गर करण

गर करण को चर करणों की श्रेणी में आता है, हिन्दू पंचाग के पांच अंग है, इसमें तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण है, व कुल 11 करण है, इसमें से प्रारम्भ के सात करणों की आवृति होती रहती है. शेष चार करण स्थिर है.

गर करण- स्वामी

गर करण के स्वामी पृथ्वी को माना गया है. पृथ्वी के प्रभाव से गर करण में सहनशीलता और धैर्य का गुण आता है. जिस जातक का जन्म गर करण में हुआ हो, और उस व्यक्ति को मानसिक, आर्थिक अथवा स्वास्थ्य संबन्धी किसी प्रकार की कोई परेशानी रहती हो, ऎसे में जातक के लिए इस करण के स्वामी पृथ्वी का पूजन करना अत्यंत लाभदायक होता है.

गर करण कब होता है

गर करण करण एक गतिशील करण है. यह चलायमान रहता है. तिथि में ये करण बार-बार आता है. यह एक सौम्य करण माना गया है. अस्थिर करण होने पूर्णिमा और अमावस की तिथियों को छोड़ कर बाकी तिथियों की गणना के अनुरुप आता रहता है.

गर करण-चरसंज्ञक करण

गर करण चरसंज्ञक है. शेष अन्य चरसंज्ञक करणों में बव, बालव, कौलव, तैतिल, वणिज और विष्टि है. बाकी के बचे हुए चार करण शकुनि, चतुष्पाद, नाग और किस्तुघ्न ध्रुव करण कहलाते है.

गर करण में क्या काम करें

गर करण को शुभ करण की श्रेणी में रखा गया है. इस करण में शुभ एवं मांगलिक कार्य किए जा सकते हैं. यह करण किसी काम के शुरु करने या किसी यात्रा को करने के लिए लिया जा सकता है. गर करण में व्यक्ति को कामों को पूरा करने का मौका भी मिलता है. इस समय पर व्यक्ति अपनी जीत के लिए बहुत अधिक प्रयसशील रहता है.

अगर कोई काम अटका हुआ है तो इस करण के दौरान उस काम के लिए प्रयास करने से लाभ मिलने की उम्मीद बंध जाती है. व्यक्ति साहस और मेहनत से भरे कामों को कर सकने में भी सक्षम होता है.

गर करण का मुहूर्त में महत्व

मुहूर्त निकालने के लिए गर करण को उपयोग में लिया जाता है. इस करण के दौरान व्यक्ति शुभ काम जैसे की घर निर्माण, प्रतियोगिता में शामिल होना, विवाह, प्रेम प्रसंग, किसी काम का आरंभ, गृह प्रवेश, भूमि संबंधी इत्यादि काम कर सकता है.

गर करण व्यक्ति कैरियर

गर करण में जन्म लेने वाले व्यक्ति को भूमि और भूमि से प्राप्त वस्तुओं के क्रय-विक्रय से आय प्राप्त होती है. जो व्यक्ति गर करण में जन्म लेता है, ऎसा व्यक्ति खेतीबाडी के क्षेत्र को भी अपने कैरियर के रुप में अपना सकता है. इस करण में जन्में व्यक्ति को अपनी माता से प्राप्त होने वाले सुख में कमी रहती है. वह घर-परिवार के साथ कम ही रह पाता है.

जीवन का अधिकतर समय उसे घर से दूर रहकर ही गुजारना पडता है. घर के कार्यो को वह तत्परता के साथ करता है. अपनी पारीवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करने को वह सबसे अधिक महत्वता देता है. व्यक्ति में महत्वकांक्षा का गुण होता है. जीवन में उसकी जो भी इच्छा होती है, अथवा जीवन में वह जो भी प्राप्त करना चाहता है, उसे अपनी मेहनत से प्राप्त होती है.

गर करण में जन्मा जातक

गर करण के वाहन गज माने जाते हैं. इस करण में जन्मा जातक मस्त और मन मौजी अधिक हो सकता है. जातक को अपने माता-पिता का प्रेम मिलता है. परिजनों का सहयोग पाकर वह आगे बढ़ता है. इस करण में जन्मा व्यक्ति कर्मठ होता है. मेहनत से अपने काम करने वाला और परिश्रम से भाग्य का निर्माता बनता है.

जातक धर्म परायण और नीति नियमों को समझने वाला होता है. कर्म की महत्ता को समझने वाला और भाग्य का निर्माण करने के लिए प्रत्यनशील होता है. न्याय प्रिय होता है और शत्रुओं का नाश करने वाला होता है. जातक बोल चाल में निपुण और वाद विवाद में आनंद लेने वाला होता है.

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जैमिनी स्थिर दशा | Jaimini Sthir Dasha

जैमिनी ज्योतिष में अनेक दशाओं का प्रयोग किया जाता है. उनमें से एक प्रमुख दशा स्थिर दशा भी है. इस दशा का विश्लेषण अप्रिय घटनाओं, स्वास्थ्य तथा जीवन की नकारात्मक जानकारियों के लिए किया जाता है. यह जैमिनी की बहुत ही सरल दशा है. इस दशा से भी जीवन के सभी पहलुओं का आंकलन किया जा सकता है. चर दशा की भाँति स्थिर दशा में भी सभी जैमिनी कारकों का उपयोग किया जाता है. 

स्थिर दशा में दशाक्रम समझने से पहले सर्वप्रथम ब्रह्मा, रुद्र तथा महेश्वर का निर्धारण करना आवश्यक होता है. इन तीनों का निर्धारण करने के लिए गणितीय गणना की आवश्यकता होती है. इस गणना के आधार पर ही ब्रह्मा, रुद्र तथा महेश्वर का निर्धारण किया जाता है. अगले अध्यायों में आपको स्थिर दशा की गणना विस्तार से और सरल शब्दों में समझाने का प्रयास किया जाएगा. आशा है कि आपको इस दशा को समझने में कोई परेशानी नहीं होगी. 

