जानिए, राक्षस गण क्या होता है?

वर-वधू की कुण्डली का मिलान करते समय मांगलिक दोष व अन्य ग्रहों दोषों के साथ साथ अष्टकूट मिलान भी किया जाता है. अष्टकूट मिलान के अलावा इसे कूट मिलान भी कहा जाता है. कूट मिलान करते समय आठ मिलान प्रकार के मिलान किए जाते है. जिसमें वर्ण मिलान, वैश्य मिलान, तारा मिलान, योनि मिलान, ग्रह मिलान, गण मिलान, भकूट मिलान व नाडी मिलान है. गण मिलान में राक्षस गण में जन्म लेने वाले व्यक्ति कौन से जन्म नक्षत्र के हो सकते है. आइये जानने का प्रयास करते है.

गण मिलान क्यों किया जाता है

गण मिलान करने पर वर-वधू का वैवाहिक जीवन सुखी ओर सामान्य भलाई के कार्यो में व्यतीत होने की संभावनाएं देता है. विवाह पश्चात इस प्रकार की कोई परेशानी न हो, इसीलिए गण मिलान किया जाता है. ज्योतिष शास्त्रों में यह मान्यता है, कि जिन वर-वधू का विवाह गण मिलान करने के बाद किया जाता है, उनके वैवाहिक जीवन में परस्पर कम विरोधाभास रहते हैं.

गण मिलान से व्यक्ति स्वभाव और व्यवहार को समझने में सहायता मिलती हैं. जब सोच में एक जैसी अनुभूति दिखाई देगी तो व्यक्ति एक दूसरे के प्रति सहयोगात्मक नजरिया रख सकता है. एक दूसरे के साथ मिलकर जीवन में आने वाले विभिन्न पड़ावों को मिल कर पार करने में भी सक्षम होता है.

राक्षस गण नक्षत्र

जिन व्यक्तियों का जन्म कृतिका नक्षत्र, मघा नक्षत्र, आश्लेषा नक्षत्र, विशाखा नक्षत्र, शतभिषा नक्षत्र, चित्रा नक्षत्र, ज्येष्ठा नक्षत्र, घनिष्ठा नक्षत्र और मूल नक्षत्र में हुआ होता है, वे सभी व्यक्ति राक्षस गण के अन्तर्गत आते है.

राक्षस गण फल

राक्षस गण के अंतर्गत कठोरता की स्थिति अधिक दिखाई देती है. राक्षस गण में जातक कुछ मनमर्जी अधिक करने वाला होता है. वह अपनी जिद के आगे दूसरों की चलने नहीं देना चाहता है. इन नक्षत्रों में जिन व्यक्तियों का जन्म होता है, उन व्यक्तियों को कलह करने की आदत हो सकती है. वह कठोर भाषण करने का आदी होता है.

कई बार व्यक्ति अपनी काम से दूसरों के साथ साथ खुद के लिए भी संकट खड़ा कर सकता है. व्यक्ति साहसी होता है और वाद विवाद में आगे रहता है. आसानी से हार नहीं मानना चाहता है. अपने काम को निकलवाने के लिए हर स्तर का प्रयास करने की कोशिश भी करता है.

राक्षस गण के प्रभाव से व्यक्ति में जल्दबाजी का गुण भी होता है. वह हर चीज को उत्साह ओर जोश के साथ सबसे पहले कर लेने की इच्छा भी रखता है. व्यक्ति को चोट अधिक लगती है. दुसाहसिक काम करने में सदैव आगे रहता है. (stylerecap.com) अपने कठोर कर्म के कारण उसके खुद के लिए भी स्थिति परेशानी की हो सकती है.

गण मिलान में गुण किस प्रकार निर्धारित करें

वर ,कन्या का गण समान हो तो 6 गुण, वर का देव तथा कन्या का मानव गण हो तो 6 गुण , कन्या का देव तथा वर का राक्षस गण हो तो 1 गुण, कन्या का राक्षस तथा वर का देव गण हो या एक का मानव व दूसरे का राक्षस गण हो तो 0 गुण मिलता है.

शुभ गण मिलान

वर और वधु दोनों अगर समान गण वाले हों तो यह स्थिति अच्छी मानी जाती है. समान गण होने पर पूरे 6 अंक मिलते हैं.

अशुभ गण मिलान

लड़का व लड़की दोनों देव-राक्षस और राक्षस-देव गण के हों तो यह गण मिलान अच्छा नहीं माना जाता है. इस मिलान में सिर्फ 1 अंक दिया जाता है. इसके अतिरिक्त मनुष्‍य के साथ राक्षस अथवा या राक्षस के साथ मनुष्‍य गण मिलान बहुत खराब माना जाता है. इसमें 0 अंक मिलते हैं.

गण दोष फल

गण दोष होने पर दोनों विवाह सुख बाधित होता है. वैचारिक मतभेद उभर सकते हैं. अलगाव और रिश्ते में तलाक की स्थिति भी प्रभावित कर सकते हैं.

गण दोष परिहार कैसे करें

जब वर-वधू की कुण्डलियों में जन्म राशि के स्वामी या नवाशं कुण्डली के लग्नेशों में मैत्री संबन्ध हो, तो यह गण दोष का परिहार हो रहा होता है. ऎसे में विशेष रुप से यह ध्यान रखा जाता है, कि दोनों की कुण्डलियों में भकूट दोष नहीं होना चाहिए.

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सूर्य सिद्धांत | Surya Siddhanta – History of Astrology | Ancient Indian Astrology| Pitahma Siddhanta Description

वैदिक ज्योतिष के गर्भ में झांकने पर ज्योतिष के अनसुलझे रहस्य परत दर परत खुलते जाते है. वैदिक ज्योतिष से परिचय करने में वेद और प्राचीन ऋषियों के शास्त्र, सिद्धान्त हमारे मार्गदर्शक का कार्य करते है. ज्योतिष शास्त्र के सर्वोपरि ग्रन्थ को सूर्य सिद्धान्त के नाम से जाना जता है. इस सिद्धान्त को प्रतिपादित करने वाले ऋषि सूर्य रहे है. आईए संक्षेप में हम ज्योतिष शास्त्र के इतिहास के पन्ने पलटते है, देखते है, कि क्या मिलता है. 

प्राचीन भारतीय ज्योतिष | Ancient Indian Astrology

पौराणिक काल को ज्योतिष काल का स्वर्णिम काल माना जाता है. इस काल को स्वर्णिम बनाने में 18 ऋषियों ने अपना विशेष योगदान दिया था. इन 18 ऋषियों में सबसे पहला नाम ऋषि सूर्य का था. इन्होने सूर्य सिद्धान्तों का प्रादुर्भाव किया. 

