कुंभ राशि में बुधादित्य योग का फल

बुध और सूर्य  से निर्मित बुधादित्य योग एक अत्यंत शुभ योगों की श्रेणी में स्थान पाता है. बुध ग्रह एवं आदित्य अर्थात सूर्य जब दोनों ग्रह एक साथ होते हैं तो इनका योग बुधादित्य योग का कारण बनता है. कुंडली में बुधादित्य योग किसी भी राशि एवं भाव में निर्मित हो सकता है. बुधादित्य योग का युति योग जब कुंभ राशि में बनता है तो इसके परिणाम काफी स्वतंत्रता के मूल कारण में निहित दिखाई देते हैं. 

बुधादित्य योग का निर्माण जिस भी राशि में होता है उसके प्रभाव उस राशि के साथ मिलकर व्यक्ति को प्राप्त होते हैं. बुध एक बुद्धि का ग्रह है और सूर्य आत्मा एवं ऊर्जा का प्रतीक बनता है. जब बुद्धि और आत्मा का संगम होता है तो व्यक्ति अपने जीवन को अनेक क्षेत्रों में सफलता की ओर ले जाने वाला होता है. सभी राशियों पर इसका अलग अलग प्रभाव देखने को मिलता है.  कुंभ राशि में मौजूद बुधादित्य योग का का फल जानने से पूर्व जरुरी है की बुध और सूर्य की कुंभ राशि में स्थिति को जान लेना चाहिए इसके पश्चात इसके फल को समझ पाना आसान होगा. 

बुध का कुंभ राशि में होना 

कुम्भ राशि में बुध का होना व्यक्ति को काफी स्वच्छंद विचारों से युक्त करता है. व्यक्ति नियमों का पालन करने में अधिक विश्वास नहीं रखता है लेकिन इसका अर्थ ये नहीं की वे नियमों को तोड़ता है वह अपने अनुसार नियमों की परिभाषा करना पसंद करता है. परंपराओं को नवीनता देता है. कुछ मामलों में यह गलत तरीकों को तोड़ने में विश्वास रखते हैं. व्यक्ति अगर चाहे तो दूसरों को बदल देने एवं उत्तेजित करने में सक्षम होता है. कुम्भ राशि में बुध वाले लोग कभी किसी के पक्षपाती होने की भावना को सहन नहीं कर सकते. दूसरों का खंडन करने में आगे रह सकते हैं. अपनी बात को बेहद सटीक रुप से प्रकट करते हैं. बौद्धिक बहस में शामिल होना पसंद करते हैं. कुम्भ राशि में बुध का होना व्यक्ति को तेज और सतर्क भी बनाता है.  अच्छी अवलोकन शक्ति होती है और तर्क और बहस में जीत सकते हैं.   

कुम्भ एक वायु तत्व राशि है, यह एक स्थिर राशि है. कुंभ राशि में बुध का होना व्यक्ति को बेहतर बौद्धिक दृष्टिकोण प्रदान करता है.  कुम्भ राशि में बुध का प्रभाव व्यक्ति को आकर्षक भी बनाता है. व्यक्ति के पास हमेशा कुछ न कुछ दिलचस्प विचार या योजनाएं होती हैं. कुम्भ राशि में बुध का प्रभाव व्यक्ति को अध्ययन की आदत भी देता है.  शेड्यूल में काम करना इन्हें अधिक पसंद नहीं होता है.  किसी दूसरे का दबाव या फिर संगठन की भावना को समझने में सक्षम नहीं होते हैं.  व्यक्ति वैज्ञानिक और आध्यात्मिक खोज के प्रति आकर्षित होता है. व्यक्ति का सेंस ऑफ ह्यूमर अच्छा होता है.  

कुंभ राशि में बुध अक्सर जिदी माना जाता है. इनका झुकाव विवादों और अराजकता की ओर हो सकता है. परंपरा और मूल्यों के लिए ज्यादा विश्वास नहीं रखते हैं. व्यक्ति के चरित्र का सही-सही आंकलन करने में सक्षम होते हैं.  निष्पक्षता और समानता में विश्वास करते हैं. मानवतावादी हैं जो हमेशा दूसरों की मदद करने में लगे रहते हैं. बुध का प्रभाव कुंभ में होने पर व्यक्ति को शानदार वक्ता और लेखक भी बनाता है.

कुंभ राशि में सूर्य का योग 

सूर्य का कुंभ राशि में होना व्यक्ति को बौद्धिक रुप से सक्रिय बनाता है. सामाजिक रुप से सफलता देता है. लोगों के साथ जुड़ने का समय भी दिखाता है.  कुंभ एक बौद्धिक और रहस्यात्मक राशि है जिसके भीतर अपार संभावनाएं देखने को मिल सकती हैं. यह मौलिकता और स्वतंत्रता को पसंद करती है. ऎसे में कुंभ राशि में स्थित सूर्य व्यक्ति को स्वयं के ढोल की थाप पर चलने के लिए स्वतंत्र बनाता है. व्यक्ति सभी लोगों के अधिकारों का समर्थन करता है. क्रांतिकारी कुम्भ के माध्यम से सूर्य की स्थिति पहचान से पीछे हटते हुए नवीनता के लिए आगे बढ़ने का समय देती है.  यह शक्ति और आदर्श का बेहतर संतुलन भी दिखाता है. कुंभ राशि में सूर्य का होना सनकी और स्वच्छंद प्रवृत्ति देता है.  इनकी उपस्थिति को नज़रअंदाज़ करना असंभव होता है. कुम्भ राशि में सूर्य का होना व्यक्ति को नियम से परे ले जाकर काम करने लिए उत्साहित करता है. व्यक्ति हमेशा अपने आप को और अपने आसपास के समुदाय को बेहतर बनाने के लिए कोशिश करता है.  चीजों को अपने तरीके से करने की स्वतंत्रता से प्रेरित होता है. अक्सर अपनी अप्रत्याशितता से दूसरों को आश्चर्यचकित करने में भी सक्षम होता है.   

व्यक्ति अपने दिल के बजाय अपने दिमाग से कार्य करता है. अलग से चलने की यह भावना सभी चीजों पर ध्यान केंद्रित करने में मदद करता है.   कुम्भ राशि में सूर्य अधिक सफलता प्राप्त करने, अपनी स्थिति को उन्नत करने के लिए प्रेरित करता है. अपने विकास पर बहुत अधिक ध्यान केंद्रित करने को कहता है. सूर्य का प्रभाव व्यक्ति को  आत्ममुग्ध और भौतिकवादी बनाता है.  शनि और सूर्य एक-दूसरे के शत्रु हैं, इसलिए नकारात्मक पक्ष को भी दर्शाता है. केवल विश्लेषण और गणना करने के बजाय खुद को खोलने और खुद को अभिव्यक्त करने की कोशिश करने की जरूरत है. भौतिकवादी उपलब्धियों के अलावा भी जीवन में करने के लिए बहुत कुछ है. 

बुधादित्य योग का कुंभ राशि प्रभाव 

कुंभ राशि में सूर्य और बुध के लाभ मिलकर व्यक्ति को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष बनाने का काम करते हैं. व्यक्ति चीजों का आनंद उठाने में आगे रहता है. वह समाज को बदल देने में सक्षम होता है. उसकी कार्यकुशलता व्यक्ति को आगे ले जाने में सक्षम होता है. कुंभ राशि को आध्यात्मिकता से भी संबंधित माना जाता है अत: इस राशि में सूर्य और बुध व्यक्ति को बहुत आध्यात्मिक बना सकते हैं. जीवन में उच्च लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए व्यक्ति कर्मठ भी होता है. 

अपने कारोबार में करियर में सुख का भोग कर पाता है. व्यक्ति नवीन चीजों को पाता है ओर कई चीजों को खोजता है. अच्छी विश्लेषणात्मक क्षमता भी व्यक्ति को प्राप्त होती है. व्यक्ति लोगों के मध्य अपनी छाप को दूसरों पर अच्छे से छोड़ता है. 

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बृहस्पति का कुंडली की 12 राशियों में फल

वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति एक पवित्र समुद्र है, जिसके कारण यह विस्तार का स्वरुप भी है. यह आध्यात्मिकता नैतिकता का आधार होता है. ज्योतिष में बृहस्पति को एक मजबूत शुभ ग्रह माना जाता है. इसे देवगुरु भी कहा जाता है. ग्रह का किसी व्यक्ति के जीवन में भी बहुत प्रभाव पड़ता है. ज्योतिष में बृहस्पति की शक्ति जीवन को समृद्ध बना सकती है. यह ज्ञान, समर्पण के लिए उत्तरदायी होता है. यह किसी व्यक्ति के आध्यात्मिक पक्ष को भी प्रकट करता है. भारतीय ज्योतिष में बृहस्पति का बहुत महत्व है. इसके अलावा, यह किसी व्यक्ति के जन्म कुंडली में यह जिस भी भाव में स्थित होता है उस घर में विस्तार को दर्शाता है. यह परिवार, संतान, धन से निकटता से जुड़ा हुआ ग्रह है.  यदि बृहस्पति शुभ है कुंडली में तो यह धन के साथ सुख एवं खुशी को प्रदान कर सकता है. अगर बृहस्पति कमजोर है तो यह जीवन में समस्याएं पैदा कर सकता है. इसका विपरीत प्रभाव हो सकता है और एक व्यक्ति धन, ज्ञान या संतान से रहित हो सकता है. एक व्यक्ति को समाज में भी अव्यवस्था हो सकती है.

मेष राशि में बृहस्पति

मेष राशि में बृहस्पति साहस, निर्भय की भावना देता है. नैतिक नेतृत्व क्षमता, के लिए बृहस्पति यहां बेहतरीन होता है. इसके कारण व्यक्ति पहल करने में आगे रहता है. आत्मनिर्भरता, शिक्षा, दर्शन या धर्म से संबंधित सकारात्मक कार्रवाई के लिए एक प्रतिभा विकसित करने का अवसर भी इसके कारण मिलता है. व्यक्तित्व और जीवन के अनुभव का विस्तार करने का मौका यहां अवश्य मिलता है. व्यक्ति अग्रणी प्रवृत्ति, साहस और बहुत शारीरिक ऊर्जा के साथ संपन्न होकर ज्ञान, समझ और अनुभव का अच्छा प्रदर्शन कर पाता है. व्यक्तिगत रुप से किसी न किसी खोज पर लगा रह सकता हैं जो अंततः जीवन को एक नए और बेहतर तरीके से आगे ले जा सकता है. समाज में अपनी जगह बनाने की क्षमता भी विकसित होती है.

