क्या होता है मुहूर्त और कैसे बदल सकता है ये आपका भाग्य

मुहूर्त को भारतीय ज्योतिष में किसी कार्य विशेष को प्रारंभ एवं संपादित करने हेतु एक निर्दिष्ट शुभ समय कहा गया है. ज्योतिष के अनुसार शुभ मुहूर्त में कार्य प्रारंभ करने से कार्य बिना किसी रुकावट के और शीघ्र संपन्न होता है. चाहे प्रश्न शास्त्र हो या जन्म कुण्डली दोनों ही मुहूर्त्त पर आधारित हैं. मुहूर्त पंचांग के पांच अंगों अर्थात तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण द्वारा निर्मित होता है. पंचाग गणना के आधार पर शुभ और अशुभ मुहूर्तों का निर्धारण किया जाता है. मुहूर्त्त को प्रत्येक कार्य के अनुसार भिन्न भिन्न रुप में लिया जाता है.

मुहूर्त्त संस्कार | Muhurat Sanskar

भारतीय संस्कृति के षोडश संस्कारों में मुहूर्त के विषय में मुहूर्त्त शास्त्र में पृथक रूप से वर्णन प्राप्त होत है. जिसमें यह बताया गया है कि तिथि, वार, नक्षत्र आदि के संयोग से भी मुहूर्त बनते हैं, जिनमें संस्कार एवं विशिष्ट कार्यों के अतिरिक्त अन्य कार्य भी किये जा सकते हैं.

शुभ मुहूर्त्त | Auspicious Muhurat

शुभ मुहूर्त वरदान स्वरुप होते हैं, विवाह, मुंडन, गृहारंभादि शुभ कार्यों में मास, तिथि, नक्षत्र, योगादि के साथ लग्न की शुद्धि को विशेष महत्व एवं प्रधानता दी जाती है. तिथि को देह, चंद्रमा को मन, योग, नक्षत्र आदि को शरीर के अंग तथा लग्न को आत्मा माना गया है इस प्रकार मुहूर्त का महत्व स्वयं में प्रर्दशित हो जाता है.   मुहूर्त शास्त्र में कई प्रकार के शुभ मुहूर्त्तों का वर्णन किया गया है जैसे सर्वार्थसिद्धि योग, सिद्धि योग, अमृतसिद्धि योग, राज योग, रविपुष्य योग, गुरुपुष्य योग, द्वि-त्रिपुष्कर योग, पुष्कर योग तथा रवि योग इत्यादि योग बताए गए हैं.

मुहूर्त संबंधी महत्वपूर्ण तथ्य | Important Factors related to Muhurat

मुहूर्त्त संबंधी कुछ महत्वपूर्ण बातों के विषय में ध्यान देना आवश्यक होता है. मुहूर्त्त में तिथियों का ध्यान रखना चाहिए जैसे रिक्ता में कार्यों का आरंभ न करें तथा अमावस्या तिथि में मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं. जब कोई भी ग्रह जिस दिन अपना राशि परिवर्तन कर रहा हो तो उस समय न किसी भी कार्य की योजना बनाएं और न ही कोई नया कार्य आरंभ करें.

जब भी कोई ग्रह उदय या अस्त हो या जन्म राशि का या जन्म नक्षत्र का स्वामी यदि अस्त हो, वक्री हो अथवा शत्रु ग्रहों के मध्य में हो तो वह समय अनुकूल कार्य को करने के लिए उपयुक्त नहीं होता. मुहूर्त्त में इन सभी बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है.

कुण्डली का मुहूर्त्त से संबंध | Relationship between Kundali and Muhurat

जन्म कुण्डली अनुकूल मुहूर्त्त का निर्धारण करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. जन्म समय की ग्रह स्थिति को बदला तो नहीं जा सकता लेकिन शुभ समय मुहूर्त्त को अपना कर कार्य को सफलता की और उन्मुख किया जा सकता है. ज्योतिष के अनुसार कुण्डली के दोषों के प्रभाव से बचने के लिए यदि अच्छी दशा में तथा शुभ गोचर में शुभ मुहूर्त्त का चयन किया जाए तो कार्य की शुभता में वृद्धि हो सकती है.

मुहूर्त महत्व | Importance of Muhurat

किसी भी कार्य को करने हेतु एक अच्छे समय की आवश्यकता होती है. हर शुभ मुहूर्त का आधार तिथि, नक्षत्र, चंद्र स्थिति, योगिनी दशा और ग्रह स्थिति के आधार पर किया जाता है. शुभ कार्यों के प्रारंभ में भद्राकाल से बचना चाहिये. चर, स्थिर लग्नों का ध्यान रखना चाहिए. जिस कार्य के लिए जो समय निर्धारित किया गया है यदि उस समय पर उक्त कार्य किया जाए तो मुहूर्त्त के अनुरूप कार्य सफलता को प्राप्त करता है.

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जैमिनी ज्योतिष में अर्गला | Argala in Jaimini Astrology

प्रत्येक राशि और ग्रह अपनी स्थिति और प्रकृति के अनुसार दूसरी राशियों और ग्रहों पर दृष्टि डालते हैं. इस दृष्टि का शुभ और अशुभ प्रभाव व्यक्ति को ग्रहों व राशियों की शुभता और अशुभता के अनुरूप प्राप्त होता है, इसे ही अर्गला कहा गया है. दूसरे शब्दों में कहें तो अर्गला वह ग्रह और राशि है जो व्यक्ति की जन्म कुण्डली में महत्वपूर्ण प्रभाव रखते हैं. इन्हीं के द्वारा व्यक्ति के आने वाले समय और उसके जीवन में होने वाली घटनाओं के विषय में ज्ञात किया जा सकता है.

अर्गला का निर्माण | Formation of Argala

दूसरे, चौथे, पांचवें एवं ग्यारहवें घर जो ग्रह बैठा हो उनकी दृष्टि इन घरों में बैठे किसी ग्रह पर हो तो वह घर अर्गला कहा जाता है. अपवाद स्वरूप केतु को अर्गला में शामिल नहीं किया गया है यानी इन घरों में से किसी में भी केतु बैठा हो तो उस घर में अर्गला का विचार नहीं किया जाता है. वैसे, केतु से नवम घर में जो ग्रह स्थित होता है उसे अर्गला के रूप में देख सकते हैं. अर्गला का विचार बहुत महत्वपूर्ण होता है ज्योतिष के विभिन्न घटना क्रमों में यह अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का प्रयास करता है.

शुभ और अशुभ अर्गला | Auspicious and Inauspicious Argala

कुण्डली में अगर प्राकृतिक शुभ ग्रह दूसरे, चौथे. पांचवें तथा ग्यारहवें घर में स्थित हो तो शुभ अर्गला होता है. अगर केतु को छोड़कर, सूर्य, मंगल,शनि और राहु इन घरों में हो तो अर्गला अशुभ होता है. अगर ये ग्रह तीसरे घर में स्थित हो तब भी अर्गला का विचार किया जा सकता है. अर्गला का विचार शुभ एवं अशुभ प्रभावों को प्रभावित करता है शुभता लिए हुए अर्गला जीवन जीवन को सामान्य एवं सुचारू रुप से चलाने में बहुत सहायी होती है.

