कुण्डली में शारदा योग क्या है और क्या होगा उसका प्रभाव

वैदिक ज्योतिष के कई मुख्य योगों की श्रृंखला में शारदा योग भी आता है. शारदा योग के बनने से व्यक्ति भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में तरक्की तथा उन्नति करता है. जैसे लेखक, कवि, राजनेता या अभिनेता आदि बनने के योग अलग होते हैं. जब यह किसी व्यक्ति विशेष की कुंडली में बनते हैं तभी वह कोई विशेष व्यक्ति बन पाता है अन्यथा वह आम जीवन ही बसर करता है.

स्त्रीपुत्रबन्धु सुखरुपगुणानुरक्ता:
भूपप्रिया गुरूमहीसुर देवभक्ता ।
विद्या विनोदरतिशीलतपोबलाढ़्या:
जाता: स्वधर्मनिरता भुवि शारदाख्ये ॥

शारदा योग का निर्माण | Formation of Sharda Yoga

शारदा योग कुण्डली में विशेष परिस्थितियों में बनता है जो इस प्रकार हैं यदि दशम भाव का स्वामी पंचम भाव में स्थित हो तथा बली सूर्य सिंह राशि में हो तो इस योग का निर्माण होता है. इसके अतिरिक्त यदि दशम भाव स्वामि पंचमभाव में हो और बुध व गुरु केन्द्र में स्थित हों तथा सूर्य स्वराशि में स्थित हो तो यह योग बनता है.

शारदा योग में जो भी ग्रह शामिल होते हैं उनका म्नजबूत एवं बली स्थिति में होना आवश्यक माना जाता है और तभी इस योग के प्रभाव भी लक्षित हो पाते हैं. शारदा योग वाले व्यक्ति राज सरकार से सम्मानित होते हैं.  इस योग के जातक धार्मिक, तपस्वी, गुणी तथा विद्वान होते हैं.  धन- धान्य, संतान तथा घर के सुख से सम्पन्न होते हैं.

शारदा योग का प्रभाव | Effect of Sharda Yoga

यदि आपकी कुण्डली में दशमेश पंचमभाव में स्थित है, बुध व गुरु केन्द्र में है और सूर्य  स्वराशि में स्थित है तो शारदा योग जातको को अच्छी उपलब्धियां प्रदान करने वाला होता है. इन परिस्तिथियों में यदि अशुभ ग्रहों का किसी भी प्रकार से समावेश हो रहा हो तो यह योग नहीं बन पाता और जातक इसके शुभ फलों से वंचित रह जाता है.

योग बशारदा योग के निर्माण में बली ग्रहों की विशेष भूमिका होती है. इसमें शामिल ग्रह अपनी मजबूत स्थिति के कारण इस योग को शुभ प्रभाव प्रदान करने वाला बनाते हैं. जातक की कुण्डली में स्थित ग्रह बली होकर शारदा योग का निर्वाह कर सकते हैं. यदि इस योग में शामिल ग्रह में से एक भी ग्रह निर्बल होता है तब यह योग कमजोर होकर फल देने में सक्षम नही होता है.

कुण्डली में इस योग के होने से जातक को माँ शारदा का आशिर्वाद प्राप्त होता है. यदि बुध केन्द्र में हो तो बुद्धि देने वाला होता है और सूर्य के प्रकाश के कारण जातक की बुद्धि शुद्ध और तीव्र होती है. दशम भाव कार्य क्षेत्र को दर्शाता है इसलिए दशमेश पंचम में आने के कारण बुद्धि, व्यापार करने में कुशलता पाता है. जातक का ज्ञान विस्तृत होता है तथा जन उपयोगी बनकर समाज में अपनी अच्छी भूमिका निभाता है. इस योग के बनने से जातक को राजसम्मान की प्राप्ति होती है, सरकार में उच्च पद प्राप्त हो सकता है.

इस योग में जन्म लेने वाले व्यक्ति को स्त्री और पुत्र सुख की प्राप्ति होती है. उसे अपने बंन्धुओं से सुख और सहयोग की प्राप्ति होती है. ऎसा जातक विवेकी, न्यायप्रिय बनता है. शारदा योग के प्रभाव से जातक धार्मिक प्रवृति के व्यक्ति हो सकते हैं. तपस्वी, शुभ गुणों से भरपूर तथा विद्वान व्यक्ति हो सकता है. व्यक्ति धन- धान्य से संपन्न, घर तथा संतान सुख से सुखी होता है तथा मान-प्रतिष्ठा स्थपित करने में सफल हो सकता है.

Posted in Ascendant, Basic Astrology, Hindu Calendar, Planets, Yoga | Tagged , , , , | Leave a comment

गुरू का ज्योतिष में महत्व | Importance of Jupiter in astrology

गुरु (बृहस्पति) ज्योतिष के नव ग्रहों में सबसे अधिक शुभ ग्रह माने जाते हैं. गुरू मुख्य रूप से आध्यात्मिकता को विकसित करने का कारक हैं. तीर्थ स्थानों तथा मंदिरों, पवित्र नदियों तथा धार्मिक क्रिया कलाप से जुडे हैं. गुरु ग्रह को अध्यापकों, ज्योतिषियों, दार्शनिकों, लेखकों जैसे कई प्रकार के क्षेत्रों में कार्य करने का कारक माना जाता है. गुरु की अन्य कारक वस्तुओं में पुत्र संतान, जीवन साथी, धन-सम्पति, शैक्षिक गुरु, बुद्धिमता, शिक्षा, ज्योतिष तर्क, शिल्पज्ञान, अच्छे गुण, श्रद्धा, त्याग, समृ्द्धि, धर्म, विश्वास, धार्मिक कार्यो, राजसिक सम्मान देखा जा सकता है.

गुरु से संबन्धित कार्य क्षेत्र कौन से है | Professions associated with Jupiter

गुरू जीवन के अधिकतर क्षेत्रों में सकारात्मक उर्जा प्रदान करने में सहायक हैं. अपने सकारात्मक रुख के कारण व्यक्ति कठिन से कठिन समय को आसानी से सुलझाने के प्रयास में लगा रहता है. गुरू आशावादी बनाते हैं और निराशा को जीवन में प्रवेश नहीं करने देते हैं. गुरू के अच्छे प्रभाव स्वरुप जातक परिवार को साथ में लेकर चलने की चाह रखने वाला होता है. गुरु के प्रभाव से व्यक्ति को बैंक, आयकर, खंजाची, राजस्व, मंदिर, धर्मार्थ संस्थाएं, कानूनी क्षेत्र, जज, न्यायाल्य, वकील, सम्पादक, प्राचार्य, शिक्षाविद, शेयर बाजार, पूंजीपति, दार्शनिक, ज्योतिषी, वेदों और शास्त्रों का ज्ञाता होता है.