ब्रह्मा का निर्धारण | Determination of Brahma

जैमिनी ज्योतिष में स्थिर दशा की गणना करने के लिए सर्वप्रथम ब्रह्मा का निर्धारण करना होता है. इसके लिए कुण्डली के अनुसार यह तय करना होगा कि लग्न तथा सप्तम भाव में सबसे अधिक बलशाली कौन-सा ग्रह है. लग्न तथा सप्तम भाव का बल जानने के लिए राशि बल की गणना की जाती है. राशि बल की गणना के आधार पर दोनों भावों में से जिस भाव की राशि अधिक बली होगी, तब उस भाव से छठे, आठवें तथा बारहवें भाव के स्वामियों को देखा जाएगा. इन तीनों भावों की राशी स्वामी में से जो ग्रह सबसे अधिक शक्तिशाली होगा उस ग्रह को ब्रह्मा की उपाधि प्राप्त होगी. 

ब्रह्मा बनने वाले ग्रहों में शनि को ब्रह्मा नहीं बनाया जाता है. यदि छठे, आठवें अथवा बारहवें भाव में शनि की राशि पड़ती है तब शनि को ब्रह्मा नहीं बनाया जाएगा. 

रुद्र का निर्धारण | Determination of Rudra

स्थिर दशा में रुद्र की गणना करने के लिए लग्न से दूसरे तथा अष्टम भाव के स्वामियों के बल का आंकलन किया जाता है. दोनों में जो बली है वह कुण्डली के रुद्र कहलाते हैं. रुद्र बनने के लिए शनि को भी लिया जाता है. 

महेश्वर का निर्धारण | Determination of Maheshwar

स्थिर दशा में महेश्वर का निर्धारण करने के लिए आत्मकारक से अष्टमेश का आंकलन किया जाता है. महेश्वर का आंकलन करने के लिए किसी भी प्रकार की गणितीय गणना की आवश्यकता नहीं होती है. इसमें कोई भी ग्रह महेश्वर बन सकता है. कुण्डली में आत्मकारक से अष्टम भाव में जो राशि आती है उस राशि का अधिपति ग्रह महेश्वर बनता है. 

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मनुष्य गण मिलान-अष्टकूट मिलान

हिन्दू धर्म में विवाह करने से पूर्व वर-वधू दोनों की कुण्डलियों का मिलान किया जाता है. कुण्डलियों के इस मिलन को अष्टकूट मिलान के नाम से जाना जाता है. कुण्डली मिलान का प्रचलन उत्तरी भारत और दक्षिण भारत दोनों में ही मुख्य रुप से देखा जा सकता है. गुण मिलान का महत्व विवाह मिलान के लिए अत्यंत आवश्यक होता है.

गण मिलान क्यों किया जाता है

गण मिलान करने पर वर-वधू का वैवाहिक जीवन सुखी और सामान्य भलाई के कार्यो में व्यतीत होने की संभावनाएं देता है. विवाह पश्चात इस प्रकार की कोई परेशानी न हों, इसीलिए गण मिलान किया जाता है. ज्योतिष शास्त्रों में यह मान्यता है, कि जिन वर-वधू का विवाह गण मिलान करने के बाद किया जाता है, उनके वैवाहिक जीवन में परस्पर कम विरोधाभास रहते है.

गण मिलान से व्यक्ति स्वभाव और व्यवहार को समझने में सहायता मिलती हैं. जब सोच में एक जैसी अनुभूति दिखाई देगी तो व्यक्त एक दूसरे के प्रति सहयोगात्मक नजरिया रख सकता है. एक दूसरे के साथ मिलकर जीवन में आने वाले विभिन्न पड़ावों को मिल कर पार करने में भी सक्षम होता है.

मनुष्य गण नक्षत्र

जिन व्यक्तियों का जन्म पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वा आषाढा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा फाल्गुणी, उत्तरा आषाढा, उतरा भाद्रपद, आर्द्रा, रोहिणी और भरणी इन नक्षत्रों को मनुष्य गण कहते है. मनुष्य गण में जन्मा जातक सामान्य और साधारण जीवन जीने की इच्छा रखता है. वह स्वभाव से कोमल होता है तो कठोर भी हो सकता है. अपनी हद से बहुत आगे जा सकता है या फिर देव तुल्य काम करके पूजनीय बन सकता है.

मनुष्य गण फल

मनुष्य गण नक्षत्र में जन्म लेने वाला व्यक्ति स्वाभिमानी, धनी, विशाल नेत्रों वाला, गौरे रंग वाला, लोगों से सहानुभूति रखने वाला होता है. मनुष्य गण का जातक परिश्रम करने वाला होता है. सुख संपन्न जीवन जीने के लिए परिश्रमी होता है. वह बुद्धि और मेहनत दोनों के द्वारा ही अपने जीवन के लक्ष्य को पूरा करने के लिए प्रयासशील होता है.

मनुष्य गण इस प्रकार है की जातक में राक्षस और देव दोनों ही गुण मौजूद होते हैं. अपने अच्छे कार्यों से लोगों के मन में उच्च स्थान पा सकता है, वहीं दूसरी ओर अपने बुरे कार्य करने पर वह राक्षस से भी नीचे जा सकता है.

गण कूट मिलान कैसे करें

मनुष्य गण वर-वधू का विवाह देवगण या मनुष्य गण वर-वधू से किया जा सकता है, परन्तु राक्षस गण वर-वधू से करना अनुकुल नहीं माना जाता है. जब गण मिल जाते है, तो गुण मिलान में 6 अंक दे दिये जाते है. प्राय: जब गण नहीं मिल पाते है, तो इस दोष का परिहार निकाला जाता है. इसके बाद यह दोष समाप्त हो जाता है.

मिलान कैसे करें

शुभ गण मिलान

वर और वधु दोनों अगर समान गण वाले हों तो यह स्थिति अच्छी मानी जाती है. समान गण होने पर पूरे अंक मिलते हैं.

अशुभ गण मिलान

लड़का व लड़की दोनों देव-राक्षस और राक्षस-देव गण के हों तो यह गण मिलान अच्छा नहीं माना जाता है. इस मिलान में सिर्फ 1 अंक दिया जाता है. इसके अतिरिक्त मनुष्‍य के साथ राक्षस अथवा या राक्षस के साथ मनुष्‍य गण मिलान बहुत खराब माना जाता है. इसमें 0 अंक मिलते हैं.

सामान्‍य गण मिलान

देव गण और मनुष्‍य गण का मिलान होना अच्छा रहता है. यह एक सामान्य स्तर का मिलान रहता है.

गण दोष फल

गण दोष होने पर दोनों विवाह सुख बाधित होता है. वैचारिक मतभेद उभर सकते हैं. अलगाव और रिश्ते में तलाक की स्थिति भी प्रभावित कर सकते हैं.

