ज्योतिष में दशाओं का महत्व | Importance of Dashas in Astrology

ज्योतिष में दशाओं का महत्वपूर्ण स्थान है और व्यक्ति के जीवन के संपूर्ण घटनाक्रम में यह अपना विशेष प्रभाव डालती हैं. यह दशाएं ग्रहों द्वारा गत जन्म के कर्मफलों को इस जन्म में दर्शाने का माध्यम है. महादशाओं के गणना की पद्धति में नक्षत्रों पर आधारित दशा पद्धतियाँ अधिक लोकप्रिय हैं. वेदांग ज्योतिष में चंद्रमा जिस नक्षत्र में उस दिन होते हैं वह उस दिन का नक्षत्र कहलाता है व उस नक्षत्र का जो स्वामी ग्रह कहा गया है, उसकी महादशा जन्म के समय मानी जाती है. तदोपरांत क्रम अनुसार प्रत्येक नक्षत्र या ग्रह की महादशा जीवन में आती रहती है.

दशा क्रम में सबसे पहले विंशोत्तरी दशा का आगमन होता है और इसी के भितर अन्तर दशा, प्रत्यन्तर दशा, सूक्ष्म दशा, प्राण दशाएं आती हैं. प्रत्येक ग्रह महादशा के काल में सभी ग्रह अपनी-अपनी अंतर्दशा लेकर आते हैं. इसमें प्राण दशा सबसे कम अवधि की होती है और महादशा सबसे अधिक अवधि की मानी जाती है. महादशाओं का चक्र 120 वर्ष में पूरा होता है. इन दशाओं में पहली दशा तो जन्म नक्षत्र पर आधारित है.

कौन सी महादशा पहले मिलेगी यह जन्म समय चंद्रमा जिस नक्षर में होता है उस नक्षत्र के स्वामी ग्रह से जतक की महादशा आरंभ होती है. दशाओं के सभी काल क्रम में आपको सभी कुछ मिलता है. जन्म में अगर कोई दशा चल रही है तो यह कतई नहीं माना जाना चाहिए कि उस ग्रह से संबंधित समस्त कर्मो का फल मिल चुका है बल्कि यह संभव है कि संपूर्ण कर्मो का केवल कुछ प्रतिशत ही उस दशा में मिला हो

दशाओं का प्रभाव | Effects of Dashas

ज्योतिषी के अनुसार सभी ग्रह अपनी दशा-अन्तर्दशा में सभी प्रकार का फल प्रदान करते हैं. ग्रह सर्वशक्ति संपन्न हैं और अच्छा-बुरा कोई भी फल दे सकते हैं. यह सत्य है कि वे अपनी दशा में आकर ही अपने संपूर्ण अच्छे-बुरे फलों का दर्शन कराती हैं. महादशा शब्द का अर्थ है वह विशेष समय जिसमें कोई ग्रह अपनी प्रबलतम अवस्था में होता है और कुंडली में अपनी स्थिति के अनुसार शुभ-अशुभ फल देता है.  ग्रहों की महादशा का समय निम्नानुसार है. सूर्य- 6 वर्ष,  चन्द्र-10 वर्ष,  मंगल- 7 वर्ष, राहु- 18 वर्ष,  गुरु- 16 वर्ष,  शनि- 19 वर्ष,  बुध- 17वर्ष,  केतु- 7 वर्ष और शुक्र- 20 वर्ष की होती है.

इन वर्षों में मुख्य ग्रहों की महादशा में अन्य ग्रहों की दशाएं आती हैं, जिसे अन्तर्दशा कहा जाता है. मुख्य ग्रह के साथ अन्तर्दशा के स्वामी ग्रह का भी प्रभाव फल का अनुभव होता है. जिस ग्रह की महादशा होगी, उसमे उसी ग्रह की अन्तर्दशा पहले आएगी अधिक सूक्ष्म गणना के लिए अन्तर्दशा में उन्ही ग्रहों की प्रत्यंतर दशा भी निकली जाती है, जो इसी क्रम से चलती है. इससे अच्छी-बुरी घटनाओं का प\ता लगाया जा सकता है. किसी ग्रह की महादशा में उसके शत्रु ग्रह की, पाप ग्रह की और नीचस्थ ग्रह की अन्तर्दशा अशुभ होती है. शुभ ग्रह में शुभ ग्रह की अन्तर्दशा अच्छा फल देती है.

स्वग्रह, मूल त्रिकण या उच्च के ग्रह की दशा शुभ मानी जाती होती है. वैदिक ज्योतिष में अनेक दशाओं का वर्णन किया गया हैं परन्तु सरल, लोकप्रिय, सटीक एवं सर्वग्राह्य विंशोत्तरी दशा ही है. सूर्य आत्मा का, चन्द्रमा मन का, मंगल बल का, बुध बुद्धि का, गुरु जीव का, शुक्र स्त्री का और शनि आयु का कारक है. अत: इनकी महादशाओं का फलादेश देश, काल और परिस्थिति को ध्यान में रखकर करना चाहिए फलादेश में परिस्थिति का ध्यान रखना आवश्यक है.

जन्म से मृत्यु तक ग्रहों के प्रभाव से विभिन्न प्रकार की सुखद एवं दु:खद घटनाओं से प्रभावित होते है. ग्रह उच्च राशि में हो तो नाम, यश प्राप्त होता है तथा ग्रहों के अशुभ होने पर कष्ट प्राप्त होता है. जन्म नक्षत्र से दशा स्वामी किस नक्षत्र में है ये देखना आवश्यक है. यदि वह अच्छी स्थिति में मित्र या अतिमित्र में है तो शुभ फल प्राप्त होते हैं.

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कुण्डली में बनने वाले विभिन्न योग | Different Yogas in a Kundali

कुण्डली या कहें जन्म पत्रिका जिसके भितर जातक के जीवन के जीवन का सारांश छुपा होता है जिसे पढ़कर व्यक्ति भूत, भविष्य और वर्तमान के संदर्भ में अनेक बातों को जान सकता है. कुण्डली में अनेक योगों का निर्माण होता है कुछ शुभ योग होते हैं और कुछ अशुभ योग होते हैं किसी की कुण्डली में कौन सा योग किस प्रकार के फल देगा इस बात को तभी समझा जा सकत है जब हम व्यक्ति की कुण्डली का अवलोकन करते हैं.

ज्योतिष शास्त्र में ग्रह और उनके योगों के आधार पर फलकथन किया जाता है. कुछ ग्रह योग अशुभ माने जाते हैं जो व्यक्ति के जीवन में अनेक परेशानियों का कारण बनते हैं और कुछ ऐसे शुभ ग्रह हैं जो व्यक्ति को सुख प्रदान करते हैं. ज्योतिषशास्त्र में बताये गये कुछ उत्तम योग हैं महालक्ष्मी योग, नृप योग आदि.

महालक्ष्मी योग धन और एश्वर्य प्रदान करने वाला योग है, जब धन भाव यानी द्वितीय स्थान का स्वामी बृहस्पति एकादश भाव में बैठकर द्वितीय भाव पर दृष्टि डालता है तो इस योग का निर्माण होता है. यह धनकारक योग माना गया है जो जातक को अच्छी धन संपदा प्रदान करने वाला होता है. इसी प्रकार एक अन्य योग सरस्वती योग है.

सरस्वती योग यह तब बनता है जब शुक्र बृहस्पति और बुध ग्रह एक दूसरे के साथ हों अथवा केन्द्र में बैठकर एक दूसरे से सम्बन्ध बना रहे हों. युति अथवा दृष्टि किसी प्रकार से सम्बन्ध बनने पर यह योग बनता है. यह योग जिस व्यक्ति की कुण्डली में बनता है उस पर विद्या की देवी मां सरस्वती की कृपा रहती है. सरस्वती योग वाले व्यक्ति कला, संगीत, लेखन, एवं विद्या से सम्बन्धित किसी भी क्षेत्र में काफी नाम और धन कमाते हैं.

नृप योग जिस व्यक्ति की कुण्डली में बनता है वह राजा के समान जीवन जीता है.इस योग का निर्माण तब होता है जब व्यक्ति की जन्म कुण्डली में तीन या उससे अधिक ग्रह उच्च स्थिति में रहते हैं.

