सभी ग्रहों के लिये सही रत्न और उनके सस्ते विकल्प

विभिन्न ग्रहों के रत्न | Gemstones for Different Planets

सूर्य – माणिक्य, चन्द्र – मोती, मंगल – मूँगा, बुध – पन्ना, बृहस्पति – पुखराज, शुक्र – हीरा, शनि – नीलम, राहु – गोमेद, केतु – लहसुनिया.

विभिन्न ग्रहों के उपरत्न | Substitute Gems For Different Planets

सूर्य – रक्ताश्म, लाल रक्तमणि, स्टार रुबी, चन्द्र – मून स्टोन, मंगल – रात-रतुवा (कार्नेलियन), बुध -जेड( हरिताश्म), फिरोजा, गुरु – सुनहला, शुक्र – ओपल, जर्कन, शनि – नीली, कटैला(एमेथिस्ट), राहु – अम्बर, तुरसावा, केतु – मार्का, एलेग्जण्ड्राइट.

ग्रहों से संबंधित धातुएँ | Metals for Different Planets

सूर्य – सोना, चन्द्र – चाँदी, मंगल – ताँबा, बुध – कांसा, गुरु – सोना, शुक्र – चाँदी, शनि – लोहा, राहु/केतु – सीसा

माणिक्य को सूर्य के लिए पहना जाता है. चन्द्रमा को बल देने के लिए मोती पहनते हैं. मूँगा रत्न मंगल की निर्बलता को दूर करने के लिए पहना जाता है. यदि बुध कुण्डली में शुभ फल नहीं दे रहे हैं तब पन्ना धारण कर सकते हैं. गुरु को बली बनाने के लिए आप पुखराज पहनना जाता है. यदि शुक्र के कमजोर होने से परेशानी है तब हीरा पहन सकते हैं. शनि को मजबूत बनाने के लिए नीलम पहनना चाहिए. राहु  के कारण बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है तब गोमेद पहन सकते हैं. यदि केतु से पीड़ित है तब लहसुनिया धारण करना चाहिए.

कई बार व्यक्ति महंगे रत्न खरीदने में असमर्थ होता है तब उनके स्थान उपरत्न पहनने की सलाह दी जाती है. प्राचीन ग्रन्थों में 84 प्रकार के उपरत्नों का जिक्र किया गया है. कई उपरत्नों का अपना स्वतंत्र महत्व भी होता है.

व्यक्ति की आवश्यकता अनुसार उपरत्नों को धारण करने का परामर्श दिया जाता है. कई बार स्वास्थ्य संबंधी बातों में रत्नों के बजाय उपरत्न बहुत ही सफलता से काम करते हैं क्योंकि वह केवल एक ही विषय से संबंधित होते हैं. कई बार संबंधित ग्रह की धातुओं को धारण करने से भी लाभ मिलता है. इन धातुओं का दान करने से भी ग्रह को बल मिलता है.

रत्नों धारण करने से पूर्व सावधानियाँ | Precautions to take before wearing any gemstone

कोई भी रत्न अथवा उपरत्न धारण करने से पूर्व उसकी जाँच आपको अवश्य करनी चाहिए कि यह आपके लिए अनुकूल होगा या प्रतिकूल होगा. आप किसी भी रत्न को धारण करने से पूर्व उसे दो से सात दिन तक अपने पास रखें. आप इसे अपने पर्स में अपने साथ रख सकते हैं या रात में सोते समय अपने बिस्तर के नीचे रख सकते हैं. यदि  इन दिनों में कुछ गलत अनुभव नहीं होता है और रात में चैन की नींद आती है तब रत्न या उपरत्न को विधिपूर्वक धारण कर सकते हैं.

रत्नों को धारण करने से पहले यह देख लें कि उनका कोई किनारा टूटा हुआ तो नहीं है. कई बार इनमें बहुत ही महीन दरार होती है जो इन्हें तराशने पर पड़ जाती है. ऎसे रत्न आपको धारण नहीं करने चाहिए. यदि कोई पहना हुआ रत्न देता है तब उसे बिलकुल भी धारण नहीं करना चाहिए. रत्न व्यक्ति की नकारात्मक बातों को अपने अंदर समा लेता है. इसलिए यदि किसी का उतारा हुआ रत्न धारण करेगें तब अशुभ फलों का सामना करना पड़ सकता है.

रत्नों अथवा उपरत्नों को ज्योतिषीय सलाह के बाद ही धारण करना चाहिए अर्थात ज्योतिषी द्वारा एक विशेष समय रत्न धारण करने का बताया जाता है. उस समय में इस रत्न को बताई विधि अनुसार धारण करें. एक बात का ध्यान हमेशा रखें कि जब भी कोई रत्न या उपरत्न धारण करें उसे शुक्ल पक्ष में धारण करें. रत्न को पंचामृत से स्नान कराएँ और उस रत्न से संबंधित मंत्र का 108 बार जाप करने पर इसे पहनें.

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कुण्डली में होरा का महत्व

वैदिक ज्योतिष में कई वर्ग कुण्डलियों का अध्ययन किया जाता है. कुण्डली का अध्ययन करते समय संबंधित भाव की वर्ग कुण्डली का अध्ययन अवश्य करना चाहिए. जिनमें से कुछ वर्ग कुण्डलियाँ प्रमुख रुप से उल्लेखनीय है. होरा कुण्डली से जातक के पास धन-सम्पत्ति का आंकलन किया जाता है. इस कुण्डली को बनाने के लिए 30 अंश को दो बराबर भागों में बाँटते हैं जिसमें  15-15 अंश के दो भाग बनते हैं. कुण्डली को दो भागों में बाँटने पर ग्रह केवल सूर्य या चन्द्रमा की होरा में आती है. कुण्डली दो भागों, सूर्य तथा चन्द्रमा की होरा में बँट जाती है. समराशि में 0 से 15 अंश तक चन्द्रमा की होरा होगी. 15 से 30 अंश तक सूर्य की होरा होगी. विषम राशि में यह गणना बदल जाती है. 0 से 15 अंश तक सूर्य की होरा होगी. 15 से 30 अंश तक चन्द्रमा की होरा होती है.

उदाहरण के लिए माना मिथुन लग्न 22 अंश का हो तो यह विषम लग्न होगा है. विषम लग्न में लग्न की डिग्री 15 से अधिक है तब होरा कुण्डली में चन्द्रमा की होरा उदय होगी अर्थात होरा कुण्डली के प्रथम भाग में कर्क राशि आएगी और दूसरे भाग में सूर्य की राशि सिंह आएगी. अब ग्रहों को भी इसी प्रकार स्थापित किया जाएगा. माना बुध 17 अंश का मकर राशि में जन्म कुण्डली में स्थित है. मकर राशि समराशि है और बुध 17 अंश का है. समराशि में 15 से 30 अंश के मध्य ग्रह सूर्य की होरा में आते हैं तो बुध सूर्य की होरा में स्थित होंगे और सिंह राशि में बुध को लिखेंगे.

