कुण्डली के बलवान ग्रह बदल सकते हैं आपके जीवन की दिशा

बलिष्ठ लग्न दशा | Balishtha Lagna Dasha

शुभ स्वास्थ्य, प्रतिष्ठा, सम्मान, सरकार द्वारा अनुग्रहीत कराती है. मध्यम बल दशा सामान्य प्रभाव देने वाली होती है. लाभ मिश्रीत परिणामों से युक्त होंगे. बाधाओं और मानसिक अशांति को देने वाला हो सकता है और क्षीण लग्न दशा अत्यधिक मानसिक चिंता, धन हानी प्रदान करने वाली हो सकती है. परिश्रम की अधिकता के बावजूद भी लाभ की संभावना कम ही बनी रहती है. दशा परिणामों का अनुमान लग्न व लग्नेश की स्थिति अनुसार ही किया जा सकता है. यदि लग्न अथवा लग्नेश शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो दृष्ट परिणामों में भी न्यूनता के सूचक हैं तथा शुभ परिणाम अत्यंत शुभदायक सिद्ध होते हैं. अशुभ ग्रहों से लग्नेश युति अशुभ परिणाम दायक होती है.

सूर्य दशा | Surya (Sun) Dasha

सूर्य दशा यदि बलिष्ठ हो तो स्वास्थ्य, धन सम्मान की प्राप्ति होती है. मध्य दशा होने पर परिणाम मिश्रीत व समानता युक्त हो सकते हैं. परंतु क्षीण दशा होने पर तनाव, झगडे़, भ्रम की स्थिति, शत्रुओं द्वारा परेशानी, सरकार से मानहानी इत्यादि प्रभाव प्राप्त हो सकते हैं. तीसरे, छठे, दशम और एकादश भाव में सूर्य शुभ परिणामदायक होते हैं. इन भावों में क्षीण सूर्य भी मिश्रीत परिणामों का सूचक हो सकता है.

चन्द्र दशा | Chandra (Moon) Dasha

बलिष्ठ चन्द्र दशा अच्छे वस्त्र, संपदा, मान सम्मान, मानसिक सुख प्रदान करने में सहायक होती है. मध्यम दशा मित्रों से परेशानि या शत्रुवत्त व्यवहार देने वाली हो सकती है. क्षीण चंद्र दशा संबन्धों में अलगाव, धन हानी, कन्या सुख, मानसिक अवसाद का कारण बनता है.

मंगल दशा | Mangal (Mars) Dasha

शत्रुओं पर विजय, नेतृत्व और साहस की प्राप्ति होती है यदि बलिष्ठ मंगल दशा हो. मध्यम दशा होने पर प्रतिष्ठा में कमी का भय, धन व स्वास्थ्य में कुछ कमी बनी रह सकती है.पर यदि कमजोर मंगल दशा हो तो चोरी, झगडे़ बने रह सकते हैं. त्वचा या रक्त विकार हो सकता है. बल व नेतृत्व में कमी बनी रह सकती है. क्षीण मंगल दशा अगर तीसरे, छठे या एकादश भाव में शुभ परिणाम दे सकती है.

बुध दशा | Buddh (Mercury) Dasha

बलिष्ठ बुध दशा में बुद्धि, ज्ञान, पद प्राप्ति की पूर्ति होती है. मध्यम बल में मित्रों द्वारा सहायता मिल सकती है. लेखन संबंधी कार्यों में अच्छा कार्य होता है. क्षीण दशा में पीडा़, ध्यान की कमी, बुद्धि का दुर्योग होता है. स्थान परिवर्तन, दूर क्षेत्रों की यात्रा, गुप्त धन की हानी जैसे योग बनते हैं. छठे, आठवें और बारहवें भाव में कमजोर बुध अत्यधिक अशुभता नहीं देता.

बृहस्पति दशा | Brahaspati (Jupiter) Dasha

बलिष्ठ दशा में धन, सम्मान, प्रसिद्धि मिल सकती है. अधिकारियों द्वारा अनुग्रहीत, शत्रुनाश, स्वास्थ्य तथा मित्रों से सम्मान प्राप्ति होती है. मध्यम दशा होने पर शुभ संबंधों की प्राप्ति, अल्प परिश्रम से ही सफलता युक्त तथा खुशहाल होते हैं.  क्षीण दशा में दुख, संतान से दुख, नास्तिकता का भाव होता है. कान के रोग बोलने में दिक्कत जैसी परेशानियां झेलनी पड़ सकती हैं.

शुक्र दशा | Shukra (Venus) Dasha

बलिष्ठ शुक्र की दशा सुख व ऎशोराम की प्राप्ति होती होती है, मध्यम दशा होने पर मित्र व परिवार का सुख बना रहता है, परंतु क्षीण दशा धन की हानी, ज्ञान में कमी लाती है.

शनि दशा | Shani (Saturn) Dasha

बलिष्ठ शनि दशा सामाजिक कार्यों में सम्मान, सरकार से सम्मान, भूमि इत्यादि का सुख दिलाती है. मध्यम दशा होने पर पशुओं से लाभ मिलता है, सुरक्षा में चिंता का भाव होता है. अल्प दशा होने पर शत्रुओं से भय, रोग दरिद्रता व कष्ट की अनुभूति होती है.

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ज्योतिष से जाने कैसी होगी आपकी आर्थिक स्थिति और आय के योग

आज के भगदौड़ वाले समय में व्यवसाय या नौकरी में प्रमोशन की चाह सभी के मन में देखी जा सकती है. अक्सर देखने में आता है कि कुछ व्यक्तियों को अत्यधिक परिश्रम के बावजूद भी आशानुरूप सफलता नहीं मिल पाती है और कुछ लोगों को कम मेहनत से ही अच्छी सफलता मिल जाती है. इस का एक कारण ज्योतिष में भी खोजा जा सकता है ज्योतिष अनुसार यह ग्रहों और उनके गोचर का प्रभाव और व्यक्ति के प्राब्धय के प्रभाव होता है .सफलता किसे प्राप्त होगी और कब कोई उन्नति के शिखर पर पहुंचता है इन सब बातों का विचार ज्योतिष द्वारा समझने का प्रयास किया जा सकता है.