गुरु के मित्र ग्रह सूर्य, चन्द्र, मंगल हैं. गुरु के शत्रु ग्रह बुध, शुक्र हैं, गुरु के साथ शनि सम संबन्ध रखता है. गुरु को मीन व धनु राशि का स्वामित्व प्राप्त है. गुरु की मूलत्रिकोण राशि धनु है. इस राशि में गुरु 0 अंश से 10 अंश के मध्य अपने मूलत्रिकोण अंशों पर होते है. गुरु कर्क राशि में 5 अंश पर होने पर अपनी उच्च राशि अंशों पर होते हैं. गुरु मकर राशि में 5 अंशों पर नीच राशिस्थ होते हैं, गुरु को पुरुष प्रधान ग्रह कहा गया है यह उत्तर-पूर्व दिशा के कारक ग्रह हैं.गुरु के सभी शुभ फल प्राप्त करने के लिए पुखराज रत्न धारण किया जाता है. गुरु का शुभ रंग पिताम्बरी पीला है.  गुरु के शुभ अंक 3, 12, 21 है.  गुरु के अधिदेवता इन्द्र, शिव, ब्रह्मा, भगवान नारायण है.

गुरु का बीज मंत्र | Jupiter’s Beej Mantra

ऊँ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरुवे नम:

गुरु का वैदिक मंत्र | Jupiter’s Vedic Mantra

देवानां च ऋषिणा च गुर्रु कान्चन सन्निभम ।
बुद्यिभूतं त्रिलोकेश तं गुरुं प्रण्माम्यहम ।।

गुरु की दान की वस्तुएं | Donations associated with Jupiter

गुरु की शुभता प्राप्त करने के लिए निम्न वस्तुओं का दान करना चाहिए.  स्वर्ण, पुखराज, रुबी, चना दान, नमक, हल्दी, पीले चावल, पीले फूल या पीले लडडू. इन वस्तुओं का दान वीरवार की शाम को करना शुभ रहता है.

गुरु का जातक पर प्रभाव | Effects of Jupiter

गुरु लग्न भाव में बली होकर स्थित हों, या फिर गुरु की धनु या मीन राशि लग्न भाव में हो, अथवा गुरु की राशियों में से कोई राशि व्यक्ति की जन्म राशि हो, तो व्यक्ति के रुप-रंग पर गुरु का प्रभाव रहता है. गुरु बुद्धि को बुद्धिमान, ज्ञान, खुशियां और सभी चीजों की पूर्णता देता है. गुरू का प्रबल प्रभाव जातक को मीठा खाने वाला तथा विभिन्न प्रकार के पकवानों तथा व्यंजनों का शौकीन बनाता है. गुरू चर्बी का प्रभाव उत्पन्न करता है इस कारण गुरू से प्रभावित व्यक्ति मोटा हो सकता है इसके साथ ही व्यक्ति साफ रंग-रुप, कफ प्रकृति, सुगठित शरीर का होता है.

गुरु के खराब होने पर | Effects of an Inauspicious Jupiter

गुरु कुण्डली में कमजोर हो, या पाप ग्रहों के प्रभाव में हो नीच का हो षडबल हीन हो तो व्यक्ति को गाल-ब्लेडर, खून की कमी, शरीर में दर्द, दिमागी रुप से विचलित, पेट में गडबड, बवासीर, वायु विकार, कान, फेफडों या नाभी संबन्धित रोग, दिमाग घूमना, बुखार, बदहजमी, हर्निया, मस्तिष्क, मोतियाबिन्द, बिषाक्त, अण्डाश्य का बढना, बेहोशी जैसे दिक्कतें परेशान कर सकती हैं. बृहस्पति के बलहीन होने पर जातक को अनेक बिमारियां जैसे मधुमेह, पित्ताशय से संबधित बिमारियों प्रभावित कर सकती हैं. कुंडली में गुरू के नीच वक्री या बलहीन होने पर व्यक्ति के शरीर की चर्बी भी बढने लगती है जिसके कारण वह बहुत मोटा भी हो सकता है. बृहस्पति पर अशुभ राहु का प्रबल व्यक्ति को आध्यात्मिकता तथा धार्मिक कार्यों दूर ले जाता है व्यक्ति धर्म तथा आध्यात्मिकता के नाम पर लोगों को धोखा देने वाला हो सकता है.

Posted in Basic Astrology, Planets, Vedic Astrology | Tagged , , , , | Leave a comment

कुण्डली में त्रिमूर्ती योग कैसे बनता है, और इसका आप पर क्या प्रभाव होगा

ज्योतिष शास्त्र में अनेक प्रकार के योगों के विषय में उल्लेख प्राप्त होता है. कुण्डली में बनने वाले यह योग जातक के जीवन पर अनेक प्रकार से प्रभाव डालते हैं. इन सभी योगों का जातक के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है. इन योगों में कुछ अच्छे कुछ बुरे और कुछ मिले जुले प्रभाव देने वाले होते हैं. इन्हीं प्रमुख योगों में एक योग त्रिमूर्ति योग के नाम से बनता है. ब्रह्मा, विष्णु, और शिव को त्रिमूर्ति योग के नाम से जाना जाता है.

त्रिमूर्ति योग का निर्माण | Formation of Trimurti Yoga

इन त्रिमूर्ति से निर्मित यह योग अपनी सार्थकता को स्वयं ही प्रकट कर देता है. जिसे जानने के लिए किसी अन्य तथ्य को जानने की आवश्यकता नहीं है. कुण्डली मे बनने वाला यह योग कई प्रकार से फलिभूत होता है जैसे द्वितियेश से दूसरे, आठवें और बारहवें भाव में अगर शुभ ग्रह हों तो हरि योग बनता है. सप्तमेश से चतुर्थ, अष्टम व नवम भाव में शुभ ग्रह हों तो शिव योग बनता है. लग्नेश से चतुर्थ, दशम और एकादश भाव में शुभ ग्रह हों तो ब्रह्मा योग बनता है. यदि त्रिमूर्ति योग के बनने में अशुभ ग्रह भी साथ में हैं तो यह योग भंग हो जाता है. हरि योग शिव योग ब्रह्मा योगो में से कोई भी एक योग आपकी कुण्डली में होता है तो सुख एवं समृद्धि की प्राप्ति होती है.

