सभी लग्नों के लिए शुभ व अशुभ ग्रह | Auspicious and Inauspicious Planets for All Ascendants

नैसर्गिक रूप से कुछ ग्रहों को शुभ और कुछ को अशुभ कहा गया है. लेकिन इनका शुभ या अशुभ फल जन्म समय पर निर्धारित होता है. इसी के आधार पर फल का निर्धारण होता है परंतु साथ ही साथ भिन्न भिन्न लग्नों के लिए अलग-अलग फल निर्धारित होते हैं.

भिन्न – भिन्न लग्नों में ग्रहों का फल | Results of Planets in Ascendants

मेष लग्न | Aries Ascendant

मेष लग्न में मंगल लग्नेश और अष्टमेष का स्थान पाता है. मेष राशि मंगल की मूल त्रिकोण राशि है, बृहस्पति नवमेश व शनि दशमेश और एकादशेश होते हैं. मेष चर राशि है और चर राशि के लिए एकादशेश भाव बाधक स्थान पाता है. मेष लग्न के लिए शुक्र मारक ग्रह है और चंद्र मिश्रित फल देता है.

वृष लग्न | Taurus Ascendant

वृष लग्न के लिए सूर्य और शनि शुभ फलदायक होते हैं. बृहस्पति अष्टमेश और एकादशेश होने से मारक के समान हो जाते हैं. शुक्र लग्नेश होता है किन्तु षष्टेश होने से शुभ फल देने में असमर्थ होता है. चंद्र तृतीयेश होकर शुभ नहीं देता है. शनि नवमेश व दशमेश होने से योगकारक होते हैं. बुद्ध द्वितीय और पंचमेश होने से कुछ शुभ दायक होता है. मंगल सप्तमेश व द्वादशेश होने से मारक का कार्य करता है.

मिथुन लग्न | Gemini Ascendant

इस लग्न के लिए बृहस्पति दशमेश और सप्तमेश होने से मारक बन जाता है. शनि अष्टमेश व नवमेश होता है. सप्तम स्थान बाधक स्थान बन जाता है. बुध लग्नेश और चतुर्थेश है, चंद्र मारक ग्रह का कार्य करता है.

कर्क लग्न | Cancer Ascendant

इस लग्न के लिए मंगल, बृहस्पति और चंद्रमा शुभ होते हैं. शनि और सूर्य मारक ग्रह हैं. शनि सप्तमेश व अष्टमेश हैं. शुक्र भी यहां शुभता में कमी कर जाता है केन्द्राधिपति दोष के कारण और बाधक भी बन जाता है. गुरू षष्ठेश और नवमेश हैं.

सिंह लग्न | Leo Ascendant

इस लग्न के लिए मंगल, बृहस्पति और सूर्य शुभ ग्रह हैं. शनि शष्ठेश और सप्तमेश होते हैं और चंद्र मारक हैं अशुभ फलदायक होते हैं. किंतु शनि मारक बनते हैं. गुरू और मंगल राजयोग कारक बनते हैं.

कन्या लग्न | Virgo Ascendant

कन्या लग्न के लिए मंगल, बृहस्पति व चंद्रमा अशुभ ग्रह होते हैं, शुक्र और बुध शुभ ग्रहों में आते है. मंगल, शुक्र, चंद्र, गुरू मारक का कार्य करते हैं. बुध और शुक्र योगकारक ग्रह बन जाते हैं.

तुला लग्न | Libra Ascendant

तुला लग्न के लिए गुरू, मंगल और सूर्य अशुभ प्रभाव देने वाले ग्रह बनते हैं. शनि और बुध शुभ ग्रह बनकर अच्छा फल देते हैं. मंगल, बृहस्पति, शुक्र मारक के रूप में सामने आते हैं. शनि, बुध राजयोग कारक हो सकते हैं. शुक्र समभाव रखता है वहीं बृहस्पति पाप ग्रहों के साथ हो तो मारक बन जाता है.

वृश्चिक लग्न | Scorpio Ascendant

बुध, शुक्र और शनि अशुभ ग्रहों का प्रभाव देते हैं. बृहस्पति और चंद्रमा शुभ ग्रहों का फल देते हैं. बुध व अन्य पाप ग्रह जब वह मारक बन जाते हैं. सूर्य और चंद्र राजयोग कारक फल देते हैं. यहां बृहस्पति मारक होते हैं और मंगल समभाव रखते हैं.

धनु लग्न | Sagittarius Ascendant

शुक्र, शनि और बुध अशुभ ग्रहों का काम करते हैं. मंगल और सूर्य शुभता देने वाले ग्रह बनते हैं. शुक्र और शनि मारक ग्रह बन जाते हैं. इसी के साथ सूर्य और बुध, मंगल और ब्रहस्पति, सूर्य और मंगल राजयोग कारक बन जाते हैं. इस लग्न में शनि मारक का काम नहीं करता है और बृहस्पति समभाव रखते हैं.

मकर लग्न | Capricorn Ascendant

बृहस्पति, चंद्र और मंगल मकर लग्न के लिए शुभ नहीं होते हैं, शुक्र और बुध शुभ ग्रह बनते हैं. बृहस्पति और मंगल मारक ग्रह का कार्य करते हैं, शुक्र और बुध राजयोग कारक बनते हैं. इस लग्न के लिए सूर्य सम हैं तथा शनि मारक नहीं हैं.

कुम्भ लग्न | Aquarius Ascendant

कुम्भ लग्न के लिए बृहस्पति, चंद्र और मंगल अशुभ ग्रह होते हैं. शनि और शुक्र शुभ ग्रह होते हैं. बृहस्पति, सूर्य और मंगल मारक ग्रह का काम करते हैं. शुक्र, मंगल और शुक्र राजयोग कारक बनते हैं. इस लग्न के लिए बुध पंचमेश होने से सम होता है.

मीन लग्न | Pisces Ascendant

शनि, शुक्र, बुध और सूर्य अशुभ ग्रह का कार्य करते हैं. चंद्र और मंगल शुभ ग्रह बनते हैं. बुध और शुक्र तथा शनि मारक ग्रहों का कार्य करते हैं. मंगल और बृहस्पति तथा मंगल और चंद्रमा राजयोगकारक बनते हैं.

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मंगला योगिनी दशा | Mangla Yogini Dasha

योगिनी दशाओं में मंगला नामक योगिनी दशा सर्वप्रथम होती है. इस दशा की समय अवधि 1 वर्ष की मानी गई है. इस दशा में चंद्रमा की भूमिका होती है यही इस दशा का स्वामित्व रखते हैं. यह शुभ ग्रह की दशा होने के कारण मन में शीतलता व सकून का भाव लेकर आती है.

