आपकी कुंडली में चन्द्र कहां है? क्या होगा उसका प्रभाव, जानिये

वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा को मन का कारक कहा जाता है और इसी के प्रभाव से प्रभावित हो व्यक्ति का मन हर समय चलायमान रहता है. उत्तर कालामृत में चंद्रमा को बुद्धि पुष्य सुगंध कहा है अर्थात चंद्रमा को बुद्धि (मन) का कारक कहकर संबोधित किया है. ज्योतिष में चंद्रमा चंद्रकला के रुप में देवी देवताओं के आभूषण रुप में अलंकृत है. चंद्रमा भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान है तो दूसरी ओर देवी चंद्रघंटा के मस्तक को शोभित करता है.  जन्म कुण्डली में दशा पद्धति चंद्रमा पर आधारित होती है विशोंतरी दशा में चंद्रमा की नक्षत्र गति देखी जाती है.

मानव जीवन को वैसे तो सभी ग्रह प्रभावित करते हैं, लेकिन व्यक्ति के दैनिक जीवन पर चंद्रमा का प्रभाव सबसे अधिक महत्व रखता है. ज्योतिष अनुसार चंद्रमा एक राशि में सवा दो दिन तक रहता है और इससे अधिक तेज चलने वाला अन्य कोई ग्रह नहीं है जो इतनी शीघ्रता से राशि परिवर्तन करता हो चंद्रमा मन का कारक है इसलिए मन के विचारों में भी तीव्र परिवर्तन देखा जा सकता है.

मन से तेज को कोई नही इस मन की सीमा नही अभी यहां तो क्षण भर में आकाश के अनंत को छू ले इसे रोकने के लिए ही तो अनेक साधु संत अपने को वर्षों की तपस्या में रत रखते है तब भी कोई कोई ही इसे काबू में रख पाने में सफल हो पाता है और जब साधक इसे इसे अपने नियंत्रण कर लेता है उसे मोक्ष का मार्ग दिखाई दे जाता है.

चंद्रमा के राशि परिवर्तन के कारण अलग-अलग भाव एवं राशि में भ्रमण के कारण व्यक्ति दुखी एवं प्रसन्न होता है. गोचर में जब भी चंद्रमा अपनी राशि से छठे, आठवें एवं बारहवें भाव में हो तो व्यक्ति की मानसिक स्थित ठीक नहीं होती व्यक्ति चिंताशील एवं अत्यधिक भावुक दिखाई देगा. चंद्रमा कर्क राशि में बली होता है और वृष राशि में उच्च बली तथा वृश्चिक राशि में नीच का होता है. चंद्रमा मित्र क्षेत्रीय, मित्र ग्रहों या गुरू से युति करता है तो व्यक्ति की इच्छाओं की पूर्ति होती है और ऊंचाइयां प्राप्त होती हैं.

कुण्डली में यदि चंद्रमा की स्थिति ठीक हो तो जातक में स्थिरता एवं विचारों का समायोजन दिखाई देगा. वह अपने को संयमी रखने में सशक्त होगा तथा धीरोदात्त गुणों से पूर्ण होगा. कुंडली में चंद्रमा उच्च का होने पर व्यक्ति को समाज में सम्मान की प्राप्ति हो पाएगी. व्यक्ति का स्वभाव चंचल होगा तथा उसकी प्रकृति विलासितापूर्ण हो सकती है.

नीच का चंद्रमा होने पर व्यक्ति रोगग्रस्त हो सकता है तथा जातक का मन अस्थिर रहेगा. कोई भी निर्णय लेने में वह डांवाडोल रह सकता है. स्वराशि का चंद्रमा होने पर व्यक्ति तेजस्वी होता है एवं अचानक धन की प्राप्ति करता है. व्यक्ति में सही गलत का निर्णय लेने की क्षमता होती है.

मित्र राशि में स्थित चंद्रमा जातक को सुखी, गुणवान और धनवान बनाता है.

इसके विपरित चंद्रमा का शत्रु राशि या क्षेत्र में होने पर जातक बीमारियों से ग्रसित हो सकता है. आत्मसंयम की कमी हो सकती है तथा नकारात्मकता का प्रभाव देखा जा सकता है.

शुभ एवं बली चंद्रमा व्यक्ति को भाग्यवान, सुंदर तथा सुखी बनाता है. जन्म कुण्डली में बल युक्त चंद्रमा का उल्लेख इस प्रकार देखा जा सकता है. प्रधाना बल संयुक्त: संपूर्णशश लांछना। एकोपि कुरूते जातम नराधिप मरिन्दमान। आरोग्यं प्रददातु नो दिनकर: श्यचन्द्रों।। अत: कह सकते हैं कि बलयुक्त मजबूत चंद्रमा भाग्य को मजबूत करता है.

कुंडली में चंद्रमा क्षीण हो, 6, 8, 12 भाव में हो, उस पर पाप ग्रहों की दृष्टि हो, राहु-केतु से ग्रसित हो तो यह जातक के लिए कष्टकारक होता है. अत: ऎसे चंद्रमा को बली बनाने के लिए कुछ उपाय करना लाभप्रद रहता है. जैसे कि मोती चांदी की अंगूठी में जड़वाकर शुक्लपक्ष के सोमवार के दिन प्राण प्रतिष्ठा कराकर धारण करने से चंद्रमा की शुभता में वृद्धि होती है इसके अतिरिक्त सोमवार या पूर्णिमा के दिन उपवास रखेने से भी चंद्रमा शुभ फल देता है. भगवान शिव का पूजन एवं शिवलिंग पर जलाभिषेक करने से भी चद्रमा की शुभता प्राप्त कि जा सकती है.

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क्या आप व्यवसाय में सफल होंगे? ज्योतिष द्वारा जानिये

कुण्डली के बारह भावों में जलग्न को प्रमुख स्थान दिया जाता है. जातक परिजात के अनुसार लग्न, लग्नेश एवं लग्न के कारक सूर्य के बलवान होने पर जातक सुख सुविधा से संपन्न जीवन व्यतीत करता है. लग्न पर यदि सूर्य की दृष्टि हो तो जातक राजसेवा तथा पितृधन से युक्त होता है. इसी प्रकार यदि लग्न पर चंद्रमा की दृष्टि पडे़ तो जातक जल या जल से संबंधित वस्तुओं का व्यापारी होता है. विद्वानों के मतानुसार लग्न की राशि के अनुसार व्यक्ति का व्यवसाय होता है. लग्न में जो राशि आती है और लग्न में स्थित ग्रहों के अनुसार व्यक्ति की आजीविका होती है. व्यवसाय के विश्लेषण में जो महत्व नवम, दशम तथा एकादश भाव का है वही महत्व लग्न भाव का भी माना गया है.

यदि सूर्य लगन तथा लग्नेश पर अपना अधिक प्रभाव रखता हो या दशम में स्थित हो या दशमेश का नवांशपति हो तो जातक स्वर्ण का व्यवसाय, डाक्टर या हकीम वैद्यक, औषधि विक्रेता, मंत्री या सलाहकार जैसे कार्यों को कर सकता है. सूर्य द्वितीय भाव में हो और द्वितीयेश एवं लाभेश का लग्न से संब्म्ध हो तो व्यक्ति बैंक का कर्मचारी बनता है.

यदि चंद्रमा आजीविका कारक हो तो व्यक्ति कृषि, जलीय पदार्थों के क्रय-विक्रेय, वस्त्र संबंधि व्यापार या आभूषणों का व्यवसाय करता है.

यदि कुण्डली में मंगल आजीविका कारक हो तो व्यक्ति धातुओं का क्रय विक्रेय, अस्त्र-शस्त्र निर्माण, इंजीनियरिंग, सेना विभाग जैसे कार्यों में कार्यरत होता है.

यदि कुण्डली में बुध आजीविका कारक हो तो जातक लेखन, शिक्षण ज्योतिष, शिल्प इत्यादि कार्यों के व्यवसाय में कार्यरत हो सकता है.

कुण्डली में यदि गुरू आजीविका कारक हो तो व्यक्ति वेद पाठन अध्यापक, धर्म संस्थानों या न्यायाधीश जैसे कार्यों को करने वाला होगा.

कुण्डली में शुक्र आजीविका कारक हो तो व्यक्ति आभूषण विक्रेता, दुग्ध व्यवसाय करने वाला, होटल इत्यादि में कार्यरत, संगीत एवं नृत्य संबंधी कलाओं से आजीविका कमाने वाला हो सकता है.

विषम राशि यदि लग्न में हैं तब व्यक्ति साहस तथा पराक्रम के बल पर सफलता पाता है. ऎसे जातक में नेतृत्व, अधिकार तथा आदेश देने की प्रवृति होती है.यह जातक इसी प्रकार के व्यवसाय में सफलता हासिल करते हैं.

सम राशि लग्न में आती है तब जातक धीर तथा गंभीर होता है. यह सेवाकार्य करना पसन्द करते हैं. यह कर्त्तव्य पालन को अधिक महत्व देते हैं. ऎसा व्यक्ति अनुगामी या सहायक के रुप मे काम करना अधिक पसन्द करता है.

इसी प्रकार यदि लग्न में चर राशि होती है तो जातक घूमने-फिरने वाले कार्य अधिक करता है. वह पर्यटन, भ्रमण अथवा फेरी लगाने के कामों से अपनी आजीविका चलाता है. व्यक्ति किसी परिवहन सेवा से भी जुड़ सकता है. वह परिवहन सेवा से जुड़कर बहुत अधिक यात्राएँ कर सकता है. जातक कोई भी कार्य करें बिना भ्रमण के उसका कार्य पूरा नहीं होगा.

यदि लग्न में स्थिर राशि है तब जातक एक ही स्थान पर टिककर कार्य करता है. वह अपने कार्य में एकाग्रचित्त रहता है. व्यक्ति को एकान्त की आवश्यकता नहीं पड़ती है. वह पूरी निष्ठा से तन्मय होकर काम करता है. जो भी कार्य करता है वह स्थिर रहते हैं. उसे स्थिर कार्य करना पसन्द होता है.