लग्न कुण्डली मुख्य कुण्डली होती है. लग्न कुण्डली में 12 भाव स्थिर होते हैं. इन बारह भावों के बारे में विस्तार से जानना है तो वर्ग कुण्डलियों का सूक्ष्मता से अध्ययन करना चाहिए. कई बार लग्न कुण्डली में घटना का होना स्पष्ट रुप से दिखाई देता है पर फिर भी जातक को समस्याओं का सामना करना पड़ता है. इसके लिए वर्ग कुण्डलियाँ देखना आवश्यक है. लग्न कुण्डली में कई बार ग्रह बली होते हैं और वही ग्रह वर्ग कुण्डली में निर्बल हो जाता है तब अनुकूल फल मिलने में बाधाओं का सामना करना पड़ता है.

अलग-अलग बातों के लिए अलग-अलग वर्ग कुण्डलियों का अध्ययन किया जाता है. लग्न कुण्डली के सप्तम भाव से जीवनसाथी का विचार किया जाता है. इसी सप्तम भाव के वर्ग कुण्डली में 12 हिस्से कर दिए जाते हैं तो वह नवाँश कुण्डली के नाम से जानी जाती है. नवाँश कुण्डली का अध्ययन जीवन के सभी पहलुओं के लिए किया जाता है.

सूर्य और चंद्र की होरा | Sun’s and Moon’s Hora

एक बात का आपको विशेष रुप से ध्यान रखना होगा कि किसी भी वर्ग कुण्डली को बनाने के लिए गणना आपको जन्म कुण्डली में ही करनी होगी. अधिकतर स्थानों पर षोडशवर्ग कुण्डलियों का अध्ययन किया जाता है. लग्न कुण्डली है जो जीवन के सभी क्षेत्रों का अध्ययन किया जाता है. इस कुण्डली में 12 भाव तथा नौ ग्रहों का आंकलन किया जाता है. इसमें एक भाव 30 अंश का होता है. वर्ग कुण्डली में ग्रह किसी भी भाव या राशि में जाएँ लेकिन सभी वर्ग कुण्डलियों के लिए गणना जन्म कुण्डली में ही की जाएगी.

होरा कुण्डली से जातक की धन सम्पदा सुख सुविधा के विषय में विचार किया जाता है. संपति का विचार भी होरा लग्न से होता है, होरा लग्न या तो सूर्य का होता है या चन्द्रमा है यदि जातक सूर्य की होरा में उत्पन्न होता है तो वह पराक्रमी, स्वाभिमानी एवं बुद्धिमान दिखाई देता है. होरा में सूर्य के साथ यदि शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के ग्रह हों तो जातक को जीवन के आरम्भिक समय में संघर्ष का सामना करना पड़ सकता है.

यदि सूर्य की होरा में पाप ग्रह हों तो जातक को परिवार एवं आर्थिक लाभ में कमी का सामना करना पड़ता है. कार्य क्षेत्र में भी अत्यधिक परिश्रम करना पड़ता है. यदि जातक चन्द्रमा की होरा में होता है तथा शुभ ग्रहों का साथ मिलने पर व्यक्ति को सम्पदा,वाहन एवं परिवार का सुख प्राप्त होता है. परंतु चंद्र की होरा में यदि पाप ग्रह हों तो मानसिक तनाव का दर्द सहना पड़ सकता है.

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बुध अगर वक्री हो तो ये जानना जरूरी है

वक्री ग्रहों की दशा में देशाटन, व्यसन एवं अत्यधिक भागदौड. जन्मांग में जो ग्रह वक्री होता है वह अपनी दशा एवं अन्तरदशा में प्रभावशाली फल प्रदान करने वाला बनता है. बुध ग्रह के वक्री होने पर मिलेजुले प्रभावों को देखा जा सकता है. बुध के शुभ या अशुभ फल का प्रभाव उसके अन्य ग्रहों के साथ संबंधों एवं अन्य तथ्यों के आधार पर किया जा सकता है. किसी जातक कि कुंडली में सामान्य रूप से शुभ फल देने वाले बुध वक्री होने की स्थिति में उस कुंडली में शुभ फल प्रदान करते हैं और कुंडली में सामान्य रूप से अशुभ फल देने वाले बुध वक्री होने की स्थिति में अपनी अशुभता में वृद्धि कर देते हैं.

वक्री होने से बुध ग्रह में अंतर को आसानी से समझा जा सकता है. बुध के वक्री होने पर जातक के व्यवहार एवं उसकी बौद्धिकता पर प्रभाव को देखा जा सकता है क्योंकि बुध बुद्धि का कारक है इस कारण से वक्री बुध के प्रभाव स्वरुप उसके विचारों में भिन्नता देखी जा सकती है, विचारों में बदलाव को देखा जा सकता है. जातक की बातचीत करने की क्षमता तथा निर्णय लेने की क्षमता दोनों ही में अंतर की स्पष्टता को देखा जा सकता है.

वक्री बुध ग्रह का प्रभाव | Effects of Retrograde Mercury

वक्री बुध के प्रभाव में आकर जीवन मे कई अप्रत्याशित परिवर्तन देखे जा सकते हैं. व्यक्ति अनेक प्रकार के अकस्मात होने वाले परिवर्तनों में कुछ अनचाहे निर्णय़ ले सकता है. उसके यह परिस्थितियों के हिसाब से लिए जाने वाले निर्णय उसे बाद में परेशान भी कर सकते हैं. वक्री बुध के प्रभाव से जीवन में ऐसे निर्णय लेते ही रहते हैं. इन बदलावों के साथ ही साथ वक्री बुध के कारण आचरण में बदलाव को देखा जा सकता है. बुध विचार एवं भावनाओं को प्रभावित करके उनमें क्रांतिकारी बदलाव दिखाता है.

बुध का वक्री स्वरुप जातक की साधारणत: बुद्धि, वाणी, अभिव्यक्ति, शिक्षा एवं साहित्य के प्रति लगाव को प्रभवैत करता है. बुध अपनी दशा एवं अन्तरदशा में जातक की मौलिक चिंतन तथा सृजनात्मक शक्ति को बढा़ता है. बुध वक्री होने पर अपनी दशा में लेखन कार्यों की ओर रुख करवाता है. जातक की रचना में अन्तर्विरोध एवं परिवर्तन को अधिक बल मिलता है. कभी कभी अपनी बात को दर्शाने के लिए गलत तर्कों को भी सहमती देता हुआ दिखाई देता है.