इन सिद्वान्तों में ग्रहों का औसत भोगांश और ग्रहों की गति के सिद्धान्त की विधि का अच्छे ढंग से वर्णन किया गया है. यह दूसरे ग्रन्थों से अच्छा और विस्तृ्त है,  किन्तु आजकल इस पुस्तक में कुछ् संशोधन किये गए है. इस शास्त्र में मुख्यत” ज्योतिष के खगोलशास्त्र पर आधारित है. तथा इसे एक टीका के रुप में लिखा गया है. 

इस शास्त्र के नियमों को कई शास्त्रियो ने सम्पादित किया. परन्तु इसके सम्पादित अंश अभी उपलब्ध नही है. इस शास्त्र में जो नियम दिए गये है उसमें ब्रह्माण्डीय पिन्डों की गति को वास्तविक माना गया है. यह विभिन्न तारों की स्थितियों, चन्द्र और नक्षत्रों भी ज्ञान करता है. साथ ही इन नियमों का पालन करते हुए सूर्य ग्रहण का भी आकलन किया जा सकता है.  

पितामह सिद्धान्त

 

ज्योतिष के तीन स्कन्ध ज्योतिष की तीन भाग है. इसमें भी सिद्वान्त ज्योतिष सर्वोपरि है. सिद्वान्त ज्योतिष को बनाने में पौराणिक काल के उपरोक्त 18 ऋषियों ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था. इन सभी ऋषियों के शास्त्रों के नाम इन ऋषियों के नाम पर रखे गए है. इन्हीं में से एक शास्त्र पितामह सिद्धान्त है. इसे बनाने वाले ऋषि पितामह थे.   

पितामह सिद्धान्त ज्योतिष् के पौराणिक काल 8300 ईसा पूर्व से 3000 वर्ष ईसा के पूर्व तक माना जाता है. इस काल में ज्योतिष के क्षेत्र में अनेक ऋषियों ने विशेष कार्य किया. इन महान ऋषियों का नाम निम्न है. 

सिद्धान्त ज्योतिष के 18 ऋषियों के नाम- Siddhanta Jyotish : Name of 18 Rishi

 

सूर्य: पितमहो व्यासो वशिष्ठोअत्रि पराशर: ।

कश्यपो नारदो गर्गो मरिचिमनु अंगिरा ।।

लोमश: पोलिशाशचैव च्यवनो यवनों मृगु: ।

शोनेको अष्टादशाश्चैते ज्योति: शास्त्र प्रवर्तका ।।

अर्थात वैदिक ज्योतिष को ऊंचाईयों पर ले जाने वाले ऋषियों में ऋषि सूर्य, ऋषि पितामह, ऋषि व्यास, ऋषि वशिष्ठ, ऋषि अत्रि, ऋषि पराशर, ऋषि कश्यप, ऋषि नारद, ऋषि गर्ग, ऋषि मरीचि, ऋषि मनु, ऋषि अंगीरश, ऋषि लोमश, ऋषि पोलिश, ऋषि चवन, ऋषि यवन, ऋषि भृ्गु, ऋषि शौनक आते हे.

पितामह सिद्वान्त वर्णन | Pitahma Siddhanta Description

पितामह सिद्वान्त को बनाने वाले ऋषि पितामह थे. पितामह सिद्धान्त एक खगोल संबन्धी शास्त्र है. इस शास्त्र में सूर्य की गति व चन्द्र संचार की गणनाओं का उल्लेख किया गया है. यह शास्त्र आज अधूरा ही उपलब्ध है. 

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कैसिटेराइट उपरत्न । Cassiterite Gemstone | Cassiterite – Metaphysical Properties

कैसिटेराइट बहुत ही महत्वपूर्ण तथा दुर्लभ अयस्क है जो टिन से मिलता है. यह उपरत्न काले, हल्के काले, काले-भूरे, पीलेपन में, हरापन लिए, लाल तथा रंगहीन रुप में पाया जाता है.  इस उपरत्न को यह नाम कैसिटेराइड्स शब्द से मिला है जो प्राचीन रोमन समय के ब्रिटीश द्वीपों के वर्णन में उपयोग में लाया जाता था.  इसका सबसे अधिक उपयोग रत्न के रुप में किया जाता है. ग्रीक भाषा में कैसिटेरोस शब्द का अर्थ टिन होता है इसलिए कई विद्वान इस उपरत्न के नाम को ग्रीक भाषा से लिया मानते हैं. कई स्थानों पर इसे टिन उपरत्न भी कहा जाता है.

यह उपरत्न मुख्य रुप से जलोढ़ स्थानों की सतहों पर पाया जाता है. टिन की यह खानें प्रमुख रुप से बोलीविया के जलतापीय स्थानों में पाई जाती हैं. यह उपरत्न अयस्क के छोटे तत्व में उपलब्ध है जो आग्नेय चट्टानों से प्राप्त होता है. कैसिटेराइट अयस्क को विभिन्न प्रकार से अलंकृत तथा व्यवस्थित करके और उसे चमकाकर उपयोग में लाया जाता है. यह उपरत्न अन्य कई उपरत्नों के साथ पाया जाता है. यह उपरत्न टिन का मुख्य अयस्क है.

यह खानों में से काले तथा अपारदर्शी रुप में पाया जाता है, जो गहनों के रुप में प्रयोग में लाया जाता है. इस उपरत्न के क्रिस्टल आमतौर पर छोटे तथा ठूंठदार प्रिज्म के रुप में पाए जाते हैं. लाल, भूरेपन में  पारदर्शी रुप में यह दुर्लभ ही पाया जाता है. पारदर्शी रुप में यह उपरत्न हीरे तथा भूरे जर्कन का भ्रम पैदा करता है. यह उपरत्न हीरे से भी अधिक तेजी से आग फैलाने वाला उपरत्न है. टिन का उपयोग प्राचीन समय से ही लोगों द्वारा किया जा रहा है. पहले समय में भोजन रखने के लिए टिन से बने बर्तनों का उपयोग किया जाता था. 

कैसिटेराइट का उपयोग | Use Of Cassiterite Gemstone

यह धारणकर्त्ता के सपनों के आशय को समझकर उन्हें अभिव्यक्त करने में और उन्हें पाने में मदद करता है. लक्ष्यों को पाने के लिए ध्यान केन्द्रित करता है. यह धारणकर्त्ता को संरक्षण प्रदान करता है और व्यक्ति को स्वभाविक रुप से व्यवहारिक बनाता है. जिन व्यक्तियों को अस्वीकार कर दिया जाता है. जिनके साथ पक्षपात का व्यवहार होता है, जिनका परित्याग कर दिया जाता है अथवा जिन्हें स्वीकारा नहीं जाता है उनके लिए यह उपरत्न अनुकूल प्रभाव रखने वाला होता है. यह उनके सभी दुखों को हरने का काम करता है. 