लग्न में द्वि-स्वभाव राशि है तो व्यक्ति के आजीविका के साधन कभी स्थिर होते हैं तो कभी चर होते हैं. जातक का मन स्थिर नहीं रहता है. उसे कभी भ्रमण करना अच्छा लगता है तो कभी टिककर कार्य करना पसन्द होता है.

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कुण्डली में विवाह योग कैसे बनते हैं | How are marriage yogas formed in a Kundali | Marriage Yogas in Kundali | Marriage Yogas

विवाह के समय का निर्धारण करने में कुण्डली में बन रहे योग विशेष भूमिका निभाते है. किसी व्यक्ति को वैवाहिक जीवन में कितना सुख मिलेगा यह सब कुण्डली के योगों पर निर्भर करता है. शुभ ग्रह, शुभ भावों के स्वामी होकर जब शुभ भावों में स्थित हों तथा अशुभ ग्रह निर्बल होकर अशुभ भावों के स्वामी होकर, अशुभ भावों में स्थित हों तो व्यक्ति को अनुकुल फल देते हैं. कुण्डली के योग विवाह को किस प्रकार प्रभावित करते है.

शुक्र के प्रभाव स्वरूप | Effects of Venus

शुक्र को विवाह का मुख्य कारक माना जाता है. यही प्रेम संबंधों की आधारशिला को दर्शाता है और कुण्डली में शुक्र के प्रधान होने पर वैवाहिक जीवन सुखमय गुजरता है. विवाह जल्दी होता है तथा प्रेम विवाह भी हो सकता है.

चंद्रमा के प्रभाव स्वरुप | Effects of Moon

कुण्डली में चंद्रमा के बली होने पर वैवाहिक जीवन में कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है. प्रेम संबंधों में असफलता भी प्राप्त हो सकती है तथा दुख का सामना करना पड़ता है.

मंगल के प्रभाव स्वरुप | Effects of Mars

इसके प्रभाव के कारण जातक प्रेम विवाह के लिए उत्साहित देखा जा सकता है. विवाह के मामले में भाग्य साथ देता है. जीवन में वैवाहिक सुख प्राप्त होता है.

बुध के प्रभाव स्वरुप | Effects of Mercury

कुण्डली में बुध के बली होने पर व्यक्ति का वैवाहिक जीवन अच्छा गुजरता है. जातक सामाजिक मान मर्यादाओं का पालन करते हुए संबंधों में मजबूती बनाने का प्रयास करता है. परिवार की आज्ञा अनुरूप विवाह करने की चाह रखता है.

सूर्य के प्रभाव स्वरुप | Effects of Sun

सूर्य प्रधान होने पर व्यक्ति अपनी मन मुताबिक सोच समझकर विवाह का विचार करता है. इसके प्रभाव स्वरुप जातक में सुखी वैवाहिक जीवन जीने की इच्छा रहती है. इस कारण जातक विवाह संबंधों को मधुर बनाने में दक्ष होता है.

शनि के प्रभाव स्वरूप | Effects of Saturn

शनि से प्रभावित होने के कारण विवाह और प्रेम के प्रति निरसता का भाव रहता है. अधिकतर शनि प्रधान लोगों का विवाह देर से होता है. और इनके प्रेम संबंधों में ठहराव नहीं रह पाता. विवाह को लेकर चिड़्चिडा़पन देखा जा सकता है.

गुरू के प्रभाव स्वरूप | Effects of Jupiter

गुरू के प्रभाव स्वरूप विवाह जल्दी होता है. व्यक्ति प्रेम और रोमांस के मामलों में महत्वकांक्षी होता है. इनका वैवाहिक जीवन सुखी और समृद्धशाली होता है.

विवाह संबंधित अन्य योग | Other Yogas related to marriage

  • कुण्डली में ग्रहों के अच्छे योग होने पर जल्दी विवाह की उम्मीद रहती है जबकि विवाह से सम्बन्धित भाव एवं ग्रह पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव होने पर शादी देर से हो सकती है.
  • कुण्डली में शुक्र सप्तम भाव में स्वगृही हो, द्वितीय भाव में लग्न द्वारा दृष्ट हों तो व्यक्ति का विवाह यौवनावस्था में होने के योग बनते है.
  • जब किसी व्यक्ति की कुण्डली में गुरु सप्तम भाव में स्थित हों तथा किसी शुभ ग्रह से दृ्ष्टि संम्बन्ध बना रहे हों अथवा सप्तम में उच्च का हों तो विवाह जल्द होने की संभावना बनती है.
  • इसके अलावा सप्तमेश और लग्नेश दोनों जब निकट भावों में स्थित हों तो व्यक्ति का विवाह जल्द होने की संभावना बनती है.
  • लग्नेश व सप्तमेश का आपस में स्थान या दृष्टि संबन्ध शुभ ग्रहों से बने तो विवाह जल्द होने की संभावना बनती है.
  • अगर किसी स्त्री की कुण्डली में चन्द्र उच्च अंश पर स्थित हो तो स्त्री व उसके जीवनसाथी की आयु में अन्तर अधिक होने की संभावना बनती है.
  • जब लग्नेश कुण्डली में बलशाली होकर स्थित हो और लग्नेश द्वितीय भाव में स्थित हो तो ऎसे व्यक्ति का विवाह शीघ्र होने के योग बनते हैं. इस योग के व्यक्ति का विवाह सुखमय रहने की संभावनाएं बनती है.
  • अगर सप्तमेश वक्री हो तथा मंगल षष्ठ भाव में हो तो ऎसे व्यक्ति का विवाह विलम्ब से होने की संभावना बनती है. सप्तमेश के वक्री होने के कारण वैवाहिक जीवन की शुभता में भी कमी हो सकती है.
  • कुण्डली में चन्द्र अगर सप्तम भाव में अकेला या शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो ऎसे व्यक्ति का जीवनसाथी सुन्दर व यह योग विवाह के मध्य की बाधाओं में कमी करता है.
  • कुण्डली में सप्तमेश छठे, आठवें और बारहवें भाव, लग्न भाव या सप्तम भाव में स्थित हो तो व्यक्ति का विवाह देर से होने के योग बनते है.
  • यदि लग्न, सप्तम भाव, लग्नेश और शुक्र चर स्थान में स्थित हों तथा चन्द्रमा चर राशि में स्थित हों तो ऎसे व्यक्ति का विवाह विलम्ब से होने के योग बनते है.
  • इसके अतिरिक्त जब शनि और शुक्र लग्न से चतुर्थ भाव में हों तथा चन्द्रमा छठे, आठवें या बारहवें भाव में हों तो व्यक्ति का विवाह तीस वर्ष के बाद होने की संभावना बनती है.
  • किसी व्यक्ति की कुण्डली में राहु और शुक्र जब प्रथम भाव में हों तथा मंगल सप्तम भाव में स्थित हों तो व्यक्ति का विवाह 28 से 30 वर्ष की आयु में होने की संभावनाएं बनती है.
  • अगर शुक्र कर्क, वृश्चिक, मकर में से किसी राशि में सप्तम भाव में स्थित हों तथा चन्द्रमा व शनि एक साथ प्रथम, द्वितीय, सप्तम या एकादश भाव में हों तो व्यक्ति का विवाह वर्ष के बाद होने कि संभावना बनती है.
  • कुण्डली में सप्तमेश बलहीन हो तथा शनि व मंगल एक साथ प्रथम, द्वितीय, सप्तम या एकादश में हों तो व्यक्ति का विवाह देर से होने के योग बनते हैं.
  • इसके अतिरिक्त मंगल या शुक्र एक साथ पंचम या सप्तम भाव में स्थित हो एवं दोनो को गुरु देख रहे हों, तो व्यक्ति का विवाह वयस्क आयु में होने की संभावना बनती है.
  • विवाह के लिये सप्तम भाव, सप्तमेश और शुक्र का विचार किया जाता है. ये तीनों शुभ स्थिति में हों तो विवाह शीघ्र होता है तथा वैवाहिक जीवन भी सुखमय रहने की संभावनाएं बनती है.
  • जब जन्म कुण्डली में अष्टमेश पंचम में हों व्यक्ति का विवाह विलम्ब से होने की संभावना बनती है. अष्टम भाव व इस भाव के स्वामी का संबन्ध जिन भावों से बनता है. उन भावों के फलों की प्राप्ति में बाधाएं आने की संभावना रहती है.
  • इसके अलावा जब जन्म कुण्डली में सूर्य व चन्द्र शनि से पूर्ण दृष्टि संबन्ध रखते हों तब भी व्यक्ति का विवाह देर से होने के योग बनते है. इस योग में सूर्य व चन्द्र दोनों में से कोई सप्तम भाव का स्वामी हो या फिर सप्तम भाव में स्थित हों तभी इस प्रकार की संभावना बनती है.
  • शुक्र केन्द्र में स्थित हों और शनि शुक्र से सप्तम भाव में स्थित हों तो व्यक्ति का विवाह वयस्क आयु में प्रवेश के बाद ही होने की संभावना बनती है.
  • इन योगों में ग्रहों की स्थिति के अनुसार विवाह समय में परिवर्तन हो सकता है. अगर सप्तमेश उच्च हो, बलवान हो, शुभ ग्रहों के प्रभाव में हो तथा अशुभ ग्रहों के पाप प्रभाव से मुक्त हो तो विवाह की आयु में परिवर्तन होना संभव है.
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गण्डमूल नक्षत्र का प्रभाव | Effect of Gandmool Nakshatra | Gand Mool Nakshatra Effects

ज्योतिष ग्रंथों में अनेक स्थानों पर गंडांत अर्थात गण्डमूल नक्षत्रों का उल्लेख मिलता है. रेवती नक्षत्र की अंतिम चार घड़ियाँ और अश्वनी नक्षत्र की पहली चार घड़ियाँ गंडांत कही जाती हैं. ज्योतिष शास्त्र  में गण्डमूल नक्षत्र के विषय में विस्तारपूर्वक बताया गया है. जातक पारिजात ,बृहत् पराशर होरा शास्त्र ,जातकाभरणं इत्यादि सभी प्राचीन ग्रंथों में गण्डमूल नक्षत्रों तथा उनके प्रभावों का वर्णन दिया गया है. गण्डमूल नक्षत्रों के सभी चरणों का फल अलग-अलग होता है जो इस प्रकार है.