त्रिमूर्ति योग का प्रभाव | Effect of Trimurti Yoga

हरि ,शिव व ब्रह्मा योग संयुक्त रूप से बनने वाला त्रिमूर्ति योग अपने निम्न रुपों में सामने आत अहै जमें इसके प्रत्येक स्वरुप को लिया जाता है. क्योंकि प्रत्येक भाव के अनुरुप में स्थित होने पर यह योग त्रिमूर्ति को भिन्न रुप से दर्शाता है. भिन्न भिन्न रुप होने पर भी यह योग एक ही नाम त्रिमूर्ति योग से जाना जाता है.

त्रिमूर्ति हरि योग | Trimurti Hari Yoga

यह योग जन्म कुंडली में दूसरे, आठवें और बारहवें भाव में शुभ ग्रह स्थित होने पर बनता है. हरि योग शुभ फलों को प्रदान करने वाला होता है. व्यक्ति को जीवन में सम्मान की प्राप्ति होती है. इसकी शुभता संपत्ति और धन प्रदान करने वाली होती है.

त्रिमूर्ति शिव योग | Trimurti Shiva Yoga

जन्म कुंडली में सप्तमेश से चतुर्थ, अष्टम व नवम भाव में यदि शुभ ग्रह हों तो शिव योग का निर्माण होता है. यह यह योग शक्ति एवं उर्जा प्रदान करने वाला होता है. जातक के भितर साहस एवं शौर्य की भावना समाहित रहती है. इसके प्रभाव स्वरूप व्यक्ति विजय एवं सफलता को प्राप्त करता है.

त्रिमूर्ति ब्रह्मा योग | Trimurti Brahma Yoga

जन्म कुंडली में यदि लग्नेश से चतुर्थ, दशम और एकादश भाव में शुभ ग्रह हों तो ब्रह्मा योग बनता है. इस योग के बनने से कर्मों में शुद्धता आती है तथा विद्वता को पाता है. व्यक्ति अपने कार्यों द्वारा समाज में उच्च स्थिति को पाता है. लाभ एवं समृद्धि की प्राप्ति होती है.

कुंडली में यदि त्रिमूर्ति योग बन रहा हो, लेकिन अशुभ ग्रह भी साथ में स्थित हों तो इस स्थिति में यह योग भंग हो जाता है. जन्म कुंडली में हरि योग, शिव योग या ब्रह्मा योग में से कोई भी एक योग आपकी कुण्डली में बन रहा है तो आप धनी, सुखी, विद्वान स्वत: ही हो जाते है.

Posted in Basic Astrology, Varga Kundli, Yoga | Tagged , , , , , | Leave a comment

शनि शांति के ज्योतिष द्वारा आसान उपाय – खुद करें

ज्योतिष शास्त्रों में शनि की व्याख्या अधिक की गई है, शनि की महादशा और शनि की साढेसाती से हर व्यक्ति प्रभावित होता है. शनि  व्यक्ति को जीवन के उच्चतम शिखर या निम्नतम स्तर में बिठा सकते है. ज्योतिष शास्त्र के अलग- अलग ग्रन्थों में शनि का अलग- अलग महत्व दर्शाया गया है. वैदिक ज्योतिष के ग्रन्थों में “वृहत्पराशर होरा शास्त्र”, “जातक तत्वम’, ” फलदीपिका” और इसी प्रकार अन्य ग्रंन्थों में भी शनि के विषय में बहुत कुछ कहा गया है.

सभी ग्रन्थों के मिले-जुले वर्णन के अनुसार शनि बलवान प्रकृति के, कठोर, ग्रह हैं. जब व्यक्ति पर शनि की कृ्पा होती है तो व्यक्ति के पास इतना धन आता है कि वह संभाले नहीं संभलता है. परन्तु जब शनि रुष्ट होते है तो व्यक्ति को एक वक्त का भोजन भी नसीब नहीं होता है.

शनिदेव नौ मुख्य ग्रहों में से एक ग्रह हैं. शनि ग्रह को न्याय का देवता कहा जाता है यह जीवों सभी कर्मों का फल प्रदान करते हैं. इन्हें भृत्य भी कहा गया है. शनि देव महापराक्रमी  न्यायाधीश हैं इनके प्रभाव से कोई अछूता नहीं रहता यह किसी के साथ अन्याय नहीं करते यह स्वभाव से उग्र और हठी  हैं अपने पिता सूर्य से इनके संबंध कभी भी ठीक नहीं रहे.

संक्षेप में कहे तो शनि जब देते है तो छप्पर फाड कर देते है. परन्तु जब वे लेने पर आते है तो व्यक्ति के पास दु:ख के पास कुछ नहीं छोडते है. प्रत्येक व्यक्ति के लिये शनि समान नहीं हो सकते है. शनि की प्रकृ्ति व शनि के प्रभाव से मिलने वाले फल जन्म कुण्डली के ग्रह-योग व महादशा- अन्तर्दशा पर काफी हद तक निर्भर करते है. कुण्डली में शनि निर्बल अवस्था में हो या अपनी पाप स्थिति के कारण अपने पूर्ण फल देने में असमर्थ हों, उन्हें शनिवार संबंधि उपायों को करने का प्रयास करना चाहिए.

शास्त्रों में वर्णित विधियों में से एक प्रमुख उपाय शनि की शांति हेतु रुद्राभिषेक व हनुमानजी की सेवा, हवन आदि करने महत्वपूर्ण होते हैं.

शिव की पूजा एवं अराधना द्वारा शनि देव को प्रसन्न किया जा सकता है. इसके लिए काले तिल एवं कच्चा दूध  प्रतिदिन शिवलिंग पर चढ़ाना चाहिए.

शनिवार के दिन कटोरी में तेल भरकर उसमें अपनी शक्ल देखें तथा उसे दान कर दें ऐसा लगातार हर शनिवार तक करने से शनि देव की कृपा प्राप्त होती है.

काले उड़द भिखारियों को दान करें तथा जल में प्रवाहित करने से शनि देव प्रसन्न होते हैं.

भगवान हनुमान जी की पूजा एवं प्रत्येक शनिवार के दिन सुंदरकांड का पाठ शनि के शांति उपायों में सर्वश्रेष्ठ फल प्रदान करने वाला होता है.

प्रत्येक शनिवार को सोते समय शरीर व नाखूनों पर तेल से मालिश करें. मद्य तथा नशीली चीजों का सेवन न करें.

शनि के बुरे प्रभावों से मुक्ति पाने के लिए आप शनि के लिए दान में दी जाने वाली वस्तुओं में व्यक्ति को अपने वजन के बराबर काले चनों को दान में देना चाहिए इसके अतिरिक्त काले कपडे, जामुन, काली उडद, काले जूते, तिल, लोहा, तेल, नीलम ,कुलथी,काले फ़ूल,कस्तूरी सोना आदि वस्तुओं को शनि के निमित्त दान में दे सकते हैं.

