शनि के मार्ग परिवर्तन का आपके जीवन पर प्रभाव

शनि देव मार्गी हो रहे हैं और इसी के साथ ही मंगल ग्रह के साथ एक ही राशि में युति करते हुए दिखाई देंगे. इन दो मुख्य बदलावों के फलस्वरुप कुछ प्रमुख घटनाएं अवश्य ही अपना प्रभाव दिखाएंगी.  ज्योतिष के अनुसार इनके मिलेजुले फल प्राप्त होंगे. स्थितियों में परिवर्तन के साथ ही वस्तुओं में उतार-चढ़ाव भी देखा जा सकता है. शनि और मंगल एक साथ होने के कारण ज्वलनशील पदार्थों के दामों में उतार-चढ़ाव के योग रहेंगे. समाज में उपद्रव की घटनाएं भी देखने को मिल सकती हैं.

वक्री ग्रह अधिक बलवान होता है और शनि का यह स्वरुप कुछ कष्टकारी भी हो सकता है. अब तक शनि वक्री अवस्था में चल रहे थे और अब वह मार्गी हो रहे है,  तो लिहाजा इस दृष्टि से उनका यह स्वरुप सभी राशि के जातकों को भी अवश्य ही प्रभावित करेगा. वर्तमान में कर्क, कन्या, तुला, वृश्चिक एवं मीन राशि के जातकों पर शनि का प्रभाव चल रहा है और जिन राशियों पर शनि की अढ़ैया अथवा साढ़े साती चल रही है, उनके लिए वक्री शनि कई प्रकार के बदलाव लेकर आ सकता है और इसके साथ ही सतह अन्य राशियों पर भी शनि अपना प्रभाव दिखाएंगे.

शनि के प्रभाव स्वरुप व्यक्ति राजा से रंक और रंक से  राजा बन सकता है. शनि की कृपा से जातक समस्त सुखों को प्राप्त कर सकता है. कोई भी शनि के प्रकोप से नहीं बच सकता है, इस समय शनि के  प्रभाव के कारण मुल्यवान धातुओं में तेजी देखी जा सकती है. शनि के मार्गी होने से लंबे समय से चले आ रहे असमंजस दूर होंगे पारिस्थितियों में कुछ सुधार की संभावना भी बन सकती है.

जब शनि  मार्गी होते हैं अत्यधिक श्रम कराते हैं. इसलिए राजनैतिक हलकलों में तेजी की स्थिति देखी जा सकती है. कार्य क्षेत्र में तेजी बनी रहेगी कर्मचारियों पर काम का अतिरिक्त बोझ बढ़ सकता है तथा साथ ही साथ कुछ असंतोष की भावना भी उभर सकती है. कार्यों में परिश्रम तो होगा लेकिन उनकी सफलता की गारंटी है या नही इस बात पर मन में उलझन बनी रहेगी. काम में स्वयं अपने को साधनों की तरफ ले जाने के प्रयास तो रहेंगे ही लेकिन साधन या तो वक्त पर खराब हो सकता है या उपयोग में नहीं आ पाएगा.

26 जून दिन मंगलवार से शनि अपनी चाल बदल रहे हैं, अभी शनि वक्री है और 26 जून के बाद ये मार्गी होंगे शनि वर्तमान में कन्या राशि में स्थित हैं. मार्गी होने के पश्चात अगस्त को तुला राशि में प्रवेश करेंगे. शनि की स्थिति से सभी राशियों पर सीधा-सीधा प्रभाव होगा. शनि के राशि परिवर्तन से कुछ राशियों को लाभ मिलेगा, लेकिन राशियों के लिए अशुभ रहेगा. इसलिए इनके शुभ फलों की प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि शनि संबंधि उपाय किए जाएं

शनिवार का व्रत रख सकते हैं तथ ऐसके सतह ही साथ शनि कवच, स्तोत्र एवं मन्त्र जप करने से शनि देव शिघ्र प्रसन्न होते हैं.  शनि देव को प्रसन्न करने हेतु हनुमान जी का पूजन भी अत्यंत लाभदायक होता है. शनि की प्रसन्नता के लिए उड़द, तेल, तिल, कुलथी, लोह, काले या श्याम वस्त्र दान किए जा सकते हैं तथा शनिवार के दिन काले घोड़े की नाल या नाव की कील का बना छल्ला मध्यमा अंगुली में में धारण कर सकते हैं.

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नवग्रह | Navagraha | Nine Planets

ज्योतिष में राशि चक्र में नवग्रहों मंगल, बुध, बृहस्पति,शुक्र, और शनि, सूर्य, चंद्रमा, राहू  और केतु का जातक के जीवन और संपूर्ण सृष्टी पर गहरा प्रभाव पड़ता है. ज्योतिष के अनुसार ब्रह्माण को यह नव ग्रह प्रभावित करते हैं. प्रत्येक ग्रह में एक विशिष्ट ऊर्जा होती है,यह ऊर्जा जातक के जन्म के साथ ही उसके साथ जुड़ जाती है और सारा जीवन उसको प्रभावित करती है यह नौ ग्रह, जीव के संचारक बनते हैं. प्रत्येक ग्रह के गुण ब्रह्मांड के समग्र संतुलन को बनाए रखने में मदद करते हैं.

सूर्य ग्रह | Sun Planet

सूर्य देव नव ग्रहों में प्रमुख स्थान रखते हैं. बारह आदित्यों में से एक हैं, धर्म ग्रंथों में सूर्य देव को प्राण कहा गया है. सूर्य भगवान के रथ को सात घोड़े खींचते हैं, जो सात चक्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं. यह रवि रूप में “रविवार” के स्वामी हैं. सूर्य राज्य सुख, सत्ता, ऐश्वर्य ,वैभव जैसे गुण प्रदान करता है. सूर्य सौरमंडल का प्रथम ग्रह है, इन्हीं से शक्ति प्राप्त करके ग्रह,उपग्रह, नक्षत्र आदि इनके चारों ओर विचरण करते हैं.

सूर्य सिंह राशि का स्वामी है. सूर्य ग्रह के रत्नों मे माणिक और उपरत्नो में लालडी, तामडा हैं. ज्योतिष में सूर्य देव को मस्तिष्क का अधिपति कहा गया है. वेदों ने सूर्य की महिमा का गुणगान किया है. ऋग्वेद तथा यजुर्वेद ने “चक्षो सूर्यो जायत” कह कर सूर्य को भगवान का नेत्र माना है. सूर्य देवताओं के नायक हैं. भगवान सूर्य के विषय में सूर्योपनिषद, भविष्य पुराण, मत्स्य पुराण, ब्रह्म पुराण, मार्कण्डेय पुराण तथा साम्बपुराण इत्यादि ग्रंथ वर्णित हैं.

