क्या रत्न सचमुच आपका भाग्य बदल सकते हैं? बिना लाग-लपेट के जानिये

सृष्टि में विभिन्न प्रकार के रत्नों का भण्डार मानव को कल्याणकारी मंगल कामनाओं के साथ वरदान स्वरूप प्राप्त हुआ है. व्यक्ति रत्नों को अपने भाग्य को चमकाने के लिए धारण करता है, रत्न द्वारा वह स्वयं को सुखी तथा सम्पन्न रखने की चाहत रखता है. रत्नों में चमत्कारी शक्ति है जो ग्रहों के विपरीत प्रभाव को कम करके ग्रह के बल को बढा़ते हैं. प्राचीन समय से ही भाग्य को बलवान बनाने के लिए रत्नों को धारण किया जाता रहा है. रत्नों में अद्भूत शक्ति होती है.

ग्रहों तथा रत्नों का क्या सम्बन्ध है इसे समझकर ही हम रत्नों के लाभ को प्राप्त कर सकते हैं. ग्रहों में व्यक्ति के सृजन एवं संहार की जितनी प्रबल शक्ति है उतनी ही शक्ति रत्नों में ग्रहों की शक्ति घटाने तथा बढ़ाने की  भी होती है. रत्न कि शक्ति को आकर्षण की विकर्षण की शक्ति कहते हैं. रत्नों में ग्रहों की रश्मियों, रंगों, चुम्बकत्व की शक्ति होती है.

रत्न व्यक्ति के भाग्य को शिखर तक पहुंचा सकता है. रत्न के अनुकूल प्रभाव को पाने के लिए उचित प्रकार से जांच करवाकर ही रत्न धारण करना चाहिए. ग्रहों की स्थिति के अनुसार रत्न धारण करना चाहिए. रत्न धारण करते समय ग्रहों की दशा एवं अन्तर्दशा का भी ख्याल रखना चाहिए. रत्न पहनते समय मात्रा का ख्याल रखना आवश्यक होता है अगर मात्रा सही नहीं हो तो फल प्राप्ति में विलम्ब होता है.

इसलिए रत्न धारण करते समय यह विचार अवश्य कर लेना चाहिए कि जिस रत्न को धारण करने जा रहे हैं वह अपने से सम्बन्धित ग्रह की शक्ति को आकर्षित करने एवं परावर्तित करने की क्षमता रखता है. इसी प्रकार शुभ ग्रहों के अशुभ के शुभत्व पूर्ण रश्मियों को आकर्षित करके ग्रह की शक्ति बढ़कर भाग्य को चमका सकती है.

कब कौन-सा रत्न धारण करना हमारे लिए भाग्यवर्द्धक होगा और कौन सा रत्न धारण करके हम बुरे ग्रह के कुप्रभावों से अपने को बचा सकेगा. रत्न न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी उपयोगी माने गए हैं आज के समय में इसे पूर्ण रुप से अनेक कामों के लिए उपयोग किया जाने लगा है. भाग्य एवं स्वास्थ्य दोनों का योग बन गए हैं

ग्रह और रत्न | Planets and Gemstones

ग्रह रत्न धारण करने का विशेष नियम है. कुण्डली में सूर्य को बलशाली बनाना हो तो सोने की अंगूठी में माणिक्य धारण करना चाहिए. इसी प्रकार सभी ग्रहों का अपना रत्न और धातु है.

चन्द्रमा का रत्न है मोती और धातु है चांदी.  मंगल का रत्न है मूंगा और धातु है तांबा. बुध का रत्न है पन्ना और धातु है सोना इसी प्रकार से गुरू का रत्न पुखराज है और धातु है सोना. शुक्र का रत्न है हीरा और धातु चांदी है. शनि का रत्न नीलम और धातु लोहा है. राहु का प्रिय रत्न है गोमेद और धातु है अष्टधातु. केतु का रत्न है लहसुनियां जिसे सोना अथवा तांबा किसी भी अंगूठी में धारण किया जा सकता है.

रत्न संबंधी सावधानी

रत्नों में ग्रहों की उर्जा को अवशोषित करने की अद्भुत क्षमता होती है। रत्नों में विराजमान गुणों के कारण रत्नों को ग्रहों का अंश भी माना जाता है। ज्योतिषशास्त्र की सभी शाखाओं में रत्नों के महत्व का वर्णन मिलता है. रत्न शुभ फल देने की शक्ति रखता है तो अशुभ फल देने की भी इसमें ताकत है. रत्नों के नाकारात्मक फल का सामना नहीं करना पड़े इसके लिए रत्नों को धारण करने से पहले कुछ सावधानियों का भी ध्यान रखना जरूरी होता है.किसी भी रत्न को धारण करने से पूर्व किसी अच्छे ज्योतिष से सलाह अवश्य लें और रत्न की प्राण प्रतिष्ठा करके उसे धारण करें. जिस ग्रह की दशा अन्तर्दशा के समय अशुभ प्रभाव मिल रहा हो उस ग्रह से सम्बन्धित रत्न पहनना शुभ फलदायी नहीं होता है. इस स्थिति में इस ग्रह के मित्र ग्रह का रत्न एवं लग्नेश का रत्न धारण करना लाभप्रद होता है. रत्न की शुद्धता की जांच करवाकर ही धारण करना चाहिए धब्बेदार और दरारों वाले रत्न भी शुभफलदायी नहीं होते हैं.

Posted in Basic Astrology, Gemstones, Rashi, Remedies, Signs, Yoga | Tagged , , , , , | 2 Comments

जानिये कि योनि मिलान क्यों जरूरी है

इस संसार में जितने भी जीव हैं वह किसी ना किसी योनि से अवश्य ही संबंध रखते हैं. वैदिक ज्योतिष में भी इन योनियों के महत्व पर बल दिया गया है और इनका संबंध नक्षत्रों से जोड़ा गया है. योनियों के वर्गीकरण में अभिजीत सहित 28 नक्षत्रों को लिया गया है.  महर्षि अत्रि का मानना है कि सफल वैवाहिक जीवन के लिए स्त्री और पुरुष दोनों के नक्षत्र की योनि समान होनी चाहिए. इससे दोनों के आंतरिक गुण समान होने से आपसी मतभेद होने की संभावना कम रहती है.

योनियाँ चौदह प्रकार की होती है और दो नक्षत्रों को एक योनि के अन्तर्गत रखा गया है.

