राहु और शुक्र की युति का कुंडली के 12 भाव में प्रभाव

इन दोनों ग्रहों का आपस में गहरा संबंध माना गया है. राहु का प्रभाव व्यक्ति को उचित अनुचित के भेद से परे को दिखाता है. शुक्र प्रेम, संबंध, विलासिता, प्रसिद्धि और धन को दर्शाता है. राहु शुक्र जब एक साथ होते हैं तो इच्छाओं में वृद्धि के लिए विशेष कारक बन जाते हैं. यह योग एक व्यक्ति को अच्छा दिखता है, उसके कोमल व्यक्तित्व को भी सामने लाता है, लेकिन इच्छाओं में बढ़ावा गलत मार्गदर्शन भी देने वाला होता है. विपरीत लिंग को अधिक आकर्षित करने की प्रवृत्ति रखता है. प्यार और रिश्ते के लिए इनके जुनून भी अधिक हो जाता है. किसी ऐसे व्यक्ति के लिए सीमा पार कर सकते हैं जिससे वे प्यार करते हैं, भौगोलिक या सांस्कृतिक दूरी से कोई फर्क नहीं पड़ता. व्यक्ति अपने मन के प्रति काफी कमजोर होता है. राहु के होने से व्यक्ति अपनी पृष्ठभूमि से हटकर काम करने और दूसरों के प्रति विश्वास को पाने में अधिक केन्द्रित दिखाई देता है. बदलाव की प्रवृत्ति व्यक्ति में बहुत अधिक होती है. ग्रहों की ऊर्जा मिलकर एक व्यक्ति को कई चीजों के लिए अधिक जिद्दी बना देती है,. 

राहु और शुक्र प्रथम भाव में

प्रथम भाव व्यक्ति के रूप-रंग, आत्म-अभिव्यक्ति, स्वभाव को दर्शाता है. इस स्थान पर राहु शुक्र का युति योग व्यक्ति को शानदार बनाता है. खूबसूरत और आकर्षक व्यक्तित्व मिलता है.  अत्यधिक महत्वाकांक्षी भी बनाता है. आर्थिक एवं भौतिक रुप से संपन्नता पाने के लिए आगे रखता है. दूसरों को ये लोग जल्द से प्रभावित कर लेने में सक्षम होते हैं. 

राहु और शुक्र दूसरे भाव में

दूसरा भाव संपत्ति और आय का प्रतिनिधित्व करता है. यहां मौजूद राहु शुक्र का युति योग अच्छे परिणाम धन के मामले में देने वाला होता है, खर्चीला हो सकता है व्यक्ति. परिवार से धन की प्राप्ति होती है लेकिन उस धन को खराब भी कर सकता है. खान पान में लापरवाह होता है और इस कारण व्यसन का भी असर पड़ सकता है. राहु और शुक्र एक व्यक्ति को जोखिम उठाने वाले बनाते हैं. 

राहु और शुक्र तीसरे घर में

तृतीय भाव से व्यक्ति के आत्मविश्वास का पता चलता है, साहस और उसके द्वारा किए जाने वाले प्रयास भी इसी भाव से देखाई देते हैं. इस स्थान पर राहु शुक्र व्यक्ति को रोमांच से जोड़ने वाला होता है. जीवन में कई तरह के उतार-चढ़ाव बने रहते हैं. भाग्य को लेकर कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है लेकिन उन्हीम पर विजय पर व्यक्ति सफल भी होता है. 

राहु और शुक्र चौथे भाव में

जन्म कुंडली में चतुर्थ भाव सांसारिक सुख से जुड़ा हुआ होता है, यहीं से माता के स्नेह सुख का पता चलता है. यहां राहु और शुक का योग व्यक्ति को आर्थिक संपन्नता देता है लेकिन उसके सुख को भोगने में कमी भी देता है. धन के मामले में यह योग कुछ हद तक अविश्वसनीय रूप से समृद्ध बना सकता है.  शानदार वाहन और घर की प्राप्ति होती है. चीजों से सुख कम मिल पाता है. माता का की ओर से कुछ दूरी बनी रह सकती है.

राहु और शुक्र पंचम भाव में

पंचम भाव पूर्व पुण्य का भाव माना गया है. इस भाव में राहु का और उसके साथ शुक्र की उपस्थिति कुछ परेशाणि दे सकती है लेकिन भौतिक चीजों का लाभ मिलता है. यह आध्यात्मिकता से जोड़ते हैं लेकिन परंपराओं से हट कर व्यक्ति अपनी धार्मिक मान्यताओं को अधिक मानता है. 

राहु और शुक्र छठे भाव में

छठा भाव रोग का स्थान होता है. जब कुंडली के इस भाव में राहु शुक्र साथ होते हैं तो कुछ मामलों में सफल बना सकते हैं लेकिन कुछ में यह चुनौतियां भी देते हैं. व्यक्ति को कई तरह की बीमारियों का सामना करना पड़ेगा. किसी प्रकार के व्यसन इत्यादि की लत भी व्यक्ति को जल्दी से लग सकती है, इसलिए स्वास्थ्य के प्रति बहुत सावधान रहना होता है. 

राहु और शुक्र सप्तम भाव में

सप्तम भाव सभी प्रकार की साझेदारियों को दर्शाता है चाहे व्यक्तिगत हो या फिर काम का क्षेत्र बदलाव तो होते हैं. विवाहेतर संबंधों में उतार-चढ़ाव अधिक बने रह सकते हैं. व्यक्ति किसी अलग पृष्ठभूमि या जाति में विवाह कर सकता है. सहकर्मियों से अनबन हो सकती है. परिवार शांति की कमी के कारण व्यक्ति कई मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं और तनाव का सामना करना पड़ सकता है. उसके साथी उसे धोखा दे सकते हैं.

राहु और शुक्र आठवें घर में

आठवां भाव दीर्घायु और मृत्यु का भाव है. राहु के साथ शुक्र का योग यहां कुछ नकारात्मक असर अधिक दिखा सकता है. इन दोनों ग्रहों के प्रभाव से व्यक्ति को शरीर के निचले हिस्से से संबंधित रोग होने की संभावनाएं अधिक रह सकती है. इसलिए अपने स्वास्थ्य के प्रति सावधान रहना जरुरी है. अपने रिश्तों में निर्भरता से बचना चाहिए. व्यक्ति गुढ विद्याओं में अधिक जुड़ सकता है. 

राहु और शुक्र नवम भाव में

राहु के साथ शुक्र का नवम भाव में युति योग में होना व्यक्तिको एक धर्म से दूसरे धर्म में ले जा सकता है. इसके अलावा व्यक्ति काफी बदलाव के लिए उत्साहित करने वाला होता है. व्यक्ति को सफलता प्राप्त करने और भाग्य को बनाए रखने के लिए अधिक संघर्ष करने की आवश्यकता होती है. 

राहु और शुक्र दशम भाव में

दशम भाव का स्थान कैरियर और व्यवसाय का स्थान होता है. व्यक्ति को अपने काम में अच्छे विस्तार मिलता है. वह अपने कार्यक्षेत्र में उपलब्धियों को पाने सफल होते हैं. विदेश से संबंधी कार्यों से जुड़ने का समय भी व्यक्ति को मिलता है. 

राहु और शुक्र एकादश भाव में

कुंडली का एकादश भाव इच्छाओं और लाभ का प्रतिनिधित्व करता है. राहु और शुक्र का एकादश भाव में होना व्यक्ति को जीवन में आगे बढ़ने के साथ साथ सफलताओं को दिखाने वाला होता है. व्यक्ति सामाजिक क्षेत्र में नाम कमाने में सक्षम होता है.

राहु और शुक्र द्वादश भाव में

कुंडली का द्वादश भाव खर्चों, विदेश यात्रा और बाहरी संपर्क को दर्शाता है. राहु के साथ शुक्र का होना व्यक्ति को बाहरी क्षेत्र से जोड़ने वाला होता है. व्यक्ति अपने लोगों के साथ अधिक रह नहीं पाता है.खर्चों की अधिकता रहती है. इच्छाएं भी अनियंत्रित भी रहती है. 

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सप्तम भाव में सूर्य विवाह पर कैसे डालता है अपना असर

सातवें भाव में बैठा सुर्य बहुत अधिक महत्वपुर्ण प्रभाव डालने वाला माना गया है. सूर्य का असर कुंडली के सातवें घर में जाना मिलेजुले असर दिखाने वाला होता है. जब सूर्य कुण्डली के सप्तम भाव में होता है. इसका असर जीवन साथी पर अपना गहरा प्रभाव डालने वाला होता है. जीवनसाथी की ओर से उसके साथ संबंधों पर इस स्थिति का असर कई तरह से देखने को मिलता है. व्यक्ति के भीतर स्वयं को स्थापित करने की इच्छा अधिक होती है. वह लीडरशीप की चाह रख सकता है. जीवन साथी योग्य एवं प्रतिभाशाली होता है. व्यक्ति की वाणी में प्रभाव झलकता है. लालित्य की ओर भी झुकाव रहता है.

सूर्य सप्तम भाव में हो तो सुंदरता के प्रति रुझान भी देता है. प्रभावशाली लोगों के साथ मेल-जोल भी रहता है. सूर्य के प्रभाव से जीवनसाथी सम्मानित परिवार और प्रतिष्ठि स्थिति वाला होता है. आर्थिक रुप से सहयोगात्मक होता है. मेष लग्न के लिए सप्तम भाव में नीच का सूर्य ग्रह चिंता का विषय बन जाता है. सूर्य एक अच्छे भाव का स्वामी है और मेष राशि के लिए एक अच्छा ग्रह है. ऐसे ग्रह को खराब फल नहीं देना चाहिए, लेकिन यहां पर जीवनसाथी और वैवाहिक जीवन से संबंधित कुछ प्रतिकूल परिणाम देने वाला हो जाता है.  

सप्तम भाव क्या है? 

