मूलाधार । प्रथम चक्र । First Chakra | Base chakra | Base Chakra Location | First Chakra Issues | Muladhara Chakra | Chakras

शरीर में मौजूद प्रत्येक चक्र शरीर के अलग-अलग अंगों में स्थित हैं इसमें से एक चक्र है मूलाधार चक्र. मूलाधार को मूल आधार, अधार, प्रथम चक्र, बेस या रूट चक्र भी कहते हैं. यह हमारे शरीर का प्रथम चक्र तथा प्राणशक्ति का आधार होता है. हमारा शरीर चक्रों से संचालित होता है यह ऊर्जा केन्द्र हैं, जो प्राणशक्ति को शरीर के सभी अवयवों तक पहुंचाने में सहायक होते हैं. ध्यान तथा योग द्वारा प्राण शक्तियों का विकास करके इन चक्रों को विकसित कर सकते हैं. योग शास्त्रों में मनुष्य के अन्दर मौजूद सभी सात चक्रों का विस्तार पूर्वक वर्णन प्राप्त है. 

मूलाधार चक्र स्थान | Base chakra Location

चक्रों में मूलाधार चक्र को प्रथम चक्र कहा गया है. मूलाधार चक्र का स्थान रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से में

जननेन्द्रिय और गुदा के मध्य में स्थित होता है. इस चक्र में ही सर्पाकार कुण्डलिनी शक्ति रहती है जिसे योग द्वारा जागृत किया जाता है.

मूलाधार चक्र का रंग | Base Chakra Colour

मूलाधार चक्र का रंग लाल है. इसका रत्न माणिक्य है और यह सूर्य से ऊर्जा प्राप्त करता है. इससे प्रभावित व्यक्ति के लिए लाल रंग का इस्तेमाल करना बहुत लाभकारी होता है. 

प्रथम चक्र  क्रिस्टल चिक्तिसा । Base Chakra Crystal Therapy

मूलाधार कमजोर होने पर माणिक्य, रक्तमणि, लाल पत्थर या गोमेद धारण करना फायदेमंद होता है. 

कुण्डलिनी शक्ति | Kundalini 

कुण्डलिनी शक्ति शरीर में मूलाधार चक्र में स्थित होती है. यहां यह सुषुप्त अवस्था में रहती है इसे योग द्वारा जागृत किया जाता है. जागृत होने पर यह सर्प की तरह सुषुम्ना नाड़ी से होते हुए इड़ा और पिंगला नाड़ियों की सहायता से प्रवाहित होने लगती है और सभी चक्रों को जगाती हुई मस्तिष्क में पहुंचती है. इस शक्ति के मस्तिष्क में पहुंचने से यह शक्ति सदाशिव से मिल जाती है और मनुष्य को दिव्य ज्ञान प्राप्त होता है. देह में मौजूद दिव्य ऊर्जा शक्ति को कुण्डलिनी शक्ति कहते हैं. 

मूलाधार चक्र शारीरिक एवं भावनात्मक समस्याएँ | Base Chakra Physical and Emotional Issues

मूलाधार चक्र मांसपेशियों, अस्थि तन्त्र, रीढ़ की हड्डी, रक्त के निर्माण और शरीर के आन्तरिक अंगों को नियन्त्रित करता है. इस चक्र के गलत ढंग से कार्य करने पर जोड़ों का दर्द, रीढ़ की हड्डी का रोग, रक्त संबंधी विकार और शरीर विकास की समस्या, कैन्सर, हड्डी की समस्या, कब्ज, गैस, सर दर्द, जोडों की समस्या, गुदे से सम्बंधित समस्याएँ, यौन सम्बंधित रोग, ऐड्स, शारीरिक और मानसिक कमजोरी, संतान प्राप्ति में समस्याएं तथा    आँत का कैन्सर जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं.

भावनात्मक समस्याएँ | Base Chakra Emotional Issues

प्रथम चक्र की उर्जा हमें भावात्मक सुरक्षा प्रदान करती है किंतु इसके कमजोर होने पर क्रोध, पागलपन जैसी भावनात्मक समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं. यह कमजोर होने पर व्यक्ति में असुराक्षा का भाव उत्पन्न करती है 

व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व का बोध नही हो पाता. बडबडाना, अवसाद में रहना, अहंकार, भय, अस्थिरता, जलन, असंतुलन, घृणा, लत, उपेक्षा भाव, आत्महत्या की भावना, असुरक्षा का होना आदि परेशानियां उत्पन्न हो सकती हैं. 

मूलाधार रचना | First Chakra Composition 

मनुष्य के भीतर मौजूद इस ऊर्जा शक्ति की तुलना ब्रह्माण्ड की शक्ति से की जाती है. यही सृष्टि का मूल चक्र भी है. यह उत्पत्ति, विकास व संहार का कारक है. मूलाधार चक्र में चार पंखुडिया हैं और स्थापना त्रिकोनाकृति अस्थि के निचले हिस्से में हैं. इसमें कमल पुष्प का अनुभव होता है जो पृथ्वी तत्व का बोधक है. चक्र में स्थित यह चार पंखुड़ियां वाला कमल पृथ्वी की चार दिशाओं की ओर संकेत करता है.

मूलाधार चक्र शरीर की सुरक्षा, अस्तित्व से संबंधित होता है. मूलाधार का प्रतीक लाल रंग और चार पंखुडि़यों वाला कमल है. इसका मुख्य कार्य काम वासना, लालच, उग्रता एवं सनक है. शारीरिक रूप में मूलाधार कामवासना को, मानसिक रूप से स्थायित्व को, भावनात्मक रूप से इंद्रिय सुख को और आध्यात्मिक रूप से सुरक्षा की भावना को नियंत्रित करता है.

चार पंखुड़ियों वाला मूलाधार चक्र का देह आकार की रचना करता है. यहां चार प्रकार की ध्वनियां वं, शं, सं, षं जैसी होती हैं यह ध्वनि मस्तिष्क एवं हृदय के भागों को दोलित करती हैं. स्वास्थ्य इन्ही ध्वनियों पर निर्भर रहता है. मूलाधार चक्र रस, रूप, गन्ध, स्पर्श, भावों व शब्दों का संगम है. 

यह अपान वायु का स्थान है तथा मल, मूत्र, वीर्य आदि इसी के अधीन है. मूलाधार चक्र कुण्डलिनी शक्ति, परम ज्ञान शक्ति का मुख्य स्थान है. यह मनुष्य की दिव्य शक्ति का विकास, मानसिक शक्ति का विकास और चैतन्यता का मूल है. मूलाधार का कार्य विसर्जन, काम, वासना, संतान उत्पत्ति हैं 

मूलाधार चक्र के सक्रिय एवं सुचारू रूप से कार्य करने पर शरीर हष्ट-पुष्ट और स्वस्थ्य होता है. व्यक्ति में  पवित्रता, शुद्धता, आत्मविश्वास का वास होता है. इस चक्र की अधिष्ठात्री देवी डाकिनी है. इसमें  भगवान शिव के अंश का वास माना गया है. 

मूलाधार का बीज मंत्र ‘लम्’ है. 

मूलाधार का स्वर  “सा” है. 

मूलाधार का ग्रह  “मंगल” है. 

मूलाधार चक्र के देवता  “श्री गणेश” हैं 

मूलाधार का तत्त्व  “भूमि तत्त्व” है 

मूलाधार के बीज अक्षर  वं, शं, षं और सं हैं.

मूलाधार के राग “बिलावल” और “शामकल्याण” हैं. 