वृषभ राशि में बृहस्पति

वृषभ में बृहस्पति के होने से भौतिक संसाधनों का उपयोग करने में कुशलता प्राप्त होती है. व्यावहारिक क्षमता विकसित होती है. बुद्धिमानी से चीजें उपयोग करने की आवश्यकता भी होती है. अपने व्यक्तित्व और जीवन के अनुभव को उचित रुप से समझ पाते हैं. व्यक्ति सफलता, धन और अच्छी जीवन शैली को पाने के लिए आकर्षित रहता है.   चीजों को पाना तो है लेकिन बहुत अधिक जोखिम लेने से बचते हैं. 

मिथुन राशि में बृहस्पति

मिथुन में बृहस्पति का होना धर्म, कानून, दर्शन और अन्य उच्च शैक्षिक विषयों से जुड़ने उन्हें समझने का अवसर देता है. व्यक्तित्व और जीवन के अनुभव का विस्तार करने के लिए यह गुणवत्ता आवश्यक है.  मानसिक रुचियों की विस्तृत श्रृंखला लोगों को आकर्षित करती है. दूसरों के साथ मिलकर ज्ञान के दायरे को व्यापक बनाने में मदद मिलती है. नए और असामान्य विषयों में अग्रणी होते हैं. लेखन, शिक्षण और व्याख्यान से जुड़े कामों में व्यक्ति अच्छा कर पाता है. 

कर्क राशि में बृहस्पति 

कर्क राशि में बृहस्पति का होना शुभस्थ होता है. इसके कारण व्यक्ति दयालु, प्यार पूर्ण, संवेदनशील और पितृ प्रकृति को पाता है. जीवन को विकसित करने का अवसर देता है. व्यक्ति सहानुभूति और समझ में सक्षम होता है. जीवन में सुरक्षित, मैत्रीपूर्ण, समृद्ध और आरामदायक स्थिति की प्राप्ति होगी. संपत्ति विरासत के रुप में माता -पिता से धन प्राप्त होता है. कर्क में बृहस्पति अच्छे भाग्य को आकर्षित करता है. सहानुभूति, धर्मार्थ से जुड़े काम व्यक्ति करता है. दूसरों को बचाने के लिए शक्तियों का उपयोग करने में सक्षम होते हैं, कर्क में बृहस्पति के रूप में व्यक्ति उच्च शक्ति, मजबूत विश्वास, भाग्य और समृद्ध का जीवन पाता है. 

सिंह राशि में बृहस्पति

सिंह राशि में बृहस्पति व्यक्ति को मजबूत नेतृत्व गुणों के साथ एक सम्मानजनक, ईमानदार, आत्म-आत्मविश्वास, आशावादी और उदार प्रकृति विकसित करने का अवसर देता है. सम्मान, सामाजिक स्थिति और प्रतिष्ठा की संभावना को दर्शाता है. यह अहंकार को सुदृढ़ करने वाली स्थिति भी होती है. आत्म-मूल्य और सामाजिक महत्व की भावना भी इस स्थान पर विकसित होती है.  सामाजिक एकीकरण और व्यक्तित्व विस्तार के लिए सिंह राशि का बृहस्पति बहुत सहायक होता है. सिंह में बृहस्पति के होने पर दूसरों का नेतृत्व करना, राजनीति, धर्म, परामर्श, नैतिक विकास, दर्शन या उच्च शिक्षा जैसे क्षेत्रों में अच्छी सफलता प्राप्त हो सकती है. 

कन्या राशि में बृहस्पति

कन्या में बृहस्पति का प्रभाव व्यक्ति को पोषण, देखभाल, विस्तार, काम और व्यवसाय में ईमानदार होने का गुण देता है. दूसरों के साथ सहयोग करने में व्यक्ति कुशल होता है. बृहस्पति का इस राशि स्थान पर होना साहित्यिक कौशल, बुद्धिमान तकनीक, वैज्ञानिक क्षमता और तकनीकी विशेषज्ञता प्रदान करता है. व्यव्यक्ति अत्यधिक पारिश्रमिक और नैतिक रूप से भी काफी मजबूत होता है. कन्या में बृहस्पति अच्छे भाग्य को आकर्षित करता है. व्यक्ति सहायक, ईमानदार, व्यावहारिक, व्यवस्थित होता है. 

तुला राशि में बृहस्पति

तुला राशि में बृहस्पति सामाजिक संबंधों में नैतिकता, निष्पक्षता और न्याय को सहयोग करता है. करीबी दोस्तों और सहयोगियों की नैतिक और सामाजिक अवधारणाओं को प्रभावित करने की क्षमता मिलती है. सामान्य रूप से दार्शनिक और मानवीय तरीके के साथ काम करने की संभावना अच्छी होती है. कलात्मक प्रतिभा होती है. तुला राशि में बृहस्पति सबसे अच्छे भाग्य को आकर्षित करता है. निष्पक्ष रुप से विचार रखने वाला तथा दूसरों के साथ समानता के साथ व्यवहार करने की क्षमता प्राप्त होती है. 

वृश्चिक राशि में बृहस्पति

वृश्चिक राशि में बृहस्पति आपको व्यवसाय में कौशल देता है. अपने काम को विकसित करने का अवसर देता है. चीजों को संभालने का गुण मौजूद होता है. सुरक्षा और व्यक्तिगत सफलता के लिए मजबूत भावनात्मक इच्छा शक्ति भी होती है. दृढ़ संकल्प और कड़ी मेहनत की क्षमता अच्छी होती है. किसी भी स्थिति में सच्चाई को उजागर करने में भी आगे रहते हैं. 

धनु राशि में बृहस्पति

धनु राशि में बृहस्पति ज्ञान को विकसित करने का अवसर देता है. गहन विचार की क्षमता मिलती है. धार्मिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक ज्ञान और समझ की क्षमता भी मिलती है. विदेशी संस्कृतियों के साथ मेल-जोल,  यात्रा और गहन अध्ययन करने में आगे बढ़ाता है. बौद्धिक दृष्टिकोण का विस्तार करने का काम करेगा.  व्यक्ति उदार, सहिष्णु, प्रेरणादायक होता है. 

मकर राशि में बृहस्पति

मकर राशि में बृहस्पति कर्तव्य, अखंडता, ईमानदारी, परिपक्व निर्णय, नैतिकता को बढ़ावा देता है. गरिमा, महत्व, शक्ति और स्थिति के लिए यह विशेष गुण होता है. व्यक्ति कड़ी मेहनत, दृढ़ संकल्प और उपलब्धि के माध्यम से सफलता को पाता है. यहां बृहस्पति व्यक्ति के लिए कुछ नम्रता पूर्वक काम करने की विद्या देता है. अभिमान के बजाय कोमलता से स्थिति का सामना करना.

कुंभ राशि में बृहस्पति

कुंभ राशि में बृहस्पति एक स्वतंत्र, स्व-इच्छाशक्ति, सहिष्णु, बौद्धिकता, आशावादी, आविष्कारशील गुण देता है. व्यक्ति के भीतर सामाजिक रुप से शामिल होने, नई तकनीक, दर्शन, धर्म, ज्योतिष, तत्वमीमांसा और मनोगत ज्ञान जैसे जीवन के गहरे विषयों में प्रवेश करने की एक सहज इच्छा जागृत करता है. उन लोगों से जुड़ने का मौका मिलता है जो मानवता के लिए कुछ नया करने और आगे बढ़ने की कोशिश कर पाएंगे. 

मीन राशि में बृहस्पति

मीन राशि में बृहस्पति व्यक्ति को सच्ची ज्ञान, करुणा, सहानुभूति और भावनात्मक गुण प्रदान करता है. भावनाएं, आध्यात्मिक, मजबूतकल्पनाशील और सहज ज्ञान का गुण भी व्यक्ति को प्रदान करता है. अपने आदर्श को पूरा करने के लिए कोशिशें करते हैं. 

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शनि के साथ मंगल का होना कुंडली के सभी भावों को करता है प्रभावित

शनि और मंगल को शत्रु ग्रह के रूप में जाना जाता है, इसलिए इन दोनों की कोई भी युति अच्छी नहीं मानी जाती है. यह एक कठिन स्थिति को दर्शाती है. मंगल को अग्नि तत्व युक्त ग्रह कहा जाता है. मंगल स्वभाव से बहुत हिंसक होता है और शनि क्रूर ग्रह है. इस तरह देखा जाए तो इन दोनों का एक साथ होना भाव फलों को कमजोर कर सकता है. इन दोनों की शक्ति में जो द्वंद है उसके चलते भी खराब परिणाम भोगने पड़ते हैं. इन दोनों ग्रहों का किसी भी तरह का संबंध जीवन में उथल-पुथल ही पैदा कर सकता है. देश और दुनिया में हिंसक घटनाओं में वृद्धि भी इस योग के होने से देखने को मिलती है.  मंगल और शनि की युति जीवन में अचानक होने वाली घटनाओं को लाती है. दांपत्य जीवन, नौकरी, व्यापार, संतान और गृह मामलों से संबंधित शुभ-अशुभ घटनाएं जीवन में अचानक घटित होती हैं.  

कुंडली के प्रथम भाव में शनि और मंगल की युति

कुंडली के पहले भाव में शनि और मंगल की युति का योग व्यक्ति को काफी बेचैन बना सकता है. व्यक्ति दूसरों के नियंत्रण को समझ नहीं पाता है. आस पास की गतिविधियों के कारण वह अस्थिर सा रहता है. कई मामलों में गंभीर और जिम्मेदार बनता है किंतु अधिकांश चीजें असंतोष का कारक बनती हैं. न्याय के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति होता है. ज्ञान और शक्ति दोनों ही गुण उसमें मौजूद होते हैं. व्यक्ति को समाज में सम्मान प्राप्त कर पाता है लेकिन लेकिन जीवन में उचित निर्णय लेने में कमजोर रहता है. 

कुंडली के दूसरे भाव में शनि और मंगल की युति

कुंडली के दूसरे भाव में शनि और मंगल की युति का प्रभाव जातक को अपने परिवार का सुख नहीं लेने देता है. व्यक्ति स्वयं की मेहनत से धन संपत्ति अर्जित करता है. दूसरों के काम करवाता है लेकिन खुद की सहायता के लिए परेशान होता है. व्यक्ति को ससुराल पक्ष से अनबन भी झेलनी पड़ सकती है. धन और संपत्ति से संबंधित समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है. जीवन में अपनों से दूरी अधिक सहन करनी पड़ती है. 