सप्तम भाव व्यवसाय और व्यक्तिगत जीवन में साझेदारी के लिए देखा जाता है.  इस भाव में स्थित हो तो यह व्यक्ति के किसी के साथ मिलकर कार्य करने की इच्छा को दर्शाता है. ऐसा व्यक्ति साथी की इच्छाओं की अत्यधिक कद्र करने वाला भी होता है. व्यक्ति सहज स्वभाव का होता है, इसलिए लोगों के लिए इनके साथ बातचीत करना आसान व सहज है. सामंजस्यपूर्ण संबंध बनाना मुश्किल काम होता है विशेष रुप से दांपत्य जीवन में. वह न्याय और कानून से संबंधित सभी क्षेत्रों में व्यक्ति अच्छा होता है. भाग्य का साथ भी इसे मिलता है. जन्म कुण्डली में सप्तम भाव में सूर्य का प्रभाव व्यक्ति को मजबूत चरित्र प्रदान करता है. शक्तिशाली, लेकिन कूटनीतिक, दोस्ती में वफादार होता है. जीवन के पथ पर, वे मेल खाने के लिए लोगों से मिलते हैं. एक आदर्श साथी के रूप में, उन्हें समान सिद्धांतों वाले व्यक्ति की आवश्यकता होती है, ईमानदार रिश्तों के मूल्य को समझते हैं. सूर्य के पीड़ित होने पर किसी भी कीमत पर नेतृत्व करने की इच्छा प्रकट होती है. ऐसे में वह दूसरों पर अधिक दबाव भी बना देते हैं. 

सप्तम भाव में सूर्य का फल

सूर्य को सप्तम भाव में अनुकूल कम ही माना जाता है. सप्तम घर के लिए एक अच्छा इसलिए भी नहीं होता है क्योंकि वहां वह कालपुरुष कुंडली में यहां कमजोर हो जाता है. सातवें घर में सूर्य जन्म के दौरान या सूर्यास्त के निकट के जन्म का समय भी दर्शाता है, सूर्य का अस्त होना अनुकूलता के असर को नहीं दिखा पाता है. वह बहुत बुरा नहीं होता है लेकिन कुछ मामलों में वह कई तरह से बेहतर असर नहीं दिखा पाता है. सूर्य यहां थोड़ा असहज हो सकता है. 

सूर्य सातवें भाव में होने पर व्यक्ति अपने तक अधिक होता है इसलिए जरुरत होती है की शेयरिंग, केयरिंग और बॉन्डिंग बनाए रखे की  क्योंकि यहा चीजें कई बार दूसरे के नजरिये से भी देखने की जरूर हो सकती है. पार्टनर के साथ पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ में व्यक्ति आगे रहने वाला होता है. वह अपने कंट्रोल को दिखाने में आगे रह सकता है. साथी के साथ उचित स्वभाव का नहीं रह पाना, यह रिश्तों को बहुत ही विद्रोही और विनाशकारी बना सकता है. रिश्ते में व्यक्ति अपनी शक्ति और ऊर्जा जरूर लगाता है लेकिन अपनी उम्मीद को पूरा होते नहीं देख पाता है. अपने लोगों की और उसका ध्यान अधिक रहता है. लेकिन व्यक्ति को अपनों की ओर से अधिक समय विरोध ही मिलता है. 

लाइफ पार्टनर के साथ दे सकता है मतभेद 

जब सूर्य सातवें भाव में होता है तो इसके कारण व्यक्ति को अपने पार्टनर के कारन अधिक परेशानी का अनुभव करना पड़ सकता है. व्यक्ति अपने जीवन साथी के साथ विरोध को अधिक झेल सकता है. या किसी न किसी कारण से अलगाव की स्थिति रिश्तों में अधिक बनी रहती है. रिश्ते में दूरी का कारण कुछ भी हो सकता है, कई बार सब कुछ सही होने के बावजूद भी नौकरी, इत्यादि के चलते ही दूरी झेलनी पड़ सकती है. सप्तम भाव में सूर्य का होना जीवनसाथी की तलाश में अधिक भगाता है, वह आसानी से अपने दांपत्य जीवन का सुख भोग नहीं पाते हैं. इनके लिए अपने जीवन में लगातार संघर्ष की स्थिति भी बनी रहती है.  अपने पार्ट्नर के लिए वह काफी जिम्मेदार भी रहता है. समर्पण का भाव भी बहुत अधिक दिखाता है. सूर्य का सप्तम में होना वैवाहिक जीवन में उथल-पुथल को अवश्य दर्शाने वाला होता है. 

सूर्य के सप्तम में होना सकारात्मक एवं नकारात्मक पक्ष  

सातवें भाव में सूर्य का प्रभाव व्यक्ति को लोकप्रियता दिलाने में सक्षम होता है. व्यक्ति अपने काम के द्वारा प्रसिद्धि भी पाता है. अपने जीवन में उच्च वर्ग के लोगों से सम्मान भी पाता है. कुछ उपलब्धियों के सहयोग से उसका जीवन बहुत अधिक सक्रिय भी बनता है. सप्तम भाव में सूर्य व्यक्ति को नेतृत्व का गुण भी देता है. अपने साथ जुड़े लोगों का मार्गदर्शन करने में भी वह आगे रहता है. व्यक्ति उत्साही एवं सजगता के साथ काम करने में अधिक विश्वास रखता है. दूसरों के साथ होने वाली बातें उसके जीवन को भी बदलने का काम करती हैं. 

सातवें भाव में सूर्य वाले जातकों को संघर्षों का सामना अधिक करना पड़ सकता है. वह उन चीजों में उलझ सकता है जो दूसरों के द्वारा अधिक क्रिएट की गई होती हैं. वह अपने जीवन के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए कई तरह से कोशिशों में लगा भी रहता है. कई बार चीजों को डील कर पाना उसके लिए मुश्किल होता है तो इस स्थिति में वह न समझौता करता है न पिछे हटना पसंद करता है. तह जटिलता अधिक परेशानी देने वाली होती है. कल्पनाओं का संसार भी विस्तार पाता है ऎसे में कई कमियों के कारण निराशा भी परेशानी देती है. दूसरों को मार्गदर्शन देने में आगे रहते हुए वह खुद के लिए उचित मार्ग को कई बार अपना नहीं पाता है. उसकी बेचैनी एवं हताशा जीवन पर भी साफ झलक सकती है. 

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चिकित्सा ज्योतिष में मानसिक विकार का कारण

ज्योतिष शास्त्र में मानसिक विकार से संबंधित योगों का वर्णन मिलता है. ज्योतिष अनुसार मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाले विकार एवं नकारात्मक सोच के पीछे ज्योतिषिय कारण बहुत असर डालते हैं. मानसिक रुप से चंद्रमा का प्रभाव बहुत विशेष माना गया है. इस कारण से सभी प्रकार के मनोविकारों के लिए चंद्रमा का प्रभाव बहुत होता है. इसके अलावा अन्य ग्रहों का योग अलग- अलग रुप से अपना प्रभाव दिखाता है. 

ज्योतिष के माध्यम से मानसिक विसंगतियों को समझना आसान है, इसका विश्लेषण करके इससे बचाव का मार्ग भी सुलभ रुप से प्राप्त होता है. मानसिक विकारों के विभिन्न कारण होते हैं. मानसिक विकारों की संभावना का निर्धारण करने में ज्योतिषीय महत्व के बारे में बात करेंगे. चिकित्सा ज्योतिष में कुछ ऐसे योग हैं जो हमें यह निर्धारित करने में मदद करते हैं कि एक व्यक्ति अपने जीवन में किन स्वास्थ्य जटिलताओं से पीड़ित होगा. इस तरह के गंभीर विश्लेषण के लिए हमेशा सूक्ष्म रुप से ग्रह नक्षत्रों का चयन जरुरी होता है.  

मानसिक विकारों को कैसे जाने कुंडली से 

कुंडली में मानसिक विकारों के लिए चंद्रमा, बुध, चतुर्थ भाव और पंचम भाव का विश्लेषण किया जाता है. चंद्रमा हृदय-मन है और बुध मस्तिष्क-बुद्धि है. इसी प्रकार चतुर्थ भाव हृदय और पंचम भाव मस्तिष्क को दर्शाता है. चंद्रमा और पंचम भाव ऐसी स्थिति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. जब व्यक्ति भावनाओं से परेशान होता है वह उन्हें संभाल नहीं पाता है, भावनात्मक उथल-पुथल के कारण अपनी मानसिक स्थिरता खो देता है तो ये स्थिति उसे दिमागी रोगों की ओर ले जाने लगती है. इसी प्रकार चतुर्थ भाव सिजोफ्रेनिया जैसे मानसिक विकार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. वहीं शनि और चंद्र की युति भी मानसिक स्वास्थ्य के लिए शुभ नहीं मानी जाती है. किसी भी प्रकार के मानसिक विकार की घटना के लिए कुंडली में चंद्रमा पीड़ित होना चाहिए.

मानसिक विकार को प्रभावित करने वाले योग 

किसी व्यक्ति में मानसिक विकार उत्पन्न होने की प्रवृत्ति तब दिखाई देती है, जब वह अपनी इच्छाओं एवं विचारों को नियंत्रित नहीं कर पाता है. इसका कारण जन्म कुंडली में बनने वाले खराब योगों के कारण ही अधिक लक्षित होता है. जन्म कुंडली में जब चन्द्रमा एक ही भाव में राहु के साथ स्थित होता है तो ऎसे में यह एक ग्रहण योग होता है. इसके कारण जातक को शुभ फल नहीं मिल पाते हैं ऐसा इसलिए है क्योंकि राहु चंद्रमा को हमारे मन को इच्छाओं को भ्रमित कर देता है. चंद्रमा मन का कारक है. ऐसी स्थिति में व्यक्ति अपने सपनों की दुनिया का निर्माण अधिक करता है और जब उसे इसमें सफलता नहीं मिलती है तो धीरे धीरे इसका प्रभाव उसे मानसिक रुप से कमजोर कर देता है. 