व्यक्ति विशेष के मन से दुखों के साथ नकारात्मक सोच को भी दूर करने में सहायक सिद्ध होता है. यह उपरत्न आशावाद तथा सकारात्मक भावना का जातक में विकास करता है. 

कैसिटेराइट के भौतिक तथा आध्यात्मिक गुण | Physical And Metaphysical Properties Of Cassiterite

यह उपरत्न खाने से संबंधित विकारों को दूर करने में उपयोगी होता है. यह उपरत्न सामान्य तथा अनिवार्य व्यवहार को नियंत्रित रखता है. इस उपरत्न को मोटापा कम करने के लिए भी उपयोग में लाया जाता है. यह हार्मोन्स से संबंधित परेशानियों को दूर करता है. हार्मोन्स की गड़बडी़ को ठीक करने में सहायक होता है. यह व्यक्ति के अनाहत चक्र तथा मनीपूरक चक्र को नियंत्रित करता है. दिल तथा पेट से संबंधित विकारों को होने से रोकता है. 

कौन धारण करे | Who Should Wear Cassiterite Gemstone

पेट तथा दिल से जुडी़ परेशानियों से बचने के लिए कैसिटेराइट उपरत्न का उपयोग किया जा सकता है. 

कहाँ पाया जाता है | Where is Cassiterite Gemstone Found

यह उपरत्न प्रमुख रुप से बोलीविया की खानों में पाया जाता है. वर्तमान समय में यह उपरत्न चीन, इन्डोनेशिया, मेक्सिको, रुस, ब्रिटेन, इक्वेडोर, ब्राजील, मलेशिया, आस्ट्रेलिया, अमेरिका, कनाडा, काँगों, थाईलैण्द, जायरे, नाईजीरिया तथा मलाय प्रायद्वीप में पाया जाता है. 

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हर्ष योग | हर्ष विपरीत राज योग | Harsh Vipreet Raj Yoga | Harsh Yoga | Harsh Yoga Result

विपरीत राज योग त्रिक भावों के स्वामियों के परस्पर स्थान परिवर्तन से बनता है. यह योग तीन प्रकार से बन सकता है. तीनों प्रकारों के नाम अलग अलग है. इन्हीं तीनों योगों में से एक योग है, हर्ष योग..

हर्ष योग कैसे बनता है. | How is Formed Harsh Vipareeta Raja Yoga 

जब कुण्डली में छठे भाव में पाप ग्रह हो या पाप ग्रहों की दृष्टि हो तो अथवा छठे भाव का स्वामी छठे, आंठवें या बारहवें भाव में हो तो हर्ष योग बनता है.  इसे हर्ष विपरीत राज योग भी कहते है. 

हर्ष योग फल । Harsh Yoga Result 

इस योग में छठे भाव का संबन्ध आंठवें भाव या बारहवें भाव से बनता है. इसलिए यह योग व्यक्ति को अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की क्षमता देता है.  इस योग से युक्त व्यक्ति का शरीर सुडौळ होता है. उस व्यक्ति के पास धन -संपति होती है. वह समाज के गणमान्य व्यक्तियों की संगति में रहता है. इसके अतिरिक्त इस योग के व्यक्ति को जीवन साथी और संतान और मित्रों का सहयोग प्राप्त होता है. 

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क्या है फाल्गुन माह का महत्व और फाल्गुन माह में आने वाले व्रत त्योहार

फाल्गुन माह को फागुन माह भी हा जाता है. इस माह का आगमन ही हर दिशा में रंगों को बिखेरता सा प्रतीत होता है. मौसम में मन को भा लेने वाला जादू सा छाया होता है. इस माह के दौरान प्रकृति में अनूपम छटा बिखरी होती है. इस मौसम में चंद्रमा के जन्म से संबंधित पौराणिक आख्यान भी मौजूद हैं, इसी कारण इस माह में चंद्रमा की पूजा का भी विशेष महत्व बताया गया है.

इस माह के दौरान भगवान शिव, भगवान विष्णु एवं चंद्र देव की पूजा का महत्व बताया गया है. फाल्गुन माह के दौरान देवी लक्ष्मी और माता सीता की पूजा का विधान भी रहा है. फाल्गुन माह आखिरी महीना होता है, इस माह के दौरान प्रकृति का एक अलग रुप दृष्टि में आता है. इसी समय पर भक्ति के साथ शक्ति की आराधना भी होती है. फाल्गुन माह भी अन्य माह की भांति ही धार्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि से महत्व रखता है.

फाल्गुन माह में जन्मा जातक

फाल्गुन माह में जन्म लेने वाला व्यक्ति गौरे रंग का होता है. दिखने में आकर्षक लगता है. बोल चाल में अधिक कुशल होता है. जातक का मन चंचल हो सकता है. बहुत अधिक चीजों को लेकर गंभीर न रह पाए. वह परोपकार के कार्यो में रुचि लेता है, तथा अपनी विद्वता से वह धन कमाने में सफल रहता है.

जातक द्वारा किए गये कार्यो में बुद्धिमानी का भाव पाया जाता है. प्रेम संबंधों के प्रति रुझान भी रखता है. वह जीवन में सभी भौतिक सुख-सुविधाएं प्राप्त करने में सफल रहता है. इसके अतिरिक्त उसे विदेश में भ्रमण के अवसर प्राप्त होते है. अपने प्रेमी के प्रति भावनात्मक झुकाव भी बहुत अधिक रखता है.

फाल्गुन माह विशेष पर्व

फाल्गुन मास मात्र इसलिए नहीं जाना जाता क्योकिं इस माह में होली का पर्व आता है. बल्कि इस माह का धार्मिक महत्व भी है. यह माह पतझड के बाद जीवन की एक नई शुरुआत का माह है. जिस प्रकार रात के बाद सुबह अवश्य आती है. उसी प्रकार व्यक्ति जीवन की बाधाओं को पार करने के बाद उन्नति की एक नई शुरुआत करता है. फागुन मास के दौरान बहुत से पर्व मनाए जाते हैं जिसमें से मुख्य होली, शिवरात्रि, फाल्गुन पूर्णिमा और एकादशी नामक उत्सव मनाए जाते हैं.

विजया एकादशी –

इस माह में आने वाली एकादशी विजया एकादशी कहलाती है. इस दिन भगवान राम ने रावण पर विजय प्राप्त कि थी.