शुभ योगों की ही तरह कुछ अशुभ योग भी कुण्डली में देखे जा सकते हैं अशुभ योगों में एक योग विषयोग है यह इस योग का निर्माण शनि और चन्द्र की स्थिति के द्वारा होता है. शनि और चन्द्र का संबंध होने पर अशुभ विषयोग बनता है. लग्न में चन्द्र पर शनि की तीसरी,सातवीं अथवा दसवीं दृष्टि होने पर यह योग बनता है. इसी प्रकार यदि कर्क राशि में शनि पुष्य नक्षत्र में हो और चन्द्रमा मकर राशि में श्रवण नक्षत्र में हो व दोनों का परिवर्तन योग बन रहा हो अथवा चन्द्र और शनि विपरीत स्थिति में हों तथा एक दूसरे पर दृष्टि डाल रहे हों तो विषयोग की स्थिति बनती है.

कुण्डली में आठवें स्थान पर राहु हो तथा शनि मेष, कर्क, सिंह या वृश्चिक लग्न में हो तब विषयोग का प्रभाव झेलना पड़ता है. विषयोग के प्रभाव के कारण व्यक्ति से बीमार रहता है और उसे  पारिवारिक जीवन में कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है. व्यक्ति शंकालु और वहमी प्रकृति का होता है.

केमद्रुम योग ज्योतिष में चंद्रमा से निर्मित एक महत्वपूर्ण योग है. यह योग तब बनता है जब चंद्रमा के आगे या पीछे वाले भावों में ग्रह न हो अर्थात चंद्रमा से दूसरे और चंद्रमा से द्वादश भाव में कोई भी ग्रह नहीं हो. ज्योतिष शास्त्र में चन्द्र को मन का कारक कहा गया है. सामान्यत: यह देखने में आता है कि मन जब अकेला हो तो वह इधर-उधर की बातें अधिक सोचता है और ऎसे में व्यक्ति में चिन्ता करने की प्रवृति अधिक होती है.  इसी प्रकार के फल केमद्रुम योग देता है.

श्रापित योग इसे शापित दोष भी कहा जाता है. शानि एवं राहु की मौजूदगी एक राशि में होने पर श्रापित योग का निर्माण होता है. यह दोनों ही ग्रह अशुभ फल देने वाले होते हैं इसलिए इन दोनों ग्रहों के योग से बनने वाले योग को शापित या श्रापित कहा जाता है. शनि की दृष्टि राहु पर होने से भी इस योग का जन्म होता है. इस योग के विषय में मान्यता है कि यह जिस व्यक्ति की कुण्डली में होता है उनकी कुण्डली में मौजूद शुभ योगों का प्रभाव कम हो जाता है जिससे व्यक्ति को जीवन में कठिनाईयों एवं चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.

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ज्योतिष में मंत्र व उपासना का महत्व | Importance of Mantras and Worship in Astrology

ज्योतिष शास्त्र में मंत्र व उपासना के महत्व को विस्तारपूर्वक बताया गया है. मंत्रों का जाप और उपासना द्वारा जीव सभी दुखों से मुक्ति पाने की क्षमता पाता है. हमारे शास्त्रों में इन्हीं मंत्रोउच्चारणों के महत्व को प्रतिपादित करते हुए उनकी सार्थकत अके बारे में सतीक टिप्पणी की गई है कि यह मंत्र ही जीवन के उचित दिशा और प्रकार प्रदान करते हैं.

कई बार रूप बार-बार प्रयत्न करने पर भी जीवन में विघ्नों एवं विफलताओं का सामना करना ही पड़ता है. ग्रहों की अनुकूलता न होने पर जीवन में उतार-चढा़व भरे बने रहते हैं. किंतु इन परेशानियों से मुक्ति पाने के लिए  ज्योतिष में अनेक उपाय एवं साधनाएं बताई गई हैं जो हमें इन समस्याओं का सामना करने की क्षमता देती हैं तथ ऐनसे मुक्ति की राह भी दिखलाती हैं.अत: ज्योतिष द्वारा प्रतिपादित अनिष्ट ग्रहों के उपायों को अपनाकर जीवन को स्वस्थ, खुशहाल एवं सुखी बनाया जा सकता है.

ग्रहों की शांति हेतु ज्योतिष में मंत्र जप, तप, व्रत, उपवास यज्ञ-हवन, दान, तीर्थ स्नान, रत्न इत्यादि अनेक उपायों को बताया गया है. जन्म कुंडली में ग्रह अनिष्ट होने पर अनेक कठिन समस्यायें उत्पन्न कर सकते हैं. इन ग्रहों की सांति के लिए उक्त ग्रहों से संबंधित जप, तप और दान इत्यादि करके लाभ प्राप्त किया जा सकता है. इसी प्रकार सभी ग्रहों के अनुसार विधि विधान सहित पूजा पाठ करके ही अच्छे फल प्राप्त किए जा सकते हैं.

मंत्र व उपासना के नियम | Principles of Mantras and Worship

मंत्र एव साधना में असीम शक्ति होती है इन विधि कर्मों से जुडे़ नियमों का पालन करन अभी अति आवश्यक होता है अन्यथा इनका सही प्रकार से पालन न हो तो उचित परिणाम प्राप्त नही हो पाता. इन पूजा पाठ विधि के दौरान व्यक्ति को चाहिए कि वो प्रयोज्य वस्तुओं का दृढ़तापूर्वक पालन करें, क्योंकि विधिवत की गई साधना से प्रभु की कृपा सुलभ रहती है.

मंत्र एवं उपासना काल में नियमों का पालन अनिवार्य है जिसकी साधना की जा रही हो, उसके प्रति पूर्ण आस्था होनी चाहिए. मंत्र-साधना के प्रति दृढ़ इच्छा शक्ति होने पर ही शुभ फलों की प्राप्ति संभव है. मंत्र एवं उपासना एकांत स्थन पर शुद्ध मन से की जानी चाहिए. किसी भी प्रकार के बुरे विचार एवं गलत व्यवहार इसके प्रभाव को समाप्त करके दुष्परिणाम दे सकता है.

मंत्र और साधना में ऐसी आध्‍यात्मिक शक्ति सम्मिलित होती है जो एक बार भगवान को भी इंसान के सन्‍मुख ला देता है. देवता को संबोधित किए गए प्रार्थना पूरक वेद मंत्र के भीतर ऐसी गूढ़ शक्ति छिपी है जो वाणी से प्रकाशित नहीं की जा सकती बल्कि शक्ति से वाणी स्‍वयं प्रकाशित होती है।

इस उपासना एवं उपायों द्वारा चेतना जीवंत, ज्‍वलंत और जाग्रत हो उठती है. साधना साधक का प्रभु में लीन होने का भाव है. जितने दिन साधक साधना में लीन होता है, उतने ही दिन साधक को साधना के नियमों का पालन करना चाहिए. यह नियम प्रकृति द्वारा ही बनाए गए है. इनका सच्चे मन से पालन करते हुए व्यक्ति अपनी बाधाओं और कष्टों से मुक्ति पा सकता है और अपने जीवन को सुखी और समृद्ध बनाने में सक्षम हो पाता है.

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मंगल का ज्योतिष में महत्व | Importance of Mars in a Kundali

ज्योतिष में मंगल ग्रह को मुख्य तौर पर एक सेनापती के रुप में दर्शाया गया है. यह ताकत, साहस और पौरुष का कारक है. मंगल ग्रह शारीरिक तथा मानसिक शक्ति और ताकत का प्रतिनिधित्व करता है. मंगल के प्रबल प्रभाव से व्यक्ति में साहस , लड़ने की क्षमता और मिड़रता का भाव आता है. मंगल के प्रभावस्वरुप जातक सामान्यतया किसी भी प्रकार के दबाव के आगे नहीं झुकता. मंगल के द्वारा साहस, शारीरिक बल, मानसिक क्षमता प्राप्त होती है. पुलिस, सेना, अग्नि-शमन सेवाओं के क्षेत्र में मंगल का अधिकार है खेल कूद इत्यादि में जोश और उत्साह मंगल के प्रभाव से ही प्राप्त होता है.

मंगल को ज्योतिष शास्त्र में व्यक्ति के साहस, छोटे भाई-बहन, आन्तरिक बल, अचल सम्पति, रोग, शत्रुता, रक्त शल्य चिकित्सा, विज्ञान, तर्क, भूमि, अग्नि, रक्षा, सौतेली माता, तीव्र काम भावना, क्रोध, घृ्णा, हिंसा, पाप, प्रतिरोधिता, आकस्मिक मृत्यु, हत्या, दुर्घटना, बहादुरी, विरोधियों, नैतिकता की हानि का कारक ग्रह है.

