कुम्भ राशि में शुक्र का प्रवेश और इसका प्रभाव

कुम्भ राशि शनि देव की राशि है, कुम्भ राशि में जब भी किसी ग्रह का संपर्क होता है तो वह एक महत्वपूर्ण समय होता है. मनुष्य के जीवन में धन, ऐश्वर्य और सुखों की प्राप्ति के कारक रुप में शुक्र ग्रह को अग्रीण स्थान प्राप्त है. इन्हीं से जीवन में मिलने वाले सभी प्रकार के सुखों को पाया जा सकता है. शुक्र राशि परिवर्तित करते हुए जब एक राशि से निकल कर अन्य राशि में प्रवेश करते हैं तो ये स्थिति कई मायनों में परिवर्तनकारी होती है. 

कुम्भ राशि का प्रभाव   

कुम्भ राशि शनि की राशि है ऎसे में ये राशि शनि देव की एक मजबूत राशि होती है जो शनि के शुभ फलों को प्रदान करने में बहुत सहायक होती है. जो भी व्यक्ति कुम्भ राशि के होते हैं उन पर शनि की विशेष कृपा दृष्टि भी देखने को मिलती है. कुम्भ राशि के गुण के साथ ही शनि ग्रह के गुणों का भी इन पर प्रभाव पड़ता है. कुम्भ राशि के मजबूत और आकर्षक स्वरुप को दर्शाती है. यह अपने भीतर कई गुढ़ तथ्य लिए भी होती है. इस राशि के लोगों को समझ पाना आसान नही होता है. इस राशि के लोगों के मन के भीतर अनेक प्रकार की उथल-पुथल का माहौल बना होता है. प्रभावशाली व्यक्तित्व के अधिकार की प्राप्ति में भी ये राशि सफल होती है. 

कुंभ राशि से संबंधित लोगों में संकोच, गंभीरता, संवेदनशीलता जैसी बातों के साथ ही जीवंतता और दिखावटीपन भी हो सकता है. निरर्थक चीजों को खुद पर लादे हुए इनमें गहराई भी झलकती है. इच्छाशक्ति, सशक्त और मजबूत प्रतिबद्धता इनके भीतर मौजूद होगी. ईमानदारी इनका विशेष गुण है चाहे कितना भी दिखावा हो लेकिन सत्य से ये मुकरते नही हैं. मनोवैज्ञानिक दृष्टि के साथ इनकी प्रखरता भी बहुत होती है. निष्पक्ष और सहनशीलता इस राशि के लोगों में देखने को मिलती है. 

कुम्भ राशि नक्षत्र 

कुम्भ राशि में धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वषाढा नक्षत्र आते हैं. कुंभ राशि, राशि चक्र में ग्यारहवें स्थान पर आती है और काल पुरुष के लिए यह लाभ स्थान की राशि बनती है. धनिष्ठा नक्षत्र का 3 और 4 चरण, शतभिषा नक्षत्र के सभी 4 चरण और पूर्वाभाद्र नक्षत्र का 1, 2 और 3 चरण इसमें शामिल होता है. 

धनिष्ठा नक्षत्र का स्वामी मंगल होता है.

शतभिषा नक्षत्र का स्वामी राहु होता है 

पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र का स्वामी गुरु होता है.

कुंभ राशि नाम अक्षर 

कुंभ राशि वालों के लिए नाम अक्षर के अंतर्गत -गु, गे, गो, सा, सी, सू, से, सो, दा अक्षर आते हैं. कुम्भ राशि में जन्म लेने वाले लोगों का नाम इन्हीं अक्षरों से आरंभ है. 

शुक्र ग्रह और कुम्भ राशि मिलान फल 

शुक्र का कुम्भ राशि के साथ होना सामान्य ओर अनुकूल स्थिति का माना जाता है. इसका मुख्य कारण है की ज्योतिष दृष्टि में शुक्र ओर शनि दोनों एक दूसरे के साथ मैत्री भाव निभाते हैं इस कारण से शुक्र ग्रह का कुम्भ राशि में गोचर पंचधा मैत्री के फलों को देने वाला होता है. 

कुम्भ और शुक्र का योग मिलकर व्यक्ति को आकर्षक व्यक्तित्व प्रदान करने वाला होता है. ऎसे व्यक्ति देखने में मध्यम व लंबे कद के, दुबले, क्रियाशील होते हैं. मानसिक रुप से नकारात्‍मक और सकारात्मक के मध्य इनका द्वंद बहुत होता है. आलस्य से दूर रह कर काम में लगे रहने वाले और मजबूत इच्छा शक्ति वाले भी होते हैं. दिमागी रूप से इतने सजग होते हैं कि इन्‍हें प्रशंसा और चापलूसी जैसी बातें आसानी से प्रभावित नही कर पाती है. जीवन के प्रति एक अलग दृष्टिकोण में इनमें देखने को मिल सकता है. आसानी से बहलाया नही जा सकता है. विचरओं में परंपरा और आधुनिकता का संगमन भी होता है. नियमों और सिद्धांतों पर चलना अधिक पसंद करते हैं. सामाजिक रुप से  कई बार खुद को अलग भी कर सकते हैं. अपने साथी को संतोषजनक पाने पर उनका पूरा साथ देंगे लेकिन असहयोग की स्थिति में रिश्ते से अलग होने में देर नहीं लगाते हैं. 

शुक्र का कुम्भ राशि में गोचर प्रभाव 

शुक्र के कुम्भ राशि में आने पर व्यक्ति के भीतर प्रगतिशील,स्वतंत्र विचार अधिक दिखाई देते है. भावनात्मक अभिव्यक्ति से भागना इनकी कमजोरी होती है. कुछ मनमौजी, दृढ़ और अकेले रहना अधिक पसंद करते हैं. मित्रों के साथ मस्ती, सहायता करना, बौद्धिक वार्तालाप में कुशल होते हैं. 

जहां कुंभ राशि में जन्मे लोग कुछ संकोची और शांत स्वभाव के देखने को मिलते हैं पर अगर शुक्र की स्थिति कुम्भ में होतो उनका एक उन्मुक्त और स्वच्छ्ंद व्यवहार भी दिखाई दे सकता है. ऊर्जावान होकर काम करना पसंद करते हैं. गूढ़ विचारशील और बौद्धिकता से भरे होते हैं. शुक्र जल्दी और आसानी से परिवर्तन की क्षमता देने वाला होता है. व्यक्ति को इसी के कारण से समूह या एक समुदाय अच्छा भी लग सकता है. दूसरे लोगों के साथ घिरे रहने का प्रयास भी करते हैं.

कुंभ में जन्मे जातकों के लिए सबसे बड़ी समस्या यह एहसास है कि वे सीमित या विवश हैं। सभी के लिए स्वतंत्रता और समानता की इच्छा के कारण वे हमेशा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और गतिविधि सुनिश्चित करने का प्रयास करेंगे। कुंभ राशि में जन्मे लोगों की ठंडे और असंवेदनशील व्यक्तियों रूप में एक प्रतिष्ठा है, लेकिन यह समय से पहले अंतरंगता के खिलाफ सिर्फ उनका सुरक्षा तंत्र है। उन्हें एक स्वस्थ तरीके से अपनी भावनाओं को व्यक्त करने और दूसरों पर भरोसे के लिए सीखने की जरूरत है।

बौद्धिक उत्तेजना कुंभ राशि के लिए अब तक की सबसे बड़ी कामोद्दीपक होती है। एक व्यक्ति के साथ एक दिलचस्प वार्तालाप की तुलना में कुंभ को आकर्षित करने योग्य कुछ भी नहीं है। खुलापन, संवाद, कल्पना और जोखिम की इच्छा इस राशि के जीवन के परिप्रेक्ष्य में अच्छी तरह से समाने वाले गुण हैं। इस गतिशील व्यक्ति के साथ एक लंबी अवधि के रिश्ते चाहने वाले लोगों में निष्ठा और ईमानदारी सबसे जरूरी है। प्यार में वे वफादार और प्रतिबद्ध हैं हक जताने वाले नहीं – वे अपने साथियों को स्वतंत्रता देंगे और उन्हें बराबर मानते हैं।

परिवार और दोस्त 

शुक्र का कुम्भ राशि में होना आपको परिवार के प्रति संवेदनशील और भावुक बनाता है. मिलनसार होकर सभी को साथ लेकर चलने की प्रवृत्ति भी इनमें देखी जा सकती है. लोगों का करीबी होने के लिए समय की जरूरत है और ये स्थिति उस समय को देने वाली होती है. दोस्तों के साथ कुछ नयी चीजों पर काम करते हैं कुछ नए आविष्कार करने का मौका भी मिलता है. मजबूत विचारों के साथ काम करते हैं. अपनी प्रिय वस्तु के लिए आत्म बलिदान जैसा कदम भी उठाने से पिछे नही हटते हैं.

रचनात्मकता से युक्त काम करने में आगे रहना चाहते हैं. अखंडता इनका गुण भी है परिवार हो या मित्रता, उम्मीदें बहुत अधिक रखते हैं और दूसरों के लिए उन उम्मीदों को पूरा भी करने वाले होते हैं.

नौकरी और व्यवसाय 

कुम्भ राशि में सूर्य का गोचर नौकरी में उत्साह भर देता है और व्यावसायिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए व्यक्ति बेहतरीन कुशलता का उपयोग करता है. व्यक्ति में अपनी सोच की शक्ति का बेहतर रुप से उपयोग करने की उल्लेखनीय क्षमता होती है. विकास और प्रदर्शन में सक्षम बनाने वाला काम अनुरूप होता है. प्रतिभा को साझा करने की इच्छा और तीक्ष्ण बुद्धि से काम करने वालों को प्रेरणा मिलती है. 

आर्थिक मामलों में आप बचत और निवेश में संतुलन बनाना जानते हैं. फैशन के प्रति सजग होंगे लेकिन व्यर्थ के दिखावे से भी बचते हैं. चमक दमक से थोड़ा दूर रहना पसंद करते हैं लेकिन अपनी उपस्थिति को बहुत अच्छे ढंग से दिखा सकते हैं. अभिनय, लेखन, शिक्षण, कला इत्यादि से जुड़े क्षेत्र अनुकूल रह सकते हैं. दिशा निर्देशों के बिना समस्या का समाधान करने की स्वतंत्रता ज्यादा पसंद आती है. 

 शुक्र ग्रह का गोचर एक प्रमुख घटना है और सभी ग्रहों की तरह शुक्र भी एक महत्वपूर्ण ग्रह है. यह जीवन में सभी प्रकार के सुखों का द्योतक है और यही वजह है कि, शुक्र का गोचर व्यक्ति के जीवन में अनेक शुभ घटनाओं की दस्तक लाता है। वास्तव में शुक्र एक ऐसा ग्रह है जो नैसर्गिक रूप से शुभ माना जाता है और आमतौर पर शुभ प्रभाव ही देता है जब तक की कुंडली में इसकी स्थिति अत्यधिक प्रतिकूल ना हो.  

