केतु महादशा का सभी लग्नों पर प्रभाव

केतु को छाया ग्रह के रुप में जाना जाता है.  वैदिक ज्योतिष के अनुसार, केतु दक्षिण नोड है जिसे चंद्रमा के कटान बिंदू के रुप में भी जानते हैं. राहु अपने रहस्यमय और आक्रामक गुणों के लिए जाना जाता है. इसमें छिपे हुए गुण भी होते हैं जिनका जीवन पर गहरा असर पड़ता है. केतु की महादशा का काल क्रम जब किसी पर पड़ता है तो उस समय के दोरान व्यक्ति कई तरह के संघर्षों से हो कर गुजरता है ओर कई तरह की परिस्थितियों को झेलता है. केतु अलग-अलग लग्न के साथ अलग-अलग तरह से कार्य करता है. अपनी विशेष शक्तियों से व्यक्ति की विचारधारा को प्रभावित करता है. 

केतु को भी खराब ग्रह माना जाता है, लेकिन ज्योतिष में कोई ग्रह अच्छा या बुरा नहीं होता है. यह बहुत सारे कारकों पर निर्भर करता है जो ग्रह और उनकी महादशा के प्रभाव को निर्धारित करते हैं. इसलिए अगर आपकी कुंडली में केतु महादशा है तो इसके सकारात्मक या नकारात्मक दोनों प्रभाव हो सकते हैं. केतु एक ऐसा ग्रह है जो वैराग्य, ध्यान, आध्यात्मिकता, आत्मज्ञान, मोक्ष, आत्म-साक्षात्कार आदि का प्रतिनिधित्व करता है. क्योंकि यह शरीर का निचला भाग है, इसका मतलब है कि इसकी कोई आंख नहीं है और यही कारण है कि लोग सब कुछ होते हुए भी असंतुष्ट महसूस करते हैं. केतु महादशा की अवधि 7 वर्ष होती है. इस अवधि के दौरान, व्यक्ति भौतिकवादी दुनिया से अलगाव का अनुभव करता है. वह धन और परिवार में रुचि खो देता है लेकिन यह हर समय सच नहीं हो सकता क्योंकि ज्योतिष में कई अन्य कारक हैं जिनके आधार पर गणना की जाती है. व्यापक स्तर पर, वे सभी लोग जो कुंभ, मेष, कर्क और मकर लग्न में पैदा हुए हैं, उन्हें इस महादशा से लाभ मिल सकता है. 

आइए देखें कि केतु किस लग्न पर कैसे अपना असर डालता है. 

मेष लग्न के लिए केतु महादशा 

केतु की महादशा का प्रभाव मेष लग्न वालों को मिलेजुले रुप में देखने को मिल सकता है. इस राशि वालों को इस दशा के दोरान उत्साह एवं जुनून की प्राप्ति भी होती है. ऊर्जा से भरपुर रह सकते हैं. व्यक्ति लापरवाह होगा, कुछ अविश्वासी और असामाजिक हो सकते हैं, लेकिन बुद्धिमान अच्छा रहेगा. 

वृष लग्न के लिए केतु महादशा

वृष राशि वालों के लिए केतु महादशा का समय कुछ सकारात्मक हो सकता है. शुक्र ग्रह की मित्रता होने के कारण यह समय पिता के लिए लाभकारी हो सकता है. जीवनसाथी के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है. केतु  ग्रह शुक्र के साथ अनुकूल दिखाई देता है लेकिन सफलता के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है. केतु सफलता की गारंटी देता है लेकिन देरी की उम्मीद करता है. भले ही अच्छी आय हो लेकिन व्यय अधिक रहते हैं. 

मिथुन लग्न के लिए केतु महादशा 

मिथुन लग्न के लिए केतु महादशा बौद्धिक एवं मन को प्रभावित करने वाली होती है. पढ़ने में व्यक्ति आगे होगा लेकिन समझ में कमी रह सकती है. गुणों का अनुभव करेगा लेकिन फिर भी बेचैन और अशांत रह सकता है. यात्राओं की अधिकता मिल सकती है. केतु मनोरंजन और मीडिया के रोजगार के क्षेत्र में लाभ प्रदान करने में सहायक हो सकता है. कुछ क्षेत्रों में प्रसिद्ध और धनवान बना सकता है. मिथुन राशि का दोहरा स्वभाव केतु को कई विषयों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है. केतु कई पेचीदगियां पैदा कर मन को भटका भी सकता है.

कर्क लग्न के लिए केतु महादशा 

कर्क लग्न के लिए केतु महा दशा का समय नई चीजों के आकर्षण और नवीनता की खोज में होगा. चंद्रमा की केतु से शत्रुता की स्थिति मानसिक बेचैनी का कारण बनती है व्यक्ति को जीवन में कठिनाइयों और अच्छे परिणामों की कमी का सामना करना पड़ सकता है. व्यक्ति अवसाद, तनाव और हृदय की समस्याओं का अनुभव कर सकता है. सुख-शांति में कमी बनी रह सकती है. 

सिंह लग्न के लिए केतु महादशा 

सिंह लग्न के लिए केतु महादशा का प्रभाव व्यक्ति को शिक्षा के मामले में कुछ प्रतिकूल स्थिति को दिखा सकता है. केतु की उपस्थिति से स्वास्थ्य संबंधी परेशानी भी हो सकती है. हृदय, रक्तचाप और अस्थमा से संबंधित रोग चिंता का कारण हो सकते हैं. सिंह के साथ केतु का शत्रु भाव होने से कई तरह की व्यर्थ बातें चिंता बढ़ा सकती हैं. केतु महादशा के दौरान गर्भावस्था में देरी या गर्भपात का सामना कर सकता  

कन्या लग्न के लिए केतु महादशा 

कन्या लग्न के लिए केतु महादशा का प्रभाव बौद्धिक होता है. व्यक्ति अधिक सामाजिक भी दिखाई देता है. आध्यात्मिक रुप से रुचि में वृद्धि देखने को मिलती है. कन्या में केतु अच्छे और अनुकूल परिणाम प्रदान करने में सहायक भी होता है. जीवन सहज और सुखी होता है. पर्याप्त आय होगी और परिश्रम द्वारा भाग्य निर्मित होता है.

तुला लग्न के लिए केतु महादशा

तुला लग्न के लिए केतु महादशा कुछ कमजोर रह सकती है. जीवन में इस दशा के दौरान कुछ प्रतिकूल स्थिति का भी सामना करना पड़ता है. सप्तम भाव में केतु की उपस्थिति वैवाहिक जीवन और साझेदारी में टकराव की संभावना को बढ़ाती है. इसके अलावा मानसिक रुप से बेचैनी की अधिकता रहती है. इच्छाओं का पूर्ण हो पाना मुश्किल होता है. विवाहेतर संबंधों का प्रभाव भी जीवन पर पड़ सकता है. 

वृश्चिक लग्न के लिए केतु महादशा 

वृश्चिक लग्न के लिए केतु महादशा का समय मिलेजुले परिणाम देता है. सेहत के मुद्दे इस दशा में अधिक परेशान कर सकते हैं. इस समय क्रोध की अधिकता एवं स्वभाव में कठोरता देखने को मिलती है. व्यक्ति को गुप्त विद्याओं की जानकारी भी इस दशा के दोरान हो सकती है. सेहत के लिहाज से आंतों की खराबी, हर्निया या कुछ जननांग संबंधी स्वास्थ्य समस्याएं उभर सकती हैं. जीवन साथी को लेकर अलगाव एवं विवाद उभर सकता है. सामाजिक रुप से व्यक्ति अपना स्थान पाता है. 

धनु लग्न के लिए केतु महादशा

धनु लग्न के लिए केतु महा दशा व्यक्ति को आध्य्तामिक रुप से बदलाव देने वाली होती है. आर्थिक क्षेत्र में सहायता मिलती है. नवीन लोगों का संपर्क भी बढ़ता है. आर्थिक रूप से सुदृढ़ और स्थिर होने के मौके मिलते है. लेकिन केतु की उपस्थिति स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा कर सकती है जैसे दुर्घटनाओं, चोटों का शिकार हो सकते हैं. व्यक्ति को धार्मिक स्थलों की यात्रा करने और धार्मिक गतिविधियों में खुद को शामिल करने के पर्याप्त अवसर मिलते हैं. 

मकर लग्न के लिए केतु महादशा

मकर लगन के लिए केतु महादशा का प्रभाव व्यक्ति को गंभीर और कुछ धीमा बना सकता है. इस लग्न के स्वामी शनि की स्थिति भी दशा पर असर डालती है. व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित करती है. यदि जन्म कुंडली में शनि की स्थिति मजबूत है, तो यह सकारात्मक और लाभकारी तरीके से काम कर सकती है. भाग्यशाली और अवसरवादी भी बना सकती है. 

कुंभ लग्न के लिए केतु महादशा 

कुंभ लग्न वालों के लिए केतु महादशा का समय सामान्य रुप से काम करता है. कुछ मामलों में भाग्य का साथ मिल पाता है. आय के कई स्रोत मिल पाते हैं. कई स्थितियों में स्वयं को भाग्यशाली पाता है व्यक्ति. चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों को संभालने में सक्षम होता है. कई बार नकारात्मक पक्ष रुप से व्यक्ति साजिशों में फंस सकता है. 

