भद्रिका योगिनी दशा | Bhadrika Yogini Dasha

भद्रिका दशा को बुध की दशा के रूप में जाना जाता है इस दशा की कुल अवधि पांच वर्ष की मानी गई है. यह दशा शुभ ग्रह की दशा होती है इसलिए इस दशा में जातक को शुभ फलों की प्राप्ति होती है. यह दशा परिवार में स्नेह एवं प्रेम की वृद्धि करती है. व्यक्ति को अपने लोगों का साथ एवं सहयोग प्राप्त होता है और खुशी की प्राप्ति होती है.

बुध से संबंधित इस दशा में जातक को बुध ग्रह से संबंधित फलों की प्राप्ति होती है. जातक की बुद्धि शुद्ध होती है और उसे सही गलत का भान हो पाता है. बुध बुद्धि, विद्या, वेदांत, धर्म,  ग्रंथ कर्ता, संस्कृत व्याकरण आदि को प्रदान करने वाले होते हैं. इस दशा में जातक का मन भगवान में लगता है. ईश्वर प्रेम पैदा होता है, जातक आध्यात्मिक ऊंचाइयों को छूने वाला होता बनता है. इसी के साथ सभी ग्रहों के लिए गणना का अपना नज़रिया होता है.

बुध ग्रह को मुख्य रूप से वाणी और बुद्धि का कारक कहा गया है अत: जातक अपनी बुद्धि तथा वाणी कौशल से कठिन परिस्थितियों को अपने अनुकूल बना लेने में काफी हद तक सफल हो सकता है. इस अवधि में जातकों की वाणी तथा व्यवहार अनुकूल ही होता है जिसके फलस्वरूप जीवन में लाभ प्राप्त होता है. जातक अपनी बुद्धि कौशल के बल पर अपना काम निकलवा लेना जानता है और लोगों के मध्य सम्मान भी पाता है.

बुध को ज्योतिष में तटस्थ अथवा नपुंसक ग्रह मानता है या स्त्री ग्रह माना जाता है. मनुष्य के शरीर में बुध मुख्य रूप से वायु तत्व का प्रतिनिधित्व करता है. कन्या राशि में स्थित होने से बुध सर्वाधिक बलशाली हो जाते हैं इसमें बुध को उच्चता प्राप्त होती है. इसके अतिरिक्त मिथुन राशि भी इन्हीं की राशि है इसमें स्थित होने से भी इन्हें अधिक बल की प्राप्ति होती है. बुध के मजबूत होने से जातक को वाचाल्य, बुद्धि कौशल एवं व्यवहार का ज्ञान होता है.

दिमागी रूप से गंभीर मसलों को सुलझाने की योग्यता पाता है. कूटनीति से पूर्ण कामों को अंजाम देता है. इसके शुभ फल द्वारा जातक सांसारिक जीवन में सफलता पाता है. नीच का बुध या क्षीण बुध के कारण इसकी दशा में जातक को अनेक कठिनाईयां झेलनी पड़ सकती हैं. पेट, गले या नर्वस तंत्र से संबंधित समस्याओं, त्वचा के रोग, अनिद्रा, मनोवैज्ञानिक रोग जैसी बिमारियों से प्रभावित हो सकता है.

बुध के लिए स्वर्ण का दान तथा हरी वस्तुओं का दान करने से लाभ मिलता है. बुध ग्रह से सम्बन्धित वस्तुओं का दान करने से पीड़ा में कमी आ सकती है. बुध की दशा में सुधार हेतु बुधवार के दिन व्रत रखना चाहिए. गाय बुध की दशा में सुधार के लिए विष्णु सहस्रनाम का जाप भी उत्तम माना जाता है. तुलसी में जल देने से बुध की दशा में सुधार होता है. अनाथों एवं गरीब छात्रों की सहायता करने से लाभ मलता है. बुधवार के दिन गणेशजी के मंदिर में लड्डुओं का भोग लगाना चाहिए. शाराव, अण्डा, मांस का सेवन न करें, जीवन में स्थिरता लाएं, एक जगह टिककर काम करने का प्रयास करना चाहिए.

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तलाक के ज्योतिषीय कारण | Astrological Reasons for Divorce

ज्योतिष में बहुत से योगो का उल्लेख मिलता है. यह सभी योग हमारे ऋषि मुनियो द्वारा हजारो वर्षो पूर्व लिख दिए गए हैं. जब यह सभी योग लिखे गए थे तब से लेकर अब तक समय में बहुत अंतर आ चुका है इसलिए इन योगो को देश, काल, पात्र के अनुसार लगाना चाहिए. यहि एक समझदार और कुशल ज्योतिषी के लक्षण होते हैं. लेकिन एक बात सत्य है कि जो योग पहले होते थे वह अब भी होते हैं केवल उन्हें देखने का नजरिया बदल गया है. जैसे हाथी-घोड़ो की सवारी की जगह कारों ने ले ली है. मंत्री पद की जगह उच्च सरकारी पदो ने ले लिया है. बहु-विवाह का स्थान अब एक से अधिक शारीरिक संबंधो ने ले लिया है.

इसी तरह से पहले भी दाम्पत्य जीवन में परेशानियाँ होती थी और पति-पत्नी अलग-अलग कारणो से एक-दूसरे से अलग रहते थे. जैसे कि भगवान राम को कई कारणो से माता सीता से अलग रहना पड़ा. द्रौपदी को भी बहुत समय अपने पतियो से अलग रहना पड़ा था. रोजगार के सिलसिले में भी पतियो को अपनी पत्नी से कई सालो तक दूर रहना पड़ता था. अब यातायात के साधन और अन्य सुविधाएँ इतनी है कि सारा संसार सिमट कर रह गया है. ऎसे में यदि कुण्डली में वैवाहिक जीवन पीड़ित नजर आ रहा है तब उस व्यक्ति को फलों का भुगतान तो करना ही पड़ता है. व्यक्ति को अपने जीवनसाथी से दूर रहना ही पड़ता है चाहे उसके लिए कुछ भी कारण बनें.

जन्म कुण्डली में विवाह के आंकलन के लिए सप्तम भाव को मुख्य भाव माना जाता है. जब सप्तम भाव पर पाप ग्रहो का प्रभाव होता है तब दाम्पत्य जीवन में परेशानियो का सामना करना पड़ता है. इसी तरह से यदि सप्तमेश पर पाप ग्रहों का प्रभाव ज्यादा होता है तब भी दाम्पत्य जीवन में बाधाओं का सामना करना पड़ता है. जन्म कुण्डली का दूसरा भाव कुटुम्ब भाव माना जाता है इसलिए इसका पीड़ित होना भी वैवाहिक संबंधो के लिए अच्छा नही माना जाता है. जन्म कुण्डली का आठवाँ भाव मांगलिक सुख का माना जाता है. यदि इस भाव में पाप ग्रह हों तब यह भी दाम्पत्य जीवन के मांगल्य को खराब करता है.

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि जन्म कुण्डली में यदि दूसरा, सप्तम और अष्टम भाव पीड़ित है तब वैवाहिक जीवन कलहमय हो जाता है और यदि उस समय जन्म कुण्डली में दशा भी विच्छेदकारी ग्रहो की या छठे, आठवें या बारहवें भाव से संबंधित चल रही है तब परेशानियाँ ज्यादा हो जाती हैं. दूसरे कारण यह भी है कि यदि आपके भीतर सहनशक्ति है तब परिस्थितियों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है. यदि सहनशक्ति नही है तब आपका वैवाहिक जीवन अच्छा नही हो सकता है.

यदि आपका लग्न अग्नि तत्व राशि 1,5,9 का है तब आपको क्रोध ज्यादा आता होगा और आप किसी की सुनेगें नहीं. ऎसे व्यक्ति को ऎसे आदमी से विवाह करना चाहिए जिसका लग्न जल तत्व राशि 4,8,12 का हो ताकि यदि एक को क्रोध आए तब दूसरा व्यक्ति शांत रह सकें. यदि आपके लग्न पर पाप ग्रहो का प्रभाव है तब भी आपको क्रोध ज्यादा आएगा और आप नियंत्रित हो सकते हैं. यदि आपके लग्न के आसपास अर्थात दूसरे और बारहवें भाव में भी पाप ग्रहों का प्रभाव है तब भी आपके अंदर धैर्य की कमी देखी जा सकती है. ऎसे में आप किसी अन्य के प्रभाव में नहीं रह पाएंगे और आपके मन-मुटाव बने रहने की संभावना रहेगी. पृथ्वी तत्व राशि 2,6,10 लग्न वाले व्यक्तियों में भी सहनशक्ति काफी होती है और ये व्यवहारिक भी होते हैं. 3,7,11 राशि वायु तत्व राशि होती है और ये कुछ ज्यादा ही भावुक भी होते हैं. सोचते ज्यादा है. जरा सी बात पर परेशान हो जाते हैं. यही इनकी सबसे बड़ी कमजोरी भी होती है.

