राशि के अनुसार नाम का चयन | Choosing a name based on astrological signs

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मनुष्य के जीवन पर बारह राशियों का महत्वपूर्ण प्रभाव होता है. इन्हीं बारह राशियों के आधार पर जन्म नाम का निर्धारण होता. जन्म कुण्डली में चन्द्रमा जिस राशि में स्थित होता है, वह राशि चन्द्र राशि होती है. इसे जन्म राशि के नाम से भी जाना जाता है और इसे “नाम राशि” की संज्ञा भी दी जाती है. ज्योतिष के अनुसार सत्ताईस नक्षत्र माने गए हैं इन नक्षत्रों के चार चरण होते हैं. इस प्रकार जन्म के समय जिस नक्षत्र का जो चरण होता है, उसी नक्षत्र चरण अक्षर से जो नाम राशि बनती है, वह जन्म राशि कहलाती है.

जन्म राशि के आधार पर शादी-ब्याह, सभी मंगल कार्यं, ग्रहों के शुभ-अशुभ प्रभाव और वास्तविक स्थिति पर विचार किया जाता है. हिन्दू धर्म संस्कारों में नामकरण इसी राशि नाम से जुड़ हुआ है. नाम के साथ मनुष्य का घनिष्ठ सम्बन्ध रहता है. नाम से संबंधित राशि का प्रभाव व्यक्ति पर अवश्य पड़ता है. सभी राशियों का अलग-अलग प्रभाव और स्वभाव होता है. इसी के अनुसार सभी ग्रह और नक्षत्र हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं. कौन-कौन से नाम अक्षर किस राशि के लिए उपयुक्त होते हैं वह इस प्रकार हैं –

राशि और नाम | Astrological signs and Names

मेष राशि | Aries Sign

मेष राशि भचक्र की पहली राशि होती है. यह अग्नि तत्व राशि है, इसका स्वामी मंगल अग्नि ग्रह है, मेष राशि के जातक ओजस्वी, साहसी तथा दृढ इच्छाशक्ति वाले होते हैं. मेष राशि वाले व्यक्तियों के नाम के अक्षर की शुरूआत चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, आ  अक्षर से होती है.

वृष राशि | Taurus Sign

वृषभ राशि दूसरी राशि है. यह पृथ्वी तत्व राशि है अत: इस राशि के जातकों में सहन शक्ति अच्छी होती है तथा यह लोग व्यवहारिक होते हैं. इस प्रकार के लोग सामाजिक होते हैं और अन्य लोगों को आदर की नजर से देखते है तथा सत्कार करने में हमेशा आगे रहते हैं. इनके नाम के अक्षर की शुरुआत ई, ऊ, ए, ओ, वा, वी, वू, वे, वो अक्षरों से होती है.

मिथुन राशि | Gemini Sign

मिथुन राशि तीसरी राशि है यह द्विस्वभव वाली राशि होती है. इस राशि के जातक में बहुमुखी प्रतिभा होती है. कार्य को जल्दी और चतुरायी से करने की क्षमता रखते हैं. संवेदनशीलता और चंचलता इनके व्यक्तित्व में समाहित है. इनके नाम के अक्षर की शुरुआत – का, की, कू, घ, ङ, छ, के, को, ह जैसे अक्षरों से होती है.

कर्क राशि | Cancer Sign

राशि चक्र की चौथी राशि है. कर्क रशि वालों में अपने विचारों के प्रती दृढ़ रहने की शक्ति होती है. इनमें अपार कल्पना शक्ति होती है, स्मरण शक्ति बहुत तीव्र होती है, इनके नाम के अक्षर की शुरुआत -ही, हू, हे, हो, डा, डी, डू, डे, डो अक्षरों से होती है.

सिंह राशि | Leo Sign

यह राशिचक्र की पांचवीं राशि है. इस राशि वाले लोग जुबान के पक्के होते हैं, शाही जीवन जीना पसंद होता है. मर्यादा मे रहना अच्छा लगता है और निड़र होते हैं. इस राशि के नाम के अक्षर की शुरुआत-  मा, मी, मू, मे, मो, टा, टी, टू, टे जैसे अक्षरों से होती है.

कन्या राशि | Virgo Sign

यह भचक्र की छठी राशि है. इस राशि के जातक दिमाग की अपेक्षा ह्रदय से काम लेना अधिक पसंद करते हैं. इस राशि के लोग संकोची और शर्मीले स्वभव के होते हैं. इस राशि के नाम के अक्षर की शुरूआत – ढो, पा, पी, पू, ष, ण, ठ, पे, पो अक्षरों से होते हैं.

तुला राशि | Libra Sign

यह भचक्र की सातवीं राशि है. तुला राशि के जातक आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी होते हैं. जीवन की कठिन परिस्थितियों को भी सहजता से लेते है. इस राशि का जातक सुलझा हुआ होता है तथा कूटनितिज्ञता से युक्त होता है. निर्णय लेने से पूर्व खूब सोच-विचार कर लेना उचित समझते है. इस राशि के नाम अक्षरों की शुरुआत रा, री, रू, रे, रो, ता, ती, तू, ते अक्षरों से होती है.

वृश्चिक राशि | Scorpio Sign

यह आठवीं राशि है. इस राशि के जातकों का स्वभाव रहस्यमयी होता है. इस राशि के व्यक्ति गहरी भावनाओं से युक्त होते है. इस राशि के व्यक्ति सोच विचार कर बोलने वाले होते हैं. इस राशि के नाम अक्षरों की शुरुआत –  तो, ना, नी, नू, ने, नो, या, यी, यू अक्षरों से होती है.

धनु राशि | Sagittarius Sign

यह राशिचक्र की नवीं राशि होती है. इस राशि के जातक में फुर्तीलापन देखा जा सकता है. ओज पूर्ण एवं आशावादी होते है. उत्तम वक्ता और सक्रिय रहते है. इस राशि के नाम अक्षरों की शुरुआत – ये, यो, भा, भी, भू, धा, फा, ढा, भे  अक्षरों से होती है.

मकर राशि | Capricorn Sign

यह राशिचक्र की दसवीं राशि है. इस राशि के जातक व्यवहारिक होते हैं. मजबूते इरादों वाले तथा आगे बढने की उच्च महत्वकांक्षा से पूर्ण होते हैं. इनमें जीवन शक्ति की अधिकता होती है. परिस्थितियों से समझौता करने में कुशल होते हैं.  इस राशि के नाम अक्षरों की शुरुआत – भो, जा, जी, खी, खू, खे, खो, गा, गी अक्षरों से होती है.

कुंभ राशि | Aquarius Sign

यह भचक्र की ग्यारहवीं राशि है.इस राशि के जातकों को स्वतन्त्र रुप से कार्य करना पसन्द होता है. इनमें अच्छे मित्र बनने का गुण विद्यमान होता है. इस राशि के नाम अक्षरों की शुरुआत – गू, गे, गो, सा, सी, सू, से, सो, दा  जैसे अक्षरों से होती है.

मीन राशि | Pisces Sign

यह भचक्र की बारहवीं राशि है. इस राशि के जातक धार्मिक, भगवान से डरने वाले होते है. इनके भितर  संयमी, रुढीवादी, अन्तर्मुखी एहसास देखा जा सकता है. इस राशि के नाम अक्षरों की शुरुआत – दी, दू, थ, झ, ञ, दे, दो, चा, ची अक्षरों से होती है.

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ग्रहों के योग क्या होते हैं और क्या उनका प्रभाव सचमुच है?