गण्डमूल नक्षत्र अश्विनी का जातक पर प्रभाव | Effect of Gandmool Nakshatra Ashwini on a native’s life

केतु के पहले गण्डमूल नक्षत्र को अश्विनी नक्षत्र कहा जाता है. अश्विनी नक्षत्र मेष राशि में शून्य अंश से प्रारम्भ होकर तेरह अंश बीस मिनट तक रहता है. जन्म के समय यदि चंद्रमा इन अंशों के मध्य स्थित हो तो यह गण्डमूल नक्षत्र में जन्म का समय माना जाता है. अश्विनी नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म होने पर जीवन में अनेक कठिन परिस्थितियों एवं परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है. पूर्व जन्म के कर्मों का फल इस नक्षत्र चरण में जन्म लेने के रूप में सामने आता है. इस नक्षत्र में जन्म लेने पर बच्चा पिता के लिए थोड़ा कष्टकारी हो सकता है. लेकिन इस कष्ट को किसी भी नकारात्मकता के साथ नहीं जोड़ना चाहिए. इसके लिए कुण्डली के अन्य बहुत से योगों का आंकलन भी किया जाना चाहिए.

अश्विनी नक्षत्र के द्वितीय चरण में जन्म लेने वाले बच्चे को जीवन में सुख व आराम प्राप्त हो सकते हैं.  अश्विनी नक्षत्र के तीसरे चरण में जन्म होने पर जातक  को जीवन के किसी भी क्षेत्र में उच्च पद प्राप्त होने के अवसर प्राप्त हो सकते हैं. जातक मित्रों से लाभ प्राप्त करता है. घूमने-फिरने में उसकी रूचि अधिक हो सकती है या किसी एक स्थान पर टिके रहना उसे अच्छा नहीं लगेगा.

अश्विनी नक्षत्र के चतुर्थ चरण में जन्म लेने पर जातक को राज सम्मान की प्राप्ति अथवा सरकार की ओर उपहार आदि की प्राप्ति हो सकती है. इसके साथ ही जातक को स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों का सामना करना पड. सकता है.

गण्डमूल नक्षत्र मघा का जीवन पर प्रभाव | Effect of Gandmool Nakshatra Magha on the life of a Native

सिंह राशि के प्रारम्भ के साथ मघा नक्षत्र का आरम्भ होता है. सिंह राशि में जब चंद्रमा शून्य से लेकर तेरह अंश और बीस मिनट तक रहता है तब वह गंडमूल नक्षत्र में कहलाता है. मघा नक्षत्र के प्रथम चरण में यदि किसी बच्चे का जन्म होने से माता को कष्ट होने की संभावना बनती है. इस नक्षत्र के दूसरे चरण में जन्म लेने से पिता को कोई कष्ट या हानि का सामना करना पड़ सकता है. मघा नक्षत्र के तीसरे चरण में जन्म लेने पर बच्चे को जीवन में सुखों की प्राप्ती होने की संभावना बनती है. यदि बच्चे का जन्म मघा नक्षत्र के चौथे चरण में होता है तब उसे कार्य क्षेत्र में स्थायित्व प्राप्त होता है. इस नक्षत्र में जन्म होने के कारण बच्चा उच्च शिक्षा भी ग्रहण करने से पीछे नहीं रहते.

गण्डमूल नक्षत्र मूल का जीवन पर प्रभाव | Effect of Gandmool Nakshatra Mool on the life of a native

जब चंद्रमा धनु राशि में शून्य से तेरह अंश और बीस मिनट के मध्य स्थित होता है तब यह गंडमूल नक्षत्र में आता है. बच्चे का जन्म मूल  नक्षत्र के प्रथम चरण में होने से पिता के जीवन में कई प्रकार के अच्छे- बुरे परिवर्तन होने लगते हैं.

मूल नक्षत्र के द्वितीय चरण में बच्चे का जन्म वैदिक ज्योतिष में माता के लिए अशुभ माना गया है इस चरण में बच्चे का जन्म होने से माता का जीवन कष्टपूर्ण रहने की संभावना बनती है.

मूल नक्षत्र के तीसरे चरण में हुआ हो  तब उसकी संपत्ति के नष्ट होने की संभावना बनती है. इस चरण में जन्म लेने वाले जातक का संपत्ति से वंचित रहना देखा जा सकता है.

मूल नक्षत्र के चतुर्थ चरण में जन्म लेने पर जातक सुखी तथा समृद्ध ही रहता है लेकिन यदि शांति कराई जाये तब ही शुभ फलों की प्राप्ति होती है. इस चरण में जन्म लेने पर बच्चे को अपने जीवन में एक बार हानि उठानी पड़ सकती है.

गण्डमूल नक्षत्र आश्लेषा का जीवन पर प्रभाव | Effect of Gandmool Nakshatra Ashlesha on the life of a native

कर्क राशि में 16 अंश और 40 मिनट से 30 अंश तक आश्लेषा नक्षत्र रहता है. जब चंद्रमा जन्म के समय इन अंशों के मध्य स्थित होता है तब यह गंडमूल नक्षत्र कहा जाता है.

आश्लेषा नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म होने पर किसी तरह का कोई विशेष अशुभ नहीं परंतु धन की हानि उठानी पड़ सकती है यदि इसकी शांति पूजा हो तो यह शुभ फल प्रदान करता है.

आश्लेषा नक्षत्र के द्वितीय चरण में जन्म होने पर बच्चा अपने बहन-भाईयों के लिए कष्टकारी हो सकता है. या जातक अपनी संपत्ति को नष्ट कर सकता है.

आश्लेषा नक्षत्र के तीसरे चरण में जन्म हुआ है तो माता तथा पिता दोनों को ही कष्ट सहना पड़ सकता है.

आश्लेषा नक्षत्र के चतुर्थ चरण में जन्म हुआ है तो पिता को आर्थिक हानि तथा शारीरिक कष्ट सहना पड़ता है.

गण्डमूल नक्षत्र ज्येष्ठा का जीवन पर प्रभाव | Effect of Gandmool Nakshatra Jyeshtha on the life of a native

वृश्चिक राशि में 16 अंश 40 मिनट से 30 अंश तक ज्येष्ठा नक्षत्र होता है. इस समय जब चंद्रमा वृश्चिक राशि में दिए गए अंशों के मध्य स्थित हो तब गंडमूल नक्षत्र होता है.

भारतीय वैदिक ज्योतिषानुसार ज्येष्ठा नक्षत्र को अशुभ नक्षत्रों की श्रेणी में रखा गया है. ज्येष्ठा नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म  लेने से बच्चे के बड़े भाई-बहनों को कई प्रकार के कष्टों को सहना पड़ सकता है.

इसी तरह द्वितीय चरण में जन्म लेना छोटे भाई – बहनों के लिए अशुभ देखा गया है. उन्हें शारीरिक अथवा अन्य कई तरह के कष्ट हो सकते हैं.

इसके तीसरे चरण में जन्म होने पर जातक की माता को स्वास्थ्य की दृष्टि से कष्ट बने रहने की संभावना बनती है.

इस नक्षत्र चरण में जन्म लेने से जातक स्वयं के लिए अच्छा नहीं रहता. उसे कई प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ सकता है. ज्येष्ठा नक्षत्र के चतुर्थ चरण में जन्म लेने वाले व्यक्तियों को जीवन में कठिन परिस्थितियों व जटिलताओं का सामना करना पडता है. इस चरण में जन्म होने के कारण जीवनभर दु:ख और पीड़ा का सामना करना पड़ता है.

गण्डमूल नक्षत्र रेवती का जीवन पर प्रभाव | Effect of Gandmool Nakshatra Rewati on the life of a native

मीन राशि में 16 अंश 40 मिनट से 30 अंश तक रेवती नक्षत्र होता है. जिस समय चंद्रमा मीन राशि में इन अंशों से गुजर रहा हो तब यह समय गंडमूल नक्षत्र का होता है.

यदि जन्म रेवती नक्षत्र के प्रथम चरण में हुआ है तो जीवन सुख और आराम में व्यतीत होता है. जातक आर्थिक रूप से सम्पन्न और सुखी रहता है.

रेवती नक्षत्र के दूसरे चरण में जन्म लेने वाले व्यक्ति अपनी मेहनत, बुद्धि एवं लगन से नौकरी में उच्च पद  प्राप्त करते हैं तथा व्यवसायिक रूप से कामयाब हो जाते हैं. लेकिन फिर भी बच्चे को बड़े होकर कुछ भूमि की हानि हो सकती है.

रेवती नक्षत्र के तीसरे चरण में जन्म होने पर जातक को धन-संपत्ति का सुख तो प्राप्त होता है तथा साथ- साथ धन हानि की भी संभावना बनी रह सकती है.

रेवती नक्षत्र के चतुर्थ चरण में जन्म लेने वाला जातक स्वयं के लिए कष्टकारी साबित होता है. लेकिन मतातन्तर से इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति अपने माता-पिता दोनों के लिए ही कष्टकारी सिद्ध हो सकते हैं. उनका जीवन काफी संघर्ष से गुजर सकता है.