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त्रयोदशी तिथि

त्रयोदशी तिथि – हिन्दू कैलेण्डर तिथि

त्रयोदशी तिथि हिन्दु माह के कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों समय पर आती है. अन्य तिथियों की भांति ही इस तिथि का भी अपना एक अलग महत्व रहा है. इस तिथि का मुहूर्त पंचाग और पर्व इत्यादि सभी में एक स्थान निश्चित किया गया है. इस तिथि में क्या करना है या क्या नहीं करना ये सभी बातें ज्योतिष शास्त्र में बताई गई हैं.

त्रयोदशी तिथि के देव कामदेव बताए गए हैं. इस तिथि में जन्म लेने वाले व्यक्तियों को कामदेव की पूजा करना कल्याणकारी रहता है. जीवन में दांपत्य संबंधों की उत्तम आधारशिला रखना एवं प्रेम संबंधों में सफलता पाना इन सभी बातों के लिए कामदेव का पूजन बहुत ही शुभदायक होता है.

त्रयोदशी तिथि कैसे बनती है

सूर्य से जब चन्द्र 145 अंश्से 156 अंश के मध्य होता है. उस समय शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि रहती है. इसके अलावा जब सूर्य से चन्द्र 313 से 336 के मध्य होता है. उस समय कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी होती है.

त्रयोदशी तिथि वार योग

त्रयोदशी तिथि जब बुधवार के दिन हो, तो मृत्यु योग बनता है. मृत्यु योग अपने नाम के अनुसार फल देता है. तथअ जब मंगलवार के दिन त्रयोदशी तिथि आती है, तो सिद्धिदा योग बनता है. शुक्ल पक्ष में त्रयोदशी तिथि को समस्त कार्यो के लिए शुभ माना जाता है. इसके विपरीत कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी में शुभ कार्य करने वर्जित होते है.

त्रयोदशी तिथि में जन्मा जातक

त्रयोदशी तिथि में जन्म लेन वाला व्यक्ति महासिद्ध होता है. वह कई विद्याओं का ज्ञाता होता है. उसे अधिक से अधिक विद्या अर्जन में रुचि होती है. उसे धार्मिक शास्त्रों में निपुणता प्राप्त होती है. इसके साथ ही वह इन्द्रियों को जीतने वाला होता है. इसके अतिरिक्त उसे परोपकार के कार्य करने विशेष रुप से पसन्द होते है.

जातक में सहनशिलता का भाव कुछ कम होता है. व्यक्ति अपने आत्मविश्वास के बल पर आगे बढ़ने की कोशिश तो करता है, लेकिन उसमें सफल नहीं हो पाता है. वाद विवाद करने में तेज होता है और अपने तर्कों के आगे दूसरों को टिकने भी नहीं देता है. जातक जीवन में संघर्ष अधिक झेलता है. प्रयास से ही सफलता को पा सकता है.

त्रयोदशी तिथि में किए जाने वाले काम

मुहूर्त एवं पंचांग में तिथि के अनुरुप काम करने का विचार बताया गया है. कार्य में सफलता के लिए एक शुभ तिथि का होना भी बहुत अनुकूल है. जिस कार्य की जैसी प्रकृति है उसी के अनुरुप तिथि होने से काम में सफलता का प्रतिशत भी बढ़ जाता है. ऎसे में त्रयोदशी तिथि के लिए भी कुछ कार्यों को रखा गया है. (Game3rb)

इस तिथि के दौरान कठिन और उग्र कार्य किए जा सकते हैं. संग्राम से जुड़े कार्य, सेना के उपयोगी अस्त्र-शस्त्र, ध्वज, पताका के निर्माण संबंधी कार्य, राज-संबंधी कार्य, वास्तु कार्य, संगीत विद्या से जुड़े काम इस दिन किए जा सकते हैं। इस दिन यात्रा, गृह प्रवेश, नए कपड़ों, नए गहनों को नही खरीदना चाहिए.

त्रयोदशी तिथि पर्व

त्रयोदशी तिथि में भी कुछ महत्व पूर्ण पर्व और व्रतों का आयोजन होता है इस तिथि को भगवान शिव को प्रिय कहा गय है और इसी लिए जिस जातक का जन्म इस तिथि में हो उसे भगवान शिव का विशेष रुप से पूजन करना चाहिए. त्रयोदशी तिथि में प्रदोष व्रत की बहुत महिमा बताई गई है.

प्रदोष व्रत –

प्रदोष व्रत पुत्र की कामना, ऋण से मुक्ति के लिए, सुख-सौभाग्य,आरोग्य आदि के लिए किया जाता है. इस व्रत के दिन प्रात:काल स्नान-ध्यान के पश्चात इस व्रत का संकल्प करें और सायंकाल सूर्यास्त के पश्चात भगवान शिव का विधि-विधान से पूजा एवं साधना करें.

अनंग त्रयोदशी –

अनंग त्रयोदशी के दिन कामदेव और रति की पूजा करने का विधान है. कामदेव का एक अन्य नाम अनंग है जिसका अर्थ बिना अंग वाले. इस दिन दांपत्य जीवन की सुख प्राप्ति के लिए कामदेव और देवी रति की पूजा की जाती है. साथ ही भगवान शिव का पूजन भी होता है.

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चन्द्र प्रज्ञाप्ति – ज्योतिष इतिहास | Chandra Pragyapati | Jyotishkarandka | Jyotishkarandka | Jyotisha History

चन्द्र प्रज्ञाप्ति ग्रन्थ में सूर्य और चन्द्र दोनों का वर्णन किया गया है. चन्द्र प्रज्ञाप्ति ग्रन्थ विशेष रुप से “छाया साधना” पर आधारित है. इस ग्रन्थ में 25 प्रकार की छाया बताई गई है. इन छायाओं का विश्लेषण कर व्यक्ति के भविष्य का ज्योतिष किया जाता है. इन 25 छायाओं में से प्रमुख कीलक छाया और शंकू छाया है. इस शास्त्र का आधार चन्द्र की कलाओं या छायाओं के आधार पर फलित करना है.  

