विवाह सहम – Vivah Saham – Sensitive Marriage Point in Horoscope

जन्म कुण्डली में सप्तम भाव से विवाह का विश्लेषण किया जाता है. विवाह कब होगा, कैसा होगा आदि सभी बाते सप्तम भाव, सप्तमेश तथा इनसे संबंध बनाने वाले ग्रहों के आधार पर देखी जाती हैं. सबसे पहले तो सप्तम से संबंधित दशा आने पर विवाह की संभावना बनती हैं. दशा के साथ जब शनि और गुरु का अनुकूल गोचर भी सप्तम भाव से हो रहा है तब विवाह होने की संभावना बली होती हैं. इसके साथ ही इन्हीं सब बातों की पुष्टि नवांश कुण्डली में भी की जाती है.

जन्म कुण्डली और नवांश कुण्डली में विवाह संबंधी बातों का आंकलन उपरोक्त नियमों के आधार पर किया जाता है. विवाह होने की और अधिक पुष्टि के लिए ज्योतिषीय ग्रंथों में विवाह सहम का जिक्र भी किया गया है. विवाह सहम का उपयोग विवाह की क्वालिटी देखने और विवाह का समय जानने के लिए किया जाता है.

विवाह सहम की गणना | Analysis of Vivah Saham

विवाह सहम की गणना के लिए जन्म कुण्डली के लग्नेश और सप्तमेश के भोगांश को आपस में जोड़ा जाता है. दोनों के भोगांश राशि, कला और विकला तक जोड़े जाते हैं.  इसे एक उदाहरण से समझते हैं. एक कन्या लग्न की कुण्डली में लग्नेश बुध होता है और सप्तमेश गुरु होता है. माना लग्नेश बुध का भोगांश 3 राशि पार, 3 अंश(डिग्री) और उन्नीस कला (मिनट) का है. सप्तमेश गुरु का भोगांश 4 राशि पार, 19 कला और 16 विकला का है. दोनों के भोगांश जोड़ने पर 7 राशि पार, 22 अंश और 35 कला आता है. इसका अर्थ यह हुआ कि विवाह सहम तीसरे भाव अर्थात वृश्चिक राशि में बना है. जैसे नवांश कुण्डली की गणना करते हैं ठीक वैसे ही विवाह सहम के नवांश को भी देखेगें कि वह नवांश में किस राशि तथा भाव में गया है और किन ग्रहों के प्रभाव में है.

उपरोक्त उदाहरण में विवाह सहम वृश्चिक राशि में बना है. उदाहरण कुण्डली के नवांश का लग्न कुंभ है और विवाह सहम को अगर नवांश में ले जाये तब यह मकर नवांश में जाएगा. अब हम विवाह सहम की गणना जन्म कुण्डली और नवांश कुण्डली दोनों में ही  करेगें. दोनों ही कुण्डलियों में विवाह सहम जिस भाव में बना है उसके स्वामी को देखेगें कि कुण्दली में उसकी क्या स्थिति है. वह शुभ स्थिति में है या अशुभ स्थिति में है. किन ग्रहों के साथ संबंध बन रहे हैं.

विवाह होने में विवाह सहम की भूमिका | Importance of Vivah Saham in Marriage

जिस तरह से सप्तम भाव का विश्लेषण विवाह के लिए किया जाता है ठीक उसी तरह से विवाह सहम का विश्लेषण भी विवाह के लिए किया जाता है. विवाह सहम का स्वामी, विवाह सहम में बैठे ग्रह और विवाह सहम से संबंध रखने वाले ग्रह आदि सभी बातों का आंकलन किया जाता है. जब विवाह सहम से संबंध रखने वाले ग्रह की दशा/अन्तर्दशा आती है तब विवाह होने की संभावना बन जाती है.

विवाह सहम में गोचर की अत्यधिक भूमिका मानी जाती है. माना जाता है कि जिस भाव में विवाह सहम बन रहा है यदि उस भाव से गोचर का गुरु गुजर रहा हो तब विवाह होने की संभावना बढ़ जाती है अथवा विवाह सहम के स्वामी ग्रह से जब गोचर का गुरु गुजरे तब भी विवाह होने की संभावना बढ़ जाती है. नवांश कुण्डली में जिस भाव में यह सहम बन रहा है उस भाव के स्वामी की दशा में विवाह हो सकता है. उस भाव में बैठे ग्रह या उस भाव से संबंध बनाने वाले ग्रह की दशा में विवाह हो सकता है.

विवाह सहम पर अशुभ प्रभाव | Inauspicious Effects of Vivah Saham

जन्म कुण्डली के जिस भाव में यह सहम बन रहा है उस भाव पर यदि पाप ग्रहों का प्रभाव है तब विवाह में परेशानी हो सकती है. उस भाव का स्वामी पीड़ित है तब भी विवाह में अड़चने या विवाह सुख में कमी हो सकती है. नवांश कुण्डली में यदि इस सहम पर पीड़ा है तब भी विवाह में अड़चने या विवाह होने में समस्या का सामना करना पड़ सकता है.

Posted in Auspicious Marriage Muhurta, Basic Astrology, Love Relationships, Marriage, Navamsa Kundli, Rashi, Signs, Yoga | Tagged , , , , | Leave a comment

ज्योतिष से व्यक्तित्व विचार | Analyzing Personality Through Astrology

ज्योतिष की मान्यता है कि प्राणपद लग्न कर्क राशि में स्थित होने पर व्यक्ति में दिखावे की प्रवृति होती है. चन्द्रमा अथवा राहु पांचवे घर में स्थित हो अथवा उनमें दृष्टि सम्बन्ध बन रहे हों तो व्यक्ति उदासीन एवं निराशावादी होता है. चन्द्रमा और राहु लग्न अथवा आत्मकारक से नौवें घर में स्थित होने से व्यक्ति कमजोर होता है. लग्न स्थान मंगल द्वारा दृष्ट होने पर व्यक्ति का स्वभाव क्रोधी होता है वह छोटी-छोटी बातों पर उग्र हो उठता है.

व्यक्ति की राशि में कारकांश ग्रह मीन राशि में होने पर व्यक्ति गुणवान होता है और दूसरों के लिए आदर्श स्वरूप होता है जबकि केतु का सम्बन्ध कारकांश से होने पर व्यक्ति में धर्माचरण की कमी होती है लेकिन अपने अच्छे होने का दिखावा ज्यादा करता है. सूर्य और राहु कारक में हो तथा उन्हें मंगल देख रहा हो तो यह इस बात का संकेत होता है कि व्यक्ति क्रोधी होगा. कारकांश से दसवें घर में बुध स्थित हो तथा उस पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो व्यक्ति काफी बुद्धिमान होता है.

जैमिनी ज्योतिष यह भी कहता है कि जिस व्यक्ति की कुण्डली में कारकांश से तीसरे घर में अशुभ ग्रह होता है वह आत्मविश्वासी होता है. उनमें उर्जा व साहस भी भरपूर रहता है. वे अपने बल पर अपना भविष्य स्वयं बनाने वाले होते हैं. जबकि, अशुभ ग्रह कारकांश से पांचवें और नवमें घर में स्थित होता है तथा उसे कोई अशुभ ग्रह देखता है तो व्यक्ति का जीवन सामान्य रहता है. उन लोगों को जनसमूह एवं रैली से घबराहट महसूस होती है जिनकी कुण्डली में शनि कारकांश अथवा इससे पांचवें घर में होता है.