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केमद्रुम योग कैसे बनता है और उसका प्रभाव क्या होता है

केमद्रुम योग ज्योतिष में चंद्रमा से निर्मित एक महत्वपूर्ण योग है. वृहज्जातक में वाराहमिहिर के अनुसार यह योग उस समय होता है जब चंद्रमा के आगे या पीछे वाले भावों में ग्रह न हो अर्थात चंद्रमा से दूसरे और चंद्रमा से द्वादश भाव में कोई भी ग्रह नहीं हो.  यह योग इतना अनिष्टकारी नहीं होता जितना कि वर्तमान समय के ज्योतिषियों ने इसे बना दिया है. व्यक्ति को इससे भयभीत नहीं होना चाहिए क्योंकि यह योग व्यक्ति को सदैव बुरे प्रभाव नहीं देता अपितु वह व्यक्ति को जीवन में संघर्ष से जूझने की क्षमता एवं ताकत देता है, जिसे अपनाकर जातक अपना भाग्य निर्माण कर पाने में सक्षम हो सकता है और अपनी बाधाओं से उबर कर आने वाले समय का अभिनंदन कर सकता है.

ज्योतिष शास्त्र में चन्द्र को मन का कारक कहा गया है. सामान्यत: यह देखने में आता है कि मन जब अकेला हो तो वह इधर-उधर की बातें अधिक सोचता है और ऎसे में व्यक्ति में चिन्ता करने की प्रवृति अधिक होती है.  इसी प्रकार के फल केमद्रुम योग देता है.

केमद्रुम योग कैसे बनता है | How is Kemdrum Yoga formed

यदि चंद्रमा से द्वितीय और द्वादश दोनों स्थानों में कोई ग्रह नही हो तो केमद्रुम नामक योग बनता है या चंद्र किसी ग्रह से युति में न हो या चंद्र को कोई शुभ ग्रह न देखता हो तो कुण्डली में केमद्रुम योग बनता है. केमद्रुम योग के संदर्भ में छाया ग्रह राहु केतु की गणना नहीं की जाती है.

इस योग में उत्पन्न हुआ व्यक्ति जीवन में कभी न कभी दरिद्रता एवं संघर्ष से ग्रस्त होता है. इसके साथ ही साथ व्यक्ति अशिक्षित या कम पढा लिखा, निर्धन एवं मूर्ख भी हो सकता है. यह भी कहा जाता है कि केमदुम योग वाला व्यक्ति वैवाहिक जीवन और संतान पक्ष का उचित सुख नहीं प्राप्त कर पाता है. वह सामान्यत: घर से दूर ही रहता है. परिजनों को सुख देने में प्रयास रत रहता है. व्यर्थ बात करने वाला होता है. कभी कभी उसके स्वभाव में नीचता का भाव भी देखा जा सकता है.

केमद्रुम योग के शुभ और अशुभ फल | Auspicious and Inauspicious results of Kemdrum Yoga

केमद्रुम योग में जन्‍म लेनेवाला व्‍यक्ति निर्धनता एवं दुख को भोगता है. आर्थिक दृष्टि से वह गरीब होता है.  आजिविका संबंधी कार्यों के लिए परेशान रह सकता है. मन में भटकाव एवं असंतुष्टी की स्थिति बनी रहती है.  व्‍यक्ति हमेशा दूसरों पर निर्भर रह सकता है. पारिवारिक सुख में कमी और संतान द्वारा कष्‍ट प्राप्‍त कर सकता है. ऐसे व्‍यक्ति दीर्घायु होते हैं.

केमद्रुम योग के बारे में ऐसी मान्यता है कि यह योग संघर्ष और अभाव ग्रस्त जीवन देता है.  इसीलिए ज्योतिष के अनेक विद्वान इसे दुर्भाग्य का सूचक कहते हें. परंतु लेकिन यह अवधारणा पूर्णतः सत्य नहीं है.  केमद्रुम योग से युक्त कुंडली के जातक कार्यक्षेत्र में सफलता के साथ-साथ यश और प्रतिष्ठा भी प्राप्त करते हैं. वस्तुतः अधिकांश विद्वान इसके नकारात्मक पक्ष पर ही अधिक प्रकाश डालते हैं. यदि इसके सकारात्मक पक्ष का विस्तार पूर्वक विवेचन करें तो हम पाएंगे कि कुछ विशेष योगों की उपस्थिति से केमद्रुम योग भंग होकर राजयोग में परिवर्तित हो जाता है. इसलिए किसी जातक की कुंडली देखते समय केमद्रुम योग की उपस्थिति होने पर उसको भंग करने वाले योगों पर ध्यान देना आवश्यक है तत्पश्चात ही फलकथन करना चाहिए.

केमद्रुम योग का भंग होना | Destruction of Kemdrum Yoga

जब कुण्डली में लग्न से केन्द्र में चन्द्रमा या कोई ग्रह हो तो केमद्रुम योग भंग माना जाता है.  योग भंग होने पर केमद्रुम योग के अशुभ फल भी समाप्त होते है.  कुण्डली में बन रही कुछ अन्य स्थितियां भी इस योग को भंग करती है, जैसे चंद्रमा सभी ग्रहों से दृष्ट हो या चंद्रमा शुभ स्‍थान में हो या चंद्रमा शुभ ग्रहों से युक्‍त हो या पूर्ण चंद्रमा लग्‍न में हो या चंद्रमा दसवें भाव में उच्‍च का हो या केन्‍द्र में चंद्रमा पूर्ण बली हो अथवा कुण्डली में सुनफा, अनफा या दुरुधरा योग बन रहा हो, तो केमद्रुम योग भंग हो जाता है. यदि चन्द्रमा से केन्द्र में कोई ग्रह हो तब भी यह अशुभ योग भंग हो जाता है और व्यक्ति इस योग के प्रभावों से मुक्त हो जाता है.

कुछ अन्य शास्त्रों के अनुसार- यदि चन्द्रमा के आगे-पीछे केन्द्र और नवांश में भी इसी प्रकार की ग्रह स्थिति बन रही हो तब भी यह योग भंग माना जाता है. केमद्रुम योग होने पर भी जब चन्द्रमा शुभ ग्रह की राशि में हो तो योग भंग हो जाता है. शुभ ग्रहों में बुध्, गुरु और शुक्र माने गये है. ऎसे में व्यक्ति संतान और धन से युक्त बनता है तथा उसे जीवन में सुखों की प्राप्ति होती है.

केमद्रुम योग की शांति के उपाय | Remedies for Kemdrum Yoga

केमद्रुम योग के अशुभ प्रभावों को दूर करने हेतु कुछ उपायों को करके इस योग के अशुभ प्रभावों को कम करके शुभता को प्राप्त किया जा सकता है. यह उपाय इस प्रकार हैं-

सोमवार को पूर्णिमा के दिन अथवा सोमवार को चित्रा नक्षत्र के समय से लगातार चार वर्ष तक पूर्णिमा का व्रत रखें.

सोमवार के दिन भगवान शिव के मंदिर जाकर शिवलिंग पर गाय का कच्चा दूध चढ़ाएं व पूजा करें.  भगवान शिव ओर माता पार्वती का पूजन करें. रूद्राक्ष की माला से शिवपंचाक्षरी मंत्र ” ऊँ नम: शिवाय” का जप करें ऎसा करने से  केमद्रुम योग के अशुभ फलों में कमी आएगी.

घर में दक्षिणावर्ती शंख स्थापित करके नियमित रुप से श्रीसूक्त का पाठ करें. दक्षिणावर्ती शंख में जल भरकर उस जल से देवी लक्ष्मी की मूर्ति को स्नान कराएं तथा चांदी के श्रीयंत्र में मोती धारण करके उसे सदैव अपने पास रखें  या धारण करें.

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ज्योतिष में रत्न का महत्व | Importance of Gemestones in Jyotish | Gemestones in Jyotish | Gemstones in Astrology

ज्योतिष एवं धार्मिक ग्रंथों में रत्नों की उत्पत्ति बारे में अनेकों कहानियाँ मिलती है. अग्नि पुराण में रत्नों की उत्पत्ति का संबंध वृत्रासुर के वध से जुडा़ है. इस दैत्य का वध करने के लिए महामुनि दधीचि के शरीर की हड्डियों का हथियार बनाया गया था.  इस अस्त्र के निर्माण के समय दधीचि की हड्डियों के कुछ अंश धरती पर गिर गए थे. जहाँ-जहाँ यह गिरे वहाँ हीरे की खानें बन गई.

एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने दैत्यराज बलि का वध करने के लिए वामन अवतार लिया था और तीन पग भूमि भिक्षा में माँगकर राजा बलि से पृथ्वी, आकाश तथा पाताल छीन लिए थे. राजा बलि ने भगवान के जब चरण स्पर्श किए थे तब उनका सारा शरीर रत्नों का बन गया था. इन्द्र ने जब राजा बलि पर वार किया तो रत्नों से बना शरीर पृथ्वी पर बिखर गया और विभिन्न प्रकार की रत्नों की खानें बन गई. राजा बलि के शरीर से ही 84 प्रकार के रत्नों की उत्पत्ति मानी जाती है.

रत्नों के संबंध में राजा बलि से ही मिलती कहानी बलासुर की है. गरुड़ पुराण के अनुसार बलासुर ने इन्द्र को युद्ध में हरा दिया था. यह दैत्य था लेकिन अपने वचन का पक्का और महादानी था. उसके इसी गुण के कारण इन्द्र ने इसे ठगा. इन्द्र ने ब्राह्मण वेश में देवताओं के यज्ञ के लिए बलासुर का शरीर माँग लिया. अग्नि में इसका शरीर भस्म होने के बाद धरती पर जहाँ-जहाँ इसके अँग गिरे वहाँ विविध प्रकार के रत्नों की खानें बन गई.

अन्त में रत्नों के संबंध में प्रचलित एक अन्य मुख्य कथा है. रत्नों से जुडी़ यह समुद्र मंथन की कथा है. देवों तथा राक्षसों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था. उस दौरान बहुत सी वस्तुएँ समुद्र से निकली थी. इनमें 14 प्रकार के रत्न पदार्थ भी निकले. समुद्र मंथन से निकले अमृत पर देवों तथा असुरों में संघर्ष हुआ. इस संघर्ष में अमृत की बूँदे पृथ्वी पर जहाँ गिरी वहाँ रत्न बन गए.