होलाष्टक –

इस समय के दोरान होलाष्टक लग जाता है. यह आठ दिनों का समय होता है जिसमें सभी शुभ काम रुक से जाते हैं इस समय पर विवाह इत्यादि कार्य नहीं होते हैं.

होली –

होली का आगमन प्रकृति से संबंधित होता है. होली रंगों का त्यौहार है जिसमें जीवन के भी सभी रंग मिल कर एक हो जाते हैं.

महाशिवरात्रि –

फाल्गुन माह की चतुर्दशी के दिन शिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है. शिवरात्रि के दिन भगवान शिव का पौराणिक मान्यता अनुसार इसी दिन से सृष्टि का प्रारंभ भी माना गया है. इस शुभ दिन में महादेव और माता पार्वती का विवाह हुआ था. वर्षभर में आने वाली 12 शिवरात्रियों में से फाल्गुन मास में आने वाली शिवरात्रि को महाशिवरात्रि के नाम से भी पुकारा जाता है और यह सबसे अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है.

फाल्गुन मास की महत्वपूर्ण बातें

  • फाल्गुन मास के दौरान व्यक्ति अपने आहा का विशेष ध्यान रखना चाहिए.
  • सामान्य एवं संतुलित आहार करना ही उत्तम होता है.
  • इस मौसम में पानी को गरम करके स्नान नहीं करना चाहिए. शीतल जल से ही स्नान करना उत्तम होता है.संभव हो सके तो गंगा स्नान का लाभ अवश्य उठाएं.
  • भोजन में अनाज का प्रयोग कम से कम करें , अधिक से अधिक फल खाएं.
  • अपनी साफ सफाई और रहन सहन को लेकर भी सौम्यता और शालिनता बरतनी चाहिए.
  • इस माह के दौरान तामसिक एवं गरिष्ठ भोजन अर्थात मांस मंदिरा और तले-भुने भोजन को त्यागना चाहिए.
  • फाल्गुन माह में पूजा पाठ कैसे करें

  • इस माह के दौरान भगवान कृष्ण का पूजन करते समय फूल एवं फूलों का उपयोग अधिक करना चाहिए.
  • भगवान शिव को बेल पते चढ़ाने चाहिए.
  • फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन देवताओं को अबीर और गुलाल अर्पित करने चाहिए.
  • आर्थिक एवं दांपत्य सुख समृद्धि के लिए माता पार्वती एवं देवी लक्ष्मी की उपासना में कुमकुम एवं सुगंधित वस्तुओं का उपयोग करना शुभकारी होता है.
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    बुधवार व्रत | How to Observe Budhvar Vrat? – Wednesday Fast Aarti (Wednesday Vrat Katha) | Wednesday Fasting in Hindi

    बुधवार का व्रत करने की विधि | Wednesday Fast Method

    जिस व्यक्ति को बुधवार का व्रत करना हों, उस व्यक्ति को व्रत के दिन प्रात: काल सूर्योदय से पूर्व उठना चाहिए. उठने के बाद प्रात: काल में उठकर पूरे घर की सफाई करनी चाहिए. इसके बाद नित्यक्रिया से निवृ्त होकर, स्नानादि कर शुद्ध हो जाना चाहिए. स्नान करने के बाद संपूर्ण घर को गंगा जल छिडकर शुद्ध करना चाहिए. गंगा जल ने मिलें, तो किसी पवित्र नदी का जल भी छिडका जा सकता है. 

    इसके पश्चात घर के ईशान कोण में किसी एकांत स्थान में भगवान बुध या शंकर की मूर्ति अथवा चित्र किसी कांस्य के बर्तन में स्थापित करना चाहिए. मूर्ति या चित्र स्थापित करने के बाद धूप, बेल-पत्र, अक्षत और घी का दीपक जलाकर पूजन करना चाहिए. इसके बाद निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए बुधदेव की आराधना करनी चाहिए  

    बुध त्वं बुद्धिजनको बोधद: सर्वदा नृणाम्।

    तत्वावबोधं कुरुषे सोमपुत्र नमो नम:॥

    पूरे दिन व्रत करने के बाद सायंकाल में भगवान बुध की एक बार फिर से पूजा करते हुए, व्रत कथा सुननी चाहिए. और आरती करनी चाहिए. सूर्यास्त होने के बाद भगवान को धूप, दीप व गुड, भात, दही का भोग लगाकर प्रसाद बांटना चाहिए, और सबसे अंत में स्वयं भी प्रसाद ग्रहण करना चाहिए. 

    बुधवार व्रत का महत्व | Importance of Wednesday Fast

    बुधवार का व्रत करने से व्यक्ति की बुद्धि में वृ्द्धि होती है. इसके साथ ही व्यापार में सफलता प्राप्त करने के लिये भी इस व्रत को विशेष रुप से किया जाता है. व्यापारिक क्षेत्र की बाधाओं में कमी करने में भी यह व्रत लाभकारी रहता है. इसके अतिरिक्त जिन व्यक्तियों की कुण्डली में बुध अपने फल देने में असमर्थ हो, उन व्यक्तियों को यह व्रत विशेष रुप से करना चाहिए. इसके अलावा जब कुण्डली में बुध अशुभ भावों का स्वामी होकर अशुभ भावों में बैठा हो, उस अवस्था में भी इस व्रत को करना कल्याणकारी रहता है. 

    बुधवार व्रत में ध्यान रखने योग्य बातें | Things to Remember for Wednesday Fast

    इस दिन भगवान की पूजा करने के बाद देव की हरे रंग की वस्तुओं से पूजा करनी चाहिए. सायंकाल में व्रत का समापन करने के बाद यथा शक्ति ब्राह्माणों को भोजन कराकर उन्हें दान अवश्य देना चाहिए. और व्रत करने वाले व्यक्ति को एक ही समय भोजन करना चाहिए. व्रत को मध्य में कभी नहीं छोडना चाहिए. तथा व्रत की कथा के मध्य में उठकर नहीं जाना चाहे. साथ ही प्रसाद भी अवश्य ग्रहण करना चाहिए.  

    बुधवार व्रतकथा | Wednesday Vrat Katha

    समतापुर नगर में मधुसूदन नामक एक व्यक्ति रहता था. वह बहुत धनवान था. मधुसूदन का विवाह बलरामपुर नगर की सुंदर और गुणवंती लड़की संगीता से हुआ था. एक बार मधुसूदन अपनी पत्नी को लेने बुधवार के दिन बलरामपुर गया.

