वैदिक ज्योतिष के अनुसार सूर्य जब एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है तब उस समयावधि को संक्रान्ति कहते हैं. भचक्र में कुल 12 राशियाँ होती हैं. इसलिए सूर्य संक्रान्ति भी बारह ही होती है. इन बारह संक्रान्तियों को हमारे ऋषियों ने चार भागों में बाँटा है – अयनी संक्रान्ति, विषुवी संक्रान्ति, षडशीतिमुखी संक्रान्ति और विष्णुपदी संक्रान्ति.
- सूर्य जब मिथुन राशि से कर्क राशि में और धनु से मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तब यह अयनी संक्रान्ति कहलाती है.
- मेष तथा तुला राशि पर सूर्य के संक्रमण को विषुवी संक्रान्ति कहते हैं.
- मिथुन, कन्या, धनु तथा मीन राशि पर सूर्य के संक्रमण को षडशीतिमुखी संक्रान्ति कहते हैं.
- वृष, सिंह, वृश्चिक तथा कुंभ राशियों पर सूर्य के संक्रमण को विष्णुपदी संक्रान्ति कहते हैं.
ज्योतिष में तथा शुभ कार्यों के सन्दर्भ में उत्तरायण को अधिक शुभ माना जाता है. उत्तरायण से दिन बढ़ने अर्थात बडे़
होने आरम्भ हो जाते हैं. दक्षिणायन में दिन घटने अर्थात छोटे होने आरम्भ हो जाते हैं. उत्तरायण से दिन बढ़ने आरम्भ होकर पूर्णता को प्राप्त होते हैं. दक्षिणायन में दिन छोटे होकर न्यूनता को प्राप्त होता है. इसलिए प्रकाश की न्यूनता-अधिकता के कारण ही दक्षिणायन की तुलना में उत्तरायण को अधिक महत्व दिया गया है.
सायन गणना के अनुसार आधुनिक समय में 22 दिसम्बर से सूर्य उत्तरायण और जून दक्षिणायन होना आरम्भ हो जाते हैं. संक्रान्तिकाल दान-पुण्य, स्नानादि का महत्व माना गया है सभी 12 संक्रान्तियों मकर संक्रान्ति को अत्यधिक पुण्यदायक है.
संक्रान्ति प्रवेशकाल वर्ष 2025 | Niryan Sankranti Beginning time 2025
| संक्रान्ति का नाम | दिनाँक तथा वार | प्रवेशकाल | पुण्यकाल समय |
|---|---|---|---|
| माघ संक्रान्ति | 14 जनवरी, मंगलवार | 26:43 घण्टे घण्टे | दोपहर 15:19 तक |
| फाल्गुन संक्रान्ति | 12 फरवरी, बुधवार | 21:56 घण्टे घण्टे | मध्याह्न बाद से होगा |
| चैत्र संक्रान्ति | 14 मार्च, शुक्रवार | 18:50 घण्टे घण्टे | सूर्य उदय के बाद सारा दिन |
| वैशाख संक्रान्ति | 14 अप्रैल, सोमवार | 21:04 घण्टे घण्टे | 09:45 तक |
| ज्येष्ठ संक्रान्ति | 14 मई, बृहस्पतिवार | 05:44 घण्टे घण्टे | 07:46 तक |
| आषाढ़ संक्रान्ति | 15 जून, रविवार | 24:27 घण्टे घण्टे | 13:08 तक |
| श्रावण संक्रान्ति | 16 जुलाई, बुधवार | 11:19 घण्टे घण्टे | 17:30 पर आरंभ होगा |
| भाद्रपद संक्रान्ति | 17 अगस्त, रविवार | 19:44 घण्टे | प्रात:काल 08:16 बाद तक |
| आश्विन संक्रान्ति | 17 सितम्बर, बुधवार | 19:43 घण्टे | 08:11 तक |
| कार्तिक संक्रान्ति | 17 अक्तूबर, शुक्रवार | 07:42 घण्टे | दोपहर 14:06 तक |
| मार्गशीर्ष संक्रान्ति | 16 नवम्बर, रविवार | 07:32 घण्टे | शाम 07:12 तक |
| पौष संक्रान्ति | 16 दिसम्बर, मंगलवार | 22:10 घण्टे | 10:43 तक |


प्रदोष व्रत त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है और इस दिन भगवान शंकर की पूजा की जाती है. यह व्रत शत्रुओं पर विजय हासिल करने के लिए अच्छा माना गया है. प्रदोष काल वह समय कहलाता है जिस समय दिन और रात का मिलन होता है. भगवान शिव की पूजा एवं उपवास- व्रत के विशेष काल और दिन रुप में जाना जाने वाला यह प्रदोष काल बहुत ही उत्तम समय होता है. प्रदोष तिथि का बहुत महत्व है, इस समय की गई भगवान शिव की पूजा से अमोघ फल की प्राप्ति होती है.
हिन्दु माह के अनुसार चतुर्थी तिथि को गणेश चतुर्थी के नाम से मनाया जाता है. इस दिन गणेश जी के व्रत व पूजा का विधान है, जो श्रद्धालु इस व्रत को करते हैं तब भगवान गणेश उनके सभी संकटों को दूर करते हैं इसलिए इन्हें विघ्नहर्ता भी कहा गया है. सुबह सवेरे स्नान आदि से निवृत होकर व्रत रखने का विधान है.
पंचक का अर्थ है – पांच, पंचक चन्द्रमा की स्थिति पर आधारित गणना हैं. गोचर में चन्द्रमा जब कुम्भ राशि से मीन राशि तक रहता है तब इसे पंचक कहा जाता है, इस दौरान चंद्रमा पाँच नक्षत्रों में से गुजरता है. ऎसे भी कह सकते हैं कि धनिष्ठा नक्षत्र का उत्तरार्ध, शतभिषा नक्षत्र, पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र, उत्तराभाद्रपद नक्षत्र, रेवती नक्षत्र ये पाँच नक्षत्र पंचक कहलाते है. बहुत से विद्वान धनिष्ठा नक्षत्र का पूरा भाग पंचक में मानते हैं तो कुछ आधा भाग मानते हैं. पंचक के समय में कोई भी शुभ कार्य करना वर्जित होता है. इस समय में किया गया कार्य पाँच गुना बढ़ जाता है.