कुंडली में ब्रेकअप का होता है यह ज्योतिषिय कारण

जीवन में रिश्तों को लेकर हर व्यक्ति काफी अधिक भावनात्मक होता है. अपने जीवन में वह रिश्तों की स्थिति को अच्छे से निभाने की हर संभव कोशिश करते हैं लेकिन कई बार असफल होते चले जाते हैं. कई बार जीवन में ऎसे भी क्षण आते हैं जब रिश्तों का बार बार टूटना व्यक्ति को तोड़ देता है. आखिर क्यों रिश्तों में व्यक्ति सफल नही हो पाता है यह बात कुंडली में मौजूद ग्रहों की स्थिति के अनुसार देखने को मिलती है. जन्म कुंडली में सभी ग्रहों का असर अलग-अलग रुप में हमारी इच्छाओं, चाहतों एवं संबंधों के लिए विशेष जिम्मेदार बनता है. 

यदि कुंडली में ज्योतिषीय कारणों की और देखा जाए तो कई तरह के कारण कुंडली में रिश्तों के टूटने या ब्रेकअप का असर दिखाता है, तो यह कुछ व्यक्तित्व लक्षणों या रिश्ते की स्थिति को दिखाता है. इसके अलावा कुंडली से हम इस बात को समझ सकते हैं जिसके द्वारा रिश्ता बार-बार खत्म होने का कारण बन रहा हो. कुंडली में लग्न ओर सप्तम भाव उन प्रतिमानों को दिखाने  और भविष्य के रिश्तों को बेहतर बनाने के लिए अधिक आत्म-प्रतिबिंब और विकास की आवश्यकता का सुझाव देता है. इसके अलावा, कुंडली में ग्रह के रुप में कुछ अन्य कारक भी दिखाई देते हैं जो चुनौतीपूर्ण स्थिति को दिखाते हैं सातवें भाव में ग्रहों की दृष्टि और असर रिश्ते की कठिनाइयों को दिखाता है. जानिए कुंडली में किन कारणों से हो सकता है टूटने की स्थिति दिखाई देती है.

कुंडली में ब्रेकअप के लिए जिम्मेदार ग्रह और भाव फल

वैदिक ज्योतिष में, कई ग्रह संभावित ब्रेकअप या रिश्ते की चुनौतियों का संकेत दे सकते हैं. इसी के साथ कुंडली के कुछ विशेष भाव इस स्थिति पर अपना गहरा असर डालते हैं. 

शुक्र ग्रह – शुक्र प्रेम, संबंधों और रिश्तों का ग्रह है. कुंडली में शुक्र की स्थिति हर प्रकार के सुख को दिखाने वाली होती है. यदि शुक्र कमजोर है या पीड़ित है, तो यह ब्रेकअप सहित रिश्ते की चुनौतियों का संकेत दे सकता है. शुक्र की पीड़ा रिश्तों के बीच आपसी समझ और स्नेह की कमी का कारण बन सकती है. शुक्र ही जीवन में इच्छाओं के लिए महत्वपूर्ण होता है. शुक्र जब कुंडली में अच्छा होता है तो रिश्तों में आगे बढ़ने के लिए सहायक बनता है. शुक्र का जन्म कुंडली में स्वराशि में होना, उच्च राशि में होना या फिर मूल त्रिकोण में होना रिश्तों की सफलता को देने में सहायक बनता है. 

मंगल ग्रह – मंगल भी रिश्तों के लिए बेहद आवश्यक ग्रह माना जाता है. मंगल कामुकता एवं यौन संबंधों के लिए विशेष होता है. मंगल ऊर्जा, जुनून और आक्रामकता का ग्रह है. जब मंगल पीड़ित होता है, तो यह गलतफहमियों और संघर्षों का कारण बन सकता है जो ब्रेकअप का कारण बनता है. खराब स्थिति में मंगल आवेगी निर्णय और क्रोध पर नियंत्रण की कमी का कारण बन सकता है, जिससे संबंधों में समस्याएं पैदा हो सकती हैं. मंगल की स्थिति अगर अच्छी हो तब व्यक्ति अपने रिश्ते में रोमांच बना रहता है. मंगल की शक्ति कम होने के कारण व्यक्ति अपने रिश्ते में नीरसता के कारण अधिक परेशानी झेल सकता है. 

चंद्रमा ग्रह – कुंडली में चंद्रमा की स्थिति भावनाओं के लिए विशेष मानी जाती है. यदि कुंडली में चंद्रमा की स्थिति अनुकूल न हो तो व्यक्ति अपनी भावनाओं को लेकर काफी भ्रम में रहता है. व्यक्ति को इस के कारण अपनों के लगव की कमी आत्मविश्वास की कमी परेशानी देती है. व्यक्ति छोटी छोटी बातों को लेकर काफी घबराता भी है यह बातें रिश्तों को पूर्णता नहीं देने ती हैं. इसी आधार पर जब कुंडली में चंद्रमा की स्थिति मजबूत होती है तो व्यक्ति रिश्ते में प्रबल रुप से सामने आता है. वहीं वह अपने रिश्ते को अनुकूल बनाने के लिए बहुत कोशिश करती है. 