कुण्डली विवेचना | Analysis of Kundali

जन्म कुण्डली द्वारा व्यक्ति की प्रगत्ति और उन्नती को समझा जा सकता है. कुण्डली में एकादश भाव को आय की प्राप्ति का भाव अर्थात लाभ भाव कहा जाता है इसलिए इस भाव पर उच्च के ग्रहों का गोचर अच्छी सफलता दिलाता है. थोडा़ और सूक्ष्म अध्ययन के लिये नवांश कुण्डली को देखा जाता है. व्यवसाय मे उन्नति के काल को निकालने के लिये दशमांश कुण्डली की विवेचना भी उतनी ही आवश्यक हो जाती है जितनी की डी-1 और डी-9 इन वर्ग कुण्डलियों में दशम भाव दशमेश का सर्वाधिक महत्व होता है. वर्ग कुण्डलियों से जो ग्रह दशम/एकादश भाव या भावेश विशेष संबध बनाते है. उन ग्रहों की दशा, अन्तरदशा में जातक को उन्नति मिलने की संभावना रहती है. इसी प्रकार बली ग्रहों की तथा शुभ ग्रहों की दशा मे भी पदोन्नती मिल सकती है.

दशा विवेचन | Analysis of Dasha

कुण्डली में लग्नेश, दशमेश व उच्च के ग्रहों की दशाएं व्यक्ति को जीवन में ऊँचाईयाँ प्रदान करने में सहायक होती हैं. जब इन का संबध व्यवसाय भाव या लाभ भाव के साथ होता है तो व्यक्ति को  व्यवसाय या नौकरी में उन्नती व वृद्धि प्राप्त होती है. इन दशाओं का संबध यदि सप्तम या सप्तमेश से हो जाये तो शुभ फलों की प्राप्ति में अधिकता आ जाती है.

कुण्डली के दशम भाव का स्वामी नवांश कुण्डली में जिस राशि में जाये उसके स्वामी के अनुसार व्यक्ति का व्यवसाय व उस पर बली ग्रह की दशा/ गोचर उन्नति के मार्ग प्रशस्त करता है, इन ग्रहों की दशा में व्यक्ति को अधिक से अधिक लाभ प्राप्त करने के अवसर प्राप्त होते हैं. यदि इस समय व्यक्ति परिश्रम के द्वारा कार्यों को करने का प्रयास करे तो उसे निश्च्य ही सफलता मिलती है. कुण्डली में उन्नति के योग हो, पद लग्न पर शुभ प्रभाव हो, दशवे घर व ग्यारहवें घर से जुड़ी दशाएं हो व गुरु शनि का गोचर हो तो व्यक्ति को मिलने वाली उन्नति को कोई नहीं रोक सकता है.

इसके अतिरिक्त कुछ ग्रह योग व्यक्ति के जीवन संवार देते हैं. ज्योतिषशास्त्र में बताये गये कुछ उत्तम योग हैं महालक्ष्मी योग, नृप योग आदि. ज्योतिष विधा ग्रह और उनके योगों के आधार पर फल का ज्ञान देता है. महान योगों में महालक्ष्मी योग  धन और एश्वर्य प्रदान करने वाला योग है. यह योग कुण्डली में तब बनता है जब धन भाव यानी द्वितीय स्थान का स्वामी बृहस्पति एकादश भाव में बैठकर द्वितीय भाव पर दृष्टि डालता है. यह धनकारक योग माना जाता है। इसी प्रकार एक महान योग है सरस्वती योग यह तब बनता है जब शुक्र बृहस्पति और बुध ग्रह एक दूसरे के साथ हों अथवा केन्द्र में बैठकर एक दूसरे से सम्बन्ध बना रहे हों, युति अथवा दृष्टि किसी प्रकार से सम्बन्ध बनने पर यह योग बनता है  यह योग जिस व्यक्ति की कुण्डली में बनता है उस पर विद्या की देवी मां सरस्वती की कृपा रहती है सरस्वती योग वाले व्यक्ति कला, संगीत, लेखन, एवं विद्या से सम्बन्धित किसी भी क्षेत्र में काफी नाम और धन कमाते हैं. इस प्रकार कुण्डली के विस्तार पूर्वक विवेचन द्वारा यह समझा जा सकत अहै कि जीवन में प्रगती व उन्नती के लिए भाग्य का साथ व कर्म की उपयोगिता बहुत आवश्यक होती है.

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कुण्डली में दशानाथ फल विचार | Results of Dashanath in a Kundali

कुण्डली में दशा व अन्तर्दशानाथ परस्पर केन्द्र व त्रिकोण भाव में होने पर शुभ व सुखदायी हो जाते हैं. इस बात को अनेक प्रकार से समझा जा सकता है. जातक परिजात इत्यादि पुस्तकों में दशानाथ के केन्द्र व त्रिकोण में परस्पर होने पर अनेक शुभ प्रभाव प्राप्त होते हैं व शुभ फलों की प्राप्ति संभव हो पाती है.

ग्रह दशानाथ से चतुर्थ स्थान में होता है वह अपनी भुक्ति अर्थात अन्तर्दशा में सुख व सम्मान पाता है जातक को माता का सुख भूमि संबंधि लाभ प्राप्त होता है. यदि दशानाथ व अन्तर्दशानाथ परस्पर समस्प्तक हो तो निश्चय ही पत्नी के सुख व स्वास्थ्य पर प्रभाव पडता है. जातक का दांपत्य सुख, पति-पत्नी के मध्य संबंधों में भी असर दिखाई देता है. इस प्रकार यदि ऎसा ग्रह भावेश व कारकत्व के साथ परस्पर स्थिति के कारण उनके जीवन को प्रभावित अवश्य करता है.