वक्री बुध झुंझलाहट और झल्लाहट उत्पन्न करता है. बुध का प्रभाव जातक को आखिरी समय में भी फैसला बदलने पर मजबूर कर सकता है.बुध वक्री, मार्गी और अतिगामी होते देखे जा सकते हैं. सूर्य के नज़दिक होने पर बुध, सूर्य के साथ मिलकर बुधादित्‍य योग का निर्माण करते हैं. इस योग के फलस्वरुप जातक बुद्धिमान होता है. बुध का प्रभाव सूर्य के सतह होने पर तीव्र बुद्धि होती है परंतु सूर्य से अधिक दूर जाने पर बुध वक्री हो जाते हैं.

मीडिया एवं संचार क्रांति में बुध का प्रभाव रहा है. लेखन, संप्रेषण का कारक है, हास्य मनोविनोद बुध द्वारा ही प्रभावित होता है. बुध के प्रभाव से व्यक्ति सामान्य से अधिक बोलने वाले होते हैं या फिर बिल्कुल ही कम बोलने वाले कई बार व्यक्ति बहुत कुछ बोलना चाहता है लेकिन कुछ भी बोल नहीं पाता इन सभी में बुध का प्रभाव पूर्ण रुप से प्रदर्शित होता है.

वक्री बुध के लिए उपाय | Remedies for Retrograde Mercury

बुध के लिए स्वर्ण का दान तथा हरी वस्तुओं का दान करने से लाभ मिलता है. बुध ग्रह से सम्बन्धित वस्तुओं का दान करने से पीड़ा में कमी आ सकती है. बुध की दशा में सुधार हेतु बुधवार के दिन व्रत रखना चाहिए. गाय बुध की दशा में सुधार के लिए विष्णु सहस्रनाम का जाप भी उत्तम माना जाता है. तुलसी में जल देने से बुध की दशा में सुधार होता है. अनाथों एवं गरीब छात्रों की सहायता करने से लाभ मलता है. बुधवार के दिन गणेशजी के मंदिर में लड्डुओं का भोग लगाना चाहिए. शाराव, अण्डा, मांस का सेवन न करें, जीवन में स्थिरता लाएं, एक जगह टिककर काम करने का प्रयास करना चाहिए.

रात को सिरहाने पानी रख कर सुबह पीपल में चढा़ना चाहिए. मन्दिर में दूध, चावल दान करें, पर्तिदिन प्रात: सूर्य को जल दें, छोटी कन्याओं की सेवा करें, मन्दिर में या ब्राह्मण को चने की दाल एंव पीला वस्त्र दान करें, गले में चांदी धारण करनी चाहिए. मीठी वाणी का प्रयोग करना चाहिए, बुध के उपाय करने से तुरन्त लाभ प्राप्त होता है.

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कैसे बना जैमिनी ज्योतिष और क्या ये सही है?

जैमिनी ज्योतिष शास्त्र ज्योतिष शास्त्र के ग्रंथों में एक प्रमुख भूमिका निभाता है. जैमिनी ज्योतिष महर्षि जैमिनी की देन है. जैमिनि ज्योतिषशास्त्र ऐसा ज्ञान है जो भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों को देखने की क्षमता रखता है. व्यक्ति के जीवन में होने वाली प्रत्येक घटनाओं के विषय में ज्योतिषशास्त्र फलकथन करने की योग्यता रखता है. नौकरी हो अथवा व्यवसाय किस क्षेत्र में व्यक्ति को कैसी सफलता मिलेगी यह सब जैमिनी ज्योतिष से ज्ञात किया जा सकता है. जैमिनी ज्योतिष में रचित सूत्रों में ज्योतिषिय फल कथन सरल तथा स्पष्ट शब्दों में किया गया है. यह सभी सूत्र व्यवहारिकता की कसौटी पर खरे उतरे हैं. जो सरल नियम, सिद्धांत तथा पद्धतियाँ इस ग्रँथ में मिलती हैं वह अन्य किसी ग्रँथ में नहीं पाई जाती हैं.

जैमिनी ज्योतिष विचार | Analysis of Jaimini Astrology

जैमिनी ज्योतिष में राशियों के आधार पर फलित कथन व्यक्त करती है. नक्षत्रों का इसमें कोई महत्व नहीं होता है. जैमिनी में एक से अधिक कई दशाओं का उल्लेख मिलता है. जिनमें चर दशा, स्थिर दशा, मण्डूक दशा, नवांश दशा आदि का प्रयोग मुख्य रुप से किया जाता है. इनमें से भी चर दशा का प्रयोग सबसे अधिक किया जाता है. चर दशा, जैमिनी पद्धति की प्रमुख दशा है. इस दशा क्रम में जैमिनी कारक, स्थिर कारक, राशियों की दृष्टियाँ, राशियों का दशाक्रम, दशाक्रम की अवधि, जैमिनी योग, कारकाँश लग्न, पद अथवा आरूढ़ लग्न, उप-पद लग्न आदि के विषयों के बारे में विस्तार से बताया गया है.

जैमिनी दशा फल | Jaimini Dasha phal

जैमिनी ज्योतिष में राहु और केतु को छोड़कर अन्य सभी सातों ग्रहों को उनके अंश, कला तथा विकला के आधार पर अवरोही क्रम में दर्शाया जाता है. इस प्रकार सात कारक हमें प्राप्त होते हैं. जैमिनी ज्योतिष में सभी ग्रहों के अंश, कला तथा विकला आदि की गणना भली-भाँति करनी होती है. सातों ग्रहों को उनके अंशों के आधार अवरोही क्रम में लिखकर यह देखने का प्रयास किया जाता है कि यदि किसी ग्रह के अंश तथा कला बराबर है, तब ग्रह का मान विकला तक देखकर निर्णय करना होता है कि कौन-सा ग्रह किस क्रम में आना चाहिए.