जन्म कुंडली में बुध का पाप प्रभावित होना भी दिमागी रोग के लिए जिम्मेदार होता है. पीड़ित बुध, केतु और चतुर्थ भाव का आपस में संबंध बनाना जातक को अत्यधिक जिद्दी बनाता है. ऐसे लोग सिजोफ्रेनिया जैसे गंभीर मानसिक विकार से भी पीड़ित हो सकते हैं. बहुत से विद्वान ऐसी स्थितियों का विश्लेषण करने के लिए चतुर्थ भाव और बुध पर बल देते हैं. जब मन और बुद्धि एक समान रुप से किसी चीज पर एकाग्र होती है तो यह अच्छी है लेकिन यदि जब यह जबरदस्ती चीजों पर जोर लगाती है तो अनुकूल नहीं होती है. इस कारण से ही कई तरह की परेशानी दिमागी फितूर के रुप में देखी जा सकती हैं. 

जन्म कुंडली में बृहस्पति या मंगल क्रमशः लग्न या सप्तम भाव में स्थित होते हैं तब जातक मानसिक समस्याओं से पीड़ित हो सकता है. मंगल ऊर्जा शक्ति है और बृहस्पति ज्ञान है. जब इन दोनों का संबंध इन भावों से बनता है तो यह विचारों को बहुत अधिक तेजी से प्रभावित करते हैं. लग्न का संबंध व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व से होता है, उसकी इच्छा शक्ति एवं विचारधारा इसी लग्न द्वारा प्रभावित होती है. इस कारण जब मंगल और बृहपति दोनों इस भाव से संबंध बनाते हैं तब व्यक्ति पर इन दोनों की जबरदस्त उर्जा का असर भी पड़ता है. अभिमान, अंहकार, क्रोध जिद जैसे गुण भी विकसित होते हैं, इन बातों का बढ़ जाना ही व्यक्ति को मानसिक विकार की ओर ले जाने वाला होता है. विशेष रुप से यदि ये दोनों ग्रह कुंडली के पाप भावों के साथ संबंध बना रहे हों उनके स्वामित्व को पाते हों अथवा पाप ग्रहों से पीड़त हो रहे हों तो उस स्थिति में इसका असर अधिक पड़ता है. 

जन्म कुंडली में  शनि लग्न में या कुंडली के पंचम, सप्तम या नवम भाव में मंगल के साथ हो, चंद्रमा केतु के साथ द्वादश भाव में स्थित हो तो व्यक्ति मानसिक विकारों से पीड़ित होता है. व्यक्ति अपने मनोभावों को सही प्रकार से दूसरों के सामने रख नहीं पाता है. वह किसी न किसी अंजाने भय से भी परेशान होता है. इसके अलावा यदि कृष्ण पक्ष के कमजोर चंद्रमा के साथ शनि बारहवें भाव में बैठा हो तो भी इस कारण मानसिक विकार होने की संभावना होती है. चंद्र और शनि की युति भी मानसिक अशांति का कारण बनती है. इसमें बुध का शामिल होना व्यक्ति को डर और भय का माहौल देने वाला होता है. उन्मांद से प्रभावित होकर जातक गलत चीजों को करने के लिए अधिक प्रेरित दिखाई देता है. 

जन्म कुंडली में उपग्रहों का स्वरुप भी विशेश होता है. मांदी अगर सप्तम भाव में हो और पाप ग्रह से पीड़ित हो. राहु और चंद्रमा लग्न में स्थित हों तो व्यक्ति को मसिक विकार परेशानी देते हैं. जब किसी कुंडली के छठे या आठवें भाव में शनि और मंगल की युति होती है तो मानसिक विकार का कारण बनती है. 

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अपनी कुंडली से जाने शुभ और अशुभ ग्रहों के बारे में विस्तार

कुंडली विषण एक बहुत विस्तृत प्रक्रिया है, और कुंडली में सभी सूक्ष्म बातों को देखना होता है. इन विवरणों में शुभ और अशुभ ग्रहों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है. यह एक कठिन काम है क्योंकि कोई ग्रह एक ही समय पर शुभ भी होगा तो वहीं वह खराब भी हो सकता है. कुछ ग्रह प्राकृतिक रुप से शुभ होते हैं और कुछ अशुभ ग्रह होते हैं. शुभ और अशुभ ग्रह. यह एक सामान्य नियम है कि कुछ ग्रह अशुभ होते हैं और कुछ शुभ. उदाहरण के लिए, बृहस्पति को एक प्राकृतिक लाभकारी के रूप में जाना जाता है, जबकि शनि को एक प्राकृतिक अशुभ के रूप में जाना जाता है. इसके विपरित कुछ लग्नों के लिए बृहस्पति अशुभ हो सकता है, और शनि शुभ हो सकता है, इसलिए वे लग्न के अनुसार शुभ बन जाते हैं, जिसे क्रियात्मक शुभ और अशुभ कहा जाता है. इसलिए कुंडली की जांच में इन बातों पर ध्यान रखने की आवश्यकता होती है. 

शुभ और अशुभ ग्रहों का पता लगाने के लिए बहुत सारी बातों को ध्यान रखना होता है. ग्रहों के बीच संबंध का पता लगाने पर शुभ और अशुभ के अलावा एक और स्थिति होती है जिसे तटस्थ भी कहा जाता है. इसमें ग्रह न शुभ होता है न अशुभ होता है व न्यूट्रल रह कर प्रभवैत करता है. शुभ और अशुभ की अवधारणा वैदिक ज्योतिष के मानदंड़ों पर आधारित है. 

शुभ और अशुभ ग्रहों का वर्गीकरण 

ग्रहों में से शनि, मंगल और राहु अशुभ हैं, और सूर्य क्रूर ग्रह है, लेकिन यह अन्य पाप ग्रहों की तरह खराब नहीं है. बृहस्पति और शुक्र को शुभ के रूप में देखा जाता है जबकि चंद्रमा और बुध की शुभता उनके साथ बैठे ग्रहों पर निर्भर करती है. यदि वे शुभ ग्रह हों तो इनका शुभ फल दिखाई देता है और यदि किसी पाप ग्रह के साथ हों तो अशुभ फल देने वाले होते हैं. इसलिए वे न तो शुभ हैं और न ही अशुभ होते हैं. ज्योतिष शास्त्र में गुरु का उच्च स्थान है लेकिन वेदों में शुक्र को गुरु से अधिक ज्ञानी बताया गया है. बृहस्पति को देवताओं के गुरु के रूप में जाना जाता है, और शुक्र असुरों के गुरु के रुप में स्थान प्राप्त होता है. शुक्ल पक्ष के चंद्रमा को लाभकारी माना जाता है. कृष्ण पक्ष या अमावस्या के दिन चंद्रमा को अशुभ माना जाता है.

मेष लग्न  के लिए शुभ अशुभ ग्रह 

मेष लग्न के लिए बृहस्पति, मंगल, चंद्र और सूर्य शुभ ग्रह हैं. लग्न का स्वामी मंगल है और मंगल के मित्र ग्रह सूर्य, चंद्र और बृहस्पति हैं तो स्वाभाविक रूप से इन ग्रहों की दशा मेष लग्न के लिए अच्छी रहती है. राहु और केतु मंगल के शत्रु हैं अत: मेष लग्न के लिए ये पापकारक हैं. ग्रहों की मित्रता में मंगल शनि और शुक्र के साथ एक तटस्थ संबंध रहता है. शुक्र मेष लग्न के लिए एक मारक ग्रह है. मेष लग्न के लिए बुध शत्रु ग्रह है और यह छठे भाव का स्वामी है.

वृष लग्न के लिए शुभ अशुभ ग्रह
वृष लग्न का स्वामी शुक्र है, शनि, शुक्र और बुध शुभ ग्रह हैं क्योंकि ये शुक्र के मित्र हैं. शनि नौवें और दसवें भाव के स्वामी है होकर बहुत शुभ बन जाते हैं. वृष राशि के लिए शनि शुभ योगकारक ग्रह बनते हैं. वृष लग्न के लिए, लग्न स्वामी शुभ और पाप दोनों श्रेणी में आता है क्योंकि नकारात्मकता के रुप में छठे भाव का स्वामी बनता है. वृष राशि के लिए चंद्रमा, मंगल, राहु, केतु और बृहस्पति, शत्रु स्थिति में होते हैं. सूर्य और शुक्र मित्र नहीं हैं, फिर भी वृष लग्न के लिए सूर्य एक तटस्थ ग्रह है.

मिथुन लग्न के लिए शुभ अशुभ ग्रह
बुध मिथुन राशि का स्वामी है और बुध शुक्र और शनि का मित्र है. मिथुन लग्न के लिए लाभकारी होते हैं, लेकिन शुक्र सबसे अधिक शुभ ग्रह है. मिथुन लग्न के लिए, मंगल सबसे अधिक पाप ग्रह के रुप में देखा जाता है, और अन्य पाप ग्रह राहु, केतु, बृहस्पति और सूर्य शामिल होते हैं. मिथुन लग्न के लिए चंद्रमा और बुध तटस्थ ग्रह के रुप में जाने जाते हैं. 

कर्क लग्न के लिए शुभ अशुभ ग्रह 

कर्क लग्न का स्वामी चंद्रमा है और कर्क लग्न के लिए केवल मंगल और चंद्रमा ही शुभ कारक ग्रह होते हैं. कर्क लग्न के लिए बृहस्पति, शनि और बुध पाप ग्रह के रुप में असर डालते हैं क्योंकि उनका नकारात्मक भावों पर अधिकार भी होता है. कर्क लग्न के लिए राहु, केतु, शुक्र और सूर्य सम होते हैं. 

सिंह लग्न के लिए शुभ अशुभ ग्रह 

सिंह लग्न, सूर्य अधिपति है अत: सिंह लग्न के लिए सूर्य, मंगल, बृहस्पति शुभ ग्रह बनते हैं. सिंह लग्न के लिए बुध, शुक्र, राहु, केतु और चंद्रमा को पाप ग्रह के रूप में देखा जाता है, क्योंकि इन ग्रहों का स्थान पाप भाव से भी जुड़ा होता है. सिंह लग्न के लिए शनि एक मारक ग्रह है होता है.

कन्या लग्न के लिए शुभ और अशुभ       

कन्या लग्न का स्वामी बुध है. कन्या लग्न के लिए बुध और शुक्र एक अत्यंत शुभ ग्रह हैं. कन्या लग्न के लिए सूर्य, मंगल, बृहस्पति, राहु, केतु और चंद्रमा अशुभ ग्रह के रुप में देखे जाते हैं.