मंगल ग्रह से संबंधित अन्य तथ्य | Other important facts related to Mars

मंगल के मित्र ग्रह सूर्य, चन्द्र और गुरु है. मंगल से शत्रु संम्बन्ध रखने वाला ग्रह बुध है. मंगल के साथ शनि और शुक्र सम सम्बन्ध रखते है.  मंगल मेष व वृश्चिक राशि का स्वामी है. मंगल की मूलत्रिकोण राशि मेष राशि है, इस राशि में मंगल 0 अंश से 12 अंशों के मध्य होने पर अपनी मूलत्रिकोण राशि में होता है. मंगल मकर राशि में उच्च स्थान प्राप्त करता है.

मंगल कर्क राशि में स्थित होने पर नीचस्थ होता है. मंगल पुरुष प्रधान ग्रह है. मंगल दक्षिण दिशा का प्रतिनिधित्व करता है. मंगल के सभी शुभ फल प्राप्त करने के लिए मूंगा, रक्तमणी जिसे तामडा भी कहा जाता है, इनमें से किसी एक रत्न को धारण किया जा सकता है.  मंगल के लिए लाल रंग धारण किया जाता है. मंगल का भाग्य अंक 9 है. मंगल के लिए गणपति, हनुमान, सुब्रह्मामन्यम, कार्तिकेय आदि देवताओं की उपासना करनी चाहिए.

मंगल के कारण व्यक्ति को कौन से रोग हो सकते है | Diseases caused by the influence of Mars

मंगल के खराब होने या पिडी़त होने से व्यक्ति को शरीर के किसी भाग का कटना, घाव, दु:खती आंखें, पित्त, रक्तचाप. बवासीर, जख्म, खुजली, हड्डियों का टूटना. पेशाब संबन्धित शिकायतें, पीलिया, खून गिरना, ट्यूमर, मिरगी जैसे रोग प्रभावित कर सकते हैं. मंगल व्यक्ति को यौद्धाओं का गुण देता है, निरंकुश, तानाशाही प्रकृति का है.

मंगल के लिए दान की जाने वाली वस्तुएं कौन सी है | What are the things that can be donated for Mars

मंगल के दुष्प्रभावों से बचने के लिए तथा शुभ फलों की प्राप्ति के लिए मंगल से संबंधित वस्तुओं का दान किया जा सकता है. तांबा, गेहूं, घी, लाल वस्त्र, लाल फूल, चन्दन की लकडी, मसूर की दाल. मंगलवार को सूर्य अस्त होने से 48 मिनट पहलें और सूर्यास्त के मध्य अवधि में ये दान किये जाते है.

मंगल के बीज मंत्र कौन सा है | Mars’s Beej Mantra

” ॐ क्रां क्रौं क्रौं स: भौमाय नम:

मंगल का वैदिक मंत्र कौन सा है | Mars’s Vedic Mantra

“ॐ घरणीगर्भसंभूतं विद्युत कन्ति सम प्रभम।

कुमार भक्तिहस्तं च मंगल प्रणामाभ्यहम।। “

मंगल का रंग-रुप कैसा है | Physical features of a person with Mars sign

मंगल लग्न भाव में अपनी उच्च राशि में हो या लग्न में मंगल की राशि हो, अथवा किसी व्यक्ति की जन्म राशि मंगल की राशियों में से कोई एक हो, तो व्यक्ति के रंग रुप पर मंगल का प्रभाव रहता है. इसके प्रभाव से व्यक्ति मध्यम कदकाठी,  क्रोधी, पतला-दुबला, क्रूर, चंचल बुद्धि, पित्तीय प्रकृ्ति का होता है. मंगल शरीर में पित्त, हाथ, आंखें, गुदा और रक्त का प्रतिनिधित्व करता है.

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ज्योतिष में सूर्य का महत्व | Importance of Sun in Astrology

ज्योतिष में सूर्य को राजा की पदवी प्रदान की गई है. ज्योतिष के अनुसार सूर्य आत्मा एवं पिता का प्रतिनिधित्व करता है. सूर्य द्वरा ही सभी ग्रहों को प्रकाश प्राप्त होता है ओर ग्रहों की इनसे दूरी या नज़दीकी उन्हें अस्त भी कर देती है. सूर्य सृष्टि को चलाने वाले प्रत्यक्ष देवता का रुप हैं. कुंडली में सूर्य को पूर्वजों का प्रतिनिधि भी माना जाता है. सूर्य पर किसी भी कुंडली में एक या एक से अधिक बुरे ग्रहों का प्रभाव होने पर उस कुंडली में पितृ दोष का निर्माण हो जाता है. व्यक्ति की आजीविका में सूर्य सरकारी पद का प्रतिनिधित्व करता है. व्यक्ति को सिद्धान्तवादी बनाता है. इसके अतिरिक्त सूर्य कार्यक्षेत्र में कठोर अनुशासन अधिकारी, उच्च पद पर आसीन अधिकारी, प्रशासक, समय के साथ उन्नति करने वाला, निर्माता, कार्यो का निरिक्षण करने वाला बनाता है.

बारह राशियों में से सूर्य मेष, सिंह तथा धनु में स्थित होकर विशेष रूप से बलवान होता है तथा मेष राशि में  सूर्य को उच्च का माना जाता है. मेष राशि के अतिरिक्त सूर्य सिंह राशि में स्थित होकर भी बली होते हैं क्योंकि यह इनकी मूलत्रिकोण राशि होती है. यदि जातक की कुंडली में सूर्य बलवान तथा किसी भी बुरे ग्रह के प्रभाव से रहित है तो जातक को जीवन में बहुत कुछ प्राप्त होता स्वास्थ्य उत्तम होता है. सूर्य बलवान होने से कुंडली जातक शारीरिक तौर पर बहुत चुस्त-दुरुस्त होता है.

सूर्य कि कुंडली में मजबूत स्थिति व्यक्ति को कुछ अधिक सशक्त बना देती है. व्यक्ति भावनाओं को नियंत्रण में रखना जानता है कोई भी निर्णय सोच विचार कर ही लेता है भावनाओं में बहकर नहीं लेता अपने निर्णय पर अड़िग रहते हुए कभी कभी कठोर प्रतीत होता है परंतु कई बार लोग इन्हें अभिमानी समझने लगते हैं पर ऎसा नही है. सूर्य का बली होना व्यक्ति में जिम्मेदारियों को उठाने वाले बनाता है.

कुछ राशियों में सूर्य का बल सामान्य से कम हो जाता है तथा यह बल सूर्य के तुला राशि में स्थित होने पर सबसे कम हो जाता है इसी मे आकर सूर्य नीच के माने जाते हैं तथा सूर्य कुंडली में अपनी कुछ अन्य स्थिति के कारण तथा बुरे ग्रहों के प्रभाव में आने के कारण भी बलहीन हो जाते हैं

सूर्य उज्ज्वल एवं ज्वलंत ग्रह है, इसकी शक्ति द्वारा जीव एवं सृष्टि का विस्तार होता है. सूर्य समस्त उत्पत्ति का कारण है, परिवार में सूर्य कर्ता है, राज्य में राजा है, ग्राम में मुखिया, ग्रहों में सबसे प्रमुख हैं. आध्यात्मिक विद्या, अग्नि एवं तेज है, अधीनता स्वीकार नहीं करता. वह आदेश देता है किसी के आदेश का पालन नही करता. अपने महत्व एवं मर्यादा को समझता हैं. जिसका सूर्य बलवान है, वह उन्नति, वृद्धि, निर्माण करने वाला होता है. सूर्य हृदय का कारक है तथा इसके अलावा सूर्य नेत्र ज्योती का भी कारक है

कुण्डली में सूर्य के बल के मुताबिक जीवन में शक्ति होती है जिस कुंडली में सूर्य कमजोर रहता है वह जातक शारीरिक रूप से कमजोर होता है, इसलिए दूसरे ग्रह भी पूर्ण फल नहीं दे पाते. फलित ज्योतिष में सूर्य की अन्य ग्रहों से दूरी से पता चलता है. उसका नीच, उच्च, स्वग्रही, मित्र या शत्रु ग्रही तो नहीं यह तथ्य फलित ज्योतिष में महत्वपूर्ण है.  सूर्य कि लग्न में स्थिति जातक कि आकृति, शारीरिक गठन, वर्ण रंग, रूप प्रभावित करती है. दशम भाव का सूर्य अधिक बलवान माना जाता है. सूर्य का कुण्डली में कमजोर होना बुरे प्रभाव देता है. कुंडली का अध्ययन करते समय कुंडली में सूर्य की स्थिति, बल तथा कुंडली के दूसरे शुभ तथा अशुभ ग्रहों के सूर्य पर प्रभाव को ध्यानपूर्वक देखना अति आवश्यक होता है.