यदि आप यह समझ लें कि आपकी कुण्डली के योग खराब हैं और आपके अपने स्वभाव व व्यवहार में कुछ बदलाव करने से परिस्थितियो में सुधार हो सकता है तब आपको बदलाव जरुर करना चाहिए. आप यदि अपनी इच्छा शक्ति को मजबूत बनाकर चलते हैं तब कुण्डली के बली खराब योगो का प्रभाव भी कम हो सकता है.

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कुंडली के 6,8 और 12वें भाव में चंद्रमा की स्थिति | Effects of Moon in 6th, 8th or 12th of the Kundali

किसी भी जन्म कुण्डली के मजबूत आधार लग्न, सूर्य तथा चंद्रमा को माना जाता है. अगर ये तीनो कुण्डली में बली है तब जीवन की बहुत सी बाधाओ पर काबू पाया जा सकता है. लग्न से व्यक्ति का व्यक्तित्व, सूर्य से आत्मा तथा चंद्रमा से मन का आंकलन किया जाता है. अगर मन अच्छा है, मनोबल ऊँचा है तब व्यक्ति के भीतर आत्मविश्वास भी बढ़ता है और वह विपरीत परिस्थितियो में भी डटा रहता है लेकिन यदि किसी व्यक्ति का मन कमजोर है या वह बहुत जल्दी परेशान हो जाता है इसका अर्थ है कि कुण्डली में उसका चंद्रमा कमजोर अवस्था में है. आज हम इस वेबकास्ट में कमजोर चंद्रमा की बात करेगें. चंद्रमा जब कुंडली के 6,8 या 12वें भाव में अकेला स्थित होता है तब कमजोर हो जाता है. व्यक्ति का मन हमेशा अशांत रहता है.

छठे भाव में चंद्रमा का प्रभाव | Effects of Moon in Sixth House

  • छठे भाव में चंद्रमा होने से आपको जीवन में प्यार की कमी रहती है अथवा प्यार में धोखा खा सकते है.
  • किसी ना किसी बात को लेकर तनाव और मानसिक परेशानियो से घिरे रह सकते है.
  • आपके कार्य क्षेत्र पर आपके सहयोगी आपका इस्तेमाल करते हैं और आप उनका विरोध भी नहीं कर पाते है.
  • माता के साथ संबंध अच्छे नहीं रहेगें अथवा माता के सुख में किन्हीं कारणो से कमी रह सकती है.

आइए सबसे पहले छठे भाव के चंद्रमा के बारे में बात करते हैं. छठे भाव में चंद्रमा होने से आपको जीवन में सदा प्यार की कमी महसूस हो सकती है अथवा आपको जीवन में एक बार प्यार में धोखा मिल सकता है. ऎसा भी हो सकता है कि आप किसी को चाहते हो और कभी उसे कहने की हिम्मत ना करने से आप उसे पा ना सके हो और यही आपके मन का मलाल हो सकता है.

आप सदा किसी ना किसी बात को लेकर तनाव और मानसिक परेशानियो से घिरे रह सकते है क्योकि छठे भाव में चंद्र की स्थिति से आपका मन कमजोर हो जाता है और जब मन ही कमजोर हो गया तब आप छोटी से छोटी बात पर अधिक परेशान हो जाते हैं. मन व्याकुल रहता है.

छठा भाव नौकरी का भी होता है और प्रतिस्पर्धा का भी होता है. इस भाव में पाप ग्रह का होना अच्छा माना गया है ताकि व्यक्ति अपने हर तरह के विरोधियो पर काबू पा सके. चंद्रमा के इस भाव में होने से आपके कार्य क्षेत्र पर आपके सहयोगी आपका इस्तेमाल कर करते हैं और आप उनका विरोध भी नहीं कर पाते है.

आपकी माता के साथ संबंध अच्छे नहीं रहेगें अथवा माता के सुख में किन्हीं कारणो से कमी रह सकती है. इस भाव में चंद्र होने से किसी ना किसी रुप में माता से अलगाव अथवा उसके सुख से वंचित हो सकते हैं.

अष्टम भाव में चंद्रमा का प्रभाव | Effects of Moon in Eighth House

  • आठवें भाव में चंद्रमा के प्रभाव से आप भावनात्मक(emotionally) रुप से स्वयं को असुरक्षित(insecure) महसूस कर सकते हैं.
  • आप भावनात्मक रुप से किसी से भी नहीं जुड़ पाते हैं, कमजोर मन के कारण सबसे अलग – थलग से रहते हैं.
  • अपने मन की बात को किसी से भी नहीं कहते हैं यहाँ तक कि संबंध बनाने वाले साथी के साथ भी पूरी तरह सुरक्षित महसूस नहीं करते हैं.
  • अष्टम भाव के चंद्रमा से आप सदा एक अनजान भय से घिरे रहते हैं.
  • अष्टम चंद्र से आप सदा दुविधा में घिरे रह सकते हैं और मन में अस्थिरता बनी रहती है.
  • चंद्रमा के इस भाव में होने से आप भोग-विलासी हो सकते हैं और आपके बहुत से संबंध दुनिया से छिपे रह सकते हैं.
  • आठवाँ भाव गूढ़ विद्याओ का भी है इसलिए आप इसमें रुचि रख सकते हैं और आप गुप्त अथवा डिटेक्टिव एजेंसी से जुड़े काम भी कर सकते हैं.

आइए अब हम आठवें भाव के चंद्रमा की बात करते हैं. आठवाँ भाव कुण्डली का सबसे खराब भाव माना जाता है. चंद्रमा मन है और आठवें भाव में चंद्रमा के प्रभाव से आप भावनात्मक(emotionally) रुप से स्वयं को अत्यधिक असुरक्षित(insecure) महसूस कर सकते हैं.

आप भावनात्मक रुप से किसी से भी नहीं जुड़ पाते हैं, कमजोर मन के कारण सबसे अलग – थलग से रहते हैं. आपका मन बहुत अधिक बेचैन रहता है और आप गहरे तनाव में धंसते जाते हैं.

अपने मन की बात को आप किसी से भी नहीं कहते हैं यहाँ तक कि जिस व्यक्ति से आप अंतरंग संबंध बनाते है उस साथी के साथ भी पूरी तरह सुरक्षित महसूस नहीं करते हैं. काफी ज्यादा समय बीत जाने पर ही आप अपने साथी से कुछ बाते शेयर करते हैं.

अष्टम भाव के चंद्रमा से आप सदा एक अनजान भय से घिरे रहते हैं, जिसका कोई कारण आपको भी समझ नही आता है. आपके अंदर आत्मविश्वास की कमी हो सकती है और आपका मनोबल भी गिरा रहता है.

आप सदा दुविधा में घिरे रह सकते हैं और मन में अस्थिरता बनी रहती है. आपको कई बार सही और गलत को पहचानना भी मुश्किल हो जाता है.

चंद्रमा के इस भाव में होने से आप भोगी और विलासी हो सकते हैं और आपके बहुत से संबंध दुनिया से छिपे रह सकते हैं. अनैतिक संबंधो से आपको सचेत रहना चाहिए.

आठवाँ भाव गूढ़ विद्याओ का भी है इसलिए आपकी इनमें रुचि हो सकते हैं और आप गुप्त अथवा डिटेक्टिव एजेंसी से जुड़े काम भी कर सकते हैं. आप जमीन के नीचे से संबंधित वस्तुओ को अपनी आजीविका के साधन बना सकते हैं.

बारहवें भाव में चंद्रमा का प्रभाव | Effects of Moon in Twelfth House

  • बारहवें भाव में चंद्रमा होने से मन का व्यय होता है और चित्त अशांत रहता है.
  • 12वाँ भाव मोक्ष का भी है इसलिए चंद्रमा के इस भाव में होने से आपका झुकाव आध्यात्म की ओर हो सकता है.
  • आप अपने जन्म स्थान से दूर जाकर तरक्की कर सकते हैं अथवा विदेश भी जा सकते हैं.
  • इस भाव का चंद्रमा व्यक्ति को एक अच्छा लेखक बना सकता है क्योकि आप रचनात्मक व्यक्ति हैं.
  • इस भाव में चंद्रमा के होने से आपकी माता भी आध्यात्मिक विचारो वाली महिला हो सकती है.
  • इस भाव का चंद्रमा कमजोर तो होता है लेकिन छठे और आठवें भाव जितना नहीं.
  • इस भाव के चंद्रमा पर से जब शनि अथवा अन्य पाप ग्रहों का गोचर होप्ता है तब मानसिक परेशानी अधिक होती है.