सबसे अधिक अंशों वाले ग्रह को तालिका में सबसे ऊपर लिख देना चाहिए. उसके बाद उससे कम अंश वाले ग्रह को लिखना चाहिए और इसी प्रकार अन्य सभी ग्रहों को भी क्रम से लिखें. सबसे अधिक अंशों वाले ग्रह को आत्मकारक कहा जाता है. उसके बाद वाले ग्रह को अमात्यकारक कहते हैं. अमात्यकारक के बाद जिस ग्रह के कम अंश होते हैं वह भ्रातृकारक कहलाता है. भ्रातृकारक के बाद जिस ग्रह के कम अंश होते हैं वह मातृकारक कहलाता है. मातृकारक के बाद वाले ग्रह को पुत्रकारक कहते हैं. पुत्रकारक के बाद जिस ग्रह के कम अंश होते हैं वह ज्ञातिकारक कहलाता है. सबसे कम अंश वाला ग्रह दाराकारक कहलाता है. इन सभी कारकों के अनुसार जातक पर पड़ने वाले प्रभावों को विस्तार पूर्वक बताया जा सकता है

जैसे कि व्यापार या व्यवसाय के बारे में जानना है तो हम जैमिनी ज्योतिष की अमात्यकारक स्थिति को देखने का प्रयास करेंगे. यदि कुण्डली में अमात्यकारक लग्न से केन्द्र, त्रिकोण या एकादश भाव में स्थित है तो व्यवसाय में उत्तम स्थिति का संकेत प्राप्त होता है. अमात्यकारक पर जिस ग्रह की दृष्टि होगी उस ग्रह के स्वभाव और गुण के अनुसार फल प्राप्त होता है. अमात्यकारक पर अगर शुभ ग्रहों की दृष्टि है तो व्यापार के लिए शुभ संकेत समझना चाहिए और अगर अशुभ ग्रहों की दृष्टि है तो व्यापार में असफलता और रूकावट का संकेत समझा जाता है.

इसी प्रकार अमात्यकारक के साथ ग्रहों की शुभ युति में व्यापार सफल होता है और कामयाबी मिलती है जबकि अशुभ ग्रहों की युति होने पर व्यापार में सफलता नहीं मिल पाती है.

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क्या आपकी कुण्डली में राजयोग है? ऐसे जानिये

वैदिक ज्योतिष अत्यधिक व्यापक क्षेत्र है. कुण्डली का विश्लेषण करना चुनौती भरा काम होता है. किसी भी कुण्डली को देखने के लिए बहुत सी बातों का विश्लेषण करके तब किसी नतीजे पर पहुंचना चाहिए. कुण्डली विश्लेषण में कुण्डली के योग महत्वपूर्ण होते हैं. यदि किसी कुण्डली में शुभ योगों का निर्माण हो रहा है तब उन योगों में शामिल ग्रह की दशा/अन्तर्दशा में व्यक्ति को शुभ फलों की प्राप्ति अवश्य होती है. वैसे तो वैदिक ज्योतिष में अच्छे तथा बुरे हजारों योगों का जिक्र मिलता है. लेकिन इन योगों में राजयोग अधिकतर कुण्डलियों में मिल जाते हैं.

केन्द्र भाव में राजयोग का निर्माण | Formation of Rajyoga in the center house

कुण्डली में स्थित पहला, चौथा, सातवाँ और दसवाँ भाव विष्णु स्थान कहलाते हैं. इन स्थानों को वैदिक ज्योतिष में केन्द्र भाव के नाम से भी जाना जाता है. इसी प्रकार आपकी कुण्डली के पंचम भाव तथा नवम भाव को लक्ष्मी स्थान कहते हैं. वैदिक ज्योतिष में पंचम तथा नवम भाव को त्रिकोण स्थान के नाम से भी जाना जाता है.

विष्णु जी बिना लक्ष्मी के अधूरे जान पड़ते हैं. इसलिए जब केन्द्र अर्थात विष्णु स्थान का संबंध त्रिकोण अर्थात लक्ष्मी स्थानों से बनता है तब आपकी कुण्डली में राजयोग का निर्माण होता है. कुण्डली में स्थित राजयोगों को शुभ माना जाता है. यह राजयोग आपको तभी फल देगें जब आपके जीवन में इन राजयोगों में शामिल ग्रह की दशा/अन्तर्दशा आती है.

त्रिकोण भाव में राजयोग का निर्माण | Formation of Rajyoga in triad houses

लग्न, पंचम तथा नवम भाव के संबंध से बनने वाले राजयोग  कुण्डली के पहले भाव का स्वामी यदि पंचम या नवम भाव में स्थित है तब कुण्डली में उत्तम श्रेणी का राजयोग बनता है. यदि जन्म कुण्डली में पहले भाव का स्वामी पंचमेश या नवमेश के साथ कुण्डली में एक साथ स्थित है तब यह एक शुभ तथा बली राजयोग है. पहले भाव के स्वामी का पंचमेश या नवमेश के साथ राशि परिवर्तन होने से एक अच्छा राजयोग बनता है. यदि जन्म कुण्डली में पहले भाव के स्वामी का परस्पर दृष्टि संबंध पंचमेश या नवमेश के साथ स्थापित हो रहा है तब यह बली राजयोग कहलाता है.

मिश्रित भावों का राजयोग | Rajyoga associated with mixed houses

चतुर्थ, पंचम तथा नवम भाव से बनने वाला राजयोग कुण्डली के चतुर्थ भाव का स्वामी पंचम या नवम भाव में स्थित है तब राजयोग का निर्माण होता है. यदि कुण्डली में चतुर्थेश, पंचमेश या नवमेश के साथ स्थित है तब यह राजयोग बन रहा है. जन्म कुण्डली में चतुर्थेश और पंचमेश या नवमेश का आपस में परस्पर दृष्टि संबंध स्थापित हो रहा है तब यह भी राजयोग माना जाता है. चतुर्थेश का राशि परिवर्तन पंचमेश या नवमेश के साथ होने पर राजयोग का निर्माण होता है.

सप्तम, पंचम तथा नवम भाव के स्वामियों के संबंध से बनने वाले राजयोग. सप्तम भाव का स्वामी पंचम या नवम भाव में स्थित है तब राजयोग का निर्माण कुण्डली में हो रहा है. सप्तमेश के नवम भाव में होने से भाग्योदय विवाह के बाद हो सकता है. सप्तम भाव का स्वामी पंचम भाव के स्वामी के साथ स्थित होने से  कुण्डली में राजयोग बन रहा है. सप्तमेश यदि कुण्डली में नवमेश के साथ स्थित है तब यह अच्छा राजयोग माना जाता है. जीवन में भाग्य से बहुत कुछ हासिल हो सकता है. सप्तमेश का पंचमेश या नवमेश के साथ राशि परिवर्तन होने से भी राजयोग का निर्माण होता है. कुण्डली में सप्तमेश का परस्पर दृष्टि संबंध पंचमेश या नवमेश से होने पर राजयोग का निर्माण हो रहा है.