ज्योतिषशास्त्र में ग्रहों के योगों का बड़ा महत्व है। पराशर से लेकर जैमनी तक सभी ने ग्रह योग को ज्योतिष फलदेश का आधार माना है। योग के आंकलन के बिना सही फलादेश कर पाना संभव नहीं है।

योग क्या है और यह कैसे बनता है | What is Graha yoga

ग्रह योग की जब हम बात कर रहे हैं तो सबसे पहले यह जानना होगा कि ग्रह योग क्या है और यह बनता कैसे है। विज्ञान की भाषा में बात करें तो दो तत्वों के मेल से योग बनता है ठीक इसी प्रकार दो ग्रहों के मेल से योग का निर्माण होता है। ग्रह योग बनने के लिए कम से कम किन्हीं दो ग्रहों के बीच संयोग, सहयोग अथवा सम्बन्ध बनना आवश्यक होता है।

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार ग्रहों के बीच योग बनने के लिए कुछ विशेष स्थितियों का होना आवश्यक होता है जैसे: दो या दो से अधिक ग्रह मिलकर एक दूसरे से दृष्टि सम्बन्ध बनाते हों। भाव विशेष में कोई अन्य ग्रह आकर संयोग करते हों। कारक तत्व शुभ स्थिति में हों। कारक ग्रह का अकारक ग्रह से सम्बन्ध बन रहा हो। एक भाव दूसरे भाव से सम्बन्ध बना रहे हों। नीच ग्रहों से मेल हो अथवा शुभ ग्रहों से मेल हो। इन सभी स्थितियों के होने पर या कोई एक स्थिति होने पर योग का निर्माण होता है।

जन्म कुण्डली में योग का स्थान | Position of Planetary combination in birth chart

व्यक्ति जब जन्म लेता है उसी समय से ग्रहों का प्रभाव उस पर पड़ना शुरू हो जाता है। हर व्यक्ति के जीवन में अच्छे बुरे परिणाम आते रहते हैं यह सब ग्रहों का प्रभाव होता है। हर व्यक्ति की कुण्डली में ग्रहों के कुछ विशेष योग होते हैं। इन योगों से व्यक्ति के जीवन में कब कैसा उतार चढ़ाव आएगा इसकी जानकारी प्राप्त की जा सकती है। जन्म कुण्डली में योग का अध्ययन करते समय योग बनाने वाले ग्रहों की स्थिति का आंकलन बहुत ही सूक्ष्मता पूर्वक किया जाना होता है। योग के दौरान जो ग्रह प्रबल होता है उसका फल ही प्रमुख रूप से प्राप्त होता है।

योग में शक्तिशाली ग्रह का आंकलन | Powerful Planet in yoga

यह तय है कि जब ग्रहों के मध्य योग बनता है तो उनमें कोई एक ग्रह अधिक शक्तिशाली होता है। शक्तिशाली ग्रह का आंकलन करने के लिए एक सूत्र है जिसके अनुसार योग से सम्बन्धित ग्रह उच्चराशि में स्थित हों तो उसे पांच अंक दिया जाते हैं, अपनी राशि में हों तो चार, मित्र राशि में हों तो 3, मूल त्रिकोण में हों तो 2 और उच्च अभिलाषी हों तो 1। इसी प्रकार अंकों का विभाजन अशुभ ग्रह स्थिति होने पर दिया जाता है जैसे नीच ग्रह को 5, पाप ग्रह को 4, पाप ग्रह के घर में बैठा हुए ग्रह हो तो 3, पाप ग्रह से दृष्ट होने पर 2 और नीचाभिलाषी होने पर 1।

योग में शामिल ग्रहों में से जिस ग्रह को अधिक अंक मिलते हैं उसकी महादशा में दूसरे ग्रह की अन्तर्दशा में योगफल निकालकर शक्तिशाली ग्रह का पता किया जाता है। इस आंकलन में अगर शुभ ग्रह को अधिक अंक मिलते हैं तो परिणाम शुभ प्राप्त होता है और अशुभ ग्रह को अधिक अंक मिलने पर अशुभ फल प्राप्त होता है।

वर्तमान समय में ग्रह योग का फल कथन में महत्व | Importance of Planetary combination in Modern era

आज की तेज रफ्तार ज़िन्दगी में हम अवसर को गंवाना नही चाहते हैं। हम लोग ज्योतिषशास्त्री के पास जब अपना प्रश्न लेकर पहुंचते हैं तो हमारे पास कई सूक्ष्म सवाल भी साथ होते हैं जिनके उत्तर योग के आंकलन के बिना नहीं दिये जा सकते। एक ऐसा ही प्रश्न उदाहरण के तौर पर लेते हैं जैसे आपका सवाल है कि आपके लिए जीवन यापन का कौन सा क्षेत्र अच्छा होगा। इस प्रश्न के जवाब में ज्योतिषशास्त्री द्वितीय, पंचम, नवम, दशम तथा एकादश भाव के साथ द्वितीयेश, पंचमेश, नवमेश, दशमेश तथा एकादशेश को देखते हैं क्योंकि यह आजीविका से सम्बन्ध रखने वाले हैं इसके बाद आजीविका प्रधान ग्रह का आंकलन करते हैं।

आजीविका स्थान पर सूर्य है तो व्यक्ति सरकारी क्षेत्र में उच्चाधिकारी बनता है परंतु सूर्य का किसी अन्य ग्रह से योग होने पर स्थिति बदल जाती है। इसी प्रकार अन्य ग्रहों और उसके साथ बनने वाले योग की स्थिति में परिणाम मिलता है इसलिए योग आजीविका स्थान पर ग्रह योग का सूक्ष्मता से अध्ययन किये बिना सटीक जवाब मिलना कठिन होता है।

सटीक फलादेश से आप सही दिशा में प्रयास करते हैं तो आपको बिना अधिक परिश्रम के जल्दी ही उत्तम परिणाम मिलता है। इस प्रकार कहना होगा कि ज्योतिषशास्त्र में ग्रहों के योंगों का काफी महत्व है। इसके बिना ज्योतिष का फलादेश अपूर्ण है।

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दशमांश कुण्डली से कैसे जानें अपना भविष्य

दशमांश कुण्डली को D – 10 कुण्डली भी कहा जाता है. दशमांश कुण्डली का उपयोग व्यवसाय मे उन्नति , प्रतिष्ठा, सम्मान और आजीविका में बढोत्तरी, समाज में सफलता प्राप्त करने इत्यादि को देखने के लिए किया जाता है. दशमांश कुण्डली की विवेचना भी उतनी ही आवश्यक हो जाती है जैसे लग्न या नवांश कुण्डली की. इस कुण्डलि में दशम भाव दशमेश का सर्वाधिक महत्व है. इसके साथ ही साथ दश्मांश से माता पिता के सुख दुख एवं आयु का विचार होता है.

पहला दशमांश (इंद्र दश्मांश) | First Dashmansh (Indra)

पहला दशमांश 0 से 3 डिग्री का होता है यह इंद्र दशमांश कहलाता है. यह धन संपन्नता, मान सम्मान का सूचक होता है. जेसे इंद्र देव सभी देवों में अग्रीण स्थान प्राप्त करते हैं तथा वैभव एवं सम्मान से युक्त होते हैं. उसी प्रकार जब दशम भाव या दशमेश का संबंध इंद्र दशमांश से बनता है तो व्यक्ति भी उसी की भांति प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकता है.

दूसरा दशमांश (अग्नि दशमांश) | Second Dashmansh (Agni)

दूसरा दशमांश 3 से 6 डिग्री तक का होता है. दूसरे दशमांश को अग्नि दशमांश भी कहते हैं. यह दशमांश पराक्रम और साहस में वृद्धि करने वाला होता है यदि  दशम भाव या दशमेश अग्नि दशमांश में पडे़ तो व्यक्ति में अग्नि तत्व गुणों की अधिकता हो सकती है. ऎसा जातक अपनी शक्ति एवं बल द्वारा धनार्जन करने का प्रयास कर सकता है. व्यक्ति को उर्जावान क्षेत्रों में व्यवसाय की प्राप्ति हो सकती है.

तीसरा दशमांश (यम) | Third Dashmansh (Yam)

तीसरा दशमांश 6 से 9 डिग्री का होता है.तीसरे दशमांश को यम दशमांश भी कहा जाता है. इस यम दशमांश के कारण व्यक्ति में न्याय संगत गुण एवं कर्य कुशलता आती है. अगर दशम भाव या दशमेश इस यम दशमांश में आते हैं तो जातक में अपने कार्य को उचित प्रकार से करने के गुण एवं नेतृत्व की भावना भी आ सकती है. व्यक्ति में लोगों के प्रति सही निर्देश देने की क्षमता भी पनपती है.