यदि अन्तर्दशा वाला ग्रह दशापति से दशम भाव में हो तो व्यापार , व्यवसाय व सामाजिक मान प्रतिष्ठा संबंधी शुभ या मिश्रित फल देने वाला बनता है. इसी प्रकार अन्तर्दशानाथ यदि दशानाथ से पंचम भाव में हो तो विद्या, बुद्धि तथा संतान संबंधी फलों को पाता है उसे शिक्षा के क्षेत्र में व मंत्र साधना इत्यादि के फल प्राप्त हो सकते हैं.

अन्तर्दशानाथ यदि दशानाथ से नवम भाव में हो तो उस अवधि में भाग्योदय, तीर्थाटन, पिता से सुख की प्राप्ति होती देखी जा सकती है. नवम भाव संबंधी फलों का निर्वाह होता है. इसके विपरित यदि अन्तर्दशानाथ-दशापति से तीसरे भाव, षष्ठ, अष्टम या द्वादश भाव में हो तो प्राय: अनिष्ट फल प्राप्त होते हैं. स्वास्थ्य संबंधी फलों को देखा जा सकता है.

तीसरे भाव में स्थित ग्रह प्राय: कुछ अचानक होने वाली घटनाएं या हैरानी व परेशानी, भागदौड़ के बाद सफलता देता है. यदि कोई ग्रह दशानाथ से षष्ठ्म भाव में हो तो अपनी अन्तर्दशा में ऋण, रोग, वाद-विवाद या शत्रु भय दे सकता है. इसमें दशानाथ व अन्तर्दशानाथ सम सप्तक होने पर परस्पर स्नेह, सहयोग, सद्भाव सेवा जनित सुख तो देते हैं परंतु षष्ठस्थ ग्रह इनकी हानि भी करता है.

यदि दशानाथ से अन्तर्दशानाथ ग्रह अष्टमस्थ हो तो इस अन्तर्दशा अवधि में बाधा, कलंक, गुप्त रोग, या अपमान जैसे कष्ट झेलने पड़ सकता है. साथ ही कुछ अचानक से होने वाले घटनाक्रमों की स्थिति भी आ सकती है अचानक धन प्राप्ति या किसी पडे़ पद की प्राप्ति इत्यादि.

यदि अन्तर्दशानाथ ग्रह दशापति से द्वादश भाव में हो तो अन्तर्दशा अवधि में व्यय, चिंता, दुख हो सकते हैं. इसी प्रकार सूर्य यदि मारक स्थान में हो तो वह अपनी दशा या अन्तर्दशा में राज्य से भय, दंड, इत्यादि दे सकता है.

केन्द्र स्थान सुरक्षा स्थान है इनमें स्थित ग्रह अधिकांशत: अशुभ व अनिष्ट फल नहीं दिया करता और अशुभ ग्रह भी अनिष्ट में कमी करते हैं अर्थात वह अपनी अनिष्टता भूल जाते हैं. दशानाथ स्वग्रही या स्वनवांश में होने पर शुभ फल देता है. इसी प्रकार केन्द्राधिपति ग्रह षष्ठस्थ होने पर पापी बन जाता है. दशानाथ योगकारक होने पर निश्चय ही शुभ फल देता है.

शुभ ग्रह केन्द्र, त्रिकोण, धन व लाभ स्थान में स्थित होकर अपनी दशा या अन्तर्दशा में स्वास्थ्य लाभ संतोष व सुख देने वाले बनते हैं.

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जानिये, कब देती हैं ग्रह दशाएं अपना शुभ फल

ग्रह स्थिति में विभिन्न दशाओं का प्रभाव देखा जा सकता है. यह प्रभाव उस दशा की ग्रह स्थिति के अनुरूप ही प्राप्त होता है. यदि दशानाथ शुभ ग्रह हो तब जातक को जीवन में राजयोग का सुख मिलता है परंतु यदि दशानाथ अशुभ ग्रह का हो तो स्थिति इसके विपरित होती है.

संपूर्ण दशा | Sampoorna Dasha

जन्म कुण्डली में जो ग्रह उच्च राशिस्थ या अति बली होते हैं उनकी दशा अन्तर्दशा संपूर्णादशा कहलाती है. इस दशा समय में जातक सुख एवं समृद्धि पाता है. व्यक्ति को स्वास्थ्य सुख, वैभव, भू-संपदा की प्राप्ति होती है.

पूर्णादशा | Poorna Dasha

जो ग्रह स्वराशि में शुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तथा जिसका इष्ट फल अधिक हो उसकी उसकी दशा या अन्तर्दशा में पदिन्नति, लाभ व व्यवसाय में सफलता प्रात होने की संभावना बनी रहती है.

शुभ दशा | Shubh Dasha

जो ग्रह मित्र क्षेत्री, मित्र या शुभ ग्रहों से युक्त अथवा दृष्ट एवं वर्गोत्तम या उच्च नवांश में होता है तो उस ग्रह की दशा में जातक को उन्नती एवं प्रगत्ति प्राप्त होती है उसे सुख, वैभव की प्राप्ति होती है.

आरोहिणी दशा | Aarohini Dasha

जो ग्रह अपनी नीच राशि को छोड़कर कुण्डली में अपनी उच्च राशि की ओर बढ़ रहा हो तो उस ग्रह की दशा या अन्तर्दशा आरोहिणी दशा कही जाती है. इस दशा के समय में जातक महत्वकांक्षी बनता है अपनी इच्छाओं को पूर्ण करने हेतु परिश्रम करता है. सुख धन-धान्य की प्राप्ति करता है.

अवरोहिणी दशा | Avrohini Dasha

जन्मांग में जो ग्रह परमोच्च स्थिति त्याग कर अपनी नीच राशि की ओर बढ़ रहा होता है तो इस दशा को अवरोहिणी दशा कहते हैं. इस दशा के दौरान जातक को दुख, कष्ट व क्लेश की स्थितियां झेलनी पड़ती हैं.

अशुभ दशा | Ashubh Dasha

जन्मांग में जो ग्रह नीच राशिस्थ, शत्रु क्षेत्री अथवा नवांश में नीचस्थ या शत्रुक्षेत्री हो तो इस दशा में व्यक्ति को विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है. भय, क्लेश, दोष इत्यादि सहन करने पड़ते हैं.