जिन लोगों की कुण्डली में केतु कारकांश से दूसरे घर में होता है और अशुभ ग्रह उसे देखते हैं वह साफ और स्पष्ट बोलने की बजाय बातों को छुपाने की कोशिश करते हैं. आमतौर पर वह लोग बुद्धिमान होते हैं जिनकी कुण्डली में पांचवें घर के स्वामी का आत्मकारक अथवा लग्न से दृष्टि सम्बन्ध बनता है. वे लोग गम में भी मुस्कुराने वाले होते हैं जिनकी जन्मपत्री में लग्न एवं आत्मकारक से चौथे घर के स्वामी की दृष्टि लग्न तथा आत्मकारक पर होती है, इनका चरित्र भी ऊँचा रहता है. आत्मकारक एवं लग्न से बारहवें घर के स्वामी की दृष्टि लग्न एवं आत्मकारक पर होना यह बताता है कि व्यक्ति खुले हाथों से खर्च करने वाला होगा.

ज्योतिष में व्यक्ति के शारीरिक गठन, लक्षण तथा रंग-रूप का विचार नवमांश, कारकांश एवं वरन्दा लग्न के स्वामी से किया जात है. वरन्दा लग्न को व्यक्ति के रूप-रंग के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है. इस ज्योतिषीय विधि में बताया गया है कि अगर केतु और शनि लग्न में हो, नवमांश लग्न, कारकांश या वरन्दा लग्न में हो तो व्यक्ति की त्वचा का रंग लालिमा लिये होता है.

शनि की युति शुक्र या राहु से होने पर व्यक्ति दिखने में सांवला होता है. उन लोगों की त्वचा निली आभा लिये होती है जिनकी कुण्डली में शनि के साथ बुध की युति बनती है. अगर आपकी कुण्डली में मंगल व शनि की युति लग्न, नवमांश लग्न, कारकांश या वरन्दा लग्न में बन रही है तो आपकी त्वचा का रंग लाल और पीली आभा लिए होगी. वहीं गुरू के साथ शनि की युति होने से आप अत्यंत गोरे हो सकते हैं. चन्द्र के साथ शनि की युति होने से भी आपकी त्वचा निखरी होती है.

Posted in Ascendant, Basic Astrology, Dashas, Planets, Rashi, Varga Kundli, Vedic Astrology, Yoga | Tagged , , , , | Leave a comment

लाल किताब के ये आसान उपाय दिला सकते सूर्य के शुभ फल

लग्न में सूर्य | Sun in Ascendant

  • लाल किताब के अनुसार यदि किसी व्यक्ति के लग्न में ही अशुभ सूर्य स्थित है तब सार्वजनिक स्थलों पर प्याऊ या नल लगाना चाहिए. इससे सूर्य को बल मिलेगा.
  • सूर्य को शुभ बनाने के लिए धार्मिक स्थान पर अनाज, नारियल, तेल, उड़द, बादाम, चने की दाल और दवाईयों का दान करना चाहिए.
  • रविवार के दिन देसी खांड, मसूर की दाल, सौंफ, छुआरे, शहद का दान करना चाहिए और विष्णु भगवान की पूजा करनी चाहिए.
  • शराब, मछली, मांस आदि का पूर्णतया त्याग करना चाहिए.

दूसरे भाव में अशुभ सूर्य | Sun in Second House

  • प्रतिदिन भगवान सूर्य को अर्ध्य देना चाहिए.
  • हरी वस्तुएं, चावल तथा अनाज कभी भी उधार पर ना लें.
  • जहां तक हो सके जमीन संबंधी झगड़ो से बचें.
  • शारीरिक कष्ट होने पर तांबे का एक सिक्का बहते पानी में बहा देना चाहिए. इससे लाभ होगा.

तीसरे भाव में अशुभ सूर्य | Sun in Third House

  • साफ पानी में थोड़ा गुड़ डालकर भगवान सूर्य को अर्ध्य देना चाहिए और निम्न मंत्र पढ़ना चाहिए “ऊं घृणि सूर्याय नम:”
  • अशुभ सूर्य होने पर नियमित रुप से रविवार का उपवास रखना चाहिए और भोजन में नमक का त्याग करना चाहिए.
  • लक्ष्मी नारायण मंदिर में जाकर दूध, चावल, चीनी तथा बर्फी का दान करना चाहिए.
  • स्वयं के ज्न्मदिवस पर गंगा आदि पवित्र तीर्थ स्थान की यात्रा करनी चाहिए और श्री लक्ष्मी नारायण की पूजा करनी चाहिए.

चतुर्थ भाव में सूर्य की स्थिति | Sun in Fourth House

  • बहन तथा बुआ के बच्चों की सेवा करने से लाभ होगा.
  • यदि पैतृक घर नही है तब अंध विद्यालय में दान करना चाहिए अथवा अंधे व्यक्ति की अपनी क्षमतानुसार सहायता करनी चाहिए.
  • सोने का छल्ला बाएँ हाथ में धारण करना चाहिए.

पंचम भाव में सूर्य | Sun in Fifth House

  • बंदरों को गुड़, चना तथा भुनी हुई गेहूँ शक्कर मिलाकर खिलाने से लाभ होगा.
  • पंचम में सूर्य यदि राहु के साथ है तब पितृदोष बनता है. इसके लिए पीपल वृक्ष एवं बड़ वृक्ष का पूजन करना चाहिए.
  • संतान सुख में वृद्धि के लिए वीरवार के दिन चने की दाल, केसर, हल्दी, पीले फूल, पीला वस्त्र दक्षिणा सहित अपने कुल के पुरोहित को दें.
  • मकान में रसोई घर पूर्व दिशा की दीवार की ओर बनाए.

छठे भाव में सूर्य | Sun in Sixth House

  • रविवार के दिन धार्मिक स्थान पर अपनी क्षमतानुसार दान करें.
  • अपने घर के पवित्र स्थान पर चांदी की डिब्बी में गंगाजल भरकर रखें इससे सूर्य के शुभ फल बढेगें.
  • पूर्णमासी के दिन लक्ष्मी नारायण मंदिर में चावल, दूध, चीनी, चांदी, सफेद मोती और नारियल आदि चढ़ाएँ और खीर का प्रसाद कन्याओं में बांटे.

सातवें भाव में सूर्य | Sun in Seventh House

  • काले रंग की गाय की सेवा करें.
  • तांबे के सात चौरस सिक्के जमीन में गाड़ना शुभ होगा.
  • नियमित रुप से पूर्णमासी का व्रत रखें और कोई भी महत्वपूर्ण काम करने से पहले पानी अवश्य पीएं.

आठवें भाव में सूर्य | Sun in Eighth House

  • शुक्लपक्ष के रविवार से 800 ग्राम गेहूँ और 800 ग्राम गुड़ मंदिर में चढ़ाएँ. ये लगातार 8 रविवार करें.
  • पिता और बड़े भाई की आज्ञा का पालन करें. लाल रंग की गाय की सेवा करें.
  • दक्षिणी दिशा की ओर मकान का  मुख्य द्वार ना बनाएं.

नवम भाव में सूर्य | Sun in Ninth House

  • मंदिर या किसी धार्मिक स्थान में चावल, चांदी और दूध आदि सफेद वस्तुओं का दान दे.
  • चितकबरे रंग की गाय को मीठी रोती खिलाना शुभ होगा.
  • घर में रखे पीतल और चांदी के बर्तनों में चावल भरकर रखें और उन्हें खाली ना रहने दें.
  • आप जिस बेड पर सोते हैं या जिस चारपाई पर सोते हैं उसके पायो में तांबे की कील लगाएँ.