अप्रभावी अर्गला | Ineffective Argala

कुछ घरों में ग्रहों की स्थिति से जहां अर्गला का निर्माण होता है वहीं कुछ ऐसे भी घर हैं जिनमें ग्रहों के होने से अर्गला अप्रभावी हो जाता है. इस विषय में कहा गया है कि दसवें, बारहवें, तीसरे एवं नवम में ग्रह स्थित हों तो दूसरे, चौथे, ग्यारहवें एवं नवम भाव के अर्गला के प्रभाव में कमी आ जाती है. जैमिनी ज्योतिष के सिद्धांत में बताया गया है कि पांचवें घर में केतु के होने से नवम भाव का अर्गला निष्प्रभावी हो जाता है. चौथे घर में ग्रहों की मौजूदगी से दसवें घर का अर्गला शक्तिहीन हो जाता है. इसी प्रकार द्वादश भाव में ग्रह होने से द्वितीय भाव का एवं ग्यारहवें घर में ग्रह होने से तीसरे भाव का तथा पंचम में ग्रह होने से नवम भाव का अर्गला फल देने में अक्षम होता है.

अर्गला का प्रभाव | Effects of Argala

मान्यताओं के अनुसार जिस घर में अर्गला बना है उस घर की राशि की जब दशा चलती है तो शुभ होने पर शुभ फल प्राप्त होता है. जबकि अशुभ अर्गला होने पर अशुभ परिणाम प्राप्त होता है. पद लग्न, लग्न एवं सप्तम में शुभ अर्गला होने पर व्यक्ति को भाग्य का उत्तम फल प्राप्त होता है. इस स्थिति में साझेदारी के काम में अच्छी सफलता मिलती है, आर्थिक स्थिति उन्नत रहती है तथा वैवाहिक जीवन सुखमय होता है.

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वर्षफल और ताजिक योग | Varshaphal and Tajik Yoga

वर्ष कुण्डली में ताजिक योगों का उपयोग किया जाता है. वर्ष फल में इन योगों का विश्लेषण करना अत्यंत आवश्यक होता है. बिना ताजिक योगों के वर्ष कुण्डली का अध्ययन अधूरा होता है. कार्य की सिद्धि होगी अथवा नहीं होगी यह ताजिक योगों से ज्ञात होता है. अधिकतर ताजिक योग लग्नेश तथा कार्येश पर आधारित होते हैं.

इकबाल योग | Ikbal Yoga

इकबाल योग का अर्थ प्रतिष्ठा, सम्मान से होता है. वर्ष कुण्डली में यदि सभी ग्रह केन्द्र भाव अर्थात 1,4,7,10 में या पणफर अर्थात 2,5,8,11 में स्थित हों तो इकबाल योग क अनिर्माण होता है. यह एक अच्छा तथा शुभ योग है कुण्डली में यह योग शुभता एवं कार्यसिद्धि का सूचक बनता है.

इन्दुवार योग | Induvar Yoga

इंदुवार यो भाग्य में कमी को दर्शाता है. यदि वर्ष कुण्डली में सारे ग्रह अपोक्लिम अर्थात 3,6,9,12 भावों में हो तब इन्दुवार योग बनता है. इस भावों बैठे ग्रह क्षीणता युक्त होते हैं.

दुरुफ योग | Duruph Yoga

कुण्डली में यदि लग्नेश तथा कार्येश 6,8,12 भावों में निर्बल अवस्था में स्थित हों तथा पाप ग्रहों से दृष्ट हों तब दुरुफ योग बनता है. यह अच्छा योग नहीं होता.

इत्थशाल योग | Ithashal Yoga

लग्नेश तथा कार्येश में दृष्टि संबंध हो. लग्नेश तथा कार्येश दीप्ताँशों में हो. इत्थशाल होने के लिए दो ग्रहों का आपस में संबंध होता है. मंदगामी ग्रह के अंश अधिक हों तथा तीव्रगामी ग्रह के अंश कम हों. उपरोक्त शर्ते यदि पूरी हो रही हों तो इत्थशाल योग बनता है. यह योग भविष्य में होने वाला संबंध दिखाता है. भविष्य में कार्य सिद्धि के योग बनते हैं.

इशराफ योग | Ishraf Yoga

कुछ विद्वान इसे मुशरिफ योग भी कहते हैं. यह योग इत्थशाल योग के ठीक विपरीत होता है. परस्पर दो ग्रहों में दृ्ष्टि हो, परन्तु शीघ्रगामी ग्रह के अधिक अंश हों तथा मंदगामी ग्रह के अंश कम हों. इस प्रकार शीघ्रगामी ग्रह आगे ही बढ़ता रहेगा और कार्य हानि होगी. मंदगामी ग्रह, तीव्रगामी ग्रह से एक अंश से अधिक पीछे हो तो इशराफ होगा.

कुत्थ योग | Kutha Yoga

लग्नेश, कार्येश कुण्डली में बली हों. शुभ ग्रहों से दृष्ट हों, शुभ भावों में हों तथा शुभ संबंध में हों तो शुभ है. कार्य की सिद्धि हो सकती है.

दुफलि कुत्थ योग | Dufali Kutha Yoga

कुण्डली में मंदगामी ग्रह बली हो. तीव्रगामी ग्रह निर्बल हो तो दुफलि कुत्थ योग बनता है. इस योग के बनने पर कार्य सिद्धि की संभावना अच्छी रहती है.

मणऊ योग | Manau Yoga

इत्थशाल में शामिल ग्रहों से मंगल तथा शनि का संबंध भी बन रहा हो तो मणऊ योग बनता है. इसमें कार्य की हानि हो होती है. कार्य नहीं बनता.

रद्द योग | Radd Yoga

वर्ष कुण्डली में यदि मंदगामी ग्रह निर्बल हो तथा तीव्रगामी ग्रह बली हो तब रद्द योग बनता है. इस योग के बनने से कार्य हानि होती है.

कम्बूल योग | Kambool Yoga

वर्ष कुण्डली में लग्नेश तथा कार्येश का परस्पर इत्थशाल हो रहा हो. दोनों ग्रहों में से किसी एक ग्रह के साथ चन्द्रमा का इत्थशाल हो रहा हो तब कम्बूल योग बनता है. इस योग के बनने पर कार्यसिद्धि होती है.

गैरी कम्बूल योग | Gairi Kambool Yoga

कुण्डली में लग्नेश तथा कार्येश का इत्थशाल, शून्यमार्गी चन्द्रमा से हो रहा हो और चन्द्रमा राशि अंत में भी स्थित हो तब यह गैरी कम्बूल योग बनता है. इस योग में कार्य सिद्धि विलम्ब से होती है.