मीन  लग्न के लिए केतु महादशा 

मीन लग्न के लिए केतु महादशा का समय मिश्रित परिणाम वाला होता है. यहां व्यक्ति को भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही रुपों में फल देखने को मिल सकते हैं. व्यक्ति के कर्मों का प्रभाव भी इस दशा में प्राप्त होता है. मानसिक रुप से व्यक्ति काफी अधिक विचारों में घिरा देखा जा सकता है. स्वास्थ्य के प्रति अधिक सजग रहने की आवश्यकता होती है. 

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सूर्य महादशा में क्या शनि दशा से होती है पीड़ा

सूर्य महादशा जीवन का एक ऎसा समय जो परिश्रम, उत्साह एवं जोश से भरा समय, जब व्यक्ति के भीतर बेहद तीव्र इच्छा शक्ति भी मौजूद होती है. यह समय व्यक्ति को कम समय के लिए मिलता है लेकिन इस समय पर यदि दशा शुभ हो तो इस समय का बेहद उत्तम समय प्राप्त होता है.  इस महादशा को राजा की दशा के रुप में भी  देखा जाता है. लेकिन इस दशा का असर यदि कुंडली में अच्छा होगा तो इसमें सुख वैभव की कमी नहीं रहेगी और विशेष रुप से सरकार का बेहद लाभ मिलेगा पद प्राप्ति होगी लेकिन अगर दशा कमजोर होगी तो उसका परिणाम व्यक्ति को अधिक भदौड़ एवं मेहनत की अधिकता देगा साथ में शरीर पर कई तरह के प्रभाव भी देखने को मिलेंगे जो रोग को प्रभावित करने वाले होंगे. 

सूर्य महादशा में शनि दशा का प्रभाव बेहद महत्वपूर्ण होता है और इसके कई दूरगामी परिणाम झेलने पड़ते हैं. शनि का गहरा असर व्यक्ति अपने जीवन के अनेक पहलूओं पर देख सकता है. इस समय के दौरान व्यक्ति कई बार अपने आप ओर दूसरों के साथ ज्यादा तालमेल नहीं बिठ अपाता है. सूर्य की ऊर्जा एवं उसके गुणों का प्रभाव भी व्यक्ति को अधिक देखने को मिलता है. कई बार वह जीवन में उन चीजों को भी इग्नोर कर देता है जो उसके जीवन के लिए बेहद जरुरी होती हैं. अब अगर इस समय शनि भी दशा में शामिल हो जाए तो उसके कारण व्यक्ति कई बार परेशानियों में उलझता सा चला जाता है. 

सूर्य महादशा में शनि अंतर्दशा का सामाजिक एवं व्यक्तिगत प्रभाव

सूर्य महादशा में व्यक्ति को सामाजिक क्षेत्र में काफी कुछ प्रभाव देखने को मिलते हैं. व्यक्ति अपने आस पास के लोगों के साथ उसका गहरा रिश्ता जुड़ता है वही कुछ मामलों में व्यक्ति अपने आप को प्रतिस्पर्धा में अच्छे स्थान पर देखता है. शनि कड़ी मेहनत, दीर्घायु, कर्म, अनुशासन, सीमा और महत्वाकांक्षा, देरी और धैर्य से जुड़ा होने के कारण ये सभी असर जीवन पर डालता है. 

सूर्य महादशा में जब शनि अंतरदशा का समय आता है तो अब समय होता चीजों के सुधार का. पुरानी गलतियों को न दोहराने का ओर बेहतर विकल्प की खोज का.  शनि का आगमन होने के साथ व्यक्ति सामाजिक रुप में कार्यकुशल बनता है. लोगों के साथ मेल जोल तो बढ़ता है लेकिन साथ ही मतभेद भी इस समय पर अधिक बढ़े हुए दिखाई देते हैं. 

यह उस अवधि में सबसे अधिक अवसर लाने के लिए जाता है. शनि सभी ग्रहों का न्यायाधीश है और अन्याय को बर्दाश्त नहीं करता है और सूर्य अपने सिद्धांतों को स्थापित करने के लिए व्यक्ति को ऊर्जा देता है. सूर्य में शनि दशा की पूरी अवधि के दौरान कैरियर और व्यक्तिगत जीवन में बहुत सारी चुनौतियां का समय आता है. 

परिवार एवं संबंधों पर इस दशा का प्रभाव 

यह अवधि आपके जीवनसाथी के साथ आपके संबंध को कुछ मायनों में बदल कर रख सकती है. बच्चे और परिवार की जिम्मेदारियों के चलते अन्य कामों में अटकाव झेलना पड़ता है. करियर में कई बाधाएं ला सकते हैं. आप अपने परिवार और भाई -बहनों के साथ कुछ मुद्दों का सामना कर सकते हैं. अपनों के साथ विवादों, ईर्ष्या से भी पीड़ित हो सकते हैं. गुस्से और आक्रामकता के कारण अपने दोस्तों और परिवार के साथ रिश्ते में तनाव की संभावना बढ़ जाती है. यह दशा यदि अशुभ प्रभाव में है तो जीवन में कई उतार -चढ़ाव ला सकती है. .

समाज में एक अच्छी छवि अर्जित कर सकते हैं लेकिन परिवार में बहुत अधिक सहयोग न मिल पाए. सूर्य के साथ शनि का संबंध नवम भाव से जुड़ रहा हो तो उसके कारण धर्मार्थ से जुड़े कार्य इस समय पर अधिक कर सकते हैं. कुशलता से सभी बाधाओं और चुनौतियों को संभाल सकते हैं. कुछ पदोन्नति प्राप्त कर सकते हैं इसके अलावा कैरियर और प्रगति के साथ खुद को बेहतर स्थान पर खड़ा पा सकते हैं. इस अवधि के दौरान दान और सामाजिक कार्य में लिप्त हो सकते हैं.

सूर्य में शनि दशा का पाप प्रभावित होना

बाधाएं मिल सकती हैं, और  लक्ष्यों को प्राप्त करने में देरी हो सकती है. अपने पिता के साथ कुछ तर्क और संघर्ष हो सकता है. अधिकार के साथ समस्याएं भी बढ़ती हैं. असुरक्षित महसूस कर सकते हैं. अपने परिवार के सदस्यों से झूठे आरोप प्रत्यारोप झेलने पड़ सकते है,  शत्रु जीवन में बाधाएं ला सकते हैं और नीचे खींचने की कोशिश कर सकते हैं. यह अवधि स्वास्थ्य के लिए कष्ट ला सकती है. मानसिक तनाव. आप सिरदर्द, बुखार और दिल से संबंधित समस्याओं जैसी स्वास्थ्य बीमारियों से पीड़ित हो सकते हैं. यह समय जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है.   व्यक्तिगत और पेशेवर मोर्चे पर समस्याओं के कारण बेचैनी, उदासीनता, मानसिक तनाव और अवसाद का अनुभव कर सकते हैं.व्यक्ति केला और मानसिक रूप से कमजोर महसूस कर सकता है. इस अवधि में आपके दुश्मन भी बढ़ सकते हैं, और वे आपको परेशान करने की कोशिश में तेजी दिखाते है. धन के उतार -चढ़ाव का अनुभव भी कर सकते हैं. 

सूर्य में शनि अंतर्दशा शुभ होने का प्रभाव 

ज्ञान और आध्यात्मिकता से जुड़ाव होता है. नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं, साहस होता है और अपने दुश्मनों के खिलाफ लड़ने की शक्ति होती है. ज्ञान को विस्तार मिलता है. पारिवारिक जीवन में खुशी मिलती है. करियर को सही रास्ते पर पा सकते हैं और आध्यात्मिक गतिविधियों में खुद को शामिल पा सकते हैं. 

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मंगल का आर्द्रा नक्षत्र प्रवेश क्यों होता है विशेष

मंगल जब मिथुन राशि में होता है तब आर्द्रा में जाता है. मंगल का आर्द्रा नक्षत्र में जाना दो शक्तिशाली तत्वों का एक साथ होने का योग बनता है. आर्द्रा नक्षत्र में मौजूद होने के कारण मंगल व्यक्ति को कड़ी मेहनत करके लाभ प्राप्त करने की शक्ति, देता है. आर्द्रा नक्षत्र परिवर्तन और विनाश के लिए खड़ा है और मंगल यहां पर होने से इन गुणों को वृद्धि मिलती है. यह नक्षत्र अवचेतन में छुपी पिछले जीवन की कुछ अपूर्ण इच्छाओं को दर्शाता है. मंगल का होना उन चीजों की पूर्ति के लिए प्रयास को दर्शाता है.

आर्द्रा नक्षत्र राहु द्वारा शासित है, और मंगल के साथ इस का संबंध शत्रुतापूर्ण देखने को मिल सकता है. इसके देवता रुद्र हैं जो  मंगल के साथ सकारात्मक मेल का असर भी दिखाता है. इस नक्षत्र में भगवान रुद्र और शिव की विनाशकारी क्षमता भी होती है. इस नक्षत्र में मंगल का होना  भावनाओं को बढ़ाता है. इसमें मंगल का होना व्यक्ति के स्वभाव में तेजी से होने वाले बदलाव दिखा सकता है.

व्यक्ति या तो बहुत खुश रहेगा या बहुत गुस्से में दिखाई दे सकता है. व्यक्ति को भावनाएं संतुलित करने में मुश्किल हो सकती है. बहुत खोजी और मेहनत करने की प्रवृत्ति भी इनमें होती है. अपने लक्ष्यों पर ध्यान केन्द्रित करते हैं और लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में काम करते हैं. 

आर्द्रा नक्षत्र एक संवेदनशील नक्षत्र है जो संवेदनशीलता और भावना से जुड़ा है. नक्षत्र का प्रभाव व्यक्ति को सत्यवादी, दयालु और मजबूत संचार की कुशलता देता है. 