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हल योग और उसका आप पर प्रभाव

हल योग अपने नाम के अनुसार ही दिखाई भी देता है. हल जो भूमि को खोदकर उसमें से जीवन का रस प्रदान करता है और उसी को पाकर ही जीव अपने जीवन को बनाए रखने में सफल होता है यही हल योग जब कुण्डली में निर्मित होता है तो उसी प्रकार जातक के जीवन के शुभ रुपों को बाहर निकाल कर उसे नई शक्ति प्रदान करता. ज्योतिष अनुसार यह योग जब त्रिकोण की आकृति में स्थित हो, अर्थात लग्न से 2, 6, 10 भाव अथवा 3, 7, 11 अथवा 4, 8, 12 भावों में हो, तो इस शुभ हल योग की रचना होती है. इस योग से युक्त व्यक्ति भूमि और भूमि से जुडे क्षेत्रों से आय प्राप्त करने में सफल रहता है.

यह हल योग जातक को कृषि क्षेत्र  से लाभ प्राप्त कराने में सहायक होता है. इस योग वाले व्यक्ति को भूमि खनन के कार्यो से आजीविका की प्राप्ति हो सकती है. वह शारीरिक परिश्रम के कार्य करने में कुशल होता है. इस योग वाला व्यक्ति भूमि से जुडे कार्यो को कुशलता से कर सकता है. इसलिए ऎसे व्यक्तियों को भूमि के क्रय-विक्रय से संबन्धित कार्य करना लाभकारी रहता है.

हल योग का निर्माण | Formation of Hal Yoga

ज्योतिष शास्त्रियों और विद्वानों के अनुसार कुंडली में हल योग तीन प्रकार से बनता है. जातक परिजात और वृहदपराशरहोराशास्त्र में इस योग के इन मुख्य संदर्भों पर प्रकाश डाला गया है जिसके अनुसार जन्म कुंडली में सभी ग्रह दूसरे, छठे और दसवें भाव में स्थित हैं तब हल योग निर्मित होता है. एक अन्य तथ्य के अनुसार कुंडली में जब सभी ग्रह तीसरे, सातवें और एकादश भाव में स्थित हैं तब भी हल योग का निर्माण होता है. तथा तीसरा तथ्य इस बात की ओर इशारा करता है कि यदि कुंडली में सभी ग्रह चतुर्थ, अष्टम और बारहवें भाव में स्थित है तब भी इस हल योग का निर्माण संभव होता है.

हल योग का जीवन पर प्रभाव | Effect of Hal Yoga

जन्म कुंडली में हल योग किसी भी प्रकार से निर्मित होता हो परंतु यह अपना प्रभाव अवश्य दिखाता है. यह योग जातक की कुण्डली में दूसरे, छठे और दसवें भाव में स्थित होने पर उसको अधिक संघर्ष की स्थिति तो देता है लेकिन साथ ही साथ उसके प्रयासों में तेजी लता है. जातक अपनी कठिनाईयों से लड़ने के लिए पूर्ण रुप से तैयार रहता है. कुंडली में यदि सभी ग्रह तीसरे, सातवें और एकादश भाव में स्थित होने पर इस स्थिति में उसके लाभ में बहुत सा अच्छा संकेत देखने को मिलता है. संबंधों में नई चुनौतियां तो आती ही हैं परंतु साथ ही साथ एक सकारात्मक रवैया भी प्राप्त होता है.

कुंडली में सभी ग्रह चतुर्थ, अष्टम और बारहवें भाव में स्थित होने पर  स्थिति कुछ अलग होती है जीवन संघर्षपूर्ण व्यतीत होता है जातक को कृषि कर्म में अधिक सफलता प्राप्त होती है. कृषि कर्म के ज़रिए ही व्यक्ति आय प्राप्त करता हैं. व्यक्ति की कुंडली में हल योग बनने पर उसका जीवन संघर्षपूर्ण परिस्थितियां लाता है लेकिन उनसे लड़ने की क्षमता भी प्राप्त होती है. यह योग अच्छे तथा बुरे दोनों ही प्रकार के होते हैं. यह किस तरह से बनते हैं और आपके जीवन पर इन योगों का क्या प्रभाव पड़ता है.इस बत को जानना अत्यंत अवश्यक है

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वक्री मंगल होने पर क्या होगा, जानिये

ज्योतिष के अनुसार सभी ग्रह भ्रमण करते हुए विभिन्न प्रकार की गति को में चलते हैं जैसे कि तेज चलना या मंद गति से चलना, वक्री या अति वक्री, मध्यम गति या कुटिल गति इत्यादि. ग्रहों का अपने भ्रमण पथ पर उल्टी गति से चलना वक्रता कहलाता है, परंतु वास्तव में ग्रह उल्टे नहीं चलते बल्कि पृथ्वी की गति तथा ग्रह की गति के भेद एवं उस ग्रह की पृथ्वी से विशेष दूरी पर स्थित होने की वजह से वक्री प्रतीत होते हैं.

वक्री ग्रहों को वैदिक ज्योतिष में शक्त अवस्था में माना गया है अर्थात वक्री ग्रह सबसे अधिक शक्तिशाली होते हैं. वक्री का अर्थ है उलटा. ग्रह गोचर में हमें वक्री अवस्था में चलते प्रतीत होते हैं जबकी वास्तविकता में वह मार्गी गति में ही विचरण करते हैं. वक्री ग्रह बार-बार प्रयास कराते हैं. एक ही कार्य को करने के लिए व्यक्ति को कई बार प्रयास करने पर सफलता मिलती है. ग्रह की वक्रता उसके अन्य ग्रहों से संबंध के आधार आनुसार फल दर्शाती है.

वक्री मंगल का प्रभाव

मंगल साहस, पराक्रम और उत्साह शक्ति प्रदान करने वाले माने जाते हैं. अत: कुण्डली में मंगल के वक्री होने कारण जातक में असहिष्णुता का भाव, अत्यधिक क्रोध और आक्रामक होना देखा जा सकता है. जातक की कार्यक्षमता सृजनात्मक नही रहती है. वक्री मंगल की दशा या अन्तर्दशा में व्यक्ति का लोगों से अधिक मतभेद हो सकता है या वह मुकदमेबाजी और कोर्ट कचहरी के चक्करों में फंस सकता है.

वक्री मंगल यदि जन्मांग में 6,8 या 12 भाव में हो तो व्यक्ति में जिद्दीपन देखा जा सकता है. व्यक्ति के व्यवहार में अड़ियल रुख हो सकता है. उसके कार्य अधूरे भी रह सकते हैं या उनमें रूकावटें उत्पन्न हो सकती हैं.