खल्लासर योग | Khallasar Yoga

लग्नेश तथा कार्येश का संबंध होने से इत्थशाल है लेकिन शून्यमार्गी चन्द्रमा से कोई संबंध नहीं है तो यह खल्लासर योग बनता है. इस योग में कार्य सिद्धि नहीं होती है.

ताम्बीर योग | Tambeer Yoga

जब कुण्डली में लग्नेश तथा कार्येश का इत्थशाल नहीं होता है. एक राशि अंत में होता है और दूसरा ग्रह अगली राशि में आने पर किसी अन्य बली ग्रह से इत्थशाल करे तब यह ताम्बीर योग बनता है. इस योग में किसी अन्य की सहायता से कार्य की सिद्धि होती है.

नक्त योग | Nakta Yoga

कुण्डली में लग्नेश तथा कार्येश में इत्थशाल नहीं है लेकिन कोई अन्य तीसरा तीव्रगामी ग्रह दोनों से इत्थशाल करता है तो नक्त योग बनता है. इस योग में किसी मध्यस्थ की सहायता से बात बन सकती है अर्थात कार्य सिद्धि हो सकती है.

यमया योग | Yamya Yoga

कुण्डली में लग्नेश तथा कार्येश में इत्थशाल नहीं है लेकिन किसी अन्य मंदगामी ग्रह से दोनों का इत्थशाल हो तो यमया योग बनता है. इस योग में किसी बडे़-बुजुर्ग की सहायता लेकर व्यक्ति कार्य बना सकता है. किसी को मध्यस्थ बनाकर कार्य को सफल बनाया जा सकता है.

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संकटनाशनगणेशस्तोत्रम् | Sankat Nashan Ganesha Stotram

संकटनाशनगणेशस्तोत्रम भगवान गनपति जी का अत्यंत प्रभावि स्त्रोत है. इसके स्मरण मात्र से सभी संकटों का नाश होता है. यदि प्रतिदिन इस स्त्रोत का पाठ किया जाए तो व्यक्ति को सभी परेशानियों से निजात मिलने लगती है. भगवान गणेश प्रथम पूज्य हैं, इनकी शरण में जाकर भक्त समस्त चिंताओं से दूर हो जाता है और आनंद एवं सुख की अनुभूति को प्राप्त करता है. गणेश पूजन किये कोई शुभ व मांगलिक कार्य आरंभ नहीं करते हैं.

पुरातन पूजा क्रम में पंच देवोपासना भेद में श्री गणेश जी को प्रमुख स्थान प्राप्त हुआ है. गणेश साधना के अनेक प्रयोग बताये जाते हैं जो जीवनोपयोगी हैं. प्रातःकाल गणेश जी को दूर्वा अर्पित करने से कार्यों में कोई बाधा उत्पन्न नहीं होती. घर के मुख्य द्वार पर गणेश जी का चित्र या प्रतिमा लगाने से धन लाभ होता है. गणपति को दूर्वा और मोतीचूर के लड्डू का भोग लगाकर उनके सम्मुख शुद्ध घी का दीपक जलाने से कभी भी धनाभाव का सामना नहीं करना पड़ता है.

प्रातः काल गणपति जी के मंत्रों का 21 दिनों तक जप करने से सभी मनोकामना पूर्ण होती हैं. श्री गणेश भगवान को ब्रह्मा, विष्णु, शिव रुप कहा गया है. अग्नि, वायु, सूर्य, चंद्र एवं समस्त देवता, पंचतत्व, नवग्रह आदि सभी कुछ गणपति जी के स्वरुप माने गए हैं. ऋद्धि-सिद्धि की प्राप्ति कामनापूर्ति, संकटनाश, दांपत्य जीवन सुख आरोग्य इत्यादि कोई भी ऐसी कामना नहीं है जो कि गणेश कृपा से पूर्ण न हो.

श्री गणेश सभी सिद्धियों के प्रदाता और विघ्न विनाशक हैं. हिंदू धर्म में प्रत्येक कार्य का आरंभ करते हुए उसकी सफलता हेतु भगवान श्री गणेश की पूजा की जाती है. गणेश साधना के  अनेक प्रयोग बताये गये हैं, जिनके द्वारा समस्त अवसादों का नाश होता है इसी श्रेणी में संकटनाशनगणेशस्तोत्रम् का पाठ करना अति उत्तम माना जाता है. तीनों वक्त श्री गणेश का पूजन करना श्रेस्कर होता है पूजन समय श्री गणेश को दूर्वा अवश्य चढ़ाएं, पुष्पों द्वारा श्री गणेश जी का आह्वान करें सिंदूर, घी का दीप और मोदक द्वारा पूजन करें.

नारद उवाच । Narada quotations

प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् ।।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायु:कामार्थसिद्धये ।।१ ।।

प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम् ।।
तृतीयं कृष्णपिङ्क्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम् ।।२ ।।

लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च ।।
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम् ।।३ ।।

नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम् ।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम् ।।४ ।।

द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं य: पठेन्नर: ।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो ।।५ ।।

विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् ।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम् ।।६ ।।

जपेत् गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासै: फलं लभेत् ।
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशय: ।।७ ।।

अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा य: समर्पयेत् ।
तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादत: ।।८ ।।

इति श्री नारदपुराणे संकटविनाशनं श्रीगणपतिस्तोत्रं संपूर्णम् ।

संकटनाशनगणेशस्तोत्रम् महत्व | Importance of Sankat Nashan Ganesha Stotram

इस स्त्रोत में नारद जी, श्री गणेश जी के अर्थ स्वरुप का प्रतिपादन करते हैं. नारद जी कहते हैं कि सभी भक्त  पार्वती नन्दन श्री गणेशजी को सिर झुकाकर प्रणाम करें और फिर अपनी आयु , कामना और अर्थ की सिद्धि के लिये इनका नित्यप्रति स्मरण करना चाहिए.

श्री गणपति जी के सर्वप्रथम वक्रतुण्ड, एकदन्त, कृष्ण पिंगाक्ष, गजवक्र, लम्बोदरं, छठा विकट, विघ्नराजेन्द्र, धूम्रवर्ण, भालचन्द्र, विनायक, गणपति तथा बारहवें स्वरुप नाम गजानन का स्मरण करना चाहिए. क्योंकि इन बारह नामों का जो मनुष्य प्रातः, मध्यान्ह और सांयकाल में पाठ करता है उसे किसी प्रकार के विध्न का भय नहीं रहता, श्री गणपति जी के इस प्रकार का स्मरण सब सिद्धियाँ प्रदान करने वाला होता है.