दशम भाव में सूर्य | Sun in Tenth House

  • बहते पानी में तांबे का सिक्का डालें. तथा गाय की सेवा करें.
  • सफेद या शर्बती रंग की पगड़ी या टोपी पहने तथा महिलाओं को सिर ढककर रहना शुभ होगा.
  • धार्मिक स्थान पर हैण्ड पम्प या प्याऊ लगाना शुभ होगा.
  • काले तथा नीले रंग के वस्त्रों का परहेज करें.

एकादश भाव में सूर्य | Sun in Eleventh House

  • शनिवार की रात में 5 मूलियाँ सिरहाने रखकर सोएं और अगले दिन सुबह धार्मिक स्थल पर दान दे दे.
  • तांबे के बर्तन में गेहूँ भरकर धार्मिक स्थान में दान करें. चालचलन शुद्ध रखें.
  • रविवार का व्रत रखें. अपने जन्मदिन से शुरु करके लगातार 43 दिन तक जमीन पर सोएँ.

द्वादश भाव में फल | Sun in Twelfth House

  • रविवार के दिन बंदरों को गुड़, चने और भुनी हुई कनक खिलाएं. अंध विद्यालय में भोजन कराएँ और भोजन में मीठी वस्तु भी दें.
  • भूरे रंग की गाय को मीठी रोती खिलाएं.
  • स्वयं सदचरित्र का पालन करें. 
Posted in Rashi, Signs, Vedic Astrology, Yoga | Tagged , , , , | 3 Comments

भ्रामरी योगिनी दशा | Bhramari Yogini Dasha

भ्रामरी दशा योगिनि दशा में चौथे स्थान पर आती है. यह मंगल की दशा होती है. मंगल से प्रभावित इस दशा में व्यक्ति के भीतर पराक्रम एवं परिश्रम द्वारा समाज में अपना स्थान अर्जित करने की कोशिश में प्रयासरत रहता है. यह दशा व्यक्ति को भटकाव की स्थिति भी अधिक देती है. व्यक्ति कार्य व व्यर्थ कामों की वजह से भ्रमण में लगा रहता है. परिवार से दूर निर्थक भटकाव की स्थिति का उसे सामना करना पड़ता है.

मंगल अग्नि तत्व एवं क्रूर ग्रह होने से व्यक्ति के भीतर भी इन गुणों को देखा जा सकता है. इस कारण उसमें क्रोद्ध एवं आक्रामक व्यवहार का आगमन हो सकता है. बात बत पर बहस या जिद्दीपन आ सकता है. यह दशा व्यक्ति को मान हानि, पदभंग जैसी स्थिति में खडा़ कर सकती है. कार्य में स्थानांतरण या न चाहते हुए भी स्थान से अलग होना पड़ सकता है. जातक अपनी समझदारी से अपने साहस एवं कौशल द्वारा अपनी प्रतिष्ठा को बचाने के प्रयास में लगा रहता है.

यदि जातक शांत एवं सूझबूझ से काम ले तो वह सरकार से सम्मान एवं अपनी सफलता को सुनिश्चित कर सकता है. कुछ विद्वानों के अनुसार भ्रामरी दशा घर परिवर के सुख में कमी करने वाली होती है. लेकिन मेहनत एवं कडे़ संघर्ष द्वारा व्यक्ति धनी मानी व्यक्तियों की कृपा से लाभ प्राप्त करने में काफी हद तक सफल होता है. यदि जातक धैर्य व संतुलन से काम ले तो वह उचित फलों को पाने में सफल भी होता है.

मंगला दशा में व्यक्ति के कई मांगलिक कार्य भी संपन्न हो सकते हैं इस दौरान व्यक्ति अपने नए संबंधों की ओर झुकाव महसूस कर सकता है. जातक में जल्दबाजी बहुत हो सकती है. बिना सोचे समझे कुछ अनचाहे फैसले भी वह ले सकता है, जिस कारण उसे परेशानियों का सामना भी करना पडे़. ऎसे समय में चाहिए की वह अपनी सोच को विस्तृत करे ओर सभी पहलुओं पर विचार करते हुए किसी फैसले पर पहुंचे. ऎसा करने से वह अपनी कई परेशानियों पर काबू पाने में सफल हो सकता है और दशा के फलों को सहने योग्य स्वयं को बना सकता है.

व्यक्ति की कुण्डली के योग दशाओं में जाकर फल देते है. किसी व्यक्ति की कुण्डली में अगर अनेक योग बन रहे हैं लेकिन फिर भी वह व्यक्ति साधारण सा जीवन व्यतीत कर रहा है. तो समझ जाना चाहिए. की उस व्यक्ति को योगों से जुडे ग्रहों की दशाएं अभी तक नहीं मिली है. यदि व्यक्ति को उचित दशाएं सही समय पर मिल जाती है यो उस व्यक्ति को जीवन में सरलता से सफलता के दर्शन हो जाते है. क्योकी यह दशाओं का ही खेल है की व्यक्ति फल प्रदान करने में सहायक होता है.

भ्रामरी योगिनी दशा में अन्य दशाओं का फल

  • भ्रामरी योगिनी दशा में पहली अंतर दशा भ्रामरी की ही होती है. इस दशा समय के दौरान व्यक्ति के लिए समय काफी कठिन रहता है. व्यक्ति को किसी न किसी कारण से भय बना रहता है. व्यक्ति को प्रोपर्टी से संबंधित परेशानी झेलनी पड़ती है.
  • भ्रामरी में भद्रिका की अंतरदशा आने पर यात्राओं का योग बनता है. दोस्तों के साथ मिलकर कुछ नए काम किए जाते हैं. राज्य की ओर से लाभ मिलेगा.
  • भ्रामरी में उल्का की अंतरदशा आने पर व्यक्ति को स्वास्थ्य से संबंधित परेशानियां झेलनी पड़ती हैं. अपने सगे संबंधियों को कष्ट होता है.
  • भ्रामरी में सिद्धा दशा आने पर लम्बी चली आ रही परेशानियों से मुक्ति मिल सकती है. रुके हुए काम आगे बढ़ते हैं. किसी पुराने रोग से मुक्ति भी इस दशा के दौरान मिल सकती है.
  • भ्रामरी में संकटा दशा का होना मारक का कार्य करता है. व्यक्ति को अचानक से किसी दुर्घटना या अप्रिय समाचार सुनना पड़ सकता है.
  • भ्रामरी में मंगला दशा का आरंभ राज्य की ओर से सुख देने वाला होगा. मान सम्मान बढ़ेगा. नौकरी में बदलाव और पद प्राप्ति हो सकती है.
  • भ्रामरी दशा में पिंगला की अंतरदशा हो तो हाथ पैरों और मुख के रोगों में वृद्धि हो सकती है. पशुओं एवं वाहन से भय बना रहता है. अचानक से कोई दुर्घटना होने की संभावना भी अधिक रहती है.
  • भ्रामरी दशा में धान्या अंतरदशा का होना रोगों से मुक्ति दिलाने वाला होता है. व्यक्ति को धीरे धीरे वस्तुओं की प्राप्ति होती है. सुख और संपन्नता का जीवन भी मिलता है. अपने वरिष्ठ लोगों से स्नेह भी मिलता है.
  • Posted in Ascendant, Basic Astrology, Planets, Vedic Astrology | Tagged , , , , | 2 Comments

    पंचतत्वों का महत्व | Significance of Five Elements Of Nature

    प्राचीन समय से ही विद्वानों का मत रहा है कि इस सृष्टि की संरचना पांच तत्वों से मिलकर हुई है. सृष्टि में इन पंचतत्वों का संतुलन बना हुआ है. यदि यह संतुलन बिगड़ गया तो यह प्रलयकारी हो सकता है. जैसे यदि प्राकृतिक रुप से जलतत्व की मात्रा अधिक हो जाती है तो पृथ्वी पर चारों ओर जल ही जल हो सकता है अथवा बाढ़ आदि का प्रकोप अत्यधिक हो सकता है. आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को पंचतत्व का नाम दिया गया है.