आर्द्रा नक्षत्र में मंगल का अंशात्मक प्रभाव 

आर्द्रा नक्षत्र मिथुन राशि में 6:40 – 20:00 तक रहता है, यहीं पर मंगल का प्रभाव इस पर पड़ता है. आर्द्रा नक्षत्र का अर्थ है नम या गीलापन, यह कई मायनों में कोमल, स्थिर, मजबूत,  बहुत त्याग करने वाले, व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन जीवन में  बीमारी, भय और क्रोध का शिकार भी अधिक होता है. 

आर्द्रा नक्षत्र में मंगल का होना व्यक्ति को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने जैसा होता है. व्यक्ति अपने काम को परिश्रम से करता चीजों को एक जिम्मेदार तरीके से करता है. लोगों को अपनी बातों एवं कार्यों से मंत्र मुग्ध करने की क्षमता रखता है. व्यक्ति का अंतर्ज्ञान तेज होता है. एक अच्छे मनोवैज्ञानिक या फिर खोज करता के रुप में भी स्थान पाता है. दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ, वह एक सौहार्दपूर्ण तरीके से व्यवहार करने वाला होता है. अवसरों में आगे बढ़ना और लोगों के प्रति कृतज्ञ होने की सक्षमता भी उसमें होती है कई तरह के समाजिक कार्यों में भी शामिल रहता है. 

कार्यक्षेत्र एवं सफलता पर इसका असर 

आर्द्रा नक्षत्र में जब मंगल होता है तो व्यक्ति सामान्य ज्ञान की एक अच्छी समझ होती है. चीजों को प्राप्त करने की क्षमता होती है. उसकी याददाश्त अच्छी होती है. वह दयालु और शांतचित्त भी होता है लेकिन दबाव में विद्रोह के लिए आगे बढ़ता है. कठिनाइयों के समय भी वह अपनी सक्षमता बनाए रख सकता है. वह किसी एक प्रकार के काम से चिपके रहना पसंद नही करता है. एक साथ कई तरह के काम में निपुणता हासिल कर सकता है.  अपने सहकर्मियों की राय का सम्मान करता है, भले ही वे उससे सहमत न हो लेकिन ऊपरी तौर पर उन्हें ये जताता नहीं है.  काम के लिए घर से दूर, या शायद विदेशों में भी बस सकता है. 

पारिवारिक जीवन और स्वास्थ्य 

आर्द्रा नक्षत्र में मंगल का होना व्यक्ति को रिश्तों में उतार-चढ़ाव की स्थिति दिखाने वाला होता है. व्यक्ति अपने रिश्ते को लेकर असुरक्षित महसुस कर सकता है प्रेम में निराशा का भाव मिल सकता है व्यर्थ के मुद्दे परेशान लरने वाले होते हैं. वैवाहिक जीवन में कई परेशानियां आ सकती हैं. व्यक्ति स्वयं के कष्टों को दूसरों के सामने अधिक उजागर नहीं करता है. स्वास्थ्य के लिहाज से कुछ बीमारियों से ग्रसित होने की संभावना रह सकती है. हृदय, रक्त विकार एवं दांत की समस्याओं से सावधान रहने की आवश्यकता होती है. 

आर्द्रा नक्षत्र में मंगल के प्रवेश का नकारात्मक और सकारात्मक प्रभाव

यदि मंगल आर्द्रा नक्षत्र में हो तो धन के लिए अधिक क्रियाशील रह सकता है. व्यवसाय में कुशल होता है, कानूनी मामलों में सफलता को पाता है.  आर्द्रा नक्षत्र में मंगल की उपस्थिति के कारण जातक सज्जन, धन से सुखी, समाज और  प्रतिष्ठित,  कुशल, एवं शास्त्रों का ज्ञाता भी बनाती है. लोग क्रय-विक्रय में तो निपुण होते हैं, व्यापार-व्यवसाय के विशेषज्ञ होते. प्रेम संबंधों की अधिकता देखने को मिल सकती है. 

आर्द्रा नक्षत्र के 1 पद में मंगल 

इस चरण में जातक अच्छा खाने वाला और पीने की चीजों का शौकीन होगा जिसके कारण कई बार ऐसे लोग शराब भी ले आते हैं. जातक बलवान, लड़ाई-झगड़ों में आगे, भाग्यवान, वाहनों का शौकीन आदि होता है. जातक अपने जीवन में एक पथ पर चलने वाला होता है.

आर्द्रा नक्षत्र के 2 पद में मंगल  

इस अवस्था में व्यक्ति दूसरों के धन पर अधिक नजर रख सकता है. कार्यों में कुछ कठोर हो सकता है. व्यर्थ के मुद्दों में वह फंस सकता है. आपसी सहमती की कमी उसके जीवन को परेशान कर सकती है. अभिमान एवं क्रोध के कारण मुश्किल स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है. दूसरों में दोष देखता है, दूसरों को परेशान करता है, गुप्त रोगों से पीड़ित हो सकता है. प्रेम संबंधों में असंतुष्ट रहता है, विदेशी भूमी पर अच्छा लाभ पाता है. 

आर्द्रा नक्षत्र के 3 पद में मंगल का  

इस अवस्था में व्यक्ति अधिक क्रोधी हो सकता. अपने विपरित लिंग के लोगों के साथ मतभेद भी अधिक रह सकते हैं. बातूनी ज्यादा होता है, मेहनती होता है. सरकार के हित में कार्य करने के कारण जातक दूसरे देशों में रहता है.

आर्द्रा नक्षत्र के 4 पद में मंगल  

इस चरण में व्यक्ति स्नेही, अनुशासन प्रिय, मजबूत, बहादुर और शांत, लेकिन क्रोधी होता है. किसी भी विषय का अच्छा ज्ञाता हो सकता है. शास्त्र में उच्च स्तर की शिक्षा प्राप्त करता है. मोटापे की समस्या परेशानी दे सकती है. स्वास्थ्य को लेकर अधिक सजग रहना होता है. आर्द्रा नक्षत्र में मंगल की उपस्थिति के कारण व्यक्ति अनुशासित होता है, अनुशासन की कमी देखकर परेशान होता है. बलवान, साहसी होता है 

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प्रेम और वैवाहिक संबंधों पर शुक्र राहु का योग

कुंडली में शुक्र और राहु ग्रहों की युति बहुत ही अलग प्रकार के फल देती है. इन दोनों को रिश्तों पर असर डालने वाला योग माना गया है. इन दोनों के कारण व्यक्ति के प्रेम संबंध और वैवाहिक जीवन के सुख पर भी असर देखने को मिलता है. दोनों का प्रभाव सबसे अधिक जीवन की भौतिकता एवं आनंद पर होता है. शुक्र और राहु दोनों भौतिकता के कारक हैं. शुक्र यानि दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य और राहु उनके शिष्य हैं. दोनों ग्रह विलासिता से जुड़े हैं, दोनों का योग व्यक्तिगत सुख और विलासिता पर अधिक केन्द्रित भी दिखाई देता है. जीवन में प्रेम की अनुभूति शुक्र ग्रह से ही प्राप्त होती है जबकि राहु ग्रह इनका प्रयोग असंतुष्ट इच्छाओं के रुप में करता है. कुंडली में राहु शुक्र ग्रह के साथ मिलकर प्रसन्न होता है क्योंकि दोनों का स्वभाव कई मायनों में मेल खाता है. सुख भोग दोनों की प्रधानता है, जीवन में भोग विलास सुख समृद्धि सभी शुक्र ग्रह के अधीन है. इन दोनों ग्रहों का प्राथमिक रुप सुख भोगना है.

प्रेम और विवाह सुख पर राहु और शुक्र डालता है अपना प्रभाव 

जन्म कुंडली के जिस भी भाव में ये मौजूद होते हैं उस भाव के सुख पर अपना असर डालते हैं. इसके अलावा व्यक्ति के प्रेम जीवन के लिए भी ये युति योग बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है. कुंडली में मौजूद ये दोनों ग्रह केन्द्र और त्रिकोण भाव में जब बैठते हैं तो उसके प्रभाव कुछ सकारात्मक रुप से देखने को मिल सकता है लेकिन जब यह त्रिक भावों में विराजमान होते हैं तो उसके कारण सुख की अनुभूति का स्वरुप खराब एवं अतृप्त इच्छाओं के द्वारा ही अधिक झलकता है. 

अगर जन्म कुंडली के पहले घर में राहु और शुक्र की का योग बन रहा है तो  युति बहुत लाभकारी होती है. यह योग व्यक्ति को रिश्तों में आगे रहने का उत्साह देता है. मिलनसार ओर प्रेम पूर्वक काम करने की कोशिश भी होती है. व्यक्ति अपने ज्ञान और विद्वता के बल पर दूसरों को अपने साथ कर लेने में योग्य होता है. राहु-शुक्र की युति में व्यक्ति कई बार कम उम्र में ही प्रेम के प्रति आस्कत दिखाई देने लगता है. अगर कोई अन्य खराब असर पड़ रहा हो तो ब्रेकअप भी जल्द होने की संभावना रह सकती है अथवा प्रेम विवाह के योग बनते हैं लेकिन तालमेल नहीं बन पाता है.