कुंडली के तीसरे भाव में शनि और मंगल की युति

कुंडली के तीसरे भाव में शनि और मंगल की युति व्यक्ति को परिश्रम द्वारा धनार्जन के लिए प्रेरित करती है. शक्ति एवं बुद्धि प्राप्त होती है. व्यक्ति पराक्रमी और परिश्रमी होता है. इस दौरान अपने आप ही धन लाभ होता है. अपने भाई-बहनों से अनबन हो सकती है. इनके जिद्दी स्वभाव के कारण परिवार में अशांति का कारण बनते हैं. यात्राओं की अधिकता रह सकती है. 

कुंडली के चौथे भाव में शनि और मंगल की युति

कुंडली के चौथे भाव में शनि और मंगल की युति धन देती है. व्यक्ति माता के निर्देशानुसार काम करने वाला होता है. व्यक्ति अपने जीवन में सुख की कमी को अनुभव कर सकता है. व्यक्ति धार्मिक कार्यों में शामिल हो सकता है. अपने बड़े बुजुर्गों के प्रति मान सम्मान करने वाला होता है. व्यक्ति छाति से संबंधित रोगों से परेशान रह सकता है. किसी नशीले पदार्थ की लत लग सकती है. घर से दूर रहकर भाग्य का निर्माण करता है.

कुंडली के पांचवें भाव में शनि और मंगल की युति

कुंडली के पंचम भाव में शनि और मंगल की युति व्यक्ति को साहस एवं शक्ति प्रदान करती है. व्यक्ति को अपने प्रेम संबंधों के मामले में कमजोर स्थिति का सामना करना पड़ सकता है. विज्ञान और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में सफलता मिल सकती है. दूसरों के लिए परोपकारी एवं सहायता करने में आगे रहता है. संतान के सुख में कुछ समस्या रह सकती है.

कुंडली के छठे भाव में शनि और मंगल की युति

जन्म कुंडली के छठे भाव में शनि और मंगल की युति का प्रभाव व्यक्ति को ज्ञान और शक्ति प्रदान करता है. इस योग द्वारा धन की प्राप्ति होती है. व्यक्ति कई बार अपने शत्रुओं से भी लाभ अर्जित करने वाला होता है. धन का अधिक व्यय करता है. व्यक्ति को वाहन चलाते समय सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि चोट लगने का खतरा हो सकता है. रोगों का असर जीवन पर पड़ता है.

कुंडली के सप्तम भाव में शनि और मंगल की युति

कुंडली के सप्तम भाव में शनि और मंगल की युति का प्रभाव वैवाहिक जीवन को कमजोर करने वाला होता है. व्यक्ति को आकर्षक और सुंदर जीवनसाथी मिलता है. व्यापार में सफलता के लिए व्यक्ति का संघर्ष अच्छा रहता है. व्यक्ति अपनी प्रतिस्पर्धा में आगे रह सकता है. व्यक्ति किसी न किसी प्रकार के व्यस्न से ग्रसित रह सकता है. अपने प्रेम संबंधों में व्यक्ति काफी विरोधाभास की स्थिति को पाता है. 

कुंडली के आठवें भाव में शनि और मंगल की युति

जन्म कुंडली के अष्टम भाव में शनि और मंगल की युति व्यक्ति को धनवान और लोकप्रिय बनाने में सक्षम होती है. यह योग व्यक्ति को व्यापार में सफलता दिला सकता है. व्यक्ति की आयु लंबी होती है. शोध के क्षेत्र में सफलता मिल सकती है. इस युति योग के कारण स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो सकती है. पैसा होते हुए भी व्यक्ति आर्थिक रुप से उसका उपयोग नहीं कर पाता है.

कुंडली के नौवें भाव में शनि और मंगल की युति

भाव में शनि और मंगल की युति होने से व्यक्ति धार्मिक होता है. इस दौरान जातक को आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ सकता है. जातक का अपने भाई-बहनों से झगड़ा होता है. जातक आध्यात्मिक कार्यों में आगे रहता है. व्यक्ति उदार और कठोर बनता है.

कुंडली के दशम भाव में शनि और मंगल की युति

जन्म कुंडली के दशम भाव में शनि और मंगल की युति व्यक्ति को कई तरह की सफलताएं भी देता है. न्यायालय से संबंधित क्षेत्रों में, सरकार, पुलिस या वकालत के क्षेत्र में सफलता को पाने में सफल होता है. इस योग को आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है. व्यक्ति पर कर्ज हो सकता है.

कुंडली के एकादश भाव में शनि और मंगल की युति

कादश भाव में शनि और मंगल की युति होने से जातक अपनी मेहनत से धन कमा सकता है. इस दौरान लोगों को पेट संबंधी बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है. जातक को समाज में बदनामी का सामना करना पड़ सकता है.

कुंडली के बारहवें भाव में शनि और मंगल की युति

जन्म कुंडली के बारहवें भाव में शनि और मंगल की युति व्यक्ति को शिक्षा के क्षेत्र में सफलता दिला सकती है. इस दौरान शत्रु व्यक्ति के सामने टिक नहीं पाते हैं. वाहन चलाते समय दुर्घटना हो सकती है.

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जन्म कुंडली में केतु सभी भावों को कैसे करता है प्रभावित

केतु का असर ज्योतिष के दृष्टिकोण से काफी शुष्क माना गया है, जिसका अर्थ हुआ की ये ग्रह अपने प्रभाव द्वारा जीवन में कठोरता एवं वास्तविकता से रुबरु कराने वाला होता है. केतु  की राशि और उसके ग्रहों के साथ युति दृष्टि योग पर फल निर्भर करता है. जन्म कुंडली में केतु के लिए सभी भावों पर असर अलग-अलग तरह से देखने को मिलता है. अगर कुंडली में अच्छी स्थिति में है तो बेहतर निर्णय लेने की क्षमता के साथ अंतर्ज्ञानी और दूरदर्शी बनाता है, लेकिन अगर कमजोर खराब स्थिति में है तो इन परिणामों को उलट कर देता है और जीवन में असंतोष बहुत अधिक भर जाता है. यदि केतु नकारात्मक है, तो जीवनसाथी के साथ अनबन का अनुभव हो सकता है. स्वास्थ्य से संबंधित मुद्दे, दुर्घटनाएं, वित्तीय नुकसान, नौकरी की स्थिरता के मुद्दे और व्यापार का नुकसान परेशान कर सकता है. उसे सामान्य शिक्षा प्राप्त करना भी बहुत कठिन लगता है. 

केतु 12 घरों को कैसे प्रभावित करता है?

प्रथम भाव में केतु

प्रथम भाव में केतु का होना व्यक्ति को क्रियशील एवं गतिशील बनाता है. व्यक्ति को भ्रमण का शौक हो सकता है वह अकेलेपन को स्वीकार करने वाला होता है. केतु शुभ दृष्टि वाला हो तो व्यक्ति को मेहनती और भाग्यवान बनाता है. पीड़ित होने पर, व्यक्ति की सहनशक्ति कमजोर होती है सेहत से जुड़े मुद्दे परेशान कर सकते हैं. व्यक्ति लोभी भ्रामक एवं आत्म-केन्द्रित हो सकता है. 

दूसरे भाव में केतु

दूसरे भाव में केतु का होना व्यक्ति को अत्यधिक विचारशील बना सकता है. नवीन ज्ञान और जानकारी पाने के लिए वह आगे रहता है बोल चाल में कई बार अति-अभिव्यंजक हो सकता है. अगर केतु पीड़ित है, तो यह सीखने की क्षमता को कमजोर कर सकता है. परिवार से अलग होना पड़ सकता है. लोगों के साथ अच्छे संबंध बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है. 

तीसरे भाव में केतु

तीसरे घर में केतु के शुभ होने पर व्यक्ति प्रसिद्ध, धनवान और यशस्वी बनता है. आध्यात्मिक रूप से प्रसिद्धि भी पाता है. व्यक्ति कि धार्मिक गतिविधियों में भागीदारी रहती है. केतु के खराब होने पर भाई-बहनों के साथ मुकदमेबाजी में फंसे सकता है, अपनों एवं लोगों के साथ शत्रुता का सामना करना पड़ सकता है. 

चौथे भाव में केतु

चौथे भाव में केतु के शुभ होने पर व्यक्ति को विदेश यात्रा एवं निवास का अवसर मिलता है. माता के साथ संबंध अनुकूल रहता है. केतु के खराब होने पर परिवार से विच्छोह या दूरी झेलनी पड़ सकती है. मन अस्थिर और अशांत रहता है. परिवार एवं संपत्ति के मामले निराशा रह सकती है. 

पंचम भाव में केतु

पंचम भाव में केतु का होना व्यक्ति को कई गुढ़ विद्याओं को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है. शोध करने की तीव्र प्रवृत्ति देता है. केतु के खराब होने पर व्यक्ति गलत चीजों की ओर अधिक आकर्षित होता है. बौद्धिकता प्रभवैत होती है. गर्भपात या संतान से संबंधित चिंता भी अधिक रह सकती है. 

छठे भाव में केतु

छठे भाव केतु का होना कई सकारात्मक असर दिखाता है ये लेकिन दुर्घटना और चोट लगने का भय भी देता है. केतु का प्रभाव बहुत सी बाधाओं का सामना करने की हिम्मत देता है. व्यक्ति अपने कठिन प्रयासों से हर बार ऊपर उठता चला जाता है. जन्म कुंडली में केतु के खराब होने पर व्यक्ति नशे या अपराध में लिप्त हो सकता है.

सातवें भाव में केतु

केतु का सातवें भाव में होना शादी और पार्टनरशिप के लिए परेशानियों को अधिक दिखाता है. जीवन में संबंधों को लेकर बाधाओं की स्थिति बनी रह सकती है. स्वास्थ्य संबंधी कुछ कष्टों के कारण वैवाहिक जीवन भी कष्टमय हो सकता है. जीवन में बार-बार संघर्ष, अलगाव और दो विवाह होने की संभावनाएं भी अधिक रह सकती है. 

आठवें भाव में केतु

केतु के आठवें भाव में होने पर व्यक्ति को धन के मामलों में बाधाओं का सामना करना पड़ता है, दुर्भाग्य और दुख का सामना करना पड़ता है. गुढ़ विद्याओं में भाग्यशाली हो सकता है. वह एक सक्षम ज्योतिषी भी हो सकता है. केतु का खराब होना हथियारों, जानवरों आदि से घायल होने का भय देता है. किसी बीमारी या चोट के कारण ऑपरेशन इत्यादि का सामना करना पड़ सकता है.