    मधुसूदन ने पत्नी के माता-पिता से संगीता को विदा कराने के लिए कहा. माता-पिता बोले- ‘बेटा, आज बुधवार है. बुधवार को किसी भी शुभ कार्य के लिए यात्रा नहीं करते.´ लेकिन मधुसूदन नहीं माना. उसने ऐसी शुभ-अशुभ की बातों को नहीं मानने की बात कही. बहुत आग्रह करने पर संगीता के माता-पिता ने विवश होकर दोनों को विदा कर दिया.

    दोनों ने बैलगाड़ी से यात्रा प्रारंभ की. दो कोस की यात्रा के बाद उसकी गाड़ी का एक पहिया टूट गया. वहाँ से दोनों ने पैदल ही यात्रा शुरू की. रास्ते में संगीता को प्यास लगी. मधुसूदन उसे एक पेड़ के नीचे बैठाकर जल लेने चला गया.

    थोड़ी देर बाद जब मधुसूदन कहीं से जल लेकर वापस आया तो वह बुरी तरह हैरान हो उठा क्योंकि उसकी पत्नी के पास उसकी ही शक्ल-सूरत का एक दूसरा व्यक्ति बैठा था. संगीता भी मधुसूदन को देखकर हैरान रह गई. वह दोनों में कोई अंतर नहीं कर पाई.

    मधुसूदन ने उस व्यक्ति से पूछा- ‘तुम कौन हो और मेरी पत्नी के पास क्यों बैठे हो?´ मधुसूदन की बात सुनकर उस व्यक्ति ने कहा- ‘अरे भाई, यह मेरी पत्नी संगीता है. मैं अपनी पत्नी को ससुराल से विदा करा कर लाया हूँ. लेकिन तुम कौन हो जो मुझसे ऐसा प्रश्न कर रहे हो?´

    मधुसूदन ने लगभग चीखते हुए कहा- ‘तुम जरूर कोई चोर या ठग हो. यह मेरी पत्नी संगीता है. मैं इसे पेड़ के नीचे बैठाकर जल लेने गया था.´ इस पर उस व्यक्ति ने कहा- ‘अरे भाई! झूठ तो तुम बोल रहे हो. संगीता को प्यास लगने पर जल लेने तो मैं गया था. मैंने तो जल लाकर अपनी पत्नी को पिला भी दिया है. अब तुम चुपचाप यहाँ से चलते बनो. नहीं तो किसी सिपाही को बुलाकर तुम्हें पकड़वा दूँगा.´

    दोनों एक-दूसरे से लड़ने लगे. उन्हें लड़ते देख बहुत से लोग वहाँ एकत्र हो गए. नगर के कुछ सिपाही भी वहाँ आ गए. सिपाही उन दोनों को पकड़कर राजा के पास ले गए. सारी कहानी सुनकर राजा भी कोई निर्णय नहीं कर पाया. संगीता भी उन दोनों में से अपने वास्तविक पति को नहीं पहचान पा रही थी.

    राजा ने दोनों को कारागार में डाल देने के लिए कहा. राजा के फैसले पर असली मधुसूदन भयभीत हो उठा. तभी आकाशवाणी हुई- ‘मधुसूदन! तूने संगीता के माता-पिता की बात नहीं मानी और बुधवार के दिन अपनी ससुराल से प्रस्थान किया. यह सब भगवान बुधदेव के प्रकोप से हो रहा है.´

    मधुसूदन ने भगवान बुधदेव से प्रार्थना की कि ‘हे भगवान बुधदेव मुझे क्षमा कर दीजिए. मुझसे बहुत बड़ी गलती हुई, भविष्य में अब कभी बुधवार के दिन यात्रा नहीं करूँगा और सदैव बुधवार को आपका व्रत किया करूँगा.´

    मधुसूदन के प्रार्थना करने से भगवान बुधदेव ने उसे क्षमा कर दिया. तभी दूसरा व्यक्ति राजा के सामने से गायब हो गया. राजा और दूसरे लोग इस चमत्कार को देख हैरान हो गए, भगवान बुधदेव की इस अनुकम्पा से राजा ने मधुसूदन और उसकी पत्नी को सम्मानपूर्वक विदा किया.

    कुछ दूर चलने पर रास्ते में उन्हें बैलगाड़ी मिल गई. बैलगाड़ी का टूटा हुआ पहिया भी जुड़ा हुआ था. दोनों उसमें बैठकर समतापुर की ओर चल दिए. मधुसूदन और उसकी पत्नी संगीता दोनों बुधवार को व्रत करते हुए आनंदपूर्वक जीवन-यापन करने लगे.

    भगवान बुधदेव की अनुकम्पा से उनके घर में धन-संपत्ति की वर्षा होने लगी. जल्दी ही उनके जीवन में खुशियाँ ही खुशियाँ भर गईं. बुधवार का व्रत करने से स्त्री-पुरुषों के जीवन में सभी मंगलकामनाएँ पूरी होती हैं. और व्रत करने वाले को बुधवार के दिन किसी आवश्यक काम से यात्रा करने पर कोई कष्ट भी नहीं होता है.

    बुधवार व्रत की आरती | Wednesday Fast Aarti : 

    आरती युगलकिशोर की कीजै। तन मन धन न्योछावर कीजै॥
    गौरश्याम मुख निरखन लीजै। हरि का रूप नयन भरि पीजै॥

    रवि शशि कोटि बदन की शोभा। ताहि निरखि मेरो मन लोभा॥
    ओढ़े नील पीत पट सारी। कुंजबिहारी गिरिवरधारी॥

    फूलन सेज फूल की माला। रत्न सिंहासन बैठे नंदलाला॥
    कंचन थार कपूर की बाती। हरि आए निर्मल भई छाती॥

    श्री पुरुषोत्तम गिरिवरधारी। आरती करें सकल नर नारी॥
    नंदनंदन बृजभान किशोरी। परमानंद स्वामी अविचल जोरी॥

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    चिकित्सा ज्योतिष में ग्रहों के कारक तत्व | Elements of the Planets in Medical Astrology

    जैसे भचक्र की भिन्न-भिन्न राशियों तथा नक्षत्रों का अधिकार क्षेत्र शरीर के विभिन्न अंगों पर है, ठीक उसी प्रकार भिन्न-भिन्न ग्रह भी शरीर के विभिन अंगों से संबंधित है. इसके अतिरिक्त कुछ रोग, ग्रह अथवा नक्षत्र की स्वाभाविक प्रकृति के अनुसार जातक को कष्ट देते हैं.

