अधियोग | Adhi Yoga | Adhi Yoga in a Kundli

ज्योतिष शास्त्र के अनेक ग्रंथों में अधियोग की कल्पना को अभिव्यक्त किया गया है. अधियोग को पापाधियोग और शुभाधियोग दो भागों में विभाजित किया गया है. इस योग में यदि जन्मकालीन चंद्रमा से बुध, बृहस्पति और शुक्र षष्ठम सप्तम एवं अष्टम भाव में स्थित होने पर अधियोग की संरचना होती है परंतु बाद के कुछ ज्योतिष विचारकों के अनुसार चंद्रमा के स्थान पर यदि लग्न से छठे, सातवें और आठवें भाव में शुभ ग्रह स्थित हों तो लग्नाधियोग के निर्माण को बल मिला.

इसके अतिरिक्त छठे भाव में तीनों ग्रह हों अथवा सातवें या आठवें में या एक स्थान में एक और एक स्थान में दो या तीनों भावों में एक-एक ग्रह स्थित हों तथा बुध, बृहस्पति और शुक्र तीनों ग्रहों का षष्ठम, सप्तम, और अष्टम भाव में रहना आवश्यक माना गया है.

चंद्रमा अथवा लग्न से षष्ठ, सप्तम एवं अष्टम भाव में
बृहस्पति, शुक्र और बुध के होने से निर्मित होता है.

अधियोग एक महत्वपूर्ण एवं विलक्षण राजयोग है जिसमें बुध, बृहस्पृति और शुक्र का षष्ठम, सप्तम अष्टम भाव में स्थित होना आवश्यक माना गया है और इन ग्रहों को किसी भी पाप ग्रहों से युक्त या पापक्रांत नहीं होना चाहिए तभी इस योग का होना संभव होता है. अधियोग दो प्रकार से बनता है पहला जब चंद्रमा से तीनों शुभ ग्रह छह, सात और आठ भावों में स्थित हों तब यह चंद्राधि योग निर्मित होता है. दूसरा जब लग्न से तीनों शुभ ग्रह छह, सात, आठ भावों में स्थित हों तब इससे लग्नाधि योग निर्मित होता है.

बृहत्पाराशर होराशास्त्र अनुसार | According to Brihatparashara Hora Shastra

षट्सप्ताष्टगै: सौम्यैर्लग्नाच्चन्द्राच्च संस्थितै:।
पाप दृग्योगदीनैश्च सुखे शुद्धेधियोगवान् ।।

यदि चंद्रमा से छठे, सातवें और आठवें भाव में बुध, गुरू और शुक्र स्थित हों एवं पाप दृष्टि से रहित हों तो चंद्राधियोग की रचना होती है और इसी प्रकार यदि लग्न से 6,7 और 8 में शुभ ग्रह हों तो यह लग्न से निर्मित योग बनना माना जाता है. लग्नाधियोग में चतुर्थ स्थान में कोई अशुभ ग्रह नहीं होना चाहिए अन्यथा यह योग भंग हो जाता है.

अधियोग का फल | Effects of Adhi Yoga

शस्त्रकृद् विबुधो वित्तविद्या गुणयशोधिक:।
बलाधिकारी मुख्यश्य जातो लग्नाधियोगके।।

इस योग में उत्पन्न होने वाला जातक शात्रों का निर्माता विद्वान होता है उसके पास धन, विद्या और मान सम्मान होता है. ऎसा जातक बलाधिकारी अर्थात सेनापति या समर्थक बनता है.

चन्द्रा दथाधियोग तु राजा मन्त्री चमूपति:।
बलक्रमादृभवेज्जात: सर्वसम्पद्युत: सुखी।।

जातक की कुण्डली में बनने वाला यह योग जातक को बलशाली बनाता है वह राजा, मंत्री या सेनापति जैसे पद प्राप्त कर सकने में सक्षम होता है. व्यक्ति को समस्त सुख संपत्ति का उपभोग करने वाला बनता है. इस योग में यदि यह तीनों ग्रह बुध, गुरू और शुक्र तीनों ग्रह पूर्ण रुप से बली हों तो अधियोग में उत्पन्न जातक भू-संपदा का स्वामी बनता है.

यदि यह तीनों ग्रह मध्यबली हों तो जातक मंत्री जैसा पद प्राप्त करता है. परंतु यदि शुक्र, गुरू और बुध अल्पबली हों तो व्यक्ति में नेता बनने जितना ही सामर्थ्य होता है. इस योग में जातक लक्ष्मीवान दीर्घायु और मनस्वी बन सकता है. जातक के अधिनस्थ अनेक लोग काम करते हैं तथा जातक अनेक लोगों का भरण करने में समर्थ भी होता है.

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ग्रह स्थिति में दशा फल | Results of Dasha according to state of planets

संपूर्ण दशा | Sampoorna Dasha

जन्म कुण्डली में जो ग्रह उच्च राशिस्थ या अतिबल (षडबल) हो उसकी दशा अन्तर्दशा संपूर्णदशा कहलाती है. इस दशा काला में मनुष्य सुख वैभव एवं समृद्धि प्राप्त कर पाता है. जातक को धन, स्वास्थ्य, भूमि, भवन मान सम्मान एवं यश प्राप्त होता है.

पूर्णादशा | Poorna Dasha

जो ग्रह स्वराशि में, शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हों तथा जिसका इष्ट फल अधिक हो उसकी दशा या अन्तर्दशा मे पदोन्नति, लाभ, सफलता और सुख प्राप्त होता हे.

शुभ दशा | Shubha Dasha

जो ग्रह मित्र क्षेत्री, मित्र या शुभ ग्रह से युक्त अथवा दृष्ट हों या वर्गोत्तम या उच्च नवांश स्थित हों अथवा सप्तवर्ग बली हों तो उस ग्रह की दशा उन्नति एवं प्रगति प्रदान करने में सहायक होती है. तथा जातक को सुख, वैभव एवं धन की प्राप्ति होती है.

आरोहिणी दशा | Aarohini Dasha

जो ग्रह अपनी नीच राशि को छोड़कर कुण्डली में अपनी उच्च राशि की ओर बढ़ रह हो तो उस ग्रह की दश या अन्तर्दशा आरोहिणी दशा कहलाती है, आरोहिणी दशा महत्वकांक्षी बनाती है  और जातक को अपनी इच्छा की पूर्ति करने के लिए परिश्रम द्वारा धन धान्य की प्राप्ति कराती है तथा जातक को अच्छा स्वास्थ्य एवं समाज में सम्मानीत स्थान प्रदान करती है. इस स्थिति में व्यक्ति के शत्रु और रोग नष्ट होते हैं या व्यक्ति उन्हें दबाने में समर्थ हो जाता है.

अवरोहिणी दशा | Avrohini Dasha

जन्मांग में जो ग्रह परमोच्च स्थिति को छोड़कर अपनी नीच राशि की ओर अग्रसर हो रहा हो वह अपनी दशा या अन्तरदशा आने पर रोग, पीड़, कलेश, चिंता, धन हानि प्रदान करता है. इस स्थिति में परेशानियों में इजाफा होने लगता है अत्यधिक व्यय भी होता है.