नक्षत्र के आधार पर योनियों का वर्गीकरण | Classification of Yoni on the basis of Nakshatra

योनि नक्षत्र
अश्व अश्विनी, शतभिष
गज भरणी, रेवती
मेष पुष्य, कृतिका
सर्प रोहिणी, मृ्गशिरा
श्वान मूल, आर्द्रा
मार्जार आश्लेषा, पुनर्वसु
मूषक मघा, पूर्वाफाल्गुनी
गौ उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराभाद्रपद
महिष स्वाती, हस्त
व्याघ्र विशाखा, चित्रा
मृग ज्येष्ठा, अनुराधा
वानर पूर्वाषाढ़ा, श्रवण
नकुल उत्तराषाढ़ा, अभिजीत
सिंह पूर्वाभाद्रपद, धनिष्ठा

उपरोक्त सभी 28 योनियों का परस्पर संबंध पाँच प्रकार से होता है.

स्वभाव योनि | Swabhava Yoni

स्वभाव योनि का अर्थ है वर तथा कन्या की योनि एक है. यदि दोनों की योनि एक ही है तब विवाह को शुभ माना गया है.

मित्र योनि | Friend Yoni

मित्र योनि में विवाह होने पर भी वैवाहिक संबंध मधुर रहते हैं.

उदासीन अथवा सम योनि | Neutral Yoni

यदि लड़के तथा लड़की की कुण्डली में दोनों की योनियाँ परस्पर उदासीन स्वभाव की हैं तब वैवाहिक संबंध औसत ही रहते हैं.

शत्रु योनि | Opposite Yoni

यदि वर तथा कन्या की परस्पर योनियाँ शत्रु स्वभाव की हैं तब इसे वैवाहिक संबंधों के लिए अशुभ माना जाता है.

महाशत्रु योनि | Enemy Yoni

वर तथा कन्या कि योनियों में महाशत्रुता होने पर यह दोनों के लिए अशुभ मानी गई है. इससे दाम्पत्य जीवन में वियोग तथा कष्टों का सामना करना पड़ सकता है.

योनि मिलान के अंक |Points for Yoni Milan

योनि मिलान, योनि दोष या योनि कूट को कुल 4 अंक प्रदान किए गये हैं.

  • वर तथा कन्या की एक योनि होने पर     4 अंक
  • वर तथा कन्या की मित्र योनि होने पर     3 अंक
  • वर तथा कन्या की सम योनि होने पर     2 अंक
  • वर तथा कन्या की शत्रु योनि होने पर     1 अंक
  • वर तथा कन्या की महाशत्रु योनि होने पर     0 अंक

योनि मिलान को वर तथा वधु की कुण्डली मिलान के लिए तो हम लेते ही हैं इसे साझेदारी का काम करने वाले दो लोगों के लिए भी लिया जा सकता है. मालिक तथा नौकर के आपसी संबंध कैसे रहेगें इसका आंकलन भी योनि मिलान से किया जा सकता है. जिन व्यक्तियों की योनि सम होती है उन लोगों की मनोवृत्ति भी समान ही होती है. कई बार तो यह भी देखा गया है कि उनके जीवन के मूल्य तथा उनकी रुचियाँ भी एक सी ही हैं.

योनि दोष का परिहार | Effects of Yoni Dosha

  • यदि किन्ही दो व्यक्तियों की कुण्डलियों में योनि दोष मौजूद है तो उनका यह दोष स्थगित हो सकता है बशर्ते कि दोनों के राशि स्वामी मित्र ग्रह हों या मित्र की तरह व्यवहार करते हों.
  • यदि वर तथा वधु की कुण्डलियों के राशि स्वामी एक ही ग्रह है तब भी योनि दोष का परिहार हो जाता है.
  • यदि वर तथा कन्या के नवांश स्वामी भी आपस में मित्र हैं तब भी योनि दोष कैंसिल हो जाता है.
  • वर तथा वधु की कुण्डलियों में भकूट दोष नहीं है तब भी योनि दोष का परिहार हो जाता है.
  • वश्य शुद्धि अर्थात वश्य मिलान होने पर भी यह दोष कैंसिल हो जाता है.
Posted in Marriage, Vedic Astrology, Yoga | Tagged , , , , | Leave a comment

क्या होगा आपके ग्रहों की शयनादी अवस्था का प्रभाव? ज्योतिष से जानिए

वैदिक ज्योतिष में बहुत से योगों तथा अवस्थाओं का वर्णन मिलता है. इन अवस्थाओं को भिन्न – भिन्न नामों से जाना जाता है. इन अवस्थाओं के नाम के अनुसार ही इनका प्रभाव भी होता है और व्यक्ति को अपने जीवन में ग्रह की इन ज्योतिषीय अवस्थाओं के अनुरुप फलों को भोगना पड़ता है. शयनादि अवस्थाओं में से ग्रह कौन सी अवस्था में है इसकी जानकारी शास्त्रों में गणितीय विधि से दी गई है. शयनादि अवस्थाएँ बारह प्रकार की होती हैं. गणितीय विधि से जो संख्या शेष आती है उस संख्या के अनुसार ग्रह का फल मिलता है. शयनादि अवस्थाओं की सभी अवस्थाएँ निम्नलिखित हैं :-

शयन अवस्था | Shayan Avastha

यह पहली अवस्था है. यदि कुण्डली में कोई ग्रह शयन अवस्था में है तब इस अवस्था में ग्रह सोये व्यक्ति के समान होता है. जैसे सोये हुए व्यक्ति को कुछ पता नहीं रहता वैसे ही सुप्त ग्रह को भी कुछ पता नहीं होता. इस अवस्था में ग्रह अपने शुभ फल देने में सक्षम नही होता है. यदि ग्रह शुभ अवस्था में बली है तब उसके फलों में कुछ शुभता हो सकती है.

उपवेशन अवस्था | Upveshan Avastha

जब व्यक्ति सुबह सोकर उठकर बिस्तर पर बैठ जाता है तब नींद तो खुल जाती है पर थोड़ा आलस्य अभी बचा होता है. उपवेशन अवस्था में भी ग्रह की यही स्थिति होती है. ग्रह में थोड़ा सा बल रहता है. वह कुछ फल देने में सक्षम होता है. लेकिन बहुत ज्यादा शुभ नहीं दे पाता है. जीवन में कुछ अभावों का सामना करना पड़ सकता है.

नेत्रपाणि अवस्था | Netrapani Avastha

सुबह के समय जब व्यक्ति सोकर उठकर अपने बिस्तर पर कुछ देर बैठने के बाद अपनी आँखें मलते हुए उठता है. कुण्डली में ग्रह की यह तीसरी अवस्था होती है. इस अवस्था में भी ग्रह ज्यादा शुभ नहीं माना जाता है. ग्रह अपने पूर्ण फल देने में असहाय हो सकता है.

प्रकाशन अवस्था | Prakashan Avastha

ग्रह की यह अवस्था कुछ ठीक मानी जाती है. जैसे व्यक्ति सोकर उठकर कमरे से बाहर निकलता है और सूर्य की रोशनी को देखता है तो उसकी नींद थोड़ा और खुलती है. इसी तरह की अवस्था ग्रह की होती है. इस अवस्था को शुभ माना जाता है. इसमें व्यक्ति को ग्रह के संपूर्ण फल मिलते हैं. व्यक्ति धनी होता है.