रत्नों को धारण करने का कारण | Reasons for wearing Gemstones

ग्रहों की शांति हेतु तथा जीवन में आने वाले कष्टों से मुक्ति प्राप्त करने के लिए रत्नों को धारण किया जाता है. रत्नों को धारण करने का जब प्रश्न आता है तब बहुत सी बातें हमारे मन में उठती हैं. कौन सा रत्न धारण करना चाहिए. कौन सा रत्न अनुकूल फल प्रदान करेगा. क्या रत्न धारण करने से लाभ होगा, आदि अनेक बातें हैं. यदि अपने जन्म का पूरा विवरण पता है तब कुण्डली में स्थित शुभ ग्रहों के आधार पर रत्न धारण कर सकते हैं. माना कुण्डली में लग्न अथवा लग्न का स्वामी ग्रह निर्बल है और उसके कारण आपको जीवन में बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है तब आप इनसे संबंधित रत्न धारण कर सकते हैं.

भाग्य आपका साथ नहीं दे रहा है या कुण्डली के शुभ ग्रह कमजोर होकर स्थित है अथवा कुण्डली में त्रिकोण भाव के स्वामी निर्बल है तब आप उनका रत्न धारण कर सकते हैं. रत्न धारण करने से संबंधित ग्रह को बल मिलता है और वह शुभ फल देने में सहायक होता है.

यह आवश्यक नही है कि आप सभी को अपने जन्म विवरण की पूरी जानकारी हो.. ऎसी स्थिति में आपको जो परेशानी या बाधा आ रही है, उससे संबंधित कारक ग्रह का रत्न धारण किया जा सकता है. जैसे किसी को संतान प्राप्ति में बाधा आ रही है तब संतान के कारक ग्रह बृहस्पति का रत्न धारण किया जा सकता है. किसी को विवाह में देरी का सामना करना पड़ रहा है तब शुक्र से संबंधित रत्न को धारण किया जा सकता है.

रत्नों के स्थान पर उपरत्नों की उपयोगिता | Utility of Upratna in place of Gemstones (Ratna)

उपरत्न देखने में सुंदर होते हैं. इनकी कीमत रत्नों से कम होती है. इन्हें साधारण व्यक्ति भी धारण कर सकता है. वैदिक ज्योतिष में उपरत्नों को भी रत्नों के समान उपयोगी माना गया है. उपरत्न धारण करने से पूर्व इनकी पहचान जरूरी है. आजकल बाजारों में काँच के रुप में नकली उपरत्न अत्यधिक मात्रा में उपलब्ध हैं. नकली उपरत्न धारण करने पर आपको अशुभ फलों की प्राप्ति हो सकती है. वर्तमान समय में रत्नों को जाँचने के लिए प्रयोगशालाएँ बनाई गई हैं. जहाँ आसानी से असली तथा नकली की पहचान हो सकती है. किसी भी ग्रह का रत्न पहने या उपरत्न पहने उसकी पहचान होने पर ही उसे उपयोग में लाएँ.

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पितृ दोष के विशेष योग और उपाय | Yogas for Pitra Dosha and Remedies for it

जन्म के समय व्यक्ति अपनी कुण्डली में बहुत से योगों को लेकर पैदा होता है.  यह योग बहुत अच्छे हो सकते हैं, बहुत खराब हो सकते हैं, मिश्रित फल प्रदान करने वाले हो सकते हैं या व्यक्ति के पास सभी कुछ होते हुए भी वह परेशान रहता है. सब कुछ होते भी व्यक्ति दुखी होता है! इसका क्या कारण हो सकता है? कई बार व्यक्ति को अपनी परेशानियों का कारण नहीं समझ आता तब वह ज्योतिषीय सलाह लेता है. तब उसे पता चलता है कि उसकी कुण्डली में पितृ-दोष बन रहा है और इसी कारण वह परेशान है.

बृहतपराशर होरा शास्त्र के अनुसार जन्म कुंडली में 14 प्रकार के शापित योग हो सकते हैं. जिनमें पितृ दोष, मातृ दोष, भ्रातृ दोष, मातुल दोष, प्रेत दोष आदि को प्रमुख माना गया है. इन शाप या दोषों के कारण व्यक्ति को स्वास्थ्य हानि, आर्थिक संकट, व्यवसाय में रुकावट, संतान संबंधी समस्या आदि का सामना करना पड़ सकता है. पितृ दोष के बहुत से कारण हो सकते हैं. उनमें से जन्म कुण्डली के आधार पर कुछ कारणों का उल्लेख किया जा रहा है जो निम्नलिखित हैं :-

  • जन्म कुण्डली के पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नौवें या दसवें भाव में यदि सूर्य-राहु या सूर्य-शनि एक साथ स्थित हों तब यह पितृ दोष माना जाता है. इन भावों में से जिस भी भाव में यह योग बनेगा उसी भाव से संबंधित फलों में व्यक्ति को कष्ट या संबंधित सुख में कमी हो सकती है.
  • सूर्य यदि नीच का होकर राहु या शनि के साथ है तब पितृ दोष के अशुभ फलों में और अधिक वृद्धि होती है.
  • किसी जातक की कुंडली में लग्नेश यदि छठे, आठवें या बारहवें भाव में स्थित है और राहु लग्न में है तब यह भी पितृ दोष का योग होता है.
  • जो ग्रह पितृ दोष बना रहे हैं यदि उन पर छठे, आठवें या बारहवें भाव के स्वामी की दृष्टि या युति हो जाती है तब इस प्रभाव से व्यक्ति को वाहन दुर्घटना, चोट, ज्वर, नेत्र रोग, ऊपरी बाधा, तरक्की में  रुकावट, बनते कामों में विघ्न, अपयश की प्राप्ति, धन हानि आदि अनिष्ट फलों के मिलने की संभावना बनती है.

उपाय | Remedies

  • यदि आपकी कुण्डली में उपरोक्त पितृ दोष में से कोई एक बन रहा है तब आपको जिस रविवार को संक्रांति पड़ रही है या अमावस्या पड़ रही है उस दिन ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए तथा लाल वस्तुओं का दान करना चाहिए. उन्हें यथा संभव दक्षिणा भी देनी चाहिए. पितरों का तर्पण करने से पितृ दोष के प्रभाव में कमी आती है.
  • जन्म कुंडली में चंद्र-राहु, चंद्र-केतु, चंद्र-बुध, चंद्र-शनि, आदि की युति से मातृ दोष होता है. यह दोष भी पितृ दोष की ही भाँति है.
  • इन योगों में चंद्र-राहु, और सूर्य-राहु की युति को ग्रहण योग कहते हैं. यदि बुध की युति राहु के साथ है तब यह जड़त्व योग बनता है. इन योगों के प्रभावस्वरुप भाव स्वामी की स्थिति के अनुसार ही अशुभ फल मिलते हैं. वैसे चंद्र की युति राहु के साथ कभी भी शुभ नही मानी जाती है. इस युति के प्रभाव से माता या पत्नी को कष्ट होता है, मानसिक तनाव रहता है, आर्थिक परेशानियाँ, गुप्त रोग, भाई-बांधवों से वैर-विरोध, परिजनों का व्यवहार परायों जैसा होने के फल मिल सकते हैं.
  • जन्म कुण्डली में दशम भाव का स्वामी छठे, आठवें अथवा बारहवें भाव में हो और इसका राहु के साथ दृष्टि संबंध या युति हो रही हो तब भी पितृ दोष का योग बनता है.
  • यदि जन्म कुंडली में आठवें या बारहवें भाव में गुरु व राहु का योग बन रहा हो तथा पंचम भाव में सूर्य-शनि या मंगल आदि क्रूर ग्रहों की स्थिति हो तब पितृ दोष के कारण संतान कष्ट या संतान से सुख में कमी रहती है.
  • बारहवें भाव का स्वामी लग्न में स्थित हो, अष्टम भाव का स्वामी पंचम भाव में हो और दशम भाव का स्वामी अष्टम भाव में हो तब यह भी पितृ दोष की कुंडली बनती है और इस दोष के कारण धन हानि या संतान के कारण कष्ट होता है.
  • इन योगों के अतिरिक्त कुंडली में कई योग ऎसे भी बन जाते हैं जो कई प्रकार से कष्ट पहुंचाने का काम करते हैं. जैसे पंचमेश राहु के साथ यदि त्रिक भावों (6, 8, 12) में स्थित है और पंचम भाव शनि या कोई अन्य क्रूर ग्रह भी है तब संतान सुख में कमी हो सकती है. शनि तथा राहु के साथ अन्य शुभ ग्रहों के मिलने से कई तरह के अशुभ योग बनते हैं जो पितृ दोष की ही तरह बुरे फल प्रदान करते हैं.