शनि की कृपा एवं शांति प्राप्ति हेतु तिल , उड़द, कालीमिर्च, मूंगफली का तेल, आचार, लौंग, तेजपत्ता तथा काले नमक का उपयोग करना चाहिए.

इसके अतिरिक्त जिन व्यक्तियों की कुण्डली में शनि की साढेसाती, शनि की ढैय्या या फिर शनि की महादशा, अन्तर्दशा चल रहीं, उन व्यक्तियों के लिये शनि व्रत को करना विशेष रुप से कल्याणकारी रहता है. शनिवार के व्रत को करने से जोडों के दर्द, कमर दर्द, स्नायु विकार में राहत मिलती है. यह मानसिक चिन्ताओं में कमी कर व्यक्ति को आशावादी बनाता है. ऐसे कई उपायों द्वारा शनि के अशुभ प्रभावों से बचा जा सकता है.

Posted in Ascendant, Basic Astrology, Dashas, Planets, Rashi, Remedies | Tagged , , , , | Leave a comment

मूल नक्षत्र क्या है और उससे आपके जीवन पर क्या प्रभाव होगा, जानिये

अश्वनी ,आश्लेषा ,मघा ,ज्येष्ठा ,मूल तथा रेवती  नक्षत्र  गण्डमूल नक्षत्र कहे जाते हैं. यह नक्षत्र संधि क्षेत्र में आने से  दुष्परिणाम देने वाले माने जाते हैं. इन नक्षत्रों में जन्म लेने वाले बच्चों के सुखमय भविष्य के लिए इन नक्षत्रों की शांति करवानी आवश्यक मानी गई है. मूल शांति कराने से इनके कारण लगने वाले दोष शांत हो जाते हैं. अन्यथा इनके अनेक प्रभाव लक्षित होते हैं जो इस प्रकार से प्रभावित कर सकते हैं. अश्वनी  नक्षत्र के पहले चरण  में जन्म हो तो पिता को कष्ट तथा अन्य चरणों में शुभ होता है.

आश्लेषा नक्षत्र के पहले चरण  में जन्म हो तो शुभ ,दूसरे में धन हानि ,तीसरे में माता को कष्ट तथा चौथे में पिता को कष्ट होता है. यह फल पहले दो  वर्षों में ही मिल जाता है.

मघा नक्षत्र के पहले चरण  में जन्म हो तो माता के पक्ष को हानि ,दूसरे में पिता को कष्ट तथा अन्य चरणों में शुभ होता है.

ज्येष्ठा नक्षत्र के पहले चरण  में जन्म हो तो बड़े भाई को कष्ट ,दूसरे में छोटे भाई को कष्ट, तीसरे में माता को कष्ट तथा चौथे में पिता को कष्ट होता है. यह फल पहले वर्ष में ही मिल जाता है. ज्येष्ठा नक्षत्र एवम मंगलवार के योग में उत्पन्न कन्या अपने भाई के लिए घातक होती है.

मूल नक्षत्र के पहले चरण  में जन्म हो तो पिता को कष्ट दूसरे में माता को कष्ट तीसरे में धन हानि तथा चौथे में शुभ होता है. मूल नक्षत्र व रवि वार के योग में उत्पन्न कन्या अपने ससुर का नाश करती है. यह फल पहले चार वर्षों में ही मिल जाता है.

मूल नक्षत्रों की शांति उपाय | Remedies for Mool nakshatra shanti

जन्म नक्षत्र के अनुसार देवता का पूजन करने से अशुभ फलों में कमी आती है तथा शुभ फलों की प्राप्ति में सहायता प्राप्त होती है. यदि आप अश्विनी, मघा, मूल नक्षत्र में जन्में हैं तो आपको गणेश जी का पूजन करना चाहिए. इस नक्षत्र में जन्में व्यक्तियों को माह के किसी भी एक गुरुवार या बुधवार को धूसर रंग के वस्त्र, लहसुनिया आदि में से किसी भी एक वस्तु का दान करना फलदायी रहता है. आपको मंदिर में झंडा फहराने से भी लाभ मिल सकता है.

यदि आप आश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती नक्षत्र में जन्में हैं तो आपके लिए बुध का पूजन करना फलदायी रहता है. इस नक्षत्र में जन्में व्यक्तियों को माह के किसी भी एक बुधवार को हरी सब्जी, हरा धनिया, पन्ना, कांसे के बर्तन, आवला आदि वस्तुओं में से किसी भी एक वस्तु का दान करना शुभकारी रहता है.

मूल शांति पूजा | Mool shanti worship

उपरोक्त उपायों के अतिरिक्त जो उपाय सबसे अधिक प्रचलन में है, उसके अनुसार यदि बच्चा गण्डमूल नक्षत्र में जन्मा है तब उसके जन्म से ठीक 27वें दिन उसी जन्म नक्षत्र में चंद्रमा के आने पर गंडमूल शांति पूजा करानी चाहिए. ज्येष्ठा मूल या अश्विनी नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक के लिउक्त नक्षत्रों से संबंधित मंत्रों का जाप करवाना चाहिये तथा मूल नक्षत्र शान्ति पूजन करना चाहिए तथा ब्राह्मणों को दान दक्षिणा एवं भोजन कराना चाहिए. यदि किसी कारणवश 27वें दिन यह पूजा नहीं कराई जा सकती तब माह में जिस दिन चंद्रमा जन्म नक्षत्र में होता है तब इसकी शांति कराई जा सकती है.

Posted in Remedies, Vedic Astrology | Tagged , , , , , | 17 Comments

कुण्डली से जाने संतान सुख का योग | Yogas for a Child in a kundali

कुण्डली में स्थित ग्रहों कि स्थिति के द्वारा संतान सुख के विषय में जाना जा सकता है. किसी की कुण्डली में ग्रहों की ऐसी स्थिति होती है जो उन्हें कई संतानों का सुख देती है. तो किसी कि कुण्डली संतान में बाधा को दर्शाती है. ग्रहों कि उपरोक्त स्थिति अनेक कारणों से बनती है जिसे हम कुछ उदाहरणों द्वारा समझ सके हैं:-

जन्म लग्न एवं चन्द्र लग्न से पंचम भाव के स्वामी और बृहस्पति अगर शुभ स्थान पर विराजमान हैं तो इस शुभ ग्रह स्थिति में आप संतान सुख प्राप्त करते हैं.