यह ग्रन्थ भी अपने मौलिक रुप में आज उपलब्ध नहीं है. सूर्या प्रज्ञाप्ति और चन्द्र प्रज्ञाप्ति दोनों लगभग एक समान ग्रन्थ है. यह सूर्य प्रज्ञाप्ति ग्रन्थ का सुधरा हुआ रुप है.  इस ग्रन्थ में सूर्य की प्रतिदिन की गति को वर्गीकृ्त किया गया है. तथा उत्तरायण और दक्षिणायण की गणना करने के बाद सूर्य और चन्द्र की गति निश्चित किया गया है. यह शास्त्र यह भी बताता है, कि चन्द्र व सूर्य दोनों का ताप क्षेत्र किस प्रकार निर्धारित किया जाता है. चन्द्र की सोलह कलाओं के आकार के आधार पर सोलह विथियों का वर्णन किया गया है. इस शास्त्र में कृ्ष्ण पक्ष में श्रावण माह की प्रतिपदा तिथि से वर्ष का प्रारम्भ माना गया है. 

चन्द्र प्रज्ञाप्ति छाया साधन ग्रन्थ | Chandra Pragyapati Chhaya Shastra 

चन्द्र प्रज्ञाप्ति ग्रन्थ विशेष रुप से छाया साधन ग्रन्थ् के रुप में जाना जाता है. जब छाया अर्धपुरुष रुप में बन रही हो तो, दिन का कितना समय व्यतीत हो चुका है, और कितना समय बचा हुआ है. दोपहर के समय छाया का आकार कितना होगा, और दिन के चौथाई समय पर छाया किस आकार -प्रकार की होती है.

चन्द्र प्रज्ञाप्ति ग्रन्थ विवरण | Chandra Pragyapati Texts Details

इस ग्रन्थ में गोल, त्रिकोण, लम्बी, चौकोर वस्तुओं की छाया पर से दिनमान जानना चाहिए. इस ग्रन्थ के कुछ् भागों में नक्षत्रों की गति, और चन्द्र के साथ नक्षत्रों के बनने वाले योगों का वर्णन किया गया है. इन योगों में श्रवण, घनिष्ठा, पूर्वाभाद्रपद, रेवती, अश्चिनी, कृ्तिका, मृ्गशिरा, पुष्य, मघा, पूर्वाफाल्गुणी,  हस्त, चित्रा, अनुराधा, मूल, पूर्वाषाढा पन्द्रह नक्षत्रों को शामिल किया गया है. 

इस ग्रन्थ के अध्याय में चन्द्र स्वप्रकाशवान बताया गया है. और साथ ही इसके घटने बढने का कारण भी दिया गया है. व राहू केतु के अन्य नाम भी

दिए गये है. 

ज्योतिष्करण्डक शास्त्र 

ज्योतिष का यह ग्रन्थ प्राचीन और मौलिक ग्रन्थ है. वर्तमान में उपलब्ध यह ग्रन्थ अधूरी अवस्था में है. इस ग्रन्थ में भी नक्षत्र का भी वर्णन किया गया है. इस ग्रन्थ में अस्स नाम अश्चिनी और साई नाम स्वाति नक्षत्र ने विषुवत वृ्त के लग्न नक्षत्र माने गये है. इस ग्रन्थ में राशि की अवस्थाओं के अनुसार नक्षत्रों का लग्न माना जाता है. इस ज्योतिष ग्रन्थ में व्यक्ति के जन्म नक्षत्र को लग्न मानकर फलित करने के नियम का प्रतिपादन किया गया है.  

ज्योतिष्करण्डक ग्रन्थ विवरण | Jyotishkarandka  Texts Details 

यह ग्रन्थ प्राकृ्ति भाषा में लिखा गया है, जैन न्याय, ज्योतिष और दर्शन का ग्रन्थ है. इस ग्रन्थ में माना जाता है, कुल 167 गाथाएं दी गई है. इस ग्रन्थ का उल्लेख कल्प, सूत्र, निरुक्त और व्याकरण नामक ग्रन्थों में मिलता है. सोलह संस्कारों में प्रयोग होने वाले मूहुर्तों का भी यहां वर्णन किया गया है.  

ज्योतिष्करण्डक ग्रन्थ में कृ्तिका नक्षत्र, घनिष्ठा, भरणी, श्रवण, अभिजीत आदि नक्षत्रों में गणना का विश्लेषण किया गया है. यह ग्रन्थ विवाह संबन्धी नक्षत्रों में उत्तराफाल्गुणी, हस्त, चित्रा, उत्तराषाढा, श्रवण, घनिष्ठा, उत्तराभाद्रपद, रेवती और अश्चिनी आदि नक्षत्र विवाह के नक्षत्र बताये गये है.  

यह ग्रन्थ ई. पू़ 300 से 400 का है.  इस समय के अन्य ज्योतिष ग्रन्थों में राशियों की विशेषताओं का विस्तृ्त रुप में वर्णन किया गया है. इन ग्रन्थों में दिन-रात्रि,शुक्ल-कृ्ष्ण पक्ष, उत्तरायण, दक्षिणायन का कई स्थानों पर वर्णन किया ग्या है. संवत्सर, अयन, चैत्रादि, मास, दिवस, मुहूर्त, पुष्य, श्रवण, विशाखा आदि नक्षत्रों की व्याखा की गई है. 


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वसुमान-शुभ-कर्तरी-पाप-कर्तरी-पारिजात-पर्वत-खल-दैन्य योग क्या है. । What is the Vasuman Yoga | Shubha Kartari Yoga | Papa Kartari Yoga | Parijat Yoga | Parvata Yoga | Khal Yoga | Dainya Yoga

वसुमान योग बुध, गुरु, शुक्र लग्न या चन्द्रमा से तीसरे, छठे, दशवें, ग्यारहवें भाव में हो, तो यह योग बनता है. वसुमान योग व्यक्ति को अत्यधिक धनवान बनाता है. इस योग से युक्त व्यक्ति बुद्धिमान, बौद्धिक रुप से गुणवान होता है. व्यक्ति को अपने कार्यो में दक्षता प्राप्त होती है. तथा इस योग से व्यक्ति के मनोबल में भी वृ्द्धि हो रही होती है.  

शुभ कर्तरी योग कैसे बनता है. | How is Formed Shubha Kartari Yoga 

जब चन्द्रमा या लग्न शुभ ग्रहों के मध्य अथवा चन्द्रमाया लग्न से पांचवें और नवें भाव में शुभ ग्रह हों, तो शुभ कर्तरी योग बनता है. शुभ कर्तरी योग व्यक्ति को अच्छा स्वास्थय, धन का संचय और जीवन के सुखों में बढोतरी देता है.

