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वैदिक ज्योतिष एवं चन्द्र दिवस तिथि (Introduction of Tithi in Vedic Jyotish)


एक चन्द्र दिवस को तिथि कहते हैं और इन तिथियों का व्यक्ति के जीवन में विशेष महत्व होता है. एक चन्द्र मास में कुल 30 चन्द्र दिवस अथवा तिथियां होती हैं. इन 30 तिथियों में पहली 15 तिथियां शुक्ल पक्ष और बाकी की 15 कृष्ण पक्ष की होती हैं. शुक्ल पक्ष की 15वीं तिथि को चन्द्रमा पूर्ण होता है, इसलिए इस तिथि को पूर्णिमा कहा जाता है. कृष्ण पक्ष की 15वीं तिथि को अमावस्या कहा जाता है, जिसका अर्थ है 'साथ में वास' क्योंकि इस दिन सूर्य और चन्द्र एक साथ वास कर युति बनाते हैं. अमावस्या को नव-चन्द्र भी कहा जाता है.

तिथि निकालने की विधि (How to calculate the Tithi)


चन्द्र मास की शुरुआत नये चन्द्रमा से होती है. सूर्य और चन्द्रमा की युति में प्रत्येक 12 डिग्री की एक तिथि होती है, इसलिए इसे निकालना बहुत ही आसान है. तिथि निकालने के लिए चन्द्रमा के अंशो से सूर्य के अंशो को घटाकर 12 से भाग किया जाता है. उदाहरण के रुप में अगर चन्द्रमा का अंश 290 है तथा सूर्य का 5 अंश तो तिथि निकालने के लिए हम 290-5/12 करेंगे तो हमें 23.75 प्राप्त होगा जो 24 के समकक्ष है. इस तरह हमें आसानी से पता चल जाता है कि 24वीं तिथि है जो कि कृष्ण पक्ष की 9 तिथी होती है.

तिथि क्या करती है (Tithi's Role in Muhurtha)


एक व्यक्ति का कार्यकलाप तिथि के कार्यकलाप से क्या सम्बन्ध रखता है यह जानने के लिए तिथि का विशेष महत्व होता है. तिथि से कर्ता अथवा व्यक्ति की खुशी और व्यवहार का आकलन किया जाता है. अगर तिथि उपयुक्त और सही हो तो कार्य व्यक्ति के पक्ष में होते हैं और उसका व्यवहार उसे अच्छे परिणाम की ओर ले जाता है. इसी तरह अगर तिथि उपयुक्त अथवा उत्तम नहीं हो तो कार्य व्यक्ति के पक्ष में नही होते और व्यक्ति को अपेक्षित परिणाम मिलने में कठिनाई होती है और अच्छा परिणाम नही मिल पाता, फिर भी इस दौरान व्यक्ति जिम्मेदारियों को पूरा करने में लगा रहता है क्योंकि उसके पास दूसरा कोई अन्य विकल्प नही होता.

तिथियों का समूह विभाजन (Categorization of Tithis in groups)


इन तिथियों को नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता और पूर्णा जैसे पांच समूहों में बांटा गया है. नन्दा तिथि से खुशी, भद्रा से सौभाग्य, जया से विजय, रिक्ता से खालीपन और पूर्णा से पूर्णता का विचार किया जाता है. पहली, छ्ठीं और ग्यारहवीं तिथि को नन्दा (Nanda Tithi), दूसरी, तीसरी और बारहवीं तिथि को भद्रा (Bhadra Tithi), तीसरी, आठवीं और तेरहवीं तिथि को जया (Jaya Tithi), चौथी, नौवीं और चौदहवीं तिथि को रिक्ता (Rikta Tithi), तथा पांचवीं दसवीं और पन्द्रहवीं तिथि को पूर्णा तिथि (Purna Tithi) के अन्तर्गत रखा गया है.

तिथियों के स्वामी (Lords of Tithis)


तिथियों के इन पाचों समूहों पर पांच ग्रहों द्वारा शासन किया जाता है. नन्दा तिथि सुख का कारक मानी जाती है जिस पर शुक्र का राज चलता है. भद्रा तिथि सौभाग्य का कारक होती है और इस पर बुध का राज चलता है. जया तिथि विजय का कारक मानी जाती है, इस पर मंगल का राज चलता है. रिक्ता तिथि से खालीपन का विचार किया जाता है और इस पर शनि का राज चलता है. इसी प्रकार पूर्णा तिथि से परिपूर्णता का विचार किया जाता है और इस पर गुरु का राज्य चलता है

तिथियों की प्रकृति (Nature of Tithis)


प्रत्येक तिथि की अपनी एक अलग प्रकृति होती है और इन तिथियों की प्रकृति से यह पता चलता है कि उस तिथि में कार्यकलापों के दौरान व्यक्ति क्या महसूस करेगा और उसका व्यवहार कैसा होगा. उदाहरण के तौर पर अगर कोई व्यक्ति चौथी तिथि में कोई कार्यकलाप करता है तो उसका व्यवहार निर्दयतापूर्ण होगा, क्योंकि चौथी तिथि रिक्ता समूह में आती है और इससे खालीपन का विचार किया जाता है.

तिथियों के देवता (Lords-Devtas of Tithis)


तिथियों के भी ग्रहों की तरह देवता होते हैं और एक तिथि के एक से अधिक देवता हो सकते हैं. किसी भी तिथि के लिये शुभ कार्य का आंकलन उसके देवता से भी किया जाता है. जैसे 14वीं (चतुर्दशी तिथि) का देवता शिव है, तो यह तिथि किसी भी काम का अंत करने के लिये शुभ है. इसी प्रकार दसवीं तिथि का देवता धर्मराज है और यह तिथि कानून से संबंधित कार्यों के लिये शुभ होगी.

तिथी और नक्षत्र के पारस्परिक सम्बन्ध (The mutual relationship of Nakshatra and Tithi)


कुछ कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए एक अलग नक्षत्र की तरह तिथि का भी होना जरुरी होता है, क्योंकि कुछ तिथि और नक्षत्र एक ही देवता के द्वारा शासित किये जाते हैं. जैसे- अगर कोई कार्यक्रम ज्येष्ठ नक्षत्र में करना उपयुक्त है तो उसे सातवीं तिथी में भी करना उपयुक्त रहेगा क्योंकि दोनों पर ही इन्द्र का राज चलता है.
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