चौथा दशमांश (राक्षस) | Fourth Dashmansh (Rakshas)

चौथा दशमांश 9 से 12 डिग्री का होता है. इस दशमांश को राक्षस दशमांश कहा जाता है. इससे प्रभावित व्यक्ति में अवैधानिक कार्यों को करने की चाह या नीति से हटकर काम करने की इच्छा देखी जा सकती है. यदि दशम भाव या दशमेंश इस राक्षस दशमांश से संबंध बनाता है तो व्यक्ति सही और गलत को भूल कर कार्य करने वाला हो सकता है. ऎसा जातक चोरी, तस्करी, रिश्वतखोर या ऎसे ही गलत कार्यों को करने वाला हो सकता है.

पांचवां दशमांश (वरुण) | Fifth Dashmansh (Varun)

पंचम दशमांश 12 से 15 डिग्री तक का होता है. इस दशमांश को वरुण भी कहा जाता है. इससे प्रभावित व्यक्ति जल से संबंधित कार्य करने वाला होता है. दशमांश का संबंध यदि दशम भाव से या दशमेश से हो तो व्यक्ति जल व्यापार कार्य जैसे नौकायान या पानी के जहाज में कार्य करने वाला हो सकता है. अर्थात पानी से जुडे़ जो भी व्यवसाय हैं वह उसके लिए लाभदायक सिद्ध हो सकते हैं.

छठा दशमांश (वायु) | Sixth Dashmansh (Vayu)

छठा दशमांश 15 से 18 डिग्री का होता है. इस दशमांश को वायु दशमांश कहा जाता है. इसका संबंध यदि दशमेश या दशम भाव से होतो व्यक्ति वायु संबंधी कार्यों से धनार्जन करता है. इस दशमांश के प्रभाव स्वरुप व्यक्ति दूरसंचार संबंधि कार्य या परिवहन सेवा, पायलट जैसे कार्यों से जुडा हो सकता है.

सातवां दशमांश (कुबेर) | Seventh Dashmansh (Kuber)

सातवां दशमांश 18 से 21 डिग्री का होता है. इस दशमांश को कुबेर दशमांश कहा जाता है. इस दशमांश का संबंध यदि दशम भाव या दशमेश से हो तो व्यक्ति धन संपदा से युक्त हो सकता है. इसके साथ ही साथ व्यक्ति का व्यवसाय धन के लेन देन से संबंधित कार्यों से अधिक हो सकता है जैसे कैशियर, बैंक कर्मचारी, फाइनेंस सलाहकार इत्यादि

आठवां दशमांश | Eighth Dashmansh (Ishaan)

आठवां दशमांश 21 से 24 डिग्री तक का होता है. अष्टम दशमांश को ईशान के नाम से भी जाना जाता है. दशम भाव या दशमेश का योग या युति अष्टम दशमांश से हो तो जातक उदार एवं धीर गंभीर स्वभाव वाला हो सकता है. इससे प्रभावित होने पर व्यक्ति को समाज में प्रतिष्ठा एवं सम्मान की प्राप्ति हो सकती है. ऎसा व्यक्ति अपने कार्य को अच्छी प्रकार से करके दूसरों से प्रशंसा प्राप्त करता है. इसका संबंध बनने पर व्यक्ति राजा सरीखे पद की प्राप्ति भी कर सकता है तथा वह समाज सुधारक या प्रबंधक जैसे कामों को अपना सकता है.

नवां दशमांश (पदमज) | Ninth Dashmansh (Padmaj)

नवां दशमांश (24 से 27 डिग्री का होता है. नवम दशमांश को पद्मज कहते हैं. यदि दशमांश का संबंध पदमज से बने तो व्यक्ति अनेक प्रकार के सुख प्राप्त करने वाला हो सकता है. इससे प्रभावित होने पर व्यक्ति रचनात्मक कार्यों को करने में रुचि रखने वाला हो सकता है. जातक में विद्वता के गुण आ सकते हैं. व्यक्ति समाज के हित एवं जन कल्याण संबंधि कार्यों को करने में इच्छा रख सकता है.

दसवां दशमांश (अनन्त) | Tenth Dashmansh (Anant)

दसवां दशमांश 27 से 30 डिग्री का होता है. दशम दशमांश को अनन्त नाम से भी जाना जाता है. यदि दशम भाव या दशमेश इस दशमांश से कोई योग बनाते हैं तो व्यक्ति के भीतर अथक परिश्रम एवं अनवरत प्रयास करने की इच्छा देखी जा सकती है. इससे प्रभावित होने पर जातक में लगातार कार्य करने की चाह उत्पन्न रहती है और उसका यह कार्य उसे समाज में प्रतिष्ठा भी प्रदान करा सकता है.

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ज्योतिष में सप्तांश कुण्डली आपके जीवन पर क्या प्रभाव करती है ये जानना बहुत जरूरी है

जन्म कुण्डली के पंचम भाव से संतान के बारे में पूर्ण रुप से विवेचन किया जाता है. इसी पंचम भाव के सूक्ष्म अध्ययन के लिए वैदिक ज्योतिष में सप्तांश कुण्डली का आंकलन किया जाता है. जन्म कुण्डली का पंचम भाव 30 अंश का होता है. इस 30 अंश को सात बराबर भागों में बाँटकर सप्ताँश कुण्डली बनाई जाती है.

सप्तांश कुण्डली से संतान पक्ष के बारे में विचार किया जाता है. इस कुण्डली से संतान का अच्छा बुरा सभी कुछ प्रत्यक्ष रुप से दिखाई देता है. इस कुण्डली के सभी सात भागों का फलित भिन्न-भिन्न होता है.

पहला सप्तांश (क्षार) ) 0 डिग्री से 4 डिग्री 17 मिनट 8 सैकंड तक | First Saptansh (Kshar) From 0 degree to 4 degrees 17 minutes and 8 seconds

प्रथम सप्तांश 0 से लेकर 4 डिग्री 17 मिनट 8 सैकंड तक होता है. पहले सप्तांश को क्षार भी कहा जाता है. यदि पंचम भाव या पंचमेश क्षार सप्तांश में हो तो इस सप्तांश को मिलेजुले परिणाम देने वाला माना गया है. पंचम भाव क्षार होने पर संतान माता पिता के लिए कष्ट प्रदान करने वाली हो सकती है .ऎसा होने पर  माता पिता को संतान पक्ष की ओर से अपमान या अपयश भी प्राप्त हो सकता है.

दूसरा सप्तांश (क्षीर) 4 डिग्री अंश 17 मिनट 8 सैकंड से 8 डिग्री 34 मिनट 17 सैकंड तक | Second Saptansh (Kshir) From 4 degrees 17 minutes and 8 seconds to 8 degrees 34 minutes and 17 seconds

दूसरा सप्तांश 4 अंश 17 मिनट 8 सैकंड से 8 डिग्री 34 मिनट 17 सैकंड तक होता है. दूसरे सप्तांश को क्षीर नाम से जाना जाता है. यदि पंचम भाव या पंचमेश क्षीर सप्तांश में हो तो संतान माता पिता की सेवा करने वाली हो सकती है. बच्चे माता पिता की वृद्धावस्था में सहायता करने वाले होते हैं. बुढापे में जब माता पिता को संतान की सेवा की अत्यधिक आवश्यकता होती है तब यदि संतान पूर्ण निष्ठा भाव से सेवा करती है तो यह माता पिता के लिए बहुत ही सुखदायक स्थिति होती है.