इससे विद्या चाहने वाले को विद्या, धना की कामना रखने वाले को धन, पुत्र की इच्छा रखने वाले को पुत्र तथा मौक्ष की इच्छा रखने वाले को मोक्ष की प्राप्ति होती है. इस गणपति स्तोत्र का जप छहः मास में इच्छित फल प्रदान करने वाला होता है तथा एक वर्ष में पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो सकती है इस  प्रकार जो व्यक्ति इस स्त्रोत को लिखकर आठ ब्राह्मणों को समर्पण करता है, गणेश जी की कृपा से उसे सब प्रकार की विद्या प्राप्त होती है.

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ग्रहों के कारक तत्व | Karak Elements of Planets | Karak Elements

सभी ग्रह के कारक उस ग्रह के प्रभावों को प्रदर्शित करने में सहायक होते हैं. नौ ग्रहों में से जब कोई भी ग्रह अपने प्रभाव देता है तो उसे समझने के लिए उसके कारकों पर दृष्टि डालनी आवश्यक होती है.

सूर्य ग्रह | Sun Planet

आत्मा, स्वयं शक्ति, सम्मान, राजा, पिता, राजनीति हडिड्यों, चिक्तित्सा विज्ञान, स्वास्थ्य, ह्रदय, पेट. पित्त , दायीं आँख, रक्त प्रवाह में बाधा गर्मी तथा बिजली इत्यादि का कारक है सूर्य.

चंद्र ग्रह | Moon Planet

चंद्रमा मन, माता. मानसिक स्थिति, मनोबल, द्रव्य वस्तुओं, चित्त की प्रसन्नता, जलाश्य, यात्रा, सुख शंति, धन संपत्ति का शरीर के तरल पदार्थ, रक्त बायीं आँख, छाती, दिमागी परेशानी, महिलाओं में मासिक चक्र इत्यादि का कारक होता है.

मंगल ग्रह | Mars Planet

मंगल साहस, वीरता, शौर्य, शक्ति, क्रोध सेनापति, युद्ध, शत्रु अस्त्र-शस्त्र, दुर्घटनाओं, भूमि, अचल संपत्ति, छोते भाई बहनों, वैज्ञानिक डाक्टर्स, यान्त्रिक कार्यों, पुलिस, सेना, सिर, जानवरों द्वारा काटना, दुर्घटना, जलना, घाव, शल्य क्रिया, आपरेशन, उच्च रक्तचाप, गर्भपात इत्यादि का कारक होता है.

बुध ग्रह | Mercury Planet

बुध ग्रह बुद्धि चातुर्य, वाणी, मनोविनोद, शिक्षा, गणित, लेखन, तर्क-वितर्क, मुद्रण, ज्योतिष विज्ञान, नृत्य एवं नाटक, वनस्पति, व्यापार, मध्यस्थता कराने वाला, मामा, मित्र, संबंधियों, गला, नाक, कान, फेफड़े, आवाज इत्यादि का कारक है.

गुरू ग्रह | Jupiter Planet

बृहस्पति जी ज्ञान, विद्वता, शिक्षा, धार्मिक कार्यों, श्रेष्ठजनों का, भक्ति, प्राचीन साहित्य, धन संपत्ति, मान सम्मान, पूर्वजों, पुत्र, बडे़ भाई, फल वाले वृक्षों, शरीर में चर्बी, मधुमेह, चिरकालीन बीमारियों, कान, बैंक, आयकर, खंजाची, राजस्व, मंदिर, धर्मार्थ संस्थाएं, कानूनी क्षेत्र, जज, न्यायाल्य, वकील, लेखापरीक्षक, सम्पादक, प्राचार्य, शिक्षाविद, अध्यापक, शेयर बाजार, पूंजीपति, मंत्री, दार्शनिक, निगम पार्षद, ज्योतिषी, वेदो और शास्त्रों इत्यादि का कारक बनता है.

शुक्र ग्रह | Venus Planet

शुक्र ग्रह वैवाहिक संबंधों, पत्नि, इन्द्रिय भोग विलास, यौन विषय, सभी प्रकार की सुख स्म्पत्ति, आभूषणों, सुंदरता, सुगंधित वस्तुओं, पुष्पों, सजावत के सामा, कलात्मकता, डिजाइनर वस्तुओं, श्वेत रंग के पदार्थों का, सुन्दर शरीर, बडी आंखे दिखने में आकर्षक, घुंघराले बाल, काव्यात्मक, गाना बजाना, काले बाल, विलासिता, व्यभिचार, शराब, नशीले पदार्थों, कफमय कम खाने वाला, छोटी कद-काठी, दिखने में युवा, गुप्त रोग, आँख, आंतें , अपेंडिक्स, मधुमेह इत्यादि का कारक बनता है.

शनि ग्रह | Saturn Planet

शनि ग्रह जीवन, आयु, मृत्यु, दुख, दरिद्रता, अनादर, निर्धनता, चापलुस, बीमारी, अनुचित व्यवहार, निम्न स्तर के कार्य,  प्राकृतिक आपदाओं, मृत्यु, बुढापे, रोग, पाप, भय, गोपनीयता, कारावास, नौकरी, विज्ञान नियम, तेल-खनिज, कामगार, मजदूर सेवक, सेवाभाव, दासता, कृषि, त्याग, उंचाई से गिरना,  अपमान, अकाल, ऋण, कठोर परिश्रम, अनाज के काले दाने, लकडी, विष, टांगें, राख, अपंगता, आत्मत्याग, बाजू, ड्कैती, अवरोध, लकडी, ऊन, यम अछूत, इस्पात, कार्यो में देरी लाना. सेवा विभाग, तेल, खनिज पदार्थों, भूमि से निकलने वाले पदार्थ, विदेशी भाषा, लोभ लालच, अहंकार, चोरी, निर्मम कार, लगंडापन, बुढा़पा, पांव, पंजे की नसें, लसीका तंत्र, लकवा, उदासी, थकान इत्यादि का कारक होता है.

राहु ग्रह | Rahu Planet

राहु ग्रह पितामह, दादा, विदेश यात्रा, समाज एवं जाती से अलग लोगों, सर्प, सर्प का काटना, त्वचा रोगों, खुजली, हड्डियां , जहर फैलाना, सर्प दंश, क्रानिक बीमारियां, डर विधवा, दुर्वचन, तीर्थ यात्राओं,  निष्ठुर वाणी युक्त, विदेश में जीवन, अकाल, इच्छाएं, त्वचा पर दाग, चर्म रोग, सरीसृप, सांप और सांप का जहर, महामारी, अनैतिक महिला से संबन्ध, नानी, व्यर्थ के तर्क, भडकाऊ भाषण, बनावटीपन,  दर्द और सूजन,डूबना, अंधेरा, दु:ख पहुंचाने वाले शब्द, निम्न जाति, दुष्ट स्त्री, जुआरी, विधर्मी, चालाकी, संक्रीण सोच, पीठ पीछे बुराई करने वाले, पाखण्डी, बुरी आदतों का आदी, जहाज के साथ जलमण्न होना, डूबना, रोगी स्त्री के साथ आनन्द, अंगच्छेदन होना, डूबना, पथरी, कोढ, बल, व्यय, आत्मसम्मान, शत्रु, मिलावट दुर्घटना, नितम्ब, देश निकाला, विकलांग,  खोजकर्ता, शराब, झगडा, गैरकानूनी, तरकीब से सामान देश से अन्दर बाहर ले जाना. जासूसी, आत्महत्या, विषैला, विधवा, पहलवान, शिकारी, दासता, शीघ्र उत्तेजित होने इत्यादि का कारक होता है.