नवम भाव में केतु

नवम भाव में केतु का होना व्यक्ति की इच्छा शक्ति को बढ़ाने वाला होता है. आध्यात्मिक रूप से विकसित होता है. तीर्थस्थलों की यात्रा करने का सुख पाता है. केतु के खराब होने पर यह स्थिति व्यक्ति के पिता के स्वास्थ्य को नुकसान पहुचा सकती है. अथवा पिता के साथ बहुत सौहार्दपूर्ण संबंध कमजोर रह सकते हैं. 

दशम भाव में केतु

दशम भाव में केतु के होने पर व्यक्ति प्रसिद्धि और वैभव को प्राप्त करता है. वह एक शक्तिशाली स्थिति, सामाजिक प्रतिष्ठा और धन प्राप्त करने में सक्षम होता है. वह अपने ज्ञान एवं जानकारियों के लिए प्रसिद्ध होता है. केतु के खराब होने पर सहकर्मियों से असहयोग वं जीवन के प्रति निराशावादी प्रवृत्ति अधिक देखने को मिल सकती है. 

ग्यारहवें भाव में केतु

केतु ग्यारहवें भाव में होने के कारण आय के अतिरिक्त स्रोत प्राप्त होते हैं. व्यक्ति आशावादी बनाता है. धार्मिक प्रवृत्ति से जुड़ाव रखता है. दया और परोपकार से जुड़े कामों में शामिल होता हैं. और काम करने की अपनी अटूट क्षमता के कारण बहुत प्रसिद्ध होता है. चुनौतीपूर्ण स्थिति को संभालने में सक्षम होता है. 

बारहवें भाव में केतु

द्वादश भाव में केतु का होना व्यक्ति आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाला और अंतर्मुखी बनाता है. व्यक्ति एकांत की ओर प्रवृत्त हो सकता है. आध्यात्मिक क्षेत्र में वह तंत्र ज्ञान, ज्योतिष जैसे विषयों को जान पाता है. विदेश में यात्रा या निवास पाता है. 

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बृहस्पति का वक्री गोचर और वक्री ग्रह के क्या परिणाम होते हैं?

बृहस्पति एक बहुत ही शुभ ग्रह है इसकी महत्ता के बारे में जन्म कुंडली में यदि हम देखें तो यदि ये शुभ हैं तो व्यक्ति के लिए सभी काम सकारात्मक रुप से होते चले जाते हैं. किंतु यदि ये सकारात्मक नहीम है तो काम के क्षेत्र में व्यक्ति को काफी परेशानी उठानी पड़ती है. इस कारण से बृहस्पति का वक्री होना उसके कमजोर पक्ष की ओर इशारा करता प्रतीत होता है. कोई भी ग्रह जब वक्री होता है तो उसके परिणाम कई तरह से बदलते चले जाते हैं. इसी में बृहस्पति ग्रह से संबंधित फल कई प्रकार के हो सकते हैं जो संपूर्ण कुंडली पर निर्भर करते हैं लेकिन सामान्य तौर पर यही परिणाम होते हैं.

वक्री होने पर बृहस्पति ग्रह अपना स्वभाव छोड़ देता है. एक मजबूत शनि एक मेहनती और श्रमसाध्य बनाता है, लेकिन वक्री बृहस्पति का लोगों को गर्व से परिपूर्ण एवं आलसी बनाने का एक बहुत ही प्रमुख प्रभाव भी देखने को मिलता है. एक मजबूत बृहस्पति व्यक्ति को धार्मिक बनाता है, लेकिन वक्री बृहस्पति इसके विपरीत काम करता है. यह वक्री होने पर जरुरी नहीं है कि किसी व्यक्ति को धर्म से अलग ले जाएगा लेकिन धर्म को लेकर अलग सोच अवश्य देने की स्थिति को दर्शाता है. यह व्यक्ति की पारिवारिक परंपराओं से अलग कट्टरपंथी विचार भी देने वाला होता है. 

वक्री होने पर ग्रह अपने से पीछे वाले भाव के फल भी देने वाला माना गया है. क्योंकि ग्रह वक्री है, इसलिए यह पीछे की ओर जाने लगता है. यदि हम पीछे की ओर बढ़ना शुरू करते हैं तो हम को पीछे मुड़कर पीछे देखने की जरूरत होती है. इस प्रकार, यह स्थिति ग्रह की भी होती है. 

बृहस्पति का ज्योतिष स्वरुप 

बृहस्पति को नौ ग्रहों में सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली ग्रह माना जाता है. यह शुभता, ईमानदारी, ज्ञान, ज्ञान, विस्तार, न्याय, सकारात्मक गुणों और खुशी का प्रतिनिधित्व करता है. यह दूसरे, पांचवें, नौवें, दसवें और एकादश भाव का कारक है. बृहस्पति पूर्वावास, विशाखा और पूर्वाभाद्र नक्षत्र के स्वामी होते हैं. यह साल में लगभग चार महीने वक्री अवस्था में रहते देखे जा सकते हैं. . बृहस्पति एक राशि में लगभग एक या सवा वर्ष की अवधि तक रहता है और राशि चक्र को पूरा करने में 13 वर्ष का समय लगा देता है. ऐसा माना जाता है कि जो लोग बृहस्पति से प्रभावित होते हैं वे अधिक चर्बी वाले और मीठा खाने के शौकिन हो सकते हैं. बृहस्पति का प्रभाव आध्यात्मिक, धार्मिक, दूरदर्शी, विद्वान और दार्शनिक बनाता है. बृहस्पति की दृष्टि पंचम, सप्तम और नवम भाव पर पूर्ण रूप से पड़ती है. माना जाता है कि जिन घरों पर बृहस्पति की दृष्टि होती है, वे शुभ फल देते हैं, लेकिन जिस घर में स्थित होते हैं, वे अशुभ फल देते हैं. बृहस्पति को धनु और मीन राशि के लिए शुभ माना जाता है जबकि कन्या और मिथुन राशि के लिए अशुभ.

बृहस्पति के वक्री होने का फल और परिणाम 

बृहस्पति यदि कुंडली में उच्च का हो तो नीच के अनुरुप फल दे सकता है. नीच का हो तो अच्छे ग्रह का फल देने लगता है. अगर पापग्रहों से दृष्ट हो तो अत्यंत अशुभ फल देता है, यदि शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो शुभ फल देता है. सूर्य से दूर होने पर ग्रह स्वतंत्र हो जाता है. उच्च और स्वतंत्र होना बहुत अधिक अच्छा है जो ग्रह को अभिमानी, बहुत मजबूत, अभिमानी और व्यर्थ बनाता है. नीच और वक्री को उच्च होने का फल बताया गया है. ऐसा इसलिए है क्योंकि जब ग्रह मुक्त होता है, तो यह अपनी ताकत का फिर से निर्माण करने के लिए काफी मजबूत होता है. इसे ग्रहों के नियमों का पालन करने की आवश्यकता नहीं है जो इसे कमजोर बनाते हैं. यह विद्रोह करने के लिए स्वतंत्र है. बृहस्पति का वक्री होना इसे किसी ग्रह की संगति से प्रभावित करने वाला भी बना देता है.  शुभ के साथ हो तो शुभ और अशुभ के साथ हो तो अशुभ हो जाता है. वक्री ग्रह भी स्वतंत्र होते हैं ऎसे में उनकी संगती जिस भी ग्रह के साथ होती है वह उसे अच्छा या बुरा बनाने में भी काफी सहयोग देती है. 

वक्री बृहस्पति ग्रह अपने कारक भाव का फल देता है. इस स्थिति में बृहस्पति वक्री है तो वह पंचम भाव , नवम भाव इत्यादि का भी फल देने में सक्षम होता है. वक्री ग्रह परिवर्तन के प्रबल सूचक बन कर उभरते हैं. वक्री बृहस्पति का अर्थ है शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव , किसी संस्थान शिक्षण स्थल का निर्माण लेकिन आधुनिक बातों को अपनाना. बहुत अधिक वक्री ग्रहों का अर्थ है कि व्यक्ति को चीजों को शुरू करने की आदत है लेकिन बीच में ही छोड़ देना है. ऎसे में बृहस्पति जब वक्री हो जाता है तो उसके कारण अब चीजें वैसी नहीं रहती हैं जैसी कि हम उनके प्रति सोच रखे हुए थे. वक्री प्रभाव का संबंध ग्रह के कारकत्व से होता है. यदि बृहस्पति मेष राशि के लिए वक्री है, तो इसका मतलब यह है कि उसका इस राशि में होकर आध्यात्मिक क्षेत्र में बदलाव करना तथा अपनी शिक्षा नीति को और अलग अंदाज से करना 

वक्री बृहस्पति अपनी महादशा के उत्तरार्ध में फल देता है 

वक्री ग्रह के कारकत्व से संबंधित प्रमुख परिणाम ग्रह के गोचर में वक्री होने पर भी महसूस किए जा सकते हैं. वक्री ग्रह के परिणामों के बारे में दशा एवं ग्रह की कुंडली में स्थिति के सतह साथ गोचर में स्थिति के आधार पर कई तरह के दिशा निर्देश हमें प्राप्त होते हैं. ग्रह का गोचर होकर फल देना परिणाम और प्रभाव को बदल देने वाला होता है. चार या इससे अधिक ग्रहों के वक्री होने से बहुत प्रबल राज योग भी बनता है इसलिए वक्री होने की स्थिति कुछ विशेष असर भी दिखाती है. बृहस्पति के वक्री होने पर व्यक्ति बहुत स्वतंत्र और आत्मनिर्भर होता है. कुंडली के थोड़े मजबूत और अन्य शुभ योगों के सहयोग द्वारा वह बहुत ही कुशल व्यक्तित्व भी प्राप्त कर सकता है. 

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कुंडली के किन भावों में राहु देता है अच्छे परिणाम और प्रभाव

राहु और केतु ऎसे छाया ग्रह हैं जिन्हें बेहद चुनौतिपूर्ण फलों को देने वाला माना गया है. राहु के साथ केतु भौतिक स्वरुप वाले ग्रहों से अलग छाया ग्रह हैं. लेकिन इनकी ऊर्जा बेहद प्रभावी होती है और जिसके कई खराब प्रभाव हम देख सकते हैं किंतु जहां नकारात्मकता अधिक हैं वहीं इन ग्रहों के शुभ फल भी व्यक्ति को जब मिलते हैं तो उसके असर अचानक से होने वाले असर के लिए अधिक जाने जाते हैं. राहु एक ऎसा ग्रह है जो भौतिकता से जोड़ते हुए भी आध्य्तामिकता की भूख को मिटने नहीम देता है. ये हमेशा नकारात्मक नहीं होता है क्योंकि ये भी कुछ भावों में अत्यंत उल्लेखनीय सकारात्मक प्रभाव लाते हैं.