यदी कुण्डली में पंचम भाव का स्वामी गुरू बलीअवस्था में हो और लग्नेश की गुरू पर दृष्टि हो तो होने वाली संतान आज्ञाकारी होती है.

संतान सुख के विषय में ज्योतिषशास्त्र की यह भी मान्यता है कि पंचमेश अगर स्वगृही हो और साथ ही शुभ ग्रह अथवा सुखेश व भाग्येश की पूर्ण दृष्टि हो तो यह संतान प्राप्ति के लिए अनुकूल ग्रह स्थिति मानी जाती है.

कुण्डली में यदि पंचमेश बली होकर लग्न , पंचम, सप्तम अथवा नवम भाव में स्थित हो तथा कोई भी पापी ग्रह क अप्रभाव उस पर नहीं हो तो संतान सुख प्राप्त होता है.

संतान प्राप्ति के संदर्भ में माना जाता है कि कुण्डली में बृहस्पति अगर मजबूत व प्रबल हो साथ ही लग्न का स्वामी पंचम भाव में मौजूद हो तो यह संतान कारक कहलाता है.

एकादश भाव में बुध, शुक्र, अथवा चंद्र में से एक भी ग्रह हो तो संतान का सुख मिलता है. इसी प्रकार पंचम भाव में यदि मेष, वृष अथवा कर्क राशि में केतु हो तो संतान योग की संभावना बनती है.

लग्नेश व नवमेश यदि कुण्डली में सप्तम भाव में होते हैं तो संतान सुख प्राप्त होता है. लग्नेश और पंचमेश के उच्च राशि में होने पर भी शुभ परिणाम मिलता है. इसी प्रकार लग्नेश पर बृहस्पति की शुभ दृष्टि भी मंगलकारी होती है.

कुण्डली में केन्द्र स्वामी त्रिकोणगत होते हैं तो संतान योग अच्छा बनता है. इसी प्रकार नवम भाव में गुरू, शुक्र एवं पंचमेश हो तो उत्तम संतान का योग बनता है.

कुण्डली में लग्न से पंचम भाव शुक्र अथवा चन्द्रमा के वर्ग में हों तथा शुक्र और चन्द्रमा से युक्त हों उसके कई संतानें होती हैं. परंतु इस स्थिति में अशुभ ग्रहों की दृष्टि एवं युति परिणाम में बाधा डाल सकती है.

पंचमेश या लग्नेश जब पुरूष ग्रह के वर्ग में होते हैं और पुरूष ग्रह द्वारा देखे जाते हैं तब संतान की प्राप्ति होती है. पंचमेश और राहु की युति होने पर राहु की अन्तर्दशा में संतान की प्राप्ति का योग बन सकता है. .

पंचम भाव में अगर वृष, सिंह, कन्या अथवा वृश्चिक राशि सूर्य के साथ हों एवं अष्टम भाव में शनि और लग्न स्थान पर मंगल विराजमान हों तो संतान सुख विलम्ब से प्राप्त होता है.

इसी प्रकार की स्थिति तब होती है जब एकादश भाव में राहु हो और पंचम भाव ग्रह विहीन हो.दशम भाव मे बृहस्पति, शुक्र, चन्द्र हो तथा पंचम भाव में राहु, शनि तथा सूर्य तो संतान सुख में देरी होती है.

यहां हम पंचम भाव को अधिक महत्ता देते हैं क्योंकि पंचम भाव संतान भाव भी कहलाता है ओर इसी भाव से प्रथम गर्भ से संबंधित विचार भी किए जाते हैं. पंचम भाव का कारक ग्रह गुरु है. गुरु इस भाव का कारक होकर संतान, ज्ञान, सम्मान देता है. पंचम भाव विशेष रुप संतान प्राप्ति के लिए देखा जाता है. इस योग की अशुभता से व्यक्ति को अपनी संतान से वियोग का सामना भी करना पड सकता है.

पंचमेश और अष्टमेश का परिवर्तन योग व्यक्ति की संतान के लिए शुभ योग नहीं है. यह योग व्यक्ति की संतान को मिलने वाले पैतृक सम्पति को प्रभावित करता है. व्यक्ति को अपने जीवन में स्वयं के द्वारा किए गये कार्यो से अप्रसन्नता होती है. साथ ही यह योग व्यक्ति के स्वास्थय को भी प्रभावित करता है.

Posted in Basic Astrology, Dashas, Planets, Rashi, Remedies, Vedic Astrology, Yoga | Tagged , , , , | 550 Comments

बुध ग्रह आपके लिये फलदायी होगा या नहीं, अपनी कुण्डली स्वयं देखिये

वैदिक ज्योतिष के अनुसार बुध ग्रह रजो गुण वाले हैं और वाणी का प्रतिनिधित्व करते हैं. बुध शांत एवं सौम्य प्रवृत्ति के ग्रह हैं. बुध ग्रह के अधिदेवता एवं प्रत्यधिदेवता भगवान विष्णु हैं तथा इनकी महादशा 17 वर्ष की होती है. बुध की विशेषता है कि यह दूसरे ग्रहों के गुणों को ग्रहण कर उसी के अनुरूप फल देते हैं. बुध मुख्य रूप से वायु तत्व का प्रतिनिधित्व करता है. कुंडली में बुध का प्रबल प्रभाव जातक को व्यवहार कुशल तथा कुटनीतिज्ञ बनाता है. बुध की विशेषताओं में बुद्धिमता, शिक्षा, मित्र, व्यापार और व्यवसाय, गणित, वैज्ञानिक, ज्ञान प्राप्त करना, निपुणता, वाणी, प्रकाशक, छापने का कार्य, पढाने वाला, फूल, मामा और मामी, लेखविद्या, लिपिक, भतीजे, दत्तक पुत्र, मोती, हंसी-मजाक, वाकपटुता, हाजिर जवाब आदि गुण आते है.

सूर्य और शुक्र, बुध के मित्र ग्रह हैं तथा बुध, चन्द्रमा को अपना शत्रु मानता है. बुध शनि, मँगल व गुरु से सम सम्बन्ध रखता है. बुध मिथुन व कन्या राशि का स्वामी है. बुध कन्या राशि में 15 अंश से 20 अंश के मध्य होने पर अपनी मूलत्रिकोण राशि में होता है. बुध कन्या राशि में 15 अंश पर उच्च स्थान प्राप्त करता है. बुध मीन राशि में होने पर नीच राशि में होता है. बुध को पुरुष व नपुंसक ग्रह माना गया है तथा यह उत्तर दिशा के स्वामी हैं. बुध का शुभ रत्न पन्ना, सुलेमानी है इनका प्रिय रंग हरा और भूरा है और बुध के शुभ अंक 5, 14, 23 हैं.