अशुभ दशा | Ashubh Dasha

जन्मांग में जो ग्रह नीच राशिस्थ, शत्रु क्षेत्री अथवा नवांश में नीचस्थ या शत्रु राशि में हो या शत्रु ग्रह से युक्त हो तो उसकी दशा या अन्तर्दशा में जातक को अनेक विषम स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है. भय, क्लेश, परेशानियों एवं बाधाओं को झेलना पड़ सकता है.

रिक्ता दशा | Rikta Dasha

जो ग्रह अति नीच, षड़बल में निर्बल या पिड़ित होता है, तो उसकी दशा रिक्ता अर्थात शुभ प्रभावों से वंचित दशा कहलाती है. इस दशा में जीवन में अनेकों उतार चढाव देखने को मिलते हैं. दुख सुख का समय लगा ही रहता है.

अनिष्ट दशा | Anishta Dasha

परम नीच, शत्रु राशि, शत्रु या नीच नवांश, पाप ग्रह से युक्त या दृष्ट ग्रह की दशा अन्तर्दशा अनिष्टकारी होने से अनिष्ट दशा होती है. इस दशा अवधि में जातक रोग, कष्ट, संकट पाता है. धन एवं सुख में कमी आती है. जातक की शिक्षा बाधित हो सकती है या उसे व्यवसाय में उतार-चढा़व झेलने पड़ सकते हैं.

कष्ट दशा | Kashta Dasha

सूर्य के अत्यधिक नज़दीक होने के कारण ग्रह अस्त कहलाते हैं. ऎसे अस्त ग्रह प्राय: शुभ फल देने में असमर्थ होते हैं. यदि शुक्र या मंगल अस्त हों तो दांपत्य सुख की हानि करते हैं. इसी प्रकार गुरू, शनि अस्त होने पर उक्त भाव से संबंधि कष्ट एवं परेशानियां दे सकते हैं

भाग्येश और गुरू का संबंध | Relation between Jupiter and Master of luck

दशानाथ ग्रह से केन्द्र या त्रिकोण भाव में गुरू या भाग्येश हो अथवा दशानाथ पर गुरू या भाग्येश की की दृष्टि हो तो दशा काल में भाग्योदय होता है. जातक को सुख एवं सम्मान की प्राप्ति होती है.

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राहु ग्रह आपके लिये कैसा है? ज्योतिष द्वारा जानिये

राहु के विषय में अनेकों कथाएँ शास्त्रो तथा पुराणों में मिलती है. राहु की जानकारी ब्रह्म पुराण, विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण, ऋग्वेद, महाभागवत तथा महाभारत आदि में मिलती है.राहु को ग्रहों में क्रूर स्वभाव तथा बुद्धि को भ्रमित कर देने वाले ग्रह के नाम से जाना जाता है. राजनीति व कूटनीति संबंधी बातों का कारक भी राहु होता है. कुण्डली में राहु यदि शुभ स्थिति में और बली है तभी आपको राजनेता की सहायता से नौकरी मिल सकती हैं  क्योंकि राहु को राजनेता, राजदूत का भी कारक ग्रह माना गया है.

वैदिक ज्योतिष में राहु

वैदिक ज्योतिष में राहु की गणना सभी राशियों में भिन्न होती है. कुण्डली में राहु की उच्च-नीच राशि में स्थिति, स्वराशि या मूलत्रिकोण राशि में स्थिति सभी का फल भिन्न होता है. कुण्डली में राहु यदि कन्या राशि में है तो राहु अपनी स्वराशि का माना जाता है.  यदि राहु कर्क राशि में है तब वह अपनी मूलत्रिकोण राशि में  माना जाता है. कुण्डली में राहु यदि वृष राशि मे स्थित है तब यह राहु की उच्च स्थिति होगी. राहु उच्च का कहलायेगा. यह राहु की अति बली अवस्था होती है. मतान्तर से राहु को मिथुन राशि में भी उच्च का माना जाता है.

कुण्डली में राहु वृश्चिक राशि में स्थित है तब वह अपनी नीच राशि में कहलाएगा. मतान्तर से राहु को धनु राशि में नीच का माना जाता है. राहु की यह स्थिति अपनी उच्च राशि के एकदम विपरीत होती है. नीच का राहु होने से आपके भीतर कुतर्क करने की प्रवृ्ति में वृद्धि हो सकती है. राहु के नैसर्गिक मित्र बुध, शुक्र तथा शनि हैं. मंगल और गुरु का राहु से सम संबंध माना जाता है. राहु के शत्रु सूर्य तथा चन्द्रमा है.

नैसर्गिक मित्रता के अलावा “तात्कालिक मैत्री” भी ग्रहों की होती है. यह कुण्डली में ग्रहों की स्थिति पर आधारित होती है. राहु आपकी कुण्डली में जिस भाव में स्थित है, उस भाव से तीन भाव आगे और उसी भाव से तीन भाव पीछे स्थित ग्रह राहु के मित्र माने जाएंगे. चाहे वह ग्रह नैसर्गिक शत्रु ही क्यों  ना हो.

राहू व्यक्ति को शोध करने की प्रवृ्ति देता है, राहू की कारक वस्तुओ में निष्ठुर वाणी युक्त, विदेश में जीवन, यात्रा, अकाल, इच्छाएं, त्वचा पर दाग, चर्म रोग, सरीसृ्प, सांप और सांप का जहर, विष, महामारी, अनैतिक महिला से संबन्ध, दादा,नानी, व्यर्थ के तर्क, भडकाऊ भाषण, बनावटीपन, विधवापन, दर्द और सूजन,डूबना, अंधेरा, दु:ख पहुंचाने वाले शब्द, निम्न जाति, दुष्ट स्त्री, जुआरी, विधर्मी, चालाकी, संक्रीण सोच, पीठ पीछे बुराई करने वाले, पाखण्डी.

राहू पुरुष प्रधान ग्रह है. राहू पंचम भाव में व्यक्ति को पुरुष संतान देता है. राहू की दिशा दक्षिण-पश्चिम है. राहू के लिए किए जाने वाले कार्य इस दिशा में करने उत्तम फल देने वाले समझे जाते है.

राहू का रत्न गोमेद या आँनिक्स है, आँनिक्स को सुलेमानी पत्थर के नाम से भी जाना जाता है.

राहु का बीज मंत्र | Rahu’s Beej Mantra

ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम:

राहू की कारक वस्तुएं | Rahu’s Karak things

राहू व्यक्ति को भौतिकता, बूढा दिखना, गंजापन, सर्वातिशायी,  सिद्धान्तवादी, जहां बैठा हो उस राशि और नक्षत्र के स्वामी, राहू विदेशियों, विदेशी जातियों, विदेश ओर विदेश यात्राओं को दर्शाता है.