रिक्ता दशा | Rikta Dasha

जो ग्रह अति नीच, षडबल में निर्बल व पीड़ित होता है उसकी दशा रिक्ता अर्थात शुभ प्रभावों से वंचित दशा कहलाती है. यह समय जीवन में उतार-चढ़ाव वाला होता है. सुख-दुख बने रहते हैं.

अनिष्ट दशा | Anisht Dasha

परमनीच, शत्रु या नीच नवांश, पाप ग्रह से युक्त या दृष्ट ग्रह की दशा व अन्तर्दशा अनिष्टकारी होने से अनिष्ट दशा कहलाती है. इस दशा काल में जातक को रोग, कष्ट, संकट जैसी तकलीफें झेलनी पड़ती हैं. धन की हानी या नुकसान झेलना पड़ता है. विद्या, व्यापार में रूकावटें उत्पन्न हो सकती हैं.

कष्ट दशा | Kasht Dasha

सूर्य के अति समीप होने से ग्रह अस्त कहलाते हैं. ऎसी स्थिति में अस्त ग्रह प्राय: शुभ फल देने में असमर्थ होते हैं. यदि शुक्र या मंगल सूर्य से अस्त हों तो दांपत्य जीवन में तनाव की स्थिति देखनी पड़ सकती है. वैवाहिक सुख की हानी होती है.  इसी प्रकार गुरू या चंद्र के अस्त होने पर असफलता, बाधा, असंतोष की स्थित बनी रहती है.

भाग्येश व गुरू संबंध दशा | Dasha related to the Lord of House of Fortune and Jupiter

दशानाथ ग्रह से केन्द्र या त्रिकोण भाव में गुरू या भाग्येश हो अथवा दशानाथ पर गुरू या भाग्येश की दृष्टि हो तो निश्च्य ही दशाकाल में भाग्योदय होता है. पिता का सुख, धर्म-कर्म की प्रगती,सुख वैभव प्राप्त है.

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कुंडली के कौन से भाव से आती है जीवन में समस्या आईये जानें इसका रहस्य

ज्योतिष में नौ ग्रहों का प्रभाव पूर्ण रुप से प्रदर्शित होता है. सभी ग्रह अपने कारक स्वरुप को पूर्ण रुप से व्यक्त करते हैं. जातक के जीवन पर होने वाले प्रभाव कुण्डली में स्थित ग्रहों के प्रभाव द्वारा प्रलक्षित होते हैं. सभी ग्रह जातक के स्वास्थ्य उसके कार्यक्षमता व उसके किसी न किसी अंग का प्रतिनिधित्व करते हैं.

कुण्डली में स्थित यह नौ ग्रहों में से जब कोई भी ग्रह पीड़ित होकर लग्न, लग्नेश, षष्ठम भाव अथवा अष्टम भाव से सम्बन्ध बनाता है. तो ग्रह से संबंधित अंग रोग प्रभावित हो सकता है. क्योंकि यह भाव कुण्डली में उत्पन्न समस्याओं को दर्शाते हैं इनकी मुख्य भूमिका इन्हीं के प्रभाव से सिद्ध होती है.

ग्रह का भाव प्रभाव | Effects of Planets in Houses

प्रत्येक ग्रह के पीड़ित रहने पर या कोई ग्रह छठे स्थान का स्वामी होकर लग्न भाव या किसी अन्य भाव में कौन सी बीमारी दे सकता है. किसी भी रोगी जातक की कुंडली का विश्लेषण करते समय सबसे पहले तृतीय, छठे, व अष्टम भव में स्थित ग्रहों की शक्ति का आंकलन करना चाहिए. इन्हीं भावों के द्वारा जातक के जीवन में होने वाले अनेक विवादस्पद क्षण दिखाई देते हैं.

ग्रहों की भाव स्थिति के अनुसार यह ज्ञात होने पर की भविष्य में कौन सी बीमारी होने वाली है. यह रोग होने की संभावना है. उससे बचाव के लिए कई प्रकार के उपाय किए जा सकते हैं. भावों का प्रभाव जातक की कुण्डली में अनेक प्रकार से संबंध बनाता है यह संबंध जातक के जीवन की स्थितियों में उतार-चढा़व लाने में मुख्य होते हैं.

कुण्डली में छठे भाव और आठवें भाव का प्रभाव

कुण्डली में बीमारी का घर छठवां स्थान माना जाता है और अष्टम स्थान आयु स्थान है. तृतीय स्थान अष्टम से अष्टम होने से यह स्थान भी बीमारी के प्रकार की और इंगित करता है. जैसे तृतीय स्थान में चंद्र पीड़ित हो तो क्षय रोग व मन में असंतोष व मानसिक बीमारी की संभावना रहती है और तृतीय स्थान में शुक्र पीड़ित हो तो मधुमेह की संभावना देखी जा सकती है.

उपरोक्त ग्रहों में जो ग्रह छठे भाव का स्वामी हो या छठे भाव के स्वामी से युति सम्बन्ध बनाए उस ग्रह की दशा में रोग होने के योग बनते हैं. छठे भाव के स्वामी का सम्बन्ध लग्न भाव लग्नेश या अष्टमेश से होना स्वास्थ्य के पक्ष से शुभ नहीं माना जाता है.  जब छठे भाव का स्वामी एकादश भाव में हो तो रोग अधिक होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं. इसी प्रकार छठे भाव का स्वामी अष्टम भाव में हो तो व्यक्ति को लंबी अवधि के रोग होने की अधिक संभावनाएं रहती हैं.

चिकित्सा ज्योतिष के कुछ नियम वेद पुराणों में भी देखे जा सकते हैं. जन्म पत्रिका और हस्त रेखाओं का अध्ययन करने के बाद ज्योतिषी यह बताने का प्रयत्न करते हैं की उक्त व्यक्ति को भविष्य में कौन सी घटना प्रभावित कर सकती है. जैसे जन्म कुण्डली में तुला लग्न या राशि पीड़ित हो तो व्यक्ति को दुविधाओं से घिरा हुआ देखा जा सकता है तथा व्यक्ति कि कमर के निचले वाले भाग में समस्या होने की संभावना रह सकती है.