पितृ दोष की शांति के विशेष उपाय | Specific Remedies for pacifying Pitr Dosha

यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में पितृ दोष बन रहा है और वह महंगे उपाय करने में असमर्थ है तब वह सरल उपायों के द्वारा भी पितृ दोष के प्रभाव को कम कर सकता है. यह उपाय निम्नलिखित हैं :-

  • यदि किसी की कुंडली में पितृ दोष बन रहा हो तब उस व्यक्ति को अपने घर की दक्षिण दिशा की दीवार पर अपने दिवंगत पूर्वजों का फोटो लगाकर उस पर हार चढ़ाकर उन्हें सम्मानित करना चाहिए. पूर्वजों की मृत्यु की तिथि पर ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए, अपनी सामर्थ्यानुसार वस्त्र और दान-दक्षिणा आदि देनी चाहिए. नियम से पितृ तर्पण और श्राद्ध करते रहना चाहिए.
  • जिन व्यक्तियों के माता-पिता जीवित हैं उनका आदर-सत्कार करना चाहिए. भाई-बहनों का भी सत्कार आपको करते रहना चाहिए. धन, वस्त्र, भोजनादि से सेवा करते हुए समय-समय पर उनका आशीर्वाद ग्रहण करना चाहिए.
  • प्रत्येक अमावस्या के दिन अपने पितरों का ध्यान करते हुए पीपल के पेड़ पर कच्ची लस्सी, थोड़ा गंगाजल, काले तिल, चीनी, चावल, जल तथा पुष्प अर्पित करें और “ऊँ पितृभ्य: नम:” मंत्र का जाप करें. उसके बाद पितृ सूक्त का पाठ करना शुभ फल प्रदान करता है.
  • प्रत्येक संक्रांति, अमावस्या और रविवार के दिन सूर्यदेव को ताम्र बर्तन में लाल चंदन, गंगाजल और शुद्ध जल मिलाकर बीज मंत्र पढ़ते हुए तीन बार अर्ध्य दें.
  • प्रत्येक अमावस्या के दिन दक्षिणाभिमुख होकर दिवंगत पितरों के लिए पितृ तर्पण करना चाहिए. पितृ स्तोत्र या पितृ सूक्त का पाठ करना चाहिए. त्रयोदशी को नीलकंठ स्तोत्र का पाठ करना, पंचमी तिथि को सर्पसूक्त पाठ, पूर्णमासी के दिन श्रीनारायण कवच का पाठ करने के बाद ब्राह्मणों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार मिठाई तथा दक्षिणा सहित भोजन कराना चाहिए. इससे भी पितृ दोष में कमी आती है और शुभ फलों की प्राप्ति होती है.
  • पितरों की शांति के लिए जो नियमित श्राद्ध किया जाता है उसके अतिरिक्त श्राद्ध के दिनों में गाय को चारा खिलाना चाहिए. कौओं, कुत्तों तथा भूखों को खाना खिलाना चाहिए. इससे शुभ फल मिलते हैं.
  • श्राद्ध के दिनों में माँस आदि का मांसाहारी भोजन नहीं करना चाहिए. शराब तथा अंडे का भी त्याग करना चाहिए. सभी तामसिक वस्तुओं को सेवन छोड़ देना चाहिए और पराये अन्न से परहेज करना चाहिए.
  • पीपल के वृक्ष पर मध्यान्ह में जल, पुष्प, अक्षत, दूध, गंगाजल, काले तिल चढ़ाएँ. संध्या समय में दीप जलाएँ और नाग स्तोत्र, महामृत्युंजय मंत्र या रुद्र सूक्त या पितृ स्तोत्र व नवग्रह स्तोत्र का पाठ करें. ब्राह्मण को भोजन कराएँ. इससे भी पितृ दोष की शांति होती है.
  • सोमवार के दिन 21 पुष्प आक के लें, कच्ची लस्सी, बिल्व पत्र के साथ शिवजी की पूजा करें. ऎसा करने से पितृ दोष का प्रभाव कम होता है.
  • प्रतिदिन इष्ट देवता व कुल देवता की पूजा करने से भी पितृ दोष का शमन होता है.
  • कुंडली में पितृ दोष होने से किसी गरीब कन्या का विवाह या उसकी बीमारी में सहायता करने पर भी लाभ मिलता है.
  • ब्राह्मणों को गोदान, कुंए खुदवाना, पीपल तथा बरगद के पेड़ लगवाना, विष्णु भगवान के मंत्र जाप, श्रीमदभागवत गीता का पाठ करना, पितरों के नाम पर अस्पताल, मंदिर, विद्यालय, धर्मशाला, आदि बनवाने से भी लाभ मिलता है.

पितृदोष के कारण संतान कष्ट होने के उपाय | Remedies to avoid unhappiness related to children due to Pitr Dosha

पितृ दोष के कारण कई व्यक्तियों को संतान प्राप्ति में बाधा तथा रुकावटों का सामना करना पड़ता है. इन बाधाओं के निवारण के लिए कुछ उपाय हैं जो निम्नलिखित हैं :-

1. यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में सूर्य-राहु, सूर्य-शनि आदि योग के कारण पितृ दोष बन रहा है तब उसके लिए नारायण बलि, नाग बलि, गया में श्राद्ध, आश्विन कृष्ण पक्ष में पितरों का श्राद्ध, पितृ तर्पण, ब्राह्मण भोजन तथा दानादि करने से शांति प्राप्त होती है.

2. मातृ दोष | Matra Dosha

यदि कुंडली में चंद्रमा पंचम भाव का स्वामी होकर शनि, राहु, मंगल आदि क्रूर ग्रहों से युक्त या आक्रान्त हो और गुरु अकेला पंचम या नवम भाव में है तब मातृ दोष के कारण संतान सुख में कमी का अनुभव हो सकता है.

मातृ दोष के शांति उपाय | Remedies to pacify Matra Dosha

यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में मातृ दोष बन रहा है तब इसकी शांति के लिए  गोदान करना चाहिए या चांदी के बर्तन में गाय का दूध भरकर दान देना शुभ होगा. इन शांति उपायों के अतिरिक्त एक लाख गायत्री मंत्र का जाप करवाकर हवन कराना चाहिए तथा दशमांश तर्पण करना चाहिए और ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए, वस्त्रादि का दान अपनी सामर्थ्य अनुसार् करना चाहिए. इससे मातृ दोष की शांति होती है.

मातृ दोष की शांति के लिए पीपल के वृक्ष की 28 हजार परिक्रमा करने से भी लाभ मिलता है.

3. भ्रातृ दोष | Bhratra Dosha

तृतीय भावेश मंगल यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में राहु के साथ पंचम भाव में हो तथा पंचमेश व लग्नेश दोनों ही अष्टम भाव में है तब भ्रातृ शाप के कारण संतान प्राप्ति बाधा तथा कष्ट का सामना करना पड़ता है.

भ्रातृ दोष के शांति उपाय | Remedies to pacify Bhratra Dosha

भ्रातृ दोष की शांति के लिए श्रीसत्यनारायण का व्रत रखना चाहिए और सत्यनारायण भगवान की कथा कहनी या सुननी चाहिए तथा विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करके सभी को प्रसाद बांटना चाहिए.

4. सर्प दोष | Sarpa Dosha

यदि पंचम भाव में राहु है और उस पर मंगल की दृष्टि हो या मंगल की राशि में राहु हो तब सर्प दोष की बाधा के कारण संतान प्राप्ति में व्यवधान आता है या संतान हानि होती है.

सर्प दोष के शांति उपाय | Remedies to pacify Sarpa Dosha

सर्प दोष की शांति के लिए नारायण नागबली विधिपूर्वक करवानी चाहिए. इसके बाद ब्राह्मणों को अपनी सामर्थ्यानुसार भोजन कराना चाहिए, उन्हें वस्त्र, गाय दान, भूमि दान, तिल, चांदी या सोने का दान भी करना चाहिए. लेकिन एक बात ध्यान रखें कि जो भी करें वह अपनी यथाशक्ति अनुसार करें.

5. ब्राह्मण श्राप या दोष | Brahman Shraap or Dosha

किसी व्यक्ति की कुंडली में यदि धनु या मीन में राहु स्थित है और पंचम भाव में गुरु, मंगल व शनि हैं और नवम भाव का स्वामी अष्टम भाव में है तब यह ब्राह्मण श्राप की कुंडली मानी जाती है और इस ब्राह्मण दोष के कारण ही संतान प्राप्ति में बाधा, सुख में कमी या संतान हानि होती है.

ब्राह्मण श्राप के शांति उपाय | Remedies to pacify Brahman Dosha

ब्राह्मण श्राप की शांति के लिए किसी मंदिर में या किसी सुपात्र ब्राह्मण को लक्ष्मी नारायण की मूर्तियों का दान करना चाहिए. व्यक्ति अपनी शक्ति अनुसार किसी कन्या का कन्यादान भी कर सकता है. बछड़े सहित गाय भी दान की जा सकती है. शैय्या दान की जा सकती है. सभी दान व्यक्ति को दक्षिणा सहित करने चाहिए. इससे शुभ फलों में वृद्धि होती है और ब्राह्मण श्राप या दोष से मुक्ति मिलती है.

6. मातुल श्राप | Maatul Shraap

यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में पांचवें भाव में मंगल, बुध, गुरु तथा राहु हो तब मामा के श्राप से संतान प्राप्ति में बाधा आती है.

मातुल श्राप के शांति उपाय | Remedies to pacify Maatul Shraap

मातुल श्राप से बचने के लिए किसी मंदिर में श्री विष्णु जी की प्रतिमा की स्थापना करानी चाहिए. लोगों की भलाई के लिए पुल, तालाब, नल या प्याउ आदि लगवाने से लाभ मिलता है और मातुल श्राप का प्रभाव कुछ कम होता है.

7. प्रेत श्राप | Pret Shraap

किसी व्यक्ति की कुंडली में यदि पंचम भाव में शनि तथा सूर्य हों और सप्तम भाव में कमजोर चंद्रमा स्थित हो तथा लग्न में राहु, बारहवें भाव में गुरु हो तब प्रेत श्राप के कारण वंश बढ़ने में समस्या आती है.

यदि कोई व्यक्ति अपने दिवंगत पितरों और अपने माता-पिता का श्राद्ध कर्म ठीक से नहीं करता हो या अपने जीवित बुजुर्गों का सम्मान नहीं कर रह हो तब इसी प्रेत बाधा के कारण वंश वृद्धि में बाधाएँ आ सकती हैं.

प्रेत श्राप के शांति उपाय | Remedies to pacify Pret Shraap

प्रेत शांति के लिए भगवान शिवजी का पूजन करवाने के बाद विधि-विधान से रुद्राभिषेक कराना चाहिए. ब्राह्मणों को अन्न, वस्त्र, फल, गोदान आदि उचित दक्षिणा सहित अपनी यथाशक्ति अनुसार देनी चाहिए. इससे प्रेत बाधा से राहत मिलती है.

गयाजी, हरिद्वार, प्रयाग आदि तीर्थ स्थानों पर स्नान तथा दानादि करने से लाभ और शुभ फलों की प्राप्ति होती है.