राहु को ज्योतिष अनुसार एक छाया ग्रह माना जाता है, इसका अशुभ प्रभाव बहुत मजबूत होता है और कहा जाता है कि इसके प्रभाव से जीवन बहुत कठिन हो जाता है. कुंडली में राहु को पूर्व  जन्मों के कर्म बंधन से भी संबंधित माना गया है. राहु की विभिन्न ग्रहों के साथ युति विभिन्न प्रकार की परेशानियों को दर्शाने वाली होती है. यह जिस भी ग्रह के साथ होता है उसके फलों को बदल देने के लिए बहुत अधिक उतावला दिखाई देता है. ज्योतिष शास्त्र अनुसार तथा धमर्म कथाओं में राहु सिर का प्रतिनिधित्व करता है. हिंदू मान्यता के अनुसार, राहु को अच्छे और बुरे के बीच भेदभाव नहीं करने वाला माना जाता है. यह धार्मिकता निति नियमों के खिलाफ भी खड़ा देखा जा सकता है. राहु को आध्यात्मिक विषयों से अनभिज्ञ कहा जा सकता है लेकिन ऎसा है नहीं क्योंकि राहु ने ही अमृत को चखा है ओर उसके ऎसा करने से अमृत के गुण बःई उसमें समाहित होते हैं. 

प्रत्येक भ्रम का कारक राहु बनता है 

राहु का वास्तविक भौतिक अस्तित्व नहीं होता है. वे छाया ग्रह हैं जो विशिष्ट ग्रहों की स्थिति से अस्तित्व में आता है लेकिन अन्य ग्रहों द्वारा तय किए गए रास्तों पर नहीं चलता है. उदय होने पर, जिस बिंदु पर चंद्रमा की कक्षा क्रांतिवृत्त को काटती है, वह राहु बन जाता है. उल्टी गति में, वह बिंदु जहां चंद्रमा की कक्षा क्रांतिवृत्त को काटती है, केतु बन जाता है. वास्तविक भौतिक अस्तित्व न होते हुए भी राहु  को बहुत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है राहु को हर भ्रम का कारण माना जाता है. राहु को स्वतंत्रता से प्रेम है वह किसी भी तरह का बंधन स्वीकार नहीं करता है. राहु आजादी के लिए तरसता है. यह स्वार्थों की पूर्ति के लिए हर किसी के भीतर समाहित होता है.  राहु को निवास, मित्रों और उद्देश्य में परिवर्तन लाने वाला भी माना जाता है. राहु अत्यधिक स्वार्थी होने के कारण शत्रुता में भी वृद्धि करता है.  

ज्योतिष में राहु

ज्योतिष में राहु को लालच, भौतिकवाद, जुनून और प्रसिद्धि का प्रतिनिधित्व करने वाला माना गया है. जब मन भौतिकवाद, वासना या घृणा से प्रभावित होने लगता है तो उसमें राहु विशेष भूमिका को निभाता है. राहु का प्रभाव आने पर कोई भी व्यक्ति कठोर वाणी और कठोर स्वभाव का होता है. राहु को सुख के लिए विशेष माना जाता है क्योंकि इसके सहयोग बिना सुख का भोग भी वास्तविक होता है अन्यथा वह व्यर्थ लग सकता है. यह सांसारिक सुखों जैसे प्रसिद्धि, धन, आदि से  भर देता है. राहु की दशा होने पर व्यक्ति को अपनी पसंद और निर्णयों के बारे में बहुत सावधान रहने की आवश्यकता होती है.  

राहु तीसरे भाव में

ज्योतिष में तीसरा भाव साहस, भाई-बहनों से प्रेम, इच्छाशक्ति और संचार की कुशलता का होता है. इस भाव में राहु का प्रभाव सबसे अच्छा होता है. जब राहु तीसरे भाव में होता है तो उसकी शक्ति काफी अधिक दिखाई देती है. बुद्धि और सामाजिक जागरूकता में सुधार होता है. राहु यहां होकर सीधे तौर पर लोगों के साथ बेहतर संबंध बनाने में मदद करता है. तीसरे भाव में राहु वाले व्यक्ति साहसी होते हैं और चुनौतियों का डटकर सामना करते हैं. आध्यात्मिक होना पसंद करते हैं और आत्म-विश्वास की भावना अच्छी रहती है. इस स्थान में बैठा राहु प्रबल जुनून को दर्शाता है और व्यक्ति को समृद्ध होने के लिए उत्साहित करता है. 

राहु छठे भाव में

ज्योतिष शास्त्र में छठा भाव शत्रुओं, कर्ज और रोग का स्थान है. इस घर में राहु बहुत विशेष स्तर से प्रभावित करने वाला होता है. राहु छठे भाव में होने पर शत्रुओं से रक्षा दिलाता है. विरोधियों का दबाव व्यक्ति को हरा नहीं पाता है. स्वास्थ्य संबंधी बीमारियों को दूर करने में भी राहु की भूमिका बहुत सक्षम दिखाई देती है. अधिकांश बीमारियों से स्थायी राहत पाने में राहु विशेष रुप से काम करता है. अगर इस भाव में मंगल जैसे ग्रह छठे भाव में राहु के साथ युति करते हैं, तो विभिन्न क्षेत्रों में लाभ का और विस्तार में तेजी भी आती है ऎसा व्यक्ति अपनी दबंगई के लिए भी पहचाना जा सकता है.

राहु दसवें भाव में

राहु एक भौतिकवादी ग्रह है, और ज्योतिष में दशम भाव भी भौतिकवाद को दर्शाता है. इस प्रकार ज्योतिष में राहु के लिए एक अच्छा स्थान है. दसवें घर में राहु एक सफल करियर देने में सक्षम होता है. व्यक्ति को सीमाओं से पार पाने में मदद करता है. जैसे-जैसे जीवन में आगे बढ़ते हैं आधिकारिक लोगों का समर्थन प्राप्त होता जाता है. इस का प्रभाव मीडिया, एंटरटेनमेंट और सॉफ्टवेयर से जुड़े कामों में अच्छा प्रोफेशन देता है.

राहु ग्यारहवें भाव में

राहु के लिए एक और अच्छा स्थान एकादश भाव भी माना गया है. इस स्थान में राहु का होना व्यक्ति को अपने जीवनकाल में सफलता और धन की प्राप्ति कराने में सहायक बनता है. ग्यारहवें भाव में राहु की स्थिति दशा काल में विशेष रूप से लाभकारी हो सकती है. इस योग वाले व्यक्ति को सरकार और समाज से लाभ मिलता है. भौतिक लाभ प्राप्त होता है. ग्यारहवां भाव लाभ का स्थान होता है जिसके चलते राहु सकारात्मक प्रभाव देता है क्योंकि वह लाभ प्राप्ति के लिए व्यक्ति को प्रयासशील भी बनाता है. 

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चंद्रमा का कुंडली प्रभाव और उसके दूरगामी परिणाम

कुंडली में एक ग्रह के रूप में चंद्रमा सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. ऎसा इस कारण होता है क्योंकि इसके गोचर की अवधी ओर इसका मानसिकता के साथ संबंध होना. जीवन के रोजमर्रा में होने वाले बदलावों को चंद्रमा की स्थिति से बहुत अधिक गहराई से जोड़ा जा सकता है. उदाहरण के लिए किसी का काम अचानक से छूट जाना,  व्यापार में हानि हुई है, रिश्ते में समस्या है, या कोई बीमारी हो जाना, इसी तरह सकारात्मक पक्ष के रुप में जीवन में कुछ प्राप्ति होना, लाभ होना इत्यादि बातें चंद्रमा के गोचर द्वारा अधिक संवेदनशील हो जाती हैं. चंद्रमा मन, स्वभाव और आंतरिक शक्ति को दर्शाता है. इस स्थिति में, अपने रोज के स्वभाव में आने वाले बदलाव, दिशाहीन होने की स्थिति जैसी बातें चंद्रमा से अधिक तारतम्य दिखाती हैं. 

चंद्रमा मन एवं दिमाग को नियंत्रित करने वाला ग्रह है, हमारी विचार प्रक्रिया, आंतरिक प्रवृत्ति को नियंत्रण में रखता है, तोअगर यह चंद्रमा मजबूत होगा तब हम सबसे खराब परिस्थितियों को भी संभाल सकते हैं लेकिन यदि  चंद्रमा कमजोर है, तो व्यक्ति दूसरों की कही बातों परिअधिक निर्भर हो जाता है. निर्णय और कार्य करने में अपने ज्ञान का उपयोग करने के बजाय व्यक्ति दूसरों से प्रभावित होने की संभावना अधिक रखता है. चंद्रमा स्त्रियों के साथ आपका संबंध, खाने की आदतें, सोने की आदतें, नियमित काम और इसी तरह के कई व्यक्तिगत छोटे छोटे फैसलों पर भी अपना असर डालता है. कुंडली में चंद्रमा की खराब स्थिति के साथ यह सबसे बड़ा मुद्दा है. यदि सूर्य शक्ति और अधिकार प्रदान करता है, तो चंद्रमा इस शक्ति और अधिकार का सर्वोत्तम उपयोग करने के लिए मन और विचार प्रक्रिया को नियंत्रित करता है. चंद्रमा दर्शाता है कि हम आंतरिक रूप से क्या हैं 

चंद्रमा का जन्म और पूनर्जन्म महत्व 

जन्म कुंडली में चंद्रमा के महत्व को प्राचीन काल से अच्छी तरह से समझा जाता रहा है. मुख्य रुप से जन्म कुंडली में सूर्य कुंडली और चंद्र कुंडली पर ध्यान देने की आवश्यकता होती है. अधिकार, शक्ति, मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की आवश्यकता है, लेकिन इसके साथ एक उचित मनोवैज्ञान की भी और यही चंद्रमा व्यक्ति को प्रदान करता है. कुंडली में चंद्रमा की भूमिका  जीवन में आने से शुरू हो जाती है. जन्म कुंडली में चंद्रमा जीवन में देखभाल करने वाली बुद्धि, रोग, सामान्य खुशी, दिल और स्त्रियों कई चीजों को दर्शाता है. जन्म कुंडली में चंद्रमा का महत्व  जीवन की शुरुआत में मिलने वाले पोषण को दर्शाने के लिए भी है. जन्म कुंडली में चंद्रमा की भूमिका और इसकी स्थिति पिछले जन्मों के सभी अच्छे और बुरे कर्मों का प्रभाव भी है.