गमनेच्छा अवस्था | Gamnechchha Avastha

सोकर उठकर व्यक्ति कुछ समय बाहर घूमना चाहता है. जिससे वह ताजगी महसूस कर सकें और उसका शरीर चुस्त-दुरुस्त रहे. गमनेच्छा में व्यक्ति अपनी दैनिक दिनचर्या को पूरा करना चाहता है. यही गमनेच्छा ग्रह की है. इस अवस्था में ग्रह ताजगी पाना चाहता है ताकि वह शुभ फल दे सके. यदि कोई ग्रह जन्म कुण्डली में इस अवस्था में स्थित है तब वह जातक धनी, गुणी, विद्वान तथा दानी हो सकता है यदि वह ग्रह कुण्डली में शुभ भावों का स्वामी है.

गमन अवस्था |Gaman Avastha

इससे पहली अवस्था में ग्रह बाहर जाने की इच्छा रखता है और इस अवस्था में ग्रह बाहर चला जाता है. बाहर घूमने से उसका आलस्य दूर होता है. वह दैनिक क्रियाओं को पूर्ण करता है और ताजगी का अनुभव करता है. इस अवस्था का फल अलग भावों में अलग ही होगा.

सभावास अवस्था अथवा सभ्यमवास्ति अवस्था | Sabhavas Avastha or Sabhayamvasti Avastha

सुबह की सभी क्रियाओं से निपटने के पश्चात व्यक्ति कुछ समय सभ्य लोगों के मध्य बिताता है. यहाँ वह इन  सभ्य व्यक्तियों से चर्चा करता है. सभी तरह के विषयों पर बातचीत की जाती है. इस अवस्था में ग्रह भी ऎसा ही होता है. इस अवस्था में भी ग्रह के फल भिन्न भावों में भिन्न ही होते हैं.

आगम अवस्था | Aagam Avastha

इस अवस्था में ग्रह बाहर जाने के बाद वापिस घर आता है. इस अवस्था के फल भी सभी ग्रहों के लिए अलग हैं.

भोजनम अवस्था | Bhojnam Avastha

बाहर से व्यक्ति जब वापिस घर आता है तब आकर वह भोजन ग्रहण करता है. इसका अर्थ है कि व्यक्ति को भूख लगी है. यही मनोदशा ग्रह की भी होती है. ग्रह यदि भूखा है अर्थात कमजोर है तब वह फल देने में कमजोर हो सकता है. ग्रह की इस अवस्था को ज्यादा शुभ नहीं बताया गया है.

नृत्यलिप्सा अवस्था | Nrityalipsa Avastha

भोजन करने के उपरान्त व्यक्ति कुछ देर विश्राम करने के लिए नृत्य देखने की इच्छा व्यक्त करता है. ग्रह इसी नृत्य अवस्था में लग्न में स्थित है तब सभी ग्रहों का अपना-अपना अलग फल होता है. जैसे नृ्त्यलिप्सा में लग्न में स्थित सूर्य बहुत शुभ फल प्रदान करेगा जबकि राहु यदि इसी अवस्था में लग्न में है तब यह बुरे फल प्रदान करेगा.

कौतुक अवस्था | Koutuk Avastha

यह ऎसी अवस्था है जिसमें कोई भी काम करने पर खुशी मिलती है. ऎसी अवस्था को अधिकाँशत: सभी ग्रहों के लिए शुभ ही माना गया है.

निद्रा अवस्था | Nidra Avastha

यह नींद आने वाली अवस्था होती है. पूरे दिन भर काम करने के बाद व्यक्ति थकान का अनुभव करता हे और सोना चाहता है या थकान के कारण उसे स्वत: ही निद्रा आने लगती है. ऎसी अवस्था में व्यक्ति कोई काम नहीं करना चाहता है. ग्रह की ऎसी अवस्था को शुभ नहीं माना जाता है. ग्रह अपने पूरे फल प्रदान करने में सक्षम नहीम होता है.

Posted in Vedic Astrology, Yoga | Tagged , , , , | Leave a comment

ज्योतिष में ग्रह कि जाग्रतादि अवस्थाओं की महत्ता

ग्रहों की कई प्रकार की अवस्थाएं होती हैं. यह अवस्थाएँ ग्रहों के अंश अथवा अन्य कई नियमों के आधार पर आधारित होती हैं. इन्हीं अवस्थाओं में से ग्रहों की एक अवस्था जाग्रत या जाग्रतादि अवस्थाएँ होती हैं. इन अवस्थाओं के आधार पर ग्रह विभिन्न फलों का प्रतिपादन करते हैं.

जाग्रत अवस्था | Jagarat Avastha

ग्रह उत्तम अवस्था में हो तो वह अपना सौ प्रतिशत फल देने वाला होता है. इसमें उसके गुण प्रभावशाली रुप से अच्छे फलों का प्रतिपादन करते हैं. जाग्रत अवस्था में ग्रह जागा हुआ होता है. ग्रह कैसे जागता है इसका विश्लेषण करते हैं. जब कुण्डली में ग्रह अपनी मूलत्रिकोण राशि में या स्वराशि अर्थात अपनी राशि में हो तो यह ग्रह की जाग्रत अवस्था कहलाती है.

जाग्रत अवस्था प्रभाव | Effect of Jagrat Awastha

इस अवस्था के कारण सुंदर वस्त्र एवं आभूषणों की प्राप्ति होती है. भवन, जमीन जायदाद एवं अन्य सुखों की प्राप्ति होती है. शिक्षा एवं ज्ञान में वृद्धि होती है. शत्रुओं का नाश होता है और भौतिक सुख सुविधाओं की प्राप्ति होती है. व्यक्ति विचारशील होकर कार्य करता है. उसे राजसी ठाठ बाट मिलता है, उच्च राजकीय सम्मान एवं पद की प्राप्ति होती है. भू-संपत्ति का लाभ मिलता है. व्यापार एवं व्यवसाय में वृद्धि होती है. शिक्षा एवं ज्ञान में वृद्धि होती है. अनेकों प्रकार की सुख एवं सुविधाओं की प्राप्ति होती है.

स्वप्न अवस्था | Swapna Awastha

इस अवस्था में ग्रह मध्यम बल का होता है. वह अपना पचास प्रतिशत तक फल देने वाला होता है. इसके अंतर्गत ग्रह की स्थिति को इस बात से समझा जाता है कि ग्रह या तो मित्र राशि में होता है या शुभ वर्गों के साथ युति में हो अथवा उनके द्वारा दृष्ट हो रहा हो तथा उस ग्रह को गुरू का सहयोग मिल रहा हो तो इस अवस्था को उस ग्रह की स्वप्न अवस्था कहते हैं.