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स्फटिक श्री यंत्र का सही उपयोग बना सकता है रंक को राजा। आईये जाने कैसे

स्फटिक श्री यंत्र देवी लक्ष्मी जी का  अमोघ फलदायक यंत्र है. श्री यंत्र में महालक्ष्मी जी का वास माना जाता है इस यंत्र को अपनाने से समस्त सुख व समृद्धि प्राप्त होती है. निर्धन धनवान बनता है और अयोग्य योग्य बनता है. इसकी उपासना से व्यक्ति कि मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. इस यंत्र को समस्त यंत्र में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है.

स्फटिक श्री यंत्र ऎश्वर्यदाता और लक्ष्मीप्रदाता है. यह यंत्र आय में वृद्धि कारक व व्यवसाय में सफलता दिलाने वाला होता है. आज के समय में स्थाई धन की अभिलाषा सभी के मन में देखी जा सकती है. अधिकतर व्यक्ति कितना भी कमाएं परंतु धन उनके पास जमा नहीं हो पाता व्यय बने ही रहते हैं. धन का संचय कर पाना कठिन काम हो जाता है.

स्फटिक श्री यंत्र अचूक उपाय | Sphatik Sri Yantra Remedy

स्फटिक श्री यंत्र स्थाई धन प्राप्ति का अचूक उपाय बनता है. इसके साथ देवी लक्ष्मी, शुक्र देव और कुबेर जी की पूजा का विधान तुरंत असरदायक होता है. जहां देवी लक्ष्मी जी ऎश्वर्य देती हैं वहीं शुक्र देव की अनुकूलता से भोगों को भोगने का सामर्थ्य व सुख मिलता है और कुबेर धन का संचय कराते हैं और वैभव प्रदान करते हैं.  इन तीनों की पूजा संयुक्त रुप से श्री यंत्र के समक्ष की जाए तो अवश्य ही संपन्नता व समृद्धि बनी रहती है.

स्फटिक श्री यंत्र साधना | Sphatik Sri Yantra Sadhna

पौराणिक ग्रंथों में भी इन तीनों की उपासना को महत्व पूर्ण रुप से दर्शाया गया है. मां लक्ष्मी  और ऎश्वर्यप्रदाता शुक्र की उपासना के लिए श्री यंत्र की पूजा की जानी चाहिए. स्फटिक यंत्र में धनदात्री माँ लक्ष्मी व शुक्र का आशिर्वाद समाहित होता है. इसकी साधना से भुक्ति, मुक्ति, ऐश्वर्य सभी प्रकार के वैभव की प्राप्ति होती है.

स्फटिक श्री यंत्र पूजा विधि | Sphatik Sri Yantra Worship

इस यंत्र को स्थिर लग्न में यथाविधि द्वारा पूजना चाहिए. इस यंत्र को गंगाजल व पंचामृत से शुद्ध किया जाता है. पांच अकीक लें और उनके उपर स्फटिक श्री यंत्र को रखें. अब यंत्र को विग्रह में चौकी पर लाला वस्त्र बिछाकर स्थापित करें और यथाविधि पंचोपचार व षडोशोपचार पूजन करें व मंत्र जाप करं

सर्वप्रथम श्री गणेश जी का स्मरण करें और फिर माँ लक्ष्मी जी के मंत्र:- “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्री ह्रीं श्री ॐ महालक्ष्म्यै नम:” का जाप करना चाहिए. लक्ष्मी जी के जाप के उपरांत शुक्र ग्रह के मंत्र:-  ऊँ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नम:।  को जपना चाहिए तथा अंत में धनपति कुबेर जी का स्मरण व मंत्र पूजन:- ऊँ यक्षाय कुबेराय वैश्रणवाय धनधान्यादिपतये धनधान्यसमृद्धि में देहि देहि दापय दापय स्वाहा। करना चाहिए.

जाप के पश्चात अकिक सहित स्फटिक श्री यंत्र को विग्रह या व्यवसाय स्थल अथवा तिजोरी में रखा जा सकता है. स्फटिक श्री यंत्र को नित्य धूप व दीप से पूजन व जप करें उपर्युक्त विधि के अनुसार पूजा व जप करने से आपकी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी व आपके पास धन का आगमन बना रहेगा.

स्फटिक श्री यंत्र महत्व | Sphatik Sri Yantra Importance

स्फटिक श्रीयंत्र को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है यह शुद्धता व पवित्रता का प्रतीक होता है. यह यंत्र नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. स्फटिक यंत्र से घर व कार्य स्थल में समृद्धि बनी रहती है यह विकास का मार्ग प्रश्स्त करता है.यह यंत्र त्रिमूर्ति का स्वरुप भी माना जाता है. वास्तु दोषों के निवारण करके शांति व ऎश्वर्य स्थापित करने के लिए यह श्रेष्ठतम है.

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प्रश्न कुंडली से कैसे जाने अपने जीवन के छुपे हुए रहस्य, जानते हैं विस्तार से

प्रश्न कुण्डली में लग्न, चन्द्र तथा नवाँश की भूमिका अहम मानी जाती है. प्रश्न कुण्डली में लग्न को पुष्प माना गया है. प्रश्न कुण्डली में चन्द्र को बीज की संज्ञा दी गई है. नवाँश कुण्डली में प्रश्न का स्वाद बताया गया है. ज्योतिषी प्रश्न कुण्डली का अध्ययन करते समय मुख्य रुप से लग्न, चन्द्र तथा नवाँश कुण्डली पर अधिक महत्व देते हैं. प्रश्न कुण्डली में इन तीनों की अहम भुमिका होती है.  प्रश्न के समय कौन सा लग्न उदय हो रहा है. लग्न पर किन शुभ – अशुभ ग्रहों का प्रभाव पड़ रहा है आदि बातों को ध्यान में रखकर ही कुछ कहा जाता है.