दूसरे भाव में शुक्र और राहु की युति योग क असर प्रेम के क्षेत्र में कई तरह के उतार-चढ़ाव देने वाला होता है. आय और धन का प्रतिनिधित्व करते हुए इस भाव में प्रेम से भी लाभ की इच्छा अधिक होती है. दूसरों की ओर से अच्छा सहयोग कम मिल पाता है. व्यक्ति रिश्तों में कई बार जोखिम अधिक उठाता है. अपने प्रेम के प्रति उसका भाव काफी अधिक जुनूनी हो सकता है. वह अपने रिश्तों पर अधिकार जताने वाला हो सकता है. 

तीसरे भाव में शुक्र और राहु की युति का योग प्रेम के संदर्भ में व्यक्ति को ठहराव कम दे पाता है. व्यक्ति में नकारात्मक आत्मविश्वास के चलते अपने रिश्तों पर अधिक भरोसा करके परेशानी को झेल सकता है. 

चतुर्थ भाव में शुक्र और राहु का योग होने के कारण व्यक्ति को प्रेम विवाह का सुख प्राप्त होता है. कुछ मामलों में वह इस योग के द्वारा अपनी परंपरा से हट कर विवाह बंधन को अपनाता है. परिवार में उसके रिश्ते अधिक मजबूत नहीं होते हैं लेकिन अपने प्रेम के प्रति समर्पण बहुत अधिक होता है. 

छठे भाव में राहु और शुक्र का योग होने से प्रेम संबंधों में तो जाते हैं लेकिन इसमें सफलता के लिए संघर्ष अधिक रहता है. व्यक्ति अपने रिश्ते में मानसिक रुप से असंतुष्ट ज्यादा रहता है. अपने वैवाहिक जीवन में उसे काफी उतार-चढ़ाव जेलने पड़ते हैं. 

पंचम भाव में शुक्र और राहु का योग व्यक्ति को एक से अधिक संबंध देने वाला होता है. इसका असर प्रेम विवाह की संभावना जो बढ़ता है. व्यक्ति बौद्धिक रुप से यौन संबंधों के प्रति भी आकर्षित होता है. 

सप्तम भाव में राहु और शुक्र का होना प्रेम विवाह की संभावना बनाता है. इस के प्रभाव द्वारा व्यक्ति अपने जीवन सतही के साथ प्रेम पूर्वक जीवन का आनंद लेता है. विवाहेत्तर संबंधों का प्रभाव भी इस युति योग में देखने को मिलता है. 

अष्टम भाव में राहु और शुक्र की युति का होना प्रेम जीवन में गुप्त संबंधों को दर्शाता है. जीवन साथी के साथ रिश्ते में अस्थिरता अधिक बनी रह सकती है. विवाह संबंधों में यह विच्छेद की स्थिति का कारण बन सकता है.  व्यक्ति बाहरी सुंदरता से अधिक आकर्षित हो सकता है. 

नवम भाव में राहु और शुक्र का योग प्रेम संबंधों के मामले में लव मैरिज क अयोग देता है. वैवाहिक जीवन में उतार-चढ़ाव अधिक रह सकते हैं. अपने धर्म से हटकर भी वह विवाह बंधन में शामिल हो सकता है. 

दशम भाव में राहु और शुक्र की युति का असर व्यक्ति को अपने कार्यक्षेत्र से जुड़े हुए व्यक्ति का साथ देता है. अपने प्रेम संबंधों में वह एक साथी के रुप में सहयोग एवं प्रेम पूर्ण साथी को पाने में सफल रहता है. 

एकादश भाव में राहु और शुक्र की युति से आर्थिक स्थिति अच्छी बनी रहती है. इस दौरान अच्छी सुख-सुविधा रहती है. यह संयोजन बड़ी वित्तीय सफलता लाता है. थोड़ी सी मेहनत से धन कमाया जा सकता है.

बारहवें भाव में राहु और शुक्र का योग प्रेम जीवन के लिए अनुकूलता की कमी का कारण बन सकता है. इसका असर प्रेम संबंधों में धोखा मिलने की स्थिति को दिखाता है. रिश्ते में दूरी और अनैतिक संबंधों को दर्शाने वाला होता है. 

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जानिए आपके लग्न पर बुध की महादशा का प्रभाव

सभी 12 लग्नों के लिए बुध की दशा अच्छे और बुरे हर प्रकार के असर दिखाती है, लेकिन इस अच्छे और खराब की स्थिति का प्रभाव किस तरह से मिलागा उसका संबंध बुध की लग्न के साथ शुभता और अशुभता पर निर्भर करता है. ग्रहों में बुध ग्रह का महत्व बहुत व्यापक है ये अभिव्यक्ति को बल देता है.ज्योतिषियों के अनुसार बुध ग्रह की महादशा के कारण व्यक्ति के जीवन में कई तरह के बदलाव देखने को मिलते हैं एक शुभ बुध प्रसिद्धि दिलाता है तो अशुभ बुध कई तरह की परेशानियां दे सकता है. अगर कुंडली में बुध मजबूत हो तो जातक को सुखों की सौगात मिलती है. बुध कहने को एक छोटा ग्रह है लेकिन ज्योतिष शास्त्र में बुध को एक महत्वपूर्ण ग्रह के रूप में गिना जाता है. बुध ठीक हो तो सब कुछ शुद्ध रहता है अर्थात सब सही ही रहता है, लेकिन यदि यह बुध खराब हो, नीच का हो या वक्री हो जाए तो अशुद्ध करता है. 

मेष लग्न के लिए बुध की महादशा

मेष लग्न के लिए बुध का असर अधिक शुभ नहीं माना जाता है. यह एक खराब ग्रह का प्रभाव अधिक दिखाता है. बुध की महादशा के कारण नौकरी में काफी परेशानी आ सकती है, नौकरी छूटने का भी डर रहता है. महादशा के दौरान व्यक्ति का जीवन कर्ज और बीमारियों में घिर जाता है. इस समय परिश्रम अधिक होता है लेकिन लाभ कम ही रहता है. 

वृष लग्न के लिए बुध की महादशा

वृष लग्न के लिए बुध की महादशा अनुकूल मानी जाती है. बुध इस लग्न के लिए धनेश बनता है ओर साथ ही जीवन में कई तरह के लाभ दिलाता है. इस दशा के आने पर व्यक्ति अपनी प्रतिभा के द्वारा मान सम्मान पाता है. जीवन सुखमय व्यतीत होता है. छोटी-मोटी परेशानियों के बावजूद अपने जीवन में रिश्तों को बेहतर रुप से निभाता है. कई मायनों में ये समय व्यक्ति के लिए प्रगति के नए दरवाजे खुलने जैसा होता है. 

मिथुन लग्न के लिए बुध महादशा

मिथुन लग्न के लिए बुध की महादशा अनुकूल होती है. बुध का लग्नेश होना ही व्यक्ति को सुख प्रदान करने वाला होता है. संघर्ष की वृद्धि रहती है लेकिन अच्छा लाभ मिलता है. जीवन में सकारात्मक कोशिशें भी आगे बढ़ने के अच्छे अवसर देती हैं. इस दौरान नौकरी में दिक्कतें आ सकती हैं. छोटी-मोटी बीमारियों का भी सामना करना पड़ता है त्वचा से संबंधित रोग परेशान करते हैं. 

कर्क लग्न के लिए बुध की महादशा

कर्क राशि के लिए बुध की महादशा स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालने वाली होती है. इस महादशा के दौरान यात्राएं परेशानी को अधिक दर्शाती है. चरित्र और बुद्धि में बदलाव आने लगती है. जीवन में विदेश यात्रा अधिक असफलता के अवसर बढ़ जाते हैं.

सिंह लग्न के लिए बुध की महादशा

सिंह राशि में बुध की महादशा के कारण धन की समस्या का सामना करना पड़ सकता है. आर्थिक क्षेत्र में व्यक्ति अपने लिए बेहतर मौके पाने में आगे रहता है. रिश्तों को लेकर व्यक्ति को कुछ बेहतर विकल्प भी मिलते हैं. इस दौरान व्यक्ति को कई तरह के विचारों का सामना करता है. 

कन्या लग्न के लिए बुध की महादशा

कन्या लग्न के लिए बुध की महादशा अच्छा फल देने वाली होती है. व्यक्ति स्वास्थ्य को लेकर थोड़ा चिंता में रह सकता है लेकिन जीवन में सफलता के लिए प्रयास कामयाब होंगे. व्यक्ति को लेखन में सफलता के मौके मिलते हैं. करियर में आगे बढ़ने के अवसर मिलते हैं लोगों के साथ संपर्क बढ़ता है. 

तुला लग्न के लिए बुध की महादशा

तुला लग्न के लिए बुध की महादशा का प्रभाव व्यक्ति को भाग्य के द्वारा आगे बढ़ने का अवसर देता है. व्यक्ति का मन चंचल अधिक रहता है. इस दौरान व्यक्ति का चरित्र कमजोर हो जाता है और चरित्र पर दाग लग जाता है.

वृश्चिक लग्न के लिए बुध की महादशा

वृश्चिक लग्न के लिए बुध की महादशा का असर व्यक्ति को योग्यता अनुरुप ही सकारात्मक प्रभाव देने वाला होता है. व्यक्ति को सिद्धि प्राप्त होती है लेकिन उसका मन बेचैन अधिक रहता है. बुध की महादशा के कारण त्वचा या वाणी संबंधी विकार अधिक परेशान कर सकते हैं. इस अवधि में इनके करियर में कोई सफलता आसानी से नहीं मिल पाती है.