राहु और केतु 

रिश्तों के अलगाव या बदलाव में इन दो ग्रहों का असर बेहद महत्वपूर्ण होता है. राहु जुनून, व्यसन और भ्रम से जुड़ा हुआ है. राहु के मजबूत होने पर यह रिश्तों की प्रबल इच्छा का संकेत देता है. यह अपेक्षाएँ और भावनात्मक अस्थिरता भी पैदा कर सकता है, जिससे रिश्ता टूट सकता है. केतु वैराग्य, आध्यात्मिक विकास और अंत के साथ जुड़ा हुआ है. जब केतु मजबूत होता है, तो यह भावनात्मक रूप से अलग होने की प्रवृत्ति का संकेत दे सकता है, जिससे रिश्ते में मुश्किलें आ सकती हैं.

पंचम भाव – कुंडली का यह भाव प्रेम के लिए विशेष रुप से देखा जाता है. पंचम भाव हमारे प्रेम संबंधों की जकारी देता है. इसका असर ही व्यक्ति के जीवन में होने वाले रिश्तों को दर्शाता है. इसके कारण ही जीवन में आने वाले रिश्ते और उनकी भूमिका समझी जाती है. अगर पंचम भाव या पंचम भाव का स्वामी खराब स्थिति में य अकमजोर है तब रिश्तों के टूटने की स्थिति अधिक असर डालने वाली होती है. इस भाव का और इसके स्वामी का अच्छा होना एक लम्बे रिश्ते की भूमिका में सहायक बनता है. 

सप्तम भाव – सप्तम भाव को पार्टनरशीप और विवाह के भाव के रूप में जाना जाता है. किसी भी प्रकार की साझेदारी इसी भाव से देखने को मिलती है. हमारे रिश्ते किसी के साथ कैसे बनेंगे यह इसी भाव की स्थिति से देखने को मिलते हैं. सप्तम भाव या इसके भाव का स्वामी अगर खराब स्थिति या पीड़ित अवस्था में होगा तो रिश्ते में कठिनाइयों का संकेत करने वाला होगा. जिससे ब्रेकअप या अलगाव हो सकता है. उदाहरण के लिए, यदि सप्तम भाव में शनि, राहु या केतु जैसे पाप ग्रह हैं, तो यह रिश्तों में चुनौतियों और संघर्ष का संकेत दे सकता है.

आठवां भाव – रिश्ते में अलगाव ओर टूटन की स्थिति के लिए ये भाव काफी गअधिक असर डालने वाला होता है. यह भाव अंतरंगता, साझा संबंधों की स्थिति, परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करता है. पीड़ित आठवां घर अंतरंग संबंधों में चुनौतियों का संकेत देता है. इसके अलावा, यह ब्रेकअप या अलगाव का कारण बन सकता है. उदाहरण के लिए, आठवें भाव में मंगल या शनि जैसे अशुभ ग्रह रिश्तों में सद्भाव और विश्वास की कमी का संकेत देने वाले होते हैं. 

Posted in astrology yogas, jyotish, planets | Leave a comment

क्या सातवें भाव में सूर्य और केतु की युति विवाह में देती है अटकाव ?

जन्म कुंडली का सातवां भाव एक शुभ भाव स्थान है. यह भाव विवाह का स्थान है, साझेदारी का भाव है. इसके द्वारा जीवन में होने वाली महत्वपूर्ण साझेदारियों को देखा जाता है. वैदिक ज्योतिष में सप्तम भाव के द्वारा व्यक्ति पर ध्यान केंद्रित किया जाता था है कि उसके जीवन का रंग दूसरों के साथ मिलकर कैसा होगा. इस भाव को उसके प्रतिस्पर्धियों या उसके विपक्ष के रुप में देखा जाता है. 

अब जब इस भाव में सूर्य और केतु जैसे ग्रह बैठ जाते हैं तो यहां की शुभता में अग्नि तत्व की प्रधानता काम करने लगती है क्योंकि सूर्य और केतु में यह बेहद अधिक मात्रा में होती है. अग्नि युक्त सुर्य जब कहीं बैठता है तो स्वाभाविक रुप से वहां की शीतलता पर असर डालेगा वहीं जव केतु बैठेगा तो वह व्यक्ति को भ्रम और अंधकार प्रदान करने वाला होगा. अब ग्रह और भाव का संबंध कैसे कैसे विवाह को प्रभावित करता है उसे समझने के लिए अनेक पड़ावों पर से गुजरने की आवश्यकता होती है. 

सूर्य केतु युति योग का दांपत्य जीवन प्रभाव 

सूर्य और केतु की युति वैवाहिक जीवन के लिए अच्छी नहीं मानी जाती है. यह सातवें भाव को प्राकृतिक रूप से नष्ट कर देगा और नकारात्मक परिणामों में सुधार करेगा. यह सातवें घर के मारक प्रभाव में वृद्धि करने वाला हो सकता है. व्यक्ति विदेश यात्रा कर सकता है. व्यक्ति का वैवाहिक जीवन सुखी नहीं रहता है. व्यक्ति को अपने जीवन साथी के प्रति अहंकार हो सकता है. अपने जीवन साथी से झगड़ा हो सकता है. दोनों एक दूसरे से नफरत कर सकते हैं. व्यक्ति किसी दूसरे के कारन अपमान या बदनामी का शिकार हो सकता है. उसे बुरे लोगों की संगत भी मिल सकती है. 