तीसरा सप्तांश (दधि) 8 डिग्री 34 मिनट 17 सैकंड से 12 डिग्री 51 मिनट 25 सैकंड | Third Saptansh (Dadhi) From 8 degrees 34 minutes and 17 seconds to 12 degrees 51 minutes and 25 seconds

तीसरा सप्तांश (दधि) 8 डिग्री 34 मिनट 17 सैकंड से 12 डिग्री 51 मिनट 25 सैकंड तक का होता है. तीसरा सप्तांश दधि कलहाता है. पंचम भाव या पंचमेश दधि में पडे़ तो संतान सुंदर और रुपवान होती है. अच्छे गुणों से युक्त हो कर्त्तव्य परायण एवं कोमल गुण वाली हो सकती है. संतान द्वारा अभिभावक को सुख और सम्मान की प्राप्ति होती है. व्यक्ति संतान के सुख को भोगता है.

चौथा सप्तांश (आज्य) 12 डिग्री 51 मिनट 25 सैकंड से 17 डिग्री 8 मिनट 34 सैकंड | Fourth Saptansh (Aajya) From 12 degrees 51 minutes and 25 seconds to 17 degrees 8 minutes and 34 seconds

चौथा सप्तांश (आज्य) 12 डिग्री 51 मिनट 25 सैकंड से 17 डिग्री 8 मिनट 34 सैकंड तक का होता है. चतुर्थ सप्तांश को आज्य कहा जाता है. यदि पंचम भाव या पंचमेश आज्य भाव में होने से संतान श्रेष्ठ गुणों से युक्त हो सकती है तथा माता पिता को भरपूर सूख देने वाली कही गई है. ऎसी संतान से माता पिता को समाज में प्रतिष्ठा और सम्मान की प्राप्ति कराने में सक्षम हो सकती है.

पांचवां सप्तांश (इक्षुरस) 17 डिग्री 8 मिनट 34 सैकंड से 21 डिग्री 25 मिनट 42 सैकंड | Fifth Saptansh (Ikshuras) From 17 degrees 8 minutes and 34 seconds to 21 degrees 25 minutes and 42 seconds

पांचवां सप्तांश (इक्षुरस) 17 डिग्री 8 मिनट 34 सैकंड से 21 डिग्री 25 मिनट 42 सैकंड तक का होता है. पंचम सप्तांश को इक्षुरस भी कहते हैं. पंचम भाव या पंचमेश यदि इक्षुरस में हो तो संतान बौद्धिक क्षमता वाली एवं शिक्षा में तेज होती है. संतान पक्ष की ओर से माता पिता को कोई कष्ट प्राप्त नहीं होता. ऎसी संतान कुटुम्ब को साथ लेकर चलने वाली हो सकती है तथा परिवार में संतुलन एवं शांति बनाए रखने का प्रयास करती है.

छठा सप्तांश (मद्य)  21 डिग्री 25 मिनट 42 सैकंड से 25 डिग्री 42 मिनट 51 सैकंड | Sixth Saptansh (Madya) From 21 degrees 25 minutes and 42 seconds to 25 degrees 42 minutes and 51 seconds

छठा सप्तांश (मद्य)  21 डिग्री 25 मिनट 42 सैकंड से 25 डिग्री 42 मिनट 51 सैकंड तक का होता है. छठा सप्तांश 21 डिग्री 25 मिनट 42 सैकंड से 25 डिग्री 42 मिनट 51 सैकंड तक का होता है. यह सप्तांश मद्य के नाम से भी जाना जाता है. पंचम भाव या पंचमेश का संबंध जब मद्य सप्तांश से होता है तब माता पिता को संतान की ओर से कष्ट प्राप्त हो सकते हैं. षष्ठेश से संबंध बनने पर संतान में नशीले पदार्थों का सेवन करने की प्रवृत्ति हो सकती है. बच्चे की यह बुरी आदत माता पिता के लिए कष्टकारक होती है.

सातवां सप्तांश (शुद्ध जल) 25 डिग्री 42 मिनट 51 सैकंड से 30 डिग्री तक | Seventh Saptansh (Shuddh Jal) From 25 degrees 42 minutes and 51 seconds to 30 degrees

सातवां सप्तांश 25 डिग्री 42 मिनट 51 सैकंड से 30 डिग्री तक होता है. यह सप्तांश शुद्ध जल कहलाता है. यदि पंचम भाव या पंचमेश सातवें सप्तांश में आता है तो संतान शुभ फलों को प्रदान करने वाली हो सकती है. संतान की ओर से माता पिता का हृदय सदा प्रसन्नचित रहता है. ऎसी संतान माता पिता के सभी आदेशों का पालन करने वाली और उनकी सेवा करने वाली होती है.

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द्वादशांश कुंडली को कैसे देखें? यहां जानिये

द्वादशांश को D-12 कुण्डली भी कहा जाता है. द्वादशांश कुण्डली द्वारा माता-पिता के विषय में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है. इस कुण्डली का अध्ययन करने से माता पिता के जीवन के उतार चढावों के बारे में जानकारी मिलती है. इसके साथ ही साथ इससे हमें आयु के बारे में भी जानकारी प्राप्त होती है. द्वादशांश कुण्डली बनाने के लिए 30 अंश के 12 बराबर भाग किए जाते हैं. इसका प्रत्येक भाग 2 अंश 30 मिनट का होता है. इस प्रत्येक भाग द्वारा फल कथन करना आसान होता है और व्यक्ति के चरित्र एवं उसके अनेक पहलुओं पर विचार किया जाता है.

गणेश द्वादशांश | Ganesha Dwadshansha

0से 2डिग्री 30 मिनट का पहला द्वादशांश होता है , 10 डिग्री से 12 डिग्री 30 मिनट तक का पांचवां द्वादशांश और 20 डिग्री से 22 डिग्री 30 मिनट तक नौवां द्वादशांश होता है. पहला, पांचवां और नौंवा द्वादशांश गणेश द्वादशांश कहलाता है. जिस प्रकार भगवान गणेश को विघ्नविनाशक माना जाता है, उसी प्रकार यह द्वादशांश भी जीवन में आने वाले अनेक कष्टों एवं परेशानियों को दूर करने में सहायक बनता है.

लग्न या लग्नेश 1,5 और 9 द्वादशांश से संबंध बनाता है तो व्यक्ति को माता पिता का पूर्ण सुख प्राप्त होता है. जातक के जीवन में माता पिता का पूरा सहयोग रहता है. जातक के माता पिता समाज में प्रतिष्ठित और सम्मानिय स्थान प्राप्त करने वाले हो सकते हैं. ऎसा जातक भी जीवन के हर क्षेत्र में सफलता और सम्मान को पाने में सक्षमता दिखाता है. वह साहस से पूर्ण जीवन के प्रति आशावादी दृष्टिकोण रखने वाला होता है. क्योंकि यह गुण वह अपने माता पिता द्वारा ही तो ग्रहण करता है.

अश्विनी द्वादशांश | Ashwini Dwadshansha

2 डिग्री से 30 मिनट से 5 डिग्री दूसरा द्वादशांश, 12 डिग्री 30 मिनट से 15 डिग्री तक छठा द्वादशांश और 22 डिग्री 30 मिनट से 25 डिग्री तक दसवां द्वादशांश होता है. दूसरा, छठा और दसवां द्वादशांश अश्विनी कुमार द्वादशांश कहलाता है. यह द्वादशांश अश्विनी कुमारों का प्रतिनिधित्व करता है. जिस प्रकार अश्विनी कुमारों को देवों के वैद्य का पद प्राप्त हो उसी प्रकार यह द्वादशांश भी इसी गुण को प्रकट करने वाला होता है.

यदि लग्न या लग्नेश का संबंध अश्विनी द्वादशांश से बने तो जातक के भीतर इससे संबंधी गुणों को देखा जा सकता है. 2,6 और 10 द्वादशांश से प्रभावित होने पर माता पिता में चिकित्सक के गुण देखे जा सकते हैं. या वह एक अच्छे विद्वान और सलाहकार हो सकते हैं. इससे प्रभावित व्यक्ति चिकित्सक के गुणों को अपनाने वाला हो सकता है. उसके अंदर एक अच्छे वैध के गुण परिलक्षित हो सकते हैं. वह अपनी इस योग्यता द्वारा लोगों का हित करने में सहायक हो सकता है. इसके साथ साथ ही वह पशुओं की देख रेख करने वाला या पशु चिकित्सक भी हो सकता है. व्यक्ति में कार्य को करने की अच्छी क्षमता का विकास भी देखा जा सकता है. वह इंजिनियर या तकनीकी संबंधी कार्य से भी जुड़ सकता है.