लग्न का अध्ययन कुशलता से करने के बाद अगला कदम चन्द्रमा के अध्ययन की ओर होता है. इसका विश्लेषण भी लग्न की तरह किया जाता है. चन्द्र का संबंध शुभ – अशुभ ग्रहों से है या नहीं. चन्द्र किन्हीं योगों में शामिल है या नहीं है. कुशलता से अध्ययन करने के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाता है.

आप देखेंगे कि लग्न तथा चन्द्र के आधार पर ही प्रश्न कुण्डली का आंकलन किया जाता है. बाकी नवाँश कुण्डली का अध्ययन किसी बात की पुष्टि को पुख्ता करने के लिए करना आवश्यक माना गया है. इसीलिए कहा गया है कि प्रश्न कुन्डली में चन्द्रमा बीज तो लग्न पुष्प है और इसका स्वाद नवाँश कुण्डली में देखने को  मिलता है.

प्रश्न कुण्डली में लग्न, चन्द्र तथा नवाँश कुण्डली के अतिरिक्त इस पद्धति में कुछ योगों का अत्यधिक महत्व होता है. यह ताजिक योग कहलाते हैं. ताजिक योग शुभ तथा अशुभ दोनों ही प्रकार के होते हें. कुछ योग ग्रह स्थिति पर आधारित होते हैं तो कुछ योग चन्द्रमा तथा ग्रहों के अंशों की गणनाओं पर आधारित होते हैं. कुछ ताजिक योगों में ग्रहों के दीप्ताँशों का महत्व होता है.

इकबाल योग, कम्बूल योग, गैरी कम्बूल योग, ताम्बीर योग, नक्त योग, यमया योग शुभ माने जाते हैं.जन्म कुण्डली तथा प्रश्न कुण्डली के महत्व को अलग रखना चाहिए. यह दोनों एक – दूसरे से भिन्न हैं. प्रश्न कुण्डली वर्तमान कर्मों को दिखाती है. आपके किए कर्मों पर आपके प्रश्न का उत्तर अत्यधिक निर्भर करता है.

व्यक्ति जब किसी बात को लेकर अत्यधिक परेशान होते हैं तब आप उसी को लेकर ज्योतिषी के पास पहुंचते हैं. उस समय के प्रश्न के आधार पर आपकी समस्या अथवा परेशानी का हल निकाला जाता है. प्रश्न कुण्डली की अपनी कुछ सीमाएँ होती हैं. यह एक समय में एक विषय से जुडे़ प्रश्न का हल ढूंढने में बहुत अच्छी मानी जाती है लेकिन कई प्रश्नों का उत्तर देने में यह सक्षम नहीं है.

प्रश्न कुण्डली के विपरीत जन्म कुण्डली आपके पिछले कर्मों को दिखाती है. कुण्डली में स्थित शुभ तथा अशुभ योग पूर्व कर्मों पर आधारित होते है. यह प्रारब्ध को दिखाती है. पूर्व जन्म के कर्मों का भुगतान हम इस जन्म में करते हैं.

जन्म कुण्डली से हमारे भूत, वर्तमान तथा भविष्य का पता चलता है. अच्छे तथा बुरे समय के बारे में सारी जानकारी हमें जन्म कुण्डली से ही मिलती है. यह आपके सभी प्रश्नों का उत्तर समय-समय पर देने में सक्षम होती है.

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श्रीचण्डी ध्वज स्तोत्रम् महत्व | Significance of Shri Chandi Dhwaj Stotram

देवी के अनेक रुपों में एक रुप चण्डी का भी है. देवी काली के समान ही देवी चण्डी भी प्राय: उग्र रूप में पूजी जाती हैं, अपने भयावह रुप में मां  दुर्गा चण्डी अथवा चण्डिका नाम से जानी जाती हैं. नवरात्रों में देवी के इस रुप की भी पूजा होती है देवी ने यह रुप बुराई के संहार हेतु ही लिया था. देवी के श्रीचण्डी ध्वज स्तोत्रम् का पाठ  सभी संकटों से मुक्ति प्रदान करने वाला होता है तथा शत्रुओं पर विजय प्रदान कराता है.

श्री चण्डी ध्वज स्तोत्रम् | Shri Chandi Dhwaj Stotram

विनियोग | ViniYoga

अस्य श्री चण्डी-ध्वज स्तोत्र मन्त्रस्य मार्कण्डेय ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहालक्ष्मीर्देवता, श्रां बीजं, श्रीं शक्तिः, श्रूं कीलकं मम वाञ्छितार्थ फल सिद्धयर्थे विनियोगः.

अंगन्यास | Anganyas

श्रां, श्रीं, श्रूं, श्रैं, श्रौं, श्रः ।

।। पाठ | Path ।।

ॐ श्रीं नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै भूत्त्यै नमो नमः ।
परमानन्दरुपिण्यै नित्यायै सततं नमः ।। १ ।।

नमस्तेऽस्तु महादेवि परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ।। २ ।।

रक्ष मां शरण्ये देवि धन-धान्य-प्रदायिनि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ।। ३ ।।

नमस्तेऽस्तु महाकाली पर-ब्रह्म-स्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ।। ४ ।।

नमस्तेऽस्तु महालक्ष्मी परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ।। ५ ।।

नमस्तेऽस्तु महासरस्वती परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ।। ६ ।।

नमस्तेऽस्तु ब्राह्मी परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ।। ७ ।।

नमस्तेऽस्तु माहेश्वरी देवि परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ।। ८ ।।

नमस्तेऽस्तु च कौमारी परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ।। ९ ।।

नमस्ते वैष्णवी देवि परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ।। १० ।।

नमस्तेऽस्तु च वाराही परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ।। ११ ।।

नारसिंही नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ।। १२ ।।

नमो नमस्ते इन्द्राणी परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ।। १३ ।।

नमो नमस्ते चामुण्डे परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ।। १४ ।।

नमो नमस्ते नन्दायै परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ।। १५ ।।

रक्तदन्ते नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ।। १६ ।।

नमस्तेऽस्तु महादुर्गे परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ।। १७ ।।

शाकम्भरी नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ।। १८ ।।

शिवदूति नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ।। १९ ।।

नमस्ते भ्रामरी देवि परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ।। २० ।।