सूर्य संबंधित कुछ अन्य विचार | Other information related to Sun

सूर्य के मित्र ग्रह चन्द्रमा, मंगल,गुरु है. शनि व शुक्र सूर्य के शत्रु ग्रह है. बुध ग्रह सूर्य के साथ सम सम्बन्ध रखता है.  सूर्य की मूलत्रिकोण राशि सिंह है. इस राशि में सूर्य 0अंश से 20 अंश पर होने पर सूर्य मूलत्रिकोण अंशों पर होता है. सूर्य की उच्च राशि मेष राशि है. मेष राशि में सूर्य 10 अंश पर उच्च स्थान प्राप्त करते है. सूर्य तुला राशि में 10 अंश पर नीच राशिस्थ होते है.

सूर्य पुरुष प्रधान ग्रह है. सूर्य पूर्व दिशा का प्रतिनिधित्व करते है. सूर्य का रत्न रुबी, रक्तमणी और तामडा है. सूर्य का शुभ रंग नारंगी, केसरी, हल्का लाल रंग है.  सूर्य की शुभ संख्या 1, 10, 19 है. सूर्य के लिए शिव, अग्नि, रुद्र, भगवान नारायण, सचिदानन्द. सूर्य की कारक वस्तुओं में आत्मा, स्वाभिमान, तेजस्विता, ताकत, चिकित्सा करने का सामर्थ्य. सूर्य राजनीति, राजसी, राजसिक ग्रह, एक नैसर्गिक आत्मकारक, जीवन का स्त्रोत, ह्रदय, ऊर्जा और चतुष्पद राशि स्वामी ग्रह है.

सूर्य का बीज मंत्र | Sun’s Beej Mantra

” ऊँ ह्रं ह्रीं ह्रौं स: सूर्याय नम: “

सूर्य का वैदिक मंत्र | Sun’s Vedic Mantra

“ऊँ आसत्येनरजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतंच ।

हिरण्येन सविता रथेनादेवी यति भुवना विपश्यत ।।”

सूर्य के लिए गेहूं, तांबा, रुबी, लाल वस्त्र, लाल फूल, चन्दन की लकडी, केसर आदि दान किये जा सकते है.

सूर्य की राशि लग्न में हो, या सूर्य लग्न बली होकर लग्न भाव में अथवा व्यक्ति की जन्म राशि सूर्य की राशि हो, तो व्यक्ति की आंखे, शहद के रंग की आंखें, शीघ्र ही क्रोधित होने वाला, कमजोर दृ्ष्टि वाला, कद में औसत होता है. सूर्य शरीर में पित्त, वायु, हड्डियां, घुटने और नाभी का प्रतिनिधित्व करता है.  सूर्य के कारण व्यक्ति को ह्रदय रोग, हड्डियों का टूटना, माइग्रेन, पीलिया, ज्वर, जलन, कटना, घाव, शरीर में सूजन, विषाक्त, चर्म रोग, कोढ, पित्तीय संरचना, कमजोर दृष्टि, पेट, दिमागी, गडबडी, भूख की कमी जैसे रोग प्रभावित कर सकते हैं.

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विवाह में त्रिबल शुद्धि | Tribal in a Marriage

भारतीय संस्कृति के अनुसार विवाह दाम्पत्य जीवन का श्रेष्ठ स्वरुप है. इसलिए कहा गया है “धन्यो गृहस्थाश्रमः” अर्थात यह समाज को अनुकूल व्यवस्था प्रदान करने तथा नई पीढ़ी को योग्य एवं श्रेष्ठ बनाने हेतु विवाह संस्कार के लिए सुयोग्य दिशा प्रदान करता है. हिंदु धर्म के चार संस्कारों ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ, विवाह एवं सन्यास आश्रमों की श्रेणी में विवाह संस्कार का महत्वपूर्ण स्थान रहा है. निर्माण के अन्तर्गत विवाह संस्कार के पारिवारिक एवं सामूहिक प्रयोग सफल और उपयोगी सिद्ध हुए हैं. इसलिए जब भी विवाह संस्कार की रीति अपनाई जाती है तो विभिन्न कर्मों का निर्धारण करना अत्यंत आवश्यक होता है.

विवाह में त्रिबल शुद्धि का महत्व | Importance of Tribal in a marriage

विवाह मुहूर्त का विचार करते समय त्रिबल का विचार करना अत्यंत आवश्यक माना जाता है. त्रिबल अर्थात तीन बल इसमें हम सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति का बल देखते हैं. त्रिबल में वर के लिए सूर्य का बल, कन्या के लिए बृहस्पति (गरू) का बल और वर-कन्या दोनों के लिए चंद्रमा बल पर विचार किया जाता है.

स्त्रीणां गुरुबलं श्रेष्ठं पुरुषाणां रवेर्बलम।
तयोश्चन्द्रबलं श्रेष्ठमिति गर्गेण निश्चितम।।

यदि मिलान में सूर्य, चंद्रमा तथा बृहस्पति का बल कुछ कम या पूर्ण नहीं हो तो विवाह नहीं किया जाता है.

गुरू को जीवन एवं भाग्य का कारक माना जाता है. चंद्रमा धन एवं मानसिक शांति प्रदान करता है तथा सूर्य तेज प्रदान करने का कार्य करते हैं इसलिए यदि विवाह के समय यह ग्रह पूर्ण अनुकूल हों तो वर एवं वधु का आने वाला जीवन सूख पूर्वक व्यतीत होता है.

वधु के लिए गुरु एवं चंद्रमा का बल और पुरुष के लिए सूर्य तथा चंद्रमा के बल का विचार किया जाता है. यह तीनों बल अत्यंत आवश्यक माने जाते हैं. शरीर एवं धन का संबंध पुरुष से बनता है और  बुद्धि का बल ही इन्हें नियंत्रित करने में सक्षम बनता है. इसलिए कन्या के लिए गुरू का बल देखा जाता है क्योंकि शरीर और धन के संवर्धन में गुरु की  महत्वपूर्ण भूमिका होती है. यदि गृहलक्ष्मी का बुद्धि बल श्रेष्ठ है तो गृहस्थ जीवन सुखद रह पाएगा.

गुरू-सूर्य तथा चंद्र विचरण | Analysis of Sun, Moon and Jupiter

त्रिबल विचार के लिए वर-वधु की जन्म राशि से विवाह के समय गुरू-सूर्य तथा चंद्र जिन राशियों में विचरण कर रहे हैं, वहां तक गिनती की जाती है. जैसे पुरूष के लिए सूर्य का विचार करने हेतु देखते हैं कि उसकी चंद्र राशि से वर्तमान राशि में गतिशील सूर्य यदि गिनती करने पर चौथे, आठवें या बारहवें स्थान में आता है तो इस समय विवाह का त्याग करना उचित होता है. यदि पहले, दूसरे, पांचवें, सातवें या नवें स्थान में सूर्य स्थित हो तो सूर्य का दान और पूजादि करके विवाह किया जा सकता है. यदि सूर्य तीसरे, छठे, दसवें या ग्यारहवें स्थान में हों तो विवाह का होना बहुत शुभप्रद माना जाता है.

कन्या की चंद्र राशि से गोचर का गुरू यदि चौथे, आठवें या बारहवें स्थान में भ्रमण कर रहा है तो विवाह नहीं करना चाहिए व ऎसे समय का विवाह के लिए त्याग करना ही उचित होता है. इसके अतिरिक्त यदि पहले, तीसरे, छठे या दशवें स्थान में गुरू हों तो उसकी पूजा एवं दान कराके ही विवाह का विचार शुभकारक होता है. यदि दूसरे, पांचवे, सातवें, नौवें या ग्यारहवें स्थान में गुरू हों तो विवाह करना शुभप्रद माना जाता है.

