैं. आयु पर भी प्रभाव पड़ता है. यदि कृष्ण पक्ष का चंद्रमा अपनी नीच राशि में या शत्रु राशि के साथ होकर केन्द्र या त्रिकोण में बैठा हो और भिन्नाष्टकवर्ग में केवल 2 या 3 बिन्दु ही प्राप्त हो ऎसी स्थिति में चंद्रमा द्वारा गृहीत भाव का बल समाप्त हो जाता है.

चंद्रमा के भिन्नाष्टकवर्ग में चंद्रमा से अष्टम भाव के बिन्दुओं की संख्या को चंद्रमा के शोध्य पिण्ड से गुणा करके उक्त गुणनफल को 27 से भाग देने पर जो शेषफल हो उसे अश्विनी नक्षत्र से शेषफल के बराबर गिनकर नक्षत्र देखें अब इस नक्षत्र और इससे त्रिकोण के नक्षत्र पर चंद्रमा का गोचर होने पर व्यक्ति लडा़ई झगडों या निराशा से गुजर सकता है.

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क्यों होता है मानसिक रोग और अवसाद आईये जाने ज्योतिष से

आज के इस लेख में हम मानसिक बीमारियों के अध्ययन की बात करेगें. मानसिक बीमारी होने के बहुत से कारण होते हैं लेकिन इन कारणों का ज्योतिषीय आधार क्या है, इसकी चर्चा इस लेख के माध्यम से की जाएगी. चिकित्सा ज्योतिष में सभी बीमारियों के कुछ योग होते हैं और कुछ संबंध बने होते हैं जिनके आधार पर यह पता चलता है कि व्यक्ति विशेष को किस तरह के रोग हो सकते हैं. लेकिन इसका निर्धारण किसी कुशल ज्योतिषी से ही कराना चाहिए अन्यथा बेकार का तनाव उत्पन्न हो सकता है. आइए कुंडली के उन योगों का अध्ययन करें जिनके आधार पर मानसिक बिमारियों का पता चलता है.

मानसिक बीमारी में चंद्रमा, बुध, चतुर्थ भाव व पंचम भाव का आंकलन किया जाता है. चंद्रमा मन है, बुध से बुद्धि देखी जाती है और चतुर्थ भाव भी मन है तथा पंचम भाव से बुद्धि देखी जाती है. जब व्यक्ति भावुकता में बहकर मानसिक संतुलन खोता है तब उसमें पंचम भाव व चंद्रमा की भूमिका अहम मानी जाती है. सेजोफ्रेनिया बीमारी में चतुर्थ भाव की भूमिका मुख्य मानी जाती है. शनि व चंद्रमा की युति भी मानसिक शांति के लिए शुभ नहीं मानी जाती है. मानसिक परेशानी में चंद्रमा पीड़ित होना चाहिए.