बारहवें भाव के चंद्रमा के बारे में बात करते हैं. यह भाव व्यय भाव भी कहलाता है. इस भाव में चंद्रमा होने से मन का व्यय होता है और चित्त अशांत रहता है.

12वाँ भाव मोक्ष का भी है इसलिए चंद्रमा के इस भाव में होने से आपका झुकाव आध्यात्म की ओर हो सकता है. आप किसी आश्रम के सदस्य बन सकते हैं.

यह भाव विदेश का भी है इसलिएा आप अपने जन्म स्थान से दूर जाकर तरक्की कर सकते हैं अथवा विदेश भी जा सकते हैं.

इस भाव का चंद्रमा व्यक्ति को एक अच्छा लेखक बना सकता है क्योकि आप रचनात्मक व्यक्ति हैं और आपका मन बहुत सी कल्पनाओ में खोया रहता है. एक लेखक के लिए अच्छी कल्पनाएँ करना बहुत जरुरी है तभी वह अच्छे और सुंदर लेख लिख सकता है.

चंद्रमा को माता का प्रतीक ग्रह माना जाता है इसलिए इस भाव में चंद्रमा के होने से आपकी माता भी आध्यात्मिक विचारो वाली महिला हो सकती है.

इस भाव का चंद्रमा कमजोर तो होता है लेकिन छठे और आठवें भाव जितना नहीं होता है.

लेकिन इस भाव के चंद्रमा पर से जब शनि अथवा अन्य पाप ग्रहों का गोचर होप्ता है तब मानसिक परेशानी अधिक हो सकती है.

उपाय | Remedy

चंद्रमा अगर कुण्डली में कमजोर है तब आपको भगवान शिव की पूजा प्रतिदिन करनी चाहिए.

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ज्योतिष में वर्ग कुंडलियो का महत्व | Importance of Varga Kundali in Astrology

जन्म कुण्डली के आधार पर व्यक्ति के भूत, वर्तमान और भविष्य के बारे में बताया जाता है. सभी का भविष्य अलग होता है. कोई सुखी तो कोई दुखी रहता है अथवा किसी को मिश्रित फल जीवन में मिलते हैं. किसी भी बात के होने में कुण्डली के योग महत्व रखते हैं और जिस ग्रह की दशा/अन्तर्दशा चल रही होती है वह महत्व रखती है. बहुत बार जन्म कुण्डली में योग अच्छे बने होते हैं और ग्रह भी बली अवस्था में होता है लेकिन फिर भी व्यक्ति को शुभ फल नहीं मिलते हैं क्योकि ग्रह वर्ग कुण्डली में कमजोर हो जाता है इसलिए ही वैदिक ज्योतिष में वर्ग कुण्डलियों का अत्यधिक महत्व माना जाता है.

जन्म कुण्डली में मौजूद फलो का स्वाद वर्ग कुण्डलियो में मिलता है. अगर ग्रह जन्म कुण्डली में बली है और संबंधित वर्ग कुण्डली में कमजोर है तब अनुकूल फल नहीं मिलते हैं और यदि ग्रह जन्म कुण्डली में कमजोर और संबंधित वर्ग कुण्डली में बली है तब कुछ बाधाओ के बाद फल अनुकूल मिलते हैं. आज इस वेबकास्ट में हम वैदिक ज्योतिष में वर्ग कुण्डलियो के महत्व की बात करेगें.

वर्ग कुण्डली के लग्न, लग्नेश और संबंधित भाव और भावेश का विश्लेषण किया जाता है. जैसे संतान के लिए सप्तांश कुण्डली का आंकलन किया जाता है इसलिए सप्तांश कुण्डली का लग्न, लग्नेश, पंचम भाव और पंचमेश को देखा जाएगा. जन्म कुण्डली के पंचमेश की स्थिति सप्तांश में भी देखी जाएगी तब जाकर किसी निर्णय पर पहुंचा जाता है.

होरा कुण्डली, द्रेष्काण और चतुर्थांश कुण्डली | Hora Kudali, Dreshkan and Chaturthansh Kundali

  • होरा कुण्डली का आंकलन धन के लिए किया जाता है.
  • स्त्री संज्ञक (female planet) चंद्रमा की होरा में और पुरुष ग्रह सूर्य की होरा में अच्छे माने जाते हैं.
  • द्रेष्काण कुण्डली या D-3 कुण्डली को भाई-बहनो के लिए देखा जाता है.
  • चतुर्थांश कुण्डली को भूमि, जमीन और भाग्य के लिए देखा जाता है.

होरा कुण्डली अर्थात D-2 कुण्डली से आरंभ करते हैं.  होरा कुण्डली का आंकलन धन के लिए किया जाता है.

स्त्री संज्ञक (female planet) चंद्रमा की होरा में और पुरुष ग्रह सूर्य की होरा में अच्छे माने जाते हैं क्योकि चंद्रमा को स्त्री समान माना जाता है और सूर्य को पुरुष समान माना जाता है.

द्रेष्काण कुण्डली या D-3 कुण्डली को भाई-बहनो के लिए देखा जाता है. कुल कितने बहन भाई होगें यह इस कुण्डली से पता चलता है. आपको भाई-बहनों का सुख मिलेगा या नहीं, इसका विश्लेषण इसी कुण्डली से किया जाता है.

चतुर्थांश कुण्डली अथवा D-4 का आंकलन  भूमि, जमीन और भाग्य के लिए देखा जाता है. आपका भाग्य कैसा रहेगा इसकी पुष्टि इस कुण्डली से होती है. आप घर बना पाएंगे या नहीं अथवा कैसा घर होगा आदि बातों की जानकारी इस कुण्डली के माध्यम से मिलती है.

सप्तांश, नवांश और दशमांश कुण्डली | Saptansh, Navansh and Dashmansh Kundali

  • सप्तांश कुण्डली अथवा D-7 का आंकलन संतान के लिए किया जाता है.
  • जन्म कुण्डली में संतान के योग हैं और सप्तांश कुण्डली में नही है तब परेशानी आती है.
  • नवांश कुण्डली अथवा D-9 कुण्डली सबसे अधिक महत्व रखती है. इसे जीवनसाथी के लिए देखा जाता है.
  • दशमांश कुण्डली अथवा D-10 कुण्डली का आंकलन कैरियर के लिए किया जाता है.

आइए अब सप्तांश कुण्डली की बात करें.  सप्तांश कुण्डली अथवा D-7 का आंकलन संतान के लिए किया जाता है. संतान कैसी होगी और उनसे सुख मिलेगा या नही आदि बातो की पुष्टि इस कुण्डली से होती है.

यदि आपकी जन्म कुण्डली में संतान के योग हैं और सप्तांश कुण्डली में नही है तब संतान होने में परेशानी आ सकती है.

नवांश कुण्डली अथवा D-9 कुण्डली सभी वर्ग कुण्डलियो में सबसे अधिक महत्व रखती है. वैसे तो इसे जीवनसाथी के लिए देखा जाता है कि वह कैसा होगा और उसके साथ संबंध कैसे रहेगे आदि बातें देखी जाती हैं. लेकिन इस कुण्डली को जीवन के हर क्षेत्र के लिए भी देखा जाता है. जो योग जन्म कुण्डली में बनते हैं उनकी पुष्टि इस कुडली में होती है. जन्म कुण्डली शरीर है तो नवांश कुण्दली को आत्मा माना जाता है.

दशमांश कुण्डली अथवा D-10 कुण्डली का आंकलन कैरियर के लिए किया जाता है. जन्म कुण्डली के दशम भाव की पुष्टि दशमांश कुण्डली से होती है. कैरियर में सफलता मिलेगी या नही आदि बातो की पुष्टि इस कुण्डली से होती है.

द्वादशांश, षोडशांश और विशांश कुण्डली | Dwadshansh, Shodshansh and Vishansh Kundali

  • द्वादशांश कुण्डली अथवा D-12 का आंकलन माता-पिता के लिए किया जाता है.
  • षोडशांश कुण्डली अथवा D-16 का विश्लेषण वाहन सुख के लिए किया जाता है.
  • विशांश कुण्डली अथवा D-20 को व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास के लिए देखा जाता है.

