24 जनवरी 2020 में शनि ग्रह का प्रवेश मकर राशि में होगा. 2020 से 2022 के आरंभ तक शनि मकर राशि में ही गोचर करेंगे. 11 मई 2020 को मकर राशि में ही वक्री होकर गोचर करेंगे. इसके बाद 29 सितंबर 2020 को मार्गी होकर मकर राशि में गोचर करेंगे. मकर

वैदिक ज्योतिष के अनुसार सूर्य जब एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है तब उस समयावधि को संक्रान्ति कहते हैं. भचक्र में कुल 12 राशियाँ होती हैं. इसलिए सूर्य संक्रान्ति भी बारह ही होती है. इन बारह संक्रान्तियों को हमारे ऋषियों ने चार

किसी भी मुख्य कार्य को करने के लिए ज्योतिष में शुभ मुहूर्त विचार के बारे में बताया गया है. कई बार परिस्थिति वश अथवा समय के अभाव के चलते उपयुक्त समय न मिल पाने के कारण कोई सुनिश्चित या निर्धारित मुहूर्त नही मिल पाता है, तब उस समय अमृत

ज्योतिष में खरीदारी करने से संबंधित कई योगों के बारे में विवरण मिलता है. जिनमें शुभाशुभ फलों की प्राप्ति हो सकती है. इन्ही योग में से ऎसे दो योग हैं द्विपुष्कर योग और त्रिपुष्कर योग. इन योगों में भूमि संपति से संबंधित कार्य शुभ होते हैं.

प्राचीन काल से, भारतीय वैदिक ज्योतिष में ऋषियों ने सोलह संस्कारों का वर्णन किया है. इन सोलह संस्कारों के अन्तर्गत यह भी कहा जाता है कि बच्चे के मुण्डन संस्कार समारोह के बारे में भी उल्लेख किया गया है। वर्ष 2020 में, मुण्डन संस्कार समारोह

प्रत्येक माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को शिवरात्रि व्रत रखा जाता है. शिवरात्रि के दिन पूरा दिन निराहार रहकर इनके व्रत का पालन करना चाहिए. रात्रि में स्वच्छ वस्त्र धारण कर शुद्ध आसन पर बैठकर भगवान भोलेनाथ का ध्यान करना चाहिए. उनके

27 नक्षत्रों में से छ: नक्षत्र ऎसे हैं जिन्हें गंडमूल नक्षत्र कहा जाता है. यह नक्षत्र दो राशियों की संधि पर होते हैं, एक नक्षत्र के साथ ही राशि भी समाप्त होती है और दूसरे नक्षत्र के आरंभ के साथ ही दूसरी राशि भी आरंभ होती है. जैसे मीन राशि

प्रदोष व्रत त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है और इस दिन भगवान शंकर की पूजा की जाती है. यह व्रत शत्रुओं पर विजय हासिल करने के लिए अच्छा माना गया है. प्रदोष काल वह समय कहलाता है जिस समय दिन और रात का मिलन होता है. भगवान शिव की पूजा एवं उपवास-

हिन्दू धर्म में अमावस्या तिथि का अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान है. अमावस्या के दिन व्यक्ति अपने पितरों को याद करते हैं और श्रद्धा भाव से उनका श्राद्ध भी करते हैं. अपने पितरों की शांति के लिए हवन आदि कराते हैं. ब्राह्मण को भोजन कराते हैं और साथ

हिन्दु माह के अनुसार कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश चतुर्थी के नाम से मनाया जाता है. इस दिन गणेश जी के व्रत व पूजा का विधान है, जो श्रद्धालु इस व्रत को करते हैं तब भगवान गणेश उनके सभी संकटों को दूर करते हैं इसलिए इन्हें विघ्नहर्ता भी