ज्योतिष में चंद्रमा की भूमिका

ज्योतिष में चंद्रमा सूर्य के बाद मानव जीवन को सीधे प्रभावित करने वाला दूसरा सबसे महत्वपूर्ण ग्रह है. सभी ग्रहों में चंद्रमा पृथ्वी को सबसे निकट रुप से प्रभावित करता है. चंद्रमा का नकारात्मक एवं सकारात्मक प्रभाव जीवन पर तत्काल पड़ता है. ज्योतिष में चंद्रमा की भूमिका कई तरह से देखी जाती है. ज्योतिष में चंद्रमा की समग्र भूमिका काफी गहरे रुप से प्रभावित करने वाली है. चिकित्सा विज्ञान ने भी मानव जीवन में चंद्रमा की भूमिका की पहचान की है. किसी व्यक्ति के मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य, विशेष रूप से मंदबुद्धि लोगों या पागलखानों में रहने वाले लोगों को देखने के लिए इसे सबसे महत्वपूर्ण ग्रह के रूप में लिया जाता है. ज्योतिष में चंद्रमा की भूमिका को तब समझा जा सकता है जब  चंद्र कुंडली पर ध्यान केंद्रित करते हैं. चंद्र नक्षत्र का उपयोग अच्छे मुहूर्त और नामकरण को जानने के लिए किया जाता है, और जन्म के चंद्रमा से सभी मुख्य ग्रहों की स्थिति को विभिन्न ज्योतिषीय विश्लेषण और भविष्यवाणियों के लिए देखा जाता है.

अलग-अलग भावों में चंद्रमा की स्थिति से चंद्रमा की भूमिका देखी जाती है. तो, आइए हम कुंडली में अलग-अलग घरों में चंद्रमा की भूमिका पर एक नजर डालते हैं.

चंद्रमा व्यक्ति के व्यक्तित्व को दर्शाता है. चंद्रमा गर्भाधान, बच्चे के जन्म और पशु प्रवृत्ति पर असर डालता है. वह माता, माता के परिवार, दादी, बूढ़ी महिलाओं, नौवाहन, कृषि भूमि, प्रेम, दया, मानसिक शांति, हृदय, दूसरों के कल्याण के लिए दी गई सेवाओं और चौथे भाव का प्रतिनिधित्व करती है. चंद्रमा का प्रभाव जीवन के कई पड़ावों पर असर डालता है.  इसी प्रकार इसका पहला चक्र चौबीसवें वर्ष में, दूसरा चक्र उनिचासवें वर्ष में और तीसरा चक्र जातक के चौरानवें वर्ष में पड़ता है. बृहस्पति, सूर्य और मंगल चंद्रमा के मित्र हैं, जबकि शनि, राहु और केतु उसके शत्रु हैं. वृष राशि के द्वितीय भाव में उच्च का होता है और वृश्चिक राशि में अष्टम भाव में नीच का हो जाता है.

विभिन्न घरों में चंद्रमा का प्रभाव

चंद्रमा कुंडली के बारह घरों पर अपना असर डालता है यह प्रभाव उसके गोचर के दोरान होता है. इसके अलग जन्म कुंडली में चंद्रमा की स्थिति कौन से स्थान भाव पर होती है राशि पर होती है यह सब बातें कुंडली के अनुरुप चंद्रमा के प्रभावों को दिखाने वाली होती हैं. जन्म कुंडली में जब चंद्रमा पहले भाव स्थान पर होता है तो यह उसकी काफी विशेष स्थिति होती है, इसके उलट चंद्रमा जब अष्टम में होता है तो अपने प्रभाव में अलग असर दिखाता है. लग्न आपके शारीरिक व्यक्तित्व, जीवन शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है. चंद्रमा भावनात्मक जुड़ाव और प्रतिक्रिया दिखाता है. पहले भाव में चंद्रमा स्वास्थ्य-चेतना, एक सुंदर और युवा रूप, और गोल-मटोल गोल चेहरे के साथ  साफ रंग देता है. प्रथम भाव में चंद्रमा का प्रभाव व्यक्ति को देखभाल करने वाला और मातृ भाव को प्रदान करता है. 

पहले भाव, दूसरे भाव, तीसरे भाव, चतुर्थ भाव, पंचम भाव, सप्तम भाव और नवम भाव में स्थित होने पर चंद्रमा बहुत अच्छे परिणाम देता है जबकि छठे भाव, आठवें भाव, एकादश भाव और द्वादश भाव में चंद्रमा को खराब परिणाम वाला माना जाता है. दुधारू पशु या घोड़े की मृत्यु, तालाब का सूखना, छूने और महसूस करने की इंद्रियों का खो जाना चंद्रमा के अशुभ होने के लक्षण होते हैं. चतुर्थ भाव में केतु की स्थिति मातृ ऋण का कारण बनता है. 

इसी प्रकार अलग अलग भावों में चंद्रमा का होना तथा कुंडली में बनने वाले ग्रहों के साथ उसका गठ जोड़ कैसा रहेगा यह सभी बातें कुंडली पर चंद्रमा के असर के लिए विशेष महत्व रखने वाली होती हैं. 

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जन्म कुंडली से कैसे जाने पुनर्जन्म का संबंध

वैदिक ज्योतिष कर्म और पुनर्जन्म के दर्शन पर आधारित है. जन्म कुंडली द्वारा व्यक्ति अपने जीवन और कर्म सिद्धांत की स्थिति को काफी गहराई के द्वारा जांच सकता है. जन्मों की इस यात्रा को समझने में ज्योतिष हमारी बहुत मदद कर सकता है. इसके ज्ञान के द्वारा कर्मों के सिद्धांत को शुभता प्रदान कर लेना भी बहुत बेहतर है. हम वह हैं जो आप अपने पिछले कई जन्मों के कारण हैं, और अभी के द्वारा किए गए काम आने वाले कर्मों का निर्धारण करते चले जाते हैं. इस जन्म में हमारे सुख दुख पुर्व में किए गए हमारे वो कृत्य हैं जिनके फल का निर्धारण इस जन्म में हमें प्राप्त होता है. जन्म कुण्डली में कर्म के निर्धारण के लिए कुंडली के कुछ भाव विशेष रुप से देखे जाते हैं. इन में से विशेष रुप से पंचम भाव, नवम भाव को मुख्य स्थान प्राप्त होता है. इसके अतिरिक्त छठा भाव और द्वादश भाव भी इसके अन्य पहलुओं के लिए विशेष होता है. कर्म एक व्यक्ति के कार्यों से उत्पन्न बल है. कर्म के नियम के दौरान, न्याय की अभिव्यक्ति स्पष्ट रुप से देखने को मिलती है. अपने अच्छे कार्यों के लिए अच्छा मिलता है लेकिन अपने पिछले जन्मों में इन अच्छे कर्मों को करने के द्वारा अर्जित गुणों के माध्यम से अपना अच्छा बुरा प्राप्त करते हैं.  

अच्छे फलों एवं मोक्ष को प्राप्त करने के लिए, एक व्यक्ति को तब तक कई जन्म लेने पड़ते हैं जब तक कि वे अपने बुरे कर्मों से मुक्त नहीं हो जाते.  इस जन्म में हम जो भी कुछ हैं वो अपने पिछले जन्मों के इन अनुभवों के कारण हैं. हमारी आत्मा की चेतना विभिन्न जीवन काल में हमारे अनुभवों से ढाली जाती है.संचित कर्म पिछले जन्मों के संचित अच्छे और बुरे कर्मों का प्रतिनिधित्व करता है जो पहले से ही परिपक्व हो चुके हैं और उन परिस्थितियों में उनका प्रभाव है जिनमें एक का जन्म हुआ है. यह कर्म हमारे जन्म के समय के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है और इसलिए इस जीवनकाल में हमें जिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है वह सभी उन्हीं संचित कर्मों का प्रभाव होता है. कुछ लोग मानसिक या शारीरिक अक्षमताओं के साथ पैदा होते हैं जिन पर उनका कोई नियंत्रण नहीं होता और कुछ महान प्रतिभाओं के साथ पैदा होते हैं जो बहुत कम उम्र में चमक जाते हैं. 

जन्म कुण्डली में संचित कर्म को चौथे भाव, छठे भाव, आठवें भाव और बारहवें भाव द्वारा दर्शाया गया है, यह भाव गहरे और छिपे हुए अर्थों और प्रभावों का प्रतिनिधित्व करते हैं. जीवन के आराम, मृत्यु और से संबंधित इन भावों के द्वारा व्यक्ति के कर्मों को जाना जा सकता है.  

जन्म कुंडली में कर्म भाव और उसकी स्थिति 

जन्म कुण्डली में संचित कर्म को चौथे भाव, छठे भाव, आठवें भाव और बारहवें भाव द्वारा दर्शाया गया है, यह भाव गहरे और छिपे हुए अर्थों और प्रभावों का प्रतिनिधित्व करते हैं. जीवन के आराम, मृत्यु और से संबंधित इन भावों के द्वारा व्यक्ति के कर्मों को जाना जा सकता है.  

जन्म कुडली में दूसरे भाव, छठे भाव, दशम भाव को धन, दैनिक कार्य, स्वास्थ्य, लेनदारों, करियर और व्यक्तिगत स्थिति का प्रतिनिधित्व करता है. इन भावों को देखना होता है ताकि व्यक्ति पर इस कर्म के भौतिक और सांसारिक प्रभावों का विश्लेषण किया जा सके. जन्म और परिस्थितियों की स्पष्ट असमानताओं का कारण तब स्पष्ट हो जाता है जब यह स्वीकार कर लिया जाता है कि आज की हमारी परिस्थितियाँ पूर्व में लिए गए निर्णयों और कार्यों का परिणाम हैं. प्रारब्ध कर्म पिछले जन्मों से लाए गए अधूरे लेन-देन का प्रतिनिधित्व करता है जिसे इस जीवन काल में निपटाने की आवश्यकता है. यह कर्म पंचम भाव पूर्व पुण्य के फलों को दिखाता है. यह लग्न भाव, पंचम और नवम भाव कर्मों के लिए काफी विशेष होता है. 