इस दशा में चंद्रमा के गुणों की समानता समाहित होती है, जिसके प्रभुत्व के कारण शुभता बनी रहती है. इस दशा में मन पवित्रता को पाता है. धार्मिक कार्यों में सहज ही रूचि बनती है. मन की जिज्ञासाओं में आगे बढने की चाह बनी रहती है. व्यक्ति का मन देव पूजन व धार्मिकता में अधिक रमता है.

सतसंग, काव्य चर्चा व पुराण काथाओं में शामिल होने से व इनमें भाग लेने से सुख, वैभव और संपन्नता का माहौल पनपता है. इस समय में व्यक्ति को सुख, सुविधा और यश की प्राप्ति संभव हो पाती है. अत्नाभूषणों एवं यात्राओं का सुख भी मिलता है. घर परिवार में शुभ आयोजन होते हैं.

विद्या, विनय और वैभव के साथ लोगों से सम्मान की प्राप्ति भी हो पाती है. मित्रों के साथ अच्छा समय और सहयोग प्राप्त होने की उम्मीद बनी रहती है. अपनों का स्नेह व सहयोग मन को संतोष देने वाला होता है. विद्वानों के अनुसार मंगला दशा मांगल्य को दर्शाती है. यह शुभ व श्रेष्ठता का प्रतीक होता है.

यह दशा जातक को संतान व जीवन साथी का सुख देने वाली होती है. साथी से निष्ठा एवं प्रेम की प्राप्ति होती है. संतान कि ओर से सुख की अनुभूति मिलती है और आदर व सम्मान की प्राप्ति होती, संतान आज्ञाकारी और भाग्यशाली होती है. धन वैभवता को पाती है.

इस दशा में व्यक्ति को अरिष्ट निवारण क्षमता प्राप्त होती है. व स्वस्थ एवं स्वयं को निरोगी रखने में सफल होता है. इस समय पराक्रम अवं साहस की प्राप्ति भी होती है. अपने कार्यों द्वारा पद प्रतिष्ठा की प्राप्ति और साथ ही जीवन में आने वाली समस्याओं के प्रति सजगता बनी रहती है. यह सभी गुण व लाभ मंगला की दशा भुक्ति में सहज ही प्राप्त हो पाते हैं.

मंगला दशा के दौरान जातक के जीवन में होने वाले नकारत्मक एवं असफल रूप में कमी आती है और जीवन की परेशानियों का दौर कुछ थमता सा नजर आता है. कुछ शांति की प्राप्ति व सहजता का एहसास मिलता है.

जातक के जीवन के संपूर्ण घटनाक्रम में यह योगिनी दशाएं अपना विशेष प्रभाव डालती हैं. यह दशाएं ग्रहों द्वारा गत जन्म के कर्मफलों को इस जन्म में दर्शाने का माध्यम है.

महादशाओं के गणना की पद्धति में इन दशाओं के क्रम का भी अनुमोदन होता है और उसी दशा क्रम में दशा का आगमन होता है और इसी के भितर अन्तर दशा, प्रत्यन्तर दशा, सूक्ष्म दशा, प्राण दशाएं आती हैं. प्रत्येक योगिनी दशा के काल में उक्त दशा से संबंधी ग्रह अपना फल देते हैं.  ज्योतिषी के अनुसार सभी ग्रह अपनी दशा में फल प्रदान करते हैं और अच्छा-बुरा कोई भी फल दे सकते हैं. यह सत्य है कि वे अपनी दशा में आकर ही अपने संपूर्ण अच्छे-बुरे फलों का दर्शन कराती हैं. इससे अच्छी-बुरी घटनाओं का बोध हो पाता है.

मंगला दशा के दौरान अन्य दशा का प्रभाव

ऐसे में जब मंगला के साथ किसी मित्र ग्रह की दशा आती है तो ये अच्छे फल देती है. पर जब इस दशा में शत्रु ग्रह की दशा आती है तो जातक को मानसिक रुप से परेशान करने वाली होती है.

इस के साथ ही ग्रह जन्म कुण्डली में किस स्थान पर बैठा किस स्थिति में बैठा हुआ है उसके आधार पर भी दशा के शुभाशुभ फल मिलते हैं. मंगला में जब संकटा अंतरदशा, उल्का अंतरदशा आती है तो ये बहुत खराब फल देने वाली बनती है. इस समय व्यक्ति किसी न किसी कारण से परेशान रहता है. स्वास्थ्य भी खराब रहता है. आर्थिक क्षेत्र में उतार-चढा़व बहुत झेलने पड़ते हैं.

मंगला में धान्या की अंतरदशा बहुत शुभ होती है. जातक को धन धान्य देने वाली होती है. मंगला में सिद्धा अंतरदशा के दौरान जातक कलात्मक रुप से बहुत मजबूत होता है. व्यक्ति की छुपी हुई प्रतिभा सामने आती है. प्रेम संबंधों में नए पड़ाव आते हैं. इस समय के दौरान जातक को एक ऎसा माहौल मिलता है जिसमें वह अपने मन अनुसार काम कर सकता है.

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श्री अष्टलक्ष्मी स्तोत्र | Sri Ashtalakshmi Stotram | Ashtalakshmi Stotram | Ashta Lakshmi Stotram

माता लक्ष्मी की कृपा पाने के लिये माँ लक्ष्मी के अष्टरुपों का नियमित स्मरण करना शुभ फलदायक माना गया है. अष्टलक्ष्मी स्त्रोत कि विशेषता है की इसे करने से व्यक्ति को धन और सुख-समृ्द्धि दोनों की प्राप्ति होती है. घर-परिवार में स्थिर लक्ष्मी का वास बनाये रखने में यह विशेष रुप से शुभ माना जाता है. अगर कोई भक्त यदि माता लक्ष्मी के अष्टस्त्रोत के साथ श्री यंत्र को स्थापित कर उसकी भी नियमित रुप से पूजा-उपासना करता है, तो उसके व्यापार में वृद्धि व धन में बढोतरी होती है.

व्यापारिक क्षेत्रों में वृद्धि करने में अष्टलक्ष्मी स्त्रोत और श्री यंत्र कि पूजा विश्लेष लाभकारी रहती है. श्री लक्ष्मी जी की पूजा में विशेष रुप से श्वेत वस्तुओं का प्रयोग करना शुभ कहा गया है. पूजा में श्वेत वस्तुओं का प्रयोग करने से माता शीघ्र प्रसन्न होती है. इसे करते समय शास्त्रों में कहे गये सभी नियमों का पालन करना चाहिए और पूर्ण विधि-विधान से करना चाहिए. शुक्रवार के दिन से इसे आरंभ करते हुए जब तक हो सके करें.