पंचक का अर्थ है - पांच, पंचक चन्द्रमा की स्थिति पर आधारित गणना हैं. गोचर में चन्द्रमा जब कुम्भ राशि से मीन राशि तक रहता है तब इसे पंचक कहा जाता है, इस दौरान चंद्रमा पाँच नक्षत्रों में से गुजरता है. ऎसे भी कह सकते हैं कि धनिष्ठा नक्षत्र का

प्रत्येक माह की पूर्णिमा तिथि को सत्यनारायण व्रत रखा जाता है, लेकिन कभी-कभी यह व्रत चतुर्दशी तिथि में भी रखा जाता है क्योंकि चन्द्रोदय कालिक एवं प्रदोषव्यापिनी पूर्णिमा ही व्रत के लिए ग्रहण करनी चाहिए. सत्यनारायण व्रत में कथा, स्नान-दान

हिन्दू धर्म में एकादशी का महत्व अत्यधिक माना गया है. इस दिन विष्णु भगवान की पूजा की जाती है और व्रत रखा जाता है. माँस-मदिरा, लहसुन-प्याज, मसूर की दाल आदि का इस दिन त्याग किया जाता है. वर्ष में कुल 24 एकादशी आती हैं. जिस वर्ष अधिकमास या

हिन्दूओं में शुभ विवाह की तिथि ज्ञात करने के लिये वर-वधू की जन्म राशि का प्रयोग किया जाता है. वर या वधू का जन्म जिस चन्द्र नक्षत्र में हुआ होता है, उस नक्षत्र के चरण में आने वाले अक्षर को भी विवाह की तिथि ज्ञात करने के लिये प्रयोग किया

हिन्दूओं में शुभ विवाह की तिथि ज्ञात करने के लिये वर-वधू की जन्म राशि का प्रयोग किया जाता है. वर या वधू का जन्म जिस चन्द्र नक्षत्र में हुआ होता है, उस नक्षत्र के चरण में आने वाले अक्षर को भी विवाह की तिथि ज्ञात करने के लिये प्रयोग किया

हिन्दूओं में शुभ विवाह की तिथि ज्ञात करने के लिये वर-वधू की जन्म राशि का प्रयोग किया जाता है. वर या वधू का जन्म जिस चन्द्र नक्षत्र में हुआ होता है, उस नक्षत्र के चरण में आने वाले अक्षर को भी विवाह की तिथि ज्ञात करने के लिये प्रयोग किया

हिन्दूओं में शुभ विवाह की तिथि ज्ञात करने के लिये वर-वधू की जन्म राशि का प्रयोग किया जाता है. वर या वधू का जन्म जिस चन्द्र नक्षत्र में हुआ होता है, उस नक्षत्र के चरण में आने वाले अक्षर को भी विवाह की तिथि ज्ञात करने के लिये प्रयोग किया

हिन्दूओं में शुभ विवाह की तिथि ज्ञात करने के लिये वर-वधू की जन्म राशि का प्रयोग किया जाता है. वर या वधू का जन्म जिस चन्द्र नक्षत्र में हुआ होता है, उस नक्षत्र के चरण में आने वाले अक्षर को भी विवाह की तिथि ज्ञात करने के लिये प्रयोग किया

हिन्दूओं में शुभ विवाह की तिथि ज्ञात करने के लिये वर-वधू की जन्म राशि का प्रयोग किया जाता है. वर या वधू का जन्म जिस चन्द्र नक्षत्र में हुआ होता है, उस नक्षत्र के चरण में आने वाले अक्षर को भी विवाह की तिथि ज्ञात करने के लिये प्रयोग किया

हिन्दूओं में शुभ विवाह की तिथि ज्ञात करने के लिये वर-वधू की जन्म राशि का प्रयोग किया जाता है. वर या वधू का जन्म जिस चन्द्र नक्षत्र में हुआ होता है, उस नक्षत्र के चरण में आने वाले अक्षर को भी विवाह की तिथि ज्ञात करने के लिये प्रयोग किया