Posted in astrology yogas, horoscope, transit, vedic astrology | Tagged , , , | Leave a comment

सूर्य शुक्र का युति योग क्यों प्रभावित करता है प्रेम संबंधों को ?

ज्योतिष शास्त्र में इन दोनों ग्रहों का एक बेहतर स्थान है. सूर्य ग्रह क्रूर होकर भी शुभता को दर्शाते हैं वहीं शुक को भी शुभ ग्रह माना जाता है. पर जब बात आती है इन दोनों के एक साथ होने की तब इस शुभता में कुछ कमी को देखा जा सकता है. इन दोनों ग्रहों का मिलन युति योग में तब अधिक परेशानी दे सकता है जब यह अंशात्मक रुप में अधिक नजदीक होता है. ऎसे में यह शुभ नहीं होता है क्योंकि जब शुक्र ग्रह सूर्य के करीब आता है तो वह अस्त हो जाता है. अस्त होने के साथ साथ शुक्र का कारक तत्व भी कमजोर होने लगता है. शुक्र की शुभता में जो प्रभाव होता है वह अपनी शुभता को कमजोर स्वरुप में पाता है. शुक्र का योग शुक्र के जल तत्व की  हानि करने जैसा होता है. यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि शुक्र ग्रह की सूर्य के साथ जिस राशि में युति योग बनता है वह कौन सी राशि है जिसका प्रभाव शुक्र पर देखने को मिलता है. 

सूर्य को अग्नि तत्व का ग्रह माना जाता है. ज्योतिष अनुसार प्राण एवं आत्मा का आधार भी सूर्य ग्रह ही होता है. सूर्य अत्यंत गर्मी युक्त, अग्नि तत्व, एवं तेज से भरपूर ग्रह है. सूर्य का महत्व काफी प्रभावी रहता है. किसी जन्म कुंडली में सूर्य का शुभस्थ होना प्रसिद्धि एवं मान सम्मान को प्रदान करने वाला होता है. सूर्य का प्रभाव जीवन में प्रगति के लिए बहुत ही सुखदायक होता है. अब दूसरी ओर शुक्र ग्रह भी अपनी सुंदरता एवं चमक के लिए अत्यंत प्रसिद्ध होता है. शुक्र की बात करें तो यह जल तत्व का ग्रह है. शुक्र शुभ एवं शीतल ग्रह है. शुक्र को वीर्य का कारक माना जाता है. शुक्र भौतिक सुख संपदा एवं समस्त इच्छाओं को दर्शाने वाला होता है. 

इन दोनों ग्रहों का योग जब एक साथ बनता है तो जल एवं अग्नि का संबंध दर्शाता है. इसके साथ ही शुक्र ग्रह की शुभता का असर सूर्य के साथ आने पर अस्त हो जाता है. किसी शुभ ग्रह का अस्त होना भी अशुभ माना जाता है. 

सूर्य – शुक्र की युति का फल एवं महत्व

ज्योतिष में इन दोनों ग्रहों के अलग-अलग प्रभाव दर्शाए गए हैं. सूर्य को जहां एक ओर आत्मा, मान, शक्ति, अधिकार आदि का कारक माना जाता है, वहीं शुक्र को भौतिक सुख, धन, सौंदर्य का कारक माना जाता है. ऐसे में देखा जाए तो ये दोनों ग्रह समृद्धि के कारक माने जाते हैं, लेकिन क्योंकि जब भी कोई ग्रह सूर्य के करीब आता है तो अस्त हो जाता है, ऐसे में सूर्य और शुक्र की युति बहुत अधिक अनुकूल नहीं मानी जाती है. 

ग्रहों का योग ज्योतिष में विशेष स्थिति को दर्शाता है. इस योग के द्वारा गोचर एवं जन्म कुंडली दोनों पर ही इस योग का प्रभाव स्पष्ट रुप से कई प्रकार से देखने को मिलता है. ज्योतिष अनुसार सूर्य का योग जब किसी ग्रह के साथ होता है तब इसके कारण कई तरह के योगों निर्मित होते हैं.  सूर्य और शुक्र का योग जब बनता है तो इन दोनों ग्रहों के फलों का मिला जुला असर दिखाने वाला होता है. यह युति योग जन्म कुंडली में बने या फिर गोचर में निर्मित होने पर अपना एक खास असर डालता है.

व्यक्ति स्वभाव से सुन्दर और महत्वाकांक्षी हो सकता है. उसके पास दूसरों का मार्गदर्श करने का गुण होता है वह बोलचाल में कुशल होता है,  स्वभाव से धार्मिक हो सकता है और धार्मिक गतिविधियों में शामिल हो सकता है. गुरु द्वारा धार्मिक ज्ञान प्राप्त कर सकता है. धार्मिक यात्रा पर जाने का योग प्राप्त हो सकता है. परोपकार से युक्त काम कर सकता है. पिता का पक्ष अनुकूल रह सकता है. पिता धनी और प्रतिष्ठित व्यक्ति हो सकते हैं. जातक के जन्म के बाद पिता की आर्थिक स्थिति में सुधार हो सकता है. धन के मामले में कुछ पारिवारिक विवाद हो सकता है. इसके अलावा पिता को स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो सकती है.

जीवन साथी का सुख प्रभावित हो सकता है. जीवनसाथी अहंकारी हो सकता है. जातक का साथी ग्रर्व से युक्त तथा काफी उच्च महत्वाकांक्षी भी होता है. प्रेम संबंधों एवं दांपत्य जीवन में प्रेम अनुकूल न रह पाए. किसी न किसी कारण विवाद की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है. 

व्यक्ति आर्थिक रुप से धनी हो सकता है और विलासितापूर्ण जीवन शैली का आनंद ले सकता है. धन और ऐश्वर्य के लिए प्रसिद्ध हो सकता है. भाग्य का फल स्वयं के प्रयासों से ही प्राप्त होता. पैसों के मामले में वह भाग्यशाली हो सकता है. अच्छा ज्ञान रखता है. वह उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकता है. शुक्र और सूर्य के साथ युति करते समय यह संतान प्राप्ति की समस्या को भी दिखा सकता है. 

शुक्र – सूर्य युति के सकारात्मक और नकरात्मक पहलू 

सूर्य और शुक्र की कुछ विशेषताएं जहां शुभता को दर्शाती हैं वहीम इनके कुछ नकारात्मक पक्ष भी दिखाई देते हैं. सूर्य उग्रता और आक्रामकता से भरा है, शुक्र शीतलता और सुंदरता के बारे में है. सूर्य और शुक्र दोनों ही ऊर्जावान और रचनात्मक ग्रह माने जाते हैं. इनके एक साथ आने पर चीजें कैसी होंगी, यह देखना भी काफी दिलचस्प और ज्ञानवर्धक होता है. वैदिक ज्योतिष के अनुसार एक ही भाव स्थान एवं राशि में सूर्य और शुक्र का होना व्यक्ति को रचनात्मक एवं कलात्मकता का गुण प्रदान करने वाला होता है. व्यक्ति सामाजिक गतिविधियों में भी शामिल होता है तथा उसके पास अच्छी आकर्षण क्षमता भी होती है. सूर्य और शुक्र की युति व्यक्ति को कल्पनाशील, महत्वाकांक्षी बनाती है साथ में शांत एवं धैर्यशील गंभीरता भी प्रदान करने वाली होती है. 

इसके यदि नकारात्मक पक्ष की बात करें तो पाएंगे कि व्यक्ति कई बार दोहरे मापदंड भी अपना सकते हैं. दिखावे से अधिक जुड़े हो सकते हैं. चीजों को बढ़ा चढ़ा कर करने की प्रवृत्ति भी उसमें अधिक होती है. कुछ स्थितियों में बहुत आलसी हो सकते हैं. सूर्य शुक्र की युति में व्यक्ति अभिमानी भी हो सकता है. गलत चीजों की आदत पड़ सकती है. शराब की लत, अनैतिक इच्छाएं और अन्य विकार भी जीवन को प्रभावित कर सकते हैं. स्वभाव से कूटनीति भी अ़च्छे से करने वाले होते है. 

Posted in astrology yogas, planets, transit, vedic astrology | Tagged , , , | Leave a comment

शनि क्या रोक सकता है दूसरे ग्रहों का शुभ प्रभाव ?

नव ग्रहों का ज्योतिष शास्त्र एवं जीवन पर असर देखा जा सकता है. शनि का प्रभाव इन सभी ग्रहों के प्रभाव को कम करने अथवा प्रभावित करने में सक्षम होता है. शनि ग्रह के रूप में, लोगों की नियति में सबसे महत्वपूर्ण है. शनि ग्रह को अक्सर एक दुष्ट ग्रह के रूप में गलत समझा जाता है. शनि के बारे में आमधारणाएं उसके कष्ट को दिखाने वाली होती हैं. शनि का असर जीवन में देरी का कारण बनता है. किंतु सच इसके विपरित है क्योंकि शनि न्याय और कर्म का ग्रह है. शनि का प्रभाव जीवन में उन फलों को दिखाता है जो हमारे द्वारा किए गए फल के रुप में हमें मिलते हैं.

यदि व्यक्ति कर्मों में सही से काम करता है तो शनि नुकसान नहीं पहुंचा पाता है. शनि का असर जीवन की प्रगति में बाधा तब डालता है जब वह कुंडली के लिए खराब हो अथवा निर्बल स्थिति में हो. पर इसके साथ कड़ी मेहनत से सफल हो सकते हैं. क्योंकि शनि लोगों की कड़ी मेहनत और प्रयासों का फल अवश्य प्रदान करता है.

यदि ईमानदार व्यक्ति हैं, तो कभी भी शनि परेशानी नहीं दे पाएगा. जब तक व्यक्ति कुछ गलत नहीं कर रहा होता है तब तक वह खराब फल नहीं देता है. यदि शनि कमजोर है, तो भी इसे मजबूत करने और अच्छे फल पाने के लिए भी कई उपायों को किया जा सकता है.