इसका प्रारम्भ करते समय इसकी संख्या का संकल्प अवश्य लेना चाहिए और संख्या पूरी होने पर उद्धापन अवश्य करना चाहिए. प्रात: जल्दी उठकर पूरे घर की सफाई करनी चाहिए. जिस घर में साफ-सफाई का ध्यान नहीं रखा जाता है, उस घर-स्थान में देवी लक्ष्मी निवास नहीं करती है. लक्ष्मी पूजा में दक्षिणा और पूजा में रखने के लिये धन के रुप में सिक्कों का प्रयोग करना चाहिए.

श्री अष्टलक्ष्मी स्तोत्र पूजन विधि | Rituals to Worship Sri Ashtalakshmi Stotram

स्त्रोत का पाठ करने के लिए घर को गंगा जल से शुद्ध करना चाहिए तथा ईशान कोण की दिशा में माता लक्ष्मी कि चांदी की प्रतिमा या तस्वीर लगानी चाहिए. साथ ही श्री यंत्र भी स्थापित करना चाहिए श्री यंत्र को सामने रख कर उसे प्रणाम करना चाहिए और अष्टलक्ष्मियों का नाम लेते हुए उन्हें प्रणाम करना चहिए, इसके पश्चात उक्त मंत्र बोलना चाहिए. पूजा करने के बाद लक्ष्मी जी कि कथा का श्रवण भी किया जा सकता है. माँ लक्ष्मी जी को खीर का भोग लगाना चाहिए और धूप, दीप, गंध और श्वेत फूलों से माता की पूजा करनी चाहिए. सभी को खीर का प्रसाद बांटकर स्वयं खीर जरूर ग्रहण करनी चाहिए.

आदिलक्ष्मी | Aadi Lakshmi

सुमनसवन्दित सुन्दरि माधवी चन्द्र सहोदरीहेममये |
मुनिगणमंडित मोक्षप्रदायिनी मंजुलभाषिणीवेदनुते ||
पंकजवासिनी देवसुपुजित सद्रुणवर्षिणी शांतियुते |
जय जय हे मधुसुदन कामिनी आदिलक्ष्मी सदापलीमाम ||१||

धान्यलक्ष्मी | Dhanya Lakshmi

अहिकली कल्मषनाशिनि कामिनी वैदिकरुपिणी वेदमये |
क्षीरमुद्भव मंगलरूपिणी मन्त्रनिवासिनी मन्त्रनुते | |
मंगलदायिनि  अम्बुजवासिनि देवगणाश्रित पाद्युते |
जय जय हे मधुसुदन कामिनी धान्यलक्ष्मी सदा पली माम|| २||

धैर्यलक्ष्मी | Dhairya Lakshmi

जयवरवर्णिनी  वैष्णवी भार्गवी मन्त्रस्वरूपिणी  मन्त्रम्ये |
सुरगणपूजित शीघ्रफलप्रद ज्ञानविकासिनी शास्त्रनुते ||
भवभयहारिणी पापविमोचनि साधुजनाश्रित पादयुते |
जय जय हे मधुसुदन कामिनी धैर्यलक्ष्मी सदापलेमाम ||३||

गजलक्ष्मी | Gaj Lakshami

जयजय दुर्गतिनाशिनी कामिनी सर्वफलप्रद शास्त्रमये |
रथगज तुरगपदादी  समावृत परिजनमंडित लोकनुते ||
हरिहर ब्रम्हा सुपूजित सेवित तापनिवारिणी पादयुते |
जय जय हे मधुसुदन कामिनी गजलक्ष्मी  रूपेण पलेमाम ||४||

संतानलक्ष्मी | Santan Lakshmi

अहिखग वाहिनी मोहिनी  चक्रनि रागविवर्धिनी  लोकहितैषिणी
स्वरसप्त भूषित गाननुते सकल सूरासुर देवमुनीश्वर  ||
मानववन्दित पादयुते |
जय जय हे मधुसुदन कामिनी संतानलक्ष्मी त्वं पालयमाम || ५ ||

विजय लक्ष्मी | Vijaya Lakshmi

जय कमलासनी सद्रतिदायिनी ज्ञानविकासिनी गानमये |
अनुदिनमर्चित कुमकुमधूसर-भूषित वासित वाद्यनुते ||
कनकधस्तुति  वैभव वन्दित शंकर देशिक मान्य पदे |
जय जय हे मधुसुदन कामिनी विजयलक्ष्मी सदा पालय माम ||६ ||

विद्यालक्ष्मी | Vidya Lakshmi

प्रणत सुरेश्वरी भारती भार्गवी शोकविनासिनी रत्नमये |
मणिमयभूषित कर्णविभूषण शांतिसमवृत  हास्यमुखे ||
नवनिधिदायिनी  कलिमहरिणी कामित फलप्रद  हस्त युते  |
जय जय हे मधुसुदन कामिनीविद्यालक्ष्मी  सदा पालय माम  ||

धनलक्ष्मी | Dhan Lakshmi

धिमिधिमी धिंधिमी धिंधिमी धिंधिमी दुन्दुभी नाद सुपूर्णमये |
घूमघूम घुंघुम घुंघुम घुंघुम शंखनिनाद सुवाद्यनुते ||
वेदपूराणेतिहास सुपूजित वैदिकमार्ग प्रदर्शयुते |
जय जय हे मधुसुदन कामिनी धनलक्ष्मी रूपेण पालय माम || ८||

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क्या होती है योगिनी दशा और जानिए इसके प्रकार विस्तार से

योगिनी दशा की कुल अवधि 36 वर्ष की होती है. मंगला, पिंगला, धन्या, भ्रामरी, भद्रिका, उल्का, सिद्धा, संकटा नामक आठ योगिनी दशाएं होती हैं. संख्याक्रम से मंगला एक वर्ष रहती है, पिंगला दो वर्ष, धन्या तीन, भ्रामरी चार, भद्रिका पांच, उल्का छः, सिद्धा सात और संकटा आठ वर्ष की होती है.