इस कर्म पर व्यक्ति का एक निश्चित मात्रा में नियंत्रण होता है क्योंकि यह अभी पूरी तरह से गठित नहीं हुआ है. राहु और केतु दो कर्म ग्रह हैं जो इस कर्म को उकसाते हैं.  केतु आगे लाए गए कर्म ऋण का प्रतिनिधित्व करता है और राहु दर्शाता है कि यह कैसे पूरा होने की संभावना है. राहु कुछ लोगों को अचानक ऊपर उठाने में एक प्रमुख भूमिका निभाता है. 

शनि और पुनर्जन्म का संबंध 

प्रथम भाव में शनि का कार्य बहुत विशिष्ट है, इनकी लग्न राशि में सबसे नीच दिग्बल होता है. तो यहां शनि हमें अपने कर्म को बहुत अधिक प्रभावित प्रभावित करते हैं यहां शनि जीवन को पूर्ण रुप से बदल देने के लिए काफी महत्व रखता है. शनि का आप अपने आप को अभिव्यक्त करने से डर सकते हैं बाधित हो सकते हैं, नई चीजें सीखना मुश्किल है, मित्रतापूर्ण, आत्मविश्वास की कमी, सामान्य ज्ञान की कमी आदि. यह असर पिछले जन्मों में शक्ति के दुरुपयोग को अधिक दिखाता है. इसमें जरुरी है कि अब इस कर्म में जीवन को संतुलन करना सीखना होगा. जब आप इसे समझ जाते हैं, तो आप जीवन में अपने लक्ष्यों के लिए व्यवस्थित रूप से काम कर पाते हैं. अपने आप को एकांत में रहने से बचना चाहिए क्योंकि इससे नकारात्मकता अधिक असर डाल सकती है. समस्याएं लगभग हमेशा मौजूद रहती हैं लेकिन उन्हें हल करने का प्रयास करना और  विनम्र होकर सीखने के लिए तैयार रहना चाहिए. 

चतुर्थ भाव और शनि का पुनर्जन्म संबंध 

चतुर्थ भाव में शनि का होना अपने घर से संबंधित अधिक कर्तव्यों को दिखाता है. ऎसा इसलिए करने की आवश्यकता है क्योंकि पिछले जन्म में परिवार की उपेक्षा या परित्याग के कारण इस जीवन में उनके सुख को पाने में कमजोर हो जाते हैं. ऎसे में भावनात्मक सुख, आराम, सुरक्षा आदि के मामलों में हमें अधिक सहयोग नहीं मिल पाता है. अकेलेपन की भावना बहुत ज्यादा तनाव देगी. इन चीजों से बचाव के लिए ही जिम्मेदार होना होगा. नियमित आध्यात्मिक चीजों के प्रति आस्था रखनी होगी. नैतिकता का सख्ती से पालन करना होगा जिससे शनि कर्म की शुभता को प्रदान करें. 

छठे भाव और शनि का पुनर्जन्म संबंध 

छठे भाव में शनि, का होना व्यक्ति को बहुत सी चुनौतियों से प्रभावित करता है. शनि मुख्य रूप से बीमार, कर्ज, शत्रु के द्वारा इस घर में होकर प्रभावित करने वाला होता है. शनि का प्रभाव छठे घर में उथल-पुथल से डरता है. इनसे बचने के लिए सक्रिय सावधानी बरतनी चाहिए. 

जब शनि की स्थिति इन घरों में होती है तो कर्म का सिद्धांत विशेष रुप से काम करता है. शनि की स्थिति जब यहां हो तो अपने कर्मों में अब बदलाव की आवश्यकता होती है. 

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शनि के साथ बृहस्पति का योग कुंभ राशि में होंगे दूरगामी प्रभाव

ज्योतिष अनुसार खगोलिय एवं ग्रह गोचरीय दोनों दृष्टिकोण से यह घटना क्रम काफी महत्वपूर्ण माने गए हैं. इन दोनों ग्रहों का मेल जब एक साथ होता है तो इसमें ज्ञान के विस्तार के साथ साथ कई चीजों में आगे बढ़ने के मौके मिलते हैं. खगोलीय रूप से एक राशि ग्रह योग तब होता है जब दो ग्रह आकाश में एक दूसरे से मिलते हुए दिखाई देते हैं. बृहस्पति और शनि हर 20 साल में मिलते हैं, ज्योतिषियों के लिए, आश्चर्यजनक रूप से, यह बहुत बड़ा घटना क्रम होता है. बृहस्पति और शनि बाहरी ग्रह हैं, और धीमी गति से चलते हैं. इस प्रकार, उनका व्यापक पैमाने पर प्रभाव भी डालते हैं. 

बृहस्पति को आशा, विस्तार, खुशी, विकास और चमत्कार का ग्रह कहा जाता है; शनि, इसके विपरीत, रुकावट, जिम्मेदारी और दीर्घकालिक इंतजार और शिक्षा  सबक से जुड़ा है. जब ये ऊर्जाएं गठबंधन करती हैं, तो कुछ नया होने की उम्मीद कर सकते हैं. इन दोनों ग्रहों का मिलना विचारों, संभावनाओं और उनकी अभिव्यक्ति की धारणा को एक नए तरीके से बढ़ने के लिए प्रेरित करता है. कला, संगीत, रंगमंच, साहित्य, मनोरंजन, भोजन, संगीत, गणित, विज्ञान, राजनीति और सरकार इन सभी पर इस योग का असर जरुर पड़ता है. 

इन दोनों ग्रहों का प्रभाव जिस भी राशि में होता है उसके अनुसार फल मिलते हैं यह संयोग कुम्भ राशि में होने पर नवाचार, मानवतावाद और स्वतंत्रता का प्रतीक बनता है, जहां ग्रह 1405 के बाद से नहीं मिले हैं इसे हम ठीक पुनर्जागरण की शुरुआत के आसपास देखते हैं. अपने आप में उल्लेखनीय होगा, लेकिन उससे भी ऊपर कुम्भ एक वायु राशि है, जो बौद्धिक, संचार में अनुकूल  और आदर्शवादी होने के लिए जानी जाती है. पिछली एक लम्बे समय तक के लिए, बृहस्पति-शनि युति ज्यादातर पृथ्वी तत्व वाली राशियों में हुई है, जो व्यावहारिक और प्रकृति द्वारा आधारित हैं. अब आगे चलकर अगले दो सौ वर्षों तक या इसके आसपास, वे केवल वायु राशियों में मिलेंगे. इस परिवर्तन को किसी बड़े बदलाव के रूप में संदर्भित कर सकते हैं स्थिर पृथ्वी ऊर्जा से आविष्कारशील वायु ऊर्जा तक देखने को मिलेगी. 

शनि और बृहस्पति का योग एक लम्बे समय पर होता है. बृहस्पति को लाभ, आशा, विश्वास, विकास और विस्तार का प्राकृतिक सूचक माना गया है. दूसरी ओर, शनि अशुभ होने के कारण प्रतिबंधों, देरी, सीमाओं, रुकावटों और निराशावाद को दर्शाता है. इनके स्वभाव के विपरीत होने से जब एक साथ होते हैं तो एक संघर्ष पैदा होता है. बृहस्पति प्रतिबंधात्मक शनि के प्रभाव में पीड़ित महसूस करता है रूढ़िवादी और प्रतिबंधात्मक शनि के साथ योग में बृहस्पति किसी की पारंपरिक मान्यताओं और धार्मिक झुकाव का कारक होने के नाते एक ऐसे व्यक्ति को दिखा सकता है जो हठधर्मी और कट्टर हो सकता है. शनि बृहस्पति की स्वाभाविक रूप से स्वीकार करने और क्षमा करने की प्रकृति को प्रतिबंधित करता है, एक व्यक्ति को दूसरे के दृष्टिकोण से चीजों को देखने में असमर्थ बनाता है और इसलिए असहिष्णु और कभी-कभी हद तक को पार कर जाता है. यह एक सख्त दमनकारी अनुशासक बना सकता है, जो अपने अधीन लोगों पर अपना अनुशासन थोपता है. व्यक्ति अत्यधिक अंतर्मुखी भी हो सकता है 

शनि के साथ बृहस्पति कार्यक्षेत्र को कैसे करता है प्रभावित 

शिक्षण, सलाह, परामर्श आदि जैसे बृहस्पति के गुण व्यक्ति को ऎसे ही काम में जोड़ते हैं. इसी प्रकार शनि भी व्यक्ति को जिम्मेदारी और अनुशासन की ओर खिंचता है. इस तरह के व्यवसायों को आगे बढ़ाने के लिए एक सामान्य झुकाव हो सकता है. व्यक्ति इतिहास, पुरातत्व और कानून जैसे कार्यों में रुझान रख सकता है. यह संयोग जब कुंडली में बनता है तो वकील और जज जैसी कार्यवाही दिखाता है. बृहस्पति एक व्यक्ति की बुद्धि और निर्णय होने के साथ-साथ शनि के अनुभव और परिपक्वता को दर्शाता है, व्यक्ति को उसके करियर में एक कुशल न्यायाधीश बना सकता है. इस तरह का संयोजन धार्मिक प्रचारकों में भी देखने को मिल सकता है क्योंकि बृहस्पति धर्म और आध्यात्मिकता का कारक है. कालपुरुष के नवें भाव का स्वामी बृहस्पति है और शनि कर्म भाव कर्म का कारक है. इसलिए दिन-प्रतिदिन की दिनचर्या का घर, धर्म और उपदेश को अपने करियर और दिन-प्रतिदिन की दिनचर्या से जोड़ना इन दोनों के युति योग में देखने को मिल सकता है. 

कुंडली के प्रथम भाव में शनि और गुरु की युति

प्रथम भाव में शनि और बृहस्पति की युति व्यक्ति के लिए आर्थिक समस्याओं का कारण बन सकती है. इन दोनों का युति योग व्यक्ति को आध्यात्मिक रुख देता है. व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों के लिए काफी सजग भी रहता है. 

कुंडली के दूसरे भाव में शनि और गुरु की युति

दूसरे भाव में शनि और गुरु की युति होने से व्यक्ति विद्वान बनता है पैतृक रुप से अपने पूर्वजों का सहयोग पाता है. व्यक्ति की निर्णय शक्ति कमजोर हो जाती है. खर्चे अधिक हो सकते हैं. करियर में बदलाव आ सकते हैं.

कुंडली के तीसरे भाव में शनि और गुरु की युति

तीसरे भाव में शनि और गुरु की युति होने से व्यक्ति परिश्रम से अधिक बौद्धिक कार्यों की ओर ले जाती है. व्यापार का विस्तार हो सकता है. दिमागी ताकत बढ़ाता है आप बार-बार नौकरी बदल सकते हैं. आप एक आरामदायक जीवन व्यतीत कर सकते हैं.