    माना जाता है कि मानव शरीर भी इन्हीं पंचतत्वों से मिलकर बना है. वास्तविकता में यह पंचतत्व मानव की पांच इन्द्रियों से संबंधित है. जीभ, नाक, कान, त्वचा और आँखें हमारी पांच इन्द्रियों का काम करती है. इन पंचतत्वों को पंचमहाभूत भी कहा गया है. इन पांचो तत्वों के स्वामी ग्रह, कारकत्व, अधिकार क्षेत्र आदि भी निर्धारित किए गये हैं. आइए इनके विषय में जानने का प्रयास करें.

    आकाश | The Space

    आकाश तत्व का स्वामी ग्रह गुरु है. आकाश एक ऎसा क्षेत्र है जिसका कोई सीमा नहीं है. पृथ्वी के साथ्-साथ समूचा ब्रह्मांड इस तत्व का कारकत्व शब्द है. इसके अधिकार क्षेत्र में आशा तथा उत्साह आदि आते हैं. वात तथा कफ इसकी धातु हैं.

    वास्तु शास्त्र में आकाश शब्द का अर्थ रिक्त स्थान माना गया है. आकाश का विशेष गुण “शब्द” है और इस शब्द का संबंध हमारे कानों से है. कानों से हम सुनते हैं और आकाश का स्वामी ग्रह गुरु है इसलिए ज्योतिष शास्त्र में भी श्रवण शक्ति का कारक गुरु को ही माना गया है. शब्द जब हमारे कानों तक पहुंचते है तभी उनका कुछ अर्थ निकलता है. वेद तथा पुराणों में शब्द, अक्षर तथा नाद को ब्रह्म रुप माना गया है. वास्तव में आकाश में होने वाली गतिविधियों से गुरुत्वाकर्षण, प्रकाश, ऊष्मा, चुंबकीय़ क्षेत्र और प्रभाव तरंगों में परिवर्तन होता है. इस परिवर्तन का प्रभाव मानव जीवन पर भी पड़ता है. इसलिए आकाश कहें या अवकाश कहें या रिक्त स्थान कहें, हमें इसके महत्व को कभी नहीं भूलना चाहिए. आकाश का देवता भगवान शिवजी को माना गया है.

    वायु | The Air

    वायु तत्व के स्वामी ग्रह शनि हैं. इस तत्व का कारकत्व स्पर्श है. इसके अधिकार क्षेत्र में श्वांस क्रिया आती है. वात इस तत्व की धातु है. यह धरती चारों ओर से वायु से घिरी हुई है. संभव है कि वायु अथवा वात का आवरण ही बाद में वातावरण कहलाया हो. वायु में मानव को जीवित रखने वाली आक्सीजन गैस मौजूद होती है. जीने और जलने के लिए आक्सीजन बहुत जरुरी है. इसके बिना मानव जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. यदि हमारे मस्तिष्क तक आक्सीजन पूरी तरह से नहीं पहुंच पाई तो हमारी बहुत सी कोशिकाएँ नष्ट हो सकती हैं. व्यक्ति अपंग अथवा बुद्धि से जड़ हो सकता है.

    प्राचीन समय से ही विद्वानों ने वायु के दो गुण माने हैं. वह है – शब्द तथा स्पर्श. स्पर्श का संबंध त्वचा से माना गया है. संवेदनशील नाड़ी तंत्र और मनुष्य की चेतना श्वांस प्रक्रिया से जुड़ी है और इसका आधार वायु है. वायु के देवता भगवान विष्णु माने गये हैं.

    अग्नि | The Fire

    सूर्य तथा मंगल अग्नि प्रधान ग्रह होने से अग्नि तत्व के स्वामी ग्रह माने गए हैं. अग्नि का कारकत्व रुप है. इसका अधिकार क्षेत्र जीवन शक्ति है. इस तत्व की धातु पित्त है. हम्सभी जानते हैं कि सूर्य की अग्नि से ही धरती पर जीवन संभव है. यदि सूर्य नहीं होगा तो चारों ओर सिवाय अंधकार के कुछ नहीं होगा और मानव जीवन की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती है. सूर्य पर जलने वाली अग्नि सभी ग्रहों को ऊर्जा तथा प्रकाश देती है. इसी अग्नि के प्रभाव से पृथ्वी पर रहने वाले जीवों के जीवन के अनुकूल परिस्थितियाँ बनती हैं. शब्द तथा स्पर्श के साथ रुप को भी अग्नि का गुण माना जाता है. रुप का संबंध नेत्रों से माना गया है. ऊर्जा का मुख्य स्त्रोत अग्नि तत्व है. सभी प्रकार की ऊर्जा चाहे वह सौर ऊर्जा हो या आणविक ऊर्जा हो या ऊष्मा ऊर्जा हो सभी का आधार अग्नि ही है. अग्नि के देवता सूर्य अथवा अग्नि को ही माना गया है.

    जल | The Water

    चंद्र तथा शुक्र दोनों को ही जलतत्व ग्रह माना गया है. इसलिए जल तत्व के स्वामी ग्रह चंद्र तथा शुक्र दोनो ही हैं. इस तत्व का कारकत्व रस को माना गया है. इन दोनों का अधिकार रुधिर अथवा रक्त पर माना गया है क्योंकि जल तरल होता है और रक्त भी तरल होता है. कफ धातु इस तत्व के अन्तर्गत आती है.

    विद्वानों ने जल के चार गुण शब्द, स्पर्श, रुप तथा रस माने हैं. यहाँ रस का अर्थ स्वाद से है. स्वाद या रस का संबंध हमारी जीभ से है. पृथ्वी पर मौजूद सभी प्रकार के जल स्त्रोत जल तत्व के अधीन आते हैं. जल के बिना जीवन संभ्हव नहीं है. जल तथा जल की तरंगों का उपयोग विद्युत ऊर्जा के उत्पादन में किया जाता है. हम यह भी भली-भाँति जानते हैं कि विश्व की सभी सभ्यताएँ नदियों के किनारे ही विकसित हुई हैं. जल के देवता वरुण तथा इन्द्र को माना गया है. मतान्तर से ब्रह्मा जी को भी जल का देवता माना गया है.

    पृथ्वी | The Earth

    पृथ्वी का स्वामी ग्रह बुध है. इस तत्व का कारकत्व गंध है. इस तत्व के अधिकार क्षेत्र में हड्डी तथा माँस आता है. इस तत्व के अन्तर्गत आने वाली धातु वात, पित्त तथा कफ तीनों ही आती हैं. विद्वानों के मतानुसार पृथ्वी एक विशालकाय चुंबक है. इस चुंबक का दक्षिणी सिरा भौगोलिक उत्तरी ध्रुव में स्थित है. संभव है इसी कारण दिशा सूचक चुंबक का उत्तरी ध्रुव सदा उत्तर दिशा का ही संकेत देता है.