तुला लग्न के लिए शुभ और अशुभ  

तुला लग्न के लिए शुक्र इस लग्न का स्वामी होकर शुभ बन जाता है, लेकिन अष्टम का स्वामी होकर अशुभ हो जाता है. तुला लग्न के लिए शनि योगकारक बनते हैं. शनि इसके लिए सबसे अधिक शुभ ग्रह होता है. 

वृश्चिक लग्न के लिए शुभ और अशुभ  

मंगल वृश्चिक राशि का लग्न स्वामी है. वृश्चिक लग्न के लिए शुभ ग्रह मंगल, चंद्रमा, बृहस्पति और सूर्य हैं. वृश्चिक लग्न के लिए शुक्र, राहु और केतु पाप ग्रह हैं.

धनु लग्न के लिए शुभ और अशुभ  

बृहस्पति धनु राशि का स्वामी है, बृहस्पति  मंगल और सूर्य इस लग्न के लिए शुभ ग्रह हैं. धनु लग्न के लिए बुध, शुक्र, राहु और केतु अशुभ ग्रह हैं. इनमें शुक्र सबसे अधिक अशुभ होता है.

मकर लग्न के लिए शुभ और अशुभ  

शनि मकर लग्न का स्वामी है और धनु लग्न के लिए शुक्र, बुध और शनि शुभ कारक ग्रह होते हैं. शुक्र सबसे अधिक शुभकारी ग्रह है क्योंकि शनि और शुक्र मित्र हैं. इस लग्न के लिए  मंगल, चंद्र, राहु और केतु हैं अशुभ रुप में असर डालते हैं. 

कुंभ लग्न के लिए शुभ और अशुभ  

शनि कुम्भ लग्न का स्वामी है. कुम्भ लग्न के लिए शुक्र हैं और शनि शुभ ग्रह हैं. इस बीच, मंगल, बृहस्पति, चंद्रमा, राहु और केतु शुभता में कमी करते हैं बृहस्पति तटस्थ भी होता है. 

मीन लग्न के लिए शुभ और अशुभ  

मीन लग्न का स्वामी गुरु है. इस लग्न के शुभ ग्रह चंद्रमा और मंगल हैं. अशुभ ग्रह शुक्र, सूर्य, राहु और केतु हैं.

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केतु महादशा में अन्य ग्रहों की अंतर्दशा प्रभाव

केतु महादशा का समय बेहद महत्वपूर्ण होता है. इस दशा के समय व्यक्ति को अस्थिरता अधिक परेशान कर सकती है. जातक अपने लिए उचित एवं अनुचित के मध्य की स्थिति को समझ पाने में कुछ कमजोर रह सकता है. केतु की महादशा में व्यक्ति को कुछ लाभ मिलते हैं लेकिन वह लाभ सीमित रुप से प्राप्त होते हैं इस के अलावा इस समय के दौरान व्यक्ति का बाहरी लोगों के साथ संपर्क अधिक हो सकता है. धन, परिवार, संबंधों के मामले में यह दशा काफी अस्थिर हो सकती है. केतु महादशा के समय अन्य ग्रहों की अंतर्दशा का आगमन भी कई तरह से असर दिखाने वाला होता है. 

केतु महादशा केतु अंतर्दशा क्या है

केतु की महादशा में केतु की अन्तर्दशा का समय जीवन में बदलाव का होता है. इस समय के दोरान व्यक्ति अपनी चीजों को लेकर अधिक भ्रम में दिखाई दे सकता है. केतु की कुंडली में स्थिति अगर शुभ हो तो इस दशा में कुछ बेहतर परिणाम मिलते हैं. इसके विपरित अगर केतु शुभ स्थिति में न हो तब यह दशा कई मायनों में परेशानी को दिखा सकती है.  

केतु महादशा में बुध की अंतर्दशा

केतु की महादशा में बुध की अन्तर्दशा का समय सावधानी पूर्वक काम करने का होता है. इस समय व्यक्ति अधिक बेचैन और उत्साही हो सकता है. इस समय के दौरान व्यक्ति अपने काम में जितना हो सके तो सोच विचार से ही आगे बढ़ने की जरुरत होती है. 

केतु महादशा में शुक्र की अंतर्दशा

केतु की महादशा में शुक्र की अंतर्दशा का समय कुछ अच्छे लाभ को प्रदान करने वाला होता है. इस समय पर व्यक्ति कुछ नई चीजों को प्राप्त कर पाता है. अगर कुंडली में केतु के साथ शुक्र का संबंध अनुकूल रहता है तो व्यक्ति को इस समय पर अच्छे फल प्राप्त होते हैं. रिश्ते में नई शुरुआत का भी समय होता है. इस समय व्यक्ति अगर केतु शुक्र की अशुभता को झेलता है तो व्यसनों अथवा संक्रमण का असर उस पर तेजी से असर डाल सकता है. 

केतु महादशा में सूर्य की अंतर्दशा

केतु की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा का समय मानसिक एवं स्वास्थ्य के लिहाज से कुछ अनुकूलता की कमी को दिखाने वाला होता है. इस समय धार्मिक यात्राओं का दौर भी होता है. उच्च एवं गुरु जनों से वार्तालाप का मौका मिलता है. सरकार की ओर से लाभ कम ही ही मिल पाता है. विवाद से बचने की आवश्यकता होती है. व्यक्ति अपने लक्ष्यों को पाने के लिए इच्छुक होता है. 

केतु महादशा में चंद्रमा की अंतर्दशा

केतु की महादशा में चन्द्रमा की अन्तर्दशा का समय कई मायनों में विशेष रहता है. व्यक्ति अपने सुख को लेकर परेशान अधिक दिखाई दे सकता है. मानसिक रुप से वह बेचैन रह सकता है. काम को करने में वह आगे तो रहता है लेकिन कुछ मायनों में वह अपनी कार्यशैली में असंतुष्ट भी रहता है. इस समय पर अपने संबंधों में भी कुछ अस्थिरता का समय होता है. जल जनित रोग अधिक प्रभाव डालने वाले होते हैं आर्थिक और भौतिक सुख को लेकर उतार-चढ़ाव बना रह सकता है. 

केतु की महादशा में राहु की अंतर्दशा

केतु की महादशा में राहु की अन्तर्दशा का समय कई मायनों में महत्वपूर्ण रह सकता है. व्यक्ति अपने आस पास की स्थिति को लेकर कुछ अधिक जिज्ञासु रहता है. कम काज में किसी भी प्रकार से सफलता पाने की उसकी इच्छा शक्ति में वृद्धि होती है. ये समय स्वास्थ्य की दृष्टि से कुछ कमजोर हो सकता है. इस समय विदेश यात्रा का योग भी रहता है. नीचले तबके के साथ सामाजिक क्षेत्र में लाभ की स्थिति प्रभावित होती है.

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सूर्य – केतु का कुंडली के सभी भावों पर प्रभाव

सूर्य और केतु का योग ज्योतिष अनुसार काफी महत्वपूर्ण होता है. यह योग कुंडली में जहां बनता है उस स्थान पर असर डालता है. इस योग को वैसे तो अनुकूलता की कमी को दिखाने वाला अधिक माना गया है. इस योग में मुख्य रुप से दो उर्जाओं का योग एक होने पर व्यक्ति पर इसके दुरगामी असर अधिक पड़ते हैं. यदि ये योग अंशात्मक रुप से दूर होता है तब इसमें अधिक तनाव नहीं पड़ता लेकिन जब यह अधिक करीब होता है उसके कारण व्यक्ति को खराब असर अधिक देखने को मिलते हैं. ज्योतिष में एक वर्ष में एक बार और यह योग निर्मित अवश्य होता है.  इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि सूर्य मजबूत है या केतु केवल स्थिति  व भाव का असर यहां बहुत महत्व रखता है. 

यह योग आध्यात्मिक रुप से काफी अच्छे परिणाम दे सकता है लेकिन भौतिक रुप से कमजोर बना देता है. सूर्य प्रकाश है, आत्मा और जीवन है यह जब केतु के साथ होता है आत्मविश्वास पर असर डालता है. केतु ध्यान, आध्यात्मिकता का प्रतिनिधित्व करता है.  

प्रथम भाव में सूर्य केतु की युति

प्रथम भाव में सूर्य के साथ केतु की युति होने पर व्यक्ति स्वभाव से कुछ कठोर और अंतर्मुखी हो सकता है.  समाज में अपनी पहचान के लिए प्रयास अधिक करता है. दूसरों पर अधिकार जताने की प्रवृत्ति रखता है. व्यक्ति सोच विचार अधिक करेगा तथा कई बार भ्रम में अधिक रहेगा.  गुसा और क्रोध के कारण विवाद में अधिक रह सकता है. वैवाहिक जीवन में साथी के साथ अलगाव परेशान कर सकता है. 

दूसरे भाव में सूर्य केतु की युति 

दूसरे भाव में सूर्य केतु का होना व्यक्ति को वाणी में कठोरता देने वाला होता है. आर्थिक रुप से धन का संचय कर पाना व्यक्ति के लिए कठिन होता है. यदि इन का योग शुभ स्थिति को पाता है तो व्यक्ति अपने वरिष्ठ लोगों से लाभ प्राप्त कर सकता है. परिवार से दूर जाकर निवास कर सकता है. घरेलू क्षेत्र में शांति कुछ कम रहेगी. परिश्रम बना रहेगा. वैवाहिक जीवन में मुद्दे बने रह सकते हैं. 

तीसरे घर में सूर्य केतु की युति  

तीसरे घर में सूर्य के साथ केतु का योग व्यक्ति को परिश्रमी बनाता है. अपनों का सहयोग कम मिल पाता है. जीवन में आध्यात्मिक यात्राएं भी करता है. व्यक्ति दार्शनिक, लेखक और राजनीतिज्ञ बन सकता है.  परिवार के सदस्यों के साथ दूरी भी रहेगी. अपने निवास स्थान को लेकर चिंता होगी ओर विदेश में निवास हो सकता है. सूर्य और केतु कुछ समय के लिए बहुत आक्रामक स्वभाव और गुस्सैल बनाता है. 