मंगला मंगलानन्दा, यशोद्रविणदायिनी। पिंगला तनुतेव्याधि, मनसौदु:खसंभ्रमौ। धान्या धनसुहृद्वन्धु नूपंशीमतिनिकरी। भ्रामरी जन्म भूमिघ्नि, भ्रामयेत्सर्वतोदिशम्। भद्रिका सुखसम्पत्ति, विलास बलदायिनी। उल्का राज्यधनारोग्यं, हारिणी दु:खदायिनी। सिद्धा साधयेत् कार्यं, नृपतिनांच राज्यदा। संकटा व्याधिमरणं सर्वदा क्लेश कारिणी।

मंगला दशा | Mangla Dasha

मंगला दशा की अवधि एक वर्ष होती है. इसके स्वामी चंद्रमा होते हैं. इस दशा में मन शुद्ध एवं शांत रहता है. व्यक्ति धार्मिक कार्यों में रुचि रखने वाला होता है उसका झुकाव अच्छे विचारों की ओर अधिक रहता है.

पिंगला | Pingala Dasha

पिंगला दशा की अवधि दो वर्ष की होती है. इसके स्वामी सूर्य हैं. विद्वानों ने सूर्य को एक क्रूर ग्रह माना है. इसलिए इस दशा के आने से जातक के जीवन में देह कष्ट, हृदय रोग तथा अनैतिक-गुस्सैल आचरण उभरने लगता है.

धान्या दशा | Dhanya Dasha

धान्या दशा की अवधि तीन वर्ष की मानी गई है. इनके स्वामी गुरू हैं यह दशा शुभ दशा मानी गई है. इस दशा के अन्तर्गत उन्नती, प्रगति, विकास की प्राप्ति होती है. गुरू धर्म व आध्यात्म का कारक है इस कारण इस दशा में व्यक्ति उपासना व तीर्थाटन करता है और जीवन में सदगति पाता है.

भ्रामरी दशा | Bhramari Dasha

भ्रामरी की दशा अवधि चार वर्ष की होती है. इसके स्वामी मंगल हैं, यह दशा व्यक्ति को व्यर्थ का भटकाव देती है. मंगल क्रूर ग्रह होने के कारण पदभंग, मानहानि या स्थानांतरण संबंधी तनाव दे सकता है. कुछ विद्वानों के अनुसार भ्रामरी दशा घर परिवार का सुख कम कर देती है किंतु परिश्रम और साहस से लाभ प्रदान करने में सहायक होती है.

भद्रिका दशा | Bhadrika Dasha

भद्रिका दशा अवधि पांच वर्ष की होती है. इसके स्वामी बुध हैं. यह दशा व्यक्ति के जीवन में स्नेह व सहयोग की प्रवृत्ति को बढा़ती है. व्यक्ति के मैत्रि संबंधों में वृद्धि होती है. संत, मात्मा, धनी मानी लोगों की कृपा से मान सम्मान की वृद्धि होती है.

उल्का दशा | Ulka Dasha

यह शनि की दशा होती है और इसकी दशा अवधि छह वर्ष की होती है. जिस प्रकार आकाश से उल्कापात होता है उसी प्रकार इस दशा की तुलना लक्ष्य पर मार करने वाले संहारक शस्त्र से की जा सकती है. यह दशा शुभता में कमी करने वाली होती है. इस दशा में धन, यश तथा वाहन की हानी होती है. परिवार में तनाव और मतभेद की स्थिति बनती है.

सिद्धा दशा | Siddha Dasha

यह शुक्र की दशा होती है इसकी दशा अवधि सात वर्ष की होती है. यह शुभ दशा मानी गई है. इस दशा में व्यक्ति सुख, सौभाग्य को पाता है. उच्चपद व अधिकार की प्राप्ति होती है.

संकटा दशा | Sankata Dasha

संकटा दशा राहु की दशा होती है इस दशा की अवधि आठ वर्ष की मानी गई है. यह दशा धन, यश और पद प्रतिष्ठा की हानि करती है. परिवार से वियोग कष्ट प्राप्त होता है. जातक में मनमानी व हठ की प्रवृत्ति अधिक रहती है.

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कुण्डली में सप्तमस्थ सूर्य का महत्व | Importance of Sun in the Seventh house of a Kundali

कुण्डली के सातवें भाव में स्थित सूर्य को अलगाववादी और विच्छेदकारी कहा गया है. इसी के साथ साथ वैवाहिक जीवन के लिए भी इसे अच्छा नहीं माना गया है परंतु इन तथ्यों की सत्यता के विषय में जानने के लिए सर्वप्रथम इस बात को समझ चाहिए की कुण्डली में क्या संभावनाएं दी गई हैं तथा वह किस प्रकार अपना फल देने में सक्षम होंगी क्योंकि केवल यह कह देना की सातवें भाव में सूर्य स्थित है और इसके कारण जीवन में सुखों का अभाव बना रहेगा यह प्रमाणिकता नहीं कहलाती.

ज्योतिष में सूर्य को पिता, आत्मा के कारक ग्रह कहा गया है. यह सिंह राशि का प्रतिनिधित्व करते हैं राजसी व तपस्वी ग्रह हैं. यह आरोग्यता के कारक हैं. इसलिए सप्तमस्थ सूर्य के होने से इन गुणों का जीवन साथी में होना स्वाभाविक है. ज्योतिष शास्त्रियों ने सप्तम भाव में सूर्य के होने को विच्छेद कारक कहा है क्योंकि सप्तम भाव का कारक शुक्र है और शुक्र का स्वभाव सुख सुविधाओं, सौंदर्य और भोग विलास में लिप्त रहना है और इसके विपरित सूर्य का स्वभाव आध्यात्मिक और सात्विक रहा है जिसके फलस्वरूप जीवन साथी समाज के आध्यात्मिक, सामाजिक, धार्मिक और अन्य क्षेत्रों से जुडा़ रहता है.

ज्योतिष के अनेक ग्रंथों में शास्त्रकारों ने सूर्य के सातवें भाव में स्थित होने के अनेक अशुभ फलों को बताया है. जिसमें से बृहत् पराशर होरा शास्त्र के अनुसार सप्तम भाव में स्थित सूर्य स्त्री को बांध्य बनाता है.

सारावली के अनुसार कुण्डली में सप्तमस्थ सूर्य के होने से जातक अनेक स्त्रियों के साथ संब्म्ध बनाने वाला, सुख से रहित, चंचल, पीले रंग के केश वाला व कुरूप होता है.

जातक निर्णय के अनुसार सप्तमस्त सूर्य के कारण जातक गोर वर्ण का कम केश वाला, विवाह में विलंब, सरकार से हानि व अपमान, संदिग्ध चरित्र वाला, यात्रा का शौकिन होता है.

जातक भ्रमण के अनुसार सप्तम भाव में सूर्य हो तो जातक संपत्ति व शरीर की कान्ति से हीन होता है, कमजोर व राजा के क्रोद्ध से दुखी होता है. भय व रोग से मुक्त रहता है.