चंद्र विचार के लिए वर एवं वधु की चंद्र राशि से गोचर का चंद्रमा यदि चौथे, आठवें या बारहवें स्थान में पड़े तो अशुभ माना जाता है. अन्य सभी स्थानों पर चंद्रमा के गोचर को विवाह के लिए शुभ माना जाता है.

सूर्य-चंद्र तथा गुरू तीनों ही विवाह के समय यदि चौथे, आठवें या बारहवें स्थान में भ्रमण कर रहे हों तो अशुभ होते हैं.  इस समय विवाह नहीं करना चाहिए. कुछ ज्योतिषाचार्यों के अनुसार वर के लिए चंद्रमा को बारहवें में शुभ मानते हैं, लेकिन कन्या के लिए बारहवां चंद्रमा पूर्ण रुप से निषिद्ध माना गया है. इसी प्रकार त्रिबल में सूर्य-चंद्र तथा गुरू का विचार करते हुए ग्यारहवां स्थान सर्वथा शुभ माना जाता है.

त्रिबल पूजा विधान | Procedure of Tribal Worship

त्रिबल में वर-वधु की राशि के आधार पर तीनों ग्रहों को देखा जाता है. यदि यह तीनों ग्रह शुभ हैं तो विवाह करना शुभ होता है परंतु यदि किसी ग्रह की शांति की जानी हो तो उस ग्रह की पूजा एवं शांति  के साथ उस ग्रह से संबंधित वस्तुओं का दान करने के पश्चात विवाह किया जा सकता है.

लाल पूजा –  इन ग्रहों से संबंधित पूजा में सूर्य की पूजा को लाल पूजा कहा जाता है.

पीली पूजा – बृहस्पति की पूजा को पीली पूजा कहा जाता है. यदि विवाह में लाल एवं पीली पूजा करना अनिवार्य है तो उक्त पूजा को करने के बाद ही विवाह किया जाना चाहिए. यदि संभव हो तो लाल पूजा करने पर विवाह को कुछ समय के लिए टाल देना ही हितकर व शुभ होता है.

भावी वर एवं वधु की पत्रिका के आधार पर गोचर में ग्रहों की क्या स्थिति है उसे इस सारणी के आधार पर देखा जा सकता है.

त्रिबल पूजा शुद्ध पूज्य नेष्ट
वर की राशि से सूर्य 3, 6, 10, 11 1, 2, 5, 7, 9 4, 8, 12
कन्या की राशि से गुरू 2, 5, 7, 9, 11 1, 3, 6, 10 4, 8, 12
दोनों की राशि से चंद्र 3, 6, 7, 10, 11 1, 2, 5, 9, 11 4, 8
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ज्योतिष में चंद्रमा का महत्व | Importance of Moon in Astrology

ग्रहों में सबसे अधिक गति से चलने वाला चंद्रमा मन का प्रतिनिधित्व करता है. चन्द्र को काल पुरुष का मन कहा गया है. चन्द्र माता ,मन ,मस्तिष्क ,बुद्धिमता ,स्वभाव ,जननेन्द्रियों ,प्रजनन सम्बन्धी रोगों,गर्भाशय  इत्यादि का कारक है . इसके साथ ही चन्द्र व्यक्ति की भावनाओं पर नियन्त्रण रखता है. वह जल तत्व ग्रह है. सभी तरल पदार्थ चन्द्र के प्रभाव क्षेत्र में आती है. इसके अतिरिक्त चन्द्र बाग-बगीचे,  नमक, समुद्री औषधी, परिवर्तन, विदेश यात्रा, दूध, मान आदि को ज्योतिष शास्त्र में चन्द्र से देखा जा सकता है.

चन्द्रमा के मित्र ग्रह सूर्य और बुध है. चन्द्रमा किसी ग्रह से शत्रु संबन्ध नहीं रखता है. चन्द्रमा मंगल, गुरु, शुक्र व शनि से सम संबन्ध रखते है.  चन्द्र कर्क राशि का स्वामी है. चन्द्र वृ्षभ राशि में उच्च स्थान प्राप्त करता है. चन्द्र वृ्श्चिक राशि में होने पर नीच राशि में होते है. चन्द्र ग्रह उत्तर-पश्चिम दिशाओं का प्रतिनिधित्व करता है. चन्द्र का भाग्य रत्न मोती है. चन्द्र ग्रह का रंग श्वेत, चांदी माना गया है. चन्द्र का शुभ अंक 2, 11,  20 है. चन्द ग्रह के लिए दुर्गा, पार्वती और देवी गौरी की उपासना करनी चाहिए.

चन्द्र ग्रह का बीज मंत्र | Moon’s Beej Mantra

चन्द्र ग्रह का बीज मंत्र ” ऊँ स्रां स्रीं स्रौं स: चन्द्रमासे नम: (संकल्प संख्या 11000)

चन्द्र ग्रह का वैदिक मंत्र | Moon’s Vedic Mantra

चन्द्र ग्रह का वैदिक मंत्र इस प्रकार है.

” ऊँ दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णवसम्भवम ।

भाशिनं भवतया भाम्भार्मुकुट्भुशणम।। “

चन्द्र की दान योग्य वस्तुएं चावल, दूध, चांदी, मोती, दही, मिश्री, श्वेत वस्त्र, श्वेत फूल या चन्दन. इन वस्तुओं का दान सोमवार के दिन सायंकाल में करना चाहिए.

चन्द्र राशि के व्यक्ति का व्यक्तित्व | Characteristics of a person having Moon sign

चन्द्र राशि लग्न भाव में हो या चन्द्र जन्म राशि हो, अथवा चन्द्र लग्न भाव में बली अवस्था में हो, तो व्यक्ति को कफ रोग शीघ्र प्रभावित करते है, शरीर की गोलाकार प्रकृ्ति का होता है. मन प्रसन्न कर देने वाली आंखे, विनोदी, अतिकामुक, अस्थिर विचारधारा.

चन्द्रमा से प्रभावित | Some areas influenced by Moon

चन्द्र शरीर में बाईं आंख, गाल, मांस, रक्त बलगम, वायु, स्त्री में दाईं आंख, पेट, भोजन नली, गर्भाशय, अण्डाशय, मूत्राशय. चन्द्र कुण्डली में कमजोर या पिडित हो, तो व्यक्ति को ह्रदय रोग, फेफडे, दमा, अतिसार, दस्त गुर्दा, बहुमूत्र, पीलिया, गर्भाशय के रोग, माहवारी में अनियमितता, चर्म रोग, रक्त की कमी, नाडी मण्डल, निद्रा, खुजली, रक्त दूषित होना, फफोले, ज्वर, तपेदिक, अपच, बलगम, जुकाम, सूजन, जल से भय, गले की समस्याएं, उदर-पीडा, फेफडों में सूजन, क्षयरोग. चन्द्र प्रभावित व्यक्ति बार-बार विचार बदलने वाला होता है.

चंद्रमा के बली और निर्बल रुप का प्रभाव | Effects of a Weak and Strong Moon

जन्म कुंडली में चन्द्रमा यदि अपनी ही राशि में या मित्र, उच्च राशि षड्बली ,शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो चन्द्रमा की शुभता में वृद्धि होती है. जन्म कुण्डली में चंद्रमा यदि मजबूत एवं बली अवस्था में हो तो व्यक्ति समस्त कार्यों में सफलता पाने वाला तथा मन से प्रसन्न रहने वाला होता है. पद प्राप्ति व पदोन्नति, जलोत्पन्न, तरल व श्वेत पदार्थों के कारोबार से लाभ मिलता है. यदि चन्द्रमा कृष्ण पक्ष का नीच या शत्रु राशि में हो तथा अशुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो चंद्रमा निर्बल हो जाता है. ऎसी स्थिति में निद्रा व आलस्य घेरे रहता है व्यक्ति मानसिक रुप से बेचैन, मन चंचलता से भरा रहता है मन में भय व्याप्त रहता है.