चतुर्थ भाव में सूर्य केतु की युति

चतुर्थ भाव में सूर्य के साथ केतु का योग अनुकूलता की कमी को दर्शाता है. माता या भाई-बहनों के साथ सुख की कमी को दिखा सकता है. सूर्य की स्थिति अनुकूल होने पर   साहस और संचार कौशल देता है. धर्म या तीर्थ से जुड़ी कई यात्राएं होती है. अपने लिए विदेश में निवास के योग बनते हैं जन्म स्थान से दूर जाने का योग बनता है. भौतिक सुख साधनों को पाकर भी संतुष्टि नहीं मिल पाती है. 

पंचम भाव में सूर्य केतु की युति 

पंचम भाव में सूर्य के साथ केतु का योग जीवन में कई तरह की चुनौतियों के साथ सफलता का सुचक होता है. प्रेम के संबंध में विवाद अलगाव की स्थिति रहती है. अपने मित्र मंडली में व्यक्ति काफी प्रभाव डालता है. संतान के सुख में कमी रहेगी या कोई परेशानी हो सकती है. बौद्धिकता नई चीजों की खोज के लिए अग्रीण होती है. अपने पितरों का आशीर्वाद लेने के लिए उनके निमित्त श्रद्धा भाव करने की जरूरत होती है.

छठे भाव में सूर्य केतु की युति 

छठे भाव में सूर्य के साथ केतु का होना अच्छे परिणाम देता है. यहां शक्ति और प्रभुत्व को प्रदान करता है. शत्रुओं को पाता है लेकिन उन्हें हरा देने में सफलता भी पाता है. अपने कार्यक्षेत्र में वह सफलता को पाता है. गलत कार्यों में भी लाभ पाता है. स्वास्थ्य को लेकर अधिक सजग होना पड़ सकता है. 

सप्तम भाव में सूर्य केतु की युति 

सप्तम भाव में सूर्य के साथ केतु का होना अनुकूलता की कमी को दिखाता है. यहां व्यक्ति साझेदारी के काम में असफलता को देखता है. वह सामाजिक कार्यों में आगे रह सकता है लेकिन मान सम्मान अपनों से नहीं मिल पाता है. जीवन साथी से अलगाव होता है. व्यवहार की कठोरता दूसरों के साथ सहयोग की कमी दिखाती है. 

आठवें भाव में सूर्य केतु की युति 

आठवें भाव में सूर्य के साथ केतु का होना आध्यात्मिक रुप से अच्छा होगा लेकिन स्वास्थ्य के लिए कुछ कमजोर होगा. यह आकस्मिक घटनाओं को देने वाला होगा. जीवन में व्यक्ति तंत्र इत्यादि जैसी विद्याओं से जुड़ सकता है. पिता का सहयोग या स्वास्थ्य प्रभावित रह सकता है. 

नवम भाव में सूर्य केतु की युति 

नवें घर में सूर्य के साथ केतु क अयोग पितृ दोष को दर्शाता है. यह भाग्य को कमजोर करता है. इसके कारण जीवन में संघर्ष अधिक करना पड़ता है. इसमें पिता या वरिष्ठ लोगों का अधिक सहयोग नहीं मिल पाता है. सुखों की कमी होती है. आध्यात्मिक रुप से यह योग कई तरह के सकारात्मक प्रभाव दिखाता है. इस योग में व्यक्ति अपने और अपने समाज के कल्याण हेतु कार्य करता है. 

दशम भाव में सूर्य केतु की युति 

दसवें भाव में सूर्य और केतु की युति जीवन में कर्म के क्षेत्र को बढ़ा देती है. प्रयासों के द्वारा ही सफलता मिल पाती है. जातक अपने लोगों के साथ अधिक अनुकूल रिश्ते बना नहीं पाता है. करियर में हर तरह के कार्यों से जुड़ने का मौका मिलता है. सामाजिक प्रतिष्ठा आसानी से नहीं मिल पाती है. 

ग्यारहवें भाव में सूर्य केतु की युति 

ग्यारहवें भाव में सूर्य और केतु का युति योग व्यक्ति को आर्थिक रुप से प्रयास करने के लिए प्रेरित करने वाला होता है. व्यक्ति अपनी इच्छाओं को पूरी करने में कमजोर होता है. असंतोष की स्थिति जीवन में लगी रहती है. सामाजिक रुप से मान सम्मान पर शत्रुओं का प्रभाव इसे खराब करता है. संतान सुख प्रभावित होता है. प्रेम संबंधों में एक से अधिक संबंध बन सकते हैं. 

बारहवें भाव में सूर्य केतु की युति 

बारहवें भाव में सूर्य के साथ केतु युति योग मोक्ष के लिए अच्छा स्थान होता है. यह व्यक्ति को विदेश से लाभ भी दिलाता है. स्वास्थ्य एवं नेत्र ज्योति पर असर डाल सकता है. व्यक्ति में आत्मविश्वास की कमी रह सकती है. 

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अंगारक योग का असर कैसे डालता है भाग्य पर असर

अंगारक योग कुंडली में मंगल और राहु के एक साथ होने पर बनता है. इस योग में केतु और सूर्य का प्रभाव भी अंगारक योग का निर्माण करता है. यह एक ज्योतिष योग है जिसे खराब योगों की श्रेणी में रखा जाता है. अंगारक योग वैदिक ज्योतिष में कई तर्ह की चुनौतियों को दर्शाता है. यदि राहु-मंगल के साथ किसी कुंडली में स्थिति या दृष्टि के कारण संबंध बनाता है, अंगारक योग कहा जाता है. कुण्डली में जिस भी भाव बनता है जिसका अर्थ है कि यदि राहु और मंगल एक ही घर में स्थित हों या राहु और मंगल की परस्पर दृष्टि एक दूसरे पर हो तो कुण्डली में अंगारक योग बनता है.जब राहु और मंगल कुंडली के किसी भी घर में युति करते हैं. यह दोष जन्म कुण्डली में राहु और मंगल की स्थिति खराब होने परखराब और हानिकारक प्रभाव दे सकता है.

ज्योतिष में अंगारक योग प्रभाव 

वैदिक ज्योतिष के अनुसार जब मंगल कुंडली में राहु या केतु में से किसी एक से संबंध बनाता है या एक दूसरे पर दृष्टि डालकर संबंध बनाता है तो उस कुंडली में अंगारक योग का निर्माण होता है. कुंडली में अंगारक योग के अशुभ फल तभी प्राप्त होते हैं जब इस योग को बनाने वाले मंगल, राहु या केतु दोनों ही अशुभ स्थिति में हों. साथ ही यदि कुंडली में मंगल और राहु-केतु शुभ स्थान में हों तो व्यक्ति के जीवन पर ज्यादा नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता है. अंगारक योग, जैसा कि नाम से ही पता चलता है, अग्नि का कारक है.

कुंडली में व्यक्ति क्रोध में फंसा रहता है और निर्णय लेने में सक्षम नहीं होता है. अंगारक योग मुख्य रूप से क्रोध, अग्नि, दुर्घटना, रक्त संबंधी रोग और त्वचा की समस्याओं का कारण बनता है. अंगारक योग की पहचान व्यक्ति के व्यवहार से भी की जा सकती है. इसके प्रभाव से व्यक्ति अत्यधिक क्रोधी हो जाता है. ये कोई निर्णय लेने में असमर्थ होते हैं लेकिन न्यायप्रिय होते हैं. स्वभाव से ये व्यक्ति सहयोगी होते हैं. इस योग के प्रभाव में व्यक्ति सरकारी पद पर प्रशासनिक अधिकारी बनता है. अंगारक योग शुभ और अशुभ दोनों तरह के फल देता है. कुंडली में यह योग बनने के बाद व्यक्ति मेहनत से नाम और पैसा कमाता है. इस योग के प्रभाव में व्यक्ति के जीवन में कई उतार-चढ़ाव आते हैं.

अंगारक योग से जुड़े प्रभाव का असर कुछ भावों पर

अंगारक योग के कारण व्यक्तिका स्वभाव आक्रामक, हिंसक और नकारात्मक हो जाता है और इस योग के प्रभाव में व्यक्तिका अपने भाइयों, मित्रों और अन्य संबंधियों से मतभेद होता है. अंगारक योग होने से धन की कमी रहती है. इसके प्रभाव से व्यक्तिको योग बनाने वाले ग्रहों की दशा में दुर्घटना होने की संभावना बनती है. वह रोगों से पीड़ित रहता है और उसके शत्रु उस पर काला जादू करते हैं. अंगारक योग का बुरा असर बिजनेस और वैवाहिक जीवन पर भी पड़ता है. कुंडली के पहले भाव में राहु-मंगल अंगारक योग होने से पेट की बीमारी और शरीर पर चोट लग सकती है. 

राहु और मंगल प्रथम भाव में

राहु वर्जनाओं को तोड़ने वाला और जोखिम लेने के लिए आगे रहता है. मंगल जुनून और आक्रामकता को दर्शाता है. वैदिक ज्योतिष या लग्न का पहला घर शरीर और आत्म-दृष्टि का प्रतिनिधित्व करता है. तो, प्रथम भाव में राहु और मंगल एक हिंसक स्वभाव, लालच, कभी न मिटने वाली भूख और क्रोध पैदा कर सकता है. 

राहु और मंगल दूसरे भाव में

दूसरा भाव धन, समृद्धि और भाग्य का प्रतिनिधित्व करता है. मंगल दुर्घटनाओं, चोटों, सर्जरी और रक्त को दर्शाता है. इस योग के कारण जातक को आर्थिक नुकसान, सर्जरी और अस्वस्थता का सामना करना पड़ सकता है. मंगल के उग्र स्वभाव के कारण इन्हें अपनी संपत्ति गंवानी पड़ सकती है. 

राहु और मंगल तीसरे घर में

तीसरा भाव भाई-बहनों, आत्म-अभिव्यक्ति और छोटी यात्राओं को दर्शाता है. राहु सभी भौतिक वस्तुओं की लालसा के बारे में है. यह व्यक्ति को धोखा देता है और झूठ बोलता है. यह उन्हें क्रूर और कंजूस भी बनाता है. कार्यक्षेत्र में उनके लिए परेशानी भरा माहौल हो सकता है. इसलिए, वे अक्सर नौकरी बदल सकते हैं. 