स्वप्न अवस्था प्रभाव | Effect of Swapna Awastha

इस अवस्था में ग्रह के 50% फल मिलते हैं जिसके द्वारा कुछ शुभ फलों की प्राप्ति होती है. शांत प्रकृति देखी जा सकती है. व्यक्ति दान करने की चाह रखने वाला होता है. शास्त्रों के प्रति रुचि एवं लगाव होता है. पठन पाठन में मन लगाने वाला होता है. व्यक्ति के मित्रों की संख्या अच्छी होती है तथा व्यक्ति राजा का मंत्री या सलाहकार भी हो सकता है. वर्तमान समय में व्यक्ति किसी अच्छे पद पर सलाहकार का काम करने वाला हो सकता है.

सुसुप्त अवस्था | Susupta Awastha

इस अवस्थ अमें ग्रह अधम या अक्षम होता है. केवल सात प्रतिशत के करीब फल देता है. इस अवस्था में ग्रह नीच का होता है, ग्रह अपने शत्रु की राशी में हो सकता है. शत्रु के क्षेत्रीय होता हो या अशुभ ग्रहों के साथ हो तब यह उस ग्रह कि सुसुप्त या सोई हुई अवस्था होती है.

सुसुप्त अवस्था प्रभाव | Effect of Sususpta Awastha

इस अवस्था के कारण धार्मिकता का लोप होता है. बिमारी के लक्षण देखे जा सकते हैं. सोचने समझने की ताकत कम होती है विवेक पूर्ण कार्य नहीं हो पाता. व्यक्ति जीवन में लक्ष्यहीन सा महसूस करता है, झगडालू प्रवृत्ति होने लगती है. पांचवें भाव के प्रभावों क अलोप होने लगता है. इस अवस्था के कारण धन की हानी होती है. निर्बल होता है और प्रताड़ना मिलती है. नीच कर्म करने वाला होता है. स्वास्थ्य में हमेशा परेशानी बनी रह सकती है. शत्रुओं से परेशानियां, धन एवं मान सम्मान की हानी, शरीर की उर्जा का ह्रास होत है. तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश करने की आदत होती है. कुतर्क करने वाला होता है.

Posted in Vedic Astrology, Yoga | Tagged , , , , | Leave a comment

लज्जितादी अवस्थाओं का महत्व और प्रभाव. पूर्ण विवरण देखिये

ग्रहों की कई प्रकार की अवस्थाएँ होती हैं. यह अवस्थाएँ ग्रहों के अंश अथवा अन्य कई नियमों के आधार पर आधारित होती हैं. इन्हीं अवस्थाओं में से ग्रहों की एक अवस्था लज्जितादि अवस्थाएँ होती हैं. इन अवस्थाओं के आधार पर ग्रह विभिन्न फलों का प्रतिपादन करते हैं. इन दशाओं में ग्रह अपनी अवस्था के अनुरुप फल प्रदान करता है. लेकिन हम सिर्फ इन अवस्थाओ से ही सारा फल कथन नही कर सकते यह तो मात्र अनुमान है.

लज्जित अवस्था | Lajjit Avastha

जब भी कोई ग्रह कुण्डली में पंचम भाव में अशुभ ग्रहों से युक्त हो तो यह ग्रह की लज्जित अवस्था होती है.

इस अवस्था में ग्रह अनुकूल फल देने में कुछ अक्षम होता है. पंचम भाव के फलों में भी कमी हो सकती है.

लज्जित अवस्था प्रभाव | Effects of Lajjit Avastha

इस अवस्था के कारण व्यक्ति के भीतर धार्मिकता का लोप होता है. किसी भी बात के मध्य अंतर को समझने की क्षमता में कमी देखी जा सकती है. छोटे बच्चों में बिमारी के लक्षण देखे जा सकते हैं. सोचने समझने की ताकत कम होती है विवेक पूर्ण कार्य नहीं हो पाता. व्यक्ति जीवन में लक्ष्यहीन सा महसूस करता है, झगडालू प्रवृत्ति होने लगती है. पांचवें भाव के प्रभाव लोप भी हो सकते हैं.

तृषित अवस्था | Trisheet Avastha

कुण्डली में ग्रह जलीय राशि(4,8,12राशि) में बैठा हो और उसे अशुभ ग्रह देख रहे हो और शुभ ग्रह नहिं देखते हों. तब यह तृषित अवस्था कहलाती है. चौथे, आठवें ओर बारहवें भाव में इस अवस्था के होने का अधिक प्रभाव पड़ता है. ग्रह पर कोई भी शुभ दृष्टि न होने पर गृह तृषित अवस्था में होता है.

तृषित अवस्था प्रभाव | Effects of Trisheet Avastha

इस अवस्था के कारण धन की हानि होती है. व्यक्ति निर्बल होता है और उसे प्रताड़ना मिल सकती है. व्यक्ति नीच कर्म करने वाला हो सकता है. स्त्रियों के संसर्ग द्वारा अनेक प्रकार की बिमारियां प्राप्त होती हैं. स्वास्थ्य में हमेशा परेशानी बनी रह सकती है.

क्षुधित अवस्था | Shudhit Avastha

इसके अनुसार यदि ग्रह शत्रु राशि या शत्रु के क्षेत्र में स्थित हो, ग्रह शत्रु से युति कर रहा हो या उससे दृष्ट हो विशेष रुप से शनि से दृष्ट हो तो यह उसकी क्षुधित अवस्था कहलाती है. इसमें शत्रु से किसी भी तरह से संबंध बन सकता है. यह मैत्री नैसर्गिक मित्रता पर आधारित होती है.

क्षुधित अवस्था प्रभाव | Effects of Shudhit Avastha

इसके प्रभाव स्वरुप व्यक्ति मानसिक रुप से विक्षिप्त, शत्रुओं से परेशानियां, धन एवं मान सम्मान की हानि, शरीर की उर्जा का ह्रास होता है. व्यक्ति में तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश करने की आदत होती है. व्यक्ति द्विअर्थी होता है और तथ्यहीन तर्क (कुतर्क) करने वाला होता है.

क्षोभित अवस्था | Shobhit Avastha

कुण्डली में ग्रह सूर्य के साथ हो, ग्रह अस्त हो या अस्त नहीं हो दोनों ही स्थितियों में या अशुभ एवं शत्रु ग्रह के साथ दृष्ट या युति में हों तो क्षोभित अवस्था होती है.

क्षोभित अवस्था प्रभाव | Effects of Shobhit Avastha

इस अवस्था के प्रभाव स्वरुप धन की हानि होती है, व्यक्ति कुतर्क करने वाला होता है. पैरों के रोग या टखने से नीचे का भाग प्रभावित हो सकता है. इस अवस्था से प्रभावित व्यक्ति को अनेक प्रकार कि मानसिक चिंताएं प्रभावित कर सकती हैं. इस योग के व्यक्ति को सरकारी प्रभाव से धन की हानि हो सकती है.