चन्द्रमा | Moon Planet

चंद्र को सोम देव भी कहा जाता है. नवग्रहों में इन्हें दूसरा स्थान प्राप्त है यह नक्षत्रों के स्वामी कहे जाते हैं. चंद्रमा कर्क राशि के स्वामी हैं.  इन्हें नक्षत्रों का भी स्वामी माना गया है. इनके अधिदेवता भगवान शिव तथा देवी उमा हैं. चन्द्रमा का विवाह दक्ष प्रजापति की  सत्ताईस कन्याओं से हुआ था और यही सत्ताईस कन्याएं नक्षत्रों के रूप में भी जानी जाती हैं तथा नक्षत्रों के भोग से एक चन्द्र मास पूर्ण होता है.

सोलह कलाओं से पूर्ण, सोम के रूप में यह सोमवार के स्वामी हैं. इनके वस्त्र, अश्व और रथ श्वेत हैं. चंद्र देव मस्तक पर स्वर्णमुकुट तथा गले में मोतियों की माला धारण किए हुए कमल के आसन पर विराजमान हैं. यह अपने दस घोड़ों और तीन पहियों वाले वाले वाहन रथ पर आरूढ़ हैं. ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को शीतलता का कारक. मन नक्षत्रों, औषधियों, रसीले पदार्थों एवं जल का स्वामी कहा गया है.

मंगल ग्रह | Mars Planet

ज्योतिष शास्त्र में मंगल देव को उग्र, ओज युक्त तेज से पूर्ण ग्रह कहा गया है. मंगल देव को संस्कृत में अंगारक भी कहते हैं. मंगल देव लाल रंग लिए हुए हैं. इन्हें भौम अर्थात ‘भूमि का पुत्र’ कहा जाता है. यह युद्ध के देवता हैं इन्हें सेनापति का पद प्राप्त है. मंगल भगवान को पृथ्वी की संतान माना गया है. यह वृश्चिक और मेष राशि के स्वामी हैं. इनकी प्रकृति तमस गुण वाली मानी गई है. अपने में अद्वितीय तेज से मंगल देव सभी को प्रभावित करते से दिखाई देते हैं.

मंगल देव ऊर्जावान कार्रवाई, आत्मविश्वास तथा अहंकार का प्रतिनिधित्व करते हैं. मंगल ग्रह शक्ति, वीरता और साहस के परिचायक है तथा धर्म रक्षक माने जाते हैं. मंगल देव को चार हाथ वाले, त्रिशूल और गदा धारण किए दर्शाया गया है. भगवान मंगल की पूजा से मंगल शांति प्राप्त होती है तथा कर्ज से मुक्ति धन लाभ प्राप्त होता है .मंगल के रत्न रूप में मूंगा धारण किया जाता मंगल देव दक्षिण दिशा के संरक्षक माने जाते हैं. इनका वाहन एक मेढा़ (भेड़ा) है तथा यह मंगल-वार के स्वामी हैं.

बुध ग्रह | Mercury Planet

बुध ग्रह चन्द्र और तारा के पुत्र हैं. यह रजो गुण वाले हैं और वाणी का प्रतिनिधित्व करते हैं. बुध शांत एवं सौम्य प्रवृत्ति के ग्रह हैं. बुध ग्रह के अधिदेवता एवं प्रत्यधिदेवता भगवान विष्णु हैं यह मिथुन तथा कन्या राशि के स्वामी हैं. बुध की महादशा 17 वर्ष की होती है. बुध भगवान पीला वस्त्र धारण किए सिर पर सोने का मुकुट तथा गले में सुन्दर पुष्प माला पहने हुए कांति युक्त दिखाई देते हैं. हाथों  में तलवार, ढाल, गदा और वरमुद्रा धारण किये हैं. बुध देव का वाहन सिंह है यह श्वेत रथ और प्रकाश से दीप्त हैं. नवग्रह में इनकी पूजा ईशानकोण में की जाती है इनका प्रतीक वाण है तथा रंग हरा है.बुध ग्रह के रत्नों में पन्ना और सुलेमानी होते हैं.

बृहस्पति ग्रह | Jupiter Planet

बृहस्पति ग्रह को गुरू भी कहा जाता है बृहस्पति जी देवताओं के गुरु हैं, यह ज्ञान का प्रतिनिधित्व करते हैं. बृहस्पति धनु और मीन राशि के स्वामी हैं तथा इनका रत्न पुखराज है. धर्म शास्त्रों बृहस्पति जी को देवी-देवताओं के गुरु कहा गया है. बृहस्पति बुद्धि और वाक शक्ति के स्वामी कहे गए हैं. बृहस्पति पीले वस्त्रों को धारण किए हुए स्वर्ण के समान आभा देते प्रतीत होते हैं. इन्होंने मस्तक पर स्वर्णमुकुट तथा कंण्ठ में सुंदर माला को धारण किया हुआ है.

बृहस्पति अपने हाथों में दंड, रुद्राक्ष माला, पात्र को धारण किए हुए वरमुद्रा में होते हैं. इनका वाहन जो स्वर्णनिर्मित रथ है जिसपर पीले रंग के आठ घोड़े जुते रहते हैं. बृहस्पति अपने ज्ञान द्वारा देवताओं को उनका यज्ञ-भाग प्राप्त कराते हैं तथा उनके ज्ञान मार्ग बनते हैं तथा देवों की असुरों से रक्षा करते हैं. बृहस्पति जी को देवमंत्री, देव पुरोहित, देवेज्य, इज्य, गुरु और वाचस्पति इत्यादि नामों से भी जाना जाता है.

शुक्र ग्रह | Venus Planet

ज्योतिष एवं धर्म ग्रंथों में शुक्र देव को दैत्यों और  दानवों के गुरु कहा गया है. दैत्य गुरु शुक्र शास्त्रों के ज्ञाता, एवं संजीवनी विद्या के ज्ञानी है. समस्त सौंदर्य का स्वरुप इन्हीं में समाहित है. ज्योतिष में इन्हें स्त्री स्वरुप माना गया है. शुक्र वृषभ व तुला राशि के स्वामी हैं, यह दक्षिण-पूर्व दिशा का प्रतिक हैं. शुक्र का भाग्य रत्न हीरा है और उपरत्न जरकन होता है. ज्योतिष में शुक्र को स्त्री ग्रह और मंत्री का दर्जा प्राप्त है. स्त्री ग्रह होने के कारण इसे मंत्राणी भी कहा जाता है शुक्र विषय-वासना, प्रेम, सौंदर्य, आकर्षण, शैया तथा वाहन सुख को दर्शाते हैं.

शनि ग्रह | Saturn Planet

शनि शनिवार के स्वामी हैं. शनि अन्य ग्रहों की तुलना मे धीमे चलते हैं. शनि ग्रह वायु तत्व और पश्चिम दिशा के स्वामी हैं. शनि देव को काला या कृष्ण वर्ण का बताया जाता है. शनि देव काले वस्त्रों में सिर पर स्वर्ण मुकुट गले में माला तथा शरीर पर नीले रंग के वस्त्रों से सुशोभित हैं. एक हाथ में  तलवार, तीर और दो खंजर लिए हुए लोहे के रथ को खिंचते गिद्ध पर सवार होते हैं. यह न्याय के देवता हैं,  योगी, तपस्या में लीन रहते हैं शनि ग्रह को न्याय का देवता कहा जाता है यह कर्मों का फल प्रदान करते हैं. शनि देव के प्रभाव से कोई अछूता नहीं रहता यह किसी के साथ अन्याय नहीं करते. स्वभाव से उग्र हैं. शनि के रत्न और उपरत्नों में नीलम,नीली  इत्यादि आते हैं.