    पृथ्वी के इसी चुंबकीय गुण का उपयोग वास्तु शास्त्र में अधिक होता है. इस चुंबक का उपयोग वास्तु में भूमि पर दबाव के लिए किया जाता है. वास्तु शास्त्र में दक्षिण दिशा में भार बढ़ाने पर अधिक बल दिया जाता है. हो सकता है इसी कारण दक्षिण दिशा की ओर सिर करके सोना स्वास्थ्य के लिए अच्छा माना गया है. यदि इस बात को धर्म से जोड़ा जाए तो कहा जाता है कि दक्षिण दिशा की ओर पैर करके ना सोएं क्योंकि दक्षिण में यमराज का वास होता है.

    पृथ्वी अथवा भूमि के पाँच गुण शब्द, स्पर्श, रुप, स्वाद तथा आकार माने गए हैं. आकार तथा भार के साथ गंध भी पृथ्वी का विशिष्ट गुण है क्योंकि इसका संबंध नासिका की घ्राण शक्ति से है.

    उपरोक्त विश्लेषण से यह निष्कर्ष निकलता है कि पंचतत्व मानव जीवन को अत्यधिक प्रभावित करते हैं. उनके बिना मानव तो क्या धरती पर रहने वाले किसी भी जीव के जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती है. इन पांच तत्वों का प्रभाव मानव के कर्म, प्रारब्ध, भाग्य तथा आचरण पर भी पूरा पड़ता है. जल यदि सुख प्रदान करता है तो संबंधों की ऊष्मा सुख को बढ़ाने का काम करती है और वायु शरीर में प्राण वायु बनकर घूमती है. आकाश महत्वाकांक्षा जगाता है तो पृथ्वी सहनशीलता व यथार्थ का पाठ सिखाती है. यदि देह में अग्नि तत्व बढ़ता है तो जल्की मात्रा बढ़ाने से उसे संतुलित किया जा सकता है. यदि वायु दोष है तो आकाश तत्व को बढ़ाने से यह संतुलित रहेगें.

    Posted in Vedic Astrology | Tagged , , , , | 1 Comment

    श्रीयंत्र की चमत्कारिक शक्तियां खोल देती हैं सुख समृद्धि का द्वार

    आधुनिक समय में इस भाग दौड़ और चमक की दुनिया में हर कोई व्यक्ति अमीर बनना चाहता है. इसके लिए वह ना जाने कैसे कैसे हथकंडे भी आजमाने की कोशिश करता है. कई बार तो मनुष्य अपनी अंदर केभले मानुष को रौंदते हुए आगे बढ़ता है.

    यदि कोई व्यक्ति अपनी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करना चाहता है तब पूजा पाठ तथा अपने सदव्यवहार के माध्यम से काफी हद तक सफलता हासिल की जा सकती है.

    सभी जानते हैं कि भारत में प्राचीन समय से ही देवी देवताओं की पूजा का प्रचलन चला आ रहा है. सभी का अपना विशिष्ट महत्व है. देवताओं की पूजा करने के अनेकों विधान प्राचीन ग्रंथों में पाए जाते हैं. उनमें सेएक यंत्रों की पूजा करने का भी विधान है. हर अवसर तथा देवों के यंत्रों का जिक्र पौराणिक इतिहास में मिलता है लेकिन सभी यंत्रों में सर्वोपरि “श्रीयंत्र” को माना गया है. प्राचीन सभी यंत्रों में यह श्रीयंत्र सर्वाधिकलोकप्रिय है.

    श्रीयंत्र की अधिष्ठात्री देवी | Goddess of Shri Yantra

    श्रीयंत्र की अधिष्ठात्री देवी महात्रिपुर सुंदरी (षोडशी देवी) हैं. श्रीयंत्र के रुप में इन्हीं की पूजा की जाती है. इस यंत्र की पूजा से व्यक्ति को मोक्ष तथा भोग दोनों की ही प्राप्ति होती है. इस यंत्र की उपासना यदिभक्तजन पूर्ण श्रद्धा से करते हैं तब उन्हें आर्थिक रुप से भी लाभ मिलता है. इस यंत्र की पूजा, भगवान शिव की अर्धांगिनी महालक्ष्मी के रुप में भी की जाती है. इनकी पूजा से विशेष प्रकार के भौतिक सुखों कीप्राप्ति होती है.

    माना गया है कि श्रीयंत्र की दक्षिणाम्नाय उपासना करने वाले व्यक्ति को भोग की प्राप्ति होती है और ऊर्ध्वाम्नाय उपासना करने वालों को मोक्ष की प्राप्ति होती है. इसलिए कहा जा सकता है कि यह श्रीयंत्र मोक्ष तथा मुक्ति के लिए भी लाभ प्रदान करता है. मूल रुप से यह श्रीयंत्र पार्वती अर्थात अंबिका हैं.

    श्रीयंत्र की पूजन विधि | Rituals to Worship Shri Yantra

    श्रीयंत्र को व्यक्ति अपनी सामर्थ्यानुसार कहीं भी बनवा सकते हैं. जैसे भोजपत्र, ताम्रपत्र, रजतपत्र अथवा स्वर्णपत्र बनवाया जा सकता है. इस यंत्र के समक्ष भक्तजनों को श्रीसूक्त का पाठ करना चाहिए. इससे उन्हें आर्थिक लाभ होगा. कनकधारा स्तोत्र का पाठ भी किया जा सकता है. जिन व्यक्तियों को नौकरी अथवा बिजनेस में परेशानियों का सामना करना पड़ रहा हो उन्हें इस यंत्र की पूजा करने से संकटों से निकलने का मार्ग दिखाई दे सकता है.

    श्रीयंत्र का निर्माण अथवा घर के पूजा स्थान में इसकी स्थापना गुरु योग, रवि पुष्य योग, नवरात्र. धनतेरस, दीपावली, बसंत पंचमी अथवा पौष माह की संक्रांति में की जानी चाहिए. इस यंत्र को शुभ मुहूर्त्त में बाजार से भी खरीदा जा सकता है.

    श्रीयंत्र को बनवाने के बाद शुभ समय में इसका पूजन आरंभ करना चाहिए और उसके बाद नियमित रुप से इसकी पूजा करनी चाहिए. सबसे पहले व्यक्ति को स्नान आदि करके स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए और पूर्व अथवा उत्तर की ओर मुख करके स्वच्छ आसन पर बैठना चाहिए. अब श्रीयंत्र को पंचामृ्त अर्थात कच्चा दूध, दही, शहद, शुद्ध घी तथा गंगाजल से स्नान कराना चाहिए.  इसके बाद ईशान कोण में एक आसन पर लाल वस्त्र बिछाकर उस पर श्रीयंत्र को स्थापित करना चाहिए. अब यंत्र की पूजा करनी चाहिए. श्रीसूक्त, कनकधारा या दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जा सकता है. श्रीयंत्र की प्राण प्रतिष्ठा के लिए निम्नलिखित मंत्र का 21 माला जप करना चाहिए. मंत्र है:-

    “ऊँ श्रीं ह्रीं श्रीं नम्:”

    “ऊँ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ऊँ महा लक्ष्म्यै नम्:”

    यह उपरोक्त मंत्र श्रीयंत्र का मूलमंत्र है. अपनी किसी भी अभीष्ट सिधि के लिए इस मंत्र की एक माला का जाप प्रतिदिन करना चाहिए.