मुदित अवस्था | Mudit Avastha

कुण्डली में यदि ग्रह मित्र की राशि में हो या मित्र के क्षेत्र में हो या मित्र से युति हो अथवा मित्र से दृष्ट और गुरु के साथ स्थित हो तो यह उस ग्रह की मुदित अवस्था होती है.

मुदित अवस्था प्रभाव | Effects of mudit Avastha

इस अवस्था के कारण सुंदर वस्त्र एवं आभूषणों की प्राप्ति होती है. व्यक्ति को अपने जीवन में बडा़ भवन मिलता है. जमीन जायदाद एवं अन्य सुखों की प्राप्ति होती है. शिक्षा एवं ज्ञान में वृद्धि होती है. शत्रुओं का नाश होता है और भौतिक सुख सुविधाओं की प्राप्ति होती है.

गर्वित अवस्था | Garvit Avastha

यह दीप्त अवस्था और स्वस्थ अवस्था के मिश्रित परिणाम द्वारा प्राप्त होती है. इसमें कुंडली में ग्रह उच्च का बैठा हो, अपनी मूलत्रिकोण राशि में हो या अपनी स्वराशी में स्थित हो तो यह ग्रह की गर्वित अवस्था कहलाती है.

गर्वित अवस्था प्रभाव

राजसी ठाठ बाट मिलता है, उच्च राजकीय सम्मान एवं पद की प्राप्ति होती है. भू-संपत्ति का लाभ मिलता है. व्यापार एवं व्यवसाय में वृद्धि होती है. शिक्षा एवं ज्ञान में वृद्धि होती है. अनेकों प्रकार की सुख एवं सुविधाओं की प्राप्ति होती है.

Posted in Vedic Astrology, Yoga | Tagged , , , , , | Leave a comment

क्या होगा पूर्वभाद्रपद नक्षत्र में जन्म लेने का प्रभाव? संपूर्ण जानकारी

आकाश में कुंभ राशि में 20 अंश से मीन राशि में 3 अंश 20 कला तक पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र रहता है. क्रान्ति वृ्त्त से 19 अंश 24 कला 22 विकला उत्तर में और विषुवत रेखा से 15 अंश 11 कला 21 विकला उत्तर में पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र स्थित है. नक्षत्रों की श्रेणी में पूर्वाभाद्रपद 25 वां नक्षत्र है. इस नक्षत्र के स्वामी देवगुरू बृहस्पति हैं. इस नक्षत्र के तीन चरण कुम्भ में और एक चरण मीन में होता है. दो तारों वाला यह नक्षत्र मण्डल जुड़वां बच्चों की भांति दिखाई पड़ता है. इस कारण इसे यमल सदृश भी कहा जाता है. यह उग्र संज्ञक नक्षत्र होता है. अत: इस नक्षत्र में उग्र कार्य करना जैसे तंत्र पूजा, मुकदमा दायर करना, शत्रु पर आक्रमण करना जैसे कामों को इस नक्षत्र में करना बेहतर माना गया है. यह नक्षत्र अधोमुखी नक्षत्र भी कहा जाता है.

पूर्वा भाद्रपद जातक की विशेषताएं | Characteristics of Purvabhadra Nakshatra

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार इस नक्षत्र में जिनका जन्म होता है वे सत्य का आचरण करने वाले एवं सच बोलने वाले होते हैं, ईमानदार होते हैं अत: छल कपट और बेईमानी से दूर रहते हैं. यह आशावादी होते हैं यही कारण है कि ये किसी भी स्थिति में उम्मीद का दामन नहीं छोड़ते हैं. पूर्वाभाद्रपद में जिनका जन्म होता है वे व्यक्ति परोपकारी होते हैं दूसरों की सहायता करने हेतु सदैव तत्पर रहते हैं. जब भी कोई कष्ट में होता है उसकी मदद करने से ये पीछे नहीं हटते हैं. व्यवहार कुशल एवं मिलनसार होते हैं, सभी के साथ प्रेम एवं हृदय से मिलते हैं, मित्रता में ये समझदारी एवं ईमानदारी का पूरा ख्याल रखते हैं.

इस नक्षत्र में पैदा होने वाले व्यक्ति शुद्ध हृदय के एवं पवित्र आचरण वाले होते हैं.  कभी भी व्यक्ति का अहित करने की चेष्टा नहीं करते हैं. इनके व्यक्तित्व की इस विशेषता के कारण इनपर विश्वास किया जा सकता है. शिक्षा एवं बुद्धि की दृष्टि से देखा जाए तो इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति काफी बुद्धिमान होते हैं. इनकी रूचि साहित्य में रहती है. साहित्य के अलावा ये विज्ञान, खगोलशास्त्र एवं ज्योतिष में पारंगत होते हैं तथा इन विषयों के विद्वान होते हैं.

पूर्वा भाद्रपद – कैरियर | Purvabhadra Nakshatra Careers

अध्यात्म सहित भिन्न भिन्न विषयों की अच्छी जानकारी रखते हैं तथा ज्योतिषशास्त्र के भी अच्छे जानकार होते हैं. पूर्वा भाद्रपद का अंतिम चरण मीन राशि में आता है , गुरु का नक्षत्र व गुरु की राशि मीन में होने से ऐसा जातक आकर्षक व्यक्तित्व का धनी, गुणवान, धर्म, कर्म को मानने वाला, ईमानदार, परोपकारी, न्यायप्रिय होता है. गुरु यदि अपनी राशि धनु या मीन में हो तो ऐसे जातक सदाचारी होते हैं.

पूर्वाभाद्रपद के द्वितीय चरण में जन्म लेने वाले व्यक्ति विद्वान और धार्मिक कार्यकर्ता हो सकते हैं. वह अपने कार्यों में अचानक सफलता पाते हैं. इसी प्रकार पूर्वाभाद्रपद के तीसरे चरण में जन्म लेने वाला जातक बुद्धिमान और कवि हो सकता है. जातक का अधिकांश समय यात्रा या प्रवास के दौरान गुजरता है. पूर्वाभाद्रपद के चौथे चरण में जन्में व्यक्ति का स्वास्थ उत्तम होता यह लोग अधिकत्तर शिक्षा अध्यापन का कार्य करके अपनी आजीविका चलाते हैं.