राहु ग्रह | Rahu Planet

राहु को अशुभ ग्रह माना गया है. इसे छाया ग्रह कहा जाता है, राहु का रुप भयंकर है. यह सिर पर मुकुट, गले में माला तथा शरीर पर काले रंग के वस्त्रों को धारण किए रहते हैं. यह सिंह के आसन पर विराजमान हाथों में तलवार, ढाल, त्रिशूल और वरमुद्रा लिए होते हैं. राहु के सम्बन्ध में अनेक पौराणिक आख्यान है,राहु काल में कोई भी कार्य करना वर्जित माना जाता है. अत: किसी कार्य को शुरू करने से पहले राहु काल का विचार किया जाता है. राहु अंधकार रूपी रथ में सवार होते हैं, इनके रथ को काले रंग के आठ घोड़े खींचते हैं. राहु के अधिदेवता काल तथा प्रत्यधि देवता सूर्य हैं. ज्योतिषशास्त्र के अनुसार राहु की महादशा 18 वर्ष की मानी गई है

केतु ग्रह | Ketu Planet

केतु धुम्र वर्ण के विकृत मुँह वाले हैं यह काले वस्त्र धारण करते हैं. इनके एक हाथ में गदा और दूसरे में वरमुद्रा धारण किये रहते हैं. केतु की महादशा सात वर्ष की होती है केतु के अधिदेवता चित्रकेतु तथा प्रत्यधिदेवता ब्रह्मा हैं. पौराणिक कथा अनुसार अमृत मंथन के समय भगवान विष्णु के सुद्रशन चक्र से कटने पर सिर राहु कहलाया और धड़ केतु कहलाया. केतु की प्रसन्नता हेतु दान की जानेवाली वस्तुओं में तिल, कम्बल, शस्त्र, कस्तूरी इत्यादि आती हैं.  केतु की शांति हेतु लहसुनिया रत्न धारण कर सकते हैं.

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दान द्वारा ग्रहों को अनुकूल कैसे करें

ग्रहों के लिए क्या-क्या दान करना चाहिए इसके उनसे संब्म्धित वस्तुओं के बारे में जानकारी होना अत्यंत आवश्यक है. ग्रहों से संबंधित वस्तुओं का दान करके आप उनके शांति उपाय उपयोग में ला सकते हैं जिससे उनके बुरे प्रभावों से बचा जा सकता है. व्यक्ति जब जन्म लेता है उसी समय से ग्रहों का प्रभाव उस पर शुरू हो जाता है. व्यक्ति के जीवन में अच्छे-बुरे सभी प्रकार के योग आते हैं और ज्योतिष के अनुसार यह सब ग्रहों का प्रभाव होता है. हर व्यक्ति की कुण्डली में ग्रहों की कुछ विशेष स्थितियां होती है. और इन स्थितियों के योगों से व्यक्ति के जीवन में अनेक उतार चढ़ाव आते हैं जब ग्रह कमजोर या निचस्थ होता है तो उससे संबंधि फलों का जातक को अनुकूल प्रभाव नहीं मिल पाता. जन्म कुण्डली में ग्रहों का अध्ययन करते समय ग्रहों की स्थिति का आंकलन बहुत ही सूक्ष्मता पूर्वक किया जाना होता है यदि ग्रह प्रबल होता है तो उसका फल ही प्रमुख रूप से प्राप्त होता है

लेकिन अशुभ ग्रह स्थिति होने पर जैसे नीच ग्रह, पाप ग्रह या पाप ग्रह के घर में बैठा या दृष्ट हुए ग्रह हो या नीचाभिलाषी होने पर अशुभ फल प्राप्त होते हैं ऎसी स्थिति में ग्रह की शुभता के लिए उनकी वस्तुओं का दान करने से ग्रह के अशुभ फलों में कमी की जा सकती है. अत: ग्रहों के उपाय श्रद्धा व विश्वास से करने पर व्यक्ति को दु:खों से मुक्ति मिलती है.

सूर्य ग्रह | Sun

सूर्य के लिए दान योग्य वस्तुओं में सोना, गेंहू, गुड, केसर, तांबा, माणिक्य, लाल और गुलाबी वस्त्र, लाल और गुलाबी फूल इत्यादि वस्तुओं को दिया जा सकता है.

चंद्रमा ग्रह | Moon

चंद्रमा की दान योग्य वस्तुओं में चांदी, मोती, सफेद वस्तुएं तथा सफेद खाद्यपदार्थ जैसे चावल, दही, दूध, मिश्री, चीनी इसके अतिरिक्त सफ़ेद चन्दन, सफ़ेद वस्त्र, इत्यादि का उपयोग किया जा सकता है.

मंगल ग्रह | Mars

मंगल ग्रह से संबंधित वस्तुओं में मिष्ठान, गुड़, मसूर दाल और मूंगा, तांबा, लाल चन्दन, लाल पुष्प लाल रंग के वस्त्र इत्यादि आते हैं.

बुध ग्रह | Mercury

बुध ग्रह की दान संब्म्धि वस्तुओं मे हरे रंग के वस्त्र, हरे फूल, पन्ना, स्वर्ण,  छाता कस्तूरी, हरे रंग के फल, केसर, कपूर, घी और धार्मिक पुस्तकें, कांसा या उससे बने बर्तन इत्यादि आते हैं.

बृहस्पति | Jupiter

बृहस्पति(गुरू) से संब्म्धित वस्तुओं में पुखराज, स्वर्ण, पीतल, हल्दी, शहद, चने की दाल, केसर, पीले वस्त्र, पीले फूल, धार्मिक पुस्तकें इत्यादि दान की जा सकती हैं.

शुक्र ग्रह | Venus

शुक्र ग्रह के लिए दान देने के लिए हीरा, ज़रकन, सफ़ेद वस्त्र, चांदी, सफ़ेद फूल, मिश्री, सजावट की वस्तुएं इत्यादि दान की जा सकती हैं.

शनि ग्रह | Saturn

शनि ग्रह के लिए दान योग्य वस्तुओं में नीली या नीलम, लोहा, सरसों का तेल, कुलथी, कंबल,चमड़ा इत्यादी को दान दिया जा सकता है.

राहु ग्रह | Rahu

राहु ग्रह के लिए दान देने के लिए इनसे संबंधित वस्तुओं जैसे गोमेद, कंबल, तिल, तेल काला वस्त्र, सप्त रत्न,अभ्रक इत्यादि को दान दिया जा सकता है.

केतु ग्रह | Ketu

केतु की शांति के लिए सीसा-रांगा, काला वस्त्र, कंबल, तिल, सात अनाज, कस्तूरी, काली मिर्च, लोहा-स्टील या इससे बने सामान को दान दे सकते हैं.