व्यक्ति किसी से भी सहयोग करना अपना अपमान समझ सकता है. जातक को स्वार्थी बना सकता है. व्यक्ति अपनी संतुष्टि एवं स्वार्थ सिद्धि के लिए किसी भी प्रकार के अनुचित कार्य करने में भी संकोच नहीं करता और वक्री मंगल की दशा में जातक को अकसमात होने वाली घटनाओं का सामना भी करना पड़ सकता है.

वक्री मंगल के लिए उपाय

वक्री मंगल के बुरे प्रभावों से बचने के लिए कुछ कार्यों को किया जा सकता है जैसे वक्री मंगल की दशा या अन्तर्दशा में अस्त्र शस्त्रों को नही खरीदें और उनके उपयोग से बचें अपने निवास स्थान पर घातक वस्तुओं को नही रखें. वक्रता के समय कोई नया वाहन या नई संपत्ति को नही खरीदें.

वक्री मंगल की दशा में गृह प्रवेश नहीं करना चाहिए. किसी भी प्रकार के आपरेशन या सर्जरी को नही कराएं. इस समय नया मुकदमा आरंभ करना उचित नहीं होता, क्योंकि इससे धन का नाश और संताप ही प्राप्त होगा. मंगल की वक्रता में छल कपट धोखा देना व्यक्ति के स्वभाव में देखा जा सकता है.

मंगल की वक्रता में मंगल मंत्र का जाप करना चाहिए, श्री हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए तथा हनुमान जी को सिंदूर चढा़ना चाहिए. बंदरों को गुड़-चने खिलाना चाहिए. माँस व मदिरा, धूम्रपान से परहेज करना चाहिए.

वक्री ग्रह के संदर्भ में ज्योतिषशास्त्र की यह भी मान्यता है कि शुभ ग्रह वक्री होने पर व्यक्ति को सभी प्रकार का सुख, धन आदि प्रदान करते हैं जबकि अशुभ ग्रह वक्री होने पर विपरीत प्रभाव देते हैं.

इस स्थिति में व्यक्ति व्यसनों का शिकार होता है, इन्हें अपमान का सामना करना होता है.तो एक अन्य सिद्धान्त यह भी है कि वक्री ग्रहों की दशा में सम्मान एवं प्रतिष्ठा में कमी की संभावना रहती है. कुण्डली में क्रूर ग्रह वक्री हों तो इनकी क्रूरता बढ़ती एवं सौम्य ग्रह वक्री हों तो इनकी कोमलता बढ़ती है.इसलिए किसी ग्रह के प्रभाव का फल कथन करने से पूर्व कुण्डली का अवलोकन अवश्य करना चाहिए.

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कुण्डली में यूप योग

ज्योतिष में हजारों योगों के विषय में उल्लेख प्राप्त होता है. कुण्डली में बनने वाले अनेक योग किसी न किसी प्रकार से जीवन को अवश्य प्रभावित करते हैं. यूप योग लग्न से चतुर्थ भाव अर्थात कुण्डली के पहले चार भावों में सभी ग्रह होने पर बनता है. यह योग शुभ योगों की श्रेणी में आता है. यह योग क्योकि लग्न, भाव, धन भाव, तृ्तीय भाव अर्थात यात्रा भाव व चतुर्थ भाव अर्थात सुख भाव के संयोग से बनता है. इसलिए इस योग के फलस्वरुप व्यक्ति को इन्हीं चारों भावों से मिलने वाले फल प्राप्त होते है.

जब दो या दो से अधिक ग्रह एक साथ एक ही राशि में बैठते हैं तो योग या कहें युति का निर्माण होता है. ग्रहों का एक साथ दृष्टि संबंध बनाना या साथ में स्थित होना किसी न किसी प्रकार के योग होने के अर्थ को सपष्ट होता है. इन नौ ग्रहों के योग किसी न किसी प्रकार के योग का कथन सार्थक करते हैं.

ज्योतिषीय योग, कुछ अच्छे व कुछ बुरे सभी प्रकार के हो सकते हैं अच्छे योग शुभ फल देने वाले एवं बुरे योग जीवन में कठिनाईयां उत्पन्न करने वाले होते हैं. ग्रह अलग-अलग भावों में शृंखलाबध्द होकर एक विशेष क्रम में उपस्थित होते हैं तब भी अनेक योगों का निर्माण होता है इसमें से एक योग यूप योग है जिसका निर्माण इसी आधार पर देखने को मिलता है. कुछ ग्रह आपस में दृष्टि संबंध बनाते हैं तब भी विशेष योग बनते हैं.

योग के निर्मित होने पर ग्रह अपने स्वभाव के अनुसार, जिस भाव में बैठे हैं उससे संबंधित एवं जिस राशि में हैं उससे अपने संबंधों के आधार पर अपना प्रभाव दिखाते हैं. इसी प्रकार योग विशेष अवस्था में भंग भी हो जाते हैं जिसके फलस्वरुप यह अपना प्रभाव देने में अस्मर्थ हो जाते हैं. यही बात यूप योग पर भी लागू होती है यदि यह योग शुभ स्वरुप में निर्मित हुआ हो तो शुभ फलों को देने में सफल होता है अन्यथा नहीं.

ज्योतिष में योगों का महत्व किसी अभिन्न अंग की भांति ही होता है. कुण्डली के भविष्य-कथन में ज्योतिषीय योगों का बहुत महत्व रहता है.

यूप योग का निर्माण | Formation of Yoop Yoga

“एकद्वित्रिचतुर्थस्थै: सर्वखेटैस्तु यूपकम्।”

कुंडली में प्रथम भाव से चतुर्थ भाव तक सभी ग्रह स्थित होने पर यूप योग बनता है. कुंडली में यह योग बनने पर व्यक्ति की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी बन जाती है. इस योग के कारण व्यक्ति धर्म- कर्म में विश्वास रखने वाला होता है.

यूप योग का जीवन पर प्रभाव | Effects of Yoop Yoga

कुंडली में यह योग बनने पर आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी बन जाती है. जातक का जन्म यदि कितने भी गरीब परिवार में क्यूँ ना हुआ है वह एक दिन अवश्य ही बहुत अच्छी स्थिति बनाने में सफल हो सकता है. यदि इस योग में जन्म हुआ हो तो व्यक्ति धर्म- कर्म में विश्वास रखने वाला होता है. यूप योग के प्रभाव से व्यक्ति यज्ञ करने वाले हो सकते हैं तथा अपनी स्थिति नीचे से ऊपर उठने वाली बना सकते हैं. व्यक्ति जीवन के अंत तक बहुत अच्छा पद प्राप्त करने में कामयाब हो सकते हैं.