शनि अन्य ग्रहों पर कैसे डालता है असर
शनि अन्य ग्रहों के शुभ फलों को कई बातों में सीमित कर सकता है. शनि ग्रह हमें धैर्य और दृढ़ता के महत्वपूर्ण सबक सिखाने में सक्षम होता है. शनि कई बार जीवन के मार्ग में कुछ रुकावटें और शुरुआती असफलताएं पैदा करके ऐसा करता है. उस समय स्थितियों में, ध्यान केंद्रित रखना चाहिए और यह निश्चित करना चाहिए कि कुछ असफलताओं का सामना करने के बाद हार न मानी जाए. यदि व्यक्ति हार मान लेता है तो शनि व्यक्ति को असीमित फल नही देता है ऎसे में अन्य ग्रहों का असर भी कमजोर होने लगता है. ज्योतिष में अन्य ग्रहों द्वारा दिए गए फलों पर शनि ग्रह के प्रभाव पर विचार करते समय कई बातों पर ध्यान रखने की आवश्यकता होती है. उदाहरण स्वरुप शनि ग्रह वृष राशि में शुक्र ग्रह के साथ बैठा हो तब वृष राशि में शनि होने का अर्थ है कि जीवन के लिए भौतिक इच्छाओं लिए आकर्षण को बढ़ाता है. इस संदर्भ में, शनि वैसा ग्रह है जो व्यक्ति को चीजों की इच्छाओं को सीमित करने में वाला होता है और इस प्रकार एक स्वस्थ जीवन शैली को प्रदान करता है.

यदि शनि के प्रभाव को समझ जाते हैं स्थितियों के आगे नहीं झुकते हैं, और अपनी सीमाओं को आगे बढ़ाना जारी रखते हैं, तो आपको यह समझना चाहिए कि एक अच्छी चीज की बहुत अधिक मात्रा जहरीली हो सकती है. वृष लग्न प्रेम के ग्रह शुक्र का स्थान है, इस स्थिति का मतलब यह हो सकता है कि आपके रिश्ते लंबे समय तक चलने वाले हैं. शनि यहां रह कर आपके प्यार की शक्ति को रोकने के लिए कुछ बाधाएं पैदा कर सकता है और यदि आप इन मुद्दों से ऊपर उठने में कामयाब हो जाते हैं, तो आपको रिश्ते में सफल होने से कोई नहीं रोक सकता है. एक ग्रह के रूप में, शनि यह दर्शाता है कि जीवन में कुछ सीमाएं उत्पन्न हो सकती हैं. यह दृष्टिकोण देता है, जो इन सीमाओं की प्रकृति को तय करता है. यदि सीमा आपको वह प्राप्त करने से रोक रही है जो आप चाहते हैं, और जो वास्तव में अच्छा है, तो आपको इसके बंधनों से उभरने के लिए हर संभव कदम उठाने चाहिए. वैकल्पिक रूप से, यदि सीमा केवल आपको सही दिशा में बढ़ने में मदद करने के लिए है, तो आपको इसका सम्मान करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आप अपने कार्यों के लिए पूरी जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए धर्म द्वारा निर्धारित तरीके से आगे बढ़ें. अपने पिछले कार्यों के माध्यम से, शनि ग्रह हमेशा अच्छाई को संभाले रखने और उन पहलुओं को प्रतिबंधित करने के लिए जाना जाता है जो लाभकारी नहीं होते हैं.

अन्य ग्रहों पर शनि का प्रभाव
एक मजबूत, धीमे ग्रह के रुप में, शनि प्रत्येक राशि से गुजरने पर अपना प्रभाव छोड़ने की कोशिश करता है. शनि समय भी अधिक लेता है. शनि ग्रह मकर राशि और कुंभ राशि का स्वामी होता है. शनि को चंद्रमा के शत्रु के रूप में जाना जाता है.

शनि प्रथम भाव में गोचर करता है
कुंडली में यदि शनि ग्रह वक्री स्थिति में पहले घर में होता है, तो यह स्थान व्यक्ति के लिए भाग्य का मार्ग खोलने वाला बनता है. सकारात्मक रुप से जीवन व्यतीत करने में सक्षम होते हैं. यदि इस स्थान पर किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में ग्रह अशुभ है, तो उन्हें हृदय की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है. दूसरे भाव में, वक्री शनि व्यक्ति को अधिक आध्यात्मिक बना सकता है. व्यक्ति को बुद्धिमान और दयालु प्रभव देने वाला होता है.

शनि तीसरे भाव में गोचर करता है
तीसरे भाव में वक्री शनि लोगों को सफल राजनेता और प्रसिद्ध सार्वजनिक व्यक्ति बनने में मदद कर सकता है. यदि शनि अशुभ स्थिति में है, तो यह स्थिति जीवन में निराशा और असफलता का कारण बन सकती है. चतुर्थ भाव में, वक्री शनि पूर्व जन्मों के प्रभाव स्वरुप स्वास्थ्य के बारे में चिंता, नकारात्मकताऔर मानसिक तनाव पैदा कर सकता है. इससे घर की शांति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है. (50gram) पंचम भाव में शनि के वक्री होने से संतान की चिन्ता तथा प्रेम में धोखा मिलने की संभावना भी बन सकती है.

शनि छठे भाव में गोचर करता है
वक्री शनि छठे स्थान में अनुकूल परिणाम देने वाला हो सकता है. यह व्यक्ति के लिए धन और विजय प्राप्ति का आशीर्वाद प्रदान करता है. यात्रा करने और शत्रुओं द्वारा बनाए गए नकारात्मक प्रभाव को दूर करने में भी मदद करता है. सप्तम भाव में भी वक्री शनि सकारात्मक है और सुखी पारिवारिक जीवन से लेकर सफलता तक सब कुछ लेकर आता है. करियर में, विशेष रूप से लोहा, इस्पात या मशीनरी से संबंधित क्षेत्रों में अच्छा अवसर देता है. इसका अगला घर आठवां है और इस घर में वक्री शनि लंबी उम्र दे सकता है लेकिन भाई-बहन आपके खिलाफ हो सकते हैं.

नवम और दशम भाव में वक्री शनि सुख, साहस और धनवान बना सकता है. महत्वाकांक्षी बना सकता है. करियर की ओर रुख रहेगा, राजनीति में काम मिलता है. एकादश भाव में भी शनि का वक्री होना एक सकारात्मक प्रभाव माना जाता है. यह जीवन में सफलता प्राप्त करने में दूसरों का सहयोग दिलाता है. बारहवें भाव में वक्री शनि सजग रहने को बनाता है.

शनि ग्रह वास्तव में कुछ स्थितियों को छोड़कर अन्य ग्रहों के शुभ फलों को सीमित नहीं करता है. जितनी अधिक मेहनत करते हैं, शनि ग्रह की कृपा उतनी ही अधिक होती है इसलिए जीवन में मजबूत बने रहना आवश्यक होता है तभी शनि के अच्छे परिणाम मिल पाते हैं.

Posted in astrology yogas, horoscope, planets, vedic astrology | Tagged , , , , | Leave a comment

अपनी कुंडली में जाने मंगल का पहले भाव में होने का विशेष फल

मंगल का प्रभाव कुंडली के हर भाव में बहुत विशेष होता है. इस ग्रह की स्थिति जातक को काफी प्रभावित करने वाली होती है. मंगल जिस भी भाव में होता है वह अपने प्रभाव को अलग-अलग तरह से दिखाता है. मंगल का असर पहले घर में होना अच्छे और खराब हर तरह के अपने प्रभाव दिखा सकता है. मंगल की स्थिति कुण्डली के पहले घर में होने पर जातक को कुछ विशेष योग मिलते हैं और साथ में जातक को यह आंतरिक रुप से भी बदलता है. जन्म कुंडली में लग्न एक विशेष भाव होता है. इस भाव में मंगल किसी भी व्यक्ति को मांगलिक बना देता है. यह ज्योतिष नियम है जिसमें मंगल का पहले घर में होना व्यक्ति को इस दशा से जोड़ देने वाला होता है. 

मंगल का प्रथम घर में होने का प्रभाव 

पहला घर स्वयं के बारे में होता है. शुरुआत के बारे में भी हम इसी भाव से देखते हैं, किसी भी व्यक्ति के जन्म का प्रभाव उस पर काफी विशेष होता है. यही प्रथम भाव का महत्व है, जिसे लग्न भी कहा जाता है. वैदिक ज्योतिष में मंगल का असर यहां होना विशेष प्रभाव देता है. यह भाग्य को प्रभावित करता है, तो पहला भाव ज्योतिष के मूल में स्थित है. ​​मंगल में लाल ग्रह भी कहा जाता है,मंगल ग्रह की बात करें तो इसे उग्र और आक्रामक ग्रह माना जाता है. मंगल ग्रह के से प्रभावित होने वाला व्यक्ति तर्क पसंद करता है और गुस्सैल स्वभाव  का होता है. जब पहले भाव में मंगल की बात आती है, तो जातक के शारीरिक रूप से मजबूत और साहसी होने की संभावना होती है. इनके व्यक्तित्व में बहुत अधिक ऊर्जा और उत्साह की विशेषता होती है.

मंगल के प्रभाव के कारण व्यक्ति गतिशील और ऊर्जा से भरपूर होता है. एक बार जब कुछ करने की ओर अपना मन लगाते हैं तो वह करते हैं कोई उन्हें रोक नहीं सकता. जीवन कार्रवाई से भरा होता है और व्यक्ति किसी भी चुनौती का सामना कर सकते हैं. लेकिन सावधान रहें कि अपनी महत्वाकांक्षा का पीछा करते हुए दूसरों को चोट न पहुंचे. प्रथम भाव में मंगल होने पर व्यक्ति एक साथ कई परियोजनाओं पर काम करने की क्षमता रखता है. अपने करियर में वह सक्रिय रहता है. लगातार कुछ नया और जोश से भरे  काम करने की इच्छा रख सकते हैं. मंगल जीवन में बहुत समृद्धि और उत्साह ला सकता है. काम करने और नियमों को लागू करने में कुशल व प्रभावी रह सकते हैं. 

मंगल का असर जातक को स्वयं को पहचानने की कोशि रखते हैं. चीजों को कैसे शुरू किया जाए. यदि दूसरे व्यक्ति के विचारों के कार्यान्वयन में बाधाएँ पैदा करते हैं, तो उन्हें हरा देने में भी आप सफल होते हैं. व्यक्ति अपने रास्ते के बारे में स्पष्ट होता है. बिना किसी शक संदेह के उसका अनुसरण करने में भी वह कुशल होता है. मंगल के प्रथम भाव के प्रभाव के अनुसार काम के अप्रत्याशित परिणाम भी मिल सकते हैं. प्रथम भाव में मंगल वाले व्यक्ति दूसरों द्वारा की गई नकारात्मक टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया नहीं देते हैं. इससे जातक पूरी तरह से सकारात्मक हो जाएंगे. इतना ही नहीं, सामाजिक प्रतिष्ठा में भी वृद्धि होती है. अपने आसपास के लोगों के बीच लोकप्रिय होते हैं. इसके अलावा, जीवन की स्थितियों पर बहुत अच्छी पकड़ होगी. जैसे, जब कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेना होता है, तो न केवल निर्णय लेते हैं बल्कि उस स्थिति में सफलता को भी पाते हैं. 