राहु और मंगल चतुर्थ भाव में

चौथा भाव या बंधु भाव और मां के साथ संबंध दर्शाता है. जब इस घर में राहु और मंगल एक साथ आते हैं, तो स्त्री पक्ष के साथ सहयोग कम होता ह. रिश्तों में आत्मिक लगाव कम रह सकता है. विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न हो सकती है. मान सम्मान पर गहरा असर पड़ सकता है. परिवार से दूर जाना पड़ सकता है. 

राहु और मंगल पंचम भाव में

राहु मंगल का प्रभाव व्यक्ति को तकनीकी क्षेत्र में आगे ले जा सकता है. व्यक्ति को सतर्क, अधीर और चिंतित बना सकता है. जब यह इस भाव में होता है तो सुख, चंचलता, शिक्षा, आशावाद और भाग्य का प्रतिनिधित्व करता है, तो यह बहुत नुकसान कर सकता है.राहु और मंगल की युति बहुत अधिक ऊर्जा जो नकारात्मक रुप से संतान पक्ष को प्रभावित कर सकती है. उत्पन्न करती है

राहु और मंगल छठे भाव में

छठा भाव ऋण, विरोध, शत्रुता, स्वास्थ्य, बाधाओं और दुर्भाग्य को दर्शाता है. लेकिन यह ग्रह योग यहां कुछ सकारात्मक प्रभाव देता है. व्यक्ति विरोधियों पर विजय प्राप्त कर सकता है.  शत्रुओं के पर व्यक्ति भारी रहता है. अपने दुश्मन को नुकसान पहुँचाने से नहीं हिचकता है. 

राहु और मंगल सातवें भाव में

सातवां भाव प्रेम, संबंध, विवाह और जीवन साथी को दर्शाता है. राहु अहंकारी है और मंगल हिंसक है, इसलिए यदि मंगल और राहु एक साथ इस घर में हों तो वैवाहिक जीवन बहुत पीड़ादायक और दुखी हो सकता है. यह इस घर के लिए बहुत ही विनाशकारी योग है. यह युति जातक के प्रेम जीवन को बर्बाद कर देती है.

राहु और मंगल आठवें घर में

राहु और मंगल का अष्टम भाव में होना जातक के लिए अनुकूलता की कमी का कारण बनता है. आठवां घर दीर्घायु, मृत्यु और अचानक धन लाभ और हानि जैसी चीजों को दर्शाता है. इसे खराब घर के रूप में देखा जाता है. यह युति व्यक्ति को परेशानी और अचानक होने वाली घटनाओं से प्रभवैत करने वाली होती है. 

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शनि की महादशा में सभी ग्रहों की अंतर्दशा का प्रभाव

शनि महादशा में आने वाले अन्य ग्रहों की दशाओं का प्रभाव जीवन में कई तरह के बदलाव देने वाला होता है. शनि ग्रह को ज्योतिषीय क्षेत्र में सबसे शक्तिशाली ग्रहों में से एक माना जाता है, इसका प्रभाव जीवन को बदल देने की क्षमता रखता है. शनि दशा के समय पर व्यक्ति को एक धीमे लेकिन प्रभावी परिणामों से भी गुजरना पड़ता है. शनि महादशा का प्रभाव करियर, स्वास्थ्य, परिवार इत्यादि बातों पर पड़ता है. 

शनि महादशा शनि अंतरदशा प्रभाव

शनि महादशा समय पहली अंतर्दशा दशा शनि की ही होती है. शनि का प्रभाव जातक को कुछ स्थिर बनाता है. शनि उच्च, मित्र और स्वराशि में हो, तब यह अनुकूल परिणाम दे सकता है. शुभ ग्रहों से संयुक्त और दृष्ट होने पर शनि की स्थिति का असर ही व्यक्ति पर पड़ता है. शनि का असर अगर शुभ न हो तो ये दशा का समय गंभीर प्रभाव देता है. जातक को परिवार एवं लोगों की ओर से सहयोग की प्राप्ति हो सकती है. शनि का असर सुख की प्राप्ति को देने वाला होता है. व्यापार में लाभ प्राप्त होता है. यदि शनि अशुभ हो और शनि नीच या शत्रु राशि में हो और पाप ग्रहों से दृष्ट या दृष्ट हो तो व्यक्ति को शनि की महादशा और शनि की अंतर्दशा में असफलता अधिक प्रभवित कर सकती है. 

शनि महादशा में बुध अंतर्दशा प्रभाव 

शनि महादशा में बुध अंतर्दशा का आगमन सकारात्मक रुप से अपना असर डालने वाला होता है. इन दोनों दशाओं के मध्य का रिश्ता एक अच्छे संबंध के रुप में होने के कारण ही ये समय नई चीजों की प्राप्ति के लिए बेहद अनुकूल होता है. इस समय के दौरान अपने रिश्तों के साथ समय बिता पाता है व्यक्ति, नई कार्यों में प्रगति के अवसर भी देखने को मिलते हैं. शनि और बुध की आपसी मित्रता के कारण इस अवधि की शुरुआत आपके लिए अच्छी रहने की संभावना होती है. व्यक्ति अपने कार्यों को करने में आशावादी होता है. वह अपने आस पास के लोगों के साथ मिलकर नई चीजों की शुरुआत को लेकर भी उत्साहित होता है. 

शनि महादशा में केतु अंतर्दशा प्रभाव 

शनि महादशा में केतु अंतर्दशा का समय आध्यात्मिक एवं मनोवैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होता है. इस समय के दौरान व्यक्ति उन अनुभवों से गुजरता है जिसको लेकर वह अधिक विचारशील भी होता है. यदि शनि और केतु आपकी कुंडली में अपनी स्थिति के अनुसार एक अच्छा संबंध साझा करते हैं, तो इस दौरान करियर के संबंध में बेहतर मौके मिल सकते हैं. कुछ वरिष्ठ लोगों एवं ज्ञानवान लोगों का संपर्क भी अधिक रहता है. इस समय पर व्यक्ति उपदेशात्मक स्थिति को भी देख पाता है. वह अपनी योजनाओं एवं निर्णयों को लेकर कई बार आशंकित होता है किंतु उसकी गहरी दृढता उसे इसमे सफलता भी दिलाती है. नर्वस सिस्टम से संबंधित विकार परेशानी दे सकते हैं. 

शनि महादशा में शुक्र की अंतर्दशा प्रभाव 

शनि महादशा में शुक्र की अंतर्दशा का असर अनुकूल माना गया है. इन दोनों ग्रहों का संबंध यदि कुंडली में अनुकूल रुप से पड़ता है तो यह भौतिक इच्छाओं के पूर्ण होने का तथा उपलब्धियों को पाने का समय भी होता है. इस समय परिवार एवं रिश्तों की ओर व्यक्ति का ध्यान अधिक रह सकता है. अपने लोगों के साथ मिलकर वह कुछ यात्राएं भी कर सकता है. यदि इन दशा में किसी कारण से अनुकूलता की कमी देखने को मिलती है तब यह समय कुछ घाटे और अधिक प्रयासों के लिए भी अपना असर दिखाने वाला होता है. शनि और शुक्र की मित्रता को देखते हुए दूसरों के साथ संबंध बेहतर करने और नए मित्रों को पाने का अच्छा समय हो सकता है. 

शनि महादशा में सूर्य अंतर्दशा प्रभाव 

शनि महादशा में सूर्य अंतर्दशा का असर मिलेजुले परिणामों को अधिक दिखाता है. यह दोनों ग्रहों के मध्य का संबंध बहुत अच्छा न होने के कारण यह दशा समय अनिश्चितता लेकर आ सकता है. कुंडली में शनि अच्छी स्थिति में है तो उत्तरार्ध आपके जीवन में नए अवसर मिल सकते हैं. इस समय वरिष्ठ एवं उच्च अधिकारियों के साथ वैचारिक मतभेद भी अधिक बढ़ सकते हैं.  अवसरों का वास्तविक लाभ उठाने के लिए अविश्वसनीय रूप से कड़ी मेहनत करनी होगी. कुंडली में दोनों ग्रह प्रतिकूल रूप से स्थित है, तो इस अवधि का आप पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा जैसे नौकरी छूटना, करियर संबंधी समस्याएं, तनाव, चिंता, स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं, वित्तीय परेशानी, देरी आदि.

शनि महादशा में चंद्र अंतर्दशा का प्रभाव 

शनि महादशा में चंद्र अंतर्दशा का आगमन मानसिक एवं भावनात्मक बदलाव का समय अधिक होता है. इस दौरन पर व्यक्ति अपने आप को एक अनजाने डर एवं व्यर्थ की चिंताओं से प्रभावित देख सकता है. इस समय सफलता के लिए संघर्ष लगातार बना रहता है. व्यक्ति अपने आस पास के लोगों के साथ बेहतर गठजोड़ नहीं बना पाता है. उसके मन में कई तरह की चिंताएं घर करे हुए होती हैं. उच्च स्तर की अनिश्चितताओं के साथ यह समय कठिन अवधि को दिखाने वाला होता है. 

शनि की महादशा में मंगल की अंतर्दशा

शनि की महादशा में मंगल की अन्तर्दशा काफी महत्वपुर्ण होती है. इस समय के दौरान मिलेजुले प्रभाव देखने को मिलते हैं. एक दूसरे के साथ मित्र भाव की कमी का प्रभाव इस दशा में अधिक देखने को मिलता है. एक वर्ष, एक माह और नौ दिनों का ये दशा अवधि समय कार्यक्षेत्र में परिश्रम की अधिकता देने वाला होता है. आपसी मतभेद की स्थिति अधिक रह सकती है. अपनों के साथ विरोधाभास परेशान कर सकता है. इस समय के दौरान व्यक्ति कुछ अधिक यात्राओं को कर सकता है. 