केतु ग्रह | Ketu Planet

केतु ग्रह रंग बिरंगे धब्बे वाले पशु-पक्षिओं का, कुत्ते, मुर्गा सींग वाले पशु, काला जादु, घाव, जीवाणु, वैराग्य एवं मोक्ष, हकलाना, पहचानने में दिक्कत, आंत, परजीवी, उन्माद, कारावास, विदेशी भूमि में जमीन, कोढ, दासता, आत्महत्या, नाना, दादी, आंखें, तुनकमिजाज, तुच्छ और जहरीली भाषा, लम्बा कद, धुआं जैसा रंग, निरन्तर धूम्रपान करने वाला,घाव, शरीर पर दाग, छरहरा और पतला, दुर्भावपूर्ण अपराधी, गिरा हुआ, साजिश, अलौकिक, दर्शनशास्त्र, वैराग्य, आकस्मिक मृत्यु,  बुरी आत्मा, कीडों के कारण होने वाले रोग, विषैला काटना, धर्म, ज्योतिष, अन्तिम उद्वार, औषधियों का प्रयोग करने वाला, मिलावट करके अशुद्ध करने वाला, गिरफ्तारी, दिवालिया, चोट, मैथुन, अपहरण, खून, विष, सजा, कृमि, चोट, अग्निकाण्ड, हत्या और कृपणता इत्यादि का कारक बनता है.

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बीसा यंत्र | Beesa Yantra | Importance of Beesa Yantra

यंत्र शास्त्र में बीसा यंत्र को प्रमुख स्थान प्राप्त है, विभिन्न यंत्रों की श्रेणी में बीसा यंत्र भी कई प्रकार के हो सकते हैं. यंत्र की अलौकिक शक्तियां साधक की कामना की पूर्ति करने में समर्थ होती हैं. यंत्र अक्षय निधि है जिससे व्यक्ति बहुत कुछ प्राप्त कर सकता है. बीसा यंत्र मनोवांछित सफलता प्रदान करने वाला तथा भय, झगड़ा, लड़ाई इत्यादि से बचाव करने वाला माना जाता है. इस यंत्र को किसी भी प्रकार से उपयोग में लाया जा सकता है चाहे तो इसे मंदिर में स्थापित कर सकते हैं या पर्स अथवा जेब में भी रख सकते हैं.

तंत्र से संबंधित कार्यों में भी इस यंत्र का उपयोग किया जाता है. भागवत में यंत्र को इष्ट देव का स्वरूप बतलाया गया है और इसी प्रकार नारद पुराण में भी बीसा यंत्र को भगवान विष्णु के समान पूजनीय कहा गया है. बीसा यंत्र में कोई भी जड़वाया जा सकता है इसमें रत्न प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालते हैं, कुण्डली में अशुभ योगों की अशुभता में कमी लाने हेतु इस बिसा यंत्र का उपयोग किया जा सकता है.

बीसा यंत्र निर्माण | Beesa Yantra Formation

तंत्र, मंत्र और यंत्र अभीष्ट सिद्धियों की प्राप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इस यंत्र की चल प्रतिष्ठा होती है बीसा यंत्र को किसी शुभ मुहूर्त्त जैसे दीपावली, नवरात्रों, रवि-पुष्य, गुरु-पुष्य, धनतेरस इत्यादि समय शास्त्रोक्त विधि से तैयार किया जाना चाहिए. शुभ मुहूर्त में इस यंत्र को भोजपत्र पर या धातु पर अष्टगंध स्याही अगर, तगर, केसर, गौरोचन, कस्तूरी, कुंकुम, लालचन्दन, सफेद चन्दन से बनाना चाहिए.

बीसा यंत्र का निर्माण भोजपत्र पर करके इसे दाहिने हाथ में धारण करने से कई प्रकार की समस्याओं से मुक्ति प्राप्त होती है. धन प्राप्ति हेतु लक्ष्मी बीसा यंत्र के सम्मुख कल्मल गट्टे की माला से “श्रीं ह्रीं क्लीं लक्ष्मी देव्यै नमः” अथवा “श्रीं ह्रीं श्रौं कमले कमलालये प्रसीद-प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः।” का पाठ करना चाहिए.

बीसा यंत्र पूजन एवं स्थापना | Beesa Yantra Worship

बीसा यंत्र की स्थापना विग्रह, दुकान या व्यापार के स्थान पर ईशान कोण के पश्चिम मुख की ओर करना चाहिए. व्यवसाय में स्फलता पाने के लिए, सर्वकार्य सिद्धि हेतु, मनोवांछित फलों की प्राप्ति के लिए स्वास्तिक बीसा यंत्र को भोजपत्र या सफेद कागज पर लाल रंग की स्याही से लिखकर पूजन स्थल पर रखना चाहिए.

विधि-विधान से ह्रीं श्रीं क्लीं क्लूं अर्द्ध नमः मंत्र का एक माला जप नित्य करें, सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. बीसा यंत्र को चांदी, ताम्रपत्र या भोजपत्र इत्यादि किसी में भी बनाकर उसका नियमित पूजन करने एवं और श्रीसूक्त का पाठ करने से बाधाएं दूर होती हैं तथा सफलता की प्राप्ति होती है.

बीसा यंत्र लाभ | Benefits of Beesa Yantra

धन के अत्यधिक अपव्यय से बचने के लिए लक्ष्मी बीसा यंत्र धारण किया जा सकता है केमद्रुम योग, दरिद्र योग आदि योग होने पर लक्ष्मी बीसा यंत्र बहुत लाभकारी होता है. बीसा यंत्र का प्रभाव चमत्कारी रुप से व्यक्ति पर असर दिखाता है. यह असीम वैभव, श्री, सुख और समृद्धि देता है.  ऐसे लोग, जिन्हें परिश्रम करने पर भी अभीष्ट फल की प्राप्ति नहीं होती, पदोन्नति में बाधा आ रही हो या प्रभुत्व के विकास में बाधाओं का सामना कर रहे हों उनके लिए बीसा यंत्र शीघ्र एवं अभीष्ट फल प्रदान करने वाला होता है.

जीवन साथी के साथ संबंधों में तनाव होना एवं पारिवारिक कलह का व्याप्त रहना इत्यादि में पुखराज युक्त बीसा यंत्र धारण करने से तुरंत लाभ की प्राप्ति होती है. बीसा यंत्र कई प्रकार के होते हैं जिसमें अधिकतर समस्याओं से बचाव के लिए यह कारगर सिद्ध होते हैं.