द्वादशांश कुण्डली अथवा D-12 का आंकलन माता-पिता के लिए किया जाता है. आपके माता-पिता से संबंधित हर बात को इस कुण्डली से देखा जा सकता है. इनके स्वास्थ्य के बारे में और इनसे मिलने वाले सुख – दुख से जुड़ी बातो की पुष्टि इस वर्ग कुण्डली से होती है.

षोडशांश कुण्डली अथवा D-16 का विश्लेषण वाहन सुख के लिए किया जाता है. यदि जन्म कुण्डली में वाहन सुख है और इस कुण्डली में नही है तब आपको अपना मनपसंद वाहन सुख मिलने में दिक्कत हो सकती है. यदि दोनो कुण्डलियो में इसकी पुष्टि होती है तब आपको अति उत्तम कोटि का वाहन मिल सकता है.

विशांश कुण्डली अथवा D-20 को व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास के लिए देखा जाता है. आपका धार्मिक बातो में या आध्यात्म की ओर झुकाव है या नही अथवा आप आस्तिक होगे या नास्तिक होगें आदि बातो को इस कुण्डली से देखा जाता है.

चतुर्विशांश, सप्तविशांश और त्रिशांश कुण्डली | Chaturvishansh, Saptavishansh and Trishansh Kundali

  • चतुर्विशांश कुण्डली अथवा D-24 को शिक्षा के लिए देखा जाता है.
  • सप्तविशांश कुण्डली अथवा D-27 को जीवन के बलाबल और कमजोरियो के लिए देखा जाता है.
  • त्रिशांश कुण्डली अथवा D-30 को स्वास्थ्य और दुर्घटनाओ के लिए देखा जाता है.

चतुर्विशांश कुण्डली अथवा D-24 को शिक्षा के लिए देखा जाता है. शिक्षा का स्तर कैसा होगा आदि बाते इस कुण्डली से सिद्ध होती हैं. जन्म कुण्डली में अगर सब ठीक है और यह कुण्डली कमजोर है तब शिक्षा में बाधा आ सकती है.

सप्तविशांश कुण्डली अथवा D-27 को जीवन के बलाबल और कमजोरियो के लिए देखा जाता है. आपका भीतरी और बाहरी बलाबल इस कुण्डली से देखा जाता है. आपकी कमजोरियाँ भी इस कुण्डली से देखी जाती है.

त्रिशांश कुण्डली अथवा D-30 को स्वास्थ्य और दुर्घटनाओ के लिए देखा जाता है. शारीरिक बिमारियो को इस कुण्डली से देखा जाता है. जीवन के कठिन समय और परेशानियो की पुष्टि इसी कुण्डली से होती है.

चत्वारिशांश, अक्षवेदांश और षष्टियांश कुण्डली | Chatvarishansh, Akshvedansh and Shashtiyansh Kundali

  • चत्वारिशांश अथवा D-40 चार्ट से जीवन के सामान्य शुभ-अशुभ बातों को देखा जाता है.
  • अक्षवेदांश अथवा D-45 चार्ट से व्यक्ति के व्यक्तित्व के बारे में और पैतृक संपत्ति के बारे में देखा जाता है.
  • षष्टियाँश अथवा D-60 चार्ट से पूर्व जन्म के कर्म देखे जाते हैं.

चत्वारिशांश अथवा D-40 चार्ट से जीवन के सामान्य शुभ-अशुभ बातों को देखा जाता है. यह वर्ग कुण्डली माता की ओर से मिलने वाली संपत्ति के बारे में भी बताती है.

अक्षवेदांश अथवा D-45 चार्ट से व्यक्ति के व्यक्तित्व के बारे में पता चलता है और पैतृक संपत्ति अथवा पिता की ओर से मिलने वाली संपत्ति के बारे में देखा जाता है.

षष्टियाँश अथवा D-60 चार्ट से पूर्व जन्म के कर्म देखे जाते हैं. पूर्व जन्म के कर्मो का पुन: भुगतान इस कुण्डली से देखा जाता है. D-1 और D-60 चार्ट को एक्-दूसरे का पूरक माना जाता है. आपके जीवन में कोई घटना “कब“ होगी, यह जन्म कुण्डली बताती है और वह घटना “क्यो” होगी यह डी-60 कुण्डली बताती है. महर्षि पराशर ने इस वर्ग कुण्डली को जीवन के सभी पहलुओ को जांचने के लिए महत्वपूर्ण माना है.

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अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्यक शर्ते | Important Tips for Good Health

अच्छे स्वास्थ्य के लिए जन्म कुण्डली में बहुत सी बातो का आंकलन किया जाता है जो निम्नलिखित है :-

  • सबसे पहले तो लग्न, लग्नेश का बली होना आवश्यक है. यदि अशुभ भाव का स्वामी जन्म लग्न में स्थित है तब स्वास्थ्य संबंधी परेशानियो से होकर गुजरना पड़ सकता है.
  • आठवें भाव से ज्यादा बली लग्न होना चाहिए तब स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ कम होती है.
  • केन्द्र में बैठे शुभ ग्रह स्वास्थ्य के लिए अच्छे माने जाते हैं लेकिन यदि यही शुभ ग्रह वक्री हो जाते हैं तब स्वास्थ्य के लिए सुरक्षा नहीं देगें.
  • लग्न में गुरु कई हजार दोषो को खतम करता है लेकिन यदि यह वक्री है तब कोई सुरक्षा प्रदान नहीं करेगा.
  • लग्नेश का 6,8 या 12वें भाव में स्थित होना स्वास्थ्य के लिए शुभ नहीं होता है.
  • सूर्य आत्मा का और चंद्रमा मन का कारक ग्रह है. इसलिए इन दोनो के बली होने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है.
  • लग्न यदि राहु/केतु अक्ष पर स्थित है तब स्वास्थ्य के लिए शुभ नहीं है.
  • लग्नेश यदि राहु/केतु अक्ष पर स्थित है तब यह भी स्वास्थ्य के लिए शुभ नहीं है.
  • लग्न या चन्द्र गंडात में स्थित है तब स्वास्थ्य के लिए शुभ नहीं हैं.
  • लग्न या लग्नेश का संबंध 22वें द्रेष्काण के साथ नहीं होना चाहिए.
  • लग्न या लग्नेश का संबंध 64वें नवांश से होने पर स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ आती हैं.
  • केन्द्राधिपति दोष के साथ ही 22वें द्रेष्काण या 64वें नवांश से भी संबंध बनता है यब यह स्वास्थ्य के लिए अच्छा नही माना जाता है.
  • छिद्र ग्रहों को भी स्वास्थ्य के लिए अशुभ माना जाता है.
  • उपरोक्त योगो के अलावा कुछ और भी योग हैं जिनमें ग्रह यदि स्थित है तब स्वास्थ्य संबंधी परेशानी आती है.

सर्प द्रेष्काण | Sarpa Drekkana in Jyotish

  • जन्म कुण्डली में कोई ग्रह यदि कर्क राशि में दूसरे द्रेष्काण या तीसरे द्रेष्काण में स्थित है तब स्वास्थ्य संबंधी परेशानियो से गुजरना पड़ सकता है.
  • जन्म कुण्डली में कोई ग्रह यदि वृश्चिक राशि के पहले या दूसरे द्रेष्काण में स्थित  है तब स्वास्थ्य के लिय यह अनुकूल स्थिति नहीं मानी जाती है.
  • जन्म कुण्डली में लग्नेश यदि मीन राशि के तीसरे द्रेष्काण में स्थित है तब यह स्वास्थ्य के लिए शुभ स्थिति नहीं मानी जाती है.