यम द्वादशांश | Yama Dwadshansha

5 डिग्री से 7 डिग्री 30 मिनट तीसरा द्वादशांश, 15 डिग्री से 17 डिग्री 30 मिनट सातवां द्वादशांश और 25 डिग्री से 27 डिग्री 30 मिनट ग्यारहवां द्वादशांश होता है. अर्थात 3, 7 और 11 वां द्वादशांश यम द्वादशांश कहलाता है. यम मृत्यु के देवता हैं यह मनुष्य को उसके कर्मों के अनुरुप फल प्रदान करते हैं. यह जीव के सभी अच्छे बुरे स्वरूप को उसके समक्ष रख कर उसके अनुरुप उसे सही मार्ग दिखाने वाले होते हैं. जीवन में भी यम और नियम की भूमिका को बहुत महत्व दिया गया है इन्हीं यम और नियम से जुड़कर जीवन अपने सही मार्ग को पाने में सफल होता है.

यदि लग्न या लगनेश का संबंध यम द्वादशांश से बनता है तो माता पिता अनुशासन प्रिय हो सकते हैं. इससे प्रभावित होने पर अभिभावक बच्चों को अच्छे और बुरे का ज्ञान देने में सक्ष्म होते हैं. इससे प्रभावित जातक समाज में रहते हुए नीति परक नियमों का पालन करने वाला हो सकता है. इसी के साथ ही वह दूसरों को भी ऎसा करने की शिक्षा देने वाला हो सकता है तथा कुछ् कठोर होकर दूसरों को सही और गलत बताने का जिम्मा भी उठा सकता है.

सर्प द्वादशांश | Sarpa Dwadshansha

7 डिग्री 30 मिनट से 10 डिग्री तक का चौथा द्वादशांश, 17 डिग्री 30 मिनट से 20 डिग्री तक का आठवां द्वादशांश और 27 डिग्री 30 मिनट से 30 डिग्री तक बारहवां द्वादशांश होता है. चौथा, आठवां और बारहवां द्वादशांश सर्प द्वादशांश कहा जाता है. यह द्वादशांश सर्प के प्रभावों से प्रभावित होता दिखता है जैसे सांप तेज चलने वाला और विषधारी होता है तथा सर्प की पकड़ भी मजबूत होती है. उसी के गुणों से प्रभावित यह द्वादशांश माता पिता या जातक के जीवन को प्रभावित करने वाला होता है.

यदि लग्न या लगनेश इस सर्प द्वादशांश से प्रभावित हो माता पिता के स्वभाव में उग्र एवं तेजस्विता का भाव देखा जा सकता है. इससे संबंध बनने पर व्यक्ति के भीतर प्रतिशोधी और आक्रमणकारी स्वभाव देखा जा सकता है. उसकी भाषा में कटुता का समावेश हो सकता है. जातक कठिनाइयों से लड़ते हुए अपनी राह बना ही लेता है. उसके व्यवहार में सर्प की भांति वक्र गति रहती है. धीरे – धीरे ही सही वह अपना निर्धारित लक्ष्य प्राप्त करने में सफल हो सकता है.

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क्या है नवांश कुण्डली का महत्व और प्रभाव

वैदिक ज्योतिष में नवमांश कुण्डली को कुण्डली का पूरक माना गया है. यह एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण कुण्डली मानी जाती है क्योंकि इसे लग्न कुण्डली के बाद सबसे महत्वपूर्ण माना गया है. जहां लग्न कुण्डली देह को दर्शाती है वहीं नवमांश कुण्डली आत्मा को अभिव्यक्त करती है. पराशर संहिता अनुसार व्यक्ति की जन्म कुन्डली का संबंध नवांश कुण्डली के साथ उचित प्रकार से बन जाता है तो वर्गोत्तम नवमांश बनता है और ऎसा होने पर व्यक्ति को अच्छे फलों की प्राप्ति होती है.

नवांश कुण्डली में यदि ग्रह अच्छी स्थिति या उच्च के हों तो वर्गोत्तम की स्थित उत्पन्न होती है और व्यक्ति शारीरिक व आत्मिक रुप से स्वस्थ हो शुभ दायक स्थिति को पाता है. यदि कोई ग्रह जन्म कुण्डली में नीच का हो, परंतु नवांश कुण्डली में वह उच्च का हो तो वह अच्छे फल प्रदान करने वाला होता है और यही तथ्य नवांश कुण्डली की महत्ता को दर्शाते हैं.

नवांश कुण्डली को नौ भागों में बांटा जाता है. जिसके आधार पर जन्म कुण्डली का विवेचन होता है.

देव नवांश | Dev Navansh

0 डिग्री से 3 डिग्री 20 मिनट, 10डिग्री से 13 डिग्री 20 मिनट और 20डिग्री से 23 डिग्री 20 मिनट तक को देव नवांश कहा जाता है. अर्थात 1,4 और 7 नवांश को देव नवांश के नाम से जानते हैं. कुछ ज्योतिष शास्त्रियों के कथन अनुसार देव नवांश सात्विक गुणों से युक्त माना गया है. यदि सप्तम नवांश या सप्तमेश देव नवांश से संबंध बनाता है तो व्यक्ति को जीवन साथी का सुख प्राप्त हो सकता है. इस नवांश का संबंध होने पर व्यक्ति में उदारता और त्याग करने की प्रवृत्ति होती है. ऎसा व्यक्ति धर्म को मानने वाला और न्याय और धर्म नीति से कार्य करने वाला होता सकता है.

नर नवांश | Nar Navansh

3 डिग्री 20 मिनट से 6 डिग्री 40 मिनट, 13 डिग्री 20 मिनट से 16 डिग्री 40 मिनट और 23 डिग्री 20 मिनट से 26 डिग्री 40 मिनट तक को नर नवांश कहा जाता है. अर्थात दूसरा, पांचवां और आठवां नवांश नर नवांश कहलाता है. ज्योतिष विद्वानों के अनुसार नर नवांश को रजो गुण वाला कहा गया है. यदि सप्तम भाव या सप्तमेश नर नवमांश में पडे़ तो जातक महत्कांक्षी और उर्जा से भरा होता है. व्यक्ति में आगे बढ़ने की दृढ़ इच्छा शक्ति देखी जा सकती है. नर नवांश होने पर व्यक्ति में सहनशीलत का गुण भी देखा जा सकता है. इस नवांश से संबंध होने पर व्यक्ति में आगे बढ़ने की चाह रहती है और वह समाज के लिए अहम भूमिका भी निभा सकता है.

राक्षस नवांश | Rakshas Navansh

6 डिग्री 40 मिनट से 10 डिग्री, 16 डिग्री 40 मिनट से 20 डिग्री और 26 डिग्री 40 मिनट से 30 डिग्री तक का नवमांश राक्षस नवमांश कहलाता है. अर्थात तीसरा, छठा और नवां नवांश राक्षस नवांश होता है. इस नवांश को तमोगुण वाला कहा गया है. लोभ, इच्छा, स्वार्थ सिद्धि इसके मुख्य गुण कहे गए हैं. यदि सप्तम या सप्तमेश का संबंध राक्षस नवांश से बनता है तो व्यक्ति में लालच और सभी सुख सुविधाओं को किसी भी प्रकार से पाने की इच्छा बनी रह सकती है. जातक में दूसरों पर अधिकार जताने की प्रवृत्ति देखी जा सकती है. उसे केवल अपने सुख से मतलब हो सकता है दूसरों कि इच्छा की परवाह करना उसके सामर्थ्य में नहीं होता है.