धनु लग्न के लिए बुध महादशा

धनु राशि में बुध की महादशा का असर व्यक्ति को वरिष्ठ लोगों के माध्यम से सफलता का अवसर देने वाला होता है. इस समय व्यक्ति लोगों के समक्ष अपनी बौद्धिकता का बेहतर प्रदर्शन करने में सफल होता है. वैवाहिक जीवन का आरंभ हो सकता है, प्रेम संबंधों में साथी का सहयोग कम मिल पाता है. अपने लोगों के सहयोग को पाने में सक्षम होता है. व्यक्ति संघर्ष के द्वारा सफलता को पाने में सक्षम होता है. 

मकर लग्न के लिए बुध की महादशा

मकर लग्न के लिए बुध की महादशा का समय मिलेजुले प्रभाव देने वाला होता है. इस दशा के समय व्यक्ति काम काज को लेकर बहुत अधिक उत्साहित रहता है. प्रेम जीवन में साथी को सफलता मिलती है. यह समय संघर्ष का भी होता है, बुध यदि कमजोर हो तो उसका प्रभाव व्यक्ति को कर्ज की ओर ले जा सकता है. इस दौरान धन की समस्या भी परेशानी दे सकती है. नौकरी में बाधाओं का सामना करना पड़ता है. इस महादशा के कारण भाग्य को लेकर संघर्ष अधिक रहता है. 

कुंभ लग्न के लिए बुध की महादशा

कुंभ लग्न के लिए बुध की महादशा के कारण व्यक्ति कलात्मक एवं दक्षता के बल पर आगे बढ़ता है. मानसिक रुप से अस्थिरता का प्रभाव व्यक्ति को अधिक परेशानी दे सकता है. संतान पक्ष से समस्या उत्पन्न हो सकती है. इस दौरान जातक को कोई भी निर्णय लेने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है.

मीन लग्न के लिए बुध की महादशा

मीन लग्न में बुध की महादशा के कारण व्यक्ति को कई मायनों में बेहतर परिणाम देती है. व्यक्ति अपने घर परिवार के लिए बहुत अधिक सोच रखता है. जीवन में साथी एवं मित्रों का सुख कमजोर रह सकता है, स्वास्थ्य संबंधी परेशानी अधिक रह सकती है. वैवाहिक जीवन को लेकर अधिक उतार-चढ़ाव बने रह सकते हैं. संपत्ति का नुकसान होता है.

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ज्योतिष से जाने आंखों से संबंधित रोग का कारण

नेत्र संबंधित रोग के लिए कौन से ग्रह और योग बनते हैं कारक 

चिकित्सा ज्योतिष में नेत्र रोग से संबंधित कई तरह के योग मिलते हैं जो आंखों की बीमारियों के होने का संकेत देते दिखाई देते हैं. ग्रह इस तथ्य को उजागर कर सकते हैं कि कोई व्यक्ति किसी नेत्र रोग से पीड़ित है या नहीं. जन्म कुंडली में निर्मित विभिन्न प्रकार के योगों से आंखों की रोशनी के प्रभावित होने की स्थिति का निर्माण होता है. इसमें दो ग्रहों का उल्लेख हमें काफी विशेष रुप से पौराणिक ग्रंथों में भी प्राप्त होता है जिन्हें नेत्र ज्योति का आधार माना गया है. इन ग्रहों में सूर्य एवं शुक्र को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है. आंखों की रोशनी के लिए इन ग्रहों की शुभता काफी सकारात्मक होती है. यदि यह जन्म कुंडली में कमजोर होते हैं पाप प्रभाव में होते हैम तब नेत्र रोग होने की संभावना भी बढ़ जाती है. 

ग्रहों का नेत्र रोग पर प्रभाव 

सूर्य और चंद्रमा दोनों ग्रह प्रकाश उत्सर्जक ग्रह हैं. दायीं आंख के लिए सूर्य ग्रह की स्थिति को देखा जाता है और बायीं आंख के लिए चंद्रमा को देखा जाता है. यह दो ग्रह आंखों पर गहरा असर डालते हैं. सूर्य को नेत्र और शुक्र को दृष्टि से संबंधित माना गया है. इन दोनों का प्रभाव आंखों की रोशनी को तेज या कमजोर करने वाला माना गया है. इन ग्रहों की शुभता एवं अशुभता के बल को देख कर आंखों की रोशनी ओर आंखों के रोग का पता चला पाना संभव होता है. 

जन्म कुंडली में नेत्र संबंधित भाव 

जन्म कुंडली में दूसरा भाव और बारहवां भाव आंखों को दर्शाता है. इस भाव और इस भाव के अधिपति का नेत्र ज्योति पर काफी नजदीकी संबंध होता है. इन भावों की शुभता व्यक्ति को अच्छी रोशनी प्रदान करने वाली होती है. अगर ये भाव पाप प्रभावित होते हैं तो नेत्र रोग होने की आशंका भी बढ़ सकती है. जो भाव जितना प्रभावित होता है उस आंख का कमजोर होना उतना ही प्रबल भी होता चला जाता है. यदि द्वितीय भाव में सूर्य और द्वादश भाव में चंद्रमा स्थित हो तो जातक को आंखों से संबंधित कोई परेशानी होने की प्रबल संभावना होती है. शुभ शुक्र ग्रह अच्छी स्थित है तो ऐसे जातक की आंखें बेहद खूबसूरत होंगी और उसे कभी भी आंखों से संबंधित कोई रोग नहीं होगा. 

आंखों से संबंधित ज्योतिषीय योग 

आंखों के होने वाले रोगों के लिए कई प्रकार के ज्योतिष सुत्र अपना असर दिखाते हैं. अगर हम कुंडली के दूसरे भाव का योग देखें तो वहां यदि मंगल केतु का प्रभव हो सिंह राशि हो तो उसके कारण व्यक्ति को आंखों में चोट लगने के कारण नेत्र का रोग परेशान कर सकता है. 

यदि द्वितीय भाव का स्वामी कमजोर स्थिति में है या यदि वह त्रिक भाव छठे भाव, आठवें भाव अथवा व्यय भाव के साथ स्थित है तो शुक्र अपना शुभ फल देने में सक्षम नहीं होगा.

यदि किसी व्यक्ति की कुंडली के दूसरे भाव में शनि ग्रह स्थित है तो ऐसे व्यक्ति को आंखों से संबंधित गंभीर समस्या हो सकती है. ऐसे व्यक्ति की नजर वाकई कमजोर होती है.

दूसरे भाव में स्थित ग्रह राहु और केतु भी किसी की दृष्टि को कमजोर कर सकते हैं और दुर्घटनाएं कर सकते हैं जिससे व्यक्ति की आंखें प्रभावित हो सकती हैं.

यदि मंगल ग्रह दूसरे भाव में स्थित है तो यह अशुभ है क्योंकि यह आंखों से संबंधित गंभीर समस्या दे सकता है. दूसरे भाव में मंगल की स्थिति से जातक को आंखों से संबंधित सर्जरी भी हो सकती है या उसे जीवन भर के लिए चश्मा लग सकता है.

सूर्य और बुध की स्थिति द्वादश भाव में हो और बुध वक्री अवस्था में हो तो उसके कारण भैंगापन की शिकायत हो सकती है. 

शुक्र और सूर्य का योग मकर राशि में और यहां केतु का प्रभाव भी हो तो इसके कारण व्यक्ति अंधेपन का शिकार हो सकता है.

वैदिक ज्योतिष के अनुसार, यदि चंद्रमा, शनि, शुक्र, मंगल या सूर्य ग्रह दूसरे और बारहवें भाव में बुरी तरह से स्थित हों, तो यह आंखों की समस्याओं को जन्म देता है.सूर्य की कमजोर स्थिति से आंखों से संबंधित विकार देने वाली होती है.कुंडली में चंद्रमा की कमजोर स्थिति कमजोर दृष्टि जैसी समस्याओं के लिए जिम्मेदार होती है. 

यदि दूसरा और 12वां भाव पाप भावों से प्रभावित है तो इसका मतलब है कि आपकी नजर कमजोर है. राहु और केतु की दूसरे भाव में स्थिति भी आंखों की समस्याओं का एक प्रमुख कारण बनती है. 

दूसरे भाव में सूर्य का होना खरब स्थिति में हो तो यह आंखों के रोग दे सकता है. सूर्य को पित्त ग्रह के रूप में जाना जाता है यदि यह दूसरे भाव में खराब स्थिति में है, तो जातक को आंखों की गंभीर समस्या और यहां तक कि अंधापन भी महसूस होता है.

बारहवें भाव में सूर्य भी आंखों की कमजोरी को दिखाता है. यदि सूर्य पाप भावों के साथ हो तो निश्चित रूप से आपको नेत्र संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ेगा.

दूसरे भाव में मंगल एक अशुभ घटना है जहां जातक को आंखों की गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है. पाप भाव में मंगल की स्थिति का अर्थ है कि जातक को आजीवन चश्मा पहनना पड़ता है.

बारहवें भाव में पीड़त मंगल भी आंखों की समस्याओं का संकेत देता है व्यक्ति को आंखों में किसी प्रकार की कमजोरी महसूस हो सकती है या उस की आंख पर किसी प्रकार के चोट का निशान भी हो सकता है. 

दूसरे भाव में शनि अर्थात आंखों की कुछ गंभीर समस्याओं को जन्म देता है. शनि के साथ केतु, या मंगल का होना नेत्र ज्योति के लिए अनुकूलता की कमी को दर्शाने वाला होता है. यह किसी दुर्घटना के कारण आंखों की परेशानी की ओर भी इशारा करता है, व्यक्ति को चश्मा पहनना पड़ता है.