पाश द्रेष्काण | Pash Drekkana in Jyotish

  • जन्म कुण्डली में यदि कोई ग्रह वृष राशि के पहले द्रेष्काण में स्थित है तब यह पाश द्रेष्काण में माना जाएगा. इस द्रेष्काण में होने से व्यक्ति बंधन में रहता है.
  • जन्म कुण्डली में यदि कोई ग्रह सिंह राशि के पहले द्रेष्काण में है तब यह पाश द्रेष्काण में होगा जो कि शुभ स्थिति नहीं मानी जाती है.
  • जन्म कुण्डली में कोई ग्रह कुंभ राशि के पहले द्रेष्काण में स्थित है तब यह पाश द्रेष्काण में माना जाता है और यह शुभ स्थिति नहीं मानी जाती है.
  • जन्म कुण्डली में कोई ग्रह तुला राशि में पहले या तीसरे द्रेष्काण में स्थित है तब यह शुभ स्थिति नहीं मानी जाती है.
  • मकर राशि में कोई ग्रह यदि पहले या तीसरे द्रेष्काण में स्थित है तब यह शुभ स्थिति नहीं मानी जाती है.
  • कुण्डली में स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ तभी होगी जब उनके होने के योग होगें और उन्ही से संबंधित दशा/अन्तर्दशा भी कुण्डली में चल रही होगी. साथ ही गोचर भी अनुकूल नहीं होगा अन्यथा परेशानी नहीं होगी.
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अश्विनी नक्षत्र वालों में होती हैं ये खूबियां जो जीत सकती हैं आपका दिल

भचक्र में शून्य से 13 अंश 20 कला तक का विस्तार अश्विनी नक्षत्र के अधिकार में आता है. अश्चिनी नक्षत्र दो “अश्विन” से उत्पन्न हुआ नक्षत्र है. यह दो सितारो का समूह है. लेकिन कुछ अन्य मतानुसार अश्विनी नक्षत्र तीन सितारो का समूह है जिनकी आकृति दो अश्व के मुख समान है. इस नक्षत्र के अधिष्ठाता स्वामी दो अश्विन ही है. इनकी दो भुजाएँ हैं और यह सूर्य तथा सविता के वाहन हैं. अश्विन को देवताओ का चिकित्सक माना गया है. वेदो के अनुसार सृष्टि के आरंभ काल में केवल सृष्टा था जो प्रजा व पालक दोनो की ही भूमिका अदा करता था. बाद में सृष्टा ने विभिन्न रुपो की रचना की जो देवता कहलाए. इन्हीं रुपो में सबसे पहली कृति दो भुजाओं वाले अश्विन की थी.

शारीरिक गठन और स्वभाव | Physique and Temperament

इस नक्षत्र में जन्म होने पर आपकी घोड़े के समान होने की संभावना बनती है. आप सुंदर मुखाकृति के व्यक्ति होगें. बड़ी व चमकदार आंखे हो सकती हैं. नाक सामान्य से कुछ बड़ी हो सकती हैं और माथा चौड़ा हो सकता है. इस नक्षत्र में जन्म लेने पर आप शांत प्रवृति के व्यक्ति होते हैं. आप कुछ जिद्दी स्वभाव के भी हो सकते हैं. आप अपना काम भी चुपचाप करते रहते हैं, किसी से कोई जिक्र नहीं करते हैं. आपको जो प्यार करता है उस पर आप अपना सब कुछ कुर्बान करने वाले होते हैं. आप विपत्तियो तथा प्रतिकूल परिस्थितियो में भी अपना संयम बनाए रखते हैं. आप मुसीबत में अफंसे लोगो की सहायता को सदा तत्पर रहते हैं.

आपको जो करना होता है वही आप करते है. आप किसी के प्रभाव में आकर कभी कोई निर्णय नहीं लेते हैं. आपकी अपनी सोच व अपना ही ढ़ंग होता है. आप एक बार जिस काम को करने का ठान लेते हैं तब उसे करके ही मानते हैं चाहे उसका परिणाम कुछ भी निकलें. आपकी आस्था भगवान के प्रति भी होती है लेकिन आप अंधविश्वास नहीं करते हैं. आप रुढ़िवादी नहीं होते हैं, आप आधुनिक विचारो के समर्थक होते हैं. समझदार होते हुए भी आप बहुत बार कई बातो को तूल दे देते हैं. अपने वातावरण को अपने ही अनुकूल बनाने की फिराक में रहते हैं.

अश्विनी नक्षत्र के जातको का व्यवसाय | Effect On Business

आप सभी काम करने में निपुण होते हैं. संगीत व साहित्य प्रेमी हो सकते हैं. हो सकता है कि 30 वर्ष की आयु तक आपका जीवन संघर्षशील रहे लेकिन उसके उपरांत आप लगातार जीवन में आगे ही बढ़ेगें. आपको छोटे से काम के लिए भी ज्यादा मानसिक परेशानी बनी रह सकती है. बाद के वर्षो में आप सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते जाएंगे. आप वैसे तो कुछ कंजूस स्वभाव के होते हैं लेकिन शानो-शोकत दिखाने के चक्कर में आप अपनी आय से ज्यादा खर्च कर देते हैं. अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति आप निरन्तर प्रयासो द्वारा करके करते हैं.

पारीवारिक जीवन | Family Life

आप अपने परिवार के सदस्यो को बहुत प्यार करते हैं. लेकिन अपने कटु व्यवहार के कारण वह आपको ज्यादा पसंद नहीं करते हैं. आपको अपने पिता से ज्यादा प्यार व दुलार नहीं मिलता है और ना ही किसी तरह की देखभाल ही मिलती है. आपको अपने मामा से ही सहारा मिलता है और जीवन में आगे बढ़ते हैं. परिवार से अलग बाहर के लोग भी आपकी सहायता करते हैं. 26 से 30 वर्ष की आयु के मध्य में विवाह होने की संभावना बनती है.

स्वास्थ्य | Health

स्वास्थ्य आपका ठीक-ठाक ही रहेगा. लेकिन सिरदर्दव ह्रदय रोग आदि की शिकायत हो सकती है. आपको अच्छे स्वास्थ्य के लिए अश्विनी नक्षत्र की पूजा करनी चाहिए. इससे आपको स्वास्थ्य लाभ होगा.

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ज्योतिष द्वारा जाने कौन सा व्यवसाय करने से मिलेगी आपको सफलता

व्यवसाय के विषय में जानने के लिए दशम भाव का विश्लेषण करना अत्यंत आवश्यक माना गया है. इसी के द्वारा जातक के कार्य के बारे में अनुमान लगाया जाता है. इसी के साथ यह भी जानना आवश्यक है कि कुण्डली में चंद्र, सूर्य और लग्न में से कौन सबसे अधिक मजबूत स्थिति में है.

दशम भाव के स्वामी का आंकलन करना सबसे पहली प्राथमिकता होती है. दशम के स्वामी का विश्लेषण करने के उपरांत दशम भाव स्वामी कुण्डली में कहां स्थित है तथा दशम भाव में कौन सा ग्रह बैठा है इसे भी देखना अत्यंत आवश्यक होता है.

अब कुण्डली को वर्ग कुण्डली डी-9 में देखना चाहिए. नवांश में दशम भाव तथा वहां स्थित ग्रह की स्थिति को देखना चाहिए की वह मजबूत या कमजोर है. इसी के साथ व्यवसाय के पूर्ण चयन में डी-10 का योगदान होता है. जिससे अच्छी प्रकार व्यवसाय के विषय में जाना जा सकता है. पूरी बारीकी यहीं से पता चल पाती है.

दशम भाव में मेष राशि के होने से व्यक्ति सैना, पुलिस, खिलाडी़, सर्जन अथवा धातु से संबंधित कार्य करता है. यदि दशम भाव में सिंह राशि स्थित हो तो जातक प्रशासनिक विभाग में कार्य करने वाला, वन्य विभाग में कार्यरत, चिकित्सा में अथवा आई.ए.एस या नेता के रूप में कार्यरत रहता है. यदि दशम भाव में धनु राशि स्थित हो तो जातक खेलकूद में, नौसेना रक्षक, संवादक या उपदेशक, नेता, फाईनेंस में लगा अथवा चर्म व्यापारी होता है.

दशम भाव में कर्क राशि होने से जातक समुद्र में काम करने वाला, नेवी में काम कर सकता है, दुग्ध उत्पादों में कार्यरत रह सकता है, मच्छली उत्पादन, शहद का व्यापार, होटल व्यवसाय में कार्य करने जैसे कामों से जुड़ सकता है.

दशम भाव में वृश्चिक राशि के प्रभाव स्वरूप व्यक्ति फिलोस्फर, नेवी आफिसर, ज्योतिषी, जासूस, भू वैज्ञानिक सशस्त्रबल, डाक्टर या नर्स से जुडे़ कामों को करने में रूचि ले सकता है.

दशम भाव में मीन राशि के होने से जातक सर्जन, नर्स, जेलर, नृत्यप्रशिक्षक, समाजसेवक, संग्राहलय, तथा अनाथालय जैसी संस्थानों में काम कर सकता है.