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ज्योतिष के द्वारा अपनी शिक्षा का विश्लेषण कैसे करें? गाइड

वैदिक ज्योतिष द्वारा हम कुण्डली में स्थित शिक्षा के योग के बारे में भी जान सकते हैं. जातक की शिक्षा कैसी होगी और वह शैक्षिक योग्यता में किन उचाइयों को छूने में सक्षम हो सकेगा. आज के समय में सभी अपनी शिक्षा में उच्च शिखर पाने की चाहत रखते हैं. माता पिता भी संतान की शिक्षा को लेकर चिन्तित देखे जा सकते हैं. वर्तमान समय में विद्या के क्षेत्र में बहुत बदलाव आया है.

ज्योतिष के आधार पर बच्चे की शिक्षा के क्षेत्र में सहायता की जा सकती है. कुण्डली के द्वारा शिक्षा का आंकलन करने के लिए शिक्षा से जुडे़ भावों का आंकलन करके जातक की शिक्षा के बारे में बताया जा सकता है. कुण्डली के दूसरे, चौथे और पांचवें भाव से शिक्षा के बारे में जाना जाता है ग्रहों की इन भावों में अच्छी स्थिति उच्च शिक्षा में सहायक बनती है. शिक्षा के लिए नवाँश कुण्डली तथा चतुर्विंशांश कुण्डली का उपयोग अवश्य करना चाहिए. जन्म कुण्डली के पंचमेश की स्थिति इन वर्ग कुण्डलियों में देखनी चाहिए.

शिक्षा में बुध एवं गुरू ग्रह का महत्व | Importance of Mercury and Jupiter in education

ज्योतिष में बुध ग्रह को बुद्धि का कारक ग्रह माना गया है तथा बृहस्पति ग्रह को ज्ञान का कारक ग्रह माना गया है. इसलिए बच्चे की कुण्डली में बुध तथा गुरु दोनों की अच्छी होना अत्यंत आवश्यक होता है. यदि यह ग्रह अच्छी स्थिति में होंगे तो जातक को शिक्षा में अच्छा स्थान प्रदान करेंगे. यदि इन ग्रहों का संबंध केन्द्र या त्रिकोण भाव से है तो भी शिक्षा के स्तर में इजाफा होता है.

शिक्षा की स्थिति जानने के लिए दूसरे भाव का विवेचन करना आवश्यक होता है. बच्चे की एकदम से आरंभिक शिक्षा का स्तर तथा संस्कार दूसरे भाव से देखे जाते हैं. दूसरे भाव से परिवार से मिली शिक्षा अथवा संस्कारों का पता चलता है. बच्चे की प्रारम्भिक शिक्षा के बारे में इस भाव की मुख्य भूमिका मानी गई है. क्योंकि बचपन में मिली सही शिक्षा ही आगे चलकर उसकी नींव बनती है.

चौथा भाव कुण्डली का सुख स्थान कहा जाता है. आरम्भिक शिक्षा के बाद स्कूल की पढा़ई का स्तर इस भाव से देखा जाता है. इस भाव के आधार पर बच्चे की आगे की शिक्षा का स्तर बताया जा सकता है. अक्षर के ज्ञान से लेकर स्कूल तक की शिक्षा का आंकलन इस भाव से किया जाता है.

पंचम भाव को शिक्षा में सबसे महत्वपूर्ण भाव माना गया है. इस भाव का कारक ग्रह भी गुरु हैं अत: इस भाव से मिलने वाली शिक्षा आजीविका में सहयोगी होती है. इस भाव की शिक्षा नौकरी या व्यवसाय करने के लिए उपयोगी मानी जाती है. आजीविका के विषय में सही विषयों के चुनाव में यह भाव महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

भावों के स्वामी और शिक्षा से जुडे़ ग्रहों की वर्ग कुण्डलियों में स्थिति कैसी है इसका अध्ययन करना भी बहुत आवश्यक होता है. कई बार जन्म कुण्डली में सारी स्थिति बहुत अच्छी होती है, लेकिन फिर भी शिक्षा का स्तर बहुत अच्छा नहीं होता है. क्योंकि वर्ग कुण्डलियों में संबंधित भाव तथा ग्रह कमजोर अवस्था में स्थित होते हैं. इस लिए वर्ग कुण्डली पूर्ण फलित को बताने के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होती है.

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ज्योतिष द्वारा ग्रह कलह से मुक्ति कैसे पायें (आसान उपाय)

गृहस्थ जीवन में सुख की चाह हर व्यक्ति के मन में समाई हुई होती है. जीवन का सच्चा सुख व्यक्ति को हर राह पर आगे ही लेकर जाता है परंतु परिवार में व्याप्त कलह – कलेश व्यक्ति के जीवन को कठीनाईयों एवं परेशानियों से भर देते हैं. इसी गृह कलेश से बचने के लिए ज्योतिष में कई प्रकार के उपाय दिए गए हैं जिनका उपयोग करने से जीवन को सुखमय एवं खुशहाल बनाया जा सकता है.

परिवार में उत्पन्न गृह कलह किसी भी कारण से हो सकती है पिता पुत्र के संबंधों में तनाव होना, पति पत्नी के संबंधों में अनबन इत्यादि अनेक समस्याएं रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करती हैं. अत: इनसे बचने हेतु आप कुछ उपाय करके जीवन को सुखी बना सकते हैं.

पति पत्नी में कलेश दूर करने के लिए और वैवाहिक जीवन सुखी बनाने के लिए आपको चाहिए कि आप श्री गणेश जी और शक्ति की उपासना करे.

सोते समय पूर्व की और सिर रखकर सोने से तनाव में कमी आती है. ऎसा करने से आपमें सकारात्मक उर्जा का संचार होता है.

चींटियों को शक्कर डालने से समस्याओं का निवारण होता है. भोजपत्र पर लाल कलम से पति का नाम लिखकर तथा “हं हनुमंते नमः” का 21 बार उच्चारण करते हुए उस पत्र को घर के किसी कोने में रख दें ऎसा करने से धीरे धीरे दांपत्य जीवन में उत्पन्न कलहपूर्ण वातावरण दूर हो जाएगा.

हनुमान मंदिर में भगवान को चोला चढाएं एवं सिंदूर चढाएं ऎसा करने से परेशानियों से राहत प्राप्त होगी. ऎसा प्रत्येक मंगलवार एवं शनिवार के दिन करें.

गेंदे का फूल पर कुंकुम लगाकर उसे किसी देव स्थान में मूर्ति के समक्ष रखने से रिश्तों में आया तनाव एवं मतभेद दूर होते हैं.

छोटी कन्या को मीठी वस्तु खिलाने एवं भेंट इत्यादि देने से आपके संकटों का निवारण होता है.

यदि पति-पत्नी के मध्य तनाव अधिक बढ़ जाए तो तीन गोमती चक्र लेकर घर के दक्षिण में हलूं बलजाद कहकर फेंक देंने से तनाव दूर होगा. पांच गोमती चक्र को लाल सिंदूर की डिब्बी में घर में रखने से दाम्पत्य जीवन में सुख-शांती रहती है.

इसके अतिरिक्त प्रात: काल दैनिक कार्यों से निवृत होकर साफ-स्वच्छ वस्त्र पहनकर मंदिर या घर पर शिवलिंग के सम्मुख पूजा करें एवं निम्न मंत्र “ऊँ नम: सम्भवाय च मयो भवाय च नम:। शंकराय च नम: शिवाय च शिवतराय च।।:” का जाप करना चाहिए तत्पश्चात  शिवलिंग पर जलाभिषेक करें ऎसा करने से आपको वैवाहिक जीवन में सुख एवं शाति प्राप्त होगी.