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विवाह में नवांश की भूमिका | Role of Navansh in A Marriage

विवाह में जन्म कुण्डली की भांती नवांश वर्ग कुण्डली की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है. नवांश जिसे D-9 भी कहा जाता है. इसका उपयोग विवाह समय, वैवाहिक जीवन, जीवन साथी के व्यवहार , उसके चरित्र, मानसिक तथा दैहिक स्वरुप को समझने के लिए किया जाता है. इसके साथ ही साथ नवांश वर्ग कुण्डली मिलान, अलगाव एवं संबंधों की मध्यस्था को जाने के भी उपयोग में आती है.

वैवाहिक जीवन का सुख | Happiness in Married Life

नवांश में नवांश लग्न और राशि चक्र के सप्तमेश स्वामी का बहुत महत्व होता है. विवाह के पश्चात जीवन में सुख एवं शंति कैसी रहेगी इस बात को यहां से समझा जा सकता है. यदि नवांश लग्न उच्च का हो, स्वराशि युक्त हो अथवा शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो वैवाहिक जीवन खुशहाल रह सकता है.

इसमें नवांश के सप्तमेश का भी अध्ययन करना आवश्य होता है जिससे फल की शुभता की मजबूती देखी जा सकती है. यदि यहां सूर्य और चंद्रमा प्रथम एवं सप्तम भाव में अक्षांश रुप में स्थित हों तो दांपत्य जीवन में कलह का भाव रह सकता है. इसी प्रकार यदि शनि द्वादश में स्थित हो तो यह वैवाहिक जीवन के लिए अच्छी स्थिति नहीं मानी जाती है.

जीवन साथी का स्वरुप | Appearance of Life Partner

नवांश लग्न एवं लग्नेश तथा जिन ग्रहों से युक्त हैं उनका अध्ययन करना अति आवश्यक होता है. यदि यह चंद्रमा से युक्त है तो साथी सुंदर और सौम्य स्वभाव वाला हो सकता है. इसी प्रकार शुक्र से युक्त होने पर कलावान एवं सौंदर्य का प्रेमी हो सकता है. बुध से युक्त होने पर बुद्धिमान एवं जिंदादिल हो सकता है.

इसी प्रकार सूर्य से संबंधित होने पर साथी गुस्से वाला और उग्र स्वभाव का हो सकता है, इसके विपरित यदि गुरू से युक्त है तो धार्मिक स्वभाव तथा शुद्ध विचारों वाला हो सकता है. यहीं शनि, मंगल और राहु केतु के होने पर स्वभाव में शुभता की कमी हो सकती है या क्रोध एवं चालबाजी अधिक हो सकती है.

नवांश से कुण्डली मिलान | Matching Kundalis with Navansh

नवांश के द्वारा कुण्डली मिलान भी किया जाता है. जीवन साथी का लग्न अथवा चंद्र राशि जातक के नवांश के चंद्र और लग्न से मिलती हो. नवांश में चंद्र:- नवांश में चंद्र यदि मेष राशि में स्थित हो हो तो धनी एवं अधिपति हो सकता है, चंद्रमा यदि वृष राशि में हो तो शाररिक रुप से बलिष्ठ होता है, मिथुन राशि में होने पर लेखक, या ज्ञानी हो सकता है, कर्क राशि में होने पर रंग रुप में कमी, सिंह में बलिष्ठ एवं क्रोधी हो सकता है इसी प्रकार सभी राशियां उस पर अपना प्रभाव छोड़ती दिखाई देती हैं .

मेष नवांश होने पर व्यक्ति चंचल, व्याकुल हो सकता है वृष नवांश होने पर खुशहाल तथा विद्याओं से युक्त, मिथुन नवांश में सौम्य, कर्क में यात्राओं का शौकीन, सिंह नवांश में अभिमानी, अकेला रहने वाला, कन्या में स्वतंत्र, सहायक, तुला में दुबल-पतला, सामान्य जीवन, वृश्चिक नवांश में विद्वान एवं दुष्ट कर्म की प्रवृत्ति रखने वाला, धनु नवांश में सद विचारों से युक्त, मकर नवांश में अस्थिर एवं खर्चीला, कुंभ नवांश में चालाक, दयाहीन और मीन नवांश में जल से लाभ कमाने वाला हो सकता है. इस प्रकार हम देखते हैं की नवांश की विवाह में एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है जो दांपत्य जीवन के सुख एवं दुखों को दर्शाने में सहायक बन सकती है.

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श्री गणपति अथर्वशीर्ष स्त्रोत | Shree Ganpati Atharvasheersha Stotra | Ganpati Atharvasheersha Stotra

भगवान गणेशजी की आराधना शीघ्र फलदायी कही गई है. प्रथम पूज्य श्री गणेश सभी संकटों का नाश करने वाले एवं विघ्नहर्ता हैं. गणेशजी की प्राण प्रतिष्ठित करके मंत्रों का जाप करते हुए सुगंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप व नैवेद्य अर्पण करना चाहिए. गणेश जी दुर्वा चढाने से अति प्रसन्न होते हैं अत: इनके नामों का स्मरण करते हुए इनके पूजन में दुर्वा चढ़ाना चाहिए.  लाल व सिंदूरी रंग इन्हें प्रिय है, यह लाल रंग के पुष्प से शीघ्र खुश होते हैं

भगवान गणेश का शास्त्रीय विधि से पूजन फलदायी होता है. इनका पूजन आह्वान, आसन, पाद्य, आचमनीय, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, पुष्पमाला, धूप-दीप,  ताम्बूल, नैवेद्य तथा आरती इत्यादि के साथ संपन्न  होता है. ॐ गं गणपतये नम: मन्त्र को पढ़ते हुए पूजन में लाई गई सामग्री गणपति पर चढाने से पूजन पूर्ण होता है तथा शुभ-लाभ की अनुभूति प्राप्त होती है.

भगवान श्री गणेश जी के अथर्वशीर्ष स्त्रोत का पाठ करने से समस्त अमंगल दूर होते हैं तथा सफलता के मार्ग खुलते हैं. भगवान गणेश बुद्धि के अधिष्ठाता है इनके श्रीविग्रह का ध्यान, उनके मंगलमय नाम का जप और उनकी आराधना ज्ञान शक्ति बढाती है.