दशम भाव में मिथुन राशि के होने से व्यक्ति में विचारों को अभिव्यक्त करने की अच्छी क्षमता होती है इस कारण से व्यक्ति संचार संबंधि कामों को करने योग्य बन सकता है, सेल्स से जुडे़ कार्य, अनुवादक, रिपोर्टर, लेखक तथा रिसर्च से जुडे़ कामों को करने वाला बन सकता है,

तुला राशि के दशम भाव में स्थित होने के प्रभाव स्वरूप व्यक्ति कंसलटेंट, वकालत से जुडे़ काम, जज, राजनितिज्ञ, जन संपर्क, गायक, अभिनेता तथा क्वॉलिटी कंट्रोलर जैसे कामों से जुड़ सकता है.

कुम्भ राशि के दशम भाव में होने से व्यक्ति टेक्निकल एवं लीगल एडवाईजर के रूप में कार्य कर सकता है, आटोमोबाईल, वायुयान यांत्रिकी,  तंत्रिका विज्ञानी, एक्स – रे, कंप्यूटर प्रौद्योगिकी के कार्यों से जुड़ सकता है.

दशम भाव में वृषभ राशि के होने से जातक में व्यवसाय से जुड़ने की चाह अधिक हो सकती है.  बैंकर्स, कैशियर, पूंजीपतियों, फाइनेंसरों, आभूषण / सौंदर्य प्रसाधन व्यापार, विज्ञापन और मीडिया एजेंट बन सकता है.

दशम भाव में कन्या राशि के होने से जातक- शिक्षक, दुकानदार, आशुलिपिक, अनुवादक, मनोवैज्ञानिकों, अनुवादक, लिखावट विशेषज्ञ, खुदरा व्यापार से जुड़ सकता है.

दशम भाव में मकर राशि के होने से जातक- कृषि, खनन, वन उत्पाद, खनिज, भूविज्ञान, व्यापारी और बैंकरके काम में दक्षता पा सकता है.

इन सभी बातों का आंकलन करने के पश्चात एक अन्य प्रमुख बात सामने आती है कि दशम भाव को पूर्ण रूप से देखने के उपरांत दशम भाव में राशि को जानना और उस भाव में कौन सा ग्रह स्थित है जिससे कार्य का आसानी से पता लगाया जा सके. इसी के साथ नवांश एवं दशमांश वर्ग कुण्डलियों में दशम भाव की स्थिति क्या है यह जानकर ही जातक के कार्य के विषय में कोई भी टिप्पणी की जा सकती है.

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तत्वों के अनुसार व्यवसाय का चयन | Classification of Career on the Basis of Ruling Element

ज्योतिष शास्त्र व्यवसाय एवं नौकरी का चयन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. नौ ग्रह और बारह राशियां मिलकर जातक के कैरियर या व्यवसाय का निर्धारण करती हैं तथा उनसे संबंधित कामों को दर्शाती हैं. चंद्रमा जो मन का कारक है और हमारा मन ही हमारे झुकाव तथा पसंद को अभिव्यक्त करने में एक महत्व पूर्ण भूमिका निभाता है. इसलिए हमारा कैरियर चंद्र राशि पर आधारित होता है. इसी प्रकार दशम भाव भी आपके काम को दर्शाता है और नौकरी अथवा व्यवसाय का चयन करने में सहायक होता है.

यदि कुण्डली में चंद्र राशि एवं दशम भाव मजबूत अवस्था में हों तथा एक दूसरे के साथ अनुकूल संबंध बनाते हों तो जातक को नौकरी अथवा व्यवसाय में अच्छी सफलता प्राप्त होती है. इसी के साथ व्यवसाय के चयन में ग्रहों की स्थिति एवं युतियों का भी महत्व होता है. कुण्डली जातक के ज्ञान एवं कौशल का भी अच्छे से निर्धारण करने में मददगार होती है.

दशम भाव में पृथ्वी तत्व राशियों का प्रभाव | 10th House ruled by Element – Earth

पृथ्वी तत्व राशियों में वृषभ, कन्या और मकर राशियां आती हैं. यह राशियाँ वैश्य वर्ण की राशियाँ होती हैं. यह प्रभावपूर्ण होती हैं, व्यक्ति अपने कार्य सोच-विचारकर योजनाबद्ध तरीके से करता है. यह अपने लाभ तथा हानि वाले कार्यों में सजग रहते है. यथार्थवादी होते हुए परिस्थितियों के अनुकूल काम करते है. कृषि विभाग, मैनेजमैंट, निर्मणकर्ता, रियल ऎस्टेट जैसे काम इनमें आते हैं.

दशम भाव में जल तत्व राशियों का प्रभाव | 10th House ruled by Element – Water

जल तत्व राशि में भावनाओं को समझने की दक्षता होती है. दशम भाव में जल तत्व राशि होने पर यह राशि  जातक को संवेदना तथा भावुकता से संबंधित विषयों से आजीविका प्राप्त कराने में सहायक होती है. जातक मेहनती होता है और अपनी सफलता को बनाए रखने के लिए प्रयासरत रहता है. जल तत्व राशि जल संबंधी व्यवसायों को भी दर्शाती है जैसे दुग्ध उत्पादन, पेयपदार्थों का व्यापार, समुद्र से जुडे़ काम, जल तकनीक इत्यादि कामों में व्यक्ति का लगना.  कर्क, वृश्चिक और मीन राशियां जल तत्व राशियां कहलाती हैं.

दशम भाव में वायु तत्व राशि का प्रभाव | 10th House ruled by Element – Air

यदि वायु तत्व राशि दशम भाव में, होती है तब व्यक्ति कला से संबंधित कार्यों से आजीविका प्राप्त करता है. उसे ऎसे कार्यों में रुचि होती है जिनमें कल्पना भी शामिल होती है. जातक काल्पनिकता से जुडे़ कार्य करता है. अपनी बुद्धि का प्रयोग अधिक करता है. व्यक्ति को ऎसे कार्यों में अधिक सफलता मिलती है जिनमें कल्पना की आवश्यकता हो, साहित्य तथा बुद्धि परक कार्य हों दार्शनिक शास्त्र, लेखन, विचारक, वैज्ञानिक इनके अंतर्गत आते हैं. मिथुन, कुम्भ और तुला वायु तत्व के अंतर्गत आते हैं.

दशम भाव में अग्नि तत्व का प्रभाव | 10th House Ruled by Element – Fire

दशम भाव में यदि अग्नि तत्व राशि होती है जातक को यह पराक्रम. परिश्रम तथा संघर्ष से भरे कार्य कराती हैं. व्यक्ति उत्साह, उमंग, साहस, तथा वीरता से आगे बढ़ने में विश्वास करता है. वह अपने बल पर जीवन में आजीविका प्राप्त करता. अग्नि तत्व के अंतर्गत लौह उधोग, इंजिनियरिंग इत्यादि व्यवसाय आते हैं.

मेष, सिंह और धनु राशि अग्नि तत्व राशियां होती हैं. इसलिए व्यवसाय का चयन करने से पूर्व यदि दशम भाव की स्थिति उसमें स्थित राशियों की प्रबलता एवं तत्व का निरधारण करने के उपरांत ज्योतिष एवं कुण्डली विवेचन द्वारा चयन करना आसान हो जाता है.

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अपने लग्न से जाने शुभ और अशुभ ग्रह के बारे में

ज्योतिष में नौ ग्रहों का जिक्र किया गया है. इन ग्रहों में से कोई भी ग्रह शुभ अथवा अशुभ हो सकता है क्योकि हर लग्न के लिए शुभ अथवा अशुभ ग्रह भिन्न होते हैं. इस लेख में पाठको को सभी बारह लग्नों के लिए शुभ अथवा अशुभ ग्रहो के विषय में बताया जाएगा.

मेष लग्न | Aries Ascendant

मेष लग्न में मंगल लग्नेश तथा अष्टमेश होता है. मेष राशि को मंगल की मूल त्रिकोण राशि माना जाता है. मेष लग्न चर लग्न है और चर लग्न के लिए एकादशेश बाधक का काम करता है. इसलिए शनि एकादशेश होने से बाधकेश का काम करता है. गुरु ग्रह नवमेश है और यदि कुण्डली में गुरु और शनि एक साथ होते हैं तब यह अच्छा फल नहीं देगें क्योकि भाग्येश की युति बाधकेश के साथ हो गई है. कुण्डली में शनि जिस भी ग्रह के साथ होगा उसके कारकत्वों में कमी कर सकता है. कुण्डली में शनि की स्थिति यदि ठीक नही है तब वह मारक का काम भी कर सकता है. मेष लग्न के लिए शुक्र मारक है तो चंद्रमा चतुर्थ का स्वामी होकर मिश्रित फल प्रदान करता है.