यहां तात्पर्य यह है कि ज्योतिर्विदों ने सप्तमस्थ सूर्य को अयोग्य जीवनसाथी का होना माना है. जिसके फलस्वरूप पारिवारिक समस्याएं उत्पन्न होती हैं. उपरोक्त फलों के कारण सप्तमस्थ सूर्य को जानना अत्यंत आवश्यक हो जाता है.

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार भाग्य बलवान होने से जीवन में मुश्किलें कम आती हैं, व्यक्ति को अपने कर्मों का फल जल्दी प्राप्त होता है. भाग्य का साथ मिले तो व्यक्ति को जीवन का हर सुख प्राप्त होता. यही कारण है कि लागों में सबसे ज्यादा इसी बात को लेकर उत्सुकता रहती है कि उसका भाग्य कैसा होगा. कुण्डली के भाग्य भाव में सातवें घर का स्वामी बैठा होने पर व्यक्ति का भाग्य कितना साथ देता है।

ज्योतिषशास्त्र की मान्यता है कि कुण्डली के सातवें घर में जो ग्रह बैठे होते हैं उनके अनुसार व्यक्ति के जीवनसाथी का स्वभाव हो सकता है, अगर इस घर में एक से अधिक ग्रह हों तो बाकि ग्रहों का भी प्रभाव जीवनसाथी पर होता है. साथी कैसा होगा अथवा वैवाहिक जीवन कैसा रहेगा तो सप्तम भाव में स्थित ग्रहों को देख कर इस विषय में काफी कुछ अनुमान लगा सकते हैं. इस आलेख में सूर्य के साथ सातवें घर में होने के अनुसार जीवन में होने वाले प्रभावों का उल्लेख किया गया है.

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वर्ष फल कुण्डली में द्वादश भाव में ग्रहों का महत्व | Significance of Planets in the Twelfth House of Varshphal Kundali

वर्ष फल कुण्डली में द्वादश भाव के फलों को जानने के लिए उनमें सभी विभिन्न भावों में स्थित ग्रहों के कारकों का फल देखना होता है जिसके अनुसार वह अपने फल देने में सक्ष्म होते हैं. इसमें से कुछ इस प्रकार हैं कि यदि भाव स्व राशि स्वामी हो या शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो उत्तम व बलिष्ठ होता है, इसी के द्वारा जातक को अच्छे फलों की प्राप्ति होती है. विभिन्न लग्नों की कुण्डलियों में ग्रह विभिन्न परिणामदायक हैं. कुण्डली के बलिष्ठ होने के लिए ग्रह यदि वह उच्चता युक्त या स्वराशि में स्थित हो तो वह शुभ परिणामदायक होंगे.

सूर्य ग्रह | Sun in the Twelfth House

ऋषि पराशर द्वारा कहा गया है कि यदि तुला लग्न हो और सूर्य द्वादशभाव में स्थित हो तो व्यक्ति को दिर्घायु प्राप्त होती है. सूर्य मजबूत होने पर व्यक्ति को सुख और पद की प्राप्ति हो सकती है.धनी व दानी बनता है, परंतु यदि सूर्य कमजोर हो तो नेत्र ज्योति कमजोर हो जाती है. आध्यात्मिक विकास में कमी आती है और विवाद होता है. विदेश यात्रा और सरकार की ओर से परेशानी झेलनी पड़ सकती है.

चंद्र ग्रह | Moon in the Twelfth House

चन्द्र के द्वादश भाव में होने पर व्यक्ति का स्वभाव उत्तम नहीं रह पाता, मन में सदैव द्वंद की स्थिति बनी रहती है, अपेक्षा का शिकार होता है. इसी प्रकार यदि अग्नि तत्व वाली राशियों में हो तो शरीर से कमजोर, गुस्सैल हो सकता है. जल राशियों में होने पर विदेश यात्रा करता है.

मंगल ग्रह | Mars in the Twelfth House

मंगल के द्वादश भाव में होने के कारण स्वार्थी हो सकता है, जीवन साथी के सुख से दूर रह सकता है. लोगों से सहायता व सहयोग की कमी रहती है, साहस में कमी हो सकती है. कमजोर हो तो व्यक्ति में अत्यधिक क्रोध व गुस्सा हो सकता है. परिवार में कलह हो सकती है या संपत्ति को लेकर कोई विवाद उभर सकता है.

बुध ग्रह | Mercury in the Twelfth House

द्वादश भाव में बुध के स्थित होने के कारण जातक धनी व बुद्धिमानी बनता है किन्तु धोखा व छल भी कर सकता है. कमजोर व निर्बल होने पर वाणी में दोष उत्पन्न हो सकता है साथ ही शिक्षा में रुकावट का सामना करना पड़ सकता है.धन की हानी हो सकती है अनैतिक कार्यों कि ओर रूझान रह सकता है.

बृहस्पति ग्रह | Jupiter in the Twelfth House

द्वादश भाव में बली अवस्था में होने के कारण व्यक्ति ज्ञानी और योग्यता से भरा होता है. आध्यात्मिक उच्चता को पाता है. मोक्ष व धर्म के लिए उपयोगी. लेकिन कमजोर होने पर नास्तिकता का भाव रहता है. दृष्टि से कमी व संतान सुख में दूरी हो सकती है.

शुक्र ग्रह | Venus in the Twelfth House

शुक्र के शुभता में होने से वाणी में मिठास आती है,व्यक्ति आकर्षक ओर योग्यता से भरा और बुद्धिमान होगा. व्यक्ति सभी का प्रेमी बनता है. विदेश यात्रा व शयन सुख पाता है. वैवाहिक संबंधों में मधुरता आती है. धनी, कवि कलाकार व शुभता बनी रहती है. परंतु कमजोर होने पर कामुक, गलत कामों में लिप्त व हृदय से कठोर हो सकता है.

शनि ग्रह | Saturn in the Twelfth House

शनि के द्वादश भाव में  यदि यह अशुभ ग्रहों से प्रभावित हो तो धन हानी या पैतृक संपत्ति विवाद हो सकता है. जातक को कष्ट, दरिद्र और परिवार से  दूर कर सकता है.

राहु ग्रह | Rahu in the Twelfth House

राहु के होने पर धन युक्त होने पर भी दरिद्रता का जीवन मिलता है. तनाव व अलगाव रहा होगा और सफलता पाने के लिए अत्यधिक संघर्ष की स्थिति से गुजरना पड़ सकता है. मानसिक रुप से दुविधा बनी रह सकती है और उत्तेजना विद्यमान रहेगी.