सबसे पहले, पहला घर शारीरिक गठन को दर्शाता है और मंगल की स्थिति यहां होने पर सामान्य रुप से व्यक्ति के शरिर और उसके हेल्थ पर अपना असर डालता है. प्रथम भाव में मंगल की स्थिति एक हष्टपुष्ठ देह को दर्शाती है. शारीरिक शक्ति में व्यापक रूप से वृद्धि प्राप्त होती है. मंगल, अस्थि मज्जा का कारक बनता है. समान रूप से छोटी और मध्यम के बीच शरीर की ऊंचाई को इंगित करता है. हड़ियों को सख्त और मजबूत होती हैं. यदि मंगल कमजोर हो तो यह शरीर की ताकत को भी कम करता है और हड्डियों की संरचना और मांसलता को प्रभवैत करने वाला होता है. यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि पहले भाव के स्वामी की अनुकूल स्थिति मंगल को अच्छा स्वास्थ्य देकर कुछ हद तक बचाती है लेकिन कम शारीरिक शक्ति और सहनशक्ति के साथ. ऎसे में मंगल का लग्न में होना उसके शुभाशुभ फल प्रदान करता है. 

पहला घर शरीर के स्वास्थ्य को भी दर्शाता है और मंगल यदि उचित है तो अपने अनुकूल संकेत भी देता है. कुछ मामलों में उच्च रक्तचाप को भी दर्शाता है. मंगल अच्छे स्वास्थ्य को इंगित करता है इसके अलावा, यदि प्रथम भाव का स्वामी भी अपनी राशि या उच्च में अच्छी तरह से स्थित है, तो यह असाधारण रूप से अच्छे स्वास्थ्य और सभी नकारात्मक कारकों को दूर रखता है. किंतु इसके विपरित अशुभ राशि में स्थित मंगल स्वास्थ्य को कम करता है. यदि प्रथम भाव का स्वामी मंगल हो या वहां स्थिति होकर बलवान है और शुभ राशि में स्थित है तो यह अच्छे स्वास्थ्य को दर्शाता है.

मंगल के लग्न पर होने से मंगल व्यक्ति को कई बार साहसी भी बनाता है. लग्न में अच्छी तरह से स्थित मंगल व्यक्ति को साहस, दृढ़ संकल्प, इच्छा-शक्ति और चरित्र की मजबूती को दर्शाता है. व्यक्ति स्वतंत्र रुप से स्व-निर्मित और आत्मविश्वासी भी बनता है. दूसरी ओर, मंगल अत्यधिक कमांडिंग बना सकता है, हावी, आक्रामक और उग्र स्वभाव भी देता है. मंगल यदि शत्रु राशि, अशुभ ग्रहों के साथ नकारात्मक प्रभावों में है तो इस कारण कठोर और क्रूर स्वभाव मिलता है, लेकिन आध्यात्मिक भी बना सकता है. मंगल स्वयं अच्छी स्थिति में होकर काफी सकारात्मक असर दिखाता है.

Posted in astrology yogas, horoscope, planets, vedic astrology | Tagged , , , | Leave a comment

राहु जब इनकम भाव पर डालता है अपना असर ?

ज्योतिष में सभी ग्रहों और राशियों का अपना महत्व होता है. वैदिक ज्योतिष में किसी भी अन्य भाव की तुलना में ग्यारहवें भाव का अधिक महत्व है. ग्यारहवां भाव स्थान राहु के लिए अच्छे  परिणाम देने वाला होता है. इस आधुनिक युग में राहु अतिरिक्त रुप से बलवान है. कुंडली में ग्यारहवें भाव में राहु का अर्थ होता है महत्वाकांक्षाओं को पूरा करना. जब राहु एकादश भाव में विराजमान होता है तो नए बदलाव को दिखाता है. राहु वास्तव में अन्य ग्रहों की तरह वास्तविक ग्रह नहीं है. राहु को वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा के उत्तरी नोड के रूप में जाना जाता है. इसीलिए इसे छाया ग्रह भी कहा जाता है.

राहु की कोई राशि नहीं है लेकिन यह वृष, मिथुन, कन्या, कुम्भ और तुला राशियों में अनुकूल फल देता है. कुछ लोग वृष और मिथुन राशि को राहु की उच्च राशि भी मानते हैं. राहु पाप ग्रह है जीवन में परेशानी को दर्शाता है. राहु के संबंध में इसे सूर्य और चंद्रमा के शत्रु के रूप में भी जाना जाता है. राहु का संबंध राजनेताओं से भी होता है. राहु ज्योतिष में विदेश का स्वामी है. यह इंटरनेट जैसी आधुनिक युग की तकनीक से भी जुड़ा है. इसलिए जो लोग विदेश में या विदेशी संगठन में काम कर रहे हैं, उन्हें एक मजबूत और अच्छी तरह से स्थित राहु की जरूरत होती है.इसी के साथ इंटरनेट से जुड़े काम में राहु सहायक बनता है.

वैदिक ज्योतिष में ग्यारहवें भाव में राहु का महत्व

एकादश भाव में राहु आर्थिक रुप से संपन्न बनाने में सहायक होता है. एकादश भाव को लाभ भाव कहा जाता है. ऎसे में राहु यहां होता तो लाभ में वृद्धि को दर्शाता है. लेकिन अलग-अलग लग्न के लिए ग्यारहवें भाव में बैठा राहु अलग-अलग असर दिखाने वाला होता है.

राहु का ग्यारहवें भाव में फल 

वैदिक ज्योतिष में अधिकांश घरों में राहु का नकारात्मक प्रभाव ही देखने को मिलताहै, लेकिन धन संपत्ति के मामले में राहु ग्यारहवें भाव में भाग्यशाली बना सकता है. आय भाव में राहु धन के मामले में अच्छा है और राहु की महादशा के दौरान अच्छा प्रभाव देता है.

आय भाव में राहु संपत्ति और अचल चल संपत्ति से लाभ देता है. कड़ी मेहनत के कारण व्यक्ति धनवान बनता है. जीवनशैली में वैभवपूर्ण सुख प्रदान करता है. खूब कमाने के मौके मिलते हैं. कमाई अपनी सुख-सुविधाओं पर खर्च करने वाला भी बनाता है. 

जब राहु आपके आय भाव में विराजमान होता है तो आपका व्यवसायिक रुप से योग्य बनाता है. चातुर्य देता है अपनी योजनाओं द्वारा व्यक्ति अच्छा लाभ कमा सकता है. पैसा निवेश करके लाभ प्राप्ति के मौके देता है. व्यक्ति के मन में धनवान बनने की इच्छा होती और इसी के चलते वह लगातार प्रयास भी करता है. अपनी मेहनत और लगन से धनवान बनते हैं. 

मेष लग्न के लिए राहु एकादश भाव में

मेष लग्न के लिए कुंभ  एकादशवां भाव है और कुंभ राशि में राहु काफी मजबूत होता है. यह बातूनी स्वभाव देता है व्यक्ति संवाद करने में आप माहिर होता है. अपनी बातों से किसी की भी मानसिकता बदल सकता हैं. मनोरंजन के क्षेत्र में अच्छा करियर मिलने की संभावना होती है. दूसरों को हंसा सकते हैं ऎसा गुण बहुत ही कम लोगों में देखने को मिलता है. तकनीकी क्षेत्र में भी  करियर बना सकते हैं. पैसों के मामले में भविष्य उज्ज्वल रहता है. शेयर बाजार में भी अच्छा अवसर मिल सकता है. लेकिन कभी-कभी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है जिससे आपको सफलता देर से मिल सकती है.

वृष लग्न के लिए राहु एकादश भाव में

वृष लग्न के लिए मीन राशि ग्यारहवें भाव में आती है और मीन राशि में राहु मध्यम बली होता है. व्यक्ति को तेज दिमाग वाला बनाता है राहु. आकर्षक व्यक्तित्व प्रदान करता है. प्रेम जीवन सुखमय रहता है. अच्छी शिक्षा और ज्ञान होता है. कभी-कभी कुछ उतार-चढ़ाव से गुजरना पड़ता है लेकिन संघर्ष और मेहनत से फल अवश्य मिलता है. स्वास्थ्य कमजोर रहता है जिस कारण  अपना अतिरिक्त ध्यान रखना होता है.

मिथुन लग्न के लिए राहु एकादश भाव में

मिथुन लग्न में ग्यारहवें भाव में मेष राशि आती है. मेष राशि पर मंगल का असर होता है जो राहु का शत्रु है. इसलिए राहु मेष राशि में बहुत अनुकूल सहज नहीं रह पाता है. व्यक्ति सभी के साथ बहुत दोस्ताना व्यवहार करता है. भीड़ में रहने की अपेक्षा अकेले रहना पसंद करता है. दूसरों के आदेश से अधिक अपनी बातें को सुनना पसंद करेगा. परिवार और दोस्तों के साथ संबंध अच्छे रहेंगे.आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी रहेगी.धनवान होगा और विलासितापूर्ण जीवन व्यतीत कर पाएगा. 

कर्क लग्न के लिए राहु ग्यारहवें भाव में

वृष राशि कर्क लग्न के लिए ग्यारहवें भाव में आती है. वृष राशि में राहु अत्यंत बलवान होता है. कर्क लग्न के लिए ग्यारहवें भाव में राहु अमीर बना सकता है.  सामाजिक दायरे में प्रसिद्ध और पहचाने दिलाता है. बचपन में गले या खांसी की समस्या रह सकती है. माता बहुत सी समस्याओं और अवसाद से ग्रसित हो सकती है. राहु कर्क लग्न के लोगों के लिए भौतिक लाभ के लिए अच्छा है.

सिंह लग्न के लिए राहु ग्यारहवें भाव में

सिंह लग्न के लिए मिथुन राशि ग्यारहवें भाव आती है. मिथुन राशि में राहु बलवान होता है. सिंह लग्न के लिए ग्यारहवें भाव में राहु आत्मविश्वासी बनाता है. यह आर्थिक लाभ और कमाई के लिए अच्छा होता है. जीवन में सफलता मिलती है. समस्याओं को दूर करने में सक्षम होते हैं. अपने लक्ष्यों की ओर आकर्षित होते हैं. गुस्सैल स्वभाव के होते हैं अपनी मनोवृत्ति से भरे रहते हैं.व्यक्ति नेता सरीखा होता है राजसी स्वभाव के कारण जीवन में कई बार नुकसान उठाना पड़ सकता है. 

कन्या लग्न के लिए राहु ग्यारहवें भाव में

कन्या लग्न के लिए कर्क राशि एकादश भाव में पड़ती है. कन्या लग्न के लिए एकादश भाव में राहु अच्छी और संतोषजनक जीवनशैली देता है. करियर, व्यापार, पैसा, परिवार, प्यार और हर चीज के मामले में  भाग्य का सहयोग मिल पाता है. व्यक्ति को अधिक मेहनत करने की जरूरत नहीं पड़ती है. समझदार और देखभाल करने वाला जीवन साथी प्राप्त होता है. लुक आकर्षक होता है. स्वास्थ्य संबंधी कुछ दिक्कतें हो सकती हैं. 