वृष लग्न | Taurus Ascendant

वृष लग्न के जातको के लिए शनि शुभ फलदायक है क्योकि शनि केन्द्र तथा त्रिकोण का स्वामी होकर योगकारक है. बृहस्पति अष्टमेश तथा एकादशेश होने से मारक के समान फल प्रदान करता है. शुक्र लग्नेश होने के साथ छठे भाव का स्वामी भी होता है इसलिए इसके शुभ फल देने में संदेह रहता है क्योकि इसकी मूल त्रिकोण राशि छठे भाव में पड़ती है. चंद्रमा तीसरे भाव का स्वामी होकर शुभ फल प्रदान करता है और सूर्य चतुर्थ भाव का स्वामी होता है इसलिए शुभ फल प्रदान करता है क्योकि केन्द्र के स्वामी साम हो जाते हैं और सूर्य क्रूर ग्रह होने से सम हो जाता है.

बुध दूसरे का स्वामी होने से धनकारक होने के साथ मारक भी होता है लेकिन साथ ही पंचम भाव का स्वामी होने से शुभ फल भी प्रदान करता है क्योकि पंचम त्रिकोण भाव है. मंगल इस लग्न के लिए सप्तम और बारहवें भाव का स्वामी होकर मारक का काम करता है. चंद्रमा तीसरे भाव का स्वामी है और यदि वह किसी मारक ग्रह के साथ स्थित हो जाता है तब मारक जैसे ही फल प्रदान करता है.

मिथुन लग्न | Gemini Ascendant

इस लग्न के लिए बृहस्पति दशम भाव का स्वामी होने के साथ सप्तम भाव का भि स्वामी होता है और सप्तमेश होने से यह ग्रह मारक का काम करता है. साथ ही मिथुन लग्न द्वि-स्वभाव राशि का है और द्विस्वभाव लग्न के लिए सप्तमेश बाधक होता है. शनि इस लग्न के लिए अष्टमेश तथा नवमेश होता है. अष्टम भाव बाधा का है तो नवम भाव सबसे शुभ त्रिकोण भाव है. यदि कुण्डली में गुरु व शनि की युति हो जाती है तब शनि भी शुभ फल प्रदान करने में दिक्कत कर सकते हैं. बुध इस लग्न के लिए लग्नेश तथा चतुर्थेश होता है लेकिन इसकी दोनो राशियाँ केन्द्र में पड़ने से इसे केन्द्राधिपति दोष भी लगता है और इस कारण शुभ फल प्रदान नहीं करता है. चंद्रमा दूसरे भाव का स्वामी है और मारक हो जाता है लेकिन कहा गया है कि चंद्र तथा सूर्य को मारक का दोष नहीं लगता है लेकिन कुण्डली में यदि चंद्रमा किसी पाप ग्रह के साथ बैठ गया तब मारक का काम कर सकता है.

कर्क लग्न | Cancer Ascendant

इस लग्न के लिए मंगल ग्रह पंचम तथा दशम का स्वामी होने से अत्यधिक शुभ तथा योगकारक बन जाता है. बृहस्पति भी नवम भाव का स्वामी होने से शुभ ही बन जाता है. चंद्रमा लग्नेश होकर शुभ होता है. इस प्रकार हम कह सकते है कि कर्क लग्न के लिए चंद्रमा, गुरु तथा मंगल तीनो शुभ ग्रह होते हैं. शनि इस लग्न के लिए सप्तमेश तथा अष्टमेश होकर बिल्कुल ही खराब है और सूर्य दूसरे भाव का स्वामी होकर मारक हो जाता है. यदि सूर्य तथा शनि की युति हो जाए तब  फल शुभ नहीं हो सकते हैं.

शुक्र को कर्क लग्न के लिए शुभ नहीं माना जाता है क्योकि कर्क लग्न चर लग्न है और चर लग्न के लिए एकादशेश बाधक होता है. साथ ही शुक्र की मूल त्रिकोण राशि चतुर्थ भाव में आने से इसे केन्द्राधिपति दोष भी लग जाता है. बृहस्पति नवमेश होने के साथ छठे भाव का स्वामी भी है लेकिन लग्नेश चंद्र का मित्र होने से यह शुभ फल ही प्रदान करता है.

सिंह लग्न | Leo Ascendant

इस लग्न के लिए मंगल केन्द्र – त्रिकोण का स्वामी होने से योगकारक ग्रह बन जाता है और शुभ फल प्रदान करता है. बृहस्पति की मूल त्रिकोण राशि धनु पंचम भाव अर्थात त्रिकोण भाव में पड़ने से यह शुभ हो जाता है हालांकि इसकी दूसरी राशि अष्टम भाव में पड़ती है. शनि और चंद्रमा इस लग्न के लिए शुभ नहीं है. वैसे भी शनि छठे और सप्तम भाव का स्वामी है और लग्नेश सूर्य का शत्रु भी है. इस कारण शनि अशु भ फल प्रदान करने वाला ही होगा. बुध की मूल त्रिकोण राशि दूसरे भाव में पड़ती है और मिथुन राशि एकादश भाव में. दोनों हि स्थितियां सही नही मानी गई है. शुक्र की मूल त्रिकोण रशि तीसरे भाव में और वृष राशि दशम भाव में चली जाती है जिससे इसे केन्द्राधिपति दोष लगता है और यह शुभ फल प्रदान करने में सक्षम नही होता है.

कन्या लग्न | Virgo Ascendant

इस लग्न के लिए बुध तथा शुक्र दोनो ही शुभ ग्रह माने गये हैं. शुक्र धन भाव तथा भाग्य भाव का स्वामी है लेकिन धन भाव ही मारक स्थान भी है इसलिए शुक्र मारक का भी काम इस लग्न के लिए करता है. मंगल तीसरे और आठवें भाव का स्वामी होकर अशुभ है. बृहस्पति चतुर्थेश और सप्तमेश होकर केन्द्राधिपति दोष से दूषित होता है और साथ ही बाधकेश भी है क्योकि कन्या लग्न द्विस्वभाव लग्न है और इस लग्न के लिए सप्तमेश बाधक होता है. इस लग्न के लिए शनि पांचवे और छठे भाव का स्वामी है और लग्नेश बुध का मित्र है, इसलिए शनि को शुभ ही माना जाता है. छठे भाव में शनि की मूल त्रिकोण राशि पड़ती है और मंगल आठवें भाव का स्वामी होकर यदि शनि से संबंध बनाए तब शनि के शुभ फलों में कमी आ सकती है.

तुला लग्न Libra Ascendant

इस लग्न के लिए शुक्र तथा बुध दोनों ही शुभ है. शुक्र लग्नेश है और बुध नवमेश होकर शुभ बन जाता है. मंगल इस लग्न के लिए प्रबल मारक ग्रह बन जाता है क्योकि मंगल दूसरे और सातवें भाव का स्वामी है. सूर्य एकादशेश होकर बाधकेश बन जाता है क्योकि तुला चर राशि है और चर के लिए एकादश भाव का स्वामी बाधक है. बृहस्पति इस लग्न के लिए शुभ नहीं है क्योकि तीसरे और छठे भाव का स्वामी होता है. साथ ही बृहस्पति, लग्नेश शुक्र का शत्रु भी है इसलिए यह शुभ फल प्रदान नहीं करेगा.

वृश्चिक लग्न | Scorpio Ascendant

इस लग्न के लिए बृहस्पति शुभ है क्योकि यह पांचवें भाव का स्वामी है, चंद्रमा शुभ है क्योंकि यह नवम भाव का स्वामी होने से भाग्येश है. शनि, बुध और शुक्र इस लग्न के लिए शुभ नही माने गये हैं. शुक्र सातवें और बारहवें भाव का स्वामी होने से मारकेश बन जाता है. बुध भी दो अशुभ भावों अष्टम और एकादश का स्वामी होता है. शनि तीसरे और चौथे का स्वामी होने से अशुभ होता है. मंगल इस लग्न के लिए सम माना गया है क्योंकि इसकी मूल त्रिकोण राशि छठे भाव में पड़ती है.