केतु ग्रह | Ketu in the Twelfth House

केतु के द्वादश भाव में होने पर मोक्ष का साकार होना माना जाता है. जातक कई जगह में घूमता है.  अस्थिरता अधिक होती है. सरकार से हानि मिल सकती है मानसिक उग्रता बनी रहेगी और उतावलापन बना रह सकता है.

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वर्षफल कुण्डली के एकादश भाव में कौन सा ग्रह देगा कैसा फल आईये जानें

वर्ष फल कुण्डली में एकादश भाव के फलों को जानने के लिए उनमें सभी विभिन्न भावों में स्थित ग्रहों के कारकों का फल देखना होता है जिसके अनुसार वह अपने फल देने में सक्ष्म होते हैं. इसमें से कुछ इस प्रकार हैं कि यदि भाव स्व राशि स्वामी हो या शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो उत्तम व बलिष्ठ होता है, इसी के द्वारा जातक को अच्छे फलों की प्राप्ति होती है. विभिन्न लग्नों की कुण्डलियों में ग्रह विभिन्न परिणामदायक हैं. कुण्डली के बलिष्ठ होने के लिए ग्रह यदि वह उच्चता युक्त या स्वराशि में स्थित हो तो वह शुभ परिणामदायक होंगे.

सूर्य ग्रह | Sun Planet

सूर्य के एकादश भाव में मजबूत होने पर व्यक्ति को सत्ता का सुख और उच्च पद की प्राप्ति हो सकती है. व्यक्ति धनी व दानी बनता है, धर्म कर्म के कार्यों में अपना धन लगाता है.पैतृक व्यवसाय में सफलता है. परंतु यदि सूर्य कमजोर हो तो धन की हानी, व्यवहार में क्रोद्ध और जिद्दीपन आता है.

चंद्र ग्रह | Moon Planet

चन्द्र के एकादश भाव में होने पर यदि वह मजबूत स्थिति में हो तो जातक को धनी व व्यवहार से सौम्य बनाता है. जमीन जायदाद से युक्त होता है.स्त्रियों से सहायता पाता है. प्रेम से युक्त और कलात्मकता से भरा हुआ बनाता है. व्यक्ति का स्त्रियों से लगाव रहता है. पर यदि यह अशुभ ग्रहों से प्रभावित हो तो धन हानी या पैतृक संपत्ति विवाद हो सकता है.

मंगल ग्रह | Mars Planet

मंगल के एकादश भाव में होने के कारण लोगों से सहायता व सहयोग मिलता है और सफलता मिलती है, जोशीला वक्ता होता है.अचानक से प्रोपर्टी से लाभ मिल सकता है. परंतु यह कमजोर हो तो व्यक्ति में अत्यधिक क्रोध व गुस्सा हो सकता है. परिवार में कलह हो सकती है या संपत्ति को लेकर कोई विवाद उभर सकता है.

बुध ग्रह | Mercury Planet

एकादश भाव में बुध के स्थित होने के कारण जातक धनी व बुद्धिमानी बनता है. कई विद्याओं में निपुण होता है. जातक की भाष में सौम्यता व मधुरता बनी रहती है. लेखन व कलात्मक कार्यों में रूझान रह सकता है. कमजोर व निर्बल होने पर वाणी में दोष उत्पन्न हो सकता है, साथ ही शिक्षा में रुकावट का सामना करना पड़ सकता है.

बृहस्पति ग्रह | Jupiter Planet

एकादश भाव में बली अवस्था में होने के कारण व्यक्ति ज्ञानी और योग्यता से भरा होता है. परिवार में मुखिया का स्थान पाता है, मित्रों से युक्त होता है. संगीत के प्रति रूचि रखता है. व्यक्ति आकर्षक ओर योग्यता से भरा और बुद्धिमान होगा.

शुक्र ग्रह | Venus Planet

शुक्र के शुभता में होने से वाणी में मिठास आती है, धनवान और यात्रा के शौकिन होता है. व्यक्ति सभी का प्रेमी बनता है. वैवाहिक संबंधों में मधुरता आती है. रंगमंच, नृत्य कला के प्रति लागाव, कवि कलाकार व शुभता बनी रहती है.

शनि ग्रह | Saturn Planet

शनि के एकादश भाव में होने के कारण कई सेवकों से युक्त होता है, राजनीति व सरकार से लाभ मिलता है. विद्या प्राप्ति में रूकावट आती है. जातक को कष्ट, दरिद्र और परिवार से  दूर कर सकता है.

राहु ग्रह | Rahu Planet

राहु के होने पर धन युक्त, सेना अध्यक्ष, विद्वान, विदेश में धन लाभ पाता है. तनाव व अलगाव रहा होगा और सफलता पाने के लिए अत्यधिक संघर्ष की स्थिति से गुजरना पड़ सकता है. मानसिक रुप से दुविधा बनी रह सकती है और उत्तेजना विद्यमान रहेगी.

केतु ग्रह | Ketu Planet

नैतिक तथा सफल, शुभ विचारों से युक्त, कई स्थानों पर सुखपूर्वक यात्राएं, सरकार से हानि मिल सकती है मानसिक उग्रता बनी रहेगी. वाणी में कर्कश और उतावलापन बना रह सकता है.

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वर्ष फल कुण्डली के दूसरे भाव से जाने कैसी होगी इस साल आपकी इनकम

वर्ष फल कुण्डली में दूसरे भाव के फलों को जानने के लिए उनमें सभी विभिन्न भावों में स्थित ग्रहों के कारकों का फल देखना होता है जिसके अनुसार वह अपने फल देने में सक्ष्म होते हैं. इसमें से कुछ इस प्रकार हैं कि यदि भाव स्व राशि स्वामी हो या शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो उत्तम व बलिष्ठ होता है, इसी के द्वारा जातक को अच्छे फलों की प्राप्ति होती है. विभिन्न लग्नों की कुण्डलियों में ग्रह विभिन्न परिणामदायक हैं. कुण्डली के बलिष्ठ होने के लिए ग्रह यदि वह उच्चता युक्त या स्वराशि में स्थित हो तो वह शुभ परिणामदायक होंगे.

सूर्य ग्रह | Sun Planet

सूर्य मजबूत होने पर व्यक्ति को सत्ता का सुख और उच्च पद की प्राप्ति हो सकती है. व्यक्ति धनी व दानी बनता है, धर्म कर्म के कार्यों में अपना धन लगाता है. परंतु यदि सूर्य कमजोर हो तो व्यक्ति को विवाह में देरी, धन की हानी, व्यवहार में क्रोद्ध और जिद्दीपन आता है.