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कुण्डली मिलान में दोष परिहार – किन कारणों से आपकी कुण्डली के दोष खत्म होते हैं

वैदिक ज्योतिष में विवाह पूर्व कुंडली मिलान पर बल दिया गया है. कुंडली मिलान के माध्यम से वर-वधु की कुंडलियों का आंकलन किया जाता है ताकि वह जीवनभर एक-दूसरे के पूरक बने रहें. लेकिन वर्तमान समय में केवल यह देखा जाता है कि यह मेरे लिए फायदेमंद रहेगा या नहीं. दुनिया भर के प्रश्न व्यक्ति एक ज्योतिषी के समक्ष रख देते हैं. जबकि कुण्डली मिलान में वर-वधु का आपसी सामंजस्य, विवाह का मांगलिक सुख तथा आने वाला दशाक्रम देखा जाना चाहिए. लेकिन लगता है कि इन सब बातों को आम व्यक्ति की तरह ज्योतिषी भी शायद भूल गये हैं.

कुंडली मिलान को अधिकतर व्यक्ति एक सरसरी निगाह से देखते हैं. उनकी नजर में जितने अधिक गुण मिलते हैं उतने अच्छा होता है जबकि यह पैमाना बिलकुल गलत है. कई बार 36 में से 36 गुण मिलने पर भी वैवाहिक सुख का अभाव रहता है क्योंकि गुण मिलान तो हो गया लेकिन जन्म कुंडली का आंकलन नहीं हुआ. सबसे पहले तो यह देखना चाहिए कि व्यक्ति की अपनी कुंडली में वैवाहिक सुख कितना है? तब उसे आगे बढ़ना चाहिए.

जैसा कि ऊपर बताया गया है कि आजकल आँख मूंदकर यही देखा है कि गुण कितने मिल रहे हैं और जातक मांगलिक है या नहीं. बस इसके बाद सब कुछ तय हो जाता है. यदि हम सूक्ष्मता से अध्ययन करें तो अधिकतर कुंडलियों में गुण मिलान दोषों या मांगलिक दोष का परिहार हो जाता है अर्थात अधिकतर दोष कैंसिल हो जाते हैं लेकिन इतना समय कौन बर्बाद करें. आइए आपको कुछ दोषों के परिहार के विषय में जानकारी देने का प्रयास करते हैं.

कुंडली मिलान में एक से चार नंबर तक के दोषों का कुछ विशेष परिहार नहीं है. मुख्य रुप से गण मिलान से परिहार आरंभ होता है.

गण दोष का परिहार | Cancellation of Gana Dosha

यदि किन्हीं जन्म कुंडलियों में गण दोष मौजूद है तब सबसे पहले कुछ बातों पर ध्यान दें :

  • चंद्र राशि स्वामियों में परस्पर मित्रता या राशि स्वामियों के नवांशपति में भिन्नता होने पर भी गणदोष नहीं रहता है.
  • ग्रहमैत्री और वर-वधु के नक्षत्रों की नाड़ियों में भिन्नता होने पर भी गणदोष का परिहार होता है.
  • यदि वर-वधु की कुंडली में तारा, वश्य, योनि, ग्रहमैत्री तथा भकूट दोष नहीं हैं तब किसी तरह का दोष नहीं माना जाता है.

भकूट दोष का परिहार | Cancellation of Bhakut Dosha

भकूट मिलान में तीन प्रकार के दोष होते हैं. जैसे षडाष्टक दोष, नव-पंचम दोष और द्वि-द्वार्दश दोष होता है. इन तीनों ही दोषों का परिहार भिन्न – भिन्न प्रकार से हो जाता है.

षडाष्टक परिहार | Cancellation of Sashtak

  • यदि वर-वधु की मेष/वृश्चिक, वृष/तुला, मिथुन/मकर, कर्क/धनु, सिंह/मीन या कन्या/कुंभ राशि है तब यह मित्र षडाष्टक होता है अर्थात इन राशियों के स्वामी ग्रह आपस में मित्र होते हैं. मित्र राशियों का षडाष्टक शुभ माना जाता है.
  • यदि वर-वधु की चंद्र राशि स्वामियों का षडाष्टक शत्रु वैर का है तब इसका परिहार करना चाहिए.
  • मेष/कन्या, वृष/धनु, मिथुन/वृश्चिक, कर्क/कुंभ, सिंह/मकर तथा तुला/मीन राशियों का आपस में शत्रु षडाष्टक होता है इनका पूर्ण रुप से त्याग करना चाहिए.
  • यदि तारा शुद्धि, राशियों की मित्रता हो, एक ही राशि हो या राशि स्वामी ग्रह समान हो तब भी षडाष्टक दोष का परिहार हो जाता है.

नव पंचम का परिहार | Cancellation of Navpanchak

नव पंचम दोष का परिहार भी शास्त्रों में दिया गया है. जब वर-वधु की चंद्र राशि एक-दूसरे से 5/9 अक्ष पर स्थित होती है तब नव पंचम दोष माना जाता है. नव पंचम का परिहार निम्न से हो जाता है.

  • यदि वर की राशि से कन्या की राशि पांचवें स्थान पर पड़ रही हो और कन्या की राशि से लड़के की राशि नवम स्थान पार पड़ रही हो तब यह स्थिति नव-पंचम की शुभ मानी गई है.
  • मीन/कर्क, वृश्चिक/कर्क, मिथुन/कुंभ और कन्या/मकर यह चारों नव-पंचम दोषों का त्याग करना चाहिए.
  • यदि वर-वधु की कुंडली के चंद्र राशिश या नवांशपति परस्पर मित्र राशि में हो तब नव-पंचम का परिहार होता है.

द्वि-द्वार्दश योग का परिहार | Cancellation of Dwi-Dwardasha Dosha

  • लड़के की राशि से लड़की की राशि दूसरे स्थान पर हो तो लड़की धन की हानि करने वाली होती है लेकिन 12वें स्थान पर हो तब धन लाभ कराने वाली होती है.
  • द्वि-द्वार्द्श योग में वर-वधु के राशि स्वामी आपस में मित्र हैं तब इस दोष का परिहार हो जाता है.
  • मतान्तर से सिंह और कन्या राशि द्वि-द्वार्दश होने पर भी इस दोष का परिहार हो जाता है.

नाड़ी दोष का परिहार | Cancellation of Nadi Dosha

नाड़ी दोष का कई परिस्थितियों में परिहार हो जाता है. आइए विस्तार से जानें :-

  • वर तथा वधु की एक ही राशि हो लेकिन नक्षत्र भिन्न तब इस दोष का परिहार होता है.
  • दोनों का जन्म नक्षत्र एक हो लेकिन चंद्र राशि भिन्न हो तब परिहार होता है.
  • दोनों का जन्म नक्षत्र एक हो लेकिन चरण भिन्न हों तब परिहार होता है.
  • शास्त्रानुसार नाड़ी दोष ब्राह्मणों के लिए, वर्णदोष क्षत्रियों के लिए, गणा दोष वैश्यों के लिए और योनि दोष शूद्र जाति के लिए देखा जाता है.
  • ज्योतिष चिन्तामणि के अनुसार रोहिणी, मृ्गशिरा, आर्द्रा, ज्येष्ठा, कृतिका, पुष्य, श्रवण, रेवती तथा उत्तराभाद्रपद नक्षत्र होने पर नाड़ी दोष नहीं माना जाता है.
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अष्टकूट मिलान | Ashtakoot Milan | Koot Milan | Guna Milan

वर्ण विचार | Varna Vichar

कर्क, वृश्चिक और मीन राशियों का ब्राह्मण मेष, सिंह और धन राशियों का क्षत्रिय, वृष, कन्या और मकर राशियों का वैश्य और मिथुन , तुला, कुम्भ राशियां शुद्र वर्ण में आती हैं. वर तथा कन्या के वर्ण से उच्च स्तरीय अथवा समान वर्ण होने पर एक गुण मिलता है यदि दोनो में से कोई भी मिलान नहीं हो तो शून्य गण होगा.

यदि वर की राशि का वर्ण कन्या की राशि वर्ण से हीन हो परंतु राशि का स्वामी उत्तम वर्ण का हो तो वर्ण मिलान शुभ माना जाता है.

वश्य विचार | Vasya Vichar

इसमें 12 राशियों को पाँच अलग-अलग भागों में बाँटा गया है. मिथुन, कन्या, तुला तथा धनु राशि का 0 से 15 डिग्री तक का पहला भाग, कुम्भ राशि द्विपद है.

मेष, वृष, धनु का 15 डिग्री से 30 डिग्री तक का बाद का भाग, मकर का 0 से 15 डिग्री तक का पहला भाग चतुष्पाद में आता है. कर्क, मकर राशि का 15 से 30 डिग्री तक का बाद का भाग, मीन राशि जलचर में आती है.