    श्रीयंत्र के सामने शुद्ध घी का दीया जलाकर लक्ष्मी जी के मंत्रों का जाप करना चाहिए. इसे कोई भी मनुष्य अपने आफिस अथवा घर में विधिपूर्वक स्थापित कर सकता है.

    श्रीयंत्र को कई व्यक्ति रेखागणित की एक जटिल आकृति से अधिक कुछ नही समझते हैं. इस जटिल तथा गूढ़ यंत्र के रहस्य को समझने के लिए आदि शंकराचार्य द्वारा रचित “सौंदर्य लहरी” आदि ग्रंथ का अध्ययन अवश्य करना चाहिए. यदि ध्यान से देखा जाए तो इस आकृति में दो त्रिकोण बने हुए हैं. एक भगवान शिव का रुप है तो दूसरा शक्ति का रुप है. दोनों ही एक-दूसरे के पूरक माने जाते हैं. इस प्रकार एक श्रीयंत्र की पूजा से मनुष्य दोनों को ही पाने की क्षमता रखता है. इसलिए विभिन्न प्रकार की कामनाओं की सिद्धि के लिए श्रीयंत्र की पूजा की जाती है. इस यंत्र को कामधेनु गाय के समान माना गया है जो सभी इच्छाओं की पूर्ति करती है. जो व्यक्ति इस यंत्र की नियमित रुप से पूजा करता है वह एक प्रकार से तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं का पूजन करता है क्योंकि इस यंत्र में इन सभी का वास माना गया है.

    वास्तु शास्त्र में भी इस श्रीयंत्र का अत्यधिक महत्व है. जिस घर में कलह रहता है या दांपत्य जीवन अच्छा नहीं है या आर्थिक परेशानियों के कारण घर का वातावरण दूषित रहता है तब इस श्रीयंत्र की स्थापना घर के पूजा घर में अवश्य करनी चाहिए. वास्तु शास्त्र के नियमानुसार इस यंत्र की स्थापना से सुख, समृद्धि, मान, यश, धन आदि की प्राप्ति होती है.

    श्रीयंत्र से जुड़ी कथा | Shri Yantra Methodology

    श्रीयंत्र के विषय में अनेकों कथाएँ मिलती है. जिनमें एक कथा देवी लक्ष्मी के रुष्ट होने की भी है. एक अन्य कथा के अनुसार आदि शंकराचार्यजी ने भगवान शिव को अपनी कठिन तपस्या से प्रसन्न किया. भगवान शिव ने उन्हें वर माँगने को कहा. इस पर शंकराचार्य जी ने विश्व का कल्याण करने के बारे में पूछा तब शिव भगवान लक्ष्मी स्वरुप श्रीयंत्र की महिमा के बारे में बताते हैं. वह कहते हैं कि इस श्रीयंत्र के पूजन से मनुष्य का पूर्ण रुप से कल्याण होगा. भगवान शिव ने बताया कि यह त्रिपुर सुंदरी का आराधना स्थल है. श्रीयंत्र में बना चक्र ही देवी का निवास स्थान है और उनका रथ भी यहीं है. इस यंत्र में देवी स्वयं विराजती हैं. तभी से इस श्रीयंत्र की पूजा का विधान चला आ रहा है.

    श्रीयंत्र को सिद्ध करने के लिए वैशाख, ज्येष्ठ, कार्तिक, माघ आदि चांद्र मासों को उत्तम माना गया है. जो व्यक्ति दीपावली की रात्रि में इस यंत्र को सिद्ध करता है वह पूरे साल आर्थिक रुप से संपन्न रहता है.

    Posted in Remedies, Yantra, Yoga | Tagged , , , , | Leave a comment

    धान्या योगिनी दशा | Dhanya Yogini Dasha

    धान्या दशा योगिनी दशाओं में तीसरे स्थान पर आती है. इसका संबंध गुरू से है और इसके स्वामी भी वही हैं. इसकी समय अवधि 3 वर्ष की मानी गई है. धान्या संबंध गुरू से होने के कारण यह दशा शुभता देने वाली कही गई है. धान्या दशा का संबंध शुभ ग्रह से होने के कारण यह जातक को उन्नति और उत्थान देने वाली होती है और व्यक्ति को सुख व धर्मप्रगति के मार्ग में ले जाने वाली होती है.

    धान्या दशा की अवधी काल में विकास की ओर उन्मुख होकर जातक शुभ कर्मों को करने वाला होता है. यह दशा जातक को काफी कुछ सोचने का समय देती है जो व्यक्ति अपने गलत कामों से दूर होकर खुद को सही दिशा की ओर ले जाने का प्रयास करता है. यह दहा व्यक्ति सही और गलत के मध्य भेद करने के बारे में ज्ञान देती है और जीवन में आने वाली परेशानियों को आशावादी दृष्टिकोण से सुलझाने का रूख प्रदान करने वाली होती है.

    असंभव कार्यों को पूर्ण करते हुए यश और सम्मान की प्राप्ति होती है. साथियों का मनोबल बढा़ने वाला होता है जातक दूरदृष्टि से अपने कार्यों को उचित प्रकार से निर्वाह करने का प्रयास करता है. इसके प्रभाव स्वरुप जातक अधिकांशत: जोखिम उठाकर भी सफलता प्राप्त करता है. विपत्ति के समय उसकी विशेष क्षमता को देखा जा सकता है.

    इस दशा में व्यक्ति को धन-मान-सम्मान की प्राप्ति होती है. इस समय में व्यक्ति विद्या या किसी शिक्षा की ओर अपना रूझान पाता है. शिक्षा में योग्यता स्पष्ट झलकती है. अपनी योग्यता का परिचय उसके अन्य लोगों के समक्ष भी दिखाई पड़ता है. अपने ज्ञान की बदोलत समान पाता है. समाज में सम्मानित व्यक्तियों से मुलाकात व संबंधों में इजाफा होता है.

    गुरू धर्म और आध्यात्म के कारक होने के कारण जातक पर भी इन्हीं का प्रभाव नजर आता है. जातक देववाचन, उपदेशक व शास्त्रगत वक्ता बनता है. उपासना और तीर्थाटन से कार्य प्रसिद्धि पाने में सफल होता है. धर्म के मार्ग पर चलने की चाह रखने की प्रवृत्ति बलवती होती है. व्यक्ति राजा व सरकार से सम्मान को पाता है. विद्वान लोगों का साथ मिलता है और उनसे बहुत कुछ सिखने को भी मिलता है.

    कुछ विद्वान धान्या दशा को धन धान्य की वृद्धि करने वाली दशा बताते हैं. यह दशा स्वास्थ्य समान सदगुणों में वृद्धि करने वाली और परस्पर सहयोग को बढा़कर सुखी बनाती है. सर्व प्रथम योगिनी दशा का स्वामी जिस भाव व राशि में स्थित है उनके संयुक्त फलों में उनके नक्षत्र स्वामी का प्रभाव भी शामिल रखता है. जिस भाव में स्थित होते हैं, उस भाव के स्वामी की तरह अपना प्रभाव व्यक्त करते हैं. ज्ञान का प्रतीक यह ग्रह देवताओं का गुरु है.

    धान्या दशा में बृहस्‍पति को लेकर व्‍यक्ति की शैक्षणिक योग्‍यता, धार्मिक चिंतन, आध्‍यात्मिक ऊर्जा, नेतृत्‍व शक्ति, राजनैतिक योग्‍यता, संतति, पुरोहित्‍य, ज्‍योतिष तंत्र-मंत्र एवं तप तस्‍या,वंशवृद्धि, विरासत, परंपरा, आचार व्‍यवहार, सभ्‍यता, पद-प्रतिष्‍ठा, में सिद्धि का पता चलता है. व्यक्ति को अदभुत दैवी शक्ति प्रदान करने में सहायक होता है. जो कार्य अन्य लोगों के सामर्थ्य में नहीं होता वह कार्य इससे प्रभावित जातक करने में सहयक होता है.