    अत: भावों, राशियों, नक्षत्रों तथा ग्रहों एवं विशिष्ट समय पर चल रही दशाओं के व्यापक विचार के बाद शरीर पर रोग का स्थान एवं प्रकृति, निदान तथा रोग का संभावित समय एवं परिणाम ज्ञात करना भी संभव है. चिकित्सा ज्योतिष में विभिन्न ग्रहों के कारक तत्व यहाँ पर संक्षिप्त रूप में दिये जा रहे है.

    सूर्य | The Sun

    यह पित्त प्रकृति का कारक ग्रह है. इसका बलाबल किसी व्यक्ति के सामान्य स्वास्थ्य को प्रतिबिंबित करता है. इनका अधिकार क्षेत्र ह्रदय, पेट, अस्थि तथा दाहिनी आँख है. चिकित्सीय क्षेत्र में सूर्य के अधिकार क्षेत्र में सिरदर्द, गंजापन,चि़डचिडापन, ज्वर, दर्द, जलना, पित की सूजन से होने वाले रोग, ह्रदय रोग , नेत्र रोग, पेट की बीमारियाँ आते हैं.

    चन्द्र | The Moon

    यह ग्रह वात तत्व, कफ प्रकृति का है. यह मन की स्थिरता तथा पुष्टता को प्रतिबिंबित करता है. मन के प्रतिनिधित्व के अतिरिक्त इसका अधिकार क्षेत्र शरीर में बहने वाले द्रव, रक्त तथा बायीं आँख है. यह मानसिक रोग संबंधी समस्याएं, मानसिक विचलन, भावात्मक अशांति, घबराना, अतिनिद्रा आदि भी दे सकता है.

    चन्द्र के अधिकार क्षेत्र में क्षयरोग, रक्ताल्पता, अतिसार, रक्त विषाक्तता, पीलिया, जल और जलीय जंतुओं से होने वाले रोग आते हैं. चन्द्र तथा मंगल मिलकर स्त्रियों में माहवारी चक्र, प्रजनन प्रणाली आदि सम्बन्धी रोग देते है. 

    मंगल | The Mars

    यह ग्रह पित्त प्रकृति का कारक है. उर्जा शक्ति, उत्साह और जोश का प्रतीक है. तेज व चेतना की प्रबलता को प्रतिबिंबित करता है. इसके अधिकार क्षेत्र है – सिर, अस्थि मज्जा, पित्त, हिमोग्लोबिन, कोशिकाएं, गर्भाशय की अंत: दीवार, दुर्घटना, चोट, शल्य क्रियाएँ, जल जाना, रक्त विकार, तन्तुओं की फटन, उच्च रक्त चाप, पित्त जनित सूजन तथा उसके कारण होने वाला ज्वर. अत्यधिक प्यास, नेत्र विकार, मिरगी, अस्थि टूटना, गर्भाशय के रोग, प्रसव तथा गर्भपात, सिर में चोट, लड़ाई में चोट आदि.

    बुध | The Mercury

    बुध वात, पित्त तथा कफ तीनों प्रकृति का कारक है. बुध बुद्धि, तर्क तथा विवेक देता है. प्रतिकूल बुध पापी चन्द्र के साथ मिलकर किसी की विचारधारा को व्यग्र कर सकता है. मानसिक विचलन का कारण बन सकता है. इसका अधिकार त्वचा, गला, नाक, फेफड़ा तथा धैर्य हीनता, मानसिक अस्थिरता, मानसिक जटिलता, अभद्र भाषा, दोषपूर्ण वाणी, चक्कर आना, श्वेत कुष्ठ रोग, नपुंसकता और बहरेपन पर है.

    गुरु | The Jupiter

    गुरु कफ प्रकृति के है. शुभ ग्रह होने के कारण रोगों से रक्षा करता है. इसका अधिकार क्षेत्र यकृत विकार, पित्त की थैली के रोग, तिल्ली के रोग, मोटापा, रक्ताल्पता, ज्वर, मूर्छा, कर्ण रोग, मधुमेह इत्यादि है. अग्नाशय का कुछ क्षेत्र तथा शरीर में चर्बी पर भी गुरु का अधिकार है. इसके अतिरिक्त गुरु आलस्य का भी कारक है.

    शुक्र | The Venus

    शुक्र वात तथा कफ प्रकृति का है. यह व्यक्ति की यौन क्रियाओं को नियंत्रित करता है. यदि अधिक पीड़ित हो अथवा अशुभ स्थान में हो तो जननांग सम्बन्धी रोग देता है. इसका अधिकार क्षेत्र चेहरा, दृष्टि, वीर्य, जननांग, मूत्र प्रणाली, अश्रुग्रंथी पर है. यह अग्नाशय के कुछ भाग का भी कारक है.इसके द्वारा शरीर की हारमोनल प्रणाली नियंत्रित होती है. शुक्र यौन विकार, नेत्र रोग, मोतिया बिन्द, श्वेत कुष्ठ, गुप्त रोग, मधुमेह आदि रोग दे सकता है.

    शनि | The Saturn

    यह ग्रह वात और कफ प्रकृति का है. यह असाध्य अथवा अतिदीर्घ कालिक रोग देते है. शनि के अधिकार क्षेत्र में टाँगे, नाडी, बड़ी आंत का अंतिम भाग, गुदा आते हैं. इसके प्रभाव के कारण व्यक्ति को पक्षाघात, पागलपन, कैंसर, अति परिश्रम, थकान, टांग तथा पैर के रोग, चोट, अवसाद तथा खिन्नता के कारण मानसिक अव्यवस्था, पेट के रोग, पेड़ से गिरने तथा पत्थर से चोट आदि  लगने की संभावना बनती है.

    राहु | The Rahu

    राहु के अधिकार क्षेत्र में कार्य को मंदगति से करना, फूहड़पन, हिचकी, उन्माद, कुष्ठ रोग, शक्तिहीनता, असाध्य रोग, विषाक्ता, सर्प दंश, पैरों के रोग आदि आते है. यह शनि के समान होने के कारण शनि के रोग भी देता है.

    केतु | The Ketu

    राहु के सभी रोग केतु भी दे सकता है, इसके अतिरिक्त केतु अनिश्चित कारण वाले रोग, महामारी, छाले युक्त ज्वर, जहरीले संक्रमण से होने वाले संक्रामक रोग, बहरापन, दोषपूर्ण वाणी, शल्यक्रिया आदि भी दे सकता है.

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    क्या हीरा अनुकुल रहेगा? | Is Heera Stone Good for Me (Can I Wear Diamond)

    शुक्र रत्न हीरा सदा से ही अपने आकर्षक आभा के कारण चर्चा का विषय रहा है. इस रत्न को वज्रमणी, इन्द्रमणी, भावप्रिय, मणीवर, कुलीश आदि नामों से भी पुकारा जाता है. हीरा धारण करने वाले व्यक्ति के वैवाहिक सुख-शान्ति में वृ्द्धि होती है. यह सुंदरता, कलाकौशल, शौक व वाहन प्राप्ति के लिये मुख्य रुप से धारण किया जाता है. 