श्री गणपति अथर्वशीर्ष
मंगलकारी आहे श्री गणपति अथर्वशीर्ष
गणपति अथर्वशीर्ष
ॐ नमस्ते गणपतये।
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि
त्वमेव केवलं कर्ताऽ सि
त्वमेव केवलं धर्ताऽसि
त्वमेव केवलं हर्ताऽसि
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि
त्व साक्षादात्माऽसि नित्यम्।।1।।

ऋतं वच्मि। सत्यं वच्मि।।2।।

अव त्व मां। अव वक्तारं।
अव श्रोतारं। अव दातारं।
अव धातारं। अवानूचानमव शिष्यं।
अव पश्चातात। अव पुरस्तात।
अवोत्तरात्तात। अव दक्षिणात्तात्।
अवचोर्ध्वात्तात्।। अवाधरात्तात्।।
सर्वतो माँ पाहि-पाहि समंतात्।।3।।

त्वं वाङ्‍मयस्त्वं चिन्मय:।
त्वमानंदमसयस्त्वं ब्रह्ममय:।
त्वं सच्चिदानंदाद्वितीयोऽषि।
त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्माषि।
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽषि।।4।।

सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते।
सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति।
सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति।
त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभ:।
त्वं चत्वारिकाकूपदानि।।5।।

त्वं गुणत्रयातीत: त्वमवस्थात्रयातीत:।
त्वं देहत्रयातीत:। त्वं कालत्रयातीत:।
त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यं।
त्वं शक्तित्रयात्मक:।
त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यं।
त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं
रूद्रस्त्वं इंद्रस्त्वं अग्निस्त्वं
वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं
ब्रह्मभूर्भुव:स्वरोम्।।6।।

गणादि पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरं।
अनुस्वार: परतर:। अर्धेन्दुलसितं।
तारेण ऋद्धं। एतत्तव मनुस्वरूपं।
गकार: पूर्वरूपं। अकारो मध्यमरूपं।
अनुस्वारश्चान्त्यरूपं। बिन्दुरूत्तररूपं।
नाद: संधानं। सँ हितासंधि:
सैषा गणेश विद्या। गणकऋषि:
निचृद्गायत्रीच्छंद:। गणपतिर्देवता।
ॐ गं गणपतये नम:।।7।।

एकदंताय विद्‍महे।
वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दंती प्रचोदयात।।8।।

एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम्।
रदं च वरदं हस्तैर्विभ्राणं मूषकध्वजम्।
रक्तं लंबोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्।
रक्तगंधाऽनुलिप्तांगं रक्तपुष्पै: सुपुजितम्।।
भक्तानुकंपिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्।
आविर्भूतं च सृष्टयादौ प्रकृ‍ते पुरुषात्परम्।
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वर:।।9।।

नमो व्रातपतये। नमो गणपतये।
नम: प्रमथपतये।
नमस्तेऽस्तु लंबोदरायैकदंताय।
विघ्ननाशिने शिवसुताय।
श्रीवरदमूर्तये नमो नम:।।10।।

एतदथर्वशीर्ष योऽधीते।
स ब्रह्मभूयाय कल्पते।
स सर्व विघ्नैर्नबाध्यते।
स सर्वत: सुखमेधते।
स पञ्चमहापापात्प्रमुच्यते।।11।।

सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति।
प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति।
सायंप्रात: प्रयुंजानोऽपापो भवति।
सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति।
धर्मार्थकाममोक्षं च विंदति।।12।।

इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम्।
यो यदि मोहाद्‍दास्यति स पापीयान् भवति।
सहस्रावर्तनात् यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत्।13।।

अनेन गणपतिमभिषिंचति
स वाग्मी भवति
चतुर्थ्यामनश्र्नन जपति
स विद्यावान भवति।
इत्यथर्वणवाक्यं।
ब्रह्माद्यावरणं विद्यात्
न बिभेति कदाचनेति।।14।।

यो दूर्वांकुरैंर्यजति
स वैश्रवणोपमो भवति।
यो लाजैर्यजति स यशोवान भवति
स मेधावान भवति।
यो मोदकसहस्रेण यजति
स वाञ्छित फलमवाप्रोति।
य: साज्यसमिद्भिर्यजति
स सर्वं लभते स सर्वं लभते।।15।।

अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा
सूर्यवर्चस्वी भवति।
सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासंनिधौ
वा जप्त्वा सिद्धमंत्रों भवति।
महाविघ्नात्प्रमुच्यते।
महादोषात्प्रमुच्यते।
महापापात् प्रमुच्यते।
स सर्वविद्भवति से सर्वविद्भवति।
य एवं वेद इत्युपनिषद्‍।।16।।

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इत्थशाल योग | Ithasala Yoga | Ithasala Yoga Importance

इत्थशाल योग का उपयोग ताजिक शास्त्र में देखा जा सकता है. ताजिक ज्योतिष वर्ष फल बताने की एक पद्धति है. इत्थशाला योग का ताजिक ज्योतिष में महत्वपूर्ण स्थान है. इत्थशाला शब्द का अर्थ है अवश्य संभावी अर्थात निश्चित सीमा तक जल्द मिलने वाला शुभ फल. ग्रहों के जिस तेजोमय के द्वारा शुभाशुभ फलों की प्राप्ति होती है उसी का नाम इत्थशाल है. इत्थशाल केवल सात ग्रहों में ही होता है इसमें राहु-केतु को स्थान प्राप्त नहीं है.इस योग को समझने के लिए ग्रहों की ताजिक दृष्टियों व सूर्यादि ग्रहों के दीप्तांशों की जानकारी होना जरूरी है.

प्रश्न कुण्डली में ताजिक योगों तथा ताजिक दृष्टियों का बहुत महत्व है. इनके बिना प्रश्न कुण्डली का आधार नहीं है. राहु-केतु के अतिरिक्त सात ग्रहों में से चन्द्रमा की गति सबसे अधिक है और शनि की गति सबसे कम है. चन्द्रमा शीघ्रगामी तो शनि मंदगामी ग्रह है. इत्थशाल योग का पहला नियम यही है कि जब कोई दो ग्रह आपस में इत्थशाल करते हैं तो शीघ्रगामी ग्रह के अंश मंदगामी ग्रह के अंशों से कम होने चाहिए.

इत्थशाल नियम | Ithasala Rules

शीघ्रगामी ग्रह, मंदगामी ग्रह से पीछे होना चाहिए. साथ ही यह दीप्ताँशों के भीतर होने चाहिए तभी इत्थशाल योग होता है. इत्थशाल योग में शामिल ग्रहों की आपस में दृष्टि होनी चाहिए. ग्रहों के दीप्ताँश निम्नलिखित हैं :-

सूर्य – 15 अंश, चन्द्रमा – 12 अंश, मंगल – 8 अंश, बुध – 7 अंश, गुरु – 9 अंश, शुक्र – 7 अंश, शनि – 9 अंश. होता है और ग्रहों के चलने का क्रम चंद्र, बुध, शुक्र, सूर्य, मंगल, गुरू एवं शनि रुप में होता है.