आदर्शवादी होते हैं, ये ज्ञान को धन से अधिक महत्व देते हैं, आजीविका की दृष्टि से नौकरी एवं व्यवसाय दोनों ही इनके लिए अनुकूल होता है. इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति व्यवसाय की अपेक्षा नौकरी करना विशेष रूप से पसंद करते हैं. नौकरी में उच्च पद पर आसीन होते हैं यदि ये व्यवसाय करते हैं तो पूरी लगन और मेहनत से उसे आगे बढाते हैं. इन्हें साझेदारी में व्यापार करना अच्छा लगता है. इनमें जिम्मेवारियों का पूरा एहसास होता है. यह अपने कर्तव्य का निर्वाह ईमानदारी से करते हैं. नकारात्मक विचारों को अपने ऊपर हावी नहीं होने देते तथा आत्मबल एवं साहस से विषम परिस्थिति से बाहर निकल आते हैं.

Posted in Basic Astrology, Nakshatra, Vedic Astrology | Tagged , , , , | 1 Comment

ज्योतिष में दीप्तादी अवस्थाओं का क्या महत्व है?

वैदिक ज्योतिष में ग्रहों की कई प्रकार की अवस्थाओं का वर्णन मिलता है. यह अवस्थाएँ ग्रहों के अंश अथवा अन्य कई तरह के बलों पर आधारित होती हैं. बालादि अवस्था में ग्रहों को बल उनके अंशो के आधार पर मिलता है जबकि दीप्तादि  में राशि के आधार पर मिलता है. जैसे कि नाम से ही पता चलता है कि ये अवस्थाएँ ग्रह के प्रकाश को बताती हैं. जब ग्रह अपनी उच्च राशि, मूल त्रिकोण राशि और स्वराशि में होते हैं तो राशियों की स्थिति के अनुकूल फल देते हैं और इन्हें ही दीप्तादि अवस्था कहते हैं .

जिस प्रकार समाज में व्यक्ति एक-दूसरे के मित्र या शत्रु होते हैं उसी प्रकार ग्रह भी आपस में मित्रता, शत्रुता और समभाव रखते हैं उसी के अनुसार वह फल भी देते हैं. यह अवस्थाएँ ग्रहों की नैसर्गिक तथा तात्कालिक मित्रता को को मिलाकर पंचधा मैत्री से देखा जाता है.

दीप्त अवस्था | Dipta Avastha

जब भी कोई ग्रह कुण्डली में उच्च का हो या अपनी उच्च राशि में स्थित हो अथवा उच्च के अंश में स्थित हो तो वह उसकी दीप्त अवस्था होती है. इसमें वह अपने सम्पूर्ण फल देने में सक्षम होता है. इस अवस्था में ग्रह अपने पूर्ण प्रकाश युक्त होता है. दीप्त अवस्था में स्थित ग्रह की दशा आने पर वह ग्रह अपार सम्पदा प्रदान करता है.

दीप्त अवस्था प्रभाव | Effects of Dipta Avastha

इस अवस्था से साहस, वैभव, धन संपत्ति, भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति, दीर्घकालिक खुशी, राजकीय मान सम्मान, राजकृपा, प्राप्त होती है. व्यक्ति शक्तिशाली, गुणवान व पुरूषार्थी होता है. उसके कार्यों में शालीनता होती है.

स्वस्थ अवस्था | Svastha Avastha

जब भी ग्रह कुण्डली में अपनी मूलत्रिकोण राशि में या स्वराशि में होता है तब वह स्वस्थ अवस्था में होता है. इसमें वह अच्छे फल देता है. व्यक्ति समाजिक यश प्राप्त करता है और हर क्षेत्र में उसे सफलता मिलती है. वह शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है और यश, सम्पदा, सम्मान प्राप्त करता है.

स्वस्थ अवस्था प्रभाव | Effects of Svastha Avastha

इस अवस्था में ग्रह अपने ही घर में माना जाता है. इस अवस्था में ग्रह अपने सारे फल देने में सक्षम होता है. ग्रह जिस भाव में स्थित होता है और जिन भावों का स्वामी होता है उनसे संबंधित सभी अशुभ व शुभ फल प्रदान करता है. जातक को धन, वाहन, भवन, आभूषण सभी कुछ प्राप्त होता है. भौतिक सुख, विलास पूर्ण वस्तुएं, आभूषण, अच्छा स्वास्थ्य, आराम-परस्त जीवन, भूमि सुख, दांपत्य सुख, संतान, धार्मिक विचारों से परिपूर्ण, पद्दोन्नति आदि मिलती है.

मुदित अवस्था | Mudita Avastha

जन्म कुण्डली में कोई भी ग्रह यदि अपनी मित्र की राशि में स्थित होता है तब वह उस ग्रह की मुदित अवस्था होती है. जिस प्रकार व्यक्ति अपने अच्छे मित्रों के साथ खुश रहता है ठीक उसी प्रकार ग्रह भी अपनी मित्र राशि में मुदित अर्थात प्रसन्न रहते हैं. मुदित अवस्था के प्रभाव से व्यक्ति धन-सम्पत्ति व धार्मिक कार्यो में रुचि दर्शाता है. जातक किसी की सहायता से भी कार्य कर सकता है. इस अवस्था में स्थित ग्रह की दशा होने पर जातक जीवन में सफलता प्राप्त करता है तथा जीवन में नई ऊचाईयों को छूता है.

मुदित अवस्था प्रभाव | Effects of Mudita Avastha

कुण्डली में यदि ग्रह अपनी मुदित अवस्था में स्थित है तब व्यक्ति को आर्थिक लाभ और धन प्राप्ति होती है. व्यक्ति सभ्य व्यवहार करने वाला होता है और उसे मानसिक संतोष की प्राप्ति होती है. उसे आभूषण, वस्त्र, वाहन का सुख मिलता है. धार्मिक प्रवृति जागृत होती है और मित्र के व्यवहार द्वारा अच्छे गुणों की प्राप्ति होती है.

शान्त अवस्था | Santa Avastha

कोई ग्रह कुण्डली में शुभ ग्रह की राशि में हो और वर्गो (सप्तमांश् नवांश, दशमाशं इत्यादि ) में अपने शुभ वर्गों में होता है तो वह उसकी शान्त अवस्था होती है. जातक धैर्यवान व शान्त प्रकृति का होता है. वह शास्त्रों का ज्ञाता होता है और दानी होता है. व्यक्ति बहुत से मित्रों से परिपूर्ण हो सकता है. व्यक्ति सरकारी अधिकारी होकर किसी उच्च पद पर आसीन हो सकता है.

शांत अवस्था प्रभाव | Effects of Santa Avastha

यह अवस्था मानसिक संतोष की अनुभूति प्रदान करने वाली होती है. जातक मित्रता पूर्ण व्यवहार करने वाला होता है. एक अच्छे सलाहकार की भूमिका निभाने वाला होता है. लेखन कार्य में रुचि होती है. अधिक पाने की लालसा रहती है. मकान एवं जायदाद संबंधी सुख की प्राप्ति होती है. धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन करना एवं योग ध्यान में रुचि उत्पन्न होती है.