धनु राशि | Sagittarius Ascendant

इस लग्न में मंगल की मूल त्रिकोण राशि मेष पंवम भाव में पड़ती है, इसलिए मंगल इस लग्न के लिए शुभ माना गया है. सूर्य इस लग्न के लिए भाग्येश है और इसलिए शुभ है. बुध को भी शुभ ही माना गया है क्योकि यह दशम भाव का स्वामी होता है लेकिन सप्तमेश होने से मारक का कार्य भी करेगा. शुक्र छठे तथा एकादश भाव का स्वामी होने से और लग्नेश बृहस्पति का शत्रु होने से अशुभ ही माना जाता है. इस लग्न में बुध को केन्द्राधिपति दोष भी लगता है लेकिन यदि बुध पंचमेश मंगल के साथ युति करता है तो अच्छे फल दे सकता है. बुध, चंद्र अथवा बृहस्पति के साथ सहचर्य में अच्छा फल प्रदान करता है.

मकर लग्न | Capricorn Ascendant

इस लग्न के लिए शुक्र केन्द्र तथा त्रिकोण का स्वामी होने से योगकारक बन जाता है और शुभ फल प्रदान करता है. बुध इस लग्न के लिए नवमेश होता है और अत्यधिक शुभ माना जाता है. मकर चर लग्न है इसलिए मंगल एकादशेश होने से बाधकेश हो जाता है और शुभ फल प्रदान नहीं करता है. सूर्य अष्टम का स्वामी होने से सम माना जाता है. वैसे तो सूर्य अष्टमेश है लेकिन सूर्य तथा चंद्रमा को अष्टमेश का दोष नही लगता है. बृहस्पति तीसरे भाव का स्वामी है और बारहवें भाव का स्वामी है. इसलिए यह अशुभ फल प्रदान करने वाला होता है.

कुंभ लग्न | Aquarius Ascendant

इस लग्न के लिए शुक्र केन्द्र – त्रिकोण का स्वामी होकर योगकारक ग्रह बन जाता है और इसकी दशा/अन्तर्दशा में जातक को शुभ फलों की प्राप्ति हो जाती है. शनि इस लग्न का स्वामी हो और शुक्र लग्नेश का मित्र भी होता. इसलिए दोनो और शुभ बन जाते हैं. बृहस्पति एकादश और द्वितीय भाव का स्वामी है. चंद्रमा छठे भाव का स्वामी होकर अधिक शुभ नहीं है. मंगल तीसरे भाव का और सूर्य सप्तम भाव का स्वामी होने से शुभ नहीं माने जाते. ये तीनो ग्रह मारक के समान है और लग्नेश शनि के शत्रु भी हैं. इस लग्न के लिए बुध पंचमेश और अष्टमेश होने पर मिश्रित फल प्रदान करने वाला होगा.

मीन लग्न | Pisces Ascendant

इस लग्न के लिए मंगल नवमेश होकर शुभ है तथा चंद्रमा भी पंचमेश होकर शुभ बन जाता है. बृहस्पति है ही लग्नेश और तीनो ग्रह आपस में नैसर्गिक मित्र भी है इसलिए यह शुभ फल ही प्रदान करते हैं. वैसे तो मंगल दूसरे भाव का स्वामी होने से मारक भी बनता है लेकिन लग्नेश का मित्र होने से मारक का कार्य नहीं करता. बाकी बचे सभी ग्रह इस लग्न के लिए अशुभ ही माने जाते हैं.

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खुद जाने, की क्या आपकी कुंडली में भी बनता है काल सर्प दोष ?

ज्योतिष में बहुत से अच्छे अथवा बुरे योगों का उल्लेख किया गया है. इन्हीं योगो में से एक योग कालसर्प योग भी है. इस योग के बारे में बहुत सी भ्रांतिया लोगो के मध्य फैली हुई है. किन्तु सही क्या है यह कहना बहुत ही कठिन काम है. कई ज्योतिषियो का यह भी मानना है कि यह कालसर्प योग जितना ऎश्वर्य प्रदान करने वाला होता है उतना ही कष्ट भी प्रदान करता है. कई लोगों का मानना है कि इस योग के बनने पर व्यक्ति धन संपदा से संपन्न होता है लेकिन उसे कुछ ना कुछ कष्ट जीवन में अवश्य उठाने पड़ सकते हैं. वैसे तो कुण्डली के सभी बारह भावों में बनने वाले कालसर्प योगों का फल भिन्न होता है लेकिन कुण्डली के छ: भाव ऎसे भी है जिनमें बनने वाले कालसर्प योग जातक को कष्ट प्रदान करते हैं. इन छ: भावों में बनने वाले कालसर्प योग का व्यक्ति के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है.

प्रथम से सप्तम तक | First to Seventh House

पहले भाव से लेकर सातवें भाव तक बनने वाले इस कालसर्प योग में अल्ग्न और सप्तम भाव प्रभावित होता है. इस योग में जातक का वैवाहिक जीवन अत्यधिक प्रभावित हो जाता है. अपने खराब वैवाहिक जीवन के कारण व्यक्ति सन्यासी तक बन जाता है. जातक को अपने जीवन के आरंभ काल में संघर्ष करना पड़ जाता है. मध्यकाल में भी परेशानियाँ पीछा नहीं छोड़ती है, जकड़े रहती हैं. यदि जीवन में कभी किसी महिला की सहायता मिल भी जाए तो किसी अन्य महिला के कारण जातक फिर पीछे हो जाता है.

द्वित्तीय से अष्टम भाव तक | Second to Eighth House

दूसरे भाव से धन का आंकलन किया जाता है. इसलिए इस भाव में कालसर्प योग के बनने पर जातक जीवनभर निर्धन रहता है. जो भी धन जातक के पास होता है वह सभी वह बुरे कामों में खर्च कर देता है. ऎसे जातक के ऊपर से सभी का भरोसा उठ जाता है. कामी होता है और बहुत सी स्त्रियों के सम्पर्क में रहता है. व्यक्ति की वाणी भी बहुत खराब रहती है. ऎसे आदमी को लोग काली जुबान का भी मानते हैं.

तृतीय से नवम भाव तक | Third to Ninth House

तीसरे भाव से लेकर नवम भाव तक बनने वाले कालसर्प योग में व्यक्ति के बिजनेस का संबंध विदेशों से स्थापित होता है लेकिन जातक को बहुत सी हानि का सामना करना पड़ सकता है. जातक के बहुत से शत्रु भी बढ़ सकते हैं. कई उच्चाधिकारियों से संबंध बिगड़ सकते हैं और हानि भी होने की संभावना बनती है.

चतुर्थ भाव से दशम भाव तक | Fourth to Tenth House

चौथे भाव से दसवें भाव तक बनने वाले इस कालसर्प योग में व्यक्ति को जीवन में मान सम्मान की बजाय मान हानि ज्यादा उठानी पड़ जाती है. यदि कोई संतान गोद ली हुई है तब उस से अपमान का सामना करना पड़ सकता है. व्यक्ति कई बार अपनी पैतृक धन सम्पदा को भी खो सकता है. कार्यक्षेत्र में भी पूर्ण रुप से सफलता हासिल नही होती है.

पंचम से एकादश भाव तक | Fifth to Eleventh House

पांचवे भाव से लेकर एकादश भाव तक बनने वाले कालसर्प योग में जातक को अपने मित्रों से धोखा मिलने की संभावना बनती है. इस कारण कई बार व्यक्ति निष्ठुर बन जाता है और सभी पर से अपना विश्वास खो देता है. अपनी मनमर्जी अधिक करता है दूसरों की नहीं सुनता है. अपनी इस बुरी आदत के कारण अपमान सहना पड़ सकता है. लाभ के स्थान पर हानि का सामना करना पड़ता है.

षष्ठ भाव से द्वादश भाव तक | Sixth to Twelfth House

छठे भाव से बारहवें भाव तक बनने वाले कालसर्प योग से व्यक्ति को जीवन में अत्यधिक कष्टों का सामना करना पड़ सकता है. रोग, ऋण तथा शत्रुओं से घिरा रह सकता है. इन भावों में बनने वाला यह योग अति घातक सिद्ध हो सकता है. जातक जेल तक जा सकता है. जातक का स्वास्थ्य भी खराब रह सकता है. आपके छिपे हुए शत्रु आपको परेशान कर सकते हैं.

छठे भाव से लेकर बारहवें तक बनने वाले इस कालसर्प योग से व्यक्ति या तो एकदम सुखी रहता है या एकदम दुखी रहता है. इस योग के प्रभाव से व्यक्ति लेखक भी बन सकता है. कलाक्षेत्र से भी व्यक्तिे अच्छी आजीविका अर्जित कर लेता है.

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