तुला लग्न के लिए राहु  एकादश भाव में

तुला राशि के लिए सिंह राशि ग्यारहवें भाव में आती है. सिंह राशि में राहु ग्यारहवें भाव में हो तो यह जीवन में ऊंचाईयों तक ले जाने की क्षमता रखता है. यदि यह मजबूत हो और अन्य ग्रहों का सहयोग प्राप्त हो रहा हो तो अच्छे लाभ दिलाता है. व्यावहारिक व्यक्ति तथा स्वभाव से काफी सहयोगी बनाता है. वैवाहिक जीवन में काफी दिक्कतें आ सकती हैं पार्टनर के विचारों में अंतर रहेगा. निजी जीवन से संतुष्ट नहीं रह पाते हैं.

वृश्चिक लग्न के लिए राहु एकादश भाव में

वृश्चिक लग्न के लिए कन्या राशि ग्यारहवें भाव में आती है. वृश्चिक लग्न के लिए ग्यारहवें भाव में राहु सपने और लक्ष्य को पूरा करने का उत्साह देता है. व्यक्ति अपने लक्ष्यों के प्रति समर्पित रहता है.  यह धन और संपत्ति के लिए एक अच्छा स्थान है. कन्या राशि में ग्यारहवें भाव में राहु आपको एक बहुत ही सफल व्यवसायी बना सकता है. विदेशों में भविष्य बनाने के बहुत सारे स्कोप मिलते हैं 

धनु लग्न के लिए राहु एकादश भाव में

धनु लग्न के लिए तुला राशि ग्यारहवें भाव में आती है. तुला में राहु कुछ रचनात्मक कार्यों के माध्यम से पैसा बनाने के लिए अच्छा होता है. यह एक सफल व्यवसायी बनाता है.  धनु लग्न के लिए राहु का एकादश भाव में होने से कमर दर्द की समस्या से पीड़ित रह सकते हैं. व्यवसाय में या यात्रा के दौरान बहुत सारे अजनबियों से मिलवाता हैं साहस के साथ व्यक्ति आगे बढ़ता है. 

मकर लग्न के लिए राहु ग्यारहवें भाव में

वृश्चिक राशि मकर लग्न के लिए ग्यारहवें भाव में आती है. यहां राहु कमजोर होता है और वृश्चिक राशि में तब तक लाभकारी परिणाम नहीं दे सकता जब तक कि यह युति या अन्य लाभकारी ग्रहों से प्रभावित न हो. जीवन में अनावश्यक समस्याओं और आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है. मित्र की ओर से भी समस्या का सामना करना पड़ सकता है. गलत लोगों के साथ घुलने-मिलने की प्रवृत्ति अधिक रह सकती है. 

कुंभ लग्न के लिए राहु ग्यारहवें भाव में

कुंभ लग्न के लिए धनु राशि एकादश भाव में आती है. धनु राशि में राहु कमजोर होता है. राहु धनु राशि में आपको अपनी कमाई के बारे में लगातार समस्या दे सकता है. स्थिर कमाई नहीं हो सकती है. मित्रों और सामाजिक दायरे से भी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है. व्यक्ति दिवास्वप्न देखने वाला हो सकता है. व्यक्ति के पास बहुत सारे सपने होते हैं 

मीन लग्न के लिए राहु ग्यारहवें भाव में

मीन लग्न के लिए मकर राशि ग्यारहवें भाव में होती है. मीन लग्न के लिए ग्यारहवें भाव में राहु कोमल बना सकता है. उदार बनाता है लेकिन साहस में कमी देता है. विदेशों में अच्छी तरक्की मिल पाती है. कल्पना प्रेमी होता है व्यक्ति.  राहु आर्थिक समृद्धि के लिए अच्छा रहता है.

Posted in astrology yogas, horoscope, jyotish, planets, vedic astrology | Tagged , , , , | Leave a comment

शनि आपकी कुंडली में इस भाव या राशि में देगा शुभ फल

ज्योतिष शास्त्र मे शनि का संबंध धीमी गति और लम्बे इंतजार से रहा है. शनि को एक पाप ग्रह के रुप में भी चिन्हित किया जाता रहा है. शनि को बुजुर्ग और अलगाववादी ग्रह कहा गया है. शनि मंद गति से चलने वाला ग्रह है और यह एक राशि में ढाई वर्ष तक रहता है. शनि की उपस्थिति कब हमारे लिए शुभ होती है ये समझना अत्यंत आवश्यक है. हम सभी शनि को लेकर आशंकित होते हैं लेकिन शनि अपने फलों को देने में कभी भेदभाव नहीं करता है. शनि मकर और कुंभ राशि का स्वामी ग्रह होता है. 

शनि तुला राशि में उच्च का होता है और मेष राशि में नीच का होता है. कुंभ राशि में शनि मूलत्रिकोण की स्थिति को पाता है. शनि को रोग, व्याधि, बीमारी, दीर्घायु, लोहा, विज्ञान, खोज, अनुसंधान, खनिज, कर्मचारी, नौकर, जेल, आयु, दया, संयम, बुढ़ापा, वायु तत्व, मृत्यु, अपमान, स्वार्थ, लालच, आकर्षण, आलस्य, कानून, धोखाधड़ी, शराब , काले वस्त्र, वायु विकार, पक्षाघात, दरिद्रता, भत्ता, ऋण और भूमि आदि से संबंधित माना गया है. 

शनि का कारक भाव 

वैदिक ज्योतिष में शनि को एक अशुभ ग्रह बताया गया है, लेकिन अगर यह कुंडली में शुभ स्थिति या मजबूत स्थिति में है, तो इस ग्रह के शुभ प्रभाव प्राप्त हो सकते हैं. कमजोर शनि व्यक्ति को आलसी, थका हुआ, सुस्त और प्रतिशोध की भावना को दे सकता है. शनि कुंडली के 6, 8, 12 भावों का कारक ग्रह बनता है. पीड़ित शनि के प्रभाव से लकवा, जोड़ों और हड्डियों के रोग, कैंसर, तपेदिक जैसे पुराने रोग उत्पन्न हो सकते हैं. माना जाता है कि शनि व्यक्ति को हमेशा कष्ट और दुख देते हैं, लेकिन यह सच इसके विपरित ही होता है. शनि आपको वह देता है जो व्यक्ति ने अपने जीवन में किया है. शनि देव कर्मों का फल देते हैं. शनि को श्रेष्ठ गुरु भी कहा जाता है. क्योंकि जीवन का पाठ सिखाने वाले होते हैं. शनि की महादशा, शनि की साढ़ेसाती और शनि की शैय्या पर व्यक्ति की परीक्षा होती है. इस समय उसके धैर्य, शक्ति और संयम की परीक्षा होती है.

यदि शनि कुंडली में मजबूत स्थिति में हो तो व्यक्ति को मेहनती, अनुशासित बनाता है. शनि के शुभ प्रभाव से व्यक्ति मेहनती और अपने काम के प्रति प्रतिबद्ध होता है. शनि की शुभ स्थिति व्यक्ति को रोग से मुक्त करती है और जीवन में संतुलन प्रदान करती है. इसके प्रभाव से व्यक्ति लंबी आयु प्राप्त करता है.

शनि कब शुभ फल देता है 

यदि जन्म कुंडली में शनि की स्थिति शुभ ग्रह के रूप में हो तो व्यक्ति व्यवस्थित जीवन व्यतीत करता है. वह अनुशासित, व्यावहारिक, मेहनती, गंभीर और सहनशील होता है. उसकी दक्षता बहुत अच्छी हो सकती है. यह बिना थके लगातार काम करने की क्षमता देने वाला होता है. शनि बलवान होने पर व्यक्ति को दृढ़निश्चयी और परिपक्व सोच देने में सक्षम बनाता है. 

शनि व्यक्ति को आध्यात्मिक भी बनाता है. यदि कुंडली में शनि का संबंध आठवें या बारहवें भाव से हो तो जातक कठोर साधना कर सकता है. शनि से प्रभावित व्यक्ति हर काम के प्रति सावधान और सतर्क रह कर काम कर सकता है. शनि व्यक्ति को व्यापार में निपुणता प्रदान करते हैं. इसके प्रभाव से मनुष्य प्रत्येक कार्य को पूरी लगन और दक्षता के साथ करता है.

शनि कुंडली के तीसरे, सातवें, दसवें या एकादश भाव में शुभ स्थिति में हो तो अनुकूलता प्रदान करने वाला माना जाता है. शनि वृष, मिथुन, कन्या, तुला, धनु और मीन राशि में हो तो शुभ फल देने में सहायक हो सकता है. शनि की शुभ स्थिति शुभ फल देती है, भले ही शनि कुण्डली के शुभ और लाभकारी ग्रहों से घनिष्ठ युति में हो या दृष्ट हो. शनि ग्रह कुंडली में बली होने पर भी शनि शुभ फल देता है.

नवांश कुंडली में शनि की स्थिति 

शनि की शुभता को लेकर यदि नवांश में इसकी स्थिति को समझा जाए तो यहां शनि का मजबूत होना अनुकूल रह सकता है. नवांश कुंडली में शनि अगर मेष में नहीं है तो यह शुभ फल देता है. क्योंकि मेष में शनि कमजोर स्थिति को पाता है.  एक मजबूत शनि व्यक्ति को सम्मान, लोकप्रियता, धन, मान्यता, कड़ी मेहनत, धैर्य, अनुशासन, आध्यात्मिकता, परिपक्वता, सहनशीलता और हर काम को अत्यंत दक्षता के साथ करने की शक्ति देता है. कुंडली में शनि की शुभ स्थिति गंभीर और कठिन विषयों को समझने में सहायक बनती है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में शनि तीसरे, सातवें या ग्यारहवें भाव में हो तो यह योग व्यक्ति को अनुकूल फल देने में सहायक बनता है. मेहनती और पराक्रमी बनाता है. ऐसे लोग हर बाधा को पार कर अपने जीवन में आगे बढ़ते हैं. 

शनि का भाव अनुसार फल 

जन्म कुंडली का तीसरा भाव साहस, पराक्रम का भाव होता है. यह व्यक्ति को लड़ने की क्षमता देता है और उसके बाहुबल में वृद्धि करता है. शनि जब तीसरे भाव में स्थित होता है तो छोटे भाई-बहनों के सुख में भी कमी भी दे सकता है. शनि का असर कई बार जातक को मिले जुले असर भी देता है. 