इस चक्र का स्वामी शनि होता है और राशियां मकर और कुंभ होती हैं.

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सौरमण्डल | Solar System

सौरमण्डल के सन्दर्भ में कुछ आवश्यक बातों को आपके लिए समझना आवश्यक है. ग्रह और नक्षत्रों के विभाजन के विषय में आपने पिछले अध्यायों में जानकारी हासिल की है. इसके अतिरिक्त सौरमण्डल से जुडी़ कुछ बातों को आप और समझ लें जिनका ज्योतिषीय दृष्टि से बहुत अधिक महत्व है. ज्योतिष में ग्रहों के विषय में वक्री, मार्गी, अतिचारी, मंदगामी, अस्त आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है. इनका अर्थ आपके लिए समझना जरुरी है. आइए इन शब्दों का अर्थ जानें. 

(1) वक्री ग्रह | Retrograde Planets

जब कोई ग्रह सूर्य से पाँचवें भाव से लेकर नवम भाव तक गोचर करता है वह वक्री अवस्था में रहता है. वक्री का अर्थ है – उलटा चलना. ग्रह वक्री अवस्था में उल्टे चलते प्रतीत होते हैं जबकि वास्तव में ऎसा नहीं है. ग्रह चलते तो सीधे हैं लेकिन सूर्य से एक विशेष दूरी पर आने पर वह विपरीत दिशा में चलते दिखाई देते हैं. जिस प्रकार एक रेलगाडी़ जब चलती है तभी उस रेलगाडी़ के साथ कोई दूसरी गाडी़ आकर आगे निकल जाती है और पहले वाली रेलगाडी़ पीछे जाती हुई दिखाई देती है जबकि वह आगे की ओर ही जा रही होती है. यही वक्री ग्रहों के साथ भी होता है. 

राहु/केतु सदैव वक्री अवस्था में भ्रमण करते हैं. 

(2) मार्गी ग्रह | Direct Planets

ग्रह जब सीधे-सीधे अपने मार्ग पर चलते हैं तो उन्हें मार्गी कहा जाता है. सूर्य तथा चन्द्रमा सदैव मार्गी रहते हैं. 

(3) अतिचारी ग्रह | Atichari Planets 

जब कोई ग्रह अपनी समान्य गति से अधिक तेजी से चलता है तब उस ग्रह को अतिचारी ग्रह कहा जाता है. बाहरी ग्रह सूर्य के साथ होने पर अतिचारी हो जाते हैं. 

(4) मंदगामी ग्रह | Slow Moving Planets

जब कोई ग्रह अपनी सामान्य गति से धीमी गति में चलता है तब उस ग्रह को मंदगामी अवस्था में माना जाता है. 

(5) स्तंभित अवस्था | Stambhit State

ग्रह जब सामान्य अवस्था गति से वक्री होने वाले होते हैं तब वह कुछ समय के लिए अपनी गति पर रुके हुए प्रतीत होते हैं. ग्रहों की इस अवस्था को स्तंभित अवस्था कहा जाता है. ग्रह मार्गी से वक्री और वक्री से मार्गी होते समय कुछ समय के लिए अपनी गति को स्थिर करते हैं. दोनों ही स्थितियों में उसे स्तंभित माना जाता है. कई विद्वान इसे भीत अवस्था भी कहते हैं. भीत का अर्थ है – डरा हुआ. 

(6) अस्त ग्रह | Combust Planets

जब ग्रह सूर्य के काफी निकट होते हैं तब वह अस्त हो जाते हैं. बाहरी ग्रह सूर्य से 17 अंश की दूरी पर भी अस्त माने जाते हैं. जब कोई ग्रह सूर्य के बिलकुल नजदीक होगा वह पूर्ण अस्त माना जाएगा. 

ग्रहों के अस्त अंश | Degree of Planets for being Combust

(1) चन्द्रमा, सूर्य से 12 अंश के भीतर रहने पर अस्त रहता है.

(2) मंगल, सूर्य से 17 अंश के अंदर रहने पर अस्त होता है.

(3) बुध, सूर्य से 13 अंश ( मतांतर से 14 अंश ) के भीतर रहने पर अस्त होता है. यदि वक्री है तो 12 अंश

(4) गुरु, सूर्य से 11 अंश के भीतर अस्त होता है

(5) शुक्र, सूर्य से 9 अंश के भीतर अस्त. मतांतर से 10 अंश. वक्री हो तो 8 अंश के भीतर अस्त.

(6) शनि, सूर्य से 15 अंश के भीतर अस्त होता है.

सूर्य की वर्ष भर की विभिन्न राशियों में अनुमानित स्थिति | Hypothetical Position of Sun in Various Signs

ज्योतिष में बारह राशियों का अध्ययन किया जाता है. यह बारह राशियाँ भचक्र पर 24 घण्टे में बारी-बारी से उदय होती हैं. सूर्य एक राशि में एक माह तक रहता है. इस प्रकार बारह माह में सूर्य पूरे भचक्र को पार करता है. सूर्य जिस राशि में होता है भचक्र पर सूर्योदय के समय वही राशि उदय होती है. 

  • 14 अप्रैल से 14 मई तक सूर्य मेष राशि में रहता है. 
  • 14 मई से 15 जून तक सूर्य वृष राशि में रहता है. 
  • 15 जून से 15 जुलाई तक सूर्य मिथुन राशि में होता है. 
  • 15 जुलाई से 16 अगस्त तक सूर्य कर्क राशि में होता है. 
  • 16 अगस्त से 16 सितम्बर तक सूर्य सिंह राशि में होता है. 
  • 16 सितम्बर से 17 अक्तूबर तक सूर्य कन्या राशि में स्थित होता है. 
  • 17 अक्तूबर से 15 नवम्बर तक सूर्य तुला राशि में स्थित होता है. 
  • 15 नवम्बर से 14 दिसम्बर तक सूर्य वृश्चिक राशि में स्थित होता है. 
  • 14 दिसम्बर से 14 जनवरी तक सूर्य धनु राशि में स्थित होता है. 
  • 14 जनवरी से 13 फरवरी तक सूर्य मकर राशि में स्थित होता है. 
  • 13 फरवरी से 15 मार्च तक सूर्य कुम्भ राशि में स्थित होता है. 
  • 15 मार्च से 14 अप्रैल तक सूर्य मीन राशि में स्थित रहता है. 

सौर मास | Solar Month

आशा है आपने सूर्य की विभिन्न राशियों में अनुमानत: स्थिति को समझ लिया होगा. सूर्य जब विभिन्न राशियों में होता है तब उस माह को नाम दिया गया है. इन माहों को सौर मास के नाम से जाना जाता है.  