चंद्र ग्रह | Moon Planet

चन्द्र के दूसरे भाव में होने पर यदि वह मजबूत स्थिति में हो तो जातक को धनी व व्यवहार से सौम्य बनाता है. प्रेम से युक्त और कलात्मकता से भरा हुआ बनाता है. व्यक्ति का स्त्रियों से लगाव रहता है. पर यदि यह अशुभ ग्रहों से प्रभावित हो तो धन हानी या पैतृक संपत्ति विवाद हो सकता है.

मंगल ग्रह | Mars Planet

मंगल के दूसरे भाव में होने के कारण लोगों से सहायता व सहयोग मिलता है और सफलता मिलती है, अचानक से प्रोपर्टी से लाभ मिल सकता है. परंतु यह कमजोर हो तो व्यक्ति में अत्यधिक क्रोध व गुस्सा हो सकता है. परिवार में कलह हो सकती है या संपत्ति को लेकर कोई विवाद उभर सकता है.

बुध ग्रह | Mercury Planet

दूसरे भाव में बुध के स्थित होने के कारण जातक धनी व बुद्धिमानी बनता है. जातक की भाष में सौम्यता व मधुरता बनी रहती है. लेखन व कलात्मक कार्यों में रूझान रह सकता है. कमजोर व निर्बल होने पर वाणी में दोष उत्पन्न हो सकत अहै साथ ही शिक्षा में रुकावट का सामना करना पड़ सकता है.

बृहस्पति ग्रह | Jupiter Planet

दसरे भाव में बली अवस्था में होने के कारण व्यक्ति ज्ञानी और योग्यता से भरा होता है. व्यक्ति आकर्षक ओर योग्यता से भरा और बुद्धिमान होगा.

शुक्र ग्रह | Venus Planet

शुक्र के शुभता में होने से वाणी में मिठास आती है, व्यक्ति सभी का प्रेमी बनता है. वैवाहिक संबंधों में मधुरता आती है. धनी, कवि कलाकार व शुभता बनी रहती है.

शनि ग्रह | Saturn Planet

शनि के दूसरे भाव में होने के कारण जातक को कष्ट, दरिद्र और परिवार से  दूर कर सकता है. शाररिक सौंदर्य में कमी हो सकती है.

राहु ग्रह | Rahu Planet

राहु के होने पर धन युक्त होने पर भी दरिद्रता का जीवन मिलता है. तनाव व अलगाव रहा होगा और सफलता पाने के लिए अत्यधिक संघर्ष की स्थिति से गुजरना पड़ सकता है. मानसिक रुप से दुविधा बनी रह सकती है और उत्तेजना विद्यमान रहेगी.

केतु ग्रह | Ketu Planet

सरकार से हानि मिल सकती है मानसिक उग्रता बनी रहेगी. वाणी में कर्कश और उतावलापन बना रह सकता है. परंतु केतु मेष, मिथुन या कन्या राशि में हो तो शुभता बनी रह सकती है.

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वर्षफल कुण्डली के चौथे भाव में बैठे ग्रह कैसे देते हैं अपना फल

वर्ष फल कुण्डली में चतुर्थ भाव में स्थित ग्रहों के प्रभावों द्वारा जो फल प्राप्त होते हैं वह जातक के जीवन को अनेक प्रकार से प्रभावित करते हैं. वर्ष फल कुण्डली ज्योतिष शास्त्र की तीन शाखाओं में से एक है. वर्ष फल मुख्यत: किसी विशेष घटनाओं को अध्ययन करने के संदर्भ में प्रयुक्त किया जाता है. फलों को जानने के लिए उनमें सभी विभिन्न भावों में स्थित ग्रहों के कारकों का फल देखना होता है.

सूर्य ग्रह | Sun Planet

चतुर्थ भाव में सूर्य के स्थित होने के प्रभाव स्वरूप जातक घूमने का शौकिन होता है, चिंताओं से घिरा रह सकता है. वर्ष कुण्डली अनुसार चौथे भाव में सूर्य के स्थित होने से व्यक्ति का मन अशांत रह सकता है, परंतु उसके व्यवसाय के लिए अच्छा रह सकता है. वह दर्शनशास्त्र के प्रति लगाव रखने वाला हो सकता है.

चंद्र ग्रह | Moon Planet

चंद्र के चतुर्थ भाव में स्थित होने के कारण व्यक्ति मन से संतुष्ट होता है, उसे राजा से सम्मान की प्राप्ति हो सकती है. समाज में सम्मान और प्रेम की प्राप्ति हो सकती है. चंद्रमा के पीडित होने पर माता से दूरी या निवासस्थान से दूर जाना पड़ सकता है. मानसिक रुप से तनाव कि स्थिति से गुजरना पड़ सकता है.

मंगल ग्रह | Mars Planet

चतुर्थ भाव में मंगल ग्रह के प्रभाव स्वरूप मानसिक अशांति बनी रह सकती है. घरेलू विवाद रह सकते हैं अथवा संपत्ति विवाद हो सकता है, माता से झगडे की स्थित उत्पन्न हो सकती है. मंगल पीडित होने पर चोरी कि संभावना अथवा लांछन लग सकता है. धोखे या छल से धन हानि की संभावना बनी रह सकती है जिस कारण तनाव बना रह सकता है.

बुध ग्रह | Mercury Planet

बुध के चतुर्थ भाव में स्थित होने के कारण व्यक्ति को विदेश यात्रा करनी पड़ सकती है या घर से कुछ समय के लिए दूर जाकर काम करना पड़ सकता है. शिक्षा में अच्छा प्रदर्शन कर सकता है, वाहन, संगीत व कला के प्रति विशेष लगाव उत्पन्न हो सकता है.

बृहस्पति ग्रह | Jupiter Planet

बृहस्पति के चतुर्थ भाव में स्थित होने के कारण व्यक्ति में ज्ञान की चाह बनी रहती है. लोगों में गणमान्य बनता है. विद्वान होता है व जीवन में सुख पाता है. समाज में सम्मान व उन्नती पाता है. धर्म के कार्यों में अग्रसर व भाग्य का साथ पाता है.

शुक्र ग्रह | Venus Planet

शुक्र के चतुर्थ भाव में स्थित होने पर व्यक्ति को यात्रा करनी पड़ सकती है और यात्रा से लाभ की प्राप्ति होती है. संगीत व कला के प्रति रूचि उत्पन्न होती है. व्यक्ति को मित्रों का साथ मिलता है, घर में सुख व सौभाग्य की प्राप्ति होती है. माता का स्नेह व सुख प्राप्त होता है वाहन का सुख मिलता है.