बारहवें भाव में स्थित शनि फिर से इसी बात का संकेत देता है कि व्यक्ति की आंखों की रोशनी पर कोई गंभीर प्रभाव देखने को मिल सकता है

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लग्न से जाने मंगल महादशा के प्रभाव

मंगल महादशा का प्रभाव सभी राशियों के लिए बेहद विशेष होता है, हर लग्न के लिए मंगल किसी न किसी विशेष पक्ष को दर्शाता है. मंगल की स्थिति यदि लग्न के लिए शुभ है तो वह शुभ फल प्रदान करने वाला होगा, इसके अलग यदि मंगल उस लग्न के लिए अनुकूल नहीं है तो दशा के विपरित प्रभाव अधिक देखने को मिलेंगे. कुछ लग्न के लिए मंगल अत्यंत ही शुभदायी होगा तो कुछ के लिए मारक भी हो सकता है. ऎसे में मंगल महादशा जब जिस भी लग्न पर आती है तो उस लग्न के अनुरुप मंगल के स्वामित्व के आधार पर अपना असर अवश्य देने वाली होती है. 

मंगल का महादशा आपको परिणाम कैसे देगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि मंगल आपकी कुंडली में एक शुभ ग्रह है या नहीं. यह भी महत्वपूर्ण है कि क्या मंगल मजबूत है या कमजोर इस पर निर्भर करता है. सामान्य तौर पर, मंगल, मेष, कैंसर, लियो, वृश्चिक, धनु और मीन राशि के लोगों के लिए एक शुभ ग्रह है.

मेष लग्न के लिए मंगल महादशा

मंगल के महादशा मेष लग्न और मेष राशि के लोगों के लिए शुभ मानी गई है. मंगल महादशा के समय इन्हें अपने जीवन के लक्ष्यों को पूरा करने का मौका मिलता है. इस दशा के प्रभाव से  व्यक्ति का आत्मविश्वास और उत्साह भी बढ़ता है. वह सामाजिक प्रतिष्ठा को पाते हैं और साहस के साथ काम करने में आगे रहते हैं. है और किए गए काम में सफलता प्राप्त होती है।

वृषभ लग्न के लिए मंगल महादशा

वृषभ लग्न के लिए मंगल महादशा अनुकूलता में कमी दिखाने वाला समय होता है. यह एक प्रकार से चुनौतियों और बाधाओं से निकलने के लिए हिम्मत प्रदान करने वाला ग्रह है. मंगल दशा का समय जब आता है तो जरुरी है की स्वयं को अधिक सजग बना लिया जाए. इस दशा में जल्दबाजी से काम करना नुकसान दे सकता है. धन के निवेश को लेकर भी जरुरी है की उचित रुप से विचार विमर्श करके आगे बढ़ा जाए. स्वास्थ्य पर ध्यान देने की आवश्यकता भी अधिक होती है. 

मिथुन लग्न के लिए मंगल महादशा

मिथुन लग्न के लिए मंगल महादशा का असर मिलेजुले परिणाम प्रदान करने वाला होता है. इस दशा के दौरान साहस एवं परिश्रम में व्यक्ति अच्छा करता है लेकिन व्यर्थ की परेशानियों में अधिक उलझ जाता है. आर्थिक क्षेत्र में अच्छी प्रगति करने वाला होता हैस्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के चलते परेशानी हो सकती है. 

कर्क लग्न के लिए मंगल महादशा 

कर्क लग्न के लिए मंगल ग्रह की महादशा का समय बहुत ही शुभ होता है. इस दौरान उनके जीवन में अच्छे परिणाम मिलते हैं. करियर में और प्रेम संबंधों में प्रगति का समय होता है. मान सम्मान की प्राप्ति भी होती है. लोगों के मध्य 

सिंह लग्न के लिए मंगल महादशा

सिंह लग्न वालों के लिए मंगल की महादशा शुभ फल प्रदान करने वाली होती है. इस दशा का प्रभाव भाग्य में वृद्धिदायक होता है. मंगल का महादशा इन लोगों को बहुत शुभ परिणाम देती है. जीवन में भाग्य के साथ साथ करियर में भी प्रगति मिलती है. जीवन में समृद्धि  के द्वारा खुलते हैं. है।

कन्या लग्न के लिए मंगल महादशा

कन्या लग्न के लिए मंगल महादशा संघर्ष को बढ़ाने वाली होती है. इस समय के दौरान, अपने काम में सफल होने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है. अपनों के साथ विरोधाभास भी अधिक बढ़ सकता है. कुछ स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ सकती हैं. इस समय के दौरान व्यग्रता से बचना उचित होता है. 

तुला लग्न लिए मंगल महादशा

तुला लग्न के मंगल का महादशा का समय काफी मिलेजुले परिणाम देने वाला होता है. इस समय पर व्यक्ति अपने काम-काज में भागदौड़ अधिक बना कर रखता है. जीवन साथी का सुख प्राप्त होता है लेकिन स्वास्थ्य समस्याएं भी परेशान करती हैं. कार्यक्षेत्र में आगे बढ़ने के अवसर प्राप्त होते हैं. 

वृश्चिक लग्न के लिए मंगल महादशा

वृश्चिक लग्न वालों के लिए मंगल महादशा का समय अनुकूल माना गया है. यह दशा वृश्चिक लग्न वालों के लिए ये समय अपने जीवन में नवीन चीजों की प्राप्ति से जुड़ा होता है. इस समय के दौरान आत्मविश्वास और उत्साह में वृद्धि भी अच्छी होती है. जीवन में सफलता प्राप्त होती है और सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ती है. 

धनु लग्न के लिए मंगल महादशा  

धनु लग्न के लिए मंगल महादशा अच्छी मानी जाती है. धनु लग्न के लोगों को मंगल महादशा के समय अपने पराक्रम का उचित रुप से उपयोग करने का अवसर प्राप्त होता है. जीवन में प्रगति होती है और किए गए काम में सफलता प्राप्त होती है. 

मकर लग्न के लिए मंगल महादशा

मकर लग्न के लिए मंगल महादशा मिश्रित परिणाम देने वाली होती है. इस महादशा के दौरान काम में सफलता के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है. इस दौरान, जीवन में आर्थिक स्थिति में सुधार की संभावना बनती है. लेकिन सेहत को लेकर भी सजग रहना पड़ता है. 

कुंभ लग्न के लिए मंगल महादशा

कुंभ लग्न के लिए मंगल महादशा का प्रभाव परिश्रम की अधिकता और लगातार कोशिशों के बाद मिलने वाली सफलता का संकेत करता है. इस महादाश के समय कड़ी मेहनत करनी होती है.  जीवन में बहुत उपद्रव भी बना रहता है. करियर में अच्छी सफलता के लिए व्यक्ति संघर्ष द्वारा सफल होता है.

मीन लग्न के लिए मंगल महादशा  

मीन लग्न के लिए मंगल के महादशा शुभ परिणाम देने वाली होती है. इस समय में वे भाग्य का सहयोग प्राप्त होता है. जीवन में बाधाएं समाप्त होती हैं, परिवार में सुख समृद्धि का वास होता है. किए गए सभी प्रयास सफल होते हैं. आर्थिक दृष्टिकोण से भी जीवन में प्रगति होती है.

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शनि के उदय और अस्त होने का ज्योतिष अनुसार प्रभाव

शनि का उदय और अस्त होना शनि चाल में सबसे महत्वपूर्ण समय की स्थिति होती है. ज्योतिष में सभी ग्रहों का अस्त होना सूर्य की स्थिति से देखा जाता है. अब जब शनि सूर्य से अस्त होता है तो यहां इसकी स्थिति अन्य ग्रहों से बहुत अधिक भिन्न होती है. इस के पीछे कई कारण जिसमें से एक पौराणिक कथा का होना भी विशेष होता है. पौराणिक तथ्यों के अनुसार भगवान सूर्य और शनि देव का गहरा संबंध रहा है. सूर्य के पुत्र शनि देव हैं, इस कारण शनि का सूर्य से अस्त होना कई अर्थों को दृष्टिगोचर करता है. 

छाया के पुत्र शनि सबसे बड़ा शिक्षक माना जाता है जो अच्छे कार्यों और खराब कार्यों दोनों में ही व्यक्ति को फल प्रदान करते हैं. अच्छे के लिए पुरस्कार देते हैं और बुराई या विश्वासघात के मार्ग पर चलने वालों को दंडित करते हैं. शनि देव को कर्म और न्याय के रूप में भी जाना जाता है. भगवान शनि को सबसे घातक ग्रह माना जाता है जो जीवन में अटकाव रोक और दुर्भाग्य लाता है. यह व्यक्तिगत और कर्म क्षेत्र के जीवन में अंतर लाने की शक्ति रखता है. इसलिए यह शनि के प्रभाव को समझ लेना जरुरी होता है. 

शनि का काल अवधि और प्रभाव 

इस ग्रह को सूर्य के चारों ओर एक परिक्रमा करने में लगभग 30 वर्ष लगते हैं, इसलिए यह प्रत्येक राशि में लगभग 2.5 वर्ष तक रहता है. यह अवधि 5 या 7.5 साल तक बढ़ सकती है. राशि में शनि की यह उपस्थिति जीवन में समस्याओं का कारण बनती है, चाहे वह आपके रिश्ते, पैसा, करियर या अन्य कुछ भी हो सकता है. मनुष्य पर शनि का प्रभाव कई गुना अधिक होता है. शनि बाधा, संकट, अवसाद, दुख, बीमारी का ग्रह है और जीवन में प्रतिकूलता लाने में सक्षम है. इसके चरण के दौरान व्यक्ति को यह बहुत कठिन लगता है. इसके कारण व्यक्ति खुद को असहाय, बेचैन और उदास पा सकते हैं. चीजों को संतुलित करने का शनि का अपना तरीका होता है. 