  • सूर्य जब मेष राशि में होता है तब उस माह को बैसाख कहा जाता है. 
  • सूर्य की स्थिति वृष राशि में तब ज्येष्ठ माह होता है. 
  • सूर्य की स्थिति मिथुन राशि में तब आषाढ़ माह होता है. 
  • सूर्य की स्थिति कर्क राशि में तब श्रावण मास होता है. 
  • सूर्य की स्थिति सिंह राशि में तब भाद्रपद माह होता है. 
  • सूर्य की स्थिति कन्या राशि में तब आश्विन माह होता है. 
  • सूर्य की स्थिति तुला राशि में तब कार्तिक माह होता है. 
  • सूर्य की स्थिति वृश्चिक राशि में तब मार्गशीर्ष माह होता है. 
  • सूर्य की स्थिति धनु राशि में तब पौष माह होता है. 
  • सूर्य की स्थिति मकर राशि में तब माघ माह होता है. 
  • सूर्य की स्थिति कुम्भ राशि में तब फाल्गुन माह होता है. 
  • सूर्य की स्थिति मीन राशि में तब चैत्र माह होता है. 
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कन्या राशि का स्वामी कौन है | Virgo Sign Meaning | Virgo – An Introduction | Mercury is the Lord of Virgo

कन्या राशि, राशिभचक्र की छठवीं राशि है. यह राशि व्यापार कार्य करने वाले व्यक्तियों की राशि मानी जाती है. इसका कारण इस राशि के व्यक्तियों में सामान्य से अधिक बुद्धि का होना, और इस राशि के व्यक्तियों का व्यवहारिक होना है. कन्या राशि की सामान्य विशेषता है, कि इस राशि के व्यक्ति विवेकी, सतर्क रहने वाले होते है. विपरीत लिंग उनकी ओर सहज आकर्षित होता है. साथ ही इनके व्यवहार में शालीनता पाई जाती है.  आईये कन्या राशि से परिचय करते है. 

कन्या राशि का स्वामी कौन है.| Who is the Lord of  Virgo

कन्या राशि का स्वामी बुध है. 

कन्या राशि का निशान क्या है.| Mercury  is the Lord  of Virgo.

कन्या राशि का चिन्ह एक कन्या है.

कन्या राशि के लिए कौन से ग्रह शुभ फल देने वाले ग्रह होते है.| Which planets are considered auspicious for Virgo 

कन्या राशि के लिए शुक्र, बुध शुभ फल देने वाले ग्रह है. 

कन्या राशि के लिए कौन से ग्रह अशुभ फल देते है.| Which Planets are inauspicious for Virgo

कन्या राशि के लिए चन्द्र, मंगल, गुरु अशुभ फल देते है.

कन्या राशि के लिए सम फल देने वाले कौन से ग्रह है. .| Which are Neutral planets for Virgo.

कन्या राशि के लिए सूर्य और शनि सम फल देते है.

कन्या राशि के लिए मारक ग्रह कौन से है.| Which  are the Marak planets for Virgo 

कन्या राशि के लिए मंगल, शुक्र, चन्द्रमा, गुरु मारक ग्रह होते है. 

कन्या राशि के लिए कौन सा भाव बाधक भाव होता है.| Which is the Badhak Bhava for Virgo.

कन्या राशि के लिए सप्तम भाव बाधक भाव होता है.

कन्या राशि के लिए कौन सा ग्रह बाधक भाव का स्वामी होता है.| Which planet is Badhkesh for Virgo

कन्या राशि के लिए गुरु मीन राशि के स्वामी होकर, बाधकेश होते है. 

कन्या राशि के लिए कौन से ग्रह योगकारक ग्रह होते है.| Which planet is YogaKaraka for Virgo

कन्या राशि के लिए बुध व शुक्र योगकारक ग्रह है.

कन्या राशि में कौन सा ग्रह उच्च का होता है. | Which Planet of Virgo, is placed in exalted position

कन्या राशि बुध ग्रह की उच्च राशि है. कन्या राशि में 15अंश पर बुध उच्च के होते है.

कन्या राशि में कौन सा ग्रह नीच राशि का होता है. | Virgo  is which planet’s Debilitated Sign

कन्या राशि के लिए शुक्र 27 अंश पर नीच राशि के होते है.

कन्या राशि में चन्द्र के शुभ अंश कौन से है. .| At which Degree Moon is auspicious for the Virgo  Sign.

कन्या राशि में चन्द्र 9 अंश पर सबसे शुभ फल देते है.

कन्या राशि में चन्द्र कितने अंशों पर अशुभ फल देते है.| At which degree Moon is inauspicious for the VirgoSign.

कन्या राशि में चन्द्र 1 अंश और 11 अंश पर अशुभ फल देते है.

कन्या राशि के व्यक्तियों के लिए कौन सा इत्र शुभ रहता है.| Which fragrance is auspicious for Virgo 

कन्या राशि के लिए नरकिसस इत्र शुभ फल देता है.

कन्या राशि के लिए शुभ अंक कौन सा है.| Which are the Lucky numbers for Virgo Sign. 

कन्या राशि के लिए शुभ अंक 7, 4, 9 है. 

कन्या राशि के लिए शुभ वार कौन से है.| Which are the lucky days for  Virgo Sign. 

कन्या राशि के लिए बुधवार, शुक्रवार, सोमवार, वीरवार शुभ फल देते है. 

कन्या राशि के लिए शुभ रत्न कौन सा है.| Which is the lucky stone for Virgo .

कन्या राशि के लिए पन्ना, मोती, हीरा, पुखराज शुभ रत्न है.

कन्या राशि के लिए शुभ रंग कौन सा है. | What are the lucky colours for Virgo.

कन्या राशि के लिए पीला, सफेद और हरा रंग शुभ होता है.

कन्या राशि के व्यक्तियों को किस दिन का उपवास करना चाहिए.| On which day Virgo People should fast .

कन्या राशि के व्यक्तियों को शुक्रवार का व्रत करना चाहिए.

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डोलोमाईट उपरत्न | Dolomite Gemstone – Dolomite Meaning – Dolomite, Metaphysical Properties – Dolomite, Healing Crystals

इस उपरत्न की खोज 1791 में हुई थी. इस उपरत्न को फ्रेन्च खनिज-विज्ञानी डियोदैट-दे-डोलोमियू(Deodat de Dolomieu) ने आल्प्स(Alps) में भ्रमण करते हुए खोजा था. उन्हीं के नाम पर इस उपरत्न का नाम डोलोमाईट पड़ गया. यह उपरत्न पृथ्वी की उपरी सतह पर नहीं पाया जाता है बल्कि यह प्राचीन चट्टानों के अंदर वाली सतहों पर पाया जाता है. यह उपरत्न कई प्रकार के आकारों में पाया जाता है. देखने में यह काँच जैसा चमकीला होता है. यह पारदर्शी तथा पारभासी दोनों ही रुपों में पाया जाता है.

यह उपरत्न सफेद, हल्के गुलाबी रंग में मुख्य रुप से पाया जाता है. इसके अतिरिक्त यह उपरत्न ग्रे, लाल, पीले तथा भूरे रंग के मिश्रण में भी पाया जाता है. इस उपरत्न के टुकड़ों को अलग रुप में देखने पर यह मोती के रंग जैसे दिखाई देते हैं. कभी इसकी चमक फीकी दिखाई देती है. डोलोमाईट के सभी रंग एक ही चट्टान में पाए जाते हैं और यह बहुत ही विचित्र बात है कि एक ही चट्टान में इतने सारे रँग पाए जाते हैं. इस उपरत्न की यही अत्यधिक विशिष्टता है.  

डोलोमाईट – आध्यात्मिक,चमत्कारिक गुण – Metaphysical-Magical Properties Of Dolomite

यह उपरत्न धारणकर्त्ता को उसके व्यवहार तथा उसके कर्मों को उचित दिशा में ले जाता है. व्यक्ति को धर्मार्थ बनाता है. धारणकर्त्ता दूसरों की समस्याओं को अपनी समझकर उनकी सहायता करता है. दूसरों के दर्द को तभी समझा जा सकता है जब जातक स्वयं भी उनसे गुजरा हो. यह उपरत्न जातक के दुखों को दूर करता है और जातक को दूसरों के दर्द को हरने के लिए प्रेरित करता है.