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क्या आप धनवान बनेंगे? अपनी कुण्डली से स्वयं जानिये

ज्योतिषशास्त्र की दृष्टि में धन वैभव और सुख के लिए कुण्डली में मौजूद धनदायक योग या लक्ष्मी योग काफी महत्वपूर्ण होते हैं.  जन्म कुण्डली एवं चंद्र कुंडली में विशेष धन योग तब बनते हैं जब जन्म व चंद्र कुंडली में यदि द्वितीय भाव का स्वामी एकादश भाव में और एकादशेश दूसरे भाव में स्थित हो अथवा द्वितीयेश एवं एकादशेश एक साथ व नवमेश द्वारा दृष्ट हो तो व्यक्ति धनवान होता है.

शुक्र की द्वितीय भाव में स्थिति को धन लाभ के लिए बहुत महत्व दिया गया है, यदि शुक्र द्वितीय भाव में हो और गुरु सातवें भाव, चतुर्थेश चौथे भाव में स्थित हो तो व्यक्ति राजा के समान जीवन जीने वाला होता है. ऐसे योग में साधारण परिवार में जन्म लेकर भी जातक अत्यधिक संपति का मालिक बनता है.  सामान्य व्यक्ति भी इन योगों के रहते उच्च स्थिति प्राप्त कर सकता है.

मेष लग्न के लिए धन योग | Dhan Yoga for Aries ascendant

लग्नेश मंगल कर्मेश शनि और भाग्येश गुरु पंचम भाव में होतो धन योग बनता है.

इसी प्रकार यदि सूर्य पंचम भाव में हो और गुरु चंद्र एकादश भाव में हों तो भी धन योग बनता है और जातक अच्छी धन संपत्ति पाता है.

वृष लग्न के लिए धन योग | Dhan Yoga for Taurus ascendant

मिथुन में शुक्र, मीन में बुध तथा गुरु केन्द्र में हो तो अचानक धन लाभ मिलता है. इसी प्रकार यदि शनि और बुध दोनों दूसरे भाव में मिथुन राशि में हों तो खूब सारी धन संपदा प्राप्त होती है.

मिथुन लग्न के लिए धन योग | Dhan Yoga for Gemini ascendant

नवम भाव में बुध और शनि की युति अच्छा धन योग बनाती है. यदि चंद्रमा उच्च का हो तो पैतृक संपत्ति से धन लाभ प्राप्त होता है.

कर्क लग्न के लिए धन योग | Dhan Yoga for Cancer ascendant

यदि कुण्डली में शुक्र दूसरे और बारहवें भाव में हो तो जातक धनवान बनता है. अगर गुरू शत्रु भाव में स्थित हो और केतु के साथ युति में हो तो जातक भरपूर धन और ऎश्वर्य प्राप्त करता है.

सिंह लग्न के लिए धन योग | Dhan Yoga for Leo ascendant

शुक्र चंद्रमा के साथ नवांश कुण्डली में बली अवस्था में हो तो व्यक्ति व्यापार एवं व्यवसाय द्वारा खूब धन कमाता है. यदि शुक्र बली होकर मंगल के साथ चौथे भाव में स्थित हो तो जातक को धन लाभ का सुख प्राप्त होता है.

कन्या लग्न के लिए धन योग | Dhan Yoga for Virgo ascendant

शुक्र और केतु दूसरे भाव में हों तो अचानक धन लाभ के योग बनते हैं. यदि कुण्डली में चंद्रमा कर्म भाव में हो तथा बुध लग्न में हो व शुक्र दूसरे भाव स्थित हो तो जातक अच्छी संपत्ति संपन्न बनता है.

तुला लग्न के लिए धन योग | Dhan Yoga for Libra ascendant

कुण्डली में दूसरे भाव में शुक्र और केतु हों तो जातक को खूब धन संपत्ति प्राप्त होती है. अगर मंगल, शुक्र, शनि और राहु बारहवें भाव में होंतो व्यक्ति को अतुल्य धन मिलता है.

वृश्चिक लग्न के लिए धन योग | Dhan Yoga for Scorpio ascendant

कुण्डली में बुध और गुरू पांचवें भाव में स्थित हो तथा चंद्रमा एकादश भाव में हो तो व्यक्ति करोड़पति बनता है.

यदि चंद्रमा, गुरू और केतु दसवें स्थान में होंतो जातक धनवान व भाग्यवान बनता है.

धनु लग्न के लिए धन योग | Dhan Yoga for Sagittarius ascendant

कुण्डली में चंद्रमा आठवें भाव में स्थित हो और सूर्य, शुक्र तथा शनि कर्क राशि में स्थित हों तो जातक को बहुत सारी संपत्ति प्राप्त होती है. यदि गुरू बुध लग्न मेषों तथा सूर्य व शुक्र दुसरे भाव में तथा मंगल और राहु छठे भाव मे हों तो अच्छा धन लाभ प्राप्त होता है.

मकर लग्न के लिए धन योग | Dhan Yoga for Capricorn ascendant

जातक की कुण्डली में चंद्रमा और मंगल एक साथ केन्द्र के भावों में हो या त्रिकोण भाव में स्थित हों तो जातक धनी बनता है. धनेश तुला राशि में और मंगल उच्च का स्थित हो व्यक्ति करोड़पति बनता है.

कुंभ लग्न के लिए धन योग | Dhan Yoga for Aquarius ascendant

कर्म भाव अर्थात दसवें भाव में चंद्र और शनि की युति व्यक्ति को धनवान बनाती है. यदि शनि लग्न में हो और मंगल छठे भाव में हो तो जातक ऎश्वर्य से युक्त होता है.

मीन लग्न के लिए धन योग | Dhan Yoga for Pisces ascendant

कुण्डली के दूसरे भाव में चंद्रमा और पांचवें भाव में मंगल हो तो अच्छे धन लाभ का योग होता है. यदि गुरु छठे भाव में शुक्र आठवें भाव में शनि बारहवें भाव और चंद्रमा एकादशेश हो तो जातक कुबेर के समान धन पाता है.

कुछ अन्य धन योग | Other Dhan Yoga

यह तो बात हुई लग्न द्वारा धन लाभ के योगों की अब हम कुछ अन्य धन योगों के विषय में चर्चा करेंगे जो इस प्रकार बनते हैं.

  • मेष या कर्क राशि में स्थित बुध व्यक्ति को धनवान बनाता है, जब गुरु नवे और ग्यारहवें और सूर्य पांचवे भाव में बैठा हो तब व्यक्ति धनवान होता है.
  • जब चंद्रमा और गुरु या चंद्रमा और शुक्र पांचवे भाव में बैठ जाए तो व्यक्ति को अमीर बनाता है.
  • सूर्य का छठे और ग्यारहवें भाव में होना व्यक्ति को अपार धन दिलाता है.
  • यदि सातवें भाव में मंगल या शनि बैठे हों और ग्यारहवें भाव में शनि या मंगल या राहू बैठा हो तो व्यक्ति धनवान बनता है.
  • मंगल चौथे भाव, सूर्य पांचवे भाव में और गुरु ग्यारहवे या पांचवे भाव में होने पर व्यक्ति को पैतृक संपत्ति से लाभ मिलता है.

पंचमहापुरूष योग | Panch Mahapurush Yoga

कुण्डली में पंच महापुरूष योग तब बनता है जबकि मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र व शनि में से कोई भी ग्रह केन्द्र में स्वगृही, मूल त्रिकोण या उच्च का होकर स्थित हो इस योग से जातक वैभव और ऐश्वर्य को पाता है. लक्ष्मी देवी इन पर अपनी कृपा अवश्य बरसाती हैं.

अमला योग | Amla Yoga

कुण्डली में अमला योग तब बनता है जब चन्द्रमा से अथवा लग्न से दशम भाव में शुभ ग्रह विराजमान होता है. कहा जाता है कि जिस व्यक्ति की कुण्डली में यह योग बनता है वह भले ही गरीब परिवार में जन्मा हो परंतु भाग्य के बल से अपने जीवन काल में यश कीर्ति और धन प्राप्त करता है.

अखण्ड सम्राज्य योग | Akhand Samrajya Yoga

कुण्डली में एकादशेश बृहस्पति हो और द्वितीयेश एवं नवमेश में से कोई एक चन्द्रमा से केन्द्र स्थान में हो तब यह योग बनता है. यह अत्यंत शुभ फलदायी और प्रभावशाली होता है और व्यक्ति अपने जीवन काल में धन वैभव एवं यश प्राप्त करता है.

लक्ष्मी योग | Laxmi Yoga

कुण्डली में जब नवमेश लग्नेश अथवा पंचमेश के साथ युति का निर्माण करता है तो यह योग बनता है. इस योग से प्रभावित व्यक्ति पर माँ लक्ष्मी की कृपा दृष्टि सदैव बनी रहती है.

गजकेसरी योग | Gajkesari Yoga

गजकेसरी योग का निर्माण गुरु से चन्द्र के केन्द्र में होने पर होता है. यह योग जब केन्द्र भावों में बने तो सबसे अधिक शुभ माना जाता है. गजकेसरी योग व्यक्ति को धन, सम्मान व उच्च पद देने वाला माना गया है.

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कुण्डली में अरिष्ट योग | Reasons for the formation of inauspicious yogas in a Kundali

जन्मकुंडली के माध्यम से जातक के अरिष्ट होने के योग या कारण को जाना जा सकता है. जन्मकुंडली में ग्रह स्थिति, गोचर तथा दशा-अन्तर्दशा से अरिष्ट योगों को समझा जा सकता है. रोगों का विचार अष्टमेश और आठवें भाव में स्थित निर्बल ग्रहों से किया जाता है. यह रोग अधिकतर दीर्घ कालिक तथा असाध्य रोग होते हैं. कुछ अप्रत्यक्ष कारणों से होने वाले रोगों का विचार षष्ठेश, छठे भाव में स्थित निर्बल ग्रहों तथा जनमकुंडली में पीड़ित राशि व पीड़ित ग्रहों से किया जाता है. जन्म कुंडली में जो भाव या राशि पाप ग्रह से पीड़ित हो या जिसका स्वामी त्रिक भाव मे हो तो उस राशि तथा भाव से संबंधित रोग प्रभावित कर सकते हैं.