यह आगे बढ़ने, विकसित करने और जीवन की बाधाओं को दूर करने में मदद कर सकता है. शनि काल व्यक्ति के जीवन में दो बार या तीन बार आता है, ज्यादा से ज्यादा दो बार तो अवश्य आता है. दूसरा शनि काल बहुत ही गंभीर है और आपके व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन में भारी परेशानी पैदा करता है. शनि सभी के लिए खराब नहीं हैं. यदि कुंडली में यह उचित स्थिति में हो या कर्मों में हम शुभ हों तो शनि जीवन को उन्नत करता है. यदि सांसारिक इच्छाओं में जकड़े हुए हैं, तो वह परेशान करेगा ताकि सही रास्ते पर आ सकें और अपने अंतर्मन को पा सकें. इस तरह शनि या शनि व्यक्ति के जीवन में संतुलन बनाए रखता है.

शनि अस्त उदय का साढ़ेसाती-ढैया प्रभाव 

यह शनि की साढ़ेसाती का प्रारंभ काल है. इस अवधि में शनि चंद्र से बारहवें भाव में गोचर करता है. यह मुख्य्त रुप से वित्तीय हानि, छिपे हुए शत्रुओं द्वारा समस्या देना, लक्ष्यहीन यात्रा, विवाद और गरीबी को दर्शाता है. इस अवधि में व्यक्ति को अपने गुप्त शत्रुओं द्वारा पैदा की हुई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है. सहकर्मियों से संबंध अच्छे नहीं रह पाते हैं. कार्यक्षेत्र में बाधाएँ खड़ी करने वाले गुप्त शत्रु हो सकते हैं. घरेलू क्षेत्रों पर भी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. इससे दबाव और तनाव पैदा हो सकता है. आपको अपने ख़र्चों पर क़ाबू रखने की ज़रूरत होती है, नहीं तो बड़ी आर्थिक समस्याएं खड़ी हो सकती हैं. इस अवधि के दौरान लंबी दूरी की यात्राएँ फलदायी नहीं हो सकती हैं. शनि का स्वभाव विलंब और निराशा का है,  आपको अंततः परिणाम मिलेंगे, इसलिए धैर्य रखना जरुरी होता है उदय या अस्त होने पर दोनों ही समय व्यक्ति को सब्र से काम लेने की जरुरत होगी. शनि के उदय या अस्त दोनों ही समय पर इस अवधि में अधिक जोखिम न उठाने से बचना चाहिए.

यह शनि की साढ़ेसाती का चरम है. तब शनि की यह उदय और अस्त अवस्था सबसे कठिन होती है. जन्मकालीन चंद्रमा पर शनि का गोचर स्वास्थ्य समस्याओं, चरित्र पर लांछन, संबंधों में समस्याओं, मानसिक कष्टों और दुखों को दर्शाता है. इस अवधि में सफलता मिलने में कठिनाई महसूस होती है. अपनी मेहनत का फल नहीं मिल पाता है व्यक्ति खुद को बंधा हुआ महसूस करता है. सेहत और प्रतिरक्षा-तन्त्र पर्याप्त सशक्त नहीं होता है.  इसलिए व्यायाम और अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना शुरू कर देना चाहिए, अन्यथा पुरानी बीमारियों की चपेट में आ सकते हैं. मानसिक अवसाद, अज्ञात भय या फ़ोबिया आदि का शिकार हो सकते हैं. संभव है कि आपके काल-खण्ड में सोच, कार्य और निर्णय करने की क्षमता में स्पष्टता का अभाव रहता है.  आध्यात्मिक रूप से प्रवृत्त होते हैं, प्रकृति से आकर्षित हो सकते हैं. स्वीकार करना और मूलभूत काम ठीक तरह से करना इस संकट की घड़ी से बाहर निकालने वाला होता है. 

शनि एक बहुत धीमी गति से चलने वाला ग्रह है, जो एक राशि में लगभग ढाई से तीन साल बिताता है. इस लिए शनि की अवस्था जब उदय या अस्त वाली होती है तब चीजें अधिक सहयोग नहीं कर पाती हैं.  शनि जब कुंडली में सूर्य के साथ जब किसी भाव में एक साथ होता है तो वह अंशात्मक नजदीकी के कारण ही अस्त होता है और दूर होने पर उदय की स्थिति में होगा.  

इस्न दोनों ही चीजों में शनि जब सूर्य के नजदीक होगा तो अस्त होए वाले परिणामों से प्रभावित रहेगा. यह महत्वपूर्ण है कि कुंडली की जांच कर ली जाए ताकि यह पता चल सके कि जब आपका जन्म हुआ था तब वह कहां स्थित था उस भाव की स्थिति ही अधिक प्रभावित होगी ओर व्यक्ति के कर्म भी अस्त होंगे. यदि अस्त न होकर शनि उदय की स्थिति में है तो इसके चलते कई मामलों में चीजें काफी गहरे रुप से मजबूत होती हैं. शनि उदय का संकेत आपको दिखाएगा कि आप अपने डर का सामना कैसे करते हैं, आप कैसे सीमाएं निर्धारित करते हैं. आप किस प्रकार की सीमाओं का सामना करते हैं, और जीवन में अनुशासित होने की मांग अधिक प्रबल होती है. 

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छठे भाव या बारहवें भाव में बना धन योग

ज्योतिष के अनुसार शुभ या अशुभ ग्रहों के विशेष योग से एक प्रकार की युति बनती है जिसे योग कहते हैं. यह योग कई तरह से देखने को मिलते हैं इसमें योग कई प्रकार के होते हैं. कुछ योग शुभ होते हैं तो कुछ अशुभ तो कई बार शुभ अशुभ योग भी एक ही साथ निर्मित हो रहे होते हैं. इन सभी में एक शुभ योग धन योग के रूप में जाना जाता है. धन योग जब भी कुंडली में धन मान सम्मान, शोहरत  कुंडली में मौजूद इस धन योग पर निर्भर करता है.

धन योग का निर्माण कैसे होता है

वैदिक ज्योतिष के अनुसार जन्म कुंडली के दूसरे भाव को धन भाव माना जाता है, और एकादश भाव को लाभ भाव के रुप में जाना जाता है. इन दोनों घरों के बीच अनुकूल संबंध बहुत शुभ धन योग बनाता है. अब यदि यह योग एवं लग्न, पंचम, द्वितीय, पंचम, नवम और एकादश भाव या उनके स्वामी जातक की कुंडली में अनुकूल स्थिति में हैं, तो कुंडली में धन योग के अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं. 

कुंडली में धन योग के लिए पांच भाव अत्यंत शुभ होते हैं. जो धन और समृद्धि प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.  उदाहरण के लिए कई तरह से धन योग की प्राप्ति हो सकती है. लग्नेश और द्वितीयेश की युति धन योग बनाती है.  एकादश भाव का स्वामी दूसरे भाव में स्थित है या दूसरे भाव का एकादश में है तो धन योग बनता है. यदि लग्नेश दशम भाव में स्थित हो तो व्यक्ति को माता-पिता से अधिक धन मिलने की संभावना होती है. यदि दूसरे और नवम भाव के स्वामी परस्पर योग करते हैं, तो जीवन में धन का संकेत मिलता है. दूसरे भाव का स्वामी यदि, नवम और ग्यारहवें भाव से संबंध बनाता है तो यह धन योग का अच्छा कारक बनता है. 

धन योग में 6 भाव और 12वें भाव में बना धन योग 

ज्योतिष शास्त्र में छठे भाव का कर्म संरचना से गहरा संबंध है. सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव, दोनों ही कर्म की श्रेणी में आते हैं. यह सब पूर्व एवं आगामी कर्मों के आधार पर बनते हैं जो वर्तमान जीवन में विभिन्न रूपों में प्रकट होते चले जाते हैं. रोग, शत्रु, ऋण, कष्ट आदि के रूप में नकारात्मक प्रभाव का अनुभव इसी भाव से किया जा सकता है. यह सब छठे भाव की स्थिति पर निर्भर करता है कि चुनौतियों और कठिनाइयों को कैसे हमारे सामने होंगी और इन पर कैसे नियंत्रण किया जा सकता है. एक कमजोर छठा भाव जीवन में बहुत सारी चुनौतियां पैदा कर सकता है. 

छठा भाव स्वास्थ्य समस्याओं, परेशानियों – बाधाओं, रोजमर्रा की स्थिति, शत्रु, ऋण, मुकदमेबाजी को दर्शाती है. संघर्ष की स्थिति उत्तरदायित्व को भार पाचन शक्ति, दु:ख, निराशा, युद्ध, लड़ाई, युद्ध, चोट, प्रतियोगिता जैसी बातें जीवन पर असर डालती हैं. वैदिक ज्योतिष में छठे भाव को रोग-रिपु-ऋण का भाव कहा जाता है, जिसका अर्थ है रोग, ऋण और शत्रु. कर्म संरचना से इसका गहरा संबंध होता है. सकारात्मक प्रभाव विकास को बढ़ावा देगा और नकारात्मक प्रभाव रोग, शत्रु, ऋण और कष्टों के रूप में अनुभव देगा. किस तरह से प्रतिक्रिया करते हैं या चुनौतियों का सामना करते हैं, यह छठे भाव पर निर्भर करता है. आप या तो डर को चुनौती देते हैं और विजेता के रूप में सामने आते हैं या दबाव के आगे झुक जाते हैं.  