शनि महादशा में राहु अंतर्दशा का प्रभाव 

शनि महादशा में राहु अंतर्दशा का समय कुछ मिलेजुले से प्रभाव दिखाता है. यह आसान तो नहीं होता है लेकिन प्रयासों के द्वारा अनुकूल परिणामों को पाने के लिए बेहतर होता है. यह समय व्यक्ति को गलत चीजों के द्वारा काम करने के लिए उकसाने वाले समय के रुप में भी देखा जा सकता है. स्वभाव में बेचैनी और विद्रोह की स्थिति भी अधिक देखने को मिल सकती है. अपने जीवन में अधिकांश फैसलों को लेकर वह इस दौरान अधिक भ्रम की स्थिति को पाता है. स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से परेशानी अधिक हो सकती है. संक्रमण इत्यादि का खतरा भी बना रह सकता है. 

शनि महादशा में बृहस्पति अंतर्दशा का प्रभाव 

शनि महादशा में बृहस्पति अंतर्दशा का असर सामान्य रुप से अपना प्रभाव दिखाता है, लेकिन ये समय नवीन संभावनाओं की ओर भी इशारा करता है. इस समय व्यक्ति को जीवन के आने वाले भविष्य की चिंताओं एवं उसके लिए तैयारी करते हुए देखा जा सकता है. सामाजिक रुप से व्यक्ति अधिक व्यस्त होता है. अपने कार्यक्षेत्र में उसे नए लोगों का सहयोग भि मिलता है. आर्थिक रुप से खर्चों की अधिकता का समय भी होता है. इस समय के दौरान व्यक्ति नई चीजों की ओर रुझान पाता है. 

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कुंडली के प्रत्येक 12 भावों में भौम मंगल का प्रभाव

मंगल ग्रह को आक्रामक, क्रियाशीलता एवं शक्ति से संबंधित होता है. मंगल ग्रह साहस, नेतृत्व और प्रभुत्व से जुड़ा है जो मुख्य रूप से हिंसा, आग से होने वाली सभी तबाही का प्रतिनिधित्व करता है. मंगल क्रोध, वीरता और शक्ति है जो एक सैनिक, पुलिसकर्मी या एथलीट का प्रतीक करती है. मंगल ग्रह से प्रभावित व्यक्ति प्रतिस्पर्धा से प्यार करते हैं, वे चुनौतियों को देखना चाहते हैं. मंगल जन्म कुंडली के प्रत्येक भाव में अलग – अलग तरह के प्रभाव दिखाता है. 

मंगल का प्रथम भाव में प्रभाव         

पहला घर आपकी शारीरिक बनावट, आपका व्यक्तित्व है. जब मंगल इस भाव में होता है, तो यह बताता है कि व्यक्तित्व अत्यधिक ऊर्जावान और गतिशील है. दृढ़ इच्छा भी अच्छी होती है. स्वतंत्रता के लिए आगे रहते हैं. स्वभाव से काफी सीधे होते हैं. आक्रामक और जोशीला होता है. प्रथम भाव का आधिपत्य चेहरे और सिर पर भी होता है, मंगल के कारण चेहरे पर कटने या जलने के निशान होने की संभावना होती है. इसलिए आमतौर पर उन निशानों के कारण उस व्यक्ति को पहचानना आसान होता है.

मंगल का दूसरे भाव पर प्रभाव 

शारीरिक रूप से मजबूत और साहसी हो सकता है. आवेगी, तेज-तर्रार होगा. व्यक्ति  एथलेटिक हो सकता है और विभिन्न खेलों में शामिल हो सकता है, धीरज, ध्यान और धैर्य को बनाए रखने पर ही व्यक्ति सफल होता है. मंगल अहंकार, आक्रामकता, अति आत्मविश्वास देने वाला होता है. चीजों में संतुलन बनाए रखना सीखना होगा. व्यक्ति आदेशों का पालन करने की अपेक्षा कर सकता है और उसे खुद का मालिक बनना पसंद होता है. व्यक्ति को आक्रामक भाषा या तेज भाषा शैली प्राप्त होती है. मंगल व्यक्ति को जोखिम के प्रति प्रवृत्त बनाता है,  वह सट्टेबाजी पर कमाई कर सकता है. अपनी बचत को बहुत जल्दी और लापरवाही से खर्च कर सकता है.

तीसरे भाव में मंगल का प्रभाव 

तीसरे घर में मंगल का होना व्यक्ति को उत्साहित बनाता है. तीसरे घर में मंगल का होना व्यक्ति को साहसी, निर्णायक, मजबूत, उद्देश्यपूर्ण और जोखिम भरा बनाता है. व्यक्ति अधिकाम्श समय  जल्दबाजी से काम करता है. जीवन में कई तरह के और छोटे परिवर्तन हो सकते हैं, छोटे भाई-बंधुओं के साथ प्रभाव या प्रतिद्वंद्विता अधिक रह सकती है, मंगल के स्वास्थ्य के आधार पर या तो व्यक्ति अपने छोटे भाई बहनों का रक्षक होगा, या उनके बीच प्रभुत्व के लिए संघर्ष होगा. अपनी सारी इच्छाशक्ति और ऊर्जा को सही दिशा में निर्देशित करना और अच्छे के लिए इसका उपयोग करना महत्वपूर्ण होता है.

मंगल का चौथे भाव में प्रभाव 

मंगल का चतुर्थ भाव में होना आक्रामकता, अहंकार के मुद्दों और प्रभुत्व के कारण पारिवारिक जीवन में संघर्ष को उत्पन्न करने वाला होता है. घर की चारदीवारी के भीतर लगातार तनाव और जुनून बना रह सकता है. माता का स्वभाव दबंग हो सकता है वह एक मजबूत और साहसी महिला हो सकती है. मंगल का असर जीवन को लगातार संघर्ष में लगे रहने के लिए प्रवृत्त करने वाला होता है. मंगल के असर से बचने के लिए सदस्यों के साथ मधुर संबंध स्थापित करने के लिए धैर्य का पालन चाहिए. व्यक्ति अक्सर अपना घर छोड़ कर कहीं दूर निवास कर सकता है.  निर्माण में लगे हो सकते हैं, अचल संपत्ति के साथ काम कर सकते हैं.

मंगल का पांचवें भाव में प्रभाव 

मंगल का पंचम भाव में होना व्यक्ति को परिश्रमी और लगनशील बनाता है. व्यक्ति का विपरीत लिंग के प्रति झुकाव बढ़ता है. ऐसे व्यक्ति के लिए अपनी ऊर्जा को नियंत्रित करना कठिन होता है. पंचम भाव एक निवेश का भी प्रतिनिधित्व करता है, और जब मंगल वहां होता है तो व्यक्ति या तो सट्टेबाज, शेयर मार्किट जैसे कामों से भी जुड़ सकता है. संतान से संबंधी परेशानी हो सकती है.

मंगल का छठे भाव में प्रभाव 

मंगल के छठे भाव में होने पर जातक अधिक सफल और उद्यमशील बनता है. किसी काम में शामिल होकर वह अपनी बेहतर क्षमता को दिखाने में सक्षम होता है. व्यक्ति के प्रतिस्पर्धी, दुश्मन अधिक हो सकते हैं. कई बार अपने लिए समस्याएँ खड़ी कर सकता है, लेकिन सफलतापूर्वक इसका सामना भी कर सकता है. अपने आस पास के लोगों के साथ उसका संबंध मिलाजुला होता है. रिश्तों निभाना आसान नहीं होता है, सब कुछ दूर कर सकता है क्योंकि उसका मंगल ग्रह पर गहरा प्रभाव है इसलिए जरूरी है कि मंगल ग्रह की ऊर्जा का उपयोग सेवा, सुरक्षा के लिए, कमजोरों की मदद करने के लिए किया जाए ऎसा करना बेहतर परिणाम दिला सकता है मंगल के प्रभावित होने पर रक्त संबंधी रोग हो सकते हैं.

मंगल का सातवें भाव में प्रभाव 

मंगल का सातवें भाव में होना व्यक्ति को मांगलिक बनाता है. एक मजबूत कुजा दोष का निर्माण होता है. एक व्यक्ति अपने पार्ट्नर के साथ आगे रहने के लिए और प्रधानता के लिए प्रतिस्पर्धा करता है. रिश्ते में बहुत अधिक भावुक और आत्म-केंद्रित हो सकता है. एक ऐसे साथी की भी तलाश भी करता है जो समान, आत्मविश्वासी, मजबूत, सक्रिय होता हो. मंगल का असर व्यक्ति को एक भावुक, मनमौजी रिश्ता देता है, लेकिन अक्सर विवाह भी अधिक देने वाला होता है. यह भी हो सकता है कि कोई व्यक्ति जल्दी से शादी करने का फैसला करना चाहे. अपनी यौन ऊर्जा को व्यथ में बर्बाद किए बिना वफादार बने रहने की जरूरत है.

मंगल का आठवें भाव में प्रभाव 

आठवां घर धन, आकस्मिक घटनाओं, दुर्घटनाओं, का स्थान है. जब मंगल इस भाव में होता है, तो यह व्यक्ति के जीवन में कुछ दुर्घटनाओं या चोटों का कारण बन सकता है. कटना, जलना या कार दुर्घटना जैसी स्थिति से प्रभावित हो सकते हैं. यहां मंगल का प्रभाव होने से व्यक्ति ससुराल वालों के साथ बहस में पड़ सकता है. इस भाव में मंगल की स्थिति जीवनसाथी के साथ संबंधों में खटास भी ला सकती है. यह स्थान विवाह के बाद के लाभ, गुप्त साधनों से लाभ को भी दर्शाता है. 

मंगल का नवम भाव में प्रभाव 

नवम भाव  उच्च शिक्षा, आध्यात्मिकता, तीर्थयात्रा,  पिता का घर है, इसे भाग्य का स्थान भी कहा जाता है. नवम भाव में मंगल के प्रभाव वाला व्यक्ति यात्रा और रोमांच का शौकीन हो सकता है.  बेवजह जोखिम उठाने का खतरा भी बना रखता है. कानूनी मामलों में बहुत सावधान रहना होता है. नौवें घर में मंगल का प्रभाव व्यक्ति को अपने शिक्षकों और विशेष रूप से पिता के साथ बहुत असहमति पैदा कर सकता है क्योंकि यहां मंगल का प्रभाव होने से व्यक्ति दूसरों का हस्तक्षेप ओर नियंत्रण पसंद नहीं करता है. 