पाप कर्तरी योग कैसे बनता है. | How is Formed Papa Kartari Yoga 

पाप कर्तरी योग उस समय बनता है, जब चन्द्रमा या लग्न अशुभ ग्रहों के मध्य अथवा चन्द्रमा या लग्न से पांचवें और नवें भाव में अशुभ ग्रहों के साथ हो, तो पाप कर्तरी योग बनता है. 

पापकर्तरी योग व्यक्ति को रोगी, और निर्धन बना सकता है. इस योग के व्यक्ति को शीघ्र गुस्सा आ सकता है. इसके अतिरिक्त यह व्यक्ति निष्ठुर भी हो सकता है.  

पारिजात योग कैसे बनता है. | How is Formed Parijat Yoga 

लग्नेश का राशीश जिस राशि में बैठा हो, उस राशि का स्वामी या लग्नेश के राशिश द्वारा ग्रहीत नवांश का स्वामी केन्द्र / त्रिकोण/ स्वराशि/ उच्च राशि में बैठा हों तब यह योग बनता है. यह योग व्यक्ति को प्रसिद्धि, विलक्षण, ज्ञानी, राज्य का संरक्षण प्राप्त कराता है. इस योग से युक्त व्यक्ति वाहनों का स्वामी होता है. व परम्पराओं और रीति-रिवाजों को मानने वाला व निभाने वाला होता है.  

पर्वत योग कैसे बनता है. | How is Formed Parvata Yoga 

पर्वत योग में लग्नेश उच्च या स्वराशि का होकर केन्द्र या त्रिकोण में हों, या लग्नेश और द्वादशेश एक दूसरे से केन्द्र में या शुभ ग्रह केन्द्र में और छठा व आंठवा भाव अशुभ प्रभाव से मुक्त हों, तो यह योग बनता है.  पर्वत योग से युक्त व्यक्ति धनवान, समृ्द्धशाली, कामुक, शहर का मुखिया, परोपकारी और एक अधिकार सम्पन्न व्यक्ति होता है.  

खल योग कैसे बनते है. | How is Formed Khal Yoga 

खल कुल आठ प्रकार है. ये आठ योग पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नवें, दसवें और ग्यारवें भावों के स्वामियों में से किसी के भी तीसरे भाव के स्वामी के साथ राशि परिवर्तन करने पर बनते है. खल योग व्यक्ति को समृ्द्धि देते है, परन्तु इस योग के कारण व्यक्ति को वृ्द्धावस्था में दुर्भाग्य का आगमन कराता है. इसके अतिरिक्त यह योग आयु बढ्ने पर व्यक्ति को निर्धनता, दुर्दशा, सज्जनता और अभिमान देता है.  

दैन्य योग किस प्रकार के फल देता है. | How is Dainya Yoga Formed 

दैन्य योग 30 प्रकार के होते है. छठे, आठवें और बारहवें भाव के स्वामियों का शेष किसी भी भाव के स्वामी के साथ राशि परिवर्तन करने पर बनते है. यह योग व्यक्ति को सौभाग्य और समृ्द्धि में कमी करता है, पापपूर्ण कार्य करना, मूर्खता, दूसरों कि निन्दा करना, शत्रुओं के द्वारा यातना, अस्थिर बुद्धि, कार्यो में रुकावटें आदि है. दैन्य योग पूर्ण रुप से अशुभ नहीं होता है. शत्रुओं के कारण परेशानियां आती है. उद्यमशील कार्यो में पीछे हटना पडता है. लेकिन अगर बली और शुभ ग्रहों से दृ्ष्ट हों, तो व्यक्ति अपने शत्रुओं को नियन्त्रित करने में और रुकावटें दूर करने में समर्थ होता है.  

कहल योग कैसे बनता है. | How is Kahal Yoga Formed 

जब कुण्डली में चतुर्थेश व नवमेश एक-दूसरे से केन्द्र में और लग्नेश बली हो तब कहल योग बनता है. कहल योग से युक्त व्यक्ति हठी, साहसी, एक सेना या गांव का मुखिया, उदार, प्रसिद्ध, जीवन के अन्तिम भाग में सुखी, राजाओं से मान पाने वाला होता है.   

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ग्रह बल | Grah Bal

जैमिनी चर दशा में राशि बल के बाद ग्रहों का बल ज्ञात किया जाता है. ग्रह बल में भी तीन प्रकार के बलों का आंकलन किया जाता है. मूल त्रिकोणादि बल, अंश बल तथा केन्द्रादि बल यह तीन प्रकार के  ग्रह बल हैं. तीनों बलों के बारे में विस्तार से बताया जाएगा. 

(1) मूल त्रिकोणादि बल | Mool Trokonadi Bal

कुण्डली में ग्रह उच्च राशि, मूल त्रिकोण राशि, स्वराशि, सम राशि, शत्रु राशि, नीच राशि आदि में स्थित होते हैं. इन ग्रहों की राशि में स्थिति के अनुसार इन्हें अंक प्रदान किए जाते हैं. इसके लिए एक तालिका के द्वारा आपको समझाने का प्रयास किया जा रहा है. 

ग्रह का स्थान अंक 

उच्च राशि 70

मूल त्रिकोण राशि 60

स्वराशि 50

मित्र राशि 40

सम राशि 30

शत्रु राशि 20

नीच राशि 10

उपरोक्त तालिका के अनुसार यदि कुण्डली में कोई ग्रह उच्च राशि में स्थित है तो उस ग्रह को 70 अंक प्राप्त होगें. मूल त्रिकोण राशि में स्थित होने पर ग्रह को 60 अंक मिलेगें. इस प्रकार सभी ग्रहों को कुण्डली में उनकी स्थिति के अनुसार अंक प्राप्त होगें. 

(2) अंश बल | Ansha Bal

ग्रह बल में दूसरे प्रकार का बल अंश बल है. यह बल जैमिनी कारकों के आधार पर ग्रहों को प्राप्त होता है. इनके अंकों को सारिणि द्वारा समझा जा सकता है. 

कारक अंक 

आत्मकारक 70

अमात्यकारक 60

भ्रातृकारक 50

मातृकारक 40

पुत्रकारक 30

ज्ञातिकारक 20

दाराकारक 10

उपरोक्त सारिणी के अनुसार ग्रहों को उनके कारकों के अनुसार अंक दिए जाएंगें. आत्मकारक को सबसे अधिक अंक दिए गए हैं और दाराकारक को सबसे कम अंक प्रदान किए गए हैं. 