राहू के विशिष्ट गुण | Rahu’s qualities

राहु शरीर में पैर, सांस प्रणाली का प्रतिनिधित्व करता है. यह वैराग्यकारक, ज्ञानकारक, सनक, विदेश यात्राएं देता है. राहु व्यक्ति से शोध कार्य कराता है, जोखिम के कार्य, वकील, विद्वान, औषधी, दूरभाष, बिजली, हवाई विमान सेवा, जहाज से सम्बन्धित कार्य, वायुयान चालन, कम्प्यूटर, इलेक्ट्रोनिक्स व सूचना प्रौद्योगिकी, कडे और क्रूर स्वभाव के व्यवसाय, खाल और चमडा, जादू, शव सम्बन्धित शवग्रह वधशाला, दुर्गन्द वाले गन्दे स्थान, संपेरा, पहलवान, नीच कार्य, कसाई वाले कार्य, चोरी, जादू-टोना, जुआ खेलना, विषैली दवाईयां, नवीनतम खोजी गई वस्तुएं और उनका कार्य, वैज्ञानिक शोध और इलेक्ट्रोन के क्षेत्र में कार्य दे सकता है.

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पाप ग्रह कब देते हैं शुभ फल | When do malefic planets give auspicious results

ज्योतिष शास्त्र में मंगल, शनि, राहु केतु को पाप ग्रहों की श्रेणी में रखा गया है और सूर्य को क्रूर ग्रह कहा जाता है. परंतु यहां यह अर्थ बिल्कुल भी नहीं है कि यह ग्रह शुभ फलों को प्रदान नहीं करते. अपितु हम इस तथ्य को बताने का प्रयास करना चाहेते हैं कि कुण्डली में कौन से भाव में बैठे यह पाप ग्रह कब शुभ फल प्रदान करने वाले बन जाते हैं. पाप ग्रह 3 6, 8 और 12वें भाव में बैठे होने पर शुभ फल प्रदान करने वाले माने जाते हैं.

दशा फल के लिए तृतीय, षष्ठम, अष्टम और द्वादश भाव अशुभ माने जाते हैं अत: इन स्थानों में बैठे अशुभ ग्रह शुभ फलों के देने वाले हो जाते हैं.

केन्द्र स्थान में | Malefic in the Kendra

केन्द्र भाव को सुरक्षा स्थान कहा जाता है यह विष्णु स्थान है, इसलिए इनमें स्थित ग्रह प्राय: अशुभ व अनिष्ट फल नहीं देते और अशुभ तथा पाप ग्रह भी अनिष्ट नहीं कर पाते और वह शुभता देने वाले हो जाते हैं.

पाप ग्रह शुभ ग्रहों से दृष्ट | Malefic planets aspected by auspicious planets

नैसर्गिक पाप ग्रह सूर्य, शनि, मंगल औत राहु-केतु यदि पाप भावों में स्थित हों तो अपनी दशा में प्रेम एवं सहयोग प्रदान करने वाले हो जाते हैं. रोग-ऋण का नाश तथा बाधा और कष्ट को समाप्त करके मान सम्मान में वृद्धि करने वाले बनते हैं.

इसी प्रकार पाप ग्रह दुष्त भाव के स्वामी कहीं भी स्थित होकर यदि शुभ ग्रहों से या शुभ भावों के स्वामीयों से युक्त या दृष्ट हों तो वह दुष्ट ग्रह भी अपनी दशा में रोग, दोष, पीडा़, भय से मुक्ति दिलाकर वैभव बढाने वाले होते हैं.

दिग्बली पाप ग्रह | Digbali (Directional Strength) Malefic Planet

दिग्बली पाप ग्रह की दशा भी प्राय: स्वास्थ्य, सम्मान, धन सुख व समृद्धि दिया करती है. क्रूर या पाप ग्रह मंगल, शनि, सूर्य दिग्बली होने पर सदा शुभ एवं अच्छे फल देते हें.

पाप ग्रह का दु:स्थान से संबंध | Relationship of Inauspicious Planet with the Inauspicious House

पाप ग्रह का दु:स्थान से संबंध होने या उसका स्वामीत्व होने पर दुख, दरिद्र व शत्रु का नाश करता है. दु:स्थान में स्थित पाप ग्रह यदि शुभ व योग कारक ग्रहों से युक्त या दृष्ट हों तो वह अपनी दशा अन्तर्दशा में रोग, शोक से मुक्ति दिलाकर स्वास्थ्य, सम्मान एवं सुख समृद्धि को प्रदान करते हैं. पाप ग्रह प्राय: दु:स्थान में स्थित होकर अनिष्ट व अशुभ का नाश करते हैं.

केन्द्र और त्रिकोण से संबंध | Relation between Kendra and Trikon

शुभ ग्रह केन्द्र व त्रिकोण में सुभ फल देते हैं किंतु पाप ग्रह जिसमें कमजोर चंद्रमा, पापयुक्त बुध, सूर्य, शनि और मंगल केन्द्र के स्वामी होने पर अपना पाप फल नहीं दे पाते. यदि कोई पाप ग्रह केन्द्रेश एवं त्रिकोणाधीश भी हो तो उस स्थित में वह शुभ बन जाता है और ऎसा ग्रह अपनी दश अन्तर्दशा में स्वास्थ्य, सुख सम्मान की वृद्धि करता है.

राहु केतु दशा फल | Rahu-Ketu Dashaphal

यदि कुण्डली में तमोग्रह या राहु केतु केन्द्र भाव में स्थित होकर त्रिकोणाधिपति ग्रह से युक्त या दृष्ट हों अथवा त्रिकोण पंचम और नवम भाव में केन्द्रेश से युक्त दृष्ट होकर स्थित हों तो वह अपनी दशा में धन सम्मान एवं सुख की वृद्धि करते हें.

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कूर्म योग | Kurma Yoga | Yoga in a Kundali | Kurma Yoga Effects

कूर्म योग अपने नाम की सार्थकता को इस प्रकार व्यक्त करता है कि कुण्डली में बनने वाला यह योग कूर्म के समान दिखाई देता है. जिस प्रकार कूर्म के पैर अनेक दिशाओं में फैले हुए से रहते हें उसी प्रकार इस योग में ग्रह 1,3,5,6,7,और 11 भावों में फैले हुए होते हैं.  कूर्म योग में शुभ ग्रहों के उच्च राशि, स्वराशि, मित्र राशि या नवांश में स्थित होकर पंचम, षष्ठ एवं सप्तम भाव में स्थित होने से इस योग को देखा जा सकता है.

शुभ ग्रहों के उच्च राशि, स्वराशि, मित्र राशि या नवांश में स्थित होकर लग्न, तृतीय अथवा एकादश भाव में स्थित होने से यह योग शुभ फल देने वाला बनता है.

जातक परिजात के अनुसार | According to Jataka Parijata

कलत्र पुत्रारिगृहेषु सौम्या: स्वतुग मित्रांशकराशियाता:।
तृतीय लाभो दयगास्त्व सौम्या मित्रोच्चसंस्था यदि कूर्म रोग:।।
विख्यात कीर्तिर्भुवि राजभोगी धर्माधिक: सत्त्व गुण प्रधान:।
धीर: सुखी वागुपकारकर्ता कूर्मोद्भवो मानव नायको वा।।

कूर्म योग का निर्माण | Formation of Kurma Yoga

कूर्म योग ज्योतिष की योग श्रृखला में अपने महत्व को प्रदर्शित करने में सार्थकता पाता है. इस योग के निर्मित होने में कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों पर विचार किया जाता है. यहां पर हम इसके निर्माण रुप को इस प्रकार समझ सकते हैं कि यदि जन्म कुण्डली में पांचवें, छठे तथा सातवें भाव में शुभ ग्रह दीप्त, स्वस्थ या मुदित अवस्था में स्थित हों तो इस योग को बनने में सहायता प्राप्त होती है.