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चामर योग | Chamar Yoga | Chamar Yoga in Kundli

जातक परिजात के अनुसार “लग्नेश केन्द्रगते स्वतुग्डें जीवेक्षिते चामरनाम योग:” अर्थात कुण्डली में यदि लग्नेश उच्च राशि में स्थित होकर केन्द्र में हो और यह योग केवल मेष, मिथुन कन्या, मकर लग्न में उपन्न जातकों के जन्मांग में विद्यमान होना संभव है. अन्य लग्न होने पर अगर लग्नेश उच्चराशि में होगा, तो केन्द्र में नहीं हो पाएगा.

जातक परिजात में इसके फल का विचार करते हुए कहा गया है कि –

योगे जातश्चामरे राजपूज्यो विद्वान् वाग्मी पण्डितो वा महीप: ।
सर्वज्ञ: स्याद्वेदशास्त्राधिकारी जीवेल्लोके सप्ततिर्वत्सराणाम्।।

“सौम्यद्वये लग्नगृहे कलत्रे नवास्पद वा यदि चामरः स्यात् ।।”

ज्योतिषतत्वम के अनुसार | According to Jyotishtatvama

लेखाच्र्येन विलोकिते हरिहपे केन्द्रस्थिते तुग्ड़भे
कि पौरे पथिभेSथ वा पथि पदे चरुद्वये चामर: ।
सर्वज्ञ: श्रुतिशास्त्र विन्मनुभवेद् पूज्यो बुधोSत्राद्भव
आयुर्वर्षमुपैति खाश्वतुलितं वाग्ग्मी च विद्वान्नृप: ।।

इस प्रकार के कई और तथ्यों के आधार पर ही चामर योग को राजयोग की संज्ञा दी गई है. इस योग में जातक राजा के समान होता है, विशेषज्ञ होता है शस्त्रों को जानने में रुचि रखने वाला होता है.

चामर योग निर्माण | Formation of Chamar Yoga

किसी भी व्यक्ति की कुंडली में चामर योग चार प्रकार से बनता है, अर्थात चामर योग बनने की चार प्रकार की शर्ते होती हैं. इन चारों में से किसी एक शर्त के पूरा होने पर चामर योग बनता है. कुण्डली में लग्नेश यदि अपनी उच्च राशि में स्थित हो तथा उसे गुरू देख रहा हो तब चामर योग बनता है. दूसरी अवस्था में यदि आपकी जन्म कुंडली में दो शुभ ग्रह लग्न या नवम भाव में स्थित हैं तब भी चामर योग का निर्माण होता है.

तीसरी अवस्था में यदि कुंडली में दो शुभ ग्रह सप्तम और दशम भाव में स्थित हैं तब इस योग से भी चामर योग बनता है और अंत में यदि जन्म कुंडली में शुभ ग्रह लग्न में स्थित हों, शुभ ग्रह का भावेश या लग्नेश शुभ भावों में बैठा हो तब भी चामर योग का निर्माण होता है. इस शर्त में ग्रह अपनी स्व राशि या उच्च राशि में अर्थात दीप्त या मुदित अवस्था में होना चाहिए.

चामर योग प्रभाव | Effect of Chamar Yoga

जिन लोगों कि कुण्डली में चामर योग का निर्माण होता है वह प्रतिष्ठित, विद्वान और यश-प्रतिष्ठा पाने में सफल होते हैं. यह योग व्यक्ति को परिश्रमी और सफल बनाता है. जातक वह दीर्घायु प्राप्त करता है. चामर योग के प्रभाव से आप नेता या नेता के समान पद पाने की संभावना रखते हैं. इस योग के प्रभाव से सरकार द्वारा सम्मान प्राप्त व्यक्ति हो सकते हैं.

इसके द्वारा जातक दीर्घायु तथा विद्वान भी होता है. चामर योग में जन्म लेने पर आप अच्छे वक्ता तथा विभिन्न कलाओं में निपुण व्यक्ति हो सकते हैं. चामर योग में उत्पन्न जातक राजा के समान समान पाने वाला, सर्वज्ञ, वेदों को समझने वाला अच्छा वक्ता होता है. व्यक्ति इस योग में वृद्धि को प्राप्त करने में सहायक होता है. वह भाँति सुन्दर और सुशील तथा लक्ष्मीवान, कीर्तिवान होता है. कई व्यक्तियों में योग योग उन्हें सफलता के उच्च शिखर प्रदान करने वाला होता है. भगवान श्री राम जी की कुण्डली में भी यही योग निर्मित होने की बात कही गई है.

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शनि का ज्योतिष में महत्व | Importance of Saturn in Astrology

ज्योतिष में शनि ग्रह कुंडली से लेकर गोचर, महादशा तथा साढ़ेसाती से हमें प्रभावित करते हैं. शनि ग्रह की स्थिति और उससे होने वाले लाभ या हानि से कोई भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता. शनि ग्रह को शनिदेव तथा शनैश्चर कहा जाता है.ज्योतिष अनुसार यह ग्रह कुंडली में किसी भी अन्य ग्रह की अपेक्षा बहुत अधिक नुकसान पहुंचा सकता है.

शनि मुख्य रूप से शारीरिक श्रम और सेवकों का कारक है. श्रमिक, चालक तथा निर्माण कर्ता के रुप में देखा जा सकता है. शनि मनुष्य के शरीर में मुख्य रूप से वायु तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं. तुला राशि में स्थित होने से शनि को सर्वाधिक बली होते हैं तथा इस राशि में स्थित शनि को उच्च का शनि भी कहा जाता है. इसके अतिरिक्त शनि मकर तथा कुंभ में स्थित होने पर भी बल पाते हैं. शनि के प्रभाव जातक को वकील, नेता का काम करने वाले लोग तथा गुढ़ विद्याओं में रुचि रखने वाला बना सकता है.

शनि ग्रह को समझने के लिए सबसे पहले शनि की कारक वस्तुओं को जानना आवश्यक है. शनि ज्योतिष में आयु का कारक ग्रह है. इसके प्रभाव से प्राकृ्तिक आपदायें, बुढापा, रोग, निर्धनता,पाप, भय, गोपनीयता, कारावास, नौकरी, विज्ञान नियम, तेल-खनिज, कामगार, मजदूर सेवक, सेवाभाव, दासता, कृ्षि, त्याग, उंचाई से गिरना,  अपमान, अकाल, ऋण, कठोर परिश्रम, अनाज के काले दानें, लकडी, विष, टांगें, राख, अपंगता, आत्मत्याग, बाजू, ड्कैती, रोग, अवरोध, लकडी, ऊन, यम अछूत, लंगडेपन, इस्पात, कार्यो में देरी लाना.