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उच्च ग्रह की दशा अगर चल जाये तो इस प्रकार जीवन बदल जायेगा

ग्रहों का दशाफल अनेक प्रकार से अपने प्रभावों को दर्शाता है. ग्रह के दशाफल का अंतर सप्ष्टता से देखा जा सकता है क्योंकि कोई एक ग्रह यदि उच्च का है तो उसके प्रभावों में शुभता अधिक देखी जा सकती है लेकिन अगर वही ग्रह नीच का हो तो उसका प्रभाव जातक पर एकदम विपरीत असर देने वाला रहेगा. अत: दशाफल विचार करते हुए हमें इस बात पर अवश्य ध्यान देना होता है कि कोई ग्रह किन परिस्थितियों से घिरा हुआ है.  यहां हम उच्च राशिग्रह की दशा फल पर विचार करेंगे अर्थात जब ग्रह अपनी उच्चता में होता है तो उसका दशाफल कैसे प्रभाव उत्पन्न करता है.

उच्चस्थ ग्रह जातक को वैभव तथा यश प्रदान करने वाला होता है. इस अवस्था में जातक को वस्त्र आभूषण और वाहन की प्राप्ति होती है. पद प्रतिष्ठा में वृद्धि मिलती है. जातक राजा के सामान सुख प्राप्त करता हे. शत्रुओं का दमन होता है तथा रूकावटें दूर होने लगती हैं. उच्चस्थ ग्रह की दशा में भू-संपदा का लाभ होता है राज्यसम्मान की प्राप्ति होती है तथा व्यक्ति के भीतर धैर्य और नैतिकता का समावेश देखा जा सकता है.

ग्रहों की उच्च्स्थ स्थिति | Exalted state of Planets

उच्चस्थ सूर्य | Exalted Sun

उच्च का सूर्य जातक को नेतृत्व की क्षमता प्रदान करता है. व्यक्ति को नेता या नायक बनाकर मान सम्मान तथा प्रतिष्ठा देता है. व्यक्ति को धन धान्य की प्राप्ति होती है, वाहन सुख प्राप्त होता है. अच्छी वस्तुओं की प्राप्ति होती है पर साथ ही उसमें गर्व की भावना भी अधिक देखी जा सकती है.

उच्चस्थ चंद्रमा | Exalted Moon

चंद्रमा की यह स्थित होने पर जातक को स्त्री सुख, संतान सुख की अनुभूति प्राप्त होती है. जातक को माता का प्रेम प्राप्त होता है, मन में भावनों की अधिकत अहोती है तथा तीर्थाटन एवं पर्यटन के मौके प्राप्त होते हैं.

उच्चस्थ मंगल | Exalted Mars

उच्चस्थ मंगल व्यक्ति को राज्य सम्मान एवं राजा से पद प्रतिष्ठा की प्राप्ति कराता है. जातक में अत्यधिक क्रोध और बाहुबल की मजबूति देखी जा सकती है उसके भीतर साहस एवं शौर्य का संचार होता है. व्यक्ति को स्त्री सुख तथा बंधुओं का सुख प्राप्त होता है.

उच्चस्थ बुध | Exalted Mercury

उच्चस्थ बुध के प्रभाव से जातक को धन-संपदा प्राप्त होती है. हास्य एवं मनोविनोद का व्यवहार पाता है. बौद्धिकता उन्नत होती है, जातक व्यापार एवं व्यवसाय में उन्नती पाता है. मित्रों, संबंधियों एवं संतान का सुख प्राप्त होता है.

उच्चस्थ गुरू | Exalted Jupiter

उच्चस्थ गुरू के प्रभाव स्वरुप जातक को विद्वता प्राप्त होती है, उसे शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त होता है अपने क्षेत्र में अग्रीण्य स्थान पाता है. मान, पद-प्रतिष्ठा प्राप्त होती है. व्यवहार में सात्विकता का समावेश होता है धर्म के प्रति आस्थावान होता है तथा भौतिक सुखों के प्रति निस्सार का भाव रखता है.

उच्चस्थ शुक्र | Exalted Venus

शुक्र की उच्चता में व्यक्ति को भौतिक सुखों के प्रति अधिक लालसा का भाव हो सकता है, व्यक्ति स्त्री संग के कारण धन का नाश पाता है. धर्म विरोधी कार्यों में रूचि रखने वाला हो सकता है. कुछ अन्य विचारकों के अनुसार जातक स्त्री, संतान और आभूषण भौजन इत्यादि का सुख पाता है.

उच्चस्थ शनि | Exalted Saturn

उच्चस्थ शनि की दशा में सत्ता का सुख प्राप्त हो सकता है, पिता एवं अन्य संबंधियों से विरोध भी झेलना पड़ सकता है. जीवन में कठिनाईयों का सामना करने की दिशा मिलती है, सही गलत का पता चलता है.

उच्चस्थ राहु | Exalted Rahu

उच्चस्थ राहु की दशा जातक को विदेश यात्राओं को करने का वसर मिलता है. राज्य के उच्च अधिकारियों से मैत्री होती है तथा धन एवं सुख की प्राप्ति होती है, धार्मिक स्थानों की यात्राएं भी कर सकता है.

उच्चस्थ केतु | Exalted Ketu

यह राजा से मान सम्मान प्रदान कराता है. सुख शांति में वृद्धि करता है. परिवार में सुख एवं शांति को बढा़ता है. जातक को धर्म कर्म के कार्यों को करने का अवसर प्राप्त होता है.

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कुण्डली के बारह भावों की महादशा | Mahadasha of the twelve house of Kundali

कुण्डली के प्रत्येक भाव की महादशा भिन्न भिन्न फल प्रदान करने वाली होती है. बारह भावों में स्थित शुभ और अशुभ प्रभाव जातक के जीवन को पूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं. प्रत्येक भाव अनुसार महादशा के प्रभावों का वर्णन इस प्रकार से जातक को प्रभावित कर सकता है.

लग्नेश की दशा | Ascendant

शारीरिक सुख, स्वास्थ्य, धन, बल की वृद्धि करने वाली होती है. यदि लग्नेश अष्टमस्थ हो तो शारीरिक पीडा़ हो सकती है. यदि लग्नेश में शनि की अन्तर्दशा से धन की हानि एवं कुंटुंब से विरोध हो सकता है.