शक्त अवस्था | Shakt Avastha

कुण्ड्ली में जब कोई ग्रह उदित अवस्था अर्थात ग्रह के अस्त होने से पहले की अवस्था में होता है तब यह ग्रह की शक्त अवस्था होती है. इस अवस्था में ग्रह इतना शक्तिशाली नहीं होता और पूर्ण फल देने में समर्थ नही होता है परन्तु वह अपने कार्य में सक्षम, शत्रु का नाश करने वाला, शौकीन मिजाज़ होता है. इस अवस्था में स्थित ग्रह की दशा होने पर जातक जीवन में कठिनाईयो के साथ सफलता प्राप्त करता है.

शक्त अवस्था प्रभाव | Effects of Shakt Avastha

इस अवस्था के प्रभाव के परिणामस्वरुप व्यक्ति को मान सम्मान की प्राप्ति होती है, उसे जीवन में खुशी मिलती है. व्यक्ति को अपने कामों के लिए प्रसिद्धि मिलती है, उसके पुरुषार्थ में वृद्धि होती है, कार्यों को संपन्न करने की दक्षता होती है. व्यक्ति को अचानक से मिलने वाले परिणाम प्राप्त होते हैं. उतार- चढाव से भरी जिंदगी भी हो सकती है. लेकिन बहुत बुरे परिणाम नहीं मिलते हैं.

पीड़ित अवस्था | Peedit Avastha

कुण्डली में जब भी ग्रह सूर्य के समीप आते है तब वह अस्त हो जाते है. इस अवस्था में ग्रह अपना प्रभाव खो देते है. अस्त ग्रह की अवस्था उसकी पीडित अवस्था होती है. इस अवस्था में ग्रह अशुभ फल प्रदान करता है. जातक बुरे व्यसनों में लिप्त हो सकता है. यदि लग्नेश होकर ग्रह अस्त होगा तो जातक जीवन मे रोग ग्रस्त हो सकता है. जातक को अपने जीवन काल मे बदनामी मिल सकती है. पीडित ग्रह जातक को कार्य में असफलता देता है.

पीड़ित अवस्था प्रभाव | Effects of Peedit Avastha

व्यक्ति को जीवन में धन हानि हो सकती है. जीवन साथी एवं बच्चों से अनबन और कलह की स्थिति उत्पन्न हो साक्ती है व्यक्ति रोग एवं व्याधि से प्रभावित हो सकता है, विशेषकर नेत्र संबंधी रोग परेशानी दे सकते हैं. व्यक्ति की किसी कारण से बदनामी हो सकती है अथवा वह पाप पूर्ण या अनैतिक कामों में लिप्त हो सकता है. व्यक्ति को अपने द्वारा किए प्रयासों में विफलता मिलती है और वह बुरी लत से प्रभावित हो सकता है.

दीन अवस्था | Deen Avastha

जब भी ग्रह कुण्डली में अपनी नीच राशि में होता है वह उसकी दीन अवस्था होती है. यहाँ ग्रह अपनी सारी शक्ति खो चुका होता है. व्यक्ति को अपने जीवन काल में संघर्षो से गुजरना पडता है. जीवन में निर्धनता का सामना करना पडता है. व्यक्ति सरकारी अधिकारियों से दुखी, भयभीत, अपने लोगो से शत्रुता, कानून व सामाजिक नियमों की अवहेलना करने वाला होता है.

दीन अवस्था प्रभाव | Effects of Deen Avastha

ग्रह की इस अवस्था में व्यक्ति के बनते हुए काम बिगड़ जाते हैं. व्यक्ति कुछ ज्यादा ही व्यावहारिक हो जाता है. हर परिस्थिति से डरने वाला, शोक संताप से पीड़ित, शारीरिक क्षमता में गिरावट का अनुभव होता है. संबंधियों से विरोध का सामना करना पड़ सकता है और घर परिवर्तन की स्थिति उत्पन्न होने की नौबत तक आ सकती है. व्यक्ति बिमारियों से ग्रस्त होता है एवं लोगों द्वारा तिरस्कृति भी हो सकता है.

विकल अवस्था | Vikal Avastha

जब भी कुण्डली के किसी भी भाव या राशि में ग्रह पाप (अशुभ) ग्रहों के साथ होता है तब वह ग्रह की विकल अवस्था होती है. जिस तरह से एक साधारण व्यक्ति यदि किसी ताकतवर या पाप कर्म करने वाले व्यक्ति के साथ बैठ जाता है तब वह स्वयं को बेचैन महसूस करता है. इसी तरह ग्रह भी पाप ग्रहों के साथ बेचैनी महसूस करते हैं और यही अवस्था ग्रह की विकल अवस्था होती है. ग्रह अपने फलानुसार फल नही दे पाता और वह साथ बैठे ग्रहों के अनुरुप फल देता है. इसके फल स्वरुप जातक नीच प्रकृति वाला होता है. जातक शक्तिहीन होकर दूसरों का सेवक होता है और बुरी संगति का संग करने वाला होता है.

विकल अवस्था प्रभाव | Effects of Vikal Avastha

ग्रह की विकल अवस्था के परिणामस्वरुप व्यक्ति शक्तिहीन तथा बलहीन होता है. व्यक्ति की आत्म-सम्मान की हानि भी हो सकती है. मित्रों एवं सगे संबंधियों से अलगाव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है. आत्मिक दुख, मानसिक प्रताड़ना, जीवन साथी तथा बच्चों से हानि एवं कष्ट की स्थिति पैदा हो सकती है. व्यक्ति को चोरों द्वारा हानि भी हो सकती है. उसके स्तरहीन लोगों से संबंध बनते हैं.

खल अवस्था | Khal Avastha

जब भी कुण्डली के किसी भी भाव या राशि में दो ग्रह या दो से अधिक ग्रह आपस में 1 अंश के अन्तर में हों तो यह गृह युद्ध की स्थिति होती है. इसमे से अधिक अंशो वाला ग्रह युद्ध में परास्त होता है. परास्त ग्रह खल अवस्था में माना जाता है वह जातक को निर्धन बनाता है और जातक क्रोधी स्वभाव वाला होता है. जातक दूसरों के धन पर बुरी दृष्टि रखने वाला होता है.

खल अवस्था प्रभाव | Effects of Khal Avastha

ग्रह की इस अवस्था के प्रभाव से व्यक्ति के अंदर शत्रुता की भावना पनपती है. वह अपने ही लोगों द्वारा प्रताड़ित होता है. स्वभाव से झगडालू हो सकता है. अपने पिता से व्यक्ति की अलगाव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है. धन- संपत्ति एवं जायदाद की हानि हो सकती है. व्यक्ति गलत कार्यों द्वारा धन एकत्रित करना चाहेगा तथा अपना हित करने वाला व स्वार्थी प्रवृत्ति का हो सकता है.