घर मे उत्पन्न कलह क्लेश को समाप्त करने हेतु तथा पति-पत्नी के बीच वैमनस्यता को दूर करने के लिए चाहिए कि रात को सोते समय पत्नी पति के तकिये में सिंदूर की एक पुड़िया और पति पत्नी के तकिये में कपूर रखे. प्रातः काल उठकर सिंदूर की पुड़िया घर से बाहर फेंक दें तथा कपूर को निकाल कर उस कमरे जला दें. ऎसा करने से भी लाभ मिलता है.

ससुराल में सुखी रहने के लिए कन्या अपने हाथ से हल्दी की साबुत गांठें, पीतल का एक टुकड़ा और थोड़ा-सा गुड़ ससुराल की ओर फेंक दें ऎसा करने से ससुराल में सुख एवं शांति का वास रहता है.

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ज्योतिष और स्वास्थ्य | Astrology and Health

चिकित्सा ज्योतिष के विषय में ज्योतिष शास्त्र में बहुत कुछ लिखा गया है. कुछ नियम पुराणों में भी दिए गए हैं. विष्णु वेद-पुराण के अनुसार भोजन करते समय जो नियम दिए गए हैं वह हमें बताते हैं कि भोजन करते समय व्यक्ति को अपना मुख पूर्व दिशा या उतर दिशा में रखना चाहिए और ऎसा इसलिए क्योंकि उससे पाचन क्रिया अनुकूल बनी रहती है.

ज्योतिष के अनुसार सभी ग्रह शरीर के किसी न किसी अंग का प्रतिनिधित्व करते हैं. इन्हीं ग्रहों के प्रभाव स्वरुप हमें फल प्राप्त होते हैं और स्वास्थ्य का हाल जाना जा सकता है. जब कोई भी ग्रह पीड़ित होकर लग्न, लग्नेश, षष्ठम भाव अथवा अष्टम भाव से सम्बन्ध बनाता है. तो ग्रह से संबंधित अंग रोग प्रभावित हो सकता है.

प्रत्येक ग्रह शरीर के किसी न किसी अग को प्रभावित अवश्य करता है या उससे संबंधित बिमारी को दर्शाता है. जैसे सूर्य ह्रदय, पेट. पित्त , दायीं आँख, घाव, जलने का घाव, गिरना, रक्त प्रवाह में बाधा आदि को दिखाता है.

चंद्रमा शरीर के तरल पदार्थ, रक्त बायीं आँख, छाती, दिमागी परेशानी, महिलाओं में मासिक चक्र की अनिमियतता इत्यादि का द्योतक होता है. मंगल- सिर, जानवरों द्वारा काटना, दुर्घटना, जलना, घाव, शल्य क्रिया, आपरेशन, उच्च रक्तचाप, गर्भपात इत्यादि.

बुध – गले, नाक, कान, फेफड़े, आवाज, बुरे सपनों का . गुरु – यकृत शरीर में चर्बी, मधुमेह, कान इत्यादि का शुक्र – मूत्र में जलन, गुप्त रोग, आँख, आंतें , अपेंडिक्स, मधुमेह, मूत्राशय में पथरी आदि का. शनि पांव, पंजे की नसे, लसीका तंत्र, लकवा, उदासी, थकान का, राहु – हड्डीयों, जहर , सर्प दंश बीमारियां, डर आदि और केतु – हकलाना, पहचानने में दिक्कत, आंत, परजीवी इत्यादि को दर्शाता है.

उपरोक्त ग्रहों में जो ग्रह छठे भाव का स्वामी हो या छठे भाव के स्वामी से युति सम्बन्ध बनाए उस ग्रह की दशा में रोग होने के योग बनते हैं. छठे भाव के स्वामी का सम्बन्ध लग्न भाव लग्नेश या अष्टमेश से होना स्वास्थ्य के पक्ष से शुभ नहीं माना जाता है. जब छठे भाव का स्वामी एकादश भाव में हो तो रोग अधिक होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं. इसी प्रकार छठे भाव का स्वामी अष्टम भाव में हो तो व्यक्ति को लंबी अवधि के रोग होने की अधिक संभावनाएं रहती हैं.

मेष राशि | Aries Sign

सिर या मस्तिष्क की कारक है. यह राशि मस्तिष्क, मेरूदण्ड तथा शरीर की आंतरिक तंत्रिकाओं पर प्रभाव डालती है यदि मंगल नीच का हो अथवा इस पर बुरे ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक को इस ग्रह से संबंधीत बिमारीयों का सामना करना पड़ सकता है.

वृषभ राशि | Taurus Sign

यह मुख की कारक राशि है तथा इसका स्वामी शुक्र है. इसके प्रभावित होने पर व्यक्ति को होने पर मुंह संबंधी बीमारी छाले, तुतलाहट या हकलाना, बोलना में दिक्कत आदि की शिकायत रहती है.

मिथुन राशि | Gemini Sign

मिथुन राशि का स्वामी बुध है यह वक्ष, छाती, भुजाओं व श्वास नली की कारक है. यदि
यह ग्रह कुण्डली में नीच का हो या अन्य क्रूर ग्रहों से पीड़ित हो तो व्यक्ति को फेफ़डों से संबंधित रोग जैसे टी.बी, सांस लेने में दिक्कत, गैस व अपच या माँस पेशियों से संबंधित रोग हो सकते हैं.

कर्क राशि | Cancer Sign

इस राशि का स्वामी चन्द्रमा है. यह राशि मन व हृदय की कारक है यदि कुण्डली में चन्द्रमा नीच का या पीड़ित हो तो जातक को मानसिक तनाव अवसाद, त्वचा व पाचन संस्थान पर विपरीत प्रभाव जैसे रोगों का सामना करना पड़ सकता है.

सिंह राशि | Leo Sign

सिंह राशि का स्वामी सूर्य है. यह राशि गर्भ व पेट की कारक है इस राशि के या इसके ग्रह के प्रभावित होने पर रक्त संचार शक्ति प्रभावित हो सकती है. ह्वदयाघात, हडि्डयों की बीमारी व नेत्र रोग भी परेशान कर सकते हैं.

कन्या राशि | Virgo

इस राशि के स्वामी बुध है तथा यह पेट व कमर के कारक हैं. बुध नीच का या अन्यथा बुध पीड़ित होने पर पेट, पाचन क्रियाएं, यकृत संबंधित रोग एवं गुप्त रोगों का खतरा हो सकता है.

तुला राशि | Libra Sign

तुला राशि के स्वामी शुक्र हैं. इसके पीड़ित या नीचस्थ होने पर व्यक्ति को जननांग व मूत्राशय संबंधित रोगों प्रभावित कर सकते हैं. महिलाओं के मासिक धर्म व गर्भ धारण संबंधी क्रिया भी इसी के कारण प्रभावित होती है.

वृश्चिक राशि | Scorpio Sign

वृश्चिक राशि के स्वामी मंगल हैं. यह राशि गुप्तांगों की कारक है, पीड़ित होने पर या नीच में स्थित होने पर गुदा, लिंग, जननांग, यकृत, मस्तिष्क संबंधी व आंत संबंधी रोग परेशान कर सकते हैं.

धनु राशि | Sagittarius Sign

धनु राशि के स्वामी बृहस्पति है. यह राशि जांघों व नितम्ब की कारक है नीचस्थ व पीड़ित गुरू जातक को लीवर, ह्वदय, आंत, जंघा, कूल्हे व बवासीर रोगों से ग्रसित रखते हैं .

मकर राशि | Capricorn Sign

मकर राशि के स्वामी शनि है, यह राशि घुटनों की कारक है. यदि शनि नीचस्थ या पीड़ित हो या राशि के प्रभावित होने पर जातक को घुटनों, जांघ, पाचन संबंधी बीमारियों घेर सकती हैं. इसके अलावा पुरानी बीमारीयां परेशान कर सकती हैं.

कुम्भ राशि | Aquarius Sign

इस राशि के स्वामी भी शनि देव हैं. यह राशि पिण्डलियों की कारक है शनि के पीड़ित या नीचस्थ होने पर व इस राशि के पीड़ित होने पर व्यक्ति को पिण्डलियों, उच्च रक्तचाप, हर्निया की बिमारी परेशान कर सकती है.