बुध से संबंधित कार्य | Profession related to Mercury

ज्योतिष में बुध ग्रह को मुख्य रूप से वाणी और बुद्धि का कारक माना जाता है. बुध के प्रभावस्वरुप व्यक्ति बुद्धिमान एवं वाणी द्वारा प्रभावित करने की क्षमता रखने वाला होता है. बुध की वाणी तथा व्यवहार आम तौर पर अवसर के अनुकूल ही होता है इसके कारण जातक बुद्धि तथा वाणी के बल पर अपना काम योग्यता पूर्वक करने वाला होता है. बुध वाणी, तेज गणना तथा बुद्धि कौशल के द्वारा दूसरे लोगों की अपेक्षा जल्दी ही उन्नती पाता है. वकील, पत्रकार, सलाहकार, अनुसंधान जैसे क्षेत्रों से जुड़े कार्यों में आछा करता है. अकाउंटेंट, साफ्टवेयर इंजीनियर, राजनीतिज्ञ, राजनयिक, अध्यापक, लेखक, ज्योतिषि तथा ऐसे ही अन्य व्यवसाय तथा उनसे जुड़े लोग बुध से प्रभावित होते हैं.

बुध का बीज मंत्र | Beej Mantra of Mercury

” ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम: “

बुध का वैदिक मंत्र | Vedic Mantra of Mercury

प्रियंगुकलकाशमं रूपूणाप्रतिमं बुधम ।
सौम्यम सौम्यगुणोपेतं व बुधं प्रणामाम्यहम ।।

बुध ग्रह से प्रभावित व्यक्ति | Characteristics of a person influenced by Mercury

जिस व्यक्ति की कु्ण्डली में बुध ग्रह की राशि मिथुन या कन्या लग्न भाव में हो, अथवा बुध लग्न भाव में बली अवस्था में हो, या फिर व्यक्ति की जन्म राशि बुध की राशि हो, तो व्यक्ति के व्यक्तित्व पर बुध का प्रभाव होता है. बुध से प्रभावित व्यक्ति सुगठित शरीर वाला, बडा शरीर, मृ्दु भाषा, हंसी मजाक, विनोदी स्वभाव का होता है.

बुध शरीर में पित्त, वायु, बलगम, गुदा, जांघे, त्वचा, नाडी प्रणाली का कारक है. बुध के कमजोर या पिडित होने पर व्यक्ति को दिमाग और बोलने के अंगों में असन्तुलन हो सकता है. बुध दिमागी रोग देता है. मानसिक रोग, नपुंसकता, ज्वर, खुजली, हड्डियों का चटकना, जवर, चक्कर आना, गर्दन में दर्द, बवासीर, अपच, जिगर, पेट, आंन्तों की समस्याएं प्रभावित कर सकती हैं. बुध के अशुभ प्रभावों से बचने के लिए बुध संबंधित वस्तुओं का दान कर सकते हैं. इनकी दान योग्य वस्तुओं में हाथी दान्त, चीनी, हरा वस्त्र, हरे फूल, मूंग की दाल, कपूर, तारपीन का तेल. बुधवार को सूर्य उदय से पहले दान करना चाहिए.

बुध के अच्छे और बुरे प्रभाव | Auspicious and Inauspicious effects of Mercury

जन्म कुंडली में बुध यदि स्व राशि में हो या मित्र राशि में हो अथवा उच्च राशि  का ,शुभ भावाधिपति, शुभ दृष्ट से युक्त हो तो अच्छे फल देने वाला होता है. बुध की शुभता से जातक को यश की प्राप्ति होती है जातक की वाणी में प्रभाव होता है, बुद्धिमत्ता का गुण विद्यमान होता है. व्यक्ति परीक्षाओं में सफलता ,हास्य-विनोद करने वाला होता है अनेक क्षेत्रों में सफलता ,व्यापार में लाभ ,प्राप्ति होती है. लेखकों,कलाकारों,ज्योतिषियों,शिल्पकारों के बुध का होना अच्छा माना जाता है. परंतु यदि बुध अस्त ,नीच का शत्रु राशि में पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो  निर्बल बनकर  विवेक कि कमी ,विद्या में बाधा, दुख एवं तकलीफ का कारण बनता है. कार्यों में बाधा, कलह, त्रिदोष विकार ,बोलने में दिक्कतें तथा वाणी का अशुद्ध होना इत्यादि से कष्ट देता है.

Posted in Ascendant, Planets, Vedic Astrology | Tagged , , , , , | 3 Comments

आपका कौन सा ग्रह बली है? राशि और ग्रहबल के बारे में जानिये

ज्योतिष में ग्रहों और राशियों को अनेक प्रकार के बल प्राप्त हैं. इन बलों के आधार पर ग्रहों एवं राशियों की स्थिति एवं उसके अच्छे एवं बुरे प्रभावों को जाना जा सकता है. वैदिक ज्योतिष में ग्रहों और राशियों के बलों को निम्न प्रकार से बांटा गया है जो इस प्रकार हैं स्थान बल, दिग्बल, काल बल, नैसर्गिक बल, चेष्टा बल और दृगबल, चर बल, स्थिर बल और दृष्टि बल हैं

चर बल क्या है | Char Bal

ज्योतिष में राशियों के बल को मुख्य आधार माना जाता है. ज्योतिष में तीनों वर्गों की राशियों के लिए कुछ अंक निर्धारित किए गए हैं. जैसे चर राशियाँ को 20 षष्टियाँश अंक मिलेगें, स्थिर राशियों को 40 षष्टियाँश अंक मिलेगें, द्वि-स्वभाव राशियों को 60 षष्टियाँश अंक मिलेगें. इन अंक बल के आधार पर द्वि-स्वभाव राशियों को सबसे अधिक अंक मिलते हैं. इस प्रकार यह राशियाँ सबसे अधिक बली हो जाती हैं.

स्थिर बल क्या है | Sthir Bal

बल में एक अन्य बल स्थिर बल कहलाता है. इस बल के लिए राशियों में बैठे ग्रह को देखा जाता है. जिस राशि में कोई ग्रह स्थित है तो उस राशि को 10 अंक प्राप्त होते हैं. यदि किसी राशि में दो ग्रह बैठे हैं तब उस राशि को 20 अंक प्राप्त हो जाएंगें. जिस राशि में कोई ग्रह नहीं है उस राशि को शून्य अंक प्राप्त होगा. जैसे चर दशा के पाठ दो की उदाहरण कुण्डली में कुम्भ राशि में पाँच ग्रह हैं तो कुम्भ राशि को 50 अंक प्राप्त होगें और जिन राशियों में कोई ग्रह नहीं है उनमें बल कम होता है.