नमो नवग्रहरुपे परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ।। २१ ।।

नवकूट महादेवि परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ।। २२ ।।

स्वर्णपूर्णे नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ।। २३ ।।

श्रीसुन्दरी नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ।। २४ ।।

नमो भगवती देवि परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ।। २५ ।।

दिव्ययोगिनी नमस्ते परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ।। २६ ।।

नमस्तेऽस्तु महादेवि परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ।। २७ ।।

नमो नमस्ते सावित्री परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ।। २८ ।।

जयलक्ष्मी नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ।। २९ ।।

मोक्षलक्ष्मी नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ।। ३० ।।

चण्डीध्वजमिदं स्तोत्रं सर्वकामफलप्रदम् ।
राजते सर्वजन्तूनां वशीकरण साधनम् ।। ३१ ।।

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जैमिनी ज्योतिष और काल विचार | Jaimini Astrology and Predictions

महर्षि पराशर के अनुसार जीवन में होने वाली घटनाओं का आंकलन करने के लिए जन्म कुण्डली महत्वपूर्ण साधन है. कुण्डली से ज्ञात होता है कि विभिन्न समयों में, ग्रहों की युति और स्थिति के अनुसार व्यक्ति विशेष को किस प्रकार का परिणाम मिलने वाला है. इस सिद्धांत से अलग जैमिनी ज्योतिष की मान्यता है कि फलादेश के लिए ग्रहों के गोचर एवं अवधि आवश्यक नहीं है.

ज्योतिष में जीवन में होने वाली महत्वपूर्ण घटनाओं के लिए चर राशि को देखा जाता है. चर दशा में ही सभी योग एवं राशि अपनी-अपनी अवधि में फल देते हैं. स्थिर दशा भी समान रूप से महत्वपूर्ण होते हैं जो न केवल दीर्घायु प्रदान करतें बल्कि कई महत्वपूर्ण घटनाओं को दर्शाते हैं.

निरायन शूल दशा भी काफी उपयोगी होता है क्योंकि, इससे माता-पिता भाई-बहन, जीवनसाथी और निकट सम्बन्धियों की लम्बी उम्र का ज्ञान होता है. निरायन फल शुक्ल दशा मूल रूप से व्यक्ति की अपनी आयु एवं उनके जीवन के मध्यकाल के विषय में जानकारी प्रदान करता है. इस प्रकार चर दशा एवं स्थिर दशा दोनों ही जीवन में घटित होने वाली घटनाओं को जानने के लिए महत्वपूर्ण होते हैं.

ग्रहों एवं राशियों का महत्व | Importance of Planets and Signs

महर्षि पराशर दशा और योगों का परिणाम ज्ञात करने के लिए बहुत सी बातों का जिक्र करते हैं. जबकि जैमिनी का सिद्धांत यह कहता है कि राशि का फल तब प्राप्त होता है जब कारकांश या अरूधा लग्न से उसकी दशा चलती है. यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि पराशर जहां ग्रहों की बात करते हैं. वहीं जैमिनी राशियों से फलदेश करते हैं.

दोनों के सिद्धांतों में विभिन्नता यहां भी दिखाई देती है कि जहां, पराशर बताते है कि उच्च राशि में ग्रहों की मौजूदगी होने पर अथवा स्वराशि में ग्रह स्थित होने पर अपनी दशा अवधि में शुभ फल देते हैं. वहीं राशियों से भविष्य कथन करते हुए जैमिनी महोदय कहते हैं कि जिस राशि में कारकांश और आत्मकारक स्थित होते हैं उस राशि की अवधि में शुभ फल मिलते हैं.

भाव एवं ग्रह विचार | Houses and Planets

अगर अशुभ ग्रहों की स्थिति किसी राशि से दोनों तरफ हो या अष्टम में तो व्यक्ति को इन घर में स्थित  राशियों की दशा के दौरान भाग्य में बाधाओं, कठिनाईयों एवं हानि का सामना करना होता है. वहीं केन्द्र स्थान यानी लग्न, चतुर्थ, सप्तम एवं दसम में गुरू के होने से व्यक्ति को शुभ परिणाम मिलता है. चन्द्रमा एवं शुक्र तीसरे घर में होने पर आर्थिक स्थिति मजबूत होती है.

बारहवें घर को व्यय स्थान कहा जाता है इस घर में चन्द्रमा एवं शुक्र की स्थिति होने से आर्थिक नुकसान होता है. जबकि राहु के द्वादश भाव में होने से स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियों की संभावना रहती है. साथ ही विदेश यात्रा का भी योग बनता है. नवम घर में अशुभ ग्रह का होना पिता के स्वास्थ्य के लिए शुभकारी नहीं माना जाता है. चौथे घर में अशुभ ग्रह होने से विवादस्पद मुद्दों में उलझना होता है एवं माता को स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियों का सामना करना होता है.

शुभ एवं अशुभ राशि विचार | Auspicious and Inauspicious Signs

तुला, कर्क, वृश्चिक, वृष, धनु , कन्या और मीन राशियों की दशा में शुभ फल मिलते हैं. इनमें गौरतलब बात यह है कि तुला से मीन राशियों की दशाओं में क्रमानुसार इनकी शुभता में कमी आती जाती है. वहीं दूसरी तरफ सिंह, मेष, कुंभ, वृश्चिक तथा मकर राशि की दशा में अशुभ परिणाम प्राप्त होता है. इनमें सबसे कम सिंह राशि अशुभ होता है और क्रमानुसर सबसे अधिक मकर राशि अशुभ होता है.

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जैमिनी ज्योतिष राजयोग का शुभफल | Auspicious Results of Rajyoga in Jaimini Astrology

राजयोग को उत्तम योग माना गया है. यह बहुत ही दुर्लभ योग होता है जो भाग्यशाली व्यक्तियों की कुण्डली में पाया जाता है या यूं कह सकते हैं कि जिनकी कुण्डली में यह योग बनता है वह भाग्यशाली होते हैं. इस योग के विषय में जैमिनी ज्योतिष की अपनी मान्यताएं हैं. इस ज्योतिष पद्धति से देखिये क्या आपकी कुण्डली में यह योग बन रहा है.