सिंह राशि वनचर में आती है और वृश्चिक राशि कीट मानी जाती है. इस मिलान को 2 अंक प्रदान किए गए हैं. लड़के तथा लड़की का एक ही वश्य होने पर दो अंक मिलते हैं. एक वश्य और दूसरा शत्रु होने पर एक ही अंक मिलता है. एक वश्य और एक भक्षक होने पर आधा अंक मिलता है. एक शत्रु और एक भक्षक होने पर कोई अंक नहीं मिलता.

तारा मिलान | Tara Milan

तारा मिलान तीसरे स्थान पर आता है. इसके तीन अंक होते हैं. इस मिलान में वर तथा कन्या के जन्म नक्षत्रों का एक-दूसरे से आंकलन किया जाता है. वर के नक्षत्र से कन्या के नक्षत्र तक गणना की जाती है. इसी प्रकार कन्या के नक्षत्र से वर के नक्षत्र तक गणना की जाती है. दोनो संख्याओं को को अलग – अलग 9 से भाग किया जाता है और शेष में यदि 3, 5 और 7 बचे तो यह अशुभ तारा मानी जाती है. वर-कन्या के दोनों ताराओं में यदि अशुभ तारा हो तो कोई अंक नहीं मिलता. एक में तारा शुभ और दुसरे में अशुभ हो तो डे़ढ़ अंक मिलत अहै ओर यदि दोनों में तारा शुभ हो तो पूरे तीन अंक मिलते हैं.

योनि विचार | Yoni Vichar

कुण्डली मिलान में अंको के क्रम में इस योनि मिलान को 4 अंक प्राप्त हैं. शास्त्रों में लिखा है कि हम जब जन्म लेते हैं, तब किसी ना किसी योनि को लेकर आते हैं. व्यक्ति के स्वभाव तथा व्यवहार में उसकी योनि की झलक अवश्य दिखाई देती है. नक्षत्रों के आधार पर व्यक्ति की योनि ज्ञात कि जाती है. कई योनियाँ ऎसी हैं जो एक-दूसरे की परम शत्रु होती हैं. जैसे मार्जार (बिल्ली) और मूषक (चूहा), गौ और व्याघ्र यह आपस में महावैर रखते हैं. इनका आपसी तालमेल कभी भी सही नहीं हो सकता है. इसलिए कुण्डली मिलाते समय हमें कोशिश करनी चाहिए कि वर तथा कन्या की योनियों का महावैर नहीं हो.

वर और कन्या की एक ही योनि होना शुभ होता है योनियों में अतिमित्रता हो तो पूरे चार अंक मिलते हैं. मित्र हों तो तीन अंक, सहज प्रकृति समान हो तो दो अंक, सामान्य वैर हो तो एक अंक और अतिशत्रु हों तो कोई अंक नहीं मिलता.

ग्रह मैत्री | Graha Milan

वर तथा वधु की चन्द्र राशियों के स्वामी के आपसि मिलान को ग्रह मैत्री कहा जाता है. वर तथा कन्या की चन्द्र राशियों के स्वामी का आपस में मित्र होना आवश्यक है. दोनों के मित्र होने या एक ही राशि होने पर आपस में विचारों में भिन्नता नहीं रहती है. जीवन की गाडी़ सुचारु रुप से चलाने में सफलता मिलती है. कलह – क्लेश कम होते हैं. दोनों की चन्द्र राशियों के स्वामी यदि आपस में शत्रु भाव रखते हैं तब पारीवारिक जीवन में तनाव रहने की अधिक संभावना रहती है. इस मिलान को पाँच अंक प्रदान किए गए हैं.

वर तथा वधु की एक राशि है या दोनों के राशि स्वामी मित्र है तब पूरे पाँच अंक मिलते हैं.

यदि एक का राशि स्वामी मित्र तथा दूसरे का सम है तब चार अंक मिलते हैं. दोनों के राशि स्वामी सम है तब तीन अंक  मिलते हैं. एक की चन्द्र राशि का स्वामी मित्र तथा दूसरे का शत्रु है तब एक अंक मिलता है. एक सम और दूसरा शत्रु है तब आधा अंक मिलता है. यदि दोनों के राशि स्वामी आपस में शत्रु है तब शून्य अंक मिलता है.

गण मिलान | Gana Milan

गण मिलान वर तथा कन्या के जन्म नक्षत्र के आधार पर उनके गणों का निर्धारण किया जाता है. इस मिलान को ‍छह अंक दिए गए हैं. इस मिलान का भी अत्यधिक महत्व माना गया है. यदि आपका गण देव है और आपके साथी का गण राक्षस है तब आप दोनों के व्यवहार में बहुत भिन्नता होगी. इसी भिन्नता के कारण आपका तालमेल जमने में परेशानी हो सकती है.  27 नक्षत्रों को तीन बराबर भागों में बांटा गया है. इस मिलान में देव गण, मनुष्य गण तथा रा़क्षस गण में 27 नक्षत्रों को बाँटा गया है. एक गण में नौ नक्षत्र आते हैं.

देव गण | Deva Gana

इसमें अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुश्य, हस्त, स्वाति, अनुराधा, श्रवण, रेवती नक्षत्र आते हैं.

मनुष्य गण | Manav Gana

इसमें भरणी, रोहिणी, आर्द्रा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, पूर्वाषाढा़, उत्तराषाढा़, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद नक्षत्र आते हैं.

राक्षस गण | Rakhasa Gana

इसमें कृतिका, आश्लेषा, मघा, चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, मूल, धनिष्ठा, शतभिषा नक्षत्र आते हैं.

वर-कन्या का एक ही गण होने पर छह अंक मिलते हैं विवाह उत्तम माना जाता है. वर का देवग और कन्या का मनुष्य गण हो तो भी छह अंक मिलते है. कन्या का देवगण और वर का मनुष्य गण होने पर पांच अंक मिलते हैं. एक का देव गण और दूसरे का राक्षस गण हो तो कोई अंक नहीं मिलता यह अशुभ माना जाता है.

  • राशि स्वामियों में परस्पर मित्रता हो या राशि नवांशपति में भिन्नता हो तो गणदोष नहीं माना जाता है.
  • ग्रह मैत्री तथा वर एवं कन्या के नक्षत्रों की नाड़ियों में भिन्नता हो तो गणदोष होने पर भी गणदोष नहीं माना जाता है.
  • इसके अतिरिक्त तारा, वश्य, योनि, ग्रह मैत्री तथा भकूट की शुद्धि होने पर कोई दोष नहीं माना जाता.

भकूट विचार | Bhukoot Vichar

इसे राशि कूट भी कहा जाता है. इस मिलान में सात अंक मिलते हैं. भकूट मिलान बहुत ही महत्वपूर्ण होता है. यह वर तथा वधु की चन्द्र राशियों पर आधारित है. इसमें वर तथा वधु की कुण्डलियों में परस्पर चन्द्रमा की स्थिति का आंकलन किया जाता है. वर-कन्या की जन्म राशि परस्पर छठे और आठवें में हो तो षडाष्टक दोष होता है. वर-कन्या की जन्म राशि परस्पर पांचवीं-नौंवी हो तो नव पंचम दोष होता है. यदि दोनों की राशियां परस्पर दूसरी और बारहवीं हो द्विद्वादश दोष बनता है.

वर तथा कन्या की एक ही राशि होने पर पूरे सात अंक मिलते हैं. दोनों के चन्द्रमा एक – दूसरे से परस्पर 1/7, 3/11 अथवा 4/10 अक्ष पर स्थित है तब भी सात अंक मिलते हैं. वर तथा वधु का चन्द्रमा एक – दूसरे से 2/12, 5/9 अथवा 6/8 अक्ष पर स्थित होने पर शून्य अंक मिलता है.

नवपंचम दोष में कन्या का चन्द्रमा वर के चन्द्र से पंचम है तो ज्यादा खराब है. वर सांसारिकता से विमुख हो सकता है.  यदि दोनों में ग्रह मेत्री है तो कुछ ठीक है. यदि कन्या का चन्द्र वर के से नवम भाव में आ रहा है तब कन्या संसार को त्याग सकती है.