दृगबल | Drig Bal

जिन दृष्ट ग्रहों के ऊपर शुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ रही हो, तो उक्त ग्रह शुभ ग्रह दृष्टि के बल को पाकर दृगबली होते हैं. ग्रहों के एक अन्य बल दृष्टि बल कहलाता है. दृष्टि बल में ग्रहों की दृष्टियों के आधार पर बल की गणना की जाती है. ग्रहों का बल जानने के लिए जिन मुख्य बलों से विचार किया जाता है उनमें से एक है दृग बल भी है. ग्रह की दृष्टि किस प्रकार से ग्रह विशेष के लिए कैसी ही यह इन्हीं बलों के अधार पर किया जाता है.

ग्रह यदि किसी विशेष ग्रह को पूर्ण या शुभ दृष्टि से देखता है तो यह जातक के लिए शुभ स्थिति कही जाती है इसके विपरीत जब ग्रह की दृष्टि अशुभ होती है तो जातक को कई प्रकार की परेशानी और नुकसान का सामना करना पड़ता है. दृग बल ऐसा बल है जो ग्रहों को एक दूसरे की दृष्टि से प्राप्त होता है. दृष्टिबल का आंकलन करते समय यह देखा जाता है कि गोचर में ग्रह किसी ग्रह विशेष को कितने समय तक किस डिग्री से देख रहा है. दृष्टिबल में ग्रहों का बल डिग्री से देखा जाता है यह महत्वपूर्ण होता है.

स्थान बल | Sthan Bal

स्थान बल के अंतर्गत ग्रह स्वग्रह, उच्च ग्रह, मित्र ग्रह और मूल त्रिकोण का होता है. जैसे सूर्य, चंद्रमा सम राशियों जैसे मेष, सिंह, वृष, कर्क राशि में स्थित होने पर स्थान बली होते हैं. इन के साथ बैठकर ग्रह बलवान हो जाते हैं.

काल बल | Kaal Bal

इस बल के अनुसार व्यक्ति का जन्म दिन के किस समय हुआ है जै से यदि किसी व्यक्ति का जन्म दिन के समय हुआ है तो तब सूर्य, और शुक्र ग्रह कालबली माने जाएंगे. और यदि रात्री में हुआ है तो चंद्रमा, शनि और मंगल ग्रहों को काल बली कहा जाएगा. गुरू ओर बुध सदैव बली माने जाते हैं.

नैसर्गिक बल | Naisargik Bal

नैसर्गिक बल के अन्तर्गत विभिन्न ग्रहों की स्थिति पर तो इस बल के अन्तर्गत क्रमागत रूप से सबसे पहले सूर्य आते हैं फिर चन्द्रमा, शुक्र, बृहस्पति, बुध, मंगल और सबसे अंत में शनि ग्रह आता है. इस बल के अन्तर्गत इन्हीं सात ग्रहों का विचार किया जाता है. नैसर्गिक बल के अनुसार एक ग्रह अन्य ग्रह से अधिक बली होता है उदाहरण स्वरुप शुक्र से चंद्र अधिक बली होगा और चंद्रमा से सूर्य ग्रह अधिक बली माना जाता है.

चेष्टा बल | Cheshta Bal

किसी ग्रह को सूर्य की परिक्रमा करने से जो बल प्राप्त होता है. इस प्रकार जो बल प्राप्त होता है. उसे चेष्टा बल कहते है.मकर से मिथुन राशि तक किसी भी राशि में रहने पर सूर्य तथा चंद्रमा चेष्टा बली होते हैं. इसी प्रकार  मंगल, बुध, गुरू, शुक्र, शनि यह ग्रह चंद्रमा के साथ होने पर चेष्टा बली माने जाते हैं.

Posted in Basic Astrology, Planets, Rashi, Remedies, Signs, Vedic Astrology | Tagged , , , , , | 1 Comment

कुंडली कैसे मिलायें? अपनी कुंडली स्वयं मिलाएं इस तरीके से

हिन्दू धर्म में विवाह करने से पूर्व वर-वधू दोनों की कुण्डलियों का मिलान किया जाता है. कुण्डली मिलान में बहुत सी बातों का विचार किया जाता है जिसमें से मांगलिक योग, अष्टकूट मिलान तथा दशाक्रम इत्यादि को देखा जाता है.

मांगलिक योग | Manglik Yoga

कुण्डली के अन्य योगों की तरह यह भी एक योग है. यदि मांगलिक योग के व्यक्ति का विवाह किसी मांगलिक व्यक्ति से ही कर दिया जाए तो सब कुछ सामान्य रहता है. उत्तर भारतीय पद्धति के अनुसार कुण्डली के 1, 4, 7, 8 अथवा 12 वें भाव में मंगल ग्रह की उपस्थिति व्यक्ति को मांगलिक बनाती है. तो दूसरी ओर दक्षिणी भारतीय पद्धति में 1, 2, 4, 7, 8 अथवा 12वें भाव में मंगल के होने से व्यक्ति मांगलिक बनता है.

गुण मिलान | Gun MIlan

इस प्रक्रिया में आठ प्रकार के गुणों अथवा अष्टकूट का मिलान वर तथा वधु की कुण्डलियों में किया जाता है.अष्टकूट मिलान में सभी आठों गुणों को उनके महत्व के आधार पर अंक प्रदान किए गए हैं. यह आठ गुण निम्न हैं  वर्ण मिलान, वश्य मिलान, तारा मिलान, योनि मिलान, ग्रह मैत्री, गण मिलान, भकूट मिलान और नाडी़ मिलान  होत है. इस अष्टकूट मिलान के कुल 36 अंक होते हैं. अच्छे वैवाहिक जीवन के लिए कम से कम 18 गुण मिलने अनिवार्य माने गए हैं. गुण मिलान के जितने अंक बढ़ते जाएंगे, उतना  ही दाम्पत्य जीवन सुखी माना गया है.

नाडी़ मिलान | Nadi Milan

वर तथा वधु की कुण्डलियों में उनके जन्म नक्षत्र के आधार पर उनकी नाड़ियों का वर्गीकरण किया जाता है. मुख्य रुप से 27 नक्षत्रों को तीन भागों में बांटा जाता है. आदि, मध्या तथा अन्त्या नाडी़ ही नाडी़ मिलान या नाडी़ दोष कहलाता है. इसमें वर तथा वधु की नाडी़ एक ही होने पर दोष माना जाता है.