    Posted in Ascendant, Basic Astrology, Dashas, Vedic Astrology | Tagged , , , , | Leave a comment

    आदित्य हृदयम स्त्रोत- सूर्य के शुभ फल पाने का अचूक उपाय

    ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्।
    रावणं चाग्रतो दृष्टवा युद्धाय समुपस्थितम्।1।

    दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्।
    उपगम्याब्रवीद् राममगरत्यो भगवांस्तदा।2।

    राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्यं सनातनम्।
    येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसे।3।

    आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्।
    जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम्।4।

    सर्वमंगलमांगल्यं सर्वपापप्रणाशनम्।
    चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वधैनमुत्तमम्।5।

    रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्।
    पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्।6।

    सर्वदेवतामको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः।
    एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः।7।

    एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः।
    महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः।8।

    पितरो वसवः साध्या अश्विनौ मरुतो मनुः।
    वायुर्वन्हिः प्रजाः प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः।9।

    आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गर्भास्तिमान्।
    सुवर्णसदृशो भानुहिरण्यरेता दिवाकरः।10।

    हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान्।
    तिमिरोन्मथनः शम्भूस्त्ष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान्।11।

    हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनोऽहरकरो रविः।
    अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शंखः शिशिरनाशनः।12।

    व्योमनाथस्तमोभेदी ऋम्यजुःसामपारगः।
    घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः।13।

    आतपी मण्डली मृत्युः पिंगलः सर्वतापनः।
    कविर्विश्वो महातेजा रक्तः सर्वभवोदभवः।14।

    नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः।
    तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते।15।

    नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः।
    ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः।16।

    जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः।
    नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः।17।

    नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नमः।
    नमः पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते।18।

    तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने।
    कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः।19।

    तप्तचामीकराभाय हस्ये विश्वकर्मणे।
    नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे।20।

    नाशयत्येष वै भूतं तमेव सृजति प्रभुः।
    पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः।21।

    एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः।
    एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्।22।

    देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च।
    यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमप्रभुः।23।

    एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च।
    कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव।24।

    पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम्।
    एतत् त्रिगुणितं जप्तवा युद्धेषु विजयिष्ति।25।

    अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि।
    एवमुक्त्वा ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम्।26।

    एतच्छ्रुत्वा महातेजा, नष्टशोकोऽभवत् तदा।
    धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान्।27।

    आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान्।
    त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्।28।

    रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थे समुपागमत्।
    सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत्।29।

    अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितनाः परमं प्रहृष्यमाणः।
    निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति।30।

    सूर्य मंत्र जाप प्रतिदिन जप करने से सूर्य का बुरा प्रभाव नष्ट हो जाता है. सूर्य मंत्र का प्रयोग सामान्यतया सूर्य के अशुभ प्रभावों को कम करने के लिए किया जाता है. सूर्य मंत्र जातक को सूर्य की सामान्य विशेषताओं से प्राप्त होने वाले लाभ प्रदान करने में सक्षम होता है. इस मंत्र को करने से सरकार अथवा न्यायालयों से जुड़े किसी प्रकार के मामलों का सामना करने का बल मिलता है तथा सरकारी पक्ष से आने वाले निर्णयों को व्यक्ति के पक्ष में कर सकता है. सूर्य की अशुभता के कारण व्यक्ति को सूर्य की सामान्य तथा विशिष्ट विशेषताओं से संबंधित हानी हो सकती है. जिसके निवारण हेतु सूर्य यंत्र को स्थापित करना एक अच्छा उपाय है विशेषकर उस स्थिति में जब सूर्य अशुभ अथवा नकारात्मक रूप से काम कर रहा हो.

    Posted in Mantra, Planets, Remedies, Signs, Yoga | Tagged , , , , | Leave a comment

    पिंगला योगिनी दशा | Pingala Yogini Dasha

    योगिनी दशा क्रम के अगले चरण में पिंगला दशा आती है. पिंगला दशा की समय अवधि 2 वर्ष की मानी गई है. इस समय के अनुसार जातक को पिंगला दशा फलों की प्राप्ति होती है. सूर्य से संबंधित इस दशा में व्यक्ति को कुछ हद तक संघर्ष की स्थिति का सामना करना करना पड़ सकता है और जातक में गुस्से की स्थिति बनी रहती है.

    पिंगला योगिनी दशा में सूर्य का जुडा़व होने से विद्वानों ने इस दशा में देह कष्ट, मनोव्यथा व हृदय रोग जैसी समस्याओं का अनुमोदन किया है. ज्योतिष विद्वानों नें सूर्य को एक क्रूर ग्रह की संज्ञा दी है. इस कारण पिंगला योगिनी दशा में जातक को अनेक प्रकार की सूर्य से संबंधित प्रभावों को भी अपने में देखना मिल जाता है.

    पिंगला दशा में जातक के मन में द्वंद की स्थिति देखी जा सकती है. अनैतिक आचरण और गलत कामों द्वारा धन कमाने की ओर अग्रसर रह सकते हैं. इसी के साथ कुसंगति में होने पर धन का नाश व मान समान की हानि का सामना करना पड़ सकता है. जो व्यक्ति के लिए संताप को बढा़ने वाला हो सकता है.

    पिंगला योगिनी दशा में व्यक्ति अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग रहने की आवश्यकता है. व्यक्ति में पित्त की अधिकता हो सकती है इस कारण पित्त संबंधि रोग और ज्वर या रक्त विकार उभर सकते हैं. व्यक्ति में क्रोद्ध करने की प्रवृत्ति अधिक बढ़ सकती है और शांति से कार्यों को निपटाने की शक्ति क्षिण होने लगती है. जिसके कारण मन अशांत रहने लगता है और शुभत अमें कमी आने लगती है.

    कुछ विद्वान पिंगला दशा का संबंध अग्नि संबंधि दुर्घटनाओं, वरिष्ठ जनों के सहयोग से होने वाले कामों में सफलता मिलना, काम के प्रति रात दिन को एकाकार कर देना, धन की प्राप्ति, भ्रमण इत्यादि से जोड़ते हैं. इसी के साथ साथ व्यापार में तेजी व कुशलता देने वाली दशा, पिला अथवा सुनहरा रंग जो प्रसन्नता में सहयोगी हो,

    कलह-क्लेश से मुक्ति मिलना, किसी प्रभावशाली महिला के सहयोग से उन्नती को पाना, दया व परोपकारित अके कामों में उन्मुख होना तथा अधिकार एवं सत्ता के सुख को पाना भी पिंगला दशा के दौरान हो सकता है. इन दो विचधारों के मध्य पिंगला दशा एक तथ्य को तो अवश्य दर्शाती है कि सूर्य से संबंधित फलों के मिलने की दशा प्रबल होती है इस समय में

    वैदिक ज्योतिष में अनेक दशाओं का वर्णन किया गया हैं  सूर्य आत्मा का, चन्द्रमा मन का, मंगल बल का, बुध बुद्धि का, गुरु जीव का, शुक्र स्त्री का और शनि आयु का कारक है. अत: इनकी महादशाओं का फलादेश देश, काल और परिस्थिति को ध्यान में रखकर करना चाहिए फलादेश में परिस्थिति का ध्यान रखना आवश्यक है.