जन्म कुंडली का छठा भाव रोग, शत्रु, कर्ज, विवाद, मुकदमेबाजी और प्रतियोगिता को दर्शाता है. ऎसे में एक पाप ग्रह शनि का यहां बैठना अनुकूल फल प्रदान करने में सहायक होता है. व्यक्ति अपने शत्रुओं को परास्त करने में सहायक बनता है. छठे भाव का संबंध नौकरी से होता है और नौकरी में आने वाली प्रतियोगिताओं से भी होता है. सेवा और नौकरी से संबंधित ग्रह होकर शनि व्यक्ति को कार्यक्षेत्र में मान सम्मान देता है. छठे भाव का शनि नौकरी के माध्यम से अच्छा लाभ दिलाने में सहायक होता है. शनि का असर व्यक्ति को काम में बहुत मेहनत देता है. 

दशम भाव में शनि मजबूत होता है, काल पुरुष कुंडली के दशम भाव में मकर राशि आती है. इसलिए शनि का इस भाव में बैठना शुभ माना जाता है. व्यक्ति को कार्यक्षेत्र क्षेत्र में कड़ी मेहनत देता है और कर्म करके आगे बढ़ने वाला बनाता है. 

एकादश भाव में शनि की स्थिति आय भाव में वृद्धि को दिलाने वाली होती है. व्यक्ति को समाज कल्याण एवं परोपकारी कामों में डाल सकता है. इच्छाओं की अधिकता एवं उनकी पूर्ति में सहायक बनता है. शनि कुछ मामलों में वरिष्ठ भाई-बहनों के सुख में कमी भी देने वाला हो सकता है. 

Posted in astrology yogas, horoscope, jyotish, panchang, planets, vedic astrology | Tagged , , , | Leave a comment

शुक्र के जन्म कुंडली में नीचस्थ होने का क्या कारण और इसका प्रभाव ?

अन्य ग्रहों की तरह शुक्र भी व्यक्ति के निजी जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. यह शुभ ग्रह प्रेम जीवन में सुख और आनंद प्रदान करने वाला है. शुक्र विवाह, प्रेम संबंधों और व्यभिचार का भी कारक है. व्यक्ति की जन्म कुंडली में शुक्र की स्थिति की को देखना महत्वपूर्ण है ताकि इसके लक्षणों और अन्य ग्रहों के साथ योग के बारे में जान सकें. पौराणिक आख्यानों में शुक्राचार्य ऋषि भृगु के पुत्र हैं और दैत्यों के गुरु के रुप में विराजमान हैं. भगवान शिव द्वारा मृतसंजीवनी विद्या का ज्ञान प्राप्त करने के योग्य केवल शुक्र ही थे. ऐसा माना जाता है कि यह ज्ञान मृत व्यक्ति को भी जीवित कर देता था, शुक्र को प्रेम, विवाह, सौंदर्य और सुख का कारक माना जाता है. शुक्र यजुर्वेद और वसंत ऋतु पर नियंत्रण भी रखते हैं. उत्तर कालामृत अनुसार शुक्र को अच्छे वस्त्र, विवाह, आय, स्त्री, ब्राह्मण, पत्नी, यौन आनंद राजसिक प्रकृति, वीर्य, नृत्य-अभिनय, गौरी और लक्ष्मी से संबंधित माना गया है. मजबूत शुक्र किसी भी कुंडली में बहुत अच्छे परिणाम देता है. कमजोर शुक्र उपर्युक्त बातों के संबंध में कुछ कमियां पैदा कर सकता है.

शुक्र दो राशियों वृष और तुला का स्वामी है. यह मीन राशी में 27 डिग्री परउच्च स्थिति को पाता है. इर कन्या राशि में इसी अम्शों पर निर्बल होता है. इसकी मूलत्रिकोण तुला राशि है. शुक्र वीर्य को नियंत्रित करता है. ग्रह मंडल में गुरु के साथ शुक्र भी मंत्री है. इसका रंग तरह-तरह का होता है. “बृहत् पराशर होरा शास्त्र” के अनुसार यह जिस देवता का प्रतिनिधित्व करता है वह शची जो भगवान इंद्र की पत्नी है. यह स्त्रीलिंग का होता है. यह पंचभूतों या पांच तत्वों के बीच पानी का प्रतिनिधित्व करता है. यह ब्राह्मण वर्ण का है और इसमें राजसिक गुणों की प्रधानता है. शुक्र आकर्षक काया युक्त, सुंदर और चमकदार आंखों, काव्य, कफनाशक, वातकारक है और घुंघराले बालों वाला होता है. यह उत्तर दिशा में प्रबल होता है. यह एक अम्लीय स्वाद का प्रतिनिधित्व करता है. यह बुध और शनि के अनुकूल है. यह सूर्य, चंद्र और मंगल का शत्रु है. यह बृहस्पति को तटस्थ मानता है.

शुक्र के अन्य महत्व्पूर्ण तथ्य
यदि यह खराब ग्रहों से नकारात्मक रूप से प्रभावित होता है, तो यह आप पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है. शुक्र के खराब होने पर जीवन में शांति और आनंद नहीं मिल सकता है. स्त्रियों को शुक्र के खराब होने के कारण प्रसव के दौरान परेशानी हो सकती है. व्यक्ति की कुंडली में शुक्र की स्थिति जातक की वैवाहिक स्थिति को भी दिखाती है. यदि ग्रह नीच का है, तो आप यौन रोगों, संक्रमण, मधुमेह, या गुर्दे की पथरी से संबंधित रोग दे सकता है. इसके अलावा, यदि ग्रह अशुभ ग्रहों के प्रभाव में है, तो आपको मूत्र संबंधी समस्याएं, सूजन या जननांग अंगों का सामना करना पड़ सकता है.

कुंडली में शुभ तरह से स्थित शुक्र व्यक्ति को अपनी पसंद का काम चुनने में मदद कर सकता है. कला, चित्रकला या कविता के क्षेत्र में व्यक्ति की रुचि हो सकती है. आयकर विभाग में ऑटोमोबाइल क्षेत्र में एक बेहतर कैरियर दे सकता है. शुक्र को सौंदर्य, इच्छा और प्रेम, तरल धन का कारक माना गया है. शुक्र विवाह का मुख्य कारक है. शुक्र पुरुष के लिए प्रेमिका या पत्नी का प्रतिनिधित्व करता है. शुक्र सभी संबंधों का कारक है चाहे वह पति-पत्नी हो या मां-बेटी को दर्शाता है.

चित्रा नक्षत्र

चित्रा नक्षत्र रचनात्मकता का नक्षत्र है, चित्रों या छवियों से संबंधित कार्य, अचल संपत्ति और रिश्ते संघर्ष आदि. चित्रा नक्षत्र की कोमल अनुभूति में शुक्र को शुभता मिपती है. यहां इसका असर सकारात्मक रुप से अपना असर दिखाने वाला होता है, लेकिन यहां यह निर्बल भी होता है.

कन्या राशि
चित्रा नक्षत्र कन्या राशि के अंतर्गत स्थान पाता है. कन्या राशि का अंग होने के कारण कन्या राशि और इसका प्रतिनिधित्व भी महत्वपूर्ण हो जाता है. कन्या राशि राशि चक्र की छठी राशि है, इसलिए यह लगभग सभी चीजों का प्रतिनिधित्व करती है. कुंडली के छठे घर द्वारा दर्शाई जाने वाली चीजों को जैसे ऋण, रोग, बाधाएं, वंचितों की सेवा, सेवा कार्य, नौकरी, आदि. इसके अलावा, कन्या विश्लेषणात्मक तर्क शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है. लोगों की आलोचनात्मक प्रकृति, पूर्णतावादी और उपचार क्षमता इसमें अ़च्छी होती है. कन्या राशि का मूल प्रतिनिधित्व हाथ में गेहूं और जड़ी-बूटी लेकर नाव में सवार महिला है. तो, कन्या राशि मूल रूप से उपचार का संकेत है. कन्या राशि में उत्तरा-फाल्गुनी, हस्त और चित्रा नक्षत्र आते हैं और कन्या राशि का स्वामी बुध ग्रह होता है.

कन्या राशि में शुक्र के नीच होने के कारण
शुक्र का कन्या राशि में निर्बल होना कई बातों पर आधारित होता है. शुक्र मुख्य जीवन का प्रतिनिधित्व करता है, कन्या छठी राशि है, इसलिए इसमें संघर्ष और बाधाओं के छठे घर की ऊर्जा भी होती है. अत: शुक्र के कन्या राशि में होने पर व्यक्ति के जीवन में संबंध कारक को समृद्ध करने के लिए शुक्र को उचित वातावरण नहीं मिल रहा है. कन्या राशि में शुक्र को मिलने वाली चीजों में संघर्ष, विवाद और बाधाएँ मुख्य होती हैं. साथ ही, कन्या पूर्णता की निशानी है. तो, कन्या राशि में शुक्र किसी ऐसे व्यक्ति को दर्शाता है जो रिश्ते या जीवन साथी में पूर्णता की तलाश कर रहा होता है. जैसा कि दुनिया में कोई सही रिश्ता या साथी नहीं है, कन्या राशि में शुक्र रिश्ते में असंतोष महसूस कर सकता है और अंत में संघर्ष और विवाद हो सकता है क्योंकि वह संबंध या साथी में केवल कमियां देखता है. अत: शुक्र कन्या राशि में नीच का होता है.

शुक्र के चित्रा में नीच होने के कारण
कन्या राशि में जो नक्षत्र आते हैं उन सभी में से शुक्र को अपनी सबसे कमजोर स्थिति चित्रा नक्षत्र में प्राप्त होती है. ऐसा इसलिए है क्योंकि चित्रा रिश्तों के टकराव का नक्षत्र है. चित्रा की पौराणिक कहानी पर गौर करें तो यह वह कहानी थी जहां संध्या ने सूर्य की आग और गर्मी के कारण सूर्य का साथ छोड़ दिया और सूर्य संध्या के पिता के घर उसके साथ सुलह करने के लिए चला गया. यहां सूर्य की आग और गर्मी और कुछ नहीं बल्कि इंसान का अहंकार है जो रिश्तों को खराब करता है. या तो आप अपना अहंकार रख सकते हैं या आप अपना रिश्ता रख सकते हैं. आपके पास दोनों नहीं हो सकते. इसी कारण शुक्र की कोमलता यहां कष्ट को भी पाती है. शुक्र के 27 डिग्री पर नीच होने के कारण इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नवांश चार्ट में भी यह नीच का हो जाता है. अतः यहाँ पर दुर्बलता शक्ति तीव्र हो जाती है.