बुध व शुक्र शनि के मित्र ग्रह हैं.  सूर्य,चन्द्र तथा मंगल शनि के शत्रु ग्रह माने जाते हैं, शनि के साथ गुरु सम संबन्ध रखता है. शनि को मकर व कुम्भ राशियों का स्वामित्व प्राप्त है इनकी मूलत्रिकोण राशि कुम्भ है. कुंभ राशि में शनि 1अंश से 20 अंश के मध्य अपनी मूलत्रिकोण राशि में होते है. शनि तुला राशि में 20 अंश पर उच्च राशिस्थ होते हैं.  शनि की नीच राशि मेष है, मेष राशि में शनि 20 अंश पर होने पर अपनी नीच राशि में होते है. शनि ग्रह को स्त्री प्रधान, और नपुंसक ग्रह कहा गया है. शनि ग्रह पश्चिम दिशा का प्रतिनिधित्व करते हैं. शनि ग्रह का भाग्य रत्न नीलम, कटैला है. शनि भूरा, नेवी, ब्लू रंग, कालापन लिए हुए होते हैं. शनि ग्रह के लिए 8, 17, 26 अंक का प्रयोग करना शुभ रहता है.  शनि ग्रह के लिए ब्रह्मा, शिव का पूजन करना चाहिए.

शनि का बीज मंत्र | Saturn Beej Mantra

ऊं प्रां प्रीं प्रौं स: शनैं नम:

शनि का वैदिक मंत्र | Saturn Vedic Mantra

नीलाजंन समाभासं रवि पुत्रम यजाग्रजम।
छाया मार्तण्ड सम्भूतं तं नमामि शज्नैश्वरम।।

शनि की दान योग्य वस्तुएं | Donations associated with Saturn

शनि के लिए लोहा, काली कीलें, काला कपडा, काले फूल, मां की दाल, काली उडद की दाल, कस्तूरी, काली गाय. इन वस्तुओं का दान करने से शनि के अशुभ प्रभावों से मुक्ति प्राप्त होती है.

शनि का स्वरुप | Physical features of a person with Saturn

शनि देव लम्बे पतले शरीर वालें, रंग में पीलापन लिए होता है. लम्बे और मुडे हुए नाखून, बडे बडे दांत, वाररोग, आलसी,रुखे उलझे बाल वाले है. शनि देव वायु तत्व रोग, पित्त प्रधान, गर्दन, हड्डियां, दान्त, प्रदूषण के कारण होने वाले रोग, मानसिक विक्षेप,  पेट के रोग, चोट, आघात, अंगहीन, कैन्सर, लकवा, गठिया, बहरापन,लम्बी अवधि के रोग देता है. शनि को देरी, अवरोध, कष्ट, विपत्ति, लोकतन्त्र, मोक्ष का कारक माना गया है.

शनि के विशिष्ठ गुण | Specific qualities of a person with Saturn

शनि तर्क, दर्शन, आत्मत्याग, नपुंसक ग्रह, कृ्पण, विनाशकारी शक्तियां, ठण्डा बर्फीला ग्रह, रहस्यमय, रुखा. आदि गुण देता है.

शनि के कार्यक्षेत्र | Saturn related profession and business

शनि आजीविका भाव का स्वामी होने पर व्यक्ति से सेवा कार्य कराता है. इस योग का व्यक्ति कठोर परिश्रम करने वाला, नौकरी पसन्द, सरकारी नौकरी प्राप्त, दिमागी और शारीरिक कार्य करने में कुशल, लोहा और इस्पात, ईंट, शीशे टायल कारखाना, जूते-चप्पल, लकडी या पत्थर का काम, बढई, तेल का काम, राजगीर, दण्ड देने से संबन्धित उपकरण, शनि से प्रभावित जातक सभी प्रकार के उत्तरदायित्व वाली नौकरियां करने वाला होता है.

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कलानिधि योग | Kalanidhi Yoga | Kalanidhi Yoga in a Kundali

फलित ज्योतिष में योगों का बहुत महत्व रहता है. फलित करते समय योगों की विवेचना द्वारा जातक के जीवन में होने वली घटनाओं और परिस्थितियों का बोध होता है. योगों के निर्माण में एक से अधिक ग्रह जब युति, दृष्टि, स्थिति संबंध बनाते हैं तो योग बनते हैं. इन योगों के फलों का प्रभाव योग कारक ग्रहों की महादशा, अन्तर्दशा व प्रत्यन्तर इत्यादि दशाओं में प्राप्त होता है. योग को समझे बिना उचित प्रकार से कुण्डली का विवेचन संभव नहीं हो पाता है. विभिन्न योगों में योगकारक ग्रहों की प्रमुख भूमिका होती है. ग्रहों के बल से योगों का फल बहुत प्रभावित होता है. इन्हीं प्रमुख योगों में कुण्डली में बनने वाला कलानिधि योग काफी महत्व रखता है.

कई जाने माने व्यक्तियों की कुण्डली में बना यह कलानिधि योग उन्हें समान एवं प्रसिद्धि दिलाने में महत्वपीर्ण भूमिका निभाता है. गुरू के प्रभाव से बनने वाले इस योग के शुभ लाभों में से व्यक्ति सुखी जीवन को पाने में सहायक होता है. व्यक्ति अत्यधिक धन-संपत्ति का अधिपति होता है. योगों को कुण्डली में देखकर किसी के व्यक्तित्व को समझा जा सकता है. ज्योतिष योग कुण्डली में विचार कर जातक की सफलता का निर्णय करने में सहायता मिलती है, यह योग जीवन के अनेक क्षेत्रों  में अच्छा फल प्रदान करते हैं.

कलानिधि योग का निर्माण | Formation of Kalanidhi Yoga

चर लग्न में नवमेश बृहस्पति से युक्त होने पर तथा पंचमेश के पंचमस्थ होने पर और प्रबल दशमेश के लाभ भाव में स्थित होने पर कलानिधि योग का निर्माण होता है.

यदि कुण्डली में गुरु दूसरे या पंचम भाव में स्थित हो और शुक्र या बुध उसे देख रहा हो तब कलानिधि योग बनता है. इसके अतिरिक्त कुंडली में यदि गुरू, बुध या शुक्र की राशि में स्थित है तब भी कलानिधि योग बनता है.

लग्न में यदि चर नवांश हो और नवमेश बृहस्पति के साथ लग्न में स्थित हो तथा पंचमेश पंचम में ही स्थित हो तथा दशमेश बली होकर लाभ स्थान में स्थित हों तो कलानिधि योग का फल प्राप्त होता है. इस योग में कहा जाता है कि आयु के 23वें वर्ष में सुख एवं समृद्धि की प्राप्ति होती है.

कलानिधि के बारे में एक अन्य तथ्य यह है कि नवांश से संबंधित ग्रहों का उल्लेख नहीं होता क्योंकि नवांश संबंधित ग्रह योग काफी किलष्ट होते हैं. दूसरे भाव में गुरू को बुध और शुक्र से अवश्य संयुक्त होना चाहिए. अथवा पंचम भाव में शुक्र और बुध गुरू की राशि धनु या मीन में स्थित हों तो कलानिधि योग की सरंचना होती है.