    हीरा रत्न कौन धारण करें? | Who Should Wear Heera Stone

    हीरा रत्न अपनी अद्वितीय सुंदरता व बेजोड गुणों के कारण आज भी सभी रत्नों में सबसे अधिक लोकप्रिय है. हीरे के विषय में एक मान्यता है, कि इस रत्न को धारण करने से व्यक्ति को जादू, तंत्र-मंत्र व करणीबाधा, भूत आदि पराविधा में कमी होती है. लग्न के अनुसार किसी व्यक्ति के लिये यह रत्न किस प्रकार का फल देता है, आईये इसका विचार करते है.    

    मेष लग्न- हीरा रत्न | Diamond Stone for Aries Lagna

    मेष लग्न में शुक्र दूसरे व सप्तम भाव के स्वामी है. कुंडली की इन दोनों को मारक भाव कहा गया है. इसलिये मेष लग्न के व्यक्तियों को जहां तक हो सके हीरा धारण करने से बचना चाहिए. जरूरी होने पर केवल शुक्र महादशा में ही इसे धारण करना चाहिए. 

    वृ्षभ लग्न-हीरा रत्न | Effect of Heera Stone on Taurus Lagna

    इस लग्न में शुक्र लग्नेश व पंचमेश होते है. इसलिये इस लग्न के व्यक्तियों को हीरा सदैव धारण करके रखना चाहिए. यह रत्न व्यक्ति को आयु वृ्द्धि, सर्वागींण विकास व आर्थिक प्रगति देता है.    

    मिथुन लग्न-हीरा रत्न | Influence of Heera on Gemini Lagna

    मिथुन लग्न में शुक्र व्ययेश व पंचमेश होते है. इस लग्न के व्यक्ति हीरा सदैव धारण करें.  

    कर्क लग्न-हीरा रत्न | Diamond for Cancer Lagna

    इस लग्न के शुक्र चतुर्थेश व एकादशेश शुक्र होते है. यहां पर ये लग्नेश चन्द्र के मित्र भी नहीं है. इसलिये केवल शुक्र महादशा अवधि में ही इसे धारण करना चाहिए.    

    सिंह लग्न-हीरा रत्न | Impact of Heera Gemstone on Leo Lagna

    सिंह लग्न के लिये शुक्र तीसरे व दशम भाव के स्वामी है. इसलिये सिंह लग्न वालों को हीरा धारण नहीं करना चाहिए. फिर भी बेहद जरूरी होने पर इसे केवल शुक्र महादशा में धारण करना चाहिए.  

    कन्या लग्न-हीरा रत्न | Heera Stone – Effect on Virgo Lagna

    कन्या लग्न में धनेश व भाग्येश शुक्र है. इस लग्ने के लिये शुक्र सबसे अधिक शुभ फल देने वाले ग्रह है. इसलिये इस लग्न के व्यक्तियों को लिये शुक्र रत्न हीरा सदैव धारण करना चाहिए. 

    तुला लग्न-हीरा रत्न | Influence of Diamond Stone on Libra Lagna

    तुल लग्न के लिए शुक्र लग्नेश तथा अष्टमेश बनते है. तुला लग्न के व्यक्तियों के लिये हीरा स्वास्थय कवच का काम करेगा. इसलिये इस लग्न के व्यक्ति हीरा अवश्य धारण करें.  

     

    वृ्श्चिक लग्न-हीरा रत्न | Diamond Gemstone for Scorpio Lagna

    वृ्श्चिक लग्न के लिए शुक्र सप्तम व व्यय भाव के स्वामी होने के कारण मध्यम स्तरीय शुभ होते है. इसलिये वृ्श्चिक लग्ने के व्यक्ति हीरा नहीं पहनें. 

     

    धनु लग्न-हीरा रत्न | Effect of Heera Stone on Sagittarius Lagna

    धनु लग्न के लिये शुक्र छठे व ग्यारहवें, स्थान का स्वामी होते है. इस लग्न के व्यक्ति भी आय वृ्द्धि के अलावा अन्य विषयों के लिये हीरा न पहनें.    

    मकर लग्न-हीरा रत्न | Diamond Stone – Influence on Capricorn Lagna

    मकर लग्न के लिये शुक्र पंचमेश व दशमेश होते है. इस लग्न के लिये शुक्र शुभ फल देने वाले ग्रह है. अत: इस लग्न के व्यक्ति हीरा अवश्य धारण करें.   

    कुम्भ लग्न-हीरा रत्न | Benefits of Diamond for Aquarius Lagna

    कुंभ लग्न के लिये शुक्र चतुर्थेश व नवमेश होते है. शुक्र यहां योगकारक ग्रह होने के कारण बेहद शुभ हो जाते है. अत: कुंभ राशि के व्यक्ति हीरा अवश्य धारण करें.    

    मीन लग्न-हीरा रत्न | Heera Gemstone for Pisces Lagna

    मीन लग्ने के लिये शुक्र तृतीय भाव व अष्टम भाव के स्वामी है. इस लग्न के व्यक्ति हीरा धारण न करें.   

    हीरा रत्न के साथ क्या पहने ? | What Should I Wear with Heera Stone

    हीरा रत्न के साथ पन्ना और नीलम व इन्ही रत्नों के उपरत्न धारण किये जा सकते है. 

     

    हीरा रत्न के साथ क्या न पहने? | What Not to Wear with Diamond

    हीरा रत्न के साथ कभी भी व्यक्ति को माणिक्य व मोती व पुखराज धारण नहीं करने चाहिए.इसके अतिरिक्त इन्हीं रत्नों का उपरत्न धारण करना भी शुभ फल नहीं देगा.     

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    साईं बाबा व्रत पूजा | Shri Sai Baba Vrat – Shirdi Sai Baba (Sai Vrat Udyapan)

    साई बाबा व्रत को कोई भी व्यक्ति कर सकता है. इस व्रत को करने के नियम भी अत्यंत साधारण है. साई बाबा अपने भक्तों की हर इच्छा पूरी करते है. उनकी कृ्पा से सभी की मनोकामनाएं पूरी होती है. मांगने से पहले ही वे सब कुछ देते है. उनके स्मरण मात्र से जीवन में आ रही बाधाओं में कमी होती है. कहा भी जाता है, कि शिरडी वाले श्री साईं बाबा कि महिमा का कोई और ओर छोर नहीं है. साईं बाबा पर पूरा विश्वास करने वालों को कभी निराशा का सामना नहीं करना पडता है. 