एक अन्य विचार के अनुसार यदि जन्म कुण्डली में तीसरे, एकादश तथा लग्न भाव में अशुभ ग्रह दीप्त या स्वस्थ अवस्था में हों तो इस योग को देखा जा सकता है. किंतु इस बात पर भी ध्यान देने की बात है कि यदि उपरोक्त दोनों शर्ते पूरी हो रहीं हैं तो जातक की कुण्डली में कूर्म योग अच्छा एवं दृढ़ रूप में बनेगा अन्यथा इसके बनने में कमी रह जाएगी.

कूर्म योग का प्रभाव | Effects of Kurma Yoga

कूर्म योग बनने के लिए जन्म कुंडली में पांचवें, छठे तथा सातवें भाव में शुभ ग्रह दीप्त, स्वस्थ या मुदित अवस्था तथा तीसरे, एकादश तथा लग्न भाव में अशुभ ग्रह दीप्त या स्वस्थ अवस्था में होने हि चाहिए. इस प्रकार से बना यह योग जातको अच्छे फल प्रदान करने में सहायक होता है. यदि आपकी जन्म कुंडली में उपरोक्त दोनों शर्ते पूरी हो रही हैं तभी कूर्म योग का निर्माण होगा क्योंकि इस योग में मौजूद ग्रहों की स्थिति कूर्म की आकृति जैसी होनी चाहिए. कूर्म योग के प्रभाव के विषय में ज्योतिष शास्त्रों में कई प्राकार की टिप्पणीयां कि गई हैं जिसके अनुसार:-

पुत्रा रिमदने सौम्या: स्वोच्चक्षिशादिगो: खला:।
त्रिलाभोदयगा: स्वाच्चभांशगा: कच्छपो मत:।।

कूर्म योग के प्रभाव से व्यक्ति राजा के समान होता है, गुणवान होता है, धार्मिक होता है. यदि कुंडली में कूर्म योग बन रहा है तब जातक सुख तथा वैभव से भरपूर हो सकते हैं. इस योग के प्रभाव से व्यक्ति उपकारी होता है, धीर- वीर गंभीर होता है तथा घर की ओर से भी सुखी रह सकता है. इस योग में उत्पन्न होने वाला जातक किर्तिवान, विख्यात होता है उसके परोपकार को दुनिया देखती है उसके मान सम्मान में इजाफा होता है. जातक दूसरों के लिए दानी और उपकारी व्यक्ति बनता है. जातक के भीतर धार्मात्मा जैसे सत्व गुणों का वास देखा जा सकता है. वह धार्मिक कार्यों को रूचि से करने वाला यज्ञादि कार्यों अपना सहयोग देने वाला बनता है

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दशा में भाव कारक तत्व विचार | Karak elements of houses during Dasha

दशानाथ जिस भाव का स्वामी या कारक होता है वह उसके फल अपनी दशा भुक्ति में कई प्रकार से देने का प्रयास करता है. जैसे कि कोई ग्रह जिस भाव में स्थित है उस भाव का फल वह पहले देगा, उसके पश्चात वह जिस राशि में है उस राशि के गुणों के अनुसार फल प्रदान करेगा. और जिन ग्रहों की उस पर दृष्टि होगी या जिन ग्रहों द्वारा दशानाथ दृष्टित है उनके प्रभाव के अनुसार फल प्रदान करेगा.

लग्न की दशा | Ascendant’s Dasha

लग्न जातक के स्वास्थ्य एवं शाररिक बनावट को दर्शाता है तथा देह संबंधि सुख दुखों का निर्धारण करता है. लग्नेश की दशा में लग्न के शत्रु जैसे षष्ठेश या शत्रु ग्रह के समय शरीर को कष्ट एवं मृत्यु तुल्य कष्ट भोगना पड़ सकता है. इस बात को इस प्रकार से समझा जा सकता है कि लग्न का संबंध आयुष्य और शरीर से होता है और इस कारण स्वास्थ्य प्रभावित होना स्वाभाविक होगा ही.

द्वितीय भाव | Second house

यह भाव कुटुंब एवं धन संपदा को दर्शाता है इसके साथ ही साथ यह नेत्र और वाणी का कारक भी है. इस प्रकार धनेश अपनी दशा समय धन, परिवार का सुख ओर प्रभावशाली वाणी प्रदान करने में सहायक होता है.

धनेश का सूर्य से संबंध होने पर जातक परोपकारी, धनी एवं विद्वान होता है. किंतु धनेश का संबंध शनि से होने पर विद्या प्राप्ति में बाधा का संकेत मिलता है.

सूर्य या चंद्रमा के निर्बल, शत्रु क्षेत्रिय या दृष्ट अथवा नीच होने पर नेत्र एवं मन की स्थिति में विकार उत्पन्न हो सकते हैं. यदि यह केतु या मंगल से दृष्ट हों तो नेत्र हीनता या दृष्टि संबंधि दोष हो सकता है.

तृतीय भाव | Third house

यह भाव साहस पराक्रम, भाई बहन, का प्रतीक होता है. यदि जन्मांग में द्वादशेश तीसरे भाव में हो तो वह तृतीय भाव की हानि कर सकता है. ऎसा जातक भी बंधुओं के सुख से वंचित रह सकता है. अन्यथा इनसे द्वेष व ईर्ष्या का भाव रख सकता है.

इसी प्रकार तृतीयेश का अष्टम या अष्टमेश से संबंध होने पर जातक में आत्महत्या एवं हीनता की भावना देखी जा सकती है.

चतुर्थ भाव | Fourth house

चतुर्थेश की दशा में चंद्रमा की भुक्ति जातक को जनता का प्रिय बना सकती है तथा राजनीति में सफलता को दर्शाती है.

चतुर्थ भाव पिड़ित होने पर या चतुर्थेश पाप ग्रहों से दृष्ट होने पर चतुर्थेश अपनी दशा में राजद्रोह या जातक की लोकप्रियता में नुकसान को दर्शाता है. चतुर्थेश या चंद्रमा का नीचस्थ होना चुनाव में पराजय दिला सकता है.

पंचम भाव | Fifth house

पंचम भाव में राहु केतु की स्थिति हो तथा पंचमेश बली, शुभग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो पंचमेश की दशा भुक्ति के समय अचानक धन लाभ के योग बन सकते हैं. इसके अतिरिक्त अपनी दशा काल में कोई भी योग कारक ग्रह का राहु केतु से संबंध होने पर वह अपनी दशा में धन लाभ प्रदान करता है.

षष्ठम भाव | Sixth house

यह रोग, रिपु और ऋण का भाव कहलाता है. यदि षष्ठेश अपनी दशा अंतर्दशा में प्राय: रोग एवं शत्रु भय द्वारा उतपन्न हो सकता है.