दुखी अवस्था | Dukhi Avastha

जन्म कुण्डली में जब कोई ग्रह शत्रु ग्रह के क्षेत्र में हो अथवा शत्रु ग्रह की राशि में बैठा हो तो वह दुखी अवस्था में होता है. जिस तरह से यदि कभी किसी व्यक्ति को अपने शत्रु के घर में जाना पड़े तो वह वहाँ जाकर परेशानी का अनुभव करता है. इसी तरह से ग्रह भी शत्रु के घर में परेशान होता है. ग्रह की इस अवस्था के कारण व्यक्ति को अनेक कष्ट मिलते हैं. उसे परिस्थतियों के कारण कष्ट की अनुभूति होती है.

दुखी अवस्था प्रभाव | Effects of Dukhi Avastha

ग्रह की इस अवस्था के कारण व्यक्ति का स्थान परिवर्तन होता है. अपने प्रिय जनों से अलग रहने की स्थिति पैदा हो सकती है. आग लगने का भय तथा चोरी का होने का भय व्यक्ति को सताता है. व्यक्ति के साथ सदा असमंजस की स्थिति बनी रहती है.

Posted in Basic Astrology, Vedic Astrology | Tagged , , , , | Leave a comment

बालादि अवस्था क्या होती हैं, जानिये.

वैदिक ज्योतिष में ग्रहो की कई प्रकार की अवस्थाओं का वर्णन मिलता है. यह अवस्थाएँ ग्रहों के अंश अथवा अन्य कई तरह के बलों पर आधारित होती हैं. इन्हीं अवस्थाओं में से ग्रहों की एक अवस्था बालादि अवस्थाएँ होती हैं. जिनमें ग्रहों को उनके अंशों के आधार पर बल मिलता है.

बालादि अवस्था में सम राशि में स्थित ग्रह का बल तथा विषम राशि मे स्थित ग्रह का बल अलग होता है. इन बलों के अनुसार ही जातक अपने जीवन में ग्रहो के फलो को भोगता है. बालादि अवस्था में ग्रहो के बल उनके अंश तथा राशि पर आधारित होते है. राशि का महत्व इसलिए है क्योंकि सम राशि में स्थित ग्रह का फल विषम राशि में स्थित ग्रह से एकदम अलग हो सकता है.

जब भी दशा अनूकूल या प्रतिकूल होती है तो उन दशाओ में ग्रह अपनी अवस्था के अनुरुप फल प्रदान करता है. लेकिन हम सिर्फ इन अवस्थाओ से ही सारा फल कथन नही कर सकते यह तो मात्र अनुमान है. पूरे फल कथन में ग्रहों की यह अवस्थाएँ भी महत्व रखती हैं.

बालादि अवस्था को जानने के लिए राशि के 30 अंशो को 5 बराबर-बराबर भागो में बांटा जाता है. एक भाग 6 अंश का होता है. बालादि अवस्था का बल सम राशि तथा विषम राशि में अलग-अलग होता है.

विषम राशि में ग्रह की अवस्था | Awastha of a planet in an uneven sign

  • 0 से 6 अंश तक बाल अवस्था
  • 6 से 12 अंश तक कुमार अवस्था
  • 12 से 18 अंश तक युवा अवस्था
  • 18 से 24 अंश तक वृद्ध अवस्था
  • 24 से 30 अंश तक मृत अवस्था


सम राशि में ग्रह की अवस्था | Awastha of a planet in a neutral sign

  • 0 से 6 अंश तक मृत अवस्था
  • 6 से 12 अंश तक वृद्ध अवस्था
  • 12 से 18 अंश तक युवा अवस्था
  • 18 से 24 अंश तक कुमार अवस्था
  • 24 से 30 अंश तक बाल अवस्था


बाल अवस्था में ग्रह की स्थिति | Planet in Baal awastha

जन्म कुण्डली में कोई भी ग्रह यदि बाल अवस्था में स्थित है तब वह ग्रह छोटे बालक के समान निर्बल होता है. अपना फल देने में ग्रह पूर्ण रुप से सक्षम नही होता है. बाल अवस्था में स्थित ग्रह जिस भाव तथा जिस राशि मे बैठा होता है उसी के अनुसार कार्य करता है.

कुमार अवस्था में स्थित ग्रह | Planet in Kumaar awastha

जन्म कुण्डली में ग्रह यदि कुमार अवस्था में किसी भी भाव या किसी भी राशि में स्थित है तब यह स्थिति बाल अवस्था से कुछ बेहतर मानी जाती है. इस अवस्था में ग्रह के भीतर कुछ फल देने की क्षमता होती है. इस अवस्था में ग्रह अपना एक तिहाई फल प्रदान करता है.

युवा अवस्था में स्थित ग्रह | Planet in Yuva awastha

ग्रह की युवा अवस्था अत्यधिक शुभ तथा बली मानी गई है. इस अवस्था में ग्रह अपने सम्पू्र्ण फल प्रदान करता है. इसमें ग्रह एक युवा के समान बली होता है तथा दशा अनुकूल होने और कुण्डली विशेष के लिए वह ग्रह अनुकूल होने पर जातक को सारे सुख प्रदान करता है. उदाहरण के लिए कुण्डली में अगर दशमेश की दशा हो और ग्रह युवा अवस्था में स्थित हो तो जातक इस दशा मे उन्नति करता है.

वृ्द्ध अवस्था में स्थित ग्रह | Planet in Vriddh awastha

इस अवस्था में स्थित ग्रह एक वृद्ध के समान निर्बल होता है. ग्रह फल देने मे सक्षम नही होता और यदि उसी ग्रह की दशा भी चल रही हो तब वह व्यक्ति के लिए शुभफलदायी नहीं रहेगी. माना किसी व्यक्ति की कुण्डली में उच्च राशि में ग्रह स्थित है लेकिन वह वृद्धा अवस्था में है तो जातक उस ग्रह की दशा में अधिक उन्नति नहीं कर पाएगा.

मृत अवस्था में स्थित ग्रह | Planet in Mrit awastha

मृत अवस्था में स्थित ग्रह अपने पूरे फल नहीं दे पाता क्योंकि ग्रह मृत व्यक्ति के समान मूक होता है. ग्रह  अपनी दशा में अपने स्वरुप फल नही देता. वह जिस भाव में तथा जिस राशि में होता है उसी के अनुसार फल प्रदान करता है. यदि लग्नेश कुंडली मे बली होकर भी मृत अवस्था में स्थित हो तो वह जातक को शारीरिक सुख में कमी प्रदान कर सकता है.

Posted in Vedic Astrology | Tagged , , , , , , | 4 Comments