नाडी़ तीन प्रकार की होती हैं – आदि नाडी़, मध्या नाडी़ और अन्त्या नाडी़. नाडी़ मिलान को सबसे अधिक 8 अंक दिए गए हैं. स्त्री तथा पुरुष की एक ही नाडी़ नहीं होनी चाहिए.

गुण मिलान के क्रम में नाडी़ दोष हमारा अंतिम पडा़व है. यह भी अत्यधिक  महत्वपूर्ण मिलान जाना जाता है.  इस मिलान को सर्वाधिक आठ अंक दिए गए हैं. इस मिलान में वर तथा वधु की कुण्डलियों को उनके जन्म नक्षत्र के आधार पर मिलाया जाता है. इस मिलान के विषय में शास्त्रों में बहुत से मत दिए गए हैं कि यह क्यों आवश्यक है. कई मतानुसार इस मिलान को संतान प्राप्ति के अवश्यक माना जाता है. कई विद्वानों यह भी मत है कि वर तथा वधु की एक सी नाडी़ होने पर उनके भीतर के छिपे कुछ रोग उनकी संतान में प्रकट हो सकते हैं.

नाडी़ मिलान में एक नाडी़ नहीं होनी चाहिए. यदि एक ही नाडी़ है लेकिन नक्षत्र भिन्न हैं तब आप विवाह कर सकते हैं. जैसे वर तथा वधु की मिथुन राशि होने से उन दोनों की आदि नाडी़ होती है. लेकिन मिथुन राशि में एक का आर्द्रा तथा दूसरे का पुनर्वसु नक्षत्र होने से नाडी़ दोष नहीं होगा.  कई विद्वानों का मत है कि एक नक्षत्र होने पर यदि उनके चरण भिन्न है तब भी नाडी़ दोष नहीं होता है. नाडी़ दोष के अन्तर्गत यदि पुरुष का नक्षत्र स्त्री के नक्षत्र से अगला ही है, तब इसे नृदूर दोष माना जाता है. यह नहीं होना चाहिए.

Posted in Basic Astrology, Love Relationships, Marriage, Rashi, Remedies, Signs, Varga Kundli, Vedic Astrology | Tagged , , , , , , | Leave a comment

उत्तरायण और दक्षिणायन | Uttarayan and Dakshinayan

हिंदु पंचांग के अनुसार एक वर्ष में दो अयन होते हैं. अर्थात एक साल में दो बार सूर्य की स्थिति में परिवर्तन होता है और यही परिवर्तन या अयन ‘उत्तरायण और दक्षिणायन’ कहा जाता है. कालगणना के अनुसार जब सूर्य मकर राशि से मिथुन राशि तक भ्रमण करता है, तब यह तक के समय को उत्तरायण कहते हैं. यह समय छ: माह का होता है. तत्पश्चात जब सूर्य कर्क राशि से सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, और धनु राशि में विचरण करता है तब इस समय को दक्षिणायन कहते हैं. इस प्रकार यह दोनो अयन 6-6 माह के होते हैं.

शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायन को नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है. इन दिनों में किए गए जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व होता है. इस अवसर पर किया गया दान सौ गुना फल प्रदान करता है. सौरमास का आरम्भ सूर्य की संक्रांति से होता है. सूर्य की एक संक्रांति से दूसरी संक्रांति का समय सौरमास कहलाता है. सौर-वर्ष के दो भाग हैं- उत्तरायण छह माह का और दक्षिणायन भी छह मास का होता है.

उत्तरायण | Uttarayan

मकर संक्रांति के दिन सूर्य उत्तरायण होता है. उत्तरायण के समय दिन लंबे और रातें छोटी होती हैं. जब सूर्य उत्तरायण होता है तो तीर्थ यात्रा व उत्सवों का समय होता है. उत्तरायण के समय पौष-माघ मास चल रहा होता है. उत्तरायण को देवताओं का दिन कहा जाता है , इसीलिए इसी काल में नए कार्य, गृह प्रवेश , यज्ञ, व्रत – अनुष्ठान, विवाह, मुंडन जैसे कार्य करना शुभ माना जाता हे.

दक्षिणायन | Dakshinayan

दक्षिणायन का प्रारंभ 21/22 जून से होता है. 21 जून को जब सूर्य उत्तरायण से दक्षिणायन होता है. धार्मिक मान्यता अनुसार दक्षिणायन का काल देवताओं की रात्रि है. दक्षिणायन समय रातें लंबी हो जाती हैं और दिन छोटे होने लगते हैं. दक्षिणायन में सूर्य दक्षिण की ओर झुकाव के साथ गति करता है.

दक्षिणायन व्रतों एवं उपवास का समय होता है. दक्षिणायन में विवाह, मुंडन, उपनयन आदि विशेष शुभ कार्य निषेध माने जाते हैं परन्तु तामसिक प्रयोगों के लिए यह समय उपयुक्त माना जाता है. सूर्य का दक्षिणायन होना इच्छाओं, कामनाओं और भोग की वृद्धि को दर्शाता है. इस कारण इस समय किए गए धार्मिक कार्य जैसे व्रत, पूजा इत्यादि से रोग और शोक मिटते हैं

उत्तरायण और दक्षिणायण का महत्व | Importance of Uttarayan and Dakshinayan

हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार सूर्य का दक्षिणायन से उत्तरायण में प्रवेश का पर्व ‘मकर संक्रांति’ है.  साल भर की छ: ऋतुओं में से तीन ऋतुएं शिशिर, बसन्त और ग्रीष्म ऋतुएं उत्तरायण की होती है. पौराणिक प्रसंगों में भीष्म पितामह ने अपनी मृत्यु के लिए उत्तरायण की प्रतीक्षा की थी और इस दिन गंगा जी के स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरने की भी मान्यता है. इसलिए माघ स्नान का महत्व भी है.

उत्तरायण में जप, तप और सिद्धियों के साथ साथ विवाह, यज्ञोपवीत और गृहप्रवेश जैसे शुभ तथा मांगलिक कार्यों की शुरूआत की जाती है. प्राचीन मान्यताओं में उत्तरायण की पहचान यह है कि इस समय आसमान साफ अर्थात बादलों से रहित होता है. दूसरी ओर दक्षिणायन के दौरान वर्षा, शरद और हेमंत, यह तीन ऋतुएं होती हैं तथा दक्षिणायन में आकाश बादलों से घिरा रहता है.

Posted in Ascendant, Basic Astrology, Hindu Calendar, Hindu Maas, Hindu Rituals | Tagged , , , , | 2 Comments