कलानिधि योग का प्रभाव | Effect of Kalanidhi Yoga

कलानिधि योग के निर्माण द्वारा जातक को राज सुख की प्राप्ति होती है. जातक को राज सम्मान की प्राप्ति होती है. विभिन्न प्रकार के वाहनों का सुख प्राप्त होता है. व्यक्ति अत्यधिक धन- संपत्ति का अधिपति हो सकता है, ज्ञानी, गुणवान, कार्य कुशल तथा विवेकी होता है.

सरकार द्वारा सम्मानित लोगों की कुण्डली में कलानिधि योग देखा जा सकता है. यदि कुंडली में कलानिधि योग बनता है तब आपके भी किसी कार्य के लिए सरकार आपको सम्मानित कर सकती है. जातक कुलीन समाज वाला और रोगों से मुक्त होता है. जातक को व्यवसाय में प्रगति मिलती है. जातक प्रचुर धन प्राप्त करने में सफल होता है.

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दशा फल विचार | Results of Dashas

कई बार जन्म कुण्डली में शुभ योग होने पर भी जातक को शुभ फलों की प्राप्ति नही हो पाती. जन्म कुण्डली शुभ होने पर भी जातक के जीवन में कभी तो दशा या गोचर में ग्रहों की स्थिति विषम हो जाती है कि जीवन में उतार चढा़व की स्थिति बनने लगती है और व्यक्ति व्याकुल व बेचैन होने लगता है. ऎसी स्थिति में उचित रुप से कुण्डली के विभिन्न पक्षों पर विचार करना अत्यंत आवश्यक हो जाता है.

शुभ फलदायी दशा | Dasha giving auspicious results

  • शुभ फलदायी दशा में ग्रह जन्म कुण्डली में केन्द्र भाव लाभ या धन भाव में स्थित हों.
  • ग्रह उच्च राशि, स्वराशि या मित्र राशि में हों.
  • ग्रह शुभ ग्रहों से दृष्ट या युक्त हों.
  • ग्रह भाव मध्य में स्थित हों या षडबल में बली हों तो उनकी दशा, अन्तर्दशा, प्रत्यंतर दशा व सूक्षम दशा अच्छा सुख और सम्मान प्रदान करती है.
  • त्रिषाड्य या त्रिक भव में स्थित पाप ग्रह अथवा दुस्थान के स्वामी ग्रह यदि दुस्थान में हों तो भी अपनी दशा या अंतर्दशा में शुभ फल देते हैं.

राहु केतु उत्तम प्रभाव | Auspicious results of Rahu – Ketu

राहु केतु केन्द्र या त्रिकोण में स्थित हों अथवा केन्द्र में स्थित राहु-केतु त्रिकोणाधिपति पंचमेश और नवमेश से दृष्ट या युक्त हों तो अपनी दशा काल में अच्छे फल प्रदान करते हैं.

त्रिकोणेश युक्त दशा | Dasha of the Lord of a triad house

कोई भी ग्रह पंचमेश या नवमेश से युक्त होने पर शुभ ग्रह बन जाता है और अपनी दशा भोग्य काल में अच्छे फल देता है. जातक को बुद्धि और भाग्य का साथ प्राप्त होता है.

धन लाभ दशा | Dasha giving wealth and profits

धन का विचार लग्न या चंद्र से किया जाता है. दूसरे भाव में स्थित कोई भी ग्रह या दूसरे भाव को देखने वाला ग्रह या दूसरे भाव का अधिपति अपने दशा काल में धन संपदा प्रदान करने में सहायक होता है. द्वितीयेश जिस राशि में स्थित हो वह भी यदि शुभ ग्रह दृष्टि से युक्त हो वह अपनी दशा में सम्मान और लाभ की प्राप्ति कराता है.

पाप ग्रह शुभयुक्त होने पर | Dasha of Malefic planets

नैसर्गिक पाप ग्रह यदि पाप भावों में स्थित हों तो अपनी दशा में जातक को भाई बंधुओं का स्नेह प्राप्त होता है, रोग, ऋण का नाश, बाधा व कष्ट दूर होते है. मान सम्मान की प्राप्ति होती है. इसी प्रकार पाप भाव या दुष्ट भाव के स्वामी कहीं भी बैठ कर यदि शुभ ग्रह या शुभ भावों के स्वामी केन्द्र, त्रिकोण, धन या लाभ स्थानों के अधिपतियों से युक्त या दृष्ट हों तो वह अपनी दशा में रोग-शोक से मुक्ति प्रदान करते हैं.

शुभ ग्रह दशा | Dasha of auspicious planets

शुभ ग्रहों के अनुसार पहले उस भाव संबंधि फल देते हैं जिस भाव में यह शुभ ग्रह स्थित हों.

दूसरे मध्य में राशि के गुण धर्मानुसार फल प्रदान करते हैं. तीसरे में जिन ग्रहों से वह दृष्ट हों उन दृष्ट ग्रहों का फल देते हैं. भाव राशि युति एवं ग्रह दृष्टि से फल का यह कालक्रम शुभ ग्रहों के लिए है.

अशुभ ग्रह दशा | Dasha of inauspicious planets

सर्वप्रथम उस राशि से संबंधित फल देगा जिस राशि में यह ग्रह स्थित हैं. उसके बाद उस भाव के कारक तत्व संबंधी फल देगा जिसमें यह पाप ग्रह स्थित हैं. आखिर में विभिन्न ग्रहों की इस दशा भुक्ति स्वामी पर पड़ने वाली दृष्टि युति से फल का क्रम अशुभ ग्रह के लिए जानने का प्रयास किया जाएगा.

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आपकी कुण्डली में नौकरी के योग. देखिए आपको किस तरह कि जाब मिलेगी

नौकरी से संबंधित बहुत से प्रश्नों पर ज्योतिष शास्त्र में विचार किया जाता है. नौकरी में बने रहना या पद्दोन्नती होना या स्थान परिवर्तन जैसी अनेक बातों का विवेचन कुण्डली में बनने वाले विभिन्न योगों से किया जा सकता है.  नौकरी में तरक्की के लिए कुण्डली के दूसरे और ग्यारहवें भाव का अनुमोदन किया जाता है. इसके साथ ही साथ तरक्की की जानकारी जानने के लिए दशम भाव का विश्लेषण भी किया जाएगा.  नौकरी में स्थान परिवर्तन के बारे में विचार करन अहो तो तीसरे और नवम भाव का विश्लेषण किया जाता है. विदेश में जाकर नौकरी करने के बारे में जानने के लिए आठवें और बारहवें भाव का विश्लेषण किया जाएगा.  बारहवें भाव से सेवानिवृति देखी जाती है या व्यक्ति में नौकरी में बना रहेगा अथवा नहीं रहेगा.

लग्न बली होने पर व्यक्ति अपनी चाहतों को पूरा करने में काफी हद तक कामयाब होता है. दशम भाव का स्वामी बली होने पर जातक को अपनी नौकरी की प्राप्ती होती है. नौकरी में बने रहना या नौकरी का छूट जाने का विचार चर लग्न और चर नवाँश होने पर देखा जा सकता है ऎसी स्थिति में नौकरी छूट सकती है. इसके अतिरिक्त लग्नेश के अस्त होने पर भी नौकरी छूट सकती है. लग्नेश या दशमेश नीचे के ग्रहों से संबंधित है तो नौकरी छूट सकती है.