दसवें भाव में मंगल का प्रभाव 

दशम भाव व्यावसाय, कर्म, व्यक्ति का स्वभाव, कार्य क्षेत्र में प्रतिष्ठा, कमजोरियों, महत्वाकांक्षाओं आदि का प्रतिनिधित्व करता है जब मंगल इस भाव में आता है, तो व्यक्ति को बेहतर कार्यकुशलता प्रदान करने वाला होता है. व्यक्ति अच्छी मात्रा में धन अर्जित करने के लिए उत्साही होता है. व्यक्ति बहुत मेहनती होता है और इनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य अपने काम में ऊंचाइयों को छूना होता है. व्यक्ति भीड़ का नेतृत्व करना पसंद करता है. व्यक्ति को बहुत मेहनत करनी पड़ती है और बिना कमाए उसे कुछ नहीं मिलता है. व्यक्ति के दबंग स्वभाव के कारण उसके अधिकांश सहयोगी और अधीनस्थ उससे दूरी भी रख सकते हैं. 

मंगल का ग्यारहवें भाव में प्रभाव 

एकादश भाव सभी प्रकार के धन, लाभ का प्रतिनिधित्व करता है. यह आशाओं और इच्छाओं के बारे में सबसे मजबूत स्थान होता है, मंगल के यहां होने पर व्यक्ति पैसा बनाने में बहुत प्रतिस्पर्धी होता है. जब प्रतिस्पर्धा की बात आती है, तो मंगल के प्रभाव के कारण व्यक्ति अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए चरम स्तर पर जा कर काम करता है. नकारात्मक पक्ष के रुप में व्यक्ति हमेशा पैसा बनाने के बारे में चिंतित रह सकता है और इसके लिए वह अवैध तरीके से जाने में संकोच नहीं कर पाए. 

मंगल का बारहवें भाव में प्रभाव 

वैदिक ज्योतिष में बारहवां भाव खर्चों, अलगाव, एकांत, विदेशी भूमि, विदेश यात्रा, अस्पताल, जेल, शरण और नुकसान का स्थान है. मंगल जब यहां होता है तो व्यक्ति अपनी उर्जा को उचित रुप से कहां लगाए इस को लेकर विरोधाभास में रह सकता है. मंगल के कारण परेशान करने वाली स्थिति हो सकती है कि व्यक्ति पर झूठे आरोप लगाए सकते हैं. इसके परिणामस्वरूप कारावास भी हो सकता है. इस घर में मंगल क्रोध और आक्रामकता को बढ़ावा देने का काम करता है. विदेश से लाभ के मौके मिल सकते हैं. 

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बृहस्पति महादशा में अन्य ग्रहों की अंतर्दशा प्रभाव

ज्योतिष शास्त्र में बृहस्पति महादशा का समय एक शुभ दशा के रुप में देखा जाता है.  बृहस्पति महादशा की अवधि सोलह वर्ष की अवधि तक रहती है.बृहस्पति को शुभ ग्रह माना गया है, इस दशा के समय पर जातक के जीवन में कई बड़े बदलाव भी देखने को मिल सकते हैं. जन्म कुंडली में मौजूद बृहस्पति की स्थिति के अनुसार ग्रह की अवधि विभिन्न कारकों के आधार पर जीवन पर अलग और भिन्न प्रभाव छोड़ती है.

बृहस्पति में बृहस्पति अंतर्दशा का प्रभाव 

बृहस्पति की महादशा में बृहस्पति अंतरदशा का असर अनुकूलता एवं चेंज का समय होता है. यह जीवन में सबसे अधिक अच्छी महादशा में से एक है. महादशा शुभ फल और प्रभाव लेकर आती है. बृहस्पति में बृहस्पति दशा का समय सफलता, धन, शक्ति और आध्यात्मिक विकास का समय होता है. बृहस्पति महादशा के नकारात्मक प्रभाव भी हो सकते हैं और यह इस बात पर निर्भर करेगा कि बृहस्पति आपकी कुंडली में कैसे स्थित है. यह दशा वित्त, स्वास्थ्य, नौकरी आदि पर भी प्रभाव डालने वाली होती है. 

बृहस्पति की महादशा में बुध की अंतर्दशा

बृहस्पति की महादशा में बुध की अन्तर्दशा का समय बौद्धिकता के सतह साथ नवीनता का भी होता है. अगर कुंडली में दोनों की स्थिति उचित है तो अनुकूल परिणाम मिलते हैं लेकिन यह शुभ स्थिति में न हों तो परेशानी झेलनी पड़ सकती है. व्यक्ति को इस समय ज्ञानी एवं गुरुजनों की संगत भी मिलती है. इस समय के दोरान स्वास्थ्य संबंधी बातों पर ध्यान देने की आवश्यकता होती है.  व्यवसाय में सफलता और उन्नति मिल सकती है या इन कार्यों में गतिविधियां तेज होने लगती हैं. 

बृहस्पति की महादशा में केतु की अंतर्दशा

बृहस्पति महादशा में केतु अंतर्दशा का समय कुछ मिले-जुले असर दिखाने वाला होता है. यह समय आध्यात्मिक क्षेत्रों में कार्यों से जोड़ सकता है. धार्मिक यात्राओं में जाने का मौका मिल सकता है. जातक आत्मज्ञान से संबंधित प्रश्नों पर खोज करने में रुचि रख सकता है. इस अवधि के दौरान, केतु करियर के मामलों में बहुत सारी समस्याएं और भ्रम पैदा कर सकता है. कुछ मामलों में व्यक्ति गलत कार्यों की ओर भी बढ़ सकता है. स्वास्थ्य का ध्यान विशेष रुप से रखने की आवश्यकता होती है. 

बृहस्पति की महादशा में शुक्र की अंतर्दशा

यह दशा बहुत सारे बदलाव दिखाने वाली होती है. इस समय पर भौतिकता एवं आध्यात्मिकता को लेकर खिंचतान कि स्थ्ति अधिक देखने को मिल सकती है. काम को लेकर कोशिशें बनी रहती है. ईश्वर के प्रति विश्वास और आध्यात्मिक चेतना को बल मिलता है. इस अवधि के दौरान धन लाभ के अवसर भी प्राप्त होते हैं. शुक्र का प्रभाव भौतिक सुख-सुविधाएं देता है साथ ही इस समय के दौरान भ्रमण के भी मौके मिल सकते हैं. दांपत्य जीवन में स्नेह और प्यार का आगमन होता है तथा नवीन रिश्तों का आरंभ भी होता है. यह दोनों ग्रह शुभ होते हैं और धन और भाग्य को दर्शाते हैं. बृहस्पति महादशा में शुक्र अंतर्दशा की यह अवधि समृद्धि और वित्तीय स्थिरता प्रदान करने वाली होती है.

बृहस्पति की महादशा में सूर्य की अंतर्दशा

गुरु की महादशा में सूर्य अंतर्दशा का समय आर्थिक स्थिति पर सकारात्मक प्रभाव डालने वाला होता है. पदप्राप्ति के अवसर मिलते हैं धन में भी वृद्धि होती है. ग्रहों का प्रभाव व्यक्ति को बहुत नाम और प्रसिद्धि दिलाने वाला होता है. ये दोनों ग्रह शक्तिशाली होते हैं इसलिए व्यावसायिक प्रयासों में सफलता का समय होता है. पदोन्नति के भी योग इस समय पर मिल सकते हैं. बृहस्पति महादशा में सूर्य अंतर्दशा की इस अवधि के दौरान ज्ञान में वृद्धि का समय होता है. इस दशा में परिवार और रिश्तों में सुख भी मिलता है. यदि अशुभ उपस्थिति हो, तो शरीर में दर्द, तंत्रिका संबंधी विकार, सिरदर्द और मन की शांति की कमी से पीड़ित हो सकता है.

बृहस्पति महादशा में चंद्रमा की अंतर्दशा

बृहस्पति महादशा में चंद्रमा की अंतर्दशा का समय व्यक्ति को सकारात्मक प्रभाव दिखाता है. इस अन्तर्दशा में व्यक्ति अपने साथी और बच्चों से सुख प्राप्त कर सकता है. चंद्रमा और गुरु के संबंध के प्रभाव से कारोबार में आय की संभावनाएं प्रबल होती हैं. आध्यात्मिक यात्राएं भी कर सकते हैं. तरल एवं दूध उत्पादों के प्रति आकर्षण बढ़ता है. बृहस्पति महादशा में चंद्र अंतर्दशा की यह अवधि करियर के मोर्चे पर प्रगति दिलाने वाली होती है.भौतिक सुख-सुविधाओं, विलासिता और जीवन के सुखों का आनंद मिल सकता है. जीवनसाथी और बच्चों के साथ भी संबंध मधुर बनते हैं. 

बृहस्पति की महादशा में मंगल की अंतर्दशा

गुरु की महादशा में मंगल की अंतर्दशा का समय व्यक्ति को जोश एवं नई चिजों से जुड़ने का समय होता है. यह अंतर्दशा ज्ञान और सीखने की क्षमता को बढ़ावा देने वाली हो सकती है. भूमी स्रोतों से लाभ मिल सकता है. पारिवारिक मामलों और वैवाहिक जीवन में मिलेजुले परिणाम मिलते हैं. भाई-बहनों से भी संबंध सुधरते स्वभाव से अधिक क्रोध एवं थोड़ा हावी होने का भाव अधिक देखने को मिलता है. 

बृहस्पति की महादशा में राहु की अंतरदशा

बृहस्पति की महादशा में राहु की अंतरदशा का समय बदलाव का होता है. यह दशा जीवन में बहुत भ्रम और समस्याएं लेकर आ सकती है. यह व्यक्ति को स्वभाव से अहंकारी और दबंग बना सकती है. व्यक्ति अनावश्यक तर्क-वितर्क और लड़ाई-झगड़ों में लिप्त हो सकता है. बृहस्पति महादशा में राहु अंतरदशा के दौरान पारिवारिक रिश्ते भी प्रभावित होने लगते हैं. विचारों पर अधिक दबाव पड़ता है. स्वास्थ्य संबंधी परेशानी भी होती है. आध्यात्मिक क्षेत्र में नई रिसर्च का समय होता है. 

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