    साई बाबा 9 गुरुवार व्रत | 9 Thursday Sai Vrat 

    साई बाबा व्रत को कोई भी साधारण जन कर सकता है. यहां तक की बच़्चे भी इस व्रत को कर सकते है.  साई बाबा अपने भक्तों में किसी प्रकार का कोई भेद भाव नहीं करते है. उनकी शरण में अमीर-गरीब या किसी भी वर्ग का व्यक्ति आये  उसकी कार्य सिद्धि अवश्य पूरी होती है.  साई बाबा व्रत एक बार शुरु करने के बाद नियमित रुप से 9 गुरुवार तक किया जाता है. इस व्रत को कोई भी व्यक्ति साई बाबा का नाम लेकर शुरु कर सकता है. 

    व्रत करने के लिये प्रात: स्नान करने के बाद साई बाबा की फोटो की पूजा कि जाती है. साई बाबा की फोटों लगाने के लिये सबसे पहले पीले रंग का वस्त्र बिछाया जाता है. इस पर साई बाबा की प्रतिमा या फोटो लगाई जाती है. इसे स्वच्छ पानी से पोंछ कर इसपर चंदन का तिलक लगाया जाता है. 

    साई बाबा की फोटों पर पीले फूलों का हार चढाना चाहिए. अगरबती और दीपक जलाकर साई व्रत की कथा पढनी चाहिए. और साई बाबा का स्मरण करना चाहिए. इसके बाद बेसन के लड्डूऔं का प्रसाद बांटा जाता है. इस व्रत को फलाहार ग्रहण करके किया जा सकता है. या फिर के समय में भोजन करके किया जा सकता है. इस व्रत में कुछ न कुछ खाना जरुरी है, भूखे रहकर इस व्रत को नहीं किया जाता है. 

    इस प्रकार व्रत करने के बाद 9 गुरुवार तक साईं बाबा के मंदिर जाकर दर्शन करना भी शुभ रहता है. घर के निकट साई बाबा मंदिर न होने पर घर में भी साई फोटों की पूरी श्रद्वा से पूजा करनी चाहिए. किसी भी स्थान पर हों, व्रत की संख्या 9 होने से पूर्व इसे मध्य में नहीं छोडना चाहिए. 

    साई बाबा व्रत उद्धापन | Sai Baba Vrat Udyapan 

    शिरडी के साई बाबा के व्रत की संख्या 9 हो जाने पर अंतिम व्रत के दिन पांच गरीब व्यक्तियों को भोजन और सामर्थ्य अनुसार दान देना चाहिए. इसके साथ ही साई बाबा की कृ्पा का प्रचार करने के लिये 7, 11, 21 साई पुस्तकें, अपने आस-पास के लोगों में बांटनी चाहिए.  इस प्रकार इस व्रत को समाप्त किया जाता है.    

    शिरडी साई बाबा चमत्कार | Sai Baba Miracles

    भारत प्राचीन काल से ही धार्मिक आस्था और पूजा-उपासना में विश्वास करने वाला देश रहा है. यहां कई धर्म और वर्ग और संस्कृ्तियां अलग – अलग होकर भी एक साथ रहती है. इसके साथ ही भारत में अनेक संत-महापुरुषों ने जन्म लिया. कई संतों के द्वारा किये गये चमत्कार आज भी चर्चा का विषय रहे है. 

    शिरडी के साई बाबा के चमत्कार की अनेक कथाएं प्रचलित है.  शिरडी के साई बाबा पर देश के करोडों लोगों की अगाध श्रद्धा है. सभी धर्मों के लोग यहां साई बाबा दर्शन के लिये आते है. यही कारण है कि साई बाबा संस्थान की प्रसिद्धि भी इसके साथ ही बढती जा रही है.   

    यह साई बाबा का चमत्कार नहीं तो और क्या है.  कि आज भी देश भर में बाबा के नाम पर छोटे बडे अस्सी हजार से अधिक मंदिर हो गये है.

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    रोमक सिद्वान्त- ज्योतिष का इतिहास | Romaka Siddhanta – History of Astrology

    प्राचीन काल में ज्योतिष अपने सर्वोत्तम स्तर पर था. मध्य काल में इस विद्या के शास्त्रों को न संभाल पाने के कारण उस समय के सही प्रमाण हमारे पास आज पूर्ण रुप से उपलब्ध नहीं है. उस समय के के शास्त्री ग्रहों कि गति, कालों आकलन आदि करना बखूबी जानते थे. 

    उस समय के गणित नियमों को सिद्धान्तों का नाम दिया गया. सिद्धान्त ज्योतिष में अनेका आचार्यों ने अनेक ग्रन्थ लिखें. इन्हीं में से कुछ शास्त्र सूर्य सिद्धान्त, पराशर सिद्धान्त, वशिष्ठ सिद्वान्त आदि है. इसी में से एक रोमक सिद्धान्त पर आज हम प्रकाश डालेंगें.    

    रोमक सिद्धान्त क्या है. | What is Romaka Siddhanta 

    यह प्राचीन् काल का गणितीय सिद्धान्त शास्त्र है. यह शास्त्र यमन ज्योतिष के नियमों पर आधारित है. यमन ज्योतिष मुख्यत: यूनान, मिश्र आदि देशों में विशेष रुप से प्रचलित था. 

    रोमक सिद्धान्त शास्त्र में क्या है. | Romaka Siddhanta Scripture

    रोमक सिद्वान्त में सूर्य व चन्द्र के बारे में आंकडे दिए गये है. इसके अतिरिक्त यह शास्त्र अधिक मास, क्षय मास, तिथि और क्षय तिथि का विस्तार से वर्णन् किया गया है. 

    बेबीलोन के निवासी ग्रहों में पांच ग्रह देवताओं का पूजन करते थें. ये पांच ग्रह बुध, शुक्र, मंगल, गुरु  व शनि ग्रह थे. इन्हीं सभी ग्रहों की पूजा का वर्णन रोमक सिद्धान्त में भी मिलता है.  

    रोमक सिद्धान्त लोमश सिद्धान्त का ही अपभ्रन्श रुप है, प्राचीन शास्त्रों में रोग देश के नागरिको के लिए रोमक शब्द प्रयुक्त किया गया है.  यह शास्त्र ज्योतिष की गणना से जुडे प्रमुख सिद्धान्त शास्त्रों में से एक है. इस सिद्धान्त का जन्म रोमण से होने के कारण इसे रोमक सिद्धान्त का नाम  दिया गया.  

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