यह उपरत्न व्यक्ति में समाए अकारण भय को दूर करता है. व्यक्ति को मजबूत बनाता है. क्रोध तथा निराशा से निजात दिलाता है. आशा की नई किरण जगाता है. यह एक सौम्य उपरत्न है जो धारणकर्त्ता को धार्मिक कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करता है. उदार बनाता है और सभी प्रकार के देने वाले कार्य कराता है. यह उपरत्न लेखकों के लिए भी उपयुक्त है. इसे धारण करने से लेखक के मन में नए-नए विचार आते हैं जिन्हें वह अपनी कलम के माध्यम से लोगों तक पहुँचाने में सफल रहता है.

यह धारणकर्त्ता की सोच को स्पष्ट करता है. नए विचारों को रोमांचित तरीके से प्रवाहित करता हैं. जब कभी व्यक्ति लम्बी अवधि से तनाव में होता है तब व्यक्ति के शरीर के विभिन्न चक्रों को हानि पहुँचनी आरम्भ हो जाती है और उसके शरीर की ऊर्जा बहने लगती है. ऊर्जा का यह बहाव शारीरिक कमजोरी के रुप में उभरकर सामने आता है. ऊर्जा के इस बहाव को रोकने के लिए डोलोमाईट क्रिस्टल को शरीर के प्रभामंडल में रखा जा सकता है जिससे शरीर से ऊर्जा का बहाव रोका जा सके.

डोलोमाईट के चिकित्सीय गुण | Healing Ability Of Dolomite Crystal

इस उपरत्न के बडे़ क्रिस्टल या बडे़ पैमाने पर बारीक संरचनाओं से बने क्रिस्टल को यदि चिकित्सक मरीजों के प्रती़क्षा कक्ष में रख दें तो उन मरीजों को राहत मिलेगी जिनके शरीर से ऊर्जा का बहाव अधिक हो गया है. यह धारणकर्त्ता के शरीर में कैल्शियम तथा मैग्नेशियम की कमी होने से रोकता है. इन खनिजों का संतुलन शरीर में बनाए रखता है. इस उपरत्न को प्राकृतिक रुप से पर्ल स्पा(Pearl Spa) कहा जाता है. गुलाबी रंग में उपलब्ध यह उपरत्न अनाहत चक्र को नियंत्रित करता है. 

जिन लोगों को रक्त संबंधी परेशानियाँ हैं उन्हें इस उपरत्न से लाभ पहुँचता है. यह माँस-पेशियों को मजबूत बनाता है. शरीर के भीतर की माँस-पेशियों की संरचना में सुधार करता है. उनकी संरचना में वृद्धि करता है. यह दाँतों को मजबूत तथा बली बनाता है. हड्डियों को मजबूत बनाने में सहायक होता है. त्वचा तथा नाखूनों को सुदृढ़ बनाता है. जो लोग अतिशीघ्र क्रोध में आ जाते हैं उनके भीतर यह सहनशक्ति को बढा़ता है. घर में इस उपरत्न को रखने से यह मानव ऊर्जा तथा खनिज ऊर्जा दोनों में वृद्धि करता है. घर में अन्य खनिजों के साथ इस उपरत्न को रखने पर यह वातावरण को ऊर्जावान बनाए रखने में सहायक होते हैं.

डोलोमाईट उपरत्न दुख तथा शोक को दूर करने के लिए अनोखा उपरत्न है. यह अकेलेपन, चिन्ता तथा तनाव से राहत दिलाता है. व्यक्ति को सुख प्रदान करता है. कई विद्वान इसे “जडी़-बूटी” की चट्टान भी पुकारते हैं. यह महिलाओं की प्रजनन क्षमता को बनाए रखता है. उसे ऊर्जा प्रदान करता है. यह महिलाओं में रजोनिवृति के समय आए बदलाव को सुचारु रुप से बनाए रखने में सहायक होता है. जिन व्यक्तियों को अनिद्रा की समस्या है, उन्हें इस उपरत्न को धारण करने से लाभ मिलेगा.

कहाँ पाया जाता है | Where Is Dolomite Found 

डोलोमाईट उपरत्न उत्तरी इटली, आस्ट्रिया, स्वीटजरलैन्ड, दक्षिण जर्मनी, ब्रजील, अमेरीका, कनाडा, मेक्सिको, उत्तरी कैरोलिना, स्पेन, ओक्लाहोमा, मिसूरी, अर्कान्सास, कोलोरैडो, ओन्टैरियो, पैम्पलोना आदि देशों में पाया जाता है.

कौन धारण करे | Who Should Wear Dolomite

इस उपरत्न को व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं के अनुसार धारण कर सकते हैं.

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जानिए कुण्डली में धन योग कैसे बनता है

घर में बालक का जन्म् होने पर बालक की कुण्डली बनवाई जाती है. कुण्डली में ग्रहों की स्थिति से बन रहे योगों की जानकारी प्राप्त की जाती है. (sematext) तथा सभी शुभ – अशुभ योगों के अलावा कुण्डली में बन रहे धन योगों का भी विश्लेषण कराया जाता है. प्रत्येक व्यक्ति को यह जानने की जिज्ञासा रहती है, कि उसकी कुण्डली में धन से संबन्धित किस प्रकार योग है. आईये आज के इस अध्याय में हम धन योगों कैसे बनते है. इस विषय का विचार करेंगे.

धन योग कैसे बनते है

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जन्म कुण्डली में दूसरे भाव को धन भाव कहा जाता है. एकादश भाव को लाभ भाव कहा जाता है. इन दोनों का एक दूसरे के साथ संबंध एक अच्छा धन योग बनाता है. धन भाव, लग्न, भाव, पंचम भाव, नवम भाव और एकादश भाव का आपस में राशि परिवर्तन करना धन योग का बनाता है. यह निम्न 10 प्रकार से बन सकता है.

धन योग के प्रकार

  • लग्नेश और द्वितीयेश एक राशि में स्थित हों 
  • लग्नेश और पंचमेश एक राशि में स्थित हों 
  • लग्नेश और नवमेश एक राशि में स्थित हों 
  • लग्नेश और एकादशेश एक राशि में स्थित हों 
  • द्वितीयेश और पंचमेश एक राशि में स्थित हों 
  • द्वितीयेश और नवमेश एक राशि में स्थित हों 
  • द्वितीयेश और एकादशेश एक राशि में स्थित हों 
  • पंचमेश और नवमेश एक राशि में स़्थित हों 
  • पंचमेश और एकादशेश एक राशि में स्थित हों 
  • नवमेश और एकादशेश एक राशि में स्थित हों 
  • उपरोक्त में से किसी भी प्रकार से योग अगर कुण्डली में बनता है, व्यक्ति को धन प्राप्ति के योग बनते है. यह योग व्यक्ति की आर्थिक स्थिति के पक्ष से शुभ योग है.

    धन योग फल

    धन योग से युक्त व्यक्ति सतगुणी होता है. वह दयावान, धनवान और सुख-संमृ्द्धि से परिपूर्ण होता है. ऎसा व्यक्ति तेजस्वी, देवभक्त भी होता है. जन्म कुण्डली में बनने वाला धन योग कितना मजबूत है और कितना कमजोर है, इस बात को समझने की आवश्यकता भी होती है.

    कुण्डली में जिस ग्रह के प्रभाव द्वारा धन योग बन रहा है वह ग्रह कितना बली है और उस पर किन शुभ अथवा अशुभ ग्रहों का प्रभाव पड़ रहा है इस बात को समझने की आवश्यकता होती है. यदि धन योग केन्द्र और त्रिकोण के स्वामियों से बन रहा है तो इन ग्रहों पर यदि शत्रुओं का प्रभाव पड़ रहा हो या ग्रह स्वयं वक्री हो या निचस्थ हो तो धन योग की स्थिति कमजोर पड़ने लगती है.