अगर कुण्डली में कोई ग्रह आपके जन्म लग्न को देख रहा हो, होरा लग्न में भी वही ग्रह उस स्थान को देख रहा हो और घटिका लग्न में भी समान स्थिति हो तो कुण्डली में शक्तिशाली राजयोग समझना चाहिए. इस योग के बनने से आर्थिक स्थिति अच्छी रहती है तथा हर तरफ से उन्नति होती है. लोगों से मान-सम्मान मिलता है तथा राजा के समान सुखमय जीवन प्राप्त होता है. इसी तरह अगर राशि कुण्डली, नवमांस कुण्डली, द्रेक्कन कुण्डली , लग्न कुण्डली, सप्तम कुण्डली में भी एक ही ग्रह एक निश्चित स्थान को देख रहा हो तब भी राजयोग बनता है. ध्यान देने वाली बात यह है कि,  उत्तम फल की प्राप्ति के लिए कुण्डली में इन सभी कारकों का होना अनिवार्य होता है. इसमे से अगर कोई कारक मौजूद नही है होता है तो पूर्ण फल मिलना कठिन होता है.

अगर नवमांश कुण्डली में लग्न, होरा लग्न और घटिका लग्न पर किसी ग्रह की दृष्टि पड़ रही हो अथवा सम्बन्ध बन रहा हो तो व्यक्ति की जन्म कुण्डली में राजयोग बनता है. परन्तु उपरोक्त सभी कारकों का होना अनिवार्य होता किसी भी कारक के नही होने से अच्छा प्रभाव नही मिलता है. इसी तरह मंगल, शुक्र और केतु एक दूसरे से तीसरे घर में स्थित हो और परस्पर एक दूसरे से दृष्टि सम्बन्ध बना रहे हों तो जन्म कुण्डली में वैथानिका योग बनता है. यह योग व्यक्ति के जीवन में उन्नति और प्रसिद्धि का कारक होता है.

अगर अमात्यकारक से दूसरा, चौथा और पांचवा घर समान रुप से बली हो और इनमें शुभ ग्रह स्थित हों तो व्यावसायिक दृष्टि से व्यक्ति के लिए बहुत ही शुभ फलदायी होता है. इसी तरह अगर कोई ग्रह अमात्यकारक ग्रह के समान बलवान होकर तीसरे या छठे घर में स्थित हो तथा उनका सम्बन्ध सूर्य, मंगल, शनि, राहु अथवा केतु से बन रहा हो तो यह इस बात का संकेत होता है कि आप अपने कार्य क्षेत्र में उन्नति की ओर अग्रसर होंगे.

शुक्र मंगल और केतु अमात्यकारक ग्रह से दूसरे और चौथे घर में स्थित होने पर सुखमय जीवन प्राप्त होता है. लग्न, सप्तम और नवम भाव बलवान होने से कुशल नेतृत्वकर्ता का गुण विकसीत होता है जातक राजनेता बन सकते हैं. अगर लग्न स्थान में दो ग्रह विराजामन हों तथा वे दोनों ही समान रूप से बलवान हों तो यह भी राजयोग माना जाता है जो वृद्धावस्था में सुख प्रदान करता है.

अगर लग्न स्थान और चौथे घर में समान संख्या में ग्रह स्थित हों तो इससे भी कुण्डली में राजयोग बनता है जिसस जीवन में सफलता और प्रसिद्धि मिलती है. गुरु और चन्द्रमा लग्न और ग्यारहवें घर में स्थित हो अथवा

लग्न और सातवें घर पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि पड़ रही हो तो राजा के समान सुखमय जीवन प्राप्त होता.  राजयोग के विषय में जैमिनी ज्योतिष में बताया गया है कि बुध और गुरु लग्न अथवा ग्यारहवें घर में स्थित हो तो व्यक्ति की कुण्डली में राजयोग बनता है. इस योग के प्रभाव से बचपन का दिन सबसे सुखमय होता है.

अमात्यकारक से दसवें घर में शुक्र व चन्द्र की युति हो और वे अमात्यकारक को देखें तो यह बहुत शुभफलदायी राजयोग होता है. इससे वैभवशाली जीवन प्राप्त होता है. कुण्डली में चन्द्रमा अगर किसी शुभ ग्रह से युति बनाता है तो राजकीय लोगों के साथ कार्य का अवसर मिलता है. शुभ ग्रह 1, 5, 9 अथवा 1,4,7,10 केन्द्र में स्थित हों जनहित में कार्य का अवसर मिलता है.

नवमांश कुण्डली में चन्द्रमा गुरु से चौथे अथवा ग्यारहवें घर में स्थित हो तो राजयोग बनता है.  कुण्डली में इस तरह का योग बनने से व्यावसायिक जीवन में अधिकार और शोहरत की प्राप्ति होती है. शुभ ग्रह जन्म राशि और नवमांस कुण्डली के दसवें और ग्यारहवें घर में स्थित हों तो सामान्य तरह का राजयोग बनता है. लेकिन, यह राजयोग भी उन्नत जीवन प्रदान करता है.

अगर लग्न अथवा अमात्यकारक राशि में कोई शुभ ग्रह स्थित हो अथवा उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि पड़ रही है तो राजसी जीवन का सुख मिलता है. आत्मकारक की नवमांश राशि लग्न, जन्म और जिस राशि में गुरू स्थित हो वह एक हो तो यह भी उत्तम राजयोग माना जाता है. शुभ ग्रह अरुधा लग्न तथा नवमांश राशि के नौवें घर में बराबर की संख्या में स्थित हो तो व्यक्ति राजनीति के क्षेत्र में अपना भविष्य बना सकता है. आत्मकारक अथवा अरुधा लग्न से कोई ग्रह तीसरे अथवा छठे घर में कोई ग्रह शुभ होकर स्थित हो तो जीवन सुख सुविधाओं से परिपूर्ण होता है.

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