    जन्म से मृत्यु तक ग्रहों के प्रभाव से विभिन्न प्रकार की सुखद एवं दु:खद घटनाओं से प्रभावित होते है. ग्रह उच्च राशि में हो तो नाम, यश प्राप्त होता है तथा ग्रहों के अशुभ होने पर कष्ट प्राप्त होता है. जन्म नक्षत्र से दशा स्वामी किस नक्षत्र में है ये देखना आवश्यक है. यदि वह अच्छी स्थिति में मित्र या अतिमित्र में है तो शुभ फल प्राप्त होते हैं.

    पिंगला में अन्य दशाओं का अंतर

  • पिंगला में पिंगला दशा का अंतर परेशानी का कारण बनता है. इस समय पर व्यक्ति को किसी बीमारी के चलते डाक्टर के चक्कर अधिक लगाने पड़ सकते हैं.
  • पिंगला दशा में धान्या अंतर दशा का आरंभ अच्छे सकारात्मक परिणाम लाता है. व्यक्ति को नए अवसर मिलते हैं. धनार्जन में वृद्धि होती है. व्यक्ति के रहन-सहन में बदलाव आता है. संतान सुख की प्राप्ति होती है. स्त्री की ओर से सुख और सहायता मिलती है.
  • पिंगला में भ्रामरी दशा का आगमन होना विदेश से लाभ मिलता है. बाहरी लोगों के साथ संपर्क बनते हैं. परिवार की ओर से सुख में कमी आती है. रिश्तों से अलगाव बढ़ता है और व्यक्ति घर से दूर जाने के बारे में अधिक सोचता है.
  • पिंगला में भद्रिका दशा का आना व्यक्ति की मानसिक स्थिति में बदलाव लाने वाला होता है. इस समय व्यक्ति के कार्य बनते हैं ओर उसे अपनी योजनाओं में गति मिलती है. वह अपने आर्थिक नुक्सान की इस समय भरपाई कर सकने में भी सक्षम होता है. व्यक्ति का स्थान परिवर्तन भी होता है. अपने काम से लाभ पाता है. पुत्र की ओर से सुख मिलता है.
  • पिंगला में उल्का दशा का अंतर होने पर कष्टों में वृद्धि होती है. मंत्र की प्राप्ति होती है. अपने संबंधियों के साथ विरोध बढ़ने लगता है. सामाजिक क्षेत्र में अलगाव दिखाई देता है. इस समय व्यक्ति को कोई नया काम शुरु करने से बचना चाहिए.
  • पिंगला दशा में सिद्धा दशा का आरंभ आध्यात्मिक रुप से व्यक्ति को आकर्षित करता है. व्यक्ति का मन पूजा पाठ मंत्र सिद्धि प्राप्ति के लिए भी उत्सुक रहता है. धन धान्य प्राप्त होता है. त्रिदोष(वात-पित्त-कफ) से संबंधित रोग बढ़ सकते हैं.
  • Posted in Ascendant, Dashas, Vedic Astrology | Tagged , , , , | Leave a comment

    राहु-केतु का फल कथन | Results of Rahu-Ketu | Shadow Planets

    राहु केतु का फलकथन छाया ग्रह के रूप में किया जाता है. राहु एवं केतु आकाशीय पिंड नहीं हैं यह चंद्रमा तथा क्रांतिवृत्त के कटाव बिंदु हैं. पाश्चात्य ज्योतिष शास्त्र में राहु को नार्थ नोड ऑफ द मून कहा जाता है. केतु की स्थिति इस बिंदु के ठीक सामने 180 डिग्री पर मानी जाती है और इस कारण से कुण्डली में केतु की स्थिति राहु से सप्तम भाव में दर्शायी जाती है. राहु की महादशा अठारह वर्ष और केतु कि सात वर्ष होती है इसलिए हम कह सकते हैं कि जातक की आयु के पच्चीस साल राहु व केतु के आधिपत्य में रहते हैं. इसके अतिरिक्त अन्य ग्रहों की महादशाओं के अंतर्गत राहु-केतु की अंतर व प्रत्यंतर भी आती है.

    राहु- केतु आकस्मिक रूप से फल प्रदान करने की क्षमता रखते हैं. ऋषियों द्वारा राहु – केतु से संबंधित फल कथन के लिए कुछ बातों को ध्यान में रखा गया जैसे कि लग्न से राहु- केतु की स्थिति है और जहां वह स्थित हो उस भाव में कौन सी राशि पड़ रही है क्योंकि राहु- केतु की स्थिति को कुछ भावों व राशियों के लिए शुभ माना जाता है तो कुछ में अशुभ कहा गया है. राहु – केतु से प्राप्त होने वाले फलों में इन सभी का महत्वपूर्ण प्रभाव होता है. राहु-केतु किस भाव में और किस राशि में स्थित हैं फलकथन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है.

    इसी के साथ यह बात भी ध्यान रखने योग्य होती है कि यह किन ग्रहों से युति और दृष्ट संबंध बना रहे हैं. इन सभी बातों का प्रभाव राहु- केतु द्वारा दिए जाने वाले फलों में घटित होता है. यदि राहु केतु राजयोग कारक हों या योग कारक ग्रहों से इनका संबंध स्थापित हो रहा हो तो ऎसी स्थिति में राहु – केतु शुभ फलों को प्रदान करने वाले बनते हैं. यदि राहु- केतु के राशीश यदि नैसर्गिक रूप से शुभ ग्रह हों या दोनों परस्पर केंद्र में स्थित हों, अपनी उच्च, मूल त्रिकोण, स्वयं की या मित्र राशि में स्थित हों तब भी यह शुभ फलों की प्राप्ति में सहायक होते हैं.

    वहीं दूसरी ओर  यदि राहु – केतु त्रिक भाव या भावेशों से प्रभावित हों नीच या शत्रु राशि में स्थित हो तो अशुभ फलों में वृद्धि करने वाले बनते हैं. राहु – केतु अपने अंशों के अनुसार दूसरे ग्रहों से जितने अधिक निकट होते हैं उतना ही दूसरे के प्रभावों को अपनी दशा के दौरान प्रकट करते हैं. राहु-केतु की युति किन ग्रहों से है और उन ग्रहों को किन भावों का स्वामित्व प्राप्त है तथा उनके नैसर्गिक कारकत्व क्या है तथाराहु – केतु तथा उनसे युति रखने वाले ग्रहों के मान यदि एक समान या अधिक निकट हों तो ग्रहों का प्रभाव राहु-केतु में दिखाई देता है.

    राहु और शनि की युति को कष्टप्रद माना गया है, कुंडली के अन्य ग्रहों से राहु- केतु के परस्पर संबंधों का विश्लेषण भी करना चाहिए क्योंकि राहु-केतु पर पड़ने वाली अन्य ग्रहों दृष्टि भी उनसे संबंधित फलों को प्रभावित करने वाली होती है. राहु-केतु के फलों का और भी अधिक विस्तार पूर्वक विश्लेषण करने के लिए उनकी नवांश में स्थिति का भी अनुमोदन किया जाना चाहिए. नवांश में राहु केतु कि स्थिति, युति और दृष्टि का विश्लेषण जन्मकुंडली की तरह ही किया जाना चाहिए.

    Posted in Planets, Rashi, Signs, Vedic Astrology | Tagged , , , , | Leave a comment