Posted in astrology yogas, planets, transit, vedic astrology | Tagged , , , | Leave a comment

धनु संक्रांति 2024 : सूर्य के राशि प्रवेश का समय

धनु संक्रांति सूर्य का धनु राशि प्रवेश समय है. इस समय पर सूर्य वृश्चिक राशि से निकल कर धनु राशि में प्रवेश करते हैं और एक माह धनु राशि में गोचरस्थ होंगे. इस गोचरकाल के समय को खर मास के नाम से भी जाना जाता रहा है. पौराणिक कथाओं के अनुसार यह एक महत्वपूर्ण दिन है जब सूर्य धनु राशि में प्रवेश करता है. उड़ीसा राज्य में इसका विशेष महत्व है जहां इस दिन को बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है इस दिन भगवान जगन्नाथ की विशेष पूजा के साथ की जाती है.

इस दिन, भारत के कई हिस्सों में, विशेष अनुष्ठानों का आयोजन भी किया जाता है. खासकर उड़ीसा में, भगवान जगन्नाथ की पूजा की जाती है. शुक्ल पक्ष में पौष मास की षष्ठी तिथि से धनु यात्रा के पर्व की शुरुआत होती है और पौष मास की पूर्णिमा तक यह पर्व संपन्न होता है. इस दिन विशेष प्रसाद तैयार किया जाता है, जिसे पूजा के दौरान भगवान को अर्पित किया जाता है. इस दिन को दान देने और पैतृक पूजा करने के लिए शुभ माना जाता है. दान क्रियाकलापों के अलावा संक्रांति जाप, पवित्र जल स्नान और पितृ तर्पण इत्यादि का विशेष महत्व होता है.

धनु संक्रांति के दिन सूर्योदय के समय सूर्य देव को जल और फूल अर्पित किए जाते हैं. भक्त अपने जीवन में सुख-समृद्धि के लिए इस दिन व्रत का पालन भी करते हैं.

धनु संक्रांति पर महत्वपूर्ण समय
धनु संक्रान्ति पुण्य काल मुहूर्त
धनु संक्रान्ति शुक्रवार, 15 दिसम्बर , 2024 को
धनु संक्रान्ति पुण्य काल – 12:16 पी एम से 05:26 पी एम
अवधि – 05 घण्टे 10 मिनट
धनु संक्रान्ति महा पुण्य काल – 03:43 पी एम से 05:26 पी एम
अवधि – 01 घण्टा 43 मिनट
धनु संक्रान्ति का प्रवेश काल समय 10:19 पी एम.

सूर्य देव ओर भगवान श्री विष्णु का पूजन किया जाता है. भगवान जगन्नाथ के पुरी मंदिर में इस दिन विशेष पूजा करने का विधान रहा है. मंदिर को सजाया जाता है और भगवान को प्रसन्न करने के लिए भक्ति गीत, धर्म ग्रंथों का पाठ तथा जागरण किर्तन इत्यादि के कार्य भी किए जाते हैं. धनु संक्रांति के समय शुद्ध मन से किया गया दान, जाप एवं प्रार्थना का कई गुण फल प्राप्त होता है.

धनु संक्रांत पर मांगलिक कार्यों पर लगती है रोक
धनु संक्रांति से मकर संक्रांति तक की अवधि को खरमास कहा जाता है, यह समय मांगलिक कामों की शुभता के लिए अनुकूल नहीं माना जाता है. इस समय पर सूर्य का गोचर धनु राशि में होने से यह समय पूजा पाठ कार्यों के लिए अनुकूल रहता है किंतु विवाह सगाई गृह प्रवेश इत्यादि के लिए अनुकूल नहीं रहता है. इस दौरान सभी शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं. इस दौरान भगवान विष्णु की पूजा और भगवान सूर्य की पूजा का विशेष महत्व होता है.

खरमास में शुभ कार्य पर रोक कारण कुछ विशेष धार्मिक मान्यताएं रही हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार खरमास के दौरान सूर्य की गति धीमी हो जाती है इसलिए इस दौरान किया गया कोई भी कार्य शुभ फल बहुत धीमी गति से प्राप्त होता है. इस दौरान हिंदू धर्म में बताए गए कोई भी संस्कार जैसे मुंडन संस्कार, यज्ञोपवीत, नामकरण, गृह प्रवेश, गृह निर्माण, नया कारोबार शुरू करना, वधू प्रवेश, सगाई, विवाह आदि नहीं किए जाते हैं. माना जाता है कि जब भी सूर्यदेव देवगुरु बृहस्पति की राशि में भ्रमण करते हैं तो यह समय इन कार्यों के लिए अच्छा नहीं माना जाता है. सूर्य की निर्बलता के कारण ही इस मास को मलमास के रुप में भी जाना जाता है.

खरमास की एक पौराणिक कथा भगवान सूर्यदेव सात घोड़ों द्वारा खींचे जाने वाले रथ पर सवार होकर निरंतर ब्रह्मांड की परिक्रमा करते हैं. सूर्य देव को कहीं भी रुकने की अनुमति नहीं है, लेकिन लगातार दौड़ते रहने से रथ के घोड़े थक जाते हैं. घोड़ों की ऐसी दशा देखकर जब सूर्यदेव घोड़ों को तालाब के किनारे ले गए तो उन्होंने देखा कि वहां दो खर मौजूद थे. भगवान सूर्यदेव ने घोड़ों को पानी पीने और आराम करने के लिए वहीं छोड़ दिया और खर यानी गधों को रथ में शामिल कर लिया. इस दौरान रथ की गति धीमी हो गई,किसी तरह सूर्य देव एक महीने का चक्र पूरा करते हैं. घोड़ों ने भी विश्राम किया, सूर्य का रथ फिर गति में लौट आया. इस तरह यह क्रम हर साल चलता रहता है ऐसे में हर साल खरमास लगता है.

धनु संक्रांति पूजा महत्व
सूर्य के धनु और मीन राशि में प्रवेश करने पर खरमास या मलमास का निर्माण होता है. मीन और धनु राशि बृहस्पति के आधिपत्य की राशि है. इस काल में भगवान सूर्य और श्री हरि के भगवान विष्णु की पूजा का विधान है. खरमास के महीने में नियमित रूप से सुबह स्नान आदि करने के बाद भगवान सूर्य को जल अर्पित करना चाहिए. सूर्य और विष्णु के मंत्रों का जाप करना चाहिए, ऐसा करने से रोगों से मुक्ति मिलती है और मुझमें सुख-सौभाग्य का आगमन होता है. सुबह उठकर सबसे पहले सूर्य देव को फूल और जल चढ़ाकर उनकी पूजा की जाती है.भगवान को मीठे चावल का भोग भी इस दिन लगाया जाता है.

Posted in astrology yogas, jyotish, panchang, rituals, transit | Tagged , , , | Leave a comment

चंद्रमा और शनि की युति का शुभ और अशुभ प्रभाव

शनि और चंद्रमा जब भी एक साथ होते है तो इनका युति योग कुछ मामलों में नकारात्मक स्थिति को ही दिखाता है. यह बहुत अनुकूल योग नहीं माना जाता है किंतु इस योग भी अपना सकारात्मक पक्ष होता है. वैसे इन दोनों ग्रहों के मध्य का भेद इनके गुणों में ही मौजूद होता है. यह दोनों जब युति करते हैं तो मन को उदास कर देने वाले भी होते हैं. भावनात्मक स्थिति पर जिम्मेदारी का बोझ और भारीपन की भावना डाल सकती है.

मन तो अनियंत्रित रुप से भागता है, असीम है. अब जब इस चंद्रमा रुपी मन पर शनि का संयोग बनता है तो इसकी चाल धीमी होने लगती है और आशंकाएं मन को घेर लेती हैं. चंद्रमा  लगातार विस्तार करना चाहता है. भविष्य के बारे में बिना शर्त और अनियंत्रित रूप से आशावादी होना चाहता है. अपने मूल्यों का निर्माण करना चाहता है, लेकिन शनि वह ऎसा नहीं है वह सीमाओं का निर्माण करता है. अब यहां इन दोनों का योग टकराहट में देखे जा सकते हैं. 

चंद्रमा और शनि की ज्योतिष में भूमिका

ज्योतिष में चंद्रमा आपकी मन, भावनाओं, मातृ सुख, भावनात्मक प्रतिक्रिया और कल्पना का प्रतिनिधित्व करता ह. चंद्रमा मन है इसलिए सोचने के तरीके और स्थितियों पर प्रतिक्रिया करने का तरीका दिखाता है. व्यक्ति कितना भा वुक या भावहीन हैं यह चंद्रमा की स्थिति पर निर्भर करता है. चंद्रमा एक जलीय एवं शीतल ग्रह है तो इसके प्रभाव में इन बातों को देखा जाता है. ज्योतिष में शनि जीवन में कर्म है , सीमाएं  हैं. व्यक्ति क्या हासिल कर सकते हैं और क्या नहीं, इन सभी की सीमाएं शनि तय करता है. शनि एक प्रकार से वेक अप कॉल भी है. शनि जीवन की सच्चाई और वास्तविकता दिखाता है.  गूढ़ स्तर पर चीजों को खोजने के बजाय अपने लक्ष्यों के बारे में अधिक व्यावहारिक और अनुशासित होने के लिए मजबूर करता है.

चंद्र और शनि की युति की विशेषता

जब सीमाओं का स्वामी चंद्रमा के साथ होता है, तो यह मन में सीमाएं पैदा कर सकता है या उन चीजों को सीमित कर सकता है जो मन करना चाहता है. ऎसे में जब जो चाहिए जो करना है वह नहीं मिलता है, तो हम निराशा का भाव जीवन में बढ़ने लगता है. उदासिनता अपने आप हावि होने लगती है. शनि की यथार्थवादी प्रकृति के कारण चंद्रमा का प्रभाव कमजोर होने लगता है. कल्पनाओं पर प्रश्न चिन्ह लग सकता है. व्यक्ति एकांत एवं अकेलेपन को अपना सकता है. शनि “क्या है” दिखाना चाहता है, जबकि चंद्रमा “और क्या हो सकता है” के बारे में देखने को कहता है.

मन को अपने ऊपर एक ऎसा नियंत्रण दिखाई देता है जिससे कोई भी आसानी से मुक्त नहीं हो पाता है. शनि दंड नहीं देता अपितु यह केवल हमारे कर्मों का फल प्रदान करता है. यदि कर्म तटस्थ या मिश्रित होते है, तो यह आगे बढ़ने के अवसर देता है जहां चंद्रमा फिर से आशावादी महसूस करवाता है. यदि चंद्रमा शनि से अधिक शक्तिशाली है, तो चंद्रमा शुरू से ही इस युति के नकारात्मक प्रभाव को दूर कर सकता है.