मीन राशि | Pisces Sign

मीन राशि के स्वामी बृहस्पति हैं. यह राशि पैर के पंजों की कारक मानी जाती है. इस राशि के स्वामी के पीडी़त होने पर व्यक्ति को पैर के पंजों, लीवर या घुटनों से संबंधी बिमारी का सामना करना पड़ सकता है.

किसी भी रोगी जातक की कुंडली का विश्लेषण करते समय सबसे पहले 3, 6 8 भावों के ग्रहों की शक्ति का आंकलन करना चाहिए. जन्मकुंडली के अनुसार शरीर का विभिन्न प्रकार के रोगों से बचाव और उनसे मुक्ति प्राप्त करने में सफल हो सकते हैं. लेकिन इसके साथ ही साथ कुण्डली में रोगों का अध्ययन करते समय इन तथ्यों का अध्ययन करते हुए ग्रहों की युति, प्रकृति, दृष्टि, उनका परमोच्चा या परम नीच की स्थिति का भी अध्ययन आवश्यक है तभी हम किसी निर्णय पर पहुंच सकते हैं.

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कुण्डली से जाने व्यवसाय में सफलता | Kundali informs about success of business

व्यवसाय में कैसी स्थिति रहेगी इस विषय का आंकलन ज्योतिष द्वारा किया जा सकता है. ग्रहों की किस प्रकार की दृष्टि, युति या स्थान परिवर्तन कैसा हो रहा है, इन सभी तथ्यों के आधार पर कारोबार में सफलता-असफलता एवं लाभ हानि को ज्ञात किया जा सकता है. जन्म कुण्डली के अनुसार व्यक्ति में कार्यनिष्ठा का भाव देखने के लिये दशम घर से शनि का संबन्ध देखा जाता है.

जातक की कुण्डली के आधार पर इस बात का पता लगाया जा सकता है कि वह कैरियर के क्षेत्र में कौन सी लाईन पकडेगा. कई व्यक्ति जीवन में दूसरों के अधीन रहकर कार्य करते हैं अर्थात नौकरी से अपनी आजीविका प्राप्त करते हैं तो कुछ व्यक्ति स्वतंत्र रुप से कार्य करना पसन्द करते हैं. कुण्डली में व्यापार करने के लिए योग मौजूद होते हैं. यह योग निम्नलिखित हैं.

  • चन्द्रमा, गुरु तथा शुक्र परस्पर दो या बारह भावों में स्थित हों तो व्यक्ति स्वयं के व्यवसाय से जीविकोपार्जन करता है.
  • यदि चन्द्र कुण्डली में शुभ ग्रह केन्द्र में हो तो जातक बिजनेस से धन कमाता है.
  • कुण्डली में बुध, राहु या शनि से दृष्ट अथवा युति है तो व्यक्ति स्वतंत्र रुप से व्यवसाय करने की चाह रखता है. लेकिन शनि कुण्डली में बली होकर बुध को दृष्ट कर रहा है तो व्यक्ति नौकरी करता है.
  • चन्द्र कुण्डली से गुरु तृतीय भाव में स्थित हो तथा शुक्र लाभ भाव में स्थित हो तो व्यक्ति अपना स्वयं का व्यवसाय कर सकता है.
  • कुण्डली में सप्तम भाव का स्वामी यदि धन भाव में स्थित है और बुध सप्तम भाव में स्थित हो व्यक्ति बिजनेस कर सकता है.
  • कुण्डली में बुध तथा शुक्र द्वितीय भाव अथवा सप्तम भाव में स्थित हों और शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तब जातक व्यापार की ओर झुकाव रख सकता है.
  • बुध को बिजनेस का कारक ग्रह माना जाता है. बुध कुण्डली में यदि सप्तम भाव में द्वितीयेश के साथ है तब जातक बिजनेस करता है.
  • दूसरे भाव का स्वामी शुभ ग्रह की राशि में स्थित हो और बुध या सप्तमेश उसे देख रहें हों तब व्यक्ति व्यापार करता है.
  • यदि गुरु की द्वितीय भाव के स्वामी पर दृष्टि हो तो व्यक्ति व्यापार कर सकता है.
  • उच्च के बुध पर द्वितीयेश की दृष्टि होने पर जातक व्यापार करने में रूचि रखता है.
  • यदि लग्नेश तथा दशमेश की परस्पर एक दूसरे पर दृष्टि हो, युति या दोनों का स्थान परिवर्तन हो रहा हो तब व्यक्ति बिजनेस कर सकता है.
  • दशम भाव पर शुभ ग्रहों की दृष्टि होने से व्यापार करता है. उसे बिजनेस में धन लाभ होता है.
  • दशम भाव में बुध की स्थिति से व्यक्ति व्यापारी बनता है.
  • कुण्डली में आत्मकारक ग्रह के नवाँश में शनि स्थित है तब व्यक्ति व्यापार में समृद्धि पाता है.
  • सप्तम भाव से द्वादश भाव तक या दशम भाव से तृतीय भाव तक पाँच या पाँच से अधिक ग्रह स्थित हैं तब व्यक्ति स्वतंत्र व्यापार करता है.
  • दशम भाव का स्वामी केन्द्र या त्रिकोण भाव में स्थित है तब भी व्यक्ति स्वतंत्र रुप से व्यापार कर सकता है.

व्यवसाय में सफलता संबंधी अन्य योग | Other Yogas related to success in business

  • मंगल और चतुर्थ भाव का स्वामी केन्द्र या त्रिकोण भाव में स्थित हो या लाभ भाव में स्थित हो और दशमेश के साथ शुक्र तथा चन्द्रमा की युति हो तब व्यक्ति कृषि तथा पशुपालन से धन प्राप्त करता है.
  • कुण्डली के नवम भाव में बुध, शुक्र तथा शनि स्थित है तब व्यक्ति कृषि कार्य से धन प्राप्त करता है.
  • कुण्डली में सूर्य ग्रह से लेकर शनि ग्रह तक सभी ग्रह परस्पर त्रिकोण भाव में स्थित हैं, तब जातक कृषि से संबंधित कार्यों से अपनी आजीविका कमा सकता है.
  • गुरु अष्टम भाव में स्थित हो और पाप ग्रह केन्द्र में हों और किसी भी शुभ ग्रह का संबंध इनसे नहीं हो तो व्यक्ति माँस – मछली आदि का व्यापार करता है.
  • बुध या शुक्र दशम भाव में दशमेश का नवाँशपति होकर स्थित हो तो व्यक्ति कपडे़ का व्यवसाय कर सकता है.
  • लग्न तथा सप्तम भाव में सभी ग्रह स्थित हो तब शकट योग बनता है और व्यक्ति ट्राँसपोर्ट से या लकडी़ के सामान के व्यापार से धनोपार्जन करता है.
  • राहु-केतु को छोड़कर कुण्डली में सातों ग्रह किन्हीं चार भावों में स्थित है तो व्यक्ति भूमि अर्थात कृषि कार्य से लाभ पाता है.
  • कुण्डली में चन्द्रमा या शुक्र की युति लग्नेश से हो जातक लेखक, कवि या पत्रकार बन सकता है.
  • मंगल तथा सूर्य के दशम भाव में स्थित होने के कारण जातक अपनी कार्य कुशलता के आधार पर एक अच्छा कारीगर बनता है और धन पाता है.
  • चन्द्रमा, बुध के नवाँश में स्थित हो और सूर्य से दृष्ट हो तब व्यक्ति अभिनय के क्षेत्र में सफलता हासिल करता है.
  • दशम भाव में चन्द्रमा तथा राहु की युति व्यक्ति को कूटनीतिज्ञ बनाती है.
  • कुण्डली में दशम भाव में मंगल स्थित हो या मंगल का दशम भाव के स्वामी के साथ दृष्टि या युति संबंध हो तब व्यक्ति कुशल प्रशासक बनता है या सेना में अधिकारी का पद प्राप्त कर सकता है.
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