यदि दशास्वामी का षष्ठेश ग्रह की अन्तर्दशा हो अथवा दशानाथ के नैसर्गिक शत्रु की भुक्ति में प्राय: अनिष्ट व पाप फल प्राप्त हो सकता है.

अंतर्दशा वाला ग्रह दशानाथ के साथ लग्नेश का भी शत्रु हो तथा दशानाथ से षष्ठ अथवा अष्टम भाव में हो तो जातक हानि या कष्ट उठा सकता है.

लग्नेश से षष्ठ भाव का स्वामी ग्रह अपनी दशा में रोग, शत्रु का भय दे सकता है.

सप्तम भाव | Seventh house

सप्तमेश की दशा अथवा सप्तम भाव के कारक शुक्र की दशा या बुक्ति में विवाह का योग देख अजा सकता है.

कुछ के अनुसार शुक्र के साथ गुरू की दशा या गोचर के गुरू की सप्तम भाव या सप्तमेश से दृष्टि होने पर वैवाहिक सुख को देखा जा सकता है.

अष्टम भाव | Eighth house

अष्टमेश पापी होकर लग्नस्थ हो तथा लग्न शुभ ग्रह की दृष्टि से वंचित हो तो अष्टमेश की दशा शाररिक कष्ट का संकेत देती है.

किंतु यदि अष्टमेश बली हो य अशुभ ग्रहों से युति संगत या दृष्ट हो तो जातक को लंबी आयु प्राप्त होती है. और अगर लग्नेश या अष्टमेश दोनों ही बली हों तो जातक अच्छा स्वास्थ्य एवं दीर्घायु पाता है.

नवम भाव | Ninth house

नवमेश की दशा बुक्ति में प्राय: भाग्योदय, पदोन्नति, धन लाभ एवं सुख की प्राप्ति देखी जा सकती है.

यदि नवमेश पापी हो या दशानाथ पाप ग्रह के साथ नवमस्थ हों तो दुख एवं अपमान की प्राप्ति होती है. जातक पर मिथ्या कलंक भी लग सकता है.

दशम भाव | Tenth house

दशमेश शुभ ग्रह हो तथा शुभता से पूर्ण अवं शुभ ग्रहों से दृष्ट या युति में हो तो इसकी दशा अन्तर्दशा में उन्नती एवं मान सम्मान की प्राप्ति होती है.

एकादश भाव | Eleventh house

लाभेश की दशा में धन संबंधि अच्छे फल प्राप्त होते हैं. किंतु इसी के साथ चिंता एवं क्लेश भी बढ़ सकते हैं.

एकादशेश भाव शरीर एक लिए प्राय: कष्टकारी हो सकता है यह अपनी दशा में धन लाभ तो देता है परंतु देह की हानि भी कर सकता है. लाभेश की दशा माता के लिए कष्टकारी हो सकती है.

द्वादश भाव | Twelfth house

यह व्यय का भाव है. द्वादशेश जिस भाव हो अथवा जिस ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो प्राय: उसका फल वह अपनी दशा में दे सकता है.

द्वादश भाव के स्वामी की दशा में शुभ ग्रह की भुक्ति में वैभव एवं सुख भी प्राप्त हो सकता है.

गोचर में शुभ ग्रह की द्वादश भाव पर दृष्टि या युति जातक को दान धर्म करने वाला बनाती है.

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शनि और मंगल का योग | Yoga of Saturn and Mars

सभी ग्रह समय – समय पर अपनी राशि परिवर्तित करते रहते हैं. सभी ग्रहों का एक  राशि में भ्रमण  का समय अलग ही होता है. कोई शीघ्र राशि बदलता है तो कई ग्रह लम्बी अवधि तक एक ही राशि में रहते हैं. सभी नौ ग्रहों  में एक शनि ऎसा ग्रह है जो सबसे अधिक समय तक  एक  राशि में रहता है. इसी तरह गोचर में कभी न कभी ग्रहों का संबंध एक साथ बनता है,जैसे अभी मंगल और शनि का युति संबंध बन रहा है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनि और मंगल दोनों ही क्रूर एवं पाप ग्रह माने जाते हैं.जहां एक और मंगल बहुत उग्र, क्रोधी हैं और इनकी प्रकृति तमस गुणों वाली मानी गई है.

इसी प्रकार अपनी धीमि गति से चलते हुए शनिदेव अपना असरदार प्रभाव देते हैं, अपने अद्वितीय तेज से दोनों ही ग्रह सभी को प्रभावित करते से दिखाई देते हैं. यह सभी पर ऊर्जावान कार्रवाई, आत्मविश्वास तथा अहंकार का प्रतिनिधित्व करते हैं. शनि और मंगल आपस में एक-दूसरे के शत्रु हैं. मृत्यु के कारक शनि और रक्त के कारक ग्रह मंगल एक दूसरे का के साथ युति में होना बहुत सी परेशानियों का कारण बन सकता है.

शनि-मंगल योग का प्रभाव | Effects of Saturn and Mars Yoga

कुंडली में शनि और मंगल की स्थिति बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है. जन्म कुंडली में इन दोनों ग्रहों की युति यानी एक ही भाव में साथ होना अच्छा संकेत नही माना जाता है .गोचर में भी शनि और मंगल की अशुभ युतियां देखी जा सकती हैं जिनका असर कुछ खास अच्छा नहीं होता है. इन ग्रहों का शत्रु के साथ होना अच्छा नहीं माना जाता है. यह दुघर्टना और संकट का सूचक बनते हैं.

शनि मंगल का दृष्टि संबंध बनना और षडाष्टक योग बनाना आपदाओं का कारण हो सकता है. हाल फिलहाल बनने वाला मंगल का शनि के साथ कन्या राशि में यह योग इस समय अनेक परेशानियों, दुर्घटनाओं का कारण बन सकता है. प्राकृतिक आपदाएं और राष्ट्रों  का आपसी मतभेद बढ़ सकता है. आतंकी घटनाओं में तेजी की संभावना देखी जा सकती है.

मंगल का राशि परिवर्तन का असर सभी पर दिखाई दे सकता है. मंगल राशि परिवर्तन और शनि के साथ युति से अचानक सफलता और वाणी एवं चतुराई में तेजी देखी जा सकती है. अनावश्यक गुस्सा और मानसिक तनाव बढ़ सकता है. नए उत्तरदायित्व मिल सकते हैं और व्यवसायियों को धन लाभ होने के योग बनते हैं. रूके हुए कार्य मेहनत से करने पर ही पूरे होंगे. वाहन, मशिनरी के क्रय- विक्रय से लाभ हो सकता है इस समय में दुर्घटना और धन हानि के योग भी बन सकते हैं. भूमि प्रॉपर्टी से संबंधित लोगों के लिए ये समय अच्छा रह सकता है. व्यर्थ के विवाद का  सामना भी करना पड़ सकता है.