चन्द्रमा बली है तो जातक को नौकरी से मानसिक संतुष्टि प्राप्त होती है. द्वित्तीयेश तथा द्वित्तीय भाव, एकादशेश तथा एकादश भाव बली हैं तो व्यक्ति को अपनी मनपसंद नौकरी मिल सकती है. यदि चतुर्थ भाव में शुभ ग्रह हैं तो नौकरी में उसे संतोष मिलेगा और उसे स्थान परिवर्तन की चाह नहीं होगी. यदि चतुर्थ भाव में अशुभ ग्रह स्थित हों तो व्यक्ति को अपनी नौकरी से संतुष्टी नहीं मिलेगी और वह स्थान परिवर्तन की चाह रखना चाहेगा. चतुर्थ भाव से आमदनी का आंकलन भी करते हैं इसलिए इसमे शुभ ग्रह स्थित हों तो व्यक्ति को अच्छा लाभ भी प्राप्त हो सकता है.

नौकरी से संबंधित कुछ अन्य योगों को भी समझना आवश्यक होता है. नौकरी के सामान्य नियमों के बारे में . सूक्ष्मता से अध्ययन करने के लिए दशमाँश कुण्डली का अध्ययन करना भी आवश्यक होता है. नौकरी से संबंधित विचार करने के लिए यदि दशमेश लग्न में है या लग्नेश दशम में है तब नौकरी जल्दी लग जाएगी. दशमेश तथा लग्नेश एक साथ स्थित है तो कार्यसिद्धि शीघ्र होगी. दशमेश तथा लग्नेश का शुभ है तो कार्य जल्दी सिद्ध होगा.

किसी ग्रह के वक्री होने पर नौकरी छोडी़ है तब उस ग्रह के मार्गी होने पर पुन: नौकरी लग सकती है. इसी प्रकार अगर किसी ग्रह के राशि परिवर्तन के समय नौकरी छोडी़ है तब उस ग्रह के अगली राशि बदलने पर नौकरी लगने की संभावनाएं बहुत रहती है. चर लग्न शुभ दृष्ट तो वर्तमान नौकरी से संतुष्ट होगा. यदि चर लग्न यदि अशुभ ग्रहों से दृष्ट होगा तो नौकरी में असंतोष रहता है या बदलाव की संभावना देखी जा सकती है.  स्थिर लग्न पाप ग्रहों से दृष्ट है तो नौकरी में बदलाव नहीं होता. यदि स्थिर लग्न शुभ दृष्ट तो वर्तमान नौकरी में व्यक्ति को अच्छा लगता है.

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शुक्र का ज्योतिष में महत्व | Importance of Venus in astrology

वैदिक ज्योतिष में शुक्र को मुख्य रूप से पत्नी का का कारक माना गया है. यह विवाह का कारक ग्रह है, ज्योतिष में शुक्र से काम सुख, आभूषण, भौतिक सुख सुविधाओं का कारक ग्रह है. शुक्र से आराम पसन्द होने की प्रकृति, प्रेम संबन्ध, इत्र, सुगन्ध, अच्छे वस्त्र, सुन्दरता, सजावट, नृ्त्य, संगीत, गाना बजाना, काले बाल, विलासिता, व्यभिचार, शराब, नशीले पदारथ, कलात्मक गुण, आदि गुण देखे जाते है. पति- पत्नी का सुख देखने के लिए कुंडली में शुक्र की स्थिति को विशेष रुप से देखा जाता है. शुक्र को सुंदरता, ऐश्वर्य तथा कला के साथ जुड़े क्षेत्रों का अधिपति माना जाता है.

रंगमंच, चित्रकार, नृत्य कला तथा फैशन भोग-विलास  से संबंधित वस्तुओं को शुक्र से जोडा़ जाता है.  कुंडली में शुक्र की प्रबल स्थिति जातक को शारीरिक रूप से सुंदर और आकर्षक बनाती है. शुक्र के प्रबल प्रभाव से महिलाएं अति आकर्षक होती हैं. शुक्र के जातक आम तौर पर फैशन जगत, सिनेमा जगत तथा ऐसे ही अन्य क्षेत्रों में सफल होते हैं. शुक्र शारीरिक सुखों के भी कारक हैं प्रेम संबंधों में शुक्र की महत्वपूर्ण भूमिका होती है.

शुक्र का प्रबल प्रभाव जातक को रसिक बनाता है शरीर के अंगों में शुक्र जननांगों के कारक होते हैं तथा महिलाओं के शरीर में शुक्र प्रजनन प्रणाली का प्रतिनिधित्व करते हैं. स्त्रियों की कुंडली में शुक्र पर बुरे ग्रह का प्रभाव होने पर उनकी प्रजनन क्षमता पर विपरीत प्रभाव दालता है. शुक्र पर बुरे ग्रहों का प्रभाव जातक के वैवाहिक जीवन एवं प्रेम संबंधों में समस्याएं उत्पन्न कर सकता है. कुंडली में शुक्र पर राहु का प्रभाव जातक को वासनाओं से भर देता है. अशुभता के कारण व्यक्ति किसी गुप्त रोग से पीड़ित भी हो सकता है.

शनि व बुध शुक्र के मित्र ग्रहों में आते है. शुक्र ग्रह के शत्रुओं में सूर्य व चन्द्रमा है. शुक्र के साथ गुरु व मंगल सम सम्बन्ध रखते हैं. शुक्र वृ्षभ व तुला राशि के स्वामी हैं. शुक्र तुला राशि में 0 अंश से 15 अंश के मध्य होने पर मूलत्रिकोण राशिस्थ होता है. शुक्र मीन राशि में 27अंश पर होने पर उच्च राशि अंशों पर होता है. शुक्र कन्या राशि में 27अंश पर होने पर नीच राशि में होता है. शुक्र ग्रह की दक्षिण-पूर्व दिशा है. शुक्र का भाग्य रत्न हीरा है और उपरत्न जरकन होता है.

शुक्र का बीच मंत्र | Beej mantra of Venus

ऊँ द्रां द्रीं द्रौं स: शुक्राये नम:
एक संकल्प समय में 6000 बार)

शुक्र का वैदिक मंत्र | Vedic mantra for Venus

हिमकुन्द मृ्णालाभं दैत्यानां परमं गुरुम।
सर्व शास्त्र प्रवक्तारं भर्गव प्रणामाम्यहम ।।

शुक्र के लिए वस्तुओं का दान | What are the things that can be donated for Venus

शुक्र के लिए घी, कपूर, दही, चांदी, चावल, चीनी, सफेद वस्त्र और फूल या गाय.  इन वस्तुओं का दान शुक्रवार को सूर्यास्त के समय करना चाहिए.