    इसी के साथ यदि शुभ ग्रहों का प्रभाव इस योग में बनता है तो धन योग का फल जातक को बहुत अच्छे फल देने वाला होगा.

    जन्म कुण्डली में अन्य धन योग फल

    आपको धन किस प्रकार मिलेगा यह बात भी ध्यान देने योग्य है. कई बार धन कठोर मेहनत से मिलता है, कई बार गुप्त रुप से धन की प्राप्ति होती है, पैतृक संपति से धन योग का निर्माण होना. दूसरा घर धन, खजाना दिखाता है तो आठवां भाव गढ़ा अथवा गुप्त धन की प्राप्ति को दर्शाता है.

    जन्म कुंडली में अगर दूसरे भाव पर केन्द्र त्रिकोण के स्वामी ग्रह स्थित हों, शुभ ग्रह स्थित हों या शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो इस कारण व्यक्ति की कुण्डली में अच्छा धन योग बनता है.

    जन्म कुण्डली के दूसरे भाव पर अष्टम में शनि की मित्र दृष्टि आ रही हो और तो जातक को पैतृक संपत्ति से धन योग की अच्छी प्राप्ति होती है.

    जन्म कुण्डली में चतुर्थ भाव का स्वामी और पंचम या नवम भाव का स्वामी एक साथ इन्हीं शुभ भावों में बैठे हुए हों तो व्यक्ति को बहुत अच्छा प्रबल धन योग मिलता है.

    कुंडली में द्वितीय भाव में वृषभ राशि का चंद्रमा स्थित हो तो यह स्थिति भी व्यक्ति को धन योग देती है. यदि चंद्रमा शुभ भाव का स्वामी हो और शुभ ग्रहों से प्रभावित हो तब धन योग का भरपूर फायदा मिलता है. इसके विपरित यदि चंद्रमा खराब ग्रहों का स्वामी होकर यहां स्थित हो और पाप प्रभाव से ग्रसित हो तो धन व्यर्थ अधिक होता है.

    जन्म कुण्डली में यदि कुछ शुभ योग बने जैसे की महाभाग्य योग, गजकेसरी योग, लक्ष्मी योग इत्यादि तो इस स्थिति में भी धन योग अपना शुभ फल देने में बहुत सहायक बनता है.

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    शकुनि करण

    पंचांग का एक महत्वपूर्ण अंग करण है. करण 11 होते हैं और हर 1 तिथि में 2 करण आते हैं. प्रत्येक करण का अपना एक अलग प्रभाव होता है. व्यक्ति के जीवन और उसके कार्यों पर करणों का प्रभाव भी स्पष्ट होता है. शकुनि करण के प्रभाव से जातक उत्साहित और काम को लेकर अधिक भागदोड़ करने वाला होता है. मन से कठोर हो सकता है और फैसले लेने में जल्दबाज होता है.

    शकुनि करण कब होता है

    कृष्ण पक्ष की चतुदर्शी के उत्तरार्ध में शकुनि करण होता है. शकुनि करण का प्रतीक पक्षी को बताया गया है. यह विचरण करने के लिए स्वतंत्र है और मुक्त रुप से जीवन जीने की इच्छा रखते हैं. शकुनि करण की अवस्था ऊर्ध्वमुखी है. अपने इस प्रभाव के कारण इसे आगे बढ़ने वाला और सामान्य फल देने वाला करण बताया गया है.

    शकुनि एक स्थाई करण है

    शकुनि करण एक स्थाई करण होता है. इस करण को बहुत अधिक शुभता की श्रेणी में नहीं रखा जाता है. इस करण के प्रभाव से व्यक्ति को बहुत अधिक शुभ प्रभाव नहीं मिल पाते हैं. जीवन में संघर्ष अधिक रहता है. शकुनि करण के स्वामी कलयुग को बताया गया है. ऎसे में इस करण पर कलियुग नामक देव का प्रभाव भी होता है.

    शकुनि करण में क्या काम करने चाहिए

    शकुनि करण का मुहूर्त में उपयोग होता है. शकुनि करण में कठोर काम करना अनुकूल होता है. शकुनि करण में मंत्र सिद्धि करने के काम किया जा सकता है. औषधि का निर्माण भी इस करण में किया जा सकता है. शकुनि करण में व्यक्ति

    शकुनि करण में जातक को युद्ध क्षेत्र विजय पाने के लिए उपयोग किया जाता है. इस करण का उपयोग सफलता पाने के लिए कठिन क्षेत्रों में उपयोग कर सकते हैं.

    शकुनि करण में जन्मा जातक

    शकुनि करण में जन्मा जातक कुशल वक्ता और काम काज में योग्य होता है. व्यक्ति अपने काम को करने पर युक्तियों का उपयोग भी करता है. मेहनत से अधिक बौद्धिकता से काम करने की कोशिश अधिक करता है. इस करण में जन्मा जातक अपने काम से प्रख्यात होता है.

    व्यक्ति को अपने मन के अनुरुप काम करने की इच्छा अधिक होती है. व्यक्ति में झूठ बोलने और चालबाजियों को करने में भी आगे रह सकता है. बोलचाल में कुशल होता है. मनोविज्ञान को समझने वाला होता है. अपने काम को दूसरों से करवाने में कुशल होता है.

    व्यवहार कुशल होता है. कार्यस्थल पर अपने सहकर्मियों के साथ जल्द मेल जोल बनाए रखने वाला होता है. अपनी बोल चाल और व्यवहार कुशलता से लोगों को आकर्षित कर अपना संघटन भी बना सकता है. लोगों से अपना काम निकलवा लेने की योग्यता भी रखता है.

    शकुनि करण आजीविका क्षेत्र

    शकुनि करण में जिस व्यक्ति का जन्म हो वह व्यक्ति विवादों का निपटारा कराने में कुशल होता है. ऎसा व्यक्ति आपस में समझौते और बिगडती बात को संभालने की योग्यता रखता है. बडी-बडी कम्पनियों में समन्वय कराने का कार्य उसे बखूबी आता है. साथ ही ऎसे व्यक्ति को औषधि निर्माण कार्य का ज्ञान हो सकता है. चिक्तिसा जगत में सेवा कार्य कर वह उतम आय प्राप्त करने में सफल रहता है.

    शकुनि करण अपनी बौद्धिक योग्यता का प्रयोग शुभ कार्यो के लिए करें, तो व्यक्ति को धन और मान दोनों प्राप्त होते है. परन्तु अगर वह धन प्राप्ति की ओर लालयित रहे तो, उसे गलत तरीकों से धन कमाने की ओर आकर्षित हो सकता है.

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    अम्बर रत्न के फायदे

    अम्बर उपरत्न विभिन्न रंगों में उपलब्ध होता है. यह पीले रंग से लेकर लाल रंग तक के रंगो में पाया जाता है. परन्तु अम्बर उपरत्न का रंग सामान्यतया शहद के रंग जैसा होता है. इसी रंग का अम्बर अधिक प्रचलित है. सबसे अच्छा अम्बर उपरत्न पारदर्शी होता है. कुछ धुँधलें अम्बर भी पाए जाते हैं. यह उपरत्न वनस्पतिजन्य पदार्थ है इसलिए इस उपरत्न में कई बार कीडे़ और पत्थर के कण भी पाए जाते हैं. कई बार इसमें पत्तियाँ, देवदार के वृक्षों की नोक, छोटे पौधे और कुछ जन्तुओं के जीवाश्म भी इसमें पाए जाते हैं. इस उपरत्न की उत्पत्ति वृक्ष के रस-गोंद से होती है. ऎसा माना जाता है कि रत्न पहनने की प्रथा अम्बर से ही हुई है.