कुंडली में यदि चंद्रमा अपनी राशि में हो या उच्च शुभ स्थिति का हो तब यह युति शनि के द्वारा नियंत्रित कम हो पाती है. शनि और चंद्रमा की युति के साथ वास्तव में कठिन चीजों को अधिक देखते हैं. कठिन समय आने पर यह व्यक्ति को अच्छी तरह से तैयार करने वाला होता है

शनि और चंद्रमा की युति का प्रभाव

चंद्रमा एक भावनात्मक ग्रह है. यह ग्रहों में रानी का स्थान पाता है. मन, भावनाओं पर इसका अधिकार होता है. यह शनि से प्रकृति में पूरी तरह से विपरीत है. यह कल्पनाशील, संवेदनशील और चंचल मन वाला होता है. इसलिए जब दो पूरी तरह से अलग ग्रह युति करते हैं, तो दोनों ग्रहों के लिए ठीक से काम करना बेहद मुश्किल हो जाता है. शनि को सबसे अधिक पापी माना गया है. शनि को समान क्रूर ग्रह और कोई नहीं है. शनि सांसारिक मामलों से वैराग्य की भावना पैदा करता है और अध्यात्म में रुचि पैदा करता है. शनि दुख के प्रति तैयार करता है ताकि व्यक्ति जीवन के सुखों और चकाचौंध से अलग हो सके और वास्तविक प्राप्ति के मार्ग की ओर बढ़ सके. शनि और चंद्रमा की युति के मामले में, यह योग चिंता और खुशी से मुक्त करने वाला बनाता है. शनि के साथ चंद्रमा की युति मानसिक शांति के लिए अनुकूल नहीं होती है, लेकिन यदि तुला या मकर राशि में युति हो या बृहस्पति से दृष्ट हो तो कुछ कम असर दिखाई देता है. 

चंद्र शनि युति के लाभ कब मिलते हैं 

केंद्र और त्रिकोण के संबंध में चंद्रमा और शनि का परस्पर साथ होना राज योग बनता है. इसके कारण आगे बढ़ने का मौका मिलता है, जीवन को उच्च स्तर तक ल जाने का बढ़ावा दे सकता है. तुला लग्न के लिए चतुर्थ और पंचम भाव का स्वामी शनि है. यदि यह दसवें भाव में हो और दसवें भाव का स्वामी चंद्रमा यदि पंमम भाव में हो तो दशम और पंचम भाव के स्वामियों के बीच आपसी आदान-प्रदान होगा, और इसके परिणामस्वरूप करियर में अच्छा मौका मिल पाएगा. आर्थिक समृद्धि की प्राप्ति होगी. दशम वें भाव में कर्क राशि में शनि और चंद्रमा की युति हो तो राजयोग भी बनेगा. इसी प्रकार, वृश्चिक लग्न के लिए, चतुर्थेश शनि और नवमेश चंद्रमा की युति समृद्धि प्रदान कर सकती है. वृश्चिक और तुला लग्न दोनों के लिए यह योग अत्यधिक लाभकारी हो सकता है और बहुत शुभ फल प्रदान करता है. 

इसी प्रकार शनि और चंद्रमा की युति आध्यात्मिक प्रगति के लिए अनुकूल मानी जाती है. अंतहीन चिंताओं का सामना करने और कठिनाई और बाधाओं से भरा जीवन जीने के बाद, आध्यात्मिकता की ओर झुकाव होता है. एक समय ऐसा आता है जब शनि व्यक्ति को सभी सांसारिक बंधनों, छल-कपट, लालच, झूठी चकाचौंध और पापों से वैराग्य की भावना देता है. लेकिन इसके अतिरिक्त इस आध्यात्मिक प्रगति के लिए शनि-चंद्र की युति को गुरु और केतु का सहयोग देने वाला होता है. जन्म स्थान से दूर सफलता के लिए चंद्रमा और शनि योग अच्छा माना जाता है. 

Posted in astrology yogas, planets, vedic astrology | Tagged , , | Leave a comment

वक्री और मार्गी शनि का आपके जीवन पर कैसा होगा असर

शनि एक सबसे धीमी गति के ग्रह हैं. यह कर्मों के अनुरुप व्यक्ति को उसका फल प्रदान करते हैं इसलिए इन्हें न्यायकर्ता और दण्डनायक भी कहा जाता है. शनि का जीवन पर प्रभाव व्यक्ति को मानसिक, शारीरिक, आर्थिक हर तरह से प्रभावित करने वाला होता है. शनि जब किसी राशि में प्रवेश करते हैं तो लगभग ढ़ाई वर्षों तक उस राशि को प्रभावित करते हैं. इस समय अवधि के दौरान शनि की चाल में बदलाव भी होता है. कभी ये वक्री होते हैं कभी मार्गी कभी तीव्र गामि गति भी धारण कर लेते हैं. शनि का ग्रहों के साथ संबंध और उनकी चाल में होने वाला बदलाव अनेक प्रकार के उतार-चढा़व देने में सक्षम होता है.  

शनि का ज्योतिषिय विचार 

शनि का ज्योतिष अनुरुप ज्योतिष में शनि को मकर ओर कुंभ राशियों का स्वामित्व प्राप्त है. शनि साढे़साती ओर ढैय्या का प्रभाव कष्टदायक एवं परिवर्तन के अनुरुप माना गया है. शनि का जब अपनी स्वराशि में गोचर होता है तो ये स्थिति ग्रह गोचर को अनुकूलता प्रदान करती है. शनि अपनी राशि में आने में लगभग 30 वर्ष का समय ले लेते हैं. इस समय शनि मकर राशि में गोचर कर रहे हैं. इसलिए ये समय धनु-मकर-कुम्भ इन राशियों की साढ़ेसाती का होगा. इन राशियों के लोगों पर शनि का अधिक असर देखने को मिलेगा. मकर राशि में गोचर करता हुआ शनि अपने कारक तत्वों में वृद्धि करने वाला होगा. 

इस गोचर में शनि जब अपनी चाल को बदलेंगे तो उस के कारण राशि यों से संबंधित लोगों पर भी इसका असर दिखाई देगा. शनि ग्रह की चाल में परिवर्तन होने पर शनि वक्री हो जाते हैं और ऎसे में शनि के शुभ प्रभाव में व्रकता आने से स्थिति परेशानी वाली रहती है. किसी भी ग्रह में जब उसकी चाल में बदलाव को देखा जाता है तो ये स्थिति काफी बदलाव और तनाव को दिखाने वाली है. ग्रह के फलों में भी वृद्धि होने लगती है और इस प्रकार चीजों की अधिकता अस्थिरता को भी जन्म देती है. 

शनि का गोचरीय नियम 

शनि का गोचर से जुड़ा नियम इस प्रकार है, शनि अगर जन्म राशि से पहले स्थान में गोचरस्थ होता है मानसिक रुप तनाव और व्यर्थ की चिंता बढ़ाता है, स्थान परिवर्तन कराता है. सुख स्थान से दूर ले जाने वाला होता है. दूसरे घर पर अगर हो तो उसके कारण कलेश और वाणी में दोष की स्थिति उत्पन्न कर सकता है. तीसरे घर पर अगर गोचर कर रह अहो तो मेहनत को बढ़ा देता है. चौथे घर पर हो तो घर से दूर करवा सकता है. शत्रु पक्ष में वृद्धि दे सकता है. 

शनि के मार्गी होने का समय 

शनि की चाल में होने वाला ये बदलाव बहुत सी उथल पुथल को शांति देने में बहुत अधिक सहायक बन सकता है. मार्गी शनि का एक बार फिर से बदलाव मानसिक रुप से स्थिति को कुछ स्थिरता देने वाला होगा. शनि मार्गी होंगे, शनि का वक्री से मार्गी होना कुछ सुधार और स्थिरता की ओर ईशारा करने वाला होगा. मार्गी होने पर शनि की दशा ओर साढे़साती ढैय्या क अप्रभव भी कुछ शांत होगा. इससे मिलने वाले कष्टों में कमी भी आएगी. शनि का मार्गी होना सभी राशि वालों के लिए किसी न किसी रुप में प्रभावित करने वाला होगा. 

शनि का उतराषाढ़ा

शनि देव का किसी एक राशि में रहना एक लम्बा समय होता है. शनि जिस भी राशि में गोचर करते हैं उस राशि के गुण स्वभाव और प्रभाव पर अपना असर भी अवश्य डालते हैं. इस समय पर शनि जब अपनी स्वराशि में होंगे तो वह उत्तराषाढा़ नक्षत्र में भी गोचर करने वाले हैं. इस प्रभाव से शनि का ये प्रभाव अधिकारी और सेवा कर्म से जुड़े लोगों के मध्य नए संबंध दर्शाएगा. हो सकता है की इस समय पर विवाद अधिक उभरें. इस समय पर वैचारिक ट्कराव की स्थिति भी सामने आएगी. मित्र राशि, उच्च राशि या स्वराशि में होते हैं तो यह स्थिति शनि से मिलने वाली सभी चीजों को बढ़ाने का काम करती है. इसके विपरित यदि शनि अपनी किसी शत्रु राशि, नीचस्थ राशि में हों तो ऎसे में उन सभी गुणों में कमी आती है ओर विपरित फल भी मिलने की संभावना बढ़ जाती है. 

इस वर्ष शनि का मकर राशि में गोचर हो रहा है. मकर राशि के स्वामी शनि हैं. इसलिए शनि का मकर राशि में गोचर बहुत मायनों में खास माना गया है. 

इन राशि वालों के लिए मार्गी का प्रभाव   

शनि के मार्गी होने का प्रभाव कुछ राशि वालों के लिए अच्छा रहेगा. इन में उन लोगों के लिए ये समय अधिक बेहतर होगा जो शनि की साढ़ेसाती ओर ढैय्या से परेशान हैं या फिर जिन पर शनि की दशा चल रही है. इसके अतिरिक्त शनि जिन राशि के लोगों के लिए उनके कार्यक्षेत्र और स्वास्थ्य से संबंधित ग्रह हैं उन के लिए भी शनि का प्रभाव काफी इफैक्टिव होगा. धनु मकर और कुम्भ राशि वालों के लिए ये समय काफी महत्वपूर्ण होगा. इन्हीं लोगों पर शनि का निर्णायक प्रभाव दिखाई देगा, 

इस समय पर बहुत से ग्रहों की स्थिति में होने वाला बदलाव होगा . ग्रहों का युति संबंध भी इस समय पर शनि से जुड़ कर बदलाव लाने वाला होगा. सूर्य, बुध, गुरु, शनि और राहु/ केतु की युति हो रही है, जो कि सभी व्यक्तियों पर अपने अपने अनुरूप इफैक्ट देने वाला होगा. कुछ लोगों के लिए शुभ तो कुछ के लिए स्थिति अनियत्रित भी हो सकती है. शनि का इस साल मिथुन तुला और कुम्भ वालों के लिए दिक्कत देने वाला है क्योंकि लौह पाद की स्थिति परेशानी व्यवधान पैदा करने वाली होती है. 

Posted in astrology yogas, planets, transit, Varga Kundali, vedic astrology | Tagged , , | Leave a comment