(3) केन्द्रादि बल | Kendradi Bal

पराशरी पद्धति के साथ जैमिनी पद्धति में भी केन्द्रों का महत्व माना गया है. कुण्डली में केन्द्रादि बल का निर्धारण आत्मकारक से ग्रहों की स्थिति देखकर किया जाता है. 

* आत्मकारक से कोई ग्रह केन्द्र(आत्मकारक से 1,4,7,10 भाव) में स्थित है तब उस ग्रह को 60 अंक मिलेगें. 

* आत्मकारक से कोई ग्रह पणफर भाव(आत्मकारक से 2,5,8,11 भाव) में स्थित है तब उस ग्रह को 40 अंक प्राप्त होगें. 

* आत्मकारक से कोई ग्रह अपोक्लिम भाव(आत्मकारक से 3,6,9,12 भाव) में स्थित है तब उस ग्रह को 20 अंक प्राप्त होगें. 

मूल त्रिकोणादि बल, अंश बल तथा केन्द्रादि बल का कुल योग ज्ञात करेगें. 

 

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तैतिल करण

11 करणों में तैतिल करण तीसरे क्रम में आता है. तैतिल करण को मिलाकर कुल 11 करण है. ज्योतिष का मुख्य भाग समझने जाने वाले पंचाग ज्ञात करने के लिए करण की गणना कि जाती है. विभिन्न कार्यो के लिए शुभ मुहूर्त निकालने के लिए भी पंचाग प्रयोग किया जाता है. और करण पंचाग का महत्वपूर्ण भाग है. इसके बिना कोई मुहूर्त नहीं निकाला जा सकता है. आईये इस करण में जन्म लेने वाले व्यक्ति की विशेषताओं पर प्रकाश डालते है.

तैतिल करण- स्वामी

तैतिल करण के स्वामी सूर्य को माना गया है. सूर्य अपने प्रकार से संपूर्ण पृथ्वी में जीवन के संचार के आधार स्तंभ हैं. इस करण के प्रभाव के फल स्वरुप जातक में अपने प्रभाव को चारों ओर फैलाने की सदैव इच्छा रहती है. जिस जातक का जन्म तैतिल करण में हुआ हो, उस व्यक्ति के लिए सूर्य उपासना बहुत लाभकारी होती है. मानसिक, आर्थिक अथवा स्वास्थ्य संबन्धी किसी प्रकार की कोई परेशानी होने पर सूर्य देव की पूजा उपासना बहुत असरदायक मानी गई है.

तैतिल करण कब होता है

तैतिल एक गतिशील करण है. यह चलायमान रहता है. तिथि में ये करण बार-बार आता है. अस्थिर करण होने पूर्णिमा और अमावस की तिथियों को छोड़ कर बाकी तिथियों की गणना के अनुरुप आता रहता है.

तैतिल करण में क्या काम करें

तैत्तिल करण को सामान्य करण की श्रेणी में रखा गया है. इस करण में ऎसे सरल काम किए जा सकते हैं जिनमें व्यक्ति को बहुत अधिक परिश्रम न करना पड़े. व्यक्ति मित्रता कर सकता है इस करण में, तैतिल करण में व्यक्ति को अधूरे बचे हुए कामों को पूरा करने का मौका भी मिलता है. इस समय पर व्यक्ति अपनी जीत के लिए बहुत अधिक प्रयसशील रहता है. जातक में कुछ काम करने की गति धीमे होती है. जातक बहुत अधिक मेहनत से बचना भी चाहता है.

मुहूर्त निकालने के लिए तैत्तिल करण को भी स्थान मिलता है. इस करण के दौरान व्यक्ति घर निर्माण, बागवानी से संबंधित काम कर सकते हैं. वस्त्र धारण करना नवीन वस्तुओं का उपयोग इस करण में कर सकते हैं. भूमि से संबंधी काम भी इस करण में किए जा सकते हैं. इस करण में जातक एक बेहतर परामर्शदाता भी बन सकता है. मैनेजमेंट से संबंधी काम कर सकता है. उपदेश देना और दूसरों से काम निकलवाने से संबंधित काम इस समय पर कर सकते हैं.

तैतिल करण में जन्में जातक के गुण-विशेषताएं

जिस व्यक्ति का जन्म तैतिल करण में होता है. उस व्यक्ति को अपने पुरुषार्थ के अलावा, सौभाग्य से भी धन प्राप्त होता है. तैतिल करण में जन्म लेने वाला व्यक्ति अपने निकट और अपने ग्रुप के सभी व्यक्तियों से स्नेह करने वाला होता है.

इस योग का व्यक्ति जीवन में कई घरों का स्वामी होता है. भूमि-भवन के मामलों में उसे धन-लाभ प्राप्त होता है. तैतिल करण में जन्मा व्यक्ति कोर्ट-कचहरी में विजय प्राप्त करता है. अपने शत्रुओं को शान्त रखने में वह माहिर होता है. साहस के कार्यों को कुशलता के साथ करता है. दूसरों का भार स्वयं उठाने की कोशिश भी करता है. अपनी ओर से कोशिश करता है सब को प्रसन्न रखने की. बहुत अधिक महत्वकांक्षाएं नहीं रखना चाहता बस जीवन में सुख और शांति की तलाश अधिक रहती है.

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दशमाँश कुण्डली तथा द्वादशांश कुण्डली | Dashmansha Kundali and Dwadashansha Kundali

दशमाँश कुण्डली या D-10 | Dashmansha Kundali or D-10

यह कुण्डली व्यवसाय की सफलता तथा असफलताओं के लिए देखी जाती है. इस कुण्डली से इस बात का आंकलन किया जाता है कि जातक का व्यवसाय कैसा होगा. वह अधिक समय तक एक ही व्यवसाय में रहेगा या बार-बार परिवर्तन करेगा. कई बार जन्म कुण्डली में व्यवसाय भाव अर्थात दशम भाव बहुत ही अच्छा दिखाई देता है लेकिन फिर भी व्यक्ति के व्यवसाय में स्थिरता की कमी होती है. इसके लिए दशम भाव के 12 भाग करके दशमाँश कुण्डली का उपयोग किया जाता है. यदि दशमाँश कुण्डली में भी व्यवसाय को लेकर परेशानियाँ दिखाई देती हैं तो जातक को परेशानियाँ उठानी ही पड़ती है. 