    अम्बर के गुण

    यह उपरत्न आँखों के लिए बहुत ही उपयोगी है. गले और फेफडों की ग्रंथियों में होने वाली सूजन इस उपरत्न को धारण करने से दूर होती है. यह उपरत्न अंत:स्त्रावी ग्रंथियों तथा पाचन तंत्र के क्रिया-कलापों के मध्य संतुलन बनाए रखता है. यह शरीर की सुरक्षा करता है और गॉयटर को कम करता है. दाँतों की सुरक्षा, सिरदर्द, तनाव, सर्दी से होने वाले विकार, पीलिया आदि बीमारी को दूर करने के लिए उपयोगी है. यह रत्न पहनने वाले व्यक्ति को स्वास्थ्य लाभ मिलता है, व्यक्ति को शारीरिक और मानसिक व्याधी से भी मुक्ति मिलती है.

    कई बार व्यक्ति के अंदर अत्यधिक उत्साह देखने को मिलता है या हम देखते हैं कि कुछ बच्चों में जोश है वह नियंत्रित करने की आवश्यकता है तो इस स्थिति में यह रत्न अधिक सहायक बनता है. व्यर्थ के उत्साह और उत्साह को नियंत्रित रखने में सहयोग करता है.

    ये रत्न मानसिक उन्मांद की स्थिति को शांत करने में सहायक होता है. एकाग्रता को बढ़ाता है ओर व्यक्ति में सिखने की प्रवृति को जन्म देता है. हीलिंग थैरिपी के रुप में भी इस रत्न का उपयोग फायदेमंद होता है. यह बुरी सोच और गलत चीजों से व्यक्ति को दूसर रखने में सहायक बनता है.

    अम्बर के अलौकिक गुण

    इस उपरत्न को धारण करने से भाग्य वृद्धि होती है. यह अच्छे भाग्य का सूचक माना जाता है. इसका संबंध लम्बी आयु से भी जोडा़ जाता है. यह उपरत्न निर्णय लेने की क्षमता का विकास करता है. व्यक्ति की याद्धाश्त तथा ऊर्जा में भी बढोतरी करता है. यह उपरत्न नकारात्मक ऊर्जा को सकारात्मक ऊर्जा में बदलने की क्षमता रखता है. व्यक्ति विशेष को आंतरिक ऊर्जा प्रदान करता है. बच्चों के गले में बाँधने से वह रोगों से बचे रहते हैं. दाँत निकालने में बच्चों को तकलीफ नहीं होती. बच्चे बुरी नजर से बचे रहते हैं.

    इस रत्न को बहुत अधिक समय तक धारण नहीं करना चाहिए. कभी-कभी इसे उतार कर रख देना चाहिए अथवा दिन में धारण करके रात्रि में सोने से पहले उतार कर रख देना ही उचित है.

    कौन धारण करे

    अम्बर उपरत्न को वह व्यक्ति धारण कर सकते हैं जिन व्यक्तियों की कुण्डली में शुक्र या बृहस्पति अच्छे भावों का स्वामी होकर निर्बल अवस्था में स्थित है. पुखराज के बदले इस उपरत्न को पहना जा सकता है.

    कौन धारण नहीं करे

    राहु, केतु, नीलम तथा चन्द्र के रत्नों तथा उपरत्नों के साथ अम्बर उपरत्न को धारण नहीं करना चाहिए.

    कैसे धारण करें

    अम्बर या कहें एम्बर रत्न को आभूषणों में भी उपयोग किया जाता है. इस रत्न को अंगूठी, ब्रेसलेट और पेंड़ेट इत्यादि में जड़वा कर उपयोग कर सकते हैं. कुछ के अनुसार ये रत्न शुक्र के लिए उपयोगी है तो कुछ के अनुसार बृहस्पति के लिए तो कुछ इसे मंगल के रत्न के रुप में भी पहनने कि सलाह दे देते हैं. इस कारण इस रत्न का उपयोग बृहस्पतिवार, शुक्रवार के दिन धारण करना चाहिए साथ ही शुक्ल पक्ष की तिथि का चयन करना चाहिए.

    प्रात:काल में अंबर स्टोन से जड़ित आभूषण को गंगा जल और कच्चे दूध से स्नान कराने के बाद धूप-दीप दिखा कर इसे पहनें. शुभ मुहूर्त समय धारण किए जाने पर रत्न की शुभता और उसका फल कई गुना बढ़ जाता है.

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    सिन्हेलाईट उपरत्न | Sinhalite Gemstone | Sinhalite – Metaphysical Properties

    इस उपरत्न का यह नाम सिंहला नाम पर पडा़ है. सीलोन द्वीप को संस्कृत में सिंहला या सिंहली कहते थें. वर्तमान श्रीलंका का यह प्राचीन नाम है. यह उपरत्न इस द्वीप पर पाए जाने से सिन्हेलाईट कहलाता है. इस उपरत्न की सर्वप्रथम खोज 1952 में हुई थी. इस उपरत्न के साथ एक कहावत यह जुडी़ है कि प्राचीन समय में सूलेमान, जो बाईबिल राजा था, वह इस उपरत्न को श्रीलंका से रानी शेबा(Sheba) का दिल जीतने के लिए लाया था. इस उपरत्न के विषय में कैथे तथा अरब की खाडी़ के देशों में बहुत सी कहानियाँ प्रचलित हैं. वहाँ पाए जाने वाले उपरत्नों में से कुछ बहुत ही प्रसिद्ध हो गए जैसे – सिन्हेलाईट और सीलोनाईट.

    सिन्हेलाईट उपरत्न एक दुर्लभ उपरत्न है और यह केवल श्रीलंका में ही प्रचुर रुप में पाया जाता है. रत्नों के बाजार में इस उपरत्न को अधिक सफलता नहीं मिल पाई है. इसकी माँग कम ही है. जब इस उपरत्न की खोज हुई थी तब इसे भूरा पेरीडोट समझा गया था. लेकिन सूक्ष्मता से अध्ययन करने पर यह एक नया उपरत्न निकला. कटे हुए सिन्हेलाईट के टुकडे़ जर्कन तथा क्राइसोबेरिल उपरत्नों का भ्रम पैदा करते हैं. यह उपरत्न विभिन्न प्रकार के रत्नों को जमा करने वालों के लिए बेहतर है.

    यह देखने में चमकदार उपरत्न है. यह पारदर्शी तथा पारभासी किस्मों में पाया जाने वाला उपरत्न है. यह उपरत्न दो दिशाओं में विखंडित होते दिखाई देता है. इसमें सफेद रंग की लकीरें अथवा धारियाँ दिखाई देती हैं. इस उपरत्न को भिन्न कोणों से देखने पर यह भिन्न रंगों में दिखाई देता है. यह उपरत्न देखने में बहुत ही स्पष्ट होता है.

    सिन्हेलाईट के गुण | Metaphysical Properties Of Sinhalite

    यह उपरत्न धारक को स्वयं के भीतर सकारात्मक बदलाव लाने के लिए प्रेरित करता है. उसकी धारणा को प्रोत्साहित करता है. यह हर दृष्टि से वृद्धि करने में सहायक होता है. यह धारणकर्त्ता के जीवन में कई कोणों से सुधार करता है. यह उपरत्न धारणकर्त्ता का उत्थान करने में मददगार होता है. यह किसी भी कार्य को समाप्त करने की क्षमता को प्रदान करता है. जातक के भीतर इस बात को विकसित करता है कि वह किसी भी कार्य को बीच में छोडे़.