कुंडली के चौथे भाव में शनि और गुरु की युति

चतुर्थ भाव में शनि और गुरु की युति व्यक्ति को प्रसिद्धि दिला सकती है. धन लाभ और भौतिक लाभ मिल पाते हैं. पारिवारिक सुखों कि पाने के लिए कुछ समय लग सकता है. 

कुंडली के पंचम भाव में शनि और गुरु की युति

पंचम भाव में शनि और गुरु की युति होने से जातक को भाग्य का साथ अधिक नहीं मिल पाता है. सरकार से अनबन हो सकती है और मुकदमेबाजी से परेशानी होती है, लेकिन कर्मों के द्वारा कुछ सकारात्मक प्रभाव मिल पाएंगे. 

कुंडली के छठे भाव में शनि और गुरु की युति

छठे भाव में शनि और गुरु की युति होने से जातक को पत्नी से पूर्ण सुख प्राप्त होता है. इस दौरान स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो सकती है. शत्रुओं को हराने में व्यक्ति काफी कुशल होता है. 

कुंडली के सप्तम भाव में शनि और गुरु की युति

कुंडली के सप्तम भाव में शनि और गुरु की युति से शुभ कार्य किए जा सकते हैं. इस दौरान खर्चों के साथ-साथ धन में वृद्धि होगी. व्यापार में लाभ लेकिन आपसी संबंधों में उतार-चढ़ाव बने रहते हैं. 

कुंडली के आठवें भाव में शनि और गुरु की युति

अष्टम भाव में शनि और गुरु की युति होने से जातक की आर्थिक स्थिति अस्थिर रहती है. आयु की अधिकता प्राप्त होती है. व्यक्ति प्रभावशाली और शक्तिशाली होता है. 

कुंडली के नवम भाव में शनि और गुरु की युति

नवम भाव में शनि और गुरु की युति व्यक्ति को अच्छी समृद्धि और धन देता है. वरिष्ठ लोगों के साथ सहयोग देता है. आद्यात्मिक रुप से व्यक्ति अधिक मजबूत बनता है. 

कुंडली के दशम भाव में शनि और गुरु की युति

दशम भाव में शनि और गुरु की युति व्यक्ति को भाग्य का सहयोग देने वाली होती है. करियर में सफलता मिल पाती है और व्यापार में सफलता भी प्राप्ति होती है. 

कुंडली के एकादश भाव में शनि और गुरु की युति

एकादश भाव में शनि और गुरु की युति व्यक्ति के करियर में बदलाव ला सकती है. करियर में सफलता मिलने से व्यक्ति सामाजिक दायरे में आगे बढ़ सकता है. मान सम्मान और प्रसिद्धि प्राप्त होती है.

कुंडली के द्वादश भाव में शनि और गुरु की युति

बारहवें भाव में शनि और गुरु की युति व्यक्ति को बाहरी संपर्क से जोड़ने वाली होती है.  धार्मिक स्थान से जुड़ने का मौका मिलता है. 

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जन्म कुंडली से जानें सूर्य महादशा का प्रभाव

सूर्य महादशा का आगमन जब होता है, तो व्यक्ति के जीवन में काफी बदलाव का समय होता है. सूर्य दशा का प्रभाव जातक को कई तरह के जीवन में प्रभाव दिखाता है. सूर्य ग्रह का प्रभाव विशेष माना जाता है. सूर्य की स्थिति व्यक्ति को मान सम्मान दिलाने वाली होती है. सूर्य की स्थिति व्यक्ति के संपूर्ण जीवन में मिलने वाली शुभता या नकारात्मकता के लिए जिम्मेदार होती है. यदि सूर्य की स्थिति कुंडली में अच्छी होती है और सूर्य शुभ हो तब इस दशा का आगमन काफी अच्छा होगा. इसके अलग अगर ये दशा अनुकूल न हो तो इस समय जीवन में चुनौतियों एवं प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है. इस तरह से दशा का प्रभाव जीवन में कुंडली की स्थिति के आधार पर विशेष होता है. सूर्य ऊर्जा का प्राथमिक स्रोत है. वैदिक ज्योतिष भी सूर्य को प्रमुख ग्रह मानता है, जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका सूर्य की होती है. ऐसा माना जाता है कि शुभ सूर्य व्यक्ति के लिए अत्यधिक अधिकार और प्रसिद्धि ला सकता है, जबकि कमजोर सूर्य प्रसिद्धि और शक्ति में बाधा उत्पन्न कर सकता है, जिससे समस्याएं और संघर्ष हो सकते हैं.

सूर्य की महादशा के प्रभाव और उपाय 

सूर्य की महादशा का समय व्यक्ति के जीवन पर कई तरह के असर दिखने को मिल सकते हैं. सूर्य महादशा जीवन में करियर, रिश्तों, व्यक्तित्व, स्वभाव, भाग्य एवं जीवन की अनेक गतिविधियों पर अपना असर दिखाने वाला होता है. सूर्य महादशा के बारे में सभी महत्वपूर्ण और प्रासंगिक चीजों को समझने की कोशिश करके इस दशा को अच्छे से जान सकते हैं. सूर्य महादशा के महत्वपूर्ण ज्योतिषीय परिणाम इस प्रकार से अपना प्रभाव डालने में सक्षम होंगे. 

सूर्य दशा का कुंडली अनुसार 

वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा के बाद सूर्य को दूसरा सबसे महत्वपूर्ण ग्रह माना जाता है जिसका व्यक्ति पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है. सूर्य जीवन के विभिन्न पहलुओं में समग्र व्यक्तित्व, स्थिति, शक्ति, मान्यता, महत्वाकांक्षा, पूर्णता और व्यक्ति की स्थिरता को प्रभावित करता है. यदि किसी कुण्डली में सूर्य शक्तिशाली है तो अन्य ग्रहों के बुरे प्रभावों को काफी हद तक नकार सकता है. यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में उच्च का सूर्य है और उसकी कुंडली में नीच का शनि या बृहस्पति या मंगल है, तो यह शक्तिशाली सूर्य नीच ग्रह के नकारात्मक प्रभावों को कम करने की क्षमता रखता है. सूर्य को मेष राशि में उच्च और तुला राशि में नीच माना जाता है. अर्थात यदि सूर्य मेष राशि में हो तो उसे उच्च का माना जाता है और यदि सूर्य तुला राशि में हो तो नीच का सूर्य कहलाता है. 

सूर्य का मजबूत होना ऊर्जा, जुनून, उत्साह, महत्वाकांक्षा, क्षमता, जीवन शक्ति, प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता, महत्वपूर्ण और कठिन कार्यों को करने की क्षमता का प्रतिनिधित्व करता है. उच्च के सूर्य के कारण दशा में व्यक्ति कई शुभ गुणों का आनंद उठाने में सफल होता है. वह जो कुछ भी करता है उसमें अति उत्साही होता है, बहुत आत्मविश्वासी, महत्त्वाकांक्षी होगा, जो कुछ भी करेगा उसमें जुनून होगा. लेकिन उच्च सूर्य का अर्थ यह भी है कि इस व्यक्ति इस दशा में अहंकार और क्रोध की स्थिति को भी पाएगा. इस समय वह कई चीजों में नियंत्रण खो सकता है और कभी-कभी हद से ज्यादा उत्तेजित हो सकता है.

सूर्य गरिमा, स्वाभिमान और योग्यता का भी प्रतिनिधित्व करता है. जिस व्यक्ति की कुण्डली में सूर्य की दशा अच्छी होती है, इस दशा के समय बेकार की चीजों और अनुभवों से हमेशा दूर रख पाएंगे. इस दशा के समय स्वाभिमान उनके लिए सर्वोच्च प्राथमिकता रखेगा. लोग कभी भी दूसरों को धोखा नहीं देता है, ईमानदार, भरोसेमंद होकर काम करेगा. सूर्य भी पिता का प्रतिनिधित्व करता है. यदि किसी व्यक्ति की कुण्डली में सूर्य की दशा अच्छी होने पर पिता का सुख प्राप्त होता है, या पिता को समाज में अच्छे पद, शक्ति और प्रसिद्धि की प्राप्ति हो सकती है. सूर्य सरकार, राजनयिक संबंधों और प्रशासन से संबंधित किसी भी चीज का प्रतिनिधित्व करता है. इस दशा के समय पर व्यक्ति सरकार की नौकरी चाहते हैं, तो सूर्य दशा में इसमें शामिल होने का मौका मिलता है. 

नीच के सूर्य की दशा का प्रभाव 

तुला राशि में सूर्य को नीच माना जाता है. नीच का सूर्य उत्साह, महत्वाकांक्षा और ऊर्जा की कमी का कारण बनता है. इस कारण से दशा का प्रभाव व्यक्ति को लापरवाह बना सकता है.  टालमटोल कर रहे हैं, दशा के प्रभाव से चीजों को पूरा कर पाने में अक्षम ही दिखाई देते हैं. इस दशा के दौरान व्यक्ति के साहस और आत्मविश्वास की कमी देखने को मिल सकती है. व्यक्ति कोई भी छोटा निर्णय या चुनाव करने से पहले कई बार सोचेगा. नीच का सूर्य आत्म सम्मान या आत्म मूल्य की कमी का कारण बनता है. व्यक्ति खुद को किसी चीज के लिए काबिल नहीं समझते. व्यक्ति खुद को कम आंकता है, जब उन्हें कोई कठिन कार्य दिया जाता है, तो वे आसानी से उसे कर पाने में सक्षम नहीं दिखाई देते हैं. नीच के सूर्य की दशा का समय व्यक्ति को सुस्त भी बनाता है, कुछ करने के लिए पर्याप्त इच्छा शक्ति की कमी इस दशा में अधिक परेशान कर सकती है.

नीच के सूर्य की दशा का प्रभाव अवसाद और मानसिक विकारों का कारण बन सकता है. नीच के सूर्य की दशा का असर प्रतिष्ठा, समाज में स्थिति, नौकरी छूटने, व्यवसाय में हानि या किसी प्रकार के ऋण का कारण बनता है. नीच के सूर्य की दशा सदैव अशुभ फल नहीं देती है, यह व्यक्ति को रचनात्मक बनाता है और कल्पना शक्ति को बढ़ाता है और इस दशा के समय इन क्षेत्रों में आगे बढ़ने ओर सफलता को पाने का सुख भी मिल सकता है. 

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