वर्तमान में ग्रहों की स्थिति पर नजर डाले तो इस आधार पर मंगल का शनि से योग बना रहा है. ग्रहों की यह स्थिति राष्ट्र के मौजूदा घटना क्रम व वर्तमान उथल-पुथल का कारण बन सकती हैं. सांसारिक जीवन में आजीविका, नौकरी, कारोबार, सेहत या संबंधों के लिए मिले जुले परिणाम देने वाला हो सकता है.

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मंत्र जाप से राशि के दोष दूर कैसे करें. आईये देखें

ज्योतिष के अनुसार सभी बारह राशियों की अपनी कुछ विशेषता होती है. उसी के अनुसार उस राशि के मंत्र भी होते हैं. प्रत्येक व्यक्ति अपनी राशि के स्वामी को प्रसन्न करने के लिए एक विशिष्ठ मंत्र का जाप किया जाता है. ग्रहों का मानव जीवन पर काफी प्रभाव पडता है, ज्योतिष में राशि का निर्धारण जन्म के समय चंद्रमा की स्थिति से निर्धारित होता है. इसके अनुसार मेष राशि, वृष,  मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन राशि का निर्माण होता है.

राशि अक्षर | Alphabets associated with signs

मेष राशि – चू,चे,चो, ला, ली, लू, ले, लो, अ.
वृष राशि–  ई, उ,ए, ओ, वा,वी, वू,वे, वो.
मिथुन राशि – का, की, कू,घ,ड,छ,के, को, ह.
कर्क राशि – ही, हू, हे, हो, डा, डी, डू,डे,डो.
सिंह राशि– मा, मी,मू,मे,मो,टा,टी, टू, टे.
कन्या राशि– टो,प,पी, पू,ष,ण,ठ,पे, पो.
तुला राशि – रा, री, रू,रे, रो, ता,ती, तू, ते.
वृश्चिक राशि –  तो, ना, नी,नू,ने, नो, या, यी,यू.  
धनु राशि – ये, यो, भ,भी, भू, ध,फ,ढ,भे.
मकर राशि–  भो,जा, जी, खी,खू,खे, खो, ग,गी.
कुंभ राशि – गू, गे,गो, सा, सी, सू,से, सो, द.   
मीन राशि – दी, दू,थ,झ,ञ,दे, दो, चा,ची अक्षर आते हैं.

राशि मंत्र | Rashi Mantra

मेष : ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीनारायण नम:
वृषभ : ॐ गौपालायै उत्तर ध्वजाय नम:
मिथुन : ॐ क्लीं कृष्णायै नम:
कर्क : ॐ हिरण्यगर्भायै अव्यक्त रूपिणे नम:
सिंह : ॐ क्लीं ब्रह्मणे जगदाधारायै नम:
कन्या : ॐ नमो प्रीं पीताम्बरायै नम:
तुला : ॐ तत्व निरंजनाय तारक रामायै नम:
वृश्चिक : ॐ नारायणाय सुरसिंहायै नम:
धनु : ॐ श्रीं देवकीकृष्णाय ऊर्ध्वषंतायै नम:
मकर : ॐ श्रीं वत्सलायै नम:
कुंभ : ॐ श्रीं उपेन्द्रायै अच्युताय नम:
मीन : ॐ क्लीं उद्‍धृताय उद्धारिणे नम:

वैदिक ज्योतिष में मंत्रों का महत्व बहुत प्रभावशाली तरह से व्यक्त किया गया है. सभी राशियों के लिए कुछ मंत्र दिए गए हैं. इन मंत्रों के माध्यम व्यक्ति स्वयं को अनेक संकटों से लड़ने की शक्ति को पाता है. मंत्रों का सही उच्चारण और मन में सच्ची आस्था के साथ ही इन राशि मंत्रों का जाप शांति और संतोष प्रदान करने में सहायक होता है.

ग्रहों और राशि के अनुरुप यदि कोई भी व्यक्ति अपनी राशि के अनुसार उससे मंत्रों का जाप किया जाए तो व्यक्ति को अपनी अनेक समस्याओं और परेशानियों से काफी हद तक तक मुक्ति मिल सकती है. मंत्र पाठ से व्यक्ति हर प्रकार के संकट से मुक्त और आर्थिक संपन्नता को पाता है. राशि-मंत्र का नित्य 108बार जप करने से मंत्र सिद्धि में सहायता मिलती है. इसकी ऊर्जा द्वारा विकास का मार्ग प्रशस्त होता है.

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मुंथा क्या है और इसको अपनी कुण्डली में कैसे देखें?

वर्ष कुण्डली में गणना के संदर्भ में मुंथा का अत्यधिक उपयोग किया जाता है. जन्म कुण्डली में मुन्था सदैव लग्न में स्थित रहती है और हर वर्ष यह एक राशि आगे बढ़ जाती है. उदाहरण के लिए यदि किसी का जन्म मेष लग्न में हो तो जातक के जन्म समय मुन्था मेष राशि में होगी तथा आने वाले वर्ष में यह मुंथा वृष राशि में और इससे आगे आने वाले वर्ष में यह मिथुन में स्थित होगी इस तरह से प्रत्येक वर्ष मुंथा एक राशि आगे बढ़ जाती है.

मुंथा कोई ग्रह नहीं है लेकिन यह नवग्रहों के समान ही महत्व रखती है और इसके विचार द्वारा कुण्डली के अनेक प्रभावों का वर्णन किया जा सकता है. मुन्था के शुभ और अशुभ प्रभाव जातक के जीवन को पूर्ण रुप से प्रभावित करते हैं. ज्योतिष के अनेक शास्त्रों में हमें मुन्था के विषय में बहुत कुछ जानने को मिलता है जिसके द्वारा मुंथा का महत्व परिलक्षित होता है और मुथा की गणना को वर्ष कुण्डली में करके जातक के जीवन में घटने वाली घटनाओं को बताया जा सकता है.

मुंथा की गणना | Calculation of Muntha

मुंथा की गणना के लिए चाहिए की जन्म कुण्डली में लग्न की राशि संख्या ज्ञात करनी चाहिए जैसे यदि वह संख्या पांच है तो लग्न की राशि सिंह होगी.

जिन वर्षों के लिए मुंथा की गणना करनी होती है जन्म से उन पूरे वर्षों की संख्या को लग्न की संख्या से जोड़ देना होता है. यदि यह जोड़ 12 वर्ष से अधिक आता है तो इसे 12 से भाग दिजिए और जो शेष संख्या आए उसी में मुंथा स्थित होगी. यदि शेष संख्या शून्य आती है तो इसे बारहवीं राशि कहेंगे.

मुंथा का प्रभाव | Effect of Muntha

वर्ष कुण्डली में जन्म कुण्डली के लग्न की भांति मुंथा अत्याधिक महत्वपूर्ण होती है. वर्ष के फल तभी शुभ होंगे जब मुंथेश उच्च युक्त या स्वराशि से युक्त हो.

मुन्थेश शुभ ग्रहों से युक्त या उनसे प्रभावित है तो परिणाम अच्छे प्राप्त हो सकते हैं.

मुन्था 2, 9 10, 11 भाव में स्थित होने पर आर्थिक पक्ष की मजबूती को दर्शाती है. यह अच्छी व्यवसायिक स्थिति को दर्शाता है.