दशमाँश कुण्डली बनाने के लिए 30 अंश को 10 बराबर भागों में बाँटा जाता है. एक भाग 3 अंश का होता है. 3-3 अंश के 10 दशमाँश होते हैं. आइए दशमाँश कुण्डली का विभाजन करन सीखें.

  1. 0 से 3 अंश का पहला दशमाँश होता है. 
  2. 3 से 6 अंश का दूसरा दशमाँश होता है. 
  3. 6 से 9 अंश का तीसरा दशमाँश होता है. 
  4. 9 से 12 अंश का चौथा दशमाँश होता है. 
  5. 12 से 15 अंश का पांचवाँ दशमाँश होता है. 
  6. 15 से 18 अंश का छठा दशमाँश होता है. 
  7. 18 से 21 अंश का सातवाँ दशमाँश होता है. 
  8. 21 से 24 अंश का आठवाँ दशमाँश होता है. 
  9. 24 से 27 अंश का नौवाँ दशमाँश होता है. 
  10. 27 से 30 अंश का दसवाँ दशमाँश होता है. 

दशमाँश कुण्डली के 30 बराबर भाग करने आपने सीख लिए हैं. अब आप दशमाँश कुण्डली में ग्रहों को स्थापित करना समझें. जन्म कुण्डली में यदि कोई ग्रह विषम राशि में स्थित है तो ग्रह की गणना वहीं से आरम्भ होगी जहाँ वह स्थित है. जन्म कुण्डली में यदि ग्रह सम राशि में स्थित है तो गणना ग्रह से नौवीं राशि से आरम्भ होगी. माना कोई ग्रह सम राशि वृष में 22 अंश का है. इसका अर्थ यह हुआ कि ग्रह आठवें दशमाँश में स्थित है. अब जन्म कुण्डली में वृष राशि से नौवीं राशि नोट करें. वृष राशि से नौवीं राशि मकर राशि है. गिनती मकर राशि से शुरु होगी. मकर से आठवाँ दशमाँश सिंह राशि आती है. 

इसका अर्थ यह हुआ कि जो ग्रह जन्म कुण्डली में वृष राशि में स्थित था वह दशमाँश कुण्डली में सिंह राशि में जाएगा. दशमाँश कुण्डली का लग्न तथा सभी ग्रहों की स्थापना दशमाँश कुण्डली में इसी प्रकार से की जाएगी.   

द्वादशांश कुण्डली या D-12 | Dwadashansha Kundali or D-12

इस कुण्डली से माता-पिता के बारे में जानकारी मिलती है. माता-पिता के जीवन के सभी पहलुओं को इस कुण्डली के अध्ययन से जाना जा सकता है. इस कुण्दली को बनाने के लिए 30 अंश के 12 बराबर भाग किए जाते हैं. एक भाग 2 अंश 30 मिनट का होता है. 30 अंश को 12 बराबर भागों में बाँटना सीखें. 

  1. 0 से 2 अंश 30 मिनट तक पहला द्वादशाँश होता है. 
  2. 2 अंश 30 मिनट से 5 अंश तक दूसरा द्वादशाँश होता है. 
  3. 5 अंश से 7 अंश 30 मिनट तक तीसरा द्वादशाँश होता है. 
  4. 7 अंश 30 मिनट  से 10 अंश तक चौथा द्वादशाँश होता है. 
  5. 10 अंश से 12 अंश 30 मिनट तक पांचवाँ द्वादशाँश होता है. 
  6. 12 अंश 30 मिनट से 15 अंश तक छठा द्वादशाँश होता है. 
  7. 15 अंश से 17 अंश 30 मिनट तक सातवाँ द्वादशाँश होता है. 
  8. 17 अंश 30 मिनट से 20 अंश तक आठवाँ द्वादशाँश होता है. 
  9. 20 अंश से 22 अंश 30 मिनट तक नौवाँ द्वादशाँश होता है. 
  10. 22 अंश 30 मिनट से 25 अंश तक दसवाँ द्वादशाँश होता है. 
  11. 25 अंश से 27 अंश 30 मिनट तक ग्यारहवाँ द्वादशाँश होता है. 
  12. 27 अंश 30 मिनट से 30 अंश तक बारहवाँ द्वादशाँश होता है. 

द्वादशाँश कुण्डली बनाने के लिए जन्म कुण्डली में जो ग्रह जिस राशि में होता है उसकी गिनती वहीं से आरम्भ होती है. माना मंगल जन्म कुण्डली में धनु राशि में 21 अंश का स्थित है. इसका अर्थ है कि मंगल दसवें द्वादशाँश में स्थित है. धनु से दसवीं राशि में मंगल की स्थापना की जाएगी. धनु से दसवीं राशि कन्या राशि है अर्थात द्वादशाँश कुण्डली में मंगल कन्या राशि में जाएगा. 

द्वादशाँश कुण्डली के लग्न को भी इस प्रकार से निर्धारित किया जाएगा. जन्म कुण्डली का लग्न देखें कि किस द्वादशाँश में आ रहा है. फिर जन्म कुण्डली के लग्न से उतने भाव आगे तक गिनें. माना जन्म कुण्डली का लग्न सिंह, 12 अंश का है. 12 अंश का अर्थ है कि यह पांचवाँ द्वादशाँश है. अब सिंह से पांचवीं राशि देखें कि कौन सी है. सिंह से पांचवीं राशि मकर है. इस प्रकार द्वादशाँश कुण्डली के लग्न में मकर राशि आएगी. अन्य सभी ग्रहों को भी इसी प्रकार से लिखा जाएगा.  

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रोग तथा रोग निवारण से संबंधित प्रश्न | Questions Related to Disease and Treatment of Disease

रोग संबंधी प्रश्न |Disease Related Question

जब किसी व्यक्ति विशेष की सेहत या स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव चल रहा हो और उसे स्वास्थ्य लाभ ना हो रहा हो तब वह हारकर ज्योतिषी का सहारा लेता है. कई बार रोगी अति कमजोर होता है और उसके स्थान पर उसके अपने प्रियजन प्रश्न करते हैं. यदि रोगी के जन्म की पूरी जानकारी उपलब्ध है तब जन्म कुण्डली से आंकलन किया जाता है और यदि जन्म विवरण उपलब्ध नहीं है तब प्रश्न कुण्डली से विश्लेषण किया जाता है. 