अब जब धन योग इस भाव में बनता है तो इस धन योग की स्थिति तब बेहतर फल देती है जब उसका उचित रुप से उपयोग किया जाए. यदि छठे घर में धन योग बनता है तो अच्छे परिणाम कम हो जाते हैं. जब धन योग यहां बनता है तो धन का उपयोग इन समस्याओं में लग सकता है, या धन नकारात्मक रुप से अधिक प्राप्त होता है. जहां धन की स्थिति सकारात्मक रुप से कम होती है. 

कुंडली का बारहवां भाव धन योग 

जन्म कुंडली का द्वादश भाव खर्च की स्थिति को दर्शाता है. यह भाव मुक्ति, हानि, व्यय, अस्पताल, विदेश यात्रा, स्वतंत्रता पर प्रतिबंध, वैराग्य, व्यसन, परिवर्तन, दान,  आश्रम, ध्यान, दंड, दुर्भाग्य, हीन भावना , कारावास, विदेश स्थिति को दर्शाता है. इस घर को संभालना थोड़ा मुश्किल होता है. अध्यात्म की राह पर चलने वालों को यह घर बेहद आकर्षक लग सकता है लेकिन भाव हर बार याद दिलाता है कि हम वास्तव में कौन हैं. शनि को 12वें घर के लिए कारक के रूप में माना गया है. 

यह सांसारिक सुख और आध्यात्मिकता दोनों में अवसर प्रदान करता है. इन्द्रियों की तृप्ति के लिए या आध्यात्मिक ज्ञान के लिए इसका उपयोग कर सकते हैं.  वैदिक ज्योतिष में बुरे घरों में से एक है.यह भाव हानि, पीड़ा, कष्ट, निराशा, कारावास, कारावास का प्रतिनिधित्व करता है. द्वादश भाव लग्न से बारहवां होता है, यह स्वयं के नुकसान को दर्शाता है.  घाटे या हानि इस घर में ग्रह एवं राशि पर निर्भर करती है. अगर इसे धन प्रदान करने वाले भावों से जोड़ा जाए तो यह खर्चों को करवाता है आर्थिक तंगी देता है जेब पर भारी पड़ सकता है.  

बारहवें भाव में स्थिति धन योग की स्थिति स्वाभाविक रुप से आर्थिक लाभ दिलाने में कमजोर होती है. यह कुछ इस प्रकार भी होती है कि धन आता है लेकिन इसका संचय कर पाना मुश्किल ही होता है. धन की प्राप्ति रोगों पर बाहरी खर्चों पर एवं व्यर्थ की बातों पर ही धन का खर्च अधिक रह सकता है. 

धन योग तब बनता है जब लग्न और स्वामी मजबूत होते हैं. धन प्राप्ति के लिए अरिष्ट योग का अभाव होना चाहिए. अरिष्ट योग को धन योग के लिए अशुभ माना जाता है. धन के स्वामी की छठे या बारहवें भाव में अशुभ स्थिति धन हानि का कारण हो सकती है. धन योग आपके पिछले अच्छे कर्मों का भी परिणाम है. बुरे कर्म धन योग के प्रभाव को वापस ले लेते हैं. इस प्रकार योग एवं भावों की स्थिति धन योग पर असर डालती है, इसलिए छठे या बारहवें भाव में बना धन योग धन तो देता है लेकिन उसकी स्थिरता कमजोर होती है. 

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सूर्य महादशा में राहु अंतरदशा प्रभाव और परिणाम

ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को शक्ति और प्रभाव का कारक माना जाता है. इसकी शक्ति जहां भी मौजूद होती है वहां जीवन और प्रगति को दर्शाती है. यह आशावाद और चमक का प्रतीक है और क्रोध का भी इसकी शक्ति के समय सभी ग्रहों का तेज धीमा पड़ने लगता है. कुंडली में सूर्य की महादशा होती है, और यदि यह दशा मजबूत होती है तो जीवन में मान सम्मान को प्रदान करने वाली होती है. 

अब एक महादशा में जब किसी अन्य ग्रह की दशा आती है तो दोनों दशाओं के पारस्परिक संबंध का असर जीवन पर भी पड़ता है. इसी के संदर्भ में जब हम बात करते हैं सूर्य महादशा में राहु की अंतरदशा की तो जीवन के विभिन्न पहलुओं जैसे करियर, परिवार, व्यवसाय आदि में घटनाएं इस तरह से घटेंगी जो जीवन को बदल कर रख देंगी. यह दशा चुनौतियों के साथ साथ परेशानियों की अवधि का समय भी है. इस समय पर नाम, शोहरत, धन और मान सम्मान को लेकर चिंता, तनाव, भय और बड़े स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी झेलनी पड़ सकती हैं.   

ज्योतिष में सूर्य और राहु का विशेष प्रभाव 

सूर्य महादशा में राहु अंतरदश अके प्रभाव को समझने के लिए जरूरी है कि इन ग्रहों के फलों को उचित रुप से समझ लिया जाए. सूर्य ज्योतिष में शक्ति का प्रतीक है, यह दशा यदि कुंडली में सही है तो व्यक्ति को जीवन के विभिन्न स्वरूपों में बहुत शक्तिशाली बना सकती. करियरमें आगे बढ़ने का समय होता है. आपको अपने आसपास के लोगों के बीच पहचान पाने में मदद करती है. 

सूर्य की शुभ स्थिति आर्थिक लाभ भी दिलाती है. कार्यों में तेजी के साथ साथ मानसिक तनाव भी मिलता है  ज्योतिष में सूर्य शक्ति का प्रतीक है, यह अवधि व्यक्ति को जीवन के विभिन्न पहलुओं में बहुत शक्तिशाली बना सकती है. व्यक्ति कई जिम्मेदारियों को हाथ में लेकर आगे बढ़ता है. शक्ति आपको अपने आसपास के लोगों के बीच पहचान दिलाने में मदद करेगी. कुंडली में सूर्य की शुभ स्थिति आपको आर्थिक लाभ भी दिलाएगी. 

राहु को भ्रम कहा गया है. राहु महादशा इस इच्छा को सक्रिय करती है और एक व्यक्ति को अपने जुनून की खोज के लिए प्रेरित भी करती है. लालसा पाने की इच्छा किसी भी रुप में हो सकती है धन, शक्ति, प्रसिद्धि या ज्ञान व्यक्ति जो कुछ भी चाहता है, राहु प्रभाव के दौरान, उस लक्ष्य के लिए तेजी से आगे बढ़ता है. उसके लिए अन्य सब गौण हो जाता है. राहु प्रभाव  के दौरान, एक के बाद एक चीजों का पीछा करते हुए, वह कभी भी संतुष्ट नहीं हो पाता है. राहु का प्रभाव व्यक्ति को हताश कर सकता है, स्वार्थी और निंदक भी बना सकता है. किसी न किसी जुनून से ग्रस्त कर सकता है. व्यक्ति में विद्रोही प्रवृत्ति होती है. राहु कुंडली में अपनी स्थिति के आधार पर जीवन में सुख अथवा दुख का कारण बनता है. 

सूर्य महादशा के अधीन राहु अंतर्दशा

सूर्य महादशा में राहु अंतर्दशा का आगमन व्यक्ति के जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित करने वाला होता है. जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को ये दशा अवधि प्रभावित करने वाली होती है. निजी जीवन हो या कार्यक्षेत्र की स्थिति कुछ न कुछ नुकसान का सामना करना पड़ सकता है. जिन लोगों को सहयोगी समझा था वे अचानक से साथ छोड़ देते दिखाई देंगे. शत्रु अधिक चोट पहुंचाने का प्रयास करते हैं. इस दशा अवधि में अतिरिक्त सतर्क रहने की आवश्यकता होती है क्योंकि इस समय व्यक्ति अपना स्थान खो सकता है. ये समय जो  कर रहे हैं उसी पर अधिक टिका हुआ होता है और चीजें बदलने का समय भी होता है. 

सूर्य के साथ राहु का योग शुभता की को दर्शाता है इसलिए इस दशा को कई कारणों से संघर्ष और नवीनता से जुड़ने की दशा भी कहा जाता है. दूर्य एवं राहु दोनों ग्रह बहुत प्रभावशाली हैं और आपके जीवन को बहुत प्रभावित करते हैं. इस दशा के दौरान, शक्तिशाली और आधिकार जताने की प्रबला भी अधिक महसूस हो सकती है. कार्यक्षेत्र में शक्तिशाली स्थिति अर्जित कर पाने में भी सक्षम होते हैं. अपने परिवार के साथ एक उचित और तटस्थ संबंध स्थापित होता है. यह दशा समय जीवन को नकारात्मक रूप से भी प्रभावित कर सकता है और सकारात्मक रुप से भी. व्यक्ति  रिश्तों में बदलाव महसूस कर सकता है. परिवार संबंधों के मध्य दरार भी पैदा हो सकती है, व्यक्ति को मानसिक तनाव का भी सामना करना पड़ सकता है.

इस अवधि में संवाद कौशल में तेजी देखने को मिलती है, बोलचाल की स्थिति कठोर भी हो सकती है, लेकिन इसमें अधिकार पूर्ण स्थिति भी दिखाई देती है. अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना आसान नहीं होता है. मार्ग बाधाओं से भरा रहता है लेकिन यदि प्रयास करते हैं तो सफलता अवश्य मिल सकती है. इस अवधि में आप मानसिक तनाव अधिक बना रह सकता है. कुछ मामलों में  आस-पास के लोग अपना समर्थन नहीं देते हैं.

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