छठा भाव त्रिक भावों में से एक भाव है तथा त्रिक भावों को शुभ भाव नहीं कहा जाता है. जब लग्न का संबंध इस भाव से होता है तो अरिष्ट की संभावना में वृद्धि होती है. जातक को कई प्रकार के रोगों का सामना करना पड़ सकता है. कोई ना कोई ना बीमारी उसे घेरे रह सकती है. इसी प्रकार जब लग्न का संबंध आठवें से होता है तब अरिष्ट योग बनता है. अष्टम भाव को सबसे बुरा भाव माना जाता है. इसका संबंध लग्न से होने पर व्यक्ति मानसिक तथा शारीरिक परेशानियों से ग्रस्त रह सकता है. इस भाव से लम्बी अवधि के रोगों का विचार किया जाता है. जब लग्न का संबंध बारहवें से बनता है तब भी जातक को अरिष्ट का सामना करना पड़ता है क्योंकि इससे संबंध बनने पर व्यक्ति को हास्पीटल का मुख देखना ही पड़ता है.

कुण्डली में बनने वाले अन्य अरिष्ट योग | Other inauspicious yoga formed in a Kundali

कुण्डली में शुक्र और बुध वृश्चिक राशि में स्थित हों तो अरिष्ट योग बनाते हैं. इसी प्रकार मेष राशि का भाव व भावेश कमजोर हो तो जातक लाचारी भरा जीवन जीता है.

कुण्डली में बुध और चंद्रमा यदि धनु राशि में स्थित हों तो जातक को अरिष्ट बनाते हैं. कुण्डली में द्वितीयेश और तृतीयेश यदि आठवें भाव में होंतो अरिष्ट योग बनता है.

  • कुण्डली में चंद्र और सूर्य यदि मकर राशि में स्थित हों तो जातक को अरिष्ट बनाते हैं.
  • कुण्डली में सूर्य और बुध कुंभ राशि में स्थित हों तो जातक को अशुभ फलों की प्राप्ति होती है स्वाथ्य संबंधी परेशानियां सता सकती हैं.
  • कुण्डली में बुध और शुक्र यदि मीन राशि में हों तो अरिष्ट योग का निर्माण करते हैं.
  • कुण्डली में शुक्र और मंगल मेष राशि में स्थित हों तो अरिष्ट बनाते हैं.
  • कुण्डली में मंगल और बृहस्पति वृष राशि में स्थित हों तो स्वास्थ्य के लिए परेशानियां देने वाले होते हैं.
  • कुण्डली में बृहस्पति और शनि मितुन राशी में स्थित हों तो अरिष्ट बनाते हैं.
  • कुण्दली में शनि यदि कर्क राशी में हो तो अरिष्ट का कारण बनता है.
  • कुण्डली में शनि और बृहस्पति सिंह राशि में रहते हुए अरिष्ट कि स्थिति उत्पन्न करते हैं.
  • कुण्डली में बृहस्पति और मंगल कन्या राशि में होने पर शुभ फल नही देते और अरिष्ट का कारण बनते हैं.
  • कुण्डली में मंगल और शुक्र यदि तुला राशि में हों तो अरिष्ट होता है.  

अरिष्ट योग के अन्य कारण | Other reasons for the formation of inauspicious Yogas

लग्न हमारा शरीर है, छठा भाव रोग का कारण है तो आठवां भाव आयु है और बारहवें भाव से व्यय देखे जाते हैं. इस कारण जब इन सभी का संबंध किसी न किसी प्रकार से लग्न से बनता है तो अरिष्ट योग की संभावना होती है. इस प्रकार अनेक अरिष्ट योगों का वर्णन ज्योतिष शास्त्र में मिलता है. कुंडली में ग्रहों के बलाबल व स्थिति के अनुरूप बीमारियों के योग देखे जाते हैं.

  • लग्नेश कमजोर हो व लग्न तथा चंद्रमा पाप प्रभाव में हो तो स्वास्थ्य प्रभावित होता है. चंद्रमा राहु के साथ हो या बारहवाँ हो तो रोग कारण बनता है.
  • लग्नेश सप्तम में होने पर पाप प्रभाव में हो तो स्वास्थ्य के लिए कष्टकारी होता है.
  • लग्नेश अष्टम में व अष्टमेश लग्न में हो तो बीमारियाँ परेशान करती हैं.
  • राशि स्वामी पाप ग्रहों से दृष्ट या युक्त हो, अष्टम में हो तो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है.
  • सूर्य, चंद्रमा और शनि एक साथ छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो तो भयंकर शारिरिक कष्ट मिल सकता है.
  • चंद्रमा और बुध केंद्र में हो और शनि व मंगल की दृष्टि में होने पर रोग घेर सकते हैं.
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क्या होता है गण्डमूल नक्षत्र और क्या होगा उसका प्रभाव

वैदिक ज्योतिष के अनुसार भचक्र में कुल 27 नक्षत्र होते हैं. इन सत्ताईस नक्षत्रों में कुछ नक्षत्र ऎसे होते हैं जिनका क्षेत्र अति संवेदनशील होता है और इन्हीं नक्षत्रों को गण्डमूल नक्षत्र कहा जाता है. सभी नक्षत्रों का अपना मूल स्वभाव होता है. कोई नक्षत्र शुभ तो कोई अशुभ की श्रेणी में आता है. इन्हीं नक्षत्रों में से छ: नक्षत्र ऎसे हैं जो राशि संधि पर मिलते हैं. यह नक्षत्र केतु तथा बुध के होते हैं. जब केतु का नक्षत्र समाप्त होकर बुध का नक्षत्र आरम्भ होता है तब यह गण्डमूल नक्षत्र कहलाते हैं.

स्कन्द पुराण, नारद पुराण जैसे ग्रंथों में अनेक स्थानों पर गंडांत अर्थात गण्डमूल नक्षत्रों का उल्लेख मिलता है. रेवती नक्षत्र की अंतिम चार घड़ियाँ और अश्वनी नक्षत्र की पहली चार घड़ियाँ गंडांत कही जाती हैं. मघा, आश्लेषा ,ज्येष्ठा और मूल नक्षत्र भी गंडांत हैं.  मुख्यत: ज्येष्ठा तथा मूल के मध्य का एक प्रहर अत्यंत अशुभ फल देने वाला माना गया है.

ज्योतिष शास्त्र  में गण्डमूल नक्षत्र के विषय में विस्तारपूर्वक बताया गया है. जातक पारिजात ,बृहत् पराशर होरा शास्त्र ,जातकाभरणं इत्यादि सभी  प्राचीन ग्रंथों में गण्डमूल नक्षत्रों तथा उनके प्रभावों का वर्णन दिया गया है.

गण्डमूल नक्षत्रों के विषय में बहुत सी भ्रांतियाँ फैली हुई हैं. अधिकाँश व्यक्ति गण्डमूल नक्षत्र में पैदा हुए बच्चे को पिता पर ही कष्टकारी मानते हैं, लेकिन ऎसा नहीं है. गण्डमूल नक्षत्रों के सभी चरणों का फल अलग-अलग होता है और किसी चरण में फल अच्छा भी होता है.

गण्डमूल नक्षत्र विचार | Gandmool Nakshatra description

वैदिक ज्योतिष में कुछ नक्षत्र ऎसे होते हैं जिनका क्षेत्र अति संवेदनशील होता है और इन्हीं नक्षत्रों को गण्डमूल नक्षत्र कहा जाता है. गण्डमूल दोष मानने का कारण यह है की नक्षत्र चक्र और राशि चक्र दोनों ही क्षेत्रों में इन गण्डमूल नक्षत्रों पर संधि होती है. संधि का समय हमेशा से विशेष माना जाता है. उदाहरण के लिए रात्रि से जब दिन का प्रारम्भ होता है तो उस समय संधि को हम ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं तथा ठीक इसी तरह जब दिन से रात्रि होती है तो उस समय संधि को हम गोधूलि कहते हैं. इन समयों पर भगवान का ध्यान करने के लिए कहा जाता है. इस समय अपने धर्मानुसार कुछ दैनिक नियमों का पालन करना चाहिए. संधि का स्थान जितना लाभप्रद होता है उतना ही हानि कारक भी होता है. संधि का समय अधिकतर शुभ कार्यों के लिए अशुभ ही माना जाता है.

भारतीय वैदिक ज्योतिष के आधार पर छ: नक्षत्रों को गण्डमूल की संज्ञा दी गयी है. इन छ: नक्षत्रों को गण्डमूल नक्षत्रों की दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है. केतु के नक्षत्र और बुध के नक्षत्र. गण्डमूल नक्षत्रों की प्रथम श्रेणी में केतु के तीन नक्षत्र अश्विनी, मघा व मूल नक्षत्र आते हैं. मान्यता है कि प्रथम श्रेणी में जन्मे बच्चे के पिता को बच्चे का मुँह तब तक नहीं देखना चाहिए जब तक कि 27 दिन बाद गण्डमूल नक्षत्र की शांति ना हो जाए. 27 दिन बाद चन्द्रमा जब उसी नक्षत्र में वापिस आता है तब गण्डमूल नक्षत्र की शांति करवाई जाती है.

गण्डमूल नक्षत्र की द्वितीय श्रेणी में बुध के तीन नक्षत्र अश्लेषा, ज्येष्ठा व रेवती नक्षत्र आते हैं. कई विद्वानों का मत है कि दूसरी श्रेणी के गण्डमूल नक्षत्रों की शांति जन्म से दसवें या उन्नीसवें दिन भी कराई जा सकती है, लेकिन यह अपवाद ही है.

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