शुक्र ग्रह का रंग-रुप | Physical features of a person with Venus sign

शुक्र ग्रह को सुन्दर शरीर वाला, बडी आंखे दिखने में आकर्षक, घुंघराले बाल, काव्यात्मक, कफमय कम खाने वाला, छोटी कद-काठी, दिखने में युवा बताया गया है.

शुक्र से संबंधित रोग | Diseases caused by the influence of Venus

शुक्र शरीर में वायु, कफ. आंखें, जननागं पेशाब, वीर्य का प्रतिनिधित्व करता है. शुक्र के कमजोर होने पर व्यक्ति को यौन संबन्धित रोग, मधुमेह, पेशाब की थैली, गुरदे में पथरी, मोतियाबिन्द, बेहोशी, के दौरे, जननांग संबन्धित परेशानियां, सूजन, शरीर में यंत्रणात्मक दर्द, श्वेत प्रदर, मूत्र सम्बन्धित रोग, चेहरे, आंखों और गुप्तागों से संबन्धित रोग, खसरा, स्त्रियों में माहवारी और उससे संबन्धित रोग परेशान कर सकते हैं.

शुक्र के विशिष्ट गुण | Specific qualities of a person with Venus

शुक्र व्यक्ति में काव्यात्मक प्रकृ्ति देता है, शुक्र इन्द्रिय सुख, उत्तेजना, जीव आदि का कारक ग्रह है.  वह भौतिक सुख-सुविधाओं का कारक ग्रह है. चमक-दमक का प्रतिनिधित्व करता है. शुक्र से काम सुख, कला और संस्कृति देखी जाती है.

शुक्र के व्यवसाय और कार्यक्षेत्र | Venus related profession and business

शुक्र आजीविका भाव में बली अवस्था में हो, दशमेश हो, या फिर दशमेश के साथ उच्च राशि का स्थित हो, तो व्यक्ति में कलाकार बनने के गुण होते है. वह नाटककार और संगीतज्ञ होता है. उसकी रुचि सिनेमा के क्षेत्र में काम करने की हो सकती है.  शुक्र से प्रभावित व्यक्ति कवि, चित्रकार, वस्त्र विक्रेता,वस्त्र उद्योग, कपडे बनाने वाला, इत्र, वाहन विक्रेता, वाहन बनाने वाले, व्यापारिक संस्थान, आभूषण विक्रेता, भवन बनाने वाले इंजिनियर, दुग्धशाला, नौसेना, रेलवे, आबकारी, यातायात, बुनकर, आयकर, सम्पति कर आदि का कार्य करता है.

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कुण्डली में कुसुम योग | Kusum Yoga in a Kundali | Kusum Yoga

ज्योतिष शास्त्र में कुसुम योग का महत्व विस्तार पूर्वक बताया गया है. कुसुम योग बनने के प्रभाव स्वरुप व्यक्ति का जीवन किस प्रकार से प्रभावित होता है इस तथ्य को अनेक ज्योतिष से संबंधित पुस्तकों में जाना जा सकता है. जातक परिजात के अनुसार इस योग में उत्पन्न होने वाला जातका शुभ फलों को पाता है. जीवन में उच्च कुल का स्वामी बनता है तथा पांण्डित्य से युक्त होता है. इस योग में उत्पन्न व्यक्ति सुखी, भोगी, विद्वान, प्रभावशाली, होता है.

कुसुम योग का निर्माण | Formation of Kusum Yoga

स्थिर लग्ने भृगौ केन्द्रे त्रिकोणेन्द्रौ शुभेतरे।
मानस्थानगते सौरे योगोऽयं कुसुमो भवेत्।।

कुण्डली स्थिर राशि लग्न की हो तथा शुक्र केंद्र में हो और चंद्रमा त्रिकोण में शुभ ग्रहों से युक्त हो तथा शनि दशम स्थान में हो तो कुसुम योग का निर्माण होता है. लग्न चर राशि का, शुक्र केन्द्र में, शुभ ग्रह युक्त चंद्रमा त्रिकोण में, शनि दशम भाव में स्थित हो तो कुसुम योग बनता है. कुछ लोगों के अनुसार इस योग के निर्माण में स्थिर लग्न के बजाय चर लग्न होना चाहिए.

एक अन्य विचार अनुसार स्थिर लग्न में गुरू स्थित हो. दशम भव में शनि दूसरे भाव में सूर्य और पंचम अथवा नवम भाव में चंद्रमा के स्थित होने से कुसुम योग का निर्माण होता है.

त्रिफला के अनुसार :- लग्नात्सप्तमगे चन्द्रे चन्द्रादष्टमगे रवौ।
गुरूणा स्थीयते लग्ने कुसुमो योग ईरित: ।।

यदि लग्न में सप्तम चंद्रमा हो, चंद्रमा से अष्टम अर्थात जन्म लग्न से द्वितीय में सूर्य हो और लग्न में बृहस्पति स्थित हो तो कुसुम योग का निर्माण होता है.

कुसुम योग का प्रभाव | Effects of Kusum Yoga

जातक परिजात अनुसार :- दाता महीमण्डलनाथबन्द्यो भोगी महावंशजराजमुख्य: ।
लोके महाकीर्तियुक्त: प्रतापी नाथो नाराणां कुसुमोद्भव: स्यात।।

कुण्डली में निर्मित कुसुम योग जातक को दान पुण्य करने वाला बनाता है. जातक का जन्म उच्च कुल में होता है. जातक को उच्च पद की प्राप्ति होती है, यश, कीर्ति और सम्मान की प्राप्ति होती है. जातक की यह स्थिति ग्रहों के बलाबल पर आधारित होती है.

व्यक्ति राजा के समान सुख सुविधाओं से संपन्न होता है. वह परिवार का तथा समाज का मुखिया हो सकता है. गुणी, दानी तथा विद्वान लोगों की कुण्डली में अवश्य ही कुसुम योग पाया जाता है.

यदि आपकी कुण्डली में लग्न चर राशि – मेष, कर्क, तुला या मकर का है, शुक्र केन्द्र में स्थित है, चंद्रमा शुभ ग्रहों से युक्त त्रिकोण में स्थित है और शनि दशम भाव है तो कुसुम योग बनता है. सीताराम झा के ने चर लग्न की बजाय स्थिर लग्न को मुख्य माना है. उनके अनुसार लग्न में चर राशि के स्थान पर स्थिर राशि – वृष, सिंह, वृश्चिक या कुंभ होनी चाहिए.

कुसुम योग के प्रभाव से आप राज वैभव के समान सुख सुविधाओं से युक्त तथा संपन्न व्यक्ति हो सकते हैं. वर्तमान समये में व्यक्ति किसी उच्च पद पर आसीन या मंत्री पद प्राप्त कर सकते हैं. इसलिए तो इस योग के प्रभाव से व्यक्ति कुसुम के समान प्रसन्नचित्त तथा स्वभाव से विनम्र होता है. यह योग कुण्डली को मजबूती प्रदान करने में सहायक होता है जिस कारण जीवन में नई उर्जा शक्ति और साहस का आगमन देखा जा सकता है.

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