द्वितीयेश की दशा | Second house

शारीरिक कष्ट एवं पीडा़ मिल सकती हैं पर यह धन संपदा में वृद्धि करने वाली भी होती है. द्वितीयेश पाप ग्रह से युक्त हो तो मानहानि, धनहानि, स्वजनों से विरोध को भी सहना पड़ सकता है. द्वितीयेश की महादशा में शनि, मंगल, सूर्य, राहु जैसे ग्रहों की अन्तर्दशा में धन की हानि हो सकती है. पाप ग्रह द्वितीयेश होकर द्वितीयेश होने पर अपनी दशा में राज भय देता है. धन हानि एवं देश निकाल दे सकता है.

यदि द्वितीय भाव में शुभ ग्रह हों तथा धनेश भी शुभ ग्रह से युक्त हो तो द्वितीयेश की दशा में जातक अच्छी उन्नती प्राप्त करता है.

तृतीयेश की महादशा | Third house

तृतीयेश शुभ ग्रहों से युक्त हो अथवा शुभ ग्रह के साथ स्थित हो तो तृतीयेश की दशा एवं अन्तर्दशा में अत्साह, साहस एवं पराक्रम की वृद्धि होती है. भाई बहनों का प्रेम प्राप्त होता है.

तृतीयेश यदि पाप ग्रहों से युक्त हो तो पाप ग्रह की अन्तर्दशा में भाई बंधुओं से मतभेद उत्पन्न हो सकता है. पापी तृतीयेश होने पर अशुभ प्रभाव अधिक देखने को मिलते हैं. यह शत्रुओं की वृद्धि करती है धन नाश, शस्त्राघात की पीडा़ देती है.

चतुर्थेश की महादशा | Fourth house

चतुर्थेश यदि पाप ग्रहों से युक्त हो तो पाप ग्रहों की अन्तर्दशा आने पर भू-संपदा की हानि, मानसिक कलेश, वाद विवाद एवं माता के सुख में कमी आती है.

चतुर्थेश यदि शुभ ग्रहों से युक्त हो तो इसकी दशा में भूमि, भवन का सुख प्राप्त होता है, वाहन का सुख एवं माता का सुख मिलता है.

पंचमेश की महादशा | Fifth house

पंचमेश में यदि शुभ ग्रह हों तो इसकी दशा में धन का लाभ होता हे संतान का सुख एवं उससे सम्मान की प्राप्ति होती है. राजसम्मान तथा लोगों से स्नेह प्राप्त होता है. पंचमेश की दशा धन धान्य, विद्या सुबुद्धि प्रदान करती है. व्यक्ति के मान सम्मान में वृद्धि होती है. परंतु पंचमेश माता के लिए मारकेश होने से माता को कष्ट, पीडा़ भी प्राप्त हो सकती है.

पंचमेश की महादशा में पाप ग्रह की अन्तर्दशा होने पर भय, दुख, संतान पर कष्ट जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं.

षष्ठेश की महादशा | Sixth house

षष्ठेश की महादशा में रोग, शत्रु का भय लग सकता हे. संतान को कष्ट हो सकता है. षष्ठेश की दशा में पाप ग्रहों की अन्तर्दशा राज्य से तिरस्कार कोप भाजन का शिकार बना सकती है. कारावास, मुकदमा या व्याधि को भी झेलना पड़ सकता है.

सप्तमेश की महादशा | Seventh house

सप्तमेश की दशा में शोक, शारीरिक कष्ट मिल सकता है. सप्तमेश पाप ग्रह हो तो इसकी दशा में स्त्री को कष्ट प्राप्त हो सकता है. वैवाहिक जीवन में तनाव एवं अलगाव भी उत्पन्न हो सकता है. सप्तमेश में पाप ग्रह की अन्तर्दशा होने पर जातक को स्त्री सुख से वंचित रहना पड़ सकता है.

किंतु शुभ ग्रहों से युक्त होने पर यह दांपत्य सुख प्रदान करने में सहायक होता है तथा सांसारिक सुख प्रदान करने में सक्षम होता है.

अष्टमेश की महादशा | Eighth house

अष्टमेश की दशा में पाप ग्रह की अन्तर्दशा शत्रु से भय, धन का क्षय करा सकती है. इसकी पाप ग्रहों की दशा स्त्री, मित्रों, भाई बंधुओं के सुख में कमी आती है. अष्टमेश आयु स्थान है अत: इसकि अच्छी दशा दिर्घायु प्रदान करने में भी सहायक होती है.

नवमेश की महादशा | Ninth house

नवमेश की दशा में धार्मिक प्रवृत्ति देखी जा सकती है. जातक दान., पुण्य, तीर्थ यात्राओं करने की इच्छा रखने वाला होता है. शुभ ग्रहों से युक्त होने पर बुद्धि, प्रतिष्ठा में उन्नती देने वाला होता है.

नवमेश की दशा में पाप ग्रह का अन्तर्दशा होने पर पिता को कष्ट हो सकता है, धार्मिकता का पतन हो सकता है तथा धन का नाश एवं बंधन प्राप्त हो सकता है.

दशमेश की महादशा | Tenth house

दशमेश की दशा में धन और मान सम्मान की प्राप्ति होती है. राज सम्मान की प्राप्ति हो सकती है. दशमेश पाप या नीच ग्रहों से युक्त होने पर प्रियजनों को संताप देता है, अपमान, कार्य में रूकावट देता है, अवनती और पदच्युति प्रदान करता है. यदि कोई ग्रह दशम में उच्च या शुभ का हो तो उक्त ग्रह की दशा में भाग्योदय, मान सम्मान की प्राप्ति होती है.

एकादशेश की महादशा | Eleventh house

एकादशेश भाव लाभ का स्थान कहलाता है अत: इसकी दशा में लाभ प्राप्ति की संभावना देखी जा सकती है. जातक व्यापार एवं व्यवसाय से अच्छा लाभ पाता है. उसे सम्मान एवं यश की प्राप्ति होती है.

यदि लाभेश पाप ग्रहों से युक्त हो तो इसकी दशा रोग प्रदान कर सकती है. इसमें पाप ग्रहों की अन्तर्दशा राजभय, हानि, दुख प्रदान कर सकती है तथा व्यर्थ के खर्चों को बढा़ सकती है.

द्वादशेश की महादशा | Twelfth house

द्वादशेश भाव व्यय भाव कहलाता है. व्ययेश की दशा में आर्थिक कष्ट, रोग, चिंता प्रदान करने वाला हो सकता है. द्वादशेश की दशा में शनि, सूर्य अथवा मंगल की अन्तर्दशा स्त्री एवं संतान से मतभेद प्रदान कर सकती है.

द्वादशेश की महादशा में राहु की अन्तर्दशा चोर, विष या अग्नि का भय प्रदान कर सकती है.

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