षडाष्टक योग में वर तथा वधु के चन्द्र राशियों के स्वामी भी आपस में शत्रुता रखते हैं तब परेशानी और बढ़ सकती हैं. घर में किसी ना किसी रुप में बाधा आती रहती है. धन संबंधी परेशानी व्यक्ति को आये दिन रहती है. अचानक होने वाली घटनाओं का सामना करना पड़ता है. प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष शत्रु किसी ना किसी रुप में परेशान कर सकते हैं.

नाडी़ दोष विचार | Nadi Dosha Vichar

वर तथा वधु की कुण्डलियों में उनके जन्म नक्षत्र के आधार पर उनकी नाड़ियों का वर्गीकरण किया जाता है. नक्षत्रों को तीन भागों में बांटा जाता है. आदि, मध्या तथा अन्त्या नाडी़ ही नाडी़ मिलान या नाडी़ दोष कहलाता है. इसमें वर तथा वधु की नाडी़ एक ही होने पर दोष माना जाता है.

नाडी़ मिलान को सबसे अधिक आठ अंक दिए गए हैं. स्त्री तथा पुरुष की एक ही नाडी़ नहीं होनी चाहिए.

गुण मिलान के क्रम में नाडी़ दोष अंतिम होता है. यह भी अत्यधिक महत्वपूर्ण मिलान जाना जाता है.  इस मिलान को सर्वाधिक आठ अंक दिए गए हैं. इस मिलान के विषय में शास्त्रों में बहुत से मत दिए गए हैं कि यह क्यों आवश्यक है. कई मतानुसार इस मिलान को संतान प्राप्ति के अवश्यक माना जाता है. कई विद्वानों यह भी मत है कि वर तथा वधु की एक सी नाडी़ होने पर उनके भीतर के छिपे कुछ रोग उनकी संतान में प्रकट हो सकते हैं.

नाडी़ मिलान में एक नाडी़ नहीं होनी चाहिए. यदि एक ही नाडी़ है लेकिन नक्षत्र भिन्न हैं तब विवाह कर सकते हैं. जैसे वर तथा वधु की मिथुन राशि होने से उन दोनों की आदि नाडी़ होती है. लेकिन मिथुन राशि में एक का आर्द्रा तथा दूसरे का पुनर्वसु नक्षत्र होने से नाडी़ दोष नहीं होगा.  कई विद्वानों का मत है कि एक नक्षत्र होने पर यदि उनके चरण भिन्न है तब भी नाडी़ दोष नहीं होता है. नाडी़ दोष के अन्तर्गत यदि पुरुष का नक्षत्र स्त्री के नक्षत्र से अगला ही है, तब इसे नृदूर दोष माना जाता है जो नहीं होना चाहिए.

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भद्रा क्या है और ज्योतिष में उसका महत्व है. इस लेख में जानिये

एक हिन्दु तिथि में दो करण होते हैं. जब विष्टि नामक करण आता है तब उसे ही भद्रा कहते हैं. माह के एक पक्ष में भद्रा की चार बार पुनरावृति होती है. जैसे शुक्ल पक्ष की अष्टमी व पूर्णिमा तिथि के पूर्वार्द्ध में भद्रा होती है और चतुर्थी व एकादशी तिथि के उत्तरार्ध में भद्रा होती है.

कृष्ण पक्ष में तृतीया व दशमी तिथि का उत्तरार्ध और सप्तमी व चतुर्दशी तिथि के पूर्वार्ध में भद्रा व्याप्त रहती है.

भद्रा में वर्जित कार्य | Restrictions during Bhadra

मुहुर्त्त  चिंतामणि और अन्य ग्रंथों के अनुसार भद्रा में कई कार्यों को निषेध माना गया है. जैसे मुण्डन संस्कार, गृहारंभ, विवाह संस्कार, गृह – प्रवेश, रक्षाबंधन, शुभ यात्रा, नया व्यवसाय आरंभ करना और सभी प्रकार के मंगल कार्य भद्रा में वर्जित माने गये हैं.

मुहुर्त्त मार्त्तण्ड के अनुसार भद्रा में किए गये शुभ काम अशुभ होते हैं. कश्यप ऋषि ने भद्रा का अति अनिष्टकारी प्रभाव बताया है. उनके अनुसार अपना जीवन जीने वाले व्यक्ति को कोई भी मंगल काम भद्राकाल में नहीं करना चाहिए. यदि कोई व्यक्ति अनजाने में ही मंगल कार्य करता है तब उसके मंगल कार्य के सब फल खतम हो सकते हैं.

भद्रा में किए जाने वाले कार्य | Activities that can be carried out during Bhadra

भद्रा में कई कार्य ऎसे भी है जिन्हें किया जा सकता है. जैसे अग्नि कार्य, युद्ध करना, किसी को कैद करना, विषादि का प्रयोग, विवाद संबंधी काम, क्रूर कर्म, शस्त्रों का उपयोग, आप्रेशन करना, शत्रु का उच्चाटन, पशु संबंधी कार्य, मुकदमा आरंभ करना या मुकदमे संबंधी कार्य, शत्रु का दमन करना आदि कार्य भद्रा में किए जा सकते हैं.

भद्रा का वास | Bhadra’s residence

मुहुर्त्त चिन्तामणि के अनुसार जब चंद्रमा कर्क, सिंह, कुंभ या मीन राशि में होता है तब भद्रा का वास पृथ्वी पर होता है. चंद्रमा जब मेष, वृष, मिथुन या वृश्चिक में रहता है तब भद्रा का वास स्वर्गलोक में रहता है. कन्या, तुला, धनु या मकर राशि में चंद्रमा के स्थित होने पर भद्रा पाताल लोक में होती है.

भद्रा जिस लोक में रहती है वही प्रभावी रहती है. इस प्रकार जब चंद्रमा कर्क, सिंह, कुंभ या मीन राशि में होगा तभी वह पृथ्वी पर असर करेगी अन्यथा नही. जब भद्रा स्वर्ग या पाताल लोक में होगी तब वह शुभ फलदायी कहलाएगी.

भद्रा संबंधी परिहार | Avoidance of Bhadra

  • यदि दिन की भद्रा रात में और रात की भद्रा दिन में आ जाए तब भद्रा का परिहार माना जाता है. भद्रा का दोष पृथ्वी पर नहीं होता है. ऎसी भद्रा को शुभ फल देने वाली माना जाता है.
  • एक अन्य मतानुसार जब उत्तरार्ध की भद्रा दिन में तथा पूर्वार्ध की भद्रा रात में हो तब इसे शुभ माना जाता है. भद्रा दोषरहित होती है.
  • यदि कभी भद्रा में शुभ काम को टाला नही जा सकता है तब भूलोक की भद्रा तथा भद्रा मुख-काल को त्यागकर स्वर्ग व पाताल की भद्रा पुच्छकाल में मंगलकार्य किए जा सकते हैं.


भद्रा पुच्छ और भद्रा मुख जानने की विधि | Procedure to know about Bhadra Pucch and Bhadra Mukh

भद्रा मुख | Bhadra Mukh

मुहुर्त्त चिन्तामणि के अनुसार शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि की पांचवें प्रहर की पांच घड़ियों में भद्रा मुख होता है, अष्टमी तिथि के दूसरे प्रहर के कुल मान आदि की पांच घटियाँ, एकादशी के सातवें प्रहर की प्रथम 5 घड़ियाँ तथा पूर्णिमा के चौथे प्रहर के आदि की पाँच घड़ियों में भद्रा मुख होता है.

ठीक इसी तरह कृष्ण पक्ष की तृतीया के आठवें प्रहर आदि की 5 घड़ियाँ भद्रा मुख होती है, कृष्ण पक्ष की सप्तमी के तीसरे प्रहर में आदि की 5 घड़ी में भद्रा मुख होता है. इसी प्रकार कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि का छठा प्रहर और चतुर्दशी तिथि का प्रथम प्रहर की पांच घड़ी में भद्रा मुख व्याप्त होता है.

भद्रा पुच्छ | Bhadra Pucch

शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि के अष्टम प्रहर की अन्त की 3 घड़ी दशमांश तुल्य, भद्रा पुच्छ कहलाती है. पूर्णिमा की तीसरे प्रहर की अंतिम तीन घटी में भी भद्रा पुच्छ होती है.

पाठकों के लिए एक बात ध्यान देने योग्य यह है कि भद्रा के कुल मान को 4 से भाग देने पर प्रहर आ जाता है, 6 से भाग देने पर षष्ठांश आता है और दस से भाग देने पर दशमांश प्राप्त हो जाता है.

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