शनि ग्रह | Saturn Planet

शनि के चतुर्थ भाव में होने पर यदि लग्नेश बलिष्ठ न हो तो माता को तकलीफ झेलनी पड़ सकती है, घर से अलग रहना पड़ सकता है व जीवन में अनेक प्रकार की समस्याओं से दो चार होना पड़ सकता है.

राहु ग्रह | Rahu Planet

राहु के चतुर्थ भाव में होने पर व्यक्ति को अपनी योग्यता में कमी झेलनी पड़ सकती है, व्यक्ति में मूर्खता अधिक झलकती है, शिक्षा में अरूचि व कमी झेलनी पड़ सकती है. बच्चे की प्रारंभिक शिक्षा में कुछ व्यवधान उत्पन्न हो सकते हैं. स्त्री की कुण्डली में होने पर दांपत्य सुख में कमी आ सकती अथवा गंभीर रोग प्रभावित कर सकते हैं.

केतु ग्रह | Ketu Planet

केतु विदेश संबंधी काम दे सकता है. माता को कष्ट की स्थिति झेलनी पड़ सकती है. भाग्य में कमी व संघर्ष अधिक करना पड़ सकता है. शनि से पिडित होने पर मानसिक अशांति मिल सकती है.

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वर्षफल कुण्डली के तीसरे भाव में ग्रहों का महत्व | Varshphal Kundali and Analysis of Third House

वर्ष फल कुण्डली जिसे ताजिक भी कहा जाता है, ज्योतिष शास्त्र की तीन शाखाओं में से एक है. वर्ष फल मुख्यत: किसी विशेष घटनाओं को अध्ययन करने के संदर्भ में प्रयुक्त किया जाता है. फलों को जानने के लिए उनमें सभी विभिन्न भावों में स्थित ग्रहों के कारकों का फल देखना होता है जिसके अनुसार वह अपने फल देने में सक्ष्म होते हैं. ज्योतिष शास्त्र में वर्ष कुण्डली पराशरी पद्धति का ही एक अंग है, पराशरी पद्धति और वर्ष कुण्डली में कुछ समानताएं रहीं हैं. इस संदर्भ में वर्ष कुण्डली में पराशरी ज्योतिषशास्त्र पद्धति के कुछ तत्व अत्यंत महत्वपूर्ण रहे हैं.

सूर्य ग्रह | Sun Planet

ज्योतिष अनुसार तीसरे भाव में सूर्य के स्थित होने से जातक धनी एवं सम्माननीय व्यक्ति होता है. स्वस्थ व चरित्रवान होता है, जातक नैतिक, प्रसिद्ध और राजा तुल्य जीवन पाता है. मिथुन राशि में, तुला और धनु राशि में सूर्य जातक को लेखक, प्रकाशक और विद्या के प्रति उत्सुक बनाता है.

चंद्र ग्रह | Moon Planet

चन्द्र के प्रभाव स्वरूप ज्ञान के प्रति रूचि होती है, व्यक्ति साहसी बनता है मानसिक स्थिरता बनी रहती है. व्यक्ति कपडों का अथवा भोजन का शौकिन होता है. चंद्र के निर्बल होने के कारण पारिवारिक तनाव की स्थिति बनी रहती है. सांस की तकलीफ हो सकती है. यात्रा में परेशानी दुर्घटना की संभावना बनी रह सकती है.

मंगल ग्रह | Mars Planet

मंगल ग्रह के प्रभाव स्वरूप जातक भाईयों के मध्य सबसे बडा़ या सबसे छोटे हो सकता है. अधिकतर यह अनुज रिक्तता सूचक होता है, साहस तेज, भुजा-बल अधिक होता है. परंतु खराब होने पर आत्महत्या प्रवृत्ति युक्त हो सकता है. रक्त विकार, दुर्घटनाओं का भय हो सकता है. पडोसियों से भय व लडा़ई-झगडा़ बना रह सकता है.

बुध ग्रह | Mercury Planet

तृतीय भाव में बलिष्ठ बुध के होने से शिक्षा अच्छी होती है. शुभ विद्या लेखन में योग्यता बनी रहती है. जातक स्मरण शक्ति में मजबूती आती है, प्रकाशन, अध्ययन के प्रति अभिरूचि बढ़ती है. कमजोर व निर्बल होने पर चिंता से घिरा हुआ, कमजोर और शिक्षा में अरूचि पाता है.

बृहस्पति ग्रह | Jupiter Planet

बृहस्पति अर्थात गुरू के तृतीय भाव में होने के फलस्वरूप जातक धनी व योग्य बनता है. परंतु नीच, अशुभ ग्रहों से दृष्ट या कमजोर होने पर शुभता में कमी आती है जीवन में सही व उचित का निर्णय लेने में देरी व कमी बनी रहती है.

शुक्र ग्रह | Venus Planet

शुक्र के बलिष्ठ होने पर व्यक्ति कला से युक्त होता है, व्यक्ति में कलात्मक समझ होती है, जीवन में प्रेम व सौंदर्य का संगम बना रहता है. प्रकृति से प्रेम व यात्रा इत्यादी से लाभ और आनंद की प्राप्ती होती है. कमजोर होने पर विवाह में विलंब और तनाव की स्थिति बनी रहती है.

शनि ग्रह | Saturn Planet

शनि के तृतीय भाव में होने के कारण जातक भाई बहनों से युक्त होता है, बलिष्ठ होने पर जिम्मेवार व्यक्ति व दर्शन शास्त्र का जानकार बन सकता है. अध्ययन और लेखन से लाभ पाता है, अशुभ होने पर भाईयों से तनाव हो सकता है. व्यवहार से कृतघ्न व चालाक हो सकता है, सफलता पाने के लिए कठोर परिश्रम करता है.

राहु ग्रह | Rahu Planet

राहु के होने पर व्यक्ति अपने भाई बहनों के मध्य छोटा या सबसे बडा़ होगा. साहस से पुर्ण निर्भय होगा. भाग्यशाली, शुभ कामों से लाभ पाने वाला लेखन और प्रकाशन से लाभ मिलता है.

केतु ग्रह | Ketu Planet

स्वराशि और उच्चता युक्त होने पर जीवन में खुशहाल रहता है, धनी, काम आकर्षण से युक्त होता है, कमजोर होने पर दुखी, भयभीत होता है, मित्रों से असुरक्षा की भावना बनी रहती है.

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