    सिन्हेलाईट के रंग | Color Of Sinhalite Crystals

    यह उपरत्न मध्यम भूरा होता है अर्थात ना अधिक गहरा और ना ही बहुत अधिक फीका होता है. बहुत ही थोडा़ सा पीला रंग, भूरे रंग में दिखाई देता है. कई बार यह उपरत्न हरे-भूरे रंग की मिश्रित आभा लिए हुए भी होता है. कई बार यह हरे-पीले रंग की आभा लिए हुए होता है. 

    कहाँ पाया जाता है | Where Is Sinhalite Gemstone Found

    इस उपरत्न की प्रमुख खानें श्रीलंका में पाई जाती हैं. वहाँ यह प्रचुरता में पाया जाता है. वर्तमान समय में यह उपरत्न म्यांमार, यह रुस में साइबेरिया में पाया जाता है. इसके अतिरिक्त यह जहाँ भी पाया जाता है बहुत ही कम मात्रा में पाया जाता है.

    कौन धारण करे | Who Should Wear Sinhalite

    इस उपरत्न को सभी व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की पूर्त्ति के अनुसार धारंण कर सकते हैं. इसे शुक्ल पक्ष में किसी भी दिन धारण किया जा सकता है. धारक इसे अपनी सुविधानुसार अंगूठी अथवा लॉकेट में धारण कर सकते हैं.

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    वणिज करण

    सूर्य से बारह अंशों की दूरी पर तिथि बनती है, तथा सूर्य से छ: अंशों कि दूरी पर करण बनता है. इस प्रकार एक तिथि में दो करण होते है. करण ज्योतिष शास्त्र में पंचाग का भाग है, व इसे मुहूर्त कार्यों में प्रयोग किया जाता है. वणिज करण को सामान्य करण माना गया है. करण का उपयोग किसी भी मुहूर्त्त को निकालने के लिए किया जाता है. शुभ कार्यों में वणिज करण को लिया जा सकता है.

    वणिज करण

    वणिज करण एक चलायमान करण है. इस करण का प्रभाव व्यक्ति को सजग और कार्यशील बनाने वाला होता है. इस का चिन्ह सांड अथवा गाय को बताया गया है. यह एक संघर्षशील स्थिति और उस पर विजय पाने की योग्यता को दिखाने वाला होता है. यह एक कर्मठ करण हैं जो काम में लगातार व्यस्त रहने की ओर ईशारा करता है.

    वणिज करण में जन्मा जातक

    वणिज करण में जन्मा जातक अधिक सोच विचार करने वाला और युक्ति से काम निकालने की इच्छा रखने वाला होता है. जातक विद्वान लोगों की संगत को पाता है. अपने और अपने परिवार के प्रति सजग होता है जिम्मेदारियों को निभाना जानता है. जातक में भीड़ से अलग चलने की योग्यता भी होती है और वह अपनी इस सोच में कामयाब भी होता है.

    जातक में जीवन का आनंद लेने की इच्छा रहती है. वह सुंदर चीजों के प्रति आकर्षित होता है. अपने मन को अनुकूल ही हर कार्य करने की उसकी इच्छा बहुत अधिक रहती है. जातक में कलात्मक प्रतिभा होती है और वे अपनी प्रतिभा से धन भी अर्जित कर सकता है. जीवन को व्यवस्थित ढंग से जीने की कोशिश करते हैं. सुरुचिपूर्ण वस्त्र, जीवन शैली, संगीत इत्यादि जीवन में रहते हैं.

    जातक को धन से प्रेम होता है, वह जीवन में अत्यधिक धन की चाह भी रखता है और इसके लिए प्रयास भी बहुत करता है. इसी के कारण वह सब कुछ पाता है जो उसे अच्छा लगता है. जातक मिलनसार और वाक चातुर्य से भरा होता है. महत्वाकांक्षी और थोड़ा सा अहंकारी भी हो सकता है. जातक का ये स्वभाव कई बार परेशानी का सबब बन सकता है.

    वणिज करण-व्यक्ति व्यवसाय

    जिस व्यक्ति का जन्म वणिज करण में होता है, उस व्यक्ति को व्यापारिक कार्यो में विशेष रुचि होती है. इस योग के व्यक्ति को नौकरी करने के स्थान पर अपना व्यापार कार्य कर लाभ उठाना चाहिए. ऎसे व्यक्ति को विदेश गमन से उत्तम आय की प्राप्ति होती है. वह व्यक्ति विदेशी संबधों के साथ कार्य कर अपनी ख्याति और आय दोनों को बढा सकता है. व्यापारिक उद्देश्यों के लिए की गई यात्राएं भी व्यक्ति की सफल होती है.

    व्यक्ति अपनी जीवन लक्ष्यों को विदेशी सूत्रों के सहयोग से पूरा करता है. बाजार में रह कर वस्तुओं के क्रय और विक्रय के विषय में बहुत अधिक ज्ञानी होता है.

    वणिज करण-चरसंज्ञक करण

    वणिज करण चरसंज्ञक है. शेष अन्य चरसंज्ञक करणों में बव, बालव कौलव, तैतिल, गर और विष्टि है. बाकी के बचे हुए चार करण शकुनि, चतुष्पाद, नाग और किस्तुघ्न ध्रुव करण कहलाते है.

    वणिज करण- स्वामी

    वणिज करण की अराध्य देवी स्वामी लक्ष्मी जी हैं. इस करण के जातकों के लिए माँ लक्ष्मी की पूजा बहुत अधिक फल दायक होती है. जो व्यक्ति अपने करण के सभी शुभ फल प्राप्त करना चाहता है. उन्हें देवी लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए. देवी लक्ष्मी की पूजा करने से व्यक्ति को स्वास्थय सुख के साथ साथ भाग्य और धन का लाभ भी प्राप्त होता है.

    आर्थिक कष्टों से बचने के लिए वणिज करण के जातक को शुक्रवार के दिन श्री सूक्त का पाठ अवश्य करना चाहिए.

  • देवी लक्ष्मी को भोग स्वरुप खीर का भोग अवश्य लगाना चाहिए.
  • यदि संभव हो सके तो शुक्रवार के व्रत करने चाहिए.
  • सफेद वस्त्रों का दान भी शुभ होता है.
  • वणिज करण में करने योग्य कार्य

    वणिज करण में कोई भी वस्तु का क्रय विक्रय करना अनुकूल माना गया है. किसी व्यापार को करने के लिए इस करण का होना बेहतर स्थिति देने वाला माना गया है. यह करण सामान्य करण है, इस करण में नवीन कार्य किए जा सकते हैं.

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    हीमेटाइट उपरत्न । Haematite | Hematite Gemstone – Meaning | Hematite – Metaphysical Properties | Hematite – History

    यह आसानी से उपलब्ध होने वाला उपरत्न है. यह अपारदर्शी होता है. यह आयरन आक्साइड से बना खनिज है. यह हल्के काले रंग से गहरे काले रंग तक के रंगों में पाया जाता है. भूरे रंग, भूरे व लाल रंग के मिश्रण तथा लाल रंग में भी कभी-कभी पाया जाता है. सामान्यतया यह हल्के काले रंग में ही उपलब्ध होता है. इन्द्रधनुषी रंग में पाया जाने वाला हेमाटाइट नाजुक होता है. यह उपरत्न क्वार्टज़ के साथ मिलाकर उपयोग में लाया जाता है इससे इस उपरत्न की उम्र बढ़ जाती है अन्यथा यह आसानी से टूटने वाला नाजुक पत्थर है. इस उपरत्न के सभी रुपों में भिन्नता है लेकिन सभी में जंग जैसा लालीपन मौजूद रहता है.  यह उपरत्न लोहे की तुलना में अधिक कठिन है लेकिन फिर भी यह लोहे से अधिक भंगुर है. 