मुन्था की विपरित स्थिति | Conflicting situations of Muntha

भाव 4, 6, 8, 12  और सप्तम भाव में मुन्था अच्छी नहीं मानी जाती यह अशुभ परिणामदायक हो सकती है. इस प्रकार यदि मुन्था षष्ठेश, अष्टमेश अथवा द्वादशेश युक्त हो तो शुभ परिणाम प्रदान करने वाली होती है.

मुन्थेश यदि नीच का हो या नीचता से युक्त हो अथवा पिड़ित, निर्बल या शत्रु भाव में स्थित हो तो यह शुभ परिणाम प्रदान नहीं करता है.

मुन्था यदि क्रूर ग्रहों से दृष्ट हो तो विपरित फल प्रदान करती है.

वर्ष कुण्डली में मुन्था महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. मुन्था को ग्रह के जैसा ही महत्वपूर्ण माना जाता है. वर्ष कुण्डली में जिस भाव में मुन्था स्थित होती है उस भाव तथा भाव के स्वामी कि स्थिति को देखा जाता है. बली हैं या निर्बल है. 4,6,7,8,12 भाव में मुन्था का स्थित होना शुभ नहीं माना जाता है. इसी प्रकार हम वर्ष कुण्डली में वर्षेश तथा पंचाधिकारियों की स्थिति को भी देखा जाता है. वर्षेश की स्थिति कुण्डली में यदि कमजोर है तो शुभ नहीं है.इसके आधार पर वर्ष कुण्डली का फलित काफी हद तक निर्भर भी रहता है.

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वर्ग कुण्डलियाँ | Varga Kundali

ज्योतिष में कई वर्ग कुण्डलियों का अध्ययन किया जाता है. लग्न कुण्डली मुख्य कुण्डली होती है जिसमें 12 भाव स्थिर होते हैं और इन बारह भावों के बारे में विस्तार से जानने के लिए वर्ग कुण्डलियों का सूक्ष्मता से अध्ययन अवश्य करना चाहिए. कई बार लग्न कुण्डली में घटना का होना स्पष्ट रुप से दिखाई देता है पर फिर भी व्यक्ति को परेशानियों और बाधाओं का सामना करना पड़ता है या  लग्न कुण्डली में कई बार ग्रह बली होते हैं और वही ग्रह वर्ग कुण्डली में निर्बल हो जाता है तब अनुकूल फल मिलने में समस्याओं का सामना करना पड़ता है.  इस प्रकार वर्ग कुण्डलियों का अध्ययन करना अत्यंत आवश्यक होता है.

वर्ग कुण्डलियों में | Varga Kundli

D-1, D-2, D-3, D-4, D-7, D-9, D-10, D-12, D-16, D-20, D-24, D-27, D-30, D-40, D-45, D-60. इन सभी कुण्डलियों का अध्ययन किया जाता है.

जन्म कुण्डली | Janma Kundali (D-1)

यह लग्न कुण्डली है. जीवन के सभी क्षेत्रों का अध्ययन किया जाता है. इस कुण्डली में 12 भाव तथा नौ ग्रहों का आंकलन किया जाता है. इसमें एक भाव 30 अंश का होता है. वर्ग कुण्डली में ग्रह किसी भी भाव या राशि में जाएँ लेकिन सभी वर्ग कुण्डलियों के लिए गणना जन्म कुण्डली में ही की जाती है

होरा कुण्डली | Hora Kundali (D-2)

इस कुण्डली से जातक के पास धन-सम्पत्ति का आंकलन किया जाता है. इस कुण्डली को बनाने के लिए 30 अंश को दो बराबर भागों में बाँटेंगें. 15-15 अंश के दो भाग बनते हैं. कुण्डली दो भागों, सूर्य तथा चन्द्रमा की होरा में विभाजित किया जाता है. समराशि में 0 से 15 अंश तक चन्द्रमा की होरा होती है. 15 से 30 अंश तक सूर्य की होरा मानी जाती है. विषम राशि में यह गणना बदल जाती है. 0 से 15 अंश तक सूर्य की होरा और 15 से 30 अंश तक चन्द्रमा की होरा मानी जाती है.

द्रेष्काण कुण्डली | Dreshkana Kundali (D-3)

यह कुण्डली जातक के भाई-बहनों का अध्ययन करने के लिए उपयोग में लाई जाती है. इस वर्ग कुण्डली में 30 जन्म कुण्डली में 0 से 10 अंश के बीच में कोई ग्रह है तो वह द्रेष्काण कुण्डली में उसी राशि में लिखा जाएगा जिस राशि में वह जन्म कुण्डली में है. जन्म कुण्डली में10 से 20 अंश के मध्य कोई ग्रह स्थित है तो वह अपनी राशि से पाँचवीं राशि में जाएगा और यदि  जन्म कुण्डली में 20 से 30 अंश के मध्य कोई ग्रह स्थित है तो द्रेष्काण कुण्डली में वह ग्रह अपनी राशि से नवम राशि में जाएगा.

चतुर्थांश कुण्डली | Chaturthansh Kundali (D-4)

इस कुण्डली से चल-अचल सम्पत्ति तथा भाग्य का अनुमान लगाया जाता है. इससे बनाने के लिए 30 अंश के 4 बराबर भाग किए जाते हैं. एक भाग 7 अंश 30 मिनट का होता है. जन्म कुण्डली में ग्रह यदि पहले चतुर्थांश में स्थित है तो वह उसी राशि में चतुर्थांश कुण्डली में जाएगा. ग्रह दूसरे चतुर्थांश में स्थित है तो वह जिस राशि में स्थित है, उससे चौथी राशि में जाएगा. ग्रह यदि तीसरे चतुर्थांश में स्थित है तो वह जिस राशि में है उससे सातवीं राशि में जाएगा. ग्रह यदि चौथे चतुर्थांश में स्थित है तो वह जिस राशि में स्थित है उससे दसवीं राशि में जाएगा.

सप्तमांश कुण्डली | Saptamansh Kundali (D-7)

इस कुण्डली से संतान का अध्ययन किया जाता है. इस वर्ग कुण्डली को बनाने के लिए 30 अंश के सात बराबर भाग किए जाते हैं. जो ग्रह विषम राशि में होगें उनकी गिनती वहीं से आरम्भ होगी जिस राशि में वह ग्रह स्थित हहोते हैं. जो ग्रह जन्म कुण्डली में सम राशि में स्थित होगें उनकी गिनती स्थित राशि से, सातवीं राशि से होती है.

नवाँश कुण्डली | Navansh Kundali (D-9)

नवांश कुण्डली अत्यधिक महत्वपूर्ण कुण्डली है. इससे वैवाहिक जीवन का आंकलन किया जाता है. जीवन के सभी क्षेत्रों का अध्ययन भी किया जाता है. इस कुण्डली का निर्माण करते समय सबसे पहले तो कुछ बातों पर ध्यान देना होत अहै इसमें सभी बारह राशियों को तीन भागों में बाँटा जाता है.