रोग प्रश्न में केन्द्र स्थानों का बहुत महत्व है. ऎसा इसलिए है कि लग्न से चिकित्सक का विचार किया जाता है. चतुर्थ भाव से औषधि अर्थात दवाई का विचार किया जाता है. सप्तम भाव से रोग का विचार किया जाता है. दशम भाव से रोगी का विचार किया जाता है. 

यदि प्रश्न कुण्डली के लग्न में शुभ ग्रह हों तो चिकित्सक एक अनुभवी तथा योग्य व्यक्ति है. चौथे भाव में शुभ ग्रह हों तो औषधि एवं चिकित्सा पद्धति अच्छी नहीं होती. सप्तम भाव में शुभ ग्रह हों तो क्षुद्र रोग होता है. दशम भाव में शुभ ग्रह हों तो रोगी परहेज करने वाला होता है. इस प्रकार आप समझ सकते हैं कि केन्द्र स्थानों में शुभ ग्रह होने से रोगी शीघ्र अच्छा हो जाता है. यदि केन्द्र स्थानों में अशुभ ग्रह हों तो रोगी का रोग बढ़ जाता है. आइए रोगी के ठीक होने के बारे में पहले चर्चा करें. 

रोगी के संबंध में प्रश्न कुण्डली का सामान्य विश्लेषण | General  analysis of Prashna Kundali of Patient 

बीमारी के प्रश्न में लग्न,लग्नेश, चन्द्रमा तथा 6,8,12 भावों का मुख्य रुप से विश्लेषण करना है. 

* लग्न का विश्लेषण | Analysis of Lagna

(1)लग्न में शुभ ग्रह हैं तो चिकित्सक अच्छा है. 

(2)लग्न में पाप ग्रह स्थित हों तब चिकित्सक अच्छा नहीं है. यदि पाप ग्रह लग्नेश होकर लग्न में स्थित है तब वह अच्छा है और चिकित्सक भी अच्छा है. 

(3)लग्न में वक्री ग्रह हो तो चिकित्सक बदलना पड़ सकता है अथवा जातक बार-बार डॉक्टर को बदल चुके हैं अथवा जिस डॉक्टर को छोड़कर आए हैं उसी डॉक्टर के पास जाना पड़ सकता है. यदि प्रश्न के समय मंगल ग्रह लग्न में स्थित होगा तो डॉक्टर बदलना पड़ सकता है. 

* चतुर्थ भाव का विश्लेषण | Analysis of Fourth House 

(1) चतुर्थ भाव से दवाई का विश्लेषण किया जाता है. यदि शुभ ग्रह चतुर्थ भाव में स्थित है तो दवाई असर करेगी. रोगी के रोग का निदान भी सही होगा. 

(2)यदि पाप ग्रह चतुर्थ भाव में स्थित है तो दवाई असर नहीं करेगी. यदि पाप ग्रह स्वराशि का है तब दवाई अधिक असर नहीं करेगी. 

(3)यदि चतुर्थ भाव में वक्री ग्रह है तब बीमारी की सही पहचान नहीं हो पाई है अथवा जो दवा मरीज ले रहा है वह विपरीत परिणाम दे सकती है. 

(4) यदि प्रश्न के समय चतुर्थ भाव में केतु स्थित है तो बीमारी समझ नहीं आएगी. 

(5) प्रश्न के समय चतुर्थ भाव में मंदगामी ग्रह स्थित हैं तो बीमारी लम्बे समय तक बनी रह सकती है. 

* सप्तम भाव का विश्लेषण | Analysis of Seventh House 

(1) सप्तम भाव से बीमारी से निवृति देखी जाती है. यदि प्रश्न के समय सप्तम भाव में पाप ग्रह हों तो बीमारी गंभीर तथा नाजुक है. 

(2) सप्तम भाव में शुभ ग्रह है तो बीमारी साध्य है. बीमारी नियंत्रण में आ जाएगी. 

(3) सप्तम भाव में वक्री ग्रह है तो वर्तमान बीमारी ठीक होकर दूसरी बीमारी हो जाएगी. 

(4)प्रश्न के समय यदि सप्तम भाव में मंगल होगा तब रोगी की शल्य चिकित्सा होगी और मरीज ठीक हो जाएगा. 

(5)यदि सप्तम भाव में बृहस्पति है तब शल्य चिकित्सा नहीं होगी. बिना शल्य चिकित्सा के रोगी ठीक हो जाएगा. 

(6) यदि सप्तम भाव में शनि स्थित है तो शल्य चिकित्सा नहीं होती लेकिन शरीर से कोई एक छोटा अंग निकाला जा सकता है.

(7) राहु/केतु रुकावट का काम करते हैं. सप्तम भाव में राहु या केतु स्थित होगा तो शरीर के जिस भाग में बीमारी है उस भाग के किसी अंग में रुकावट(blockage) हो सकती है. 

(8) सप्तम भाव में शुभ ग्रह होने पर रोगी जल्दी ठीक हो जाता है. 

(9) सप्तम भाव में सूर्य स्थित है तो रेडियोथेरेपी(Radiotherapy) जैसे कार्य से मरीज ठीक हो सकता है. 

* दशम भाव का विश्लेषण Analysis of Tenth House 

(1) प्रश्न कुण्डली में दशम भाव से मरीज का आंकलन किया जाता है. प्रश्न के समय शुभ ग्रह दशम भाव में स्थित है तो मरीज सहयोग करने वाला होगा. 

(2) प्रश्न के समय यदि अशुभ ग्रह दशम भाव में स्थित है तब मरीज, चिकित्सक तथा परिवार के अन्य सदस्यों से सहयोग करने वाला नहीं होगा. मरीज की बद-हजमी तथा परहेज ना करने से रोग बढे़गा. 

* प्रश्न के समय 6,8,12 भाव में पाप ग्रहों की अधिक संख्या सही नहीं है. छठे भाव में पाप ग्रह रोग भी देंगें और रोग से लड़ने की शक्ति भी देगें. 

* 12वें भाव में पाप ग्रह हों तो मरीज को कष्ट अधिक हो सकता है. यदि 8वें तथा 12वें भाव में ग्रह बली है तो मरीज ठीक हो जाएगा. यदि ग्रह निर्बल है तो परेशानी हो सकती है.  

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