    हीमेटाइट शब्द ग्रीक शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ है – रक्त. मंगल ग्रह के अन्वेषणकर्त्ताओं का मानना है कि मंगल ग्रह पर लाल रंग का पानी है जो हीमेटाइट के कारण भी हो सकता है. इस उपरत्न के मंगल ग्रह की सतह पर बहने से वहाँ लाल पानी पाया गया है. यह उपरत्न मंगल ग्रह पर हर तरफ पाया जाता है. 18वीं तथा 19वीं सदी में लोगों द्वारा हीमेटाइट उपरत्न से बने गहनों का प्रयोग शोक में शामिल होने के लिए किया जाता था. अमेरिका के मूल निवासी युद्ध में विजय हासिल करने के लिए हीमेटाइट से बने रंग का उपयोग करते थे. प्राचीन समय में इस उपरत्न का उपयोग लाल गेरू के रुप में भी किया जाता था. इससे गुफाओं में चित्र बनाने तथा रंग करने के लिए उपयोग में लाया जाता था.

    प्राचीन समय में इस उपरत्न का उपयोग दर्पण के रुप में भी किया जाता था. जब इसे काटा जाता था तो यह लाल और पारदर्शी हो जाता था. पॉलिश करने पर यह पहले से अधिक चमकदार हो जाता था. इस उपरत्न को गहनों, अँगुठियों तथा मालाओं में जडा़ जाता था.

    हीमेटाइट के आध्यात्मिक तथा भावनात्मक गुण | Metaphysical And Emotional Properties Of Hematite

    इस उपरत्न को आध्यात्मिक तथा भावनात्मक चिकित्सा के लिए अच्छा माना गया है. यह अशांत मन को शांत करता है. यह व्यक्ति में संतुलन बनाए रखता है. यह चीजों को समझने में स्पष्टता दिखाता है. 
    इसे धारण करने व्यक्ति धरातल से जुडा़ रहता है. व्यवहारिक बनता है. यह मानसिकता को बढा़ने में मदद करता है. यह अन्तर्ज्ञान में वृद्धि करता है. संबंधों में सुधार तथा प्रगाढ़ता लाता है. यह अंदरुनी सुख प्रदान करता है. यह शरीर की ऊर्जा का विकास करता है. जीवन के तनावों से मानव का बचाव करता है और शारीरिक क्षमता का विकास करता है. यह प्यार में वृद्धि करता है. व्यक्ति विशेष को सुरक्षा प्रदान करता है.

    इसे मानसिक महारत का उपरत्न भी कहा जा सकता है. यह उपरत्न व्यक्तिगत आकांक्षाओं तथा लक्ष्यों की पूर्त्ति के लिए व्यक्ति को बढा़वा देता है, इस बात की परवाह किए बिना कि दूसरा व्यक्ति का सोचेगा. यह उपरत्न व्यक्ति को आध्यात्मिकता की ओर प्रेरित करता है. यह प्रतिदिन की सच्चाई से भी लोगों को अवगत कराता है. इसलिए इसे जमीन से जुडा़ उपरत्न कहा जाता है. यह नकारात्मक ऊर्जा में कमी करता है. यह शांत, प्यारे तथा अच्छे संबंधों के लिए उपयोग में लाया जाता है. यह ज्ञान तथा याद्धाश्त को बढा़ने में मदद करता है.  यदि इस उपरत्न को धारण करना हो तो इसे बाएँ हाथ की अँगुली में धारण किया जाना चाहिए.

    हीमेटाइट के चिकित्सीय गुण | Healing Qualities Of Hematite

    प्राचीन समय में इस उपरत्न का उपयोग मिस्त्रवासियों द्वारा रक्त का सुचारु रुप से संचरण करने तथा रक्त कोशिकाओं में वृद्धि करने के लिए किया जाता था. यह उपरत्न किडनी तथा शरीर के परिसंचरण तंत्र को सुचारु रुप से चलाने में मदद करता है. यह किडनी तथा रक्त से संबंधित विकारों को ठीक करता है. अत्यधिक रक्तस्त्राव होने पर इस उपरत्न का उपयोग ताबीज के रुप में किया जा सकता है. यह छोटी आंत में लौह कणों को अवशोषित करने में सहायता करता है, यह लौह कण शरीर में आक्सीजन के स्तर में वृद्धि करते हैं. यह पलकों के कैंसर को होने से रोकता है.

    यह शरीर के हर प्रकार के तरल पदार्थों को नियंत्रित करता है. रक्त को शुद्ध रखने में सहायक होता है. सिर दर्द को होने से रोकता है. जिन्हें चक्कर आते हैं, उनके लिए यह लाभदायक है. धारणकर्त्ता की नसों तथा हार्मोन्स को नियंत्रित रखता है. यह बहुत ही शक्तिशाली उपरत्न है, लेकिन इसे गहनों के रुप में धारण करने से पूर्व इसका त्वचा पर असर देखना चाहिए. यदि इसे धारण करने से त्वचा पर कुछ विकार होता है तब इसे धारण नहीं करना चाहिए. जिन व्यक्तियों को इसे धारण करने पर त्वचा विकार नहीं होते हैं उन्हें भी लम्बे समय तक लगातार इसे धारण नहीं करना चाहिए.

    हीमेटाइट उपरत्न अग्नि तत्व है. इसे शनि ग्रह का उपरत्न माना जाता है. यह शरीर के मूलाधार चक्र को नियंत्रित रखता है.

    कहाँ पाया जाता है | Where Is Hematite Found

    यह उपरत्न अलाबामा(अमेरिका) का मुख्य उपरत्न है. 1840 से लेकर 1975 के मध्य तक 375 मिलियन टन हीमेटाइट निकाला जा चुका था. इसके अतिरिक्त इन्द्रधनुषी हीमेटाइट ब्राजील में पाया जाता है. आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, कनाडा, इटली, स्वीट्जरलैण्ड, स्वीडन, नॉर्वे, मोरोक्को, न्यूजीलैण्ड, मेक्सिको, चीन, जर्मनी आदि देशों में हीमेटाइट की बाकी किस्में पाई जाती हैं. ब्राजील देश इस उपरत्न का मुख्य स्त्रोत है. एरीजोना, मिशिगन तथा विस्कोन्सिन के क्षेत्रों में भी यह उपरत्न पाया जाता है.

    कौन धारण करें | Who Should Wear Hematite Gemstone

    जिन व्यक्तियों की कुण्डलियों में शनि ग्रह शुभ भावों का स्वामी होकर निर्बल अवस्था में स्थित है वह हीमेटाइट उपरत्न को धारण कर सकते हैं.

    अगर आप अपने लिये शुभ-अशुभ रत्नों के बारे में पूरी जानकारी चाहते हैं तो आप astrobix.com की रत्न रिपोर्ट बनवायें. इसमें आपके कैरियर, आर्थिक मामले, परिवार, भाग्य, संतान आदि के लिये शुभ रत्न पहनने कि विधि व अन्य जानकारी भी साथ में दी गई है : आपके लिये शुभ रत्न – astrobix.com

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