दशमांश कुण्डली | Dashmansh Kundali (D-10)

दशमांश कुण्डली को D – 10 कहा जाता है. दशमांश कुण्डली का उपयोग व्यवसाय मे उन्नति , प्रतिष्ठा, सम्मान और आजीविका में बढोत्तरी, समाज में सफलता को देखने के लिए किया जाता है. इस कुण्डलि में दशम भाव दशमेश का सर्वाधिक महत्व है. इसके साथ ही साथ दश्मांश से माता पिता के सुख दुख एवं आयु का विचार होता है.

द्वादशांश कुण्डली | Dwadshansh Kundali (D-12)

द्वादशांश को D-12 कुण्डली भी कहा जाता है. द्वादशांश कुण्डली बनाने के लिए 30 अंश के 12 बराबर भाग किए जाते हैं. इसका प्रत्येक भाग 2 अंश 30 मिनट का होता है.इस कुण्डली का अध्ययन करने से माता पिता के जीवन के उतार चढावों के बारे में जानकारी मिलती है. इसके साथ ही साथ इससे हमें आयु के बारे में भी जानकारी प्राप्त होती है.

षोडशाँश कुण्डली | Shodshansh Kundali (D-16)

इस वर्ग कुण्डली को बनाने के लिए 30 अंश के 16 बराबर भाग करते हैं. इससे वाहन सुख के बारे में जाना जा सकता है. वाहन से संबंधित कष्ट, दुर्घटना तथा मृत्यु का आंकलन करने के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है. इसका एक भाग 1 अंश 52 मिनट 30 सेकण्ड का होता है. इसके अनुसार यदि चर राशि(1,4,7,10) में ग्रह है तो गणना का आरम्भ मेष राशि से होता है. यदि स्थिर राशि(2,5,8,11) में ग्रह है तो गणना का सिंह राशि से होती है. यदि ग्रह द्वि-स्वभाव राशि(3,6,9,12) में स्थित है तो गणना का धनु राशि से होती है. एक अन्य मतानुसार यदि ग्रह विषम राशि में स्थित है तो गणना उसी राशि से आरम्भ होगी जिसमें ग्रह स्थित है. यदि ग्रह सम राशि में स्थित है तो गणना, जिस राशि में ग्रह स्थित है उससे चौथी राशि से अपसव्य(विपरीत) क्रम में आरम्भ होगी.

विशाँश कुण्डली | Vishansh Kundali (D-20)

इस कुण्डली का अध्ययन करने के लिए 30 अंश के 20 बराबर भाग किए जाते हैं. एक भाग 1 अंश 30 मिनट का होता है. इस कुण्डली के अध्ययन से जातक कितना धार्मिक होगा इस बात का आंकलन किया जाता है उसकी. इसमें ग्रह यदि चर राशि में स्थित हैं तो गणना मेष से आरम्भ होती है. ग्रह यदि स्थिर राशि में है तो गणना धनु राशि से आरम्भ होती है. यदि ग्रह द्वि-स्वभाव राशि में है तो गणना सिंह राशि से मानी जाती है.

चतुर्विशांश कुण्डली | Chaturvishansh Kundali (D-24)

इस वर्ग कुण्डली में 30 अंश को 24 बराबर भागों में बांटा जाता है. एक भाग 1 अंश 15 मिनट का होता है. इस कुण्डली का अध्ययन शिक्षा, दीक्षा, विद्या तथा ज्ञान के लिए किया जाता है. यदि ग्रह विषम राशि में स्थित है तब सिंह राशि से गणना आरम्भ होती है. सम राशि में गणना कर्क राशि से आरम्भ कि जाती है.

सप्तविशाँश कुण्डली | Saptavishansh Kundali (D-27)

इस वर्ग कुण्डली को बनाने के लिए 30 अंश के 27 बराबर भाग किए जाते हैं. प्रत्येक भाग 1 अंश 6 मिनट 40 सेकण्ड का होता है. इसक उपयोग जातक के दैहिक बल और योग्यता देखने के लिए किया जाता है. जन्म कुण्डली में ग्रह यदि अग्नि तत्व(1,5,9 राशि) राशि में स्थित है तो गणना मेष राशि से आरम्भ होती है. पृथ्वी तत्व(2,6,10 राशि) राशि में स्थित ग्रह की गणना कर्क से आरम्भ होती है. वायु तत्व राशि(3,7,11 राशि) में स्थित ग्रह की गणना तुला से गणना आरम्भ होती है. जल तत्व राशि(4,8,12 राशि) में स्थित ग्रह की गणना मकर राशि से आरम्भ होती है.  

त्रिशाँश कुण्डली | Trishansh Kundali (D-30)

त्रिशांश कुण्डली का अध्ययन भी लगभग जीवन में जातक के जीवन में आने वाले सभी प्रकार के अरिष्ट देखने के लिए किया जाता है.  इसमें कुण्डली को 30 भागों में विभाजित किया जाता है. त्रिशाँश कुण्डली के बनाने में एक भिन्न तरीके का प्रयोग किया जाता है. इस कुण्डली को बनाने में सम राशि तथा विषम राशियों की गणना अलग-अलग की जाती है.

खवेदांश कुण्डली | Khavedansh Kundali (D-40)

इस वर्ग कुण्डली को चत्वार्यांश भी कहते हैं.  इस वर्ग कुण्डली को बनाने के लिए 30 अंशों को 40 बराबर भागों में बाँटा जाता है. इससे व्यक्ति के शुभ या अशुभ फलों का विश्लेषण किया जाता है. एक भाग 0 अंश 45 मिनट का होता है. जन्म कुण्डली में ग्रह यदि विषम राशि में स्थित है तो गणना मेष राशि से आरम्भ होगी. ग्रह यदि सम राशि में स्थित है तो गणना तुला राशि से आरम्भ होगी.

अक्षवेदांश कुण्डली | Akshavedansh Kundali (D-45)

इस वर्ग कुण्डली को पंच चत्वार्यांश भी कहते हैं.  इस कुण्डली के 30 अंश को 45 बराबर भागों में बाँटा जाता है. इस कुण्डली से जातक के चरित्र के बारे में जान अजाता है. कुण्डली में ग्रह यदि चर राशि में स्थित है तो गणना मेष राशि से आरम्भ होती. ग्रह यदि स्थिर राशि में स्थित है तो गणना सिंह राशि से शुरु होती . ग्रह यदि द्वि-स्वभाव राशि में स्थित है तो गणना तुला राशि से आरम्भ होती है.  

षष्टियांश कुण्डली | Shashtiyansh Kundali (D-60)

षष्टियांश वर्ग कुण्डली में 30 अंश को 45 बराबर भागों में बाँटा जाता है. इस वर्ग का उपयोग जीवन में होने वाली शुभ तथा अशुभ घटनाओं को जानने के लिए किया जाता है. इसमें ग्रह रेखांश को 2 से गुणा किया जाता है और जो संख्या आती है उसे 12 से भाग दिया जाता है. जो संख्या शेष होती है वह संख्या ग्रह जहां स्थित हो वहां से आरंभ करते हैं. जहां पर यह संख्या समाप्त होती है उस भाव में ग्रह इस वर्ग में स्थित माना जाता है.

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