यदि मंदगामी ग्रह के अंश, शीघ्रगामी ग्रह के अंशों से अधिक हैं. दोनों ही ग्रहों की आपस में दृष्टि है और यदि दोनों ग्रहों के भोगांश का अंतर, दोनों ग्रहों के दीप्तांश के योग के आधे से कम है होना चाहिए. यदि यह नियम पूर्ण हैं तब ग्रह इत्थशाल योग में शामिल है. बुध, गुरू, शुक्र एवं चंद्रमा का आपस में इत्थशाल निर्मित हो तो अच्छे फल प्राप्त हो सकते हैं. इसके साथ ही साथ लग्नेश जिस ग्रह के साथ इत्थशाल करता है, उस ग्रह के प्रभाव जातक को मिलते रहते हैं. शीघ्रगामी ग्रह अपना प्रभाव आगे वाले मंदगति ग्रह को देता है इस कारण दोनों ग्रहों से कार्य सिद्धि हो सकता है.

इत्थशाल भाव | Itthasala houses

ताजिक के अनुसार जो ग्रह कुंडली के जिस भाव में स्थित होते हैं वहां से चतुर्थ, सप्तम और दशम भाव को शत्रु दृष्टि से और तीसरे, नौंवें और एकादश भाव को मित्र दृष्टि से देखते हैं. इसलिए कुंडली का ताजिक दृष्टि से विचार कते समय यह याद रखें कि ताजिक में ग्रहों का कोई निश्चित मित्र-शत्रु नहीं है. जो ग्रह आपस में दृष्टि रखते हों या एक ही राशि में हों अथवा अगली-पिछली राशियों में स्थित हों तो उन्हें शीघ्रगति व मंदगति ग्रह के क्रम से देखें. चंद्र सबसे तेज और शनि सबसे धीमी गति से चलने वाले ग्रह होते हैं.

इत्थशाल से राज योग | Itthasala Raj Yoga

यदि कुण्डली के वृष लग्न में शुक्र 15 अंशों पर हो और शनि नवम भाव में 21 अंशों पर स्थित है तो दोनों ग्रहों में मित्र दृष्टि होने से शुभ प्रभाव प्राप्त हो सकते हैं और यह एक उच्च स्तर का इत्थशाल योग माना जाएगा. यह यह एक प्रकार से राजयोग का भी निर्माण करेगा और जातक को सम्मान एवं धन संपत्ति प्रदान करने वाला होगा.

कुंडली के छठे, आठवें और बारहवें भावों के स्वामियों को छोड़कर अन्य भावों के स्वामी ग्रहों से यदि लग्नेश चंद्रमा या सूर्य मित्र दृष्टि का इत्थशाल करें तो शुभता की प्राप्ति होती है. व्यक्ति को कार्यों में सफलता प्राप्त होती है. परंतु इसके विपरित यदि शत्रु दृष्टि का इत्थशाल निर्मित हो रहा हो तो कार्यों में सफलता पाने के लिए अत्यधिक प्रयत्न एवं बार बार प्रयास करना पड़ सकता है.

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नामकरण संस्कार करने की सही शास्त्रोक्त विधि

नाम के इस व्यवहारिक महत्व को हमारे धर्म गुरुओं ने वर्षों पहले ही समझ लिया था. उसी मह्त्ता के आधार पर नामकरण संस्कार को आधार मिला तथा नामकरण की धार्मिक प्रक्रिया शुरु हुई.  भारतीय ज्योतिष में नामकरण को शादी-विवाह जैसे प्रमुख समारोह के समकक्ष माना जाता है, जिसकी मर्यादा का हम आज भी यथावत पालन करते हैं.

व्यक्ति के जीवन में नाम का व्यवहारिक् ही नही अपितु धार्मिक तौर पर भी खास महत्व है. इसलिए नाम का चयन करते वक्त यह देखा जाता है कि नाम सुन्दर होने के साथ-साथ अर्थपूर्ण भी हो तथा भावार्थ के अनुरुप जीवन में सदगुणों का विकास करने का सामर्थ रखता हो. व्यवहारिक जीवन में नाम का महत्व इसी बात से आप लगा सकते हैं कि गहरी नींद में सोये हुए व्यक्ति को भी अगर उसके सही नाम से पुकारा जाय तो वह उठकर बैठ जाता है.

इस मध्य जानकारी के अभाव में कुछ भ्रान्तियां भी देखने को मिलती हैं. कुछ लोगों का मानना है कि जन्म के नाम से भूलकर भी बच्चे का नाम नहीं रखना चाहिए अन्यथा बच्चा तरक्की नहीं कर पाता. इस तथ्य में अनभिता के अलावा और कोई आधार नही दिखाई देता. इसलिए सबसे पहले नामकरण संस्कार के महत्व को जानना आवश्यक है.

ज्योतिष में नामकरण विचार | Importance of Naming ceremony in Astrology

बच्चे के जन्म के समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र अथवा राशि में होता है उसी राशि व नक्षत्र के नामा़क्षर से बच्चे का नाम रखा जाता है तथा वह राशि उसकी जन्म राशि होती है. इस तरह नामाक्षर के आधार पर रखा गया नाम प्रमाणिक तौर पर बच्चे की उन्नति और व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक होता है. परन्तु जरुरी नहीं कि आप उसी नाम को ले जो पंडित जी ने नामकरण के द्वारा दिया है. आप नाम की बजाय ज्योतिष द्वारा सुझाया गया नामाक्षर लेकर खुद भी नाम का चुनाव कर सकते हैं.

वर्तमान में नाम सिर्फ नाम न होकर फ़ैशन का विषय बन गया है. लोग नाम की सार्थकता के साथ-साथ इसकी सुन्दरता व आकर्षता के प्रति कुछ ज्यादा ही गंभीर होते दिखाई दे रहे हैं. लोग चाहते हैं कि उनका नाम लोगों से अलग सुन्दर, सार्थक तथा नामाक्षर के अनुकूल हो, यही कारण है कि आज के सन्दर्भ में अच्छे नाम का चुनाव करना कठिन कार्य बन गया है.

अगर नाम जन्म नक्षत्र की राशि पर न रखा जा सके तो कुछ वैकल्पिक स्त्रोत हैं जिनके आधार पर हम अनुकूल नाम का चुनाव कर सकते हैं. जैसे- मित्र राशि के आधार पर- जिस ग्रह की राशि में आपका जन्म हुआ है उसके मित्र राशियों से जो नाम बन रहा हो आप उसके आधार पर भी नाम का चुनाव कर सकते हैं.

सूर्य राशि के आधार पर- जन्म के समय सूर्य जिस राशि में स्थित हो उसके आधार पर जो नाम बन रहा हो उसके आधार पर भी आप अनुकूल नाम का चुनाव कर सकते हैं.जन्म लग्न के आधार पर-  लग्न और लग्नेश का बली होना व्यक्ति के मन स्थिति और सफलता के लिए अत्यधिक आवश्यक होता है. अत: लग्न में स्थित राशि के नामाक्षर के आधार पर भी हम अनुकूल नाम का चुनाव कर सकते हैं.

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