  • जन्म कुंडली में चंद्रमा अगर राहु के साथ है तब व्यक्ति को मानसिक बीमारी होने की संभावना बनती है क्योकि राहु मन को भ्रमित रखता है और चंद्रमा मन है. मन के घोड़े बहुत ज्यादा दौड़ते हैं. व्यक्ति बहुत ज्यादा हवाई किले बनाता है.
  • यदि जन्म कुंडली में बुध, केतु और चतुर्थ भाव का संबंध बन रहा है और यह तीनों अत्यधिक पीड़ित हैं तब व्यक्ति में अत्यधिक जिदपन हो सकती है और वह सेजोफ्रेनिया का शिकार हो सकता है. इसके लिए बहुत से लोगों ने बुध व चतुर्थ भाव पर अधिक जोर दिया है.
  • जन्म कुंडली में गुरु लग्न में स्थित हो और मंगल सप्तम भाव में स्थित हो या मंगल लग्न में और सप्तम में गुरु स्थित हो तब मानसिक आघात लगने की संभावना बनती है.
  • जन्म कुंडली में शनि लग्न में और मंगल पंचम भाव या सप्तम भाव या नवम भाव में स्थित हो तब मानसिक रोग होने की संभावना बनती है.
  • कृष्ण पक्ष का बलहीन चंद्रमा हो और वह शनि के साथ 12वें भाव में स्थित हो तब मानसिक रोग की संभावना बनती है. शनि व चंद्र की युति में व्यक्ति मानसिक तनाव ज्यादा रखता है.
  • जन्म कुंडली में शनि लग्न में स्थित हो, सूर्य 12वें भाव में हो, मंगल व चंद्रमा त्रिकोण भाव में स्थित हो तब मानसिक रोग होने की संभावना बनती है.
  • जन्म कुंडली में मांदी सप्तम भाव में स्थित हो और अशुभ ग्रह से पीड़ित हो रही हो.
  • राहु व चंद्रमा लग्न में स्थित हो और अशुभ ग्रह त्रिकोण में स्थित हों तब भी मानसिक रोग की संभावना बनती है.
  • मंगल चतुर्थ भाव में शनि से दृष्ट हो या शनि चतुर्थ भाव में राहु/केतु अक्ष पर स्थित हो तब भी मानसिक रोग होने की संभावना बनती है.
  • जन्म कुंडली में शनि व मंगल की युति छठे भाव या आठवें भाव में हो रही हो.
  • जन्म कुंडली में बुध पाप ग्रह के साथ तीसरे भाव में हो या छठे भाव में हो या आठवें भाव में हो या बारहवें भाव में स्थित हो तब भी मानसिक रोग होने की संभावना बनती है.
  • यदि चंद्रमा की युति केतु व शनि के साथ हो रही हो तब यह अत्यधिक अशुभ माना गया है और अगर यह अंशात्मक रुप से नजदीक हैं तब मानसिक रोग होने की संभावना अधिक बनती है.
  • जन्म कुंडली में शनि और मंगल दोनो ही चंद्रमा या बुध से केन्द्र में स्थित हों तब मानसिक रोग होने की संभावना बनती है.


मिरगी होने के जन्म कुंडली में लक्षण | Signs of Epilepsy In Astrology

इसके लिए चंद्र तथा बुध की स्थिति मुख्य रुप से देखी जाती है. साथ ही अन्य ग्रहों की स्थिति भी देखी जाती है.

  • शनि व मंगल जन्म कुंडली में छठे या आठवें भाव में स्थित हो तब व्यक्ति को मिरगी संबंधित बीमारी का सामना करना पड़ सकता है.
  • कुंडली में शनि व चंद्रमा की युति हो और यह दोनो मंगल से दृष्ट हो.
  • जन्म कुंडली में राहु व चंद्रमा आठवें भाव में स्थित हों.


मानसिक रुप से कमजोर बच्चे अथवा मंदबुद्धि बच्चे | Children Born with Mental Instability or Disorders

  • जन्म के समय लग्न अशुभ प्रभाव में हो विशेष रुप से शनि का संबंध बन रहा हो. यह संबंध युति, दृष्टि व स्थिति किसी भी रुप से बन सकता है.
  • शनि पंचम से लग्नेश को देख रहा हो तब व्यक्ति जन्म से ही मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है.
  • जन्म के समय बच्चे की कुण्डली में शनि व राहु पंचम भाव में स्थित हो, बुध बारहवें भाव में स्थित हो और पंचमेश पीड़ित अवस्था में हो तब बच्चा जन्म से ही मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है.
  • पंचम भाव, पंचमेश, चंद्रमा व बुध सभी पाप ग्रहों के प्रभाव में हो तब भी बच्चा जन्म से ही मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है.
  • जन्म के समय चंद्रमा लग्न में स्थित हो और शनि व मंगल से दृष्ट हो तब भी व्यक्ति मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है.
  • पंचम भाव का राहु भी व्यक्ति की बुद्धि को भ्रष्ट करने का काम करता है, बुद्धि अच्छी नहीं रहती है.
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