अपने सहभागी के साथ व्यर्थ के विवाद में उलझ सकता है. तर्क एवं भाषण की समस्या बनी रह सकती है. विवाद अभिमान जैसी बातें भी एक दूसरे के साथ अलगाव का कारण भी बन सकती हैं. व्यक्ति एवं उसके जीवन साथी को कानूनी मुद्दों का सामना करना पड़ सकता है. यह स्थिति कुंडली के आधार पर अलगाव या तलाक या साथी की मृत्यु का कारण बन सकती है. यह देर से विवाह या विवाह न होने की स्थिति का कारण भी हो सकती है. व्यक्ति को स्वभाव से झगड़ालू और अहंकारी जीवन साथी की प्राप्ति हो सकती है. साथी व्यवहार में आधिकारिक हो सकता है. जीवन साथी अभिजात वर्ग एवं अमीर प्रसिद्ध परिवार से संबंधित हो सकता है. जीवन साथी बात बात पर जल्द क्रोधित होने वाला, अथवा स्वभाव से अधिक हिंसक हो सकती है. उसका सामाजिक आचरण कमजोर हो सकता है. स्त्रियों के द्वारा व्यक्ति को हानि हो सकती है.

जीवन साथी को स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो सकती है. हॉर्मोनल प्रॉब्लम से जूझ सकता है, संतान प्राप्ति में परेशानी हो सकती है. व्यक्ति की जीवन शक्ति कम होती है. वह स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से पीड़ित हो सकते हैं. वह दिल से संबंधित समस्याओं से पीड़ित हो सकता है, वह त्वचा एवं एलर्जी से पीड़ित हो सकते हैं. वह बुखार से पीड़ित हो सकता है. उसकी आंखों की रोशनी कमजोर हो सकती है और वह चश्मा पहन सकता है. यह दुर्घटनाओं का कारण भी बन सकता है. सरकार, अधिकारी वर्ग, अथवा सत्ता से परेशानी हो सकती है. कर्ज संबंधी मुद्दों के कारण  व्यवसाय में नुकसान हो सकता है.  

सूर्य सावधानी, अनुशासन और समझ के द्वारा केतु की आक्रामकता और आवेग पर काबू पाना सिखाता है.  केतु आपका भूतकाल है और सूर्य वर्तमान को बनाने के लिए अतीत में जो कुछ भी सीख रहे हैं उसका उपयोग करने की आवश्यकता को सिखाता है. केतु सूक्ष्म स्तरों पर वर्तमान जीवन आपको भ्रमित करता रहता है. केतु के साथ सूर्य को देखना आत्म परिपक्वता स्तर का विश्लेषण करना होता है. यह आपको बताएगा कि आप भौतिक मार्ग पर जा रहे हैं या आध्यात्मिक मार्ग पर. यदि केतु  के साथ सूर्य जड़ों से जुड़ने, परिवार, पहचान, समाज आदि से पहचान दिलाता है. कुछ मामलों में नस्लीय या धार्मिक कट्टरता भी दे सकता है. जीवन साथी के साथ उसे विचारों से अलग ले जा सकता है. 

सातवें भाव में केतु युति सूर्य समस्या पैदा कर सकता है क्योंकि सूर्य के कमजोर होने पर आत्मविश्वास मुख्य रूप से प्रभावित होता है. व्यक्ति आत्म-अहंकार आदि भावों पर आघात सहता है. अंतर्मुखी, निराशावादी, अपराध बोध का भार ढो सकता है. अपनी समस्याओं के लिए अपने साथी से सहानुभूति की उम्मीद करते हैं जो पूर्ण रुप से मिल नहीं पाती है. जीवन शक्ति कम होने लगती है, जीवन भ्रमित सा लगता है. लेकिन अगर सूर्य किसी तरह से शक्तिशाली है, तो यह बहुत अधिक शारीरिक ऊर्जा और क्षमता दे सकता है क्योंकि केतु पहले से ही चमकते सूर्य में अपनी ऊर्जा जोड़ता है. साथी के साथ आगे बढ़ सकते हैं. काम में ध्यान केंद्रित करने और मुद्दों को हल करने में सक्षम होता है. 

साथी आध्यात्मिक पथ पर आगे बढ़ते रहने की चाह रख सकता है.  केतु हमेशा एक बहुत ही विशिष्ट कार्य करता है, वऎसे में साथी खुद को सभी विलासिता की इच्छा रखते हुए और उनका उपयोग करते हुए देखना जरुर चाहेगा लेकिन जल्द ही वह इन चीजों से हट कर अपने आप को एकांत जीवन में भी ढाल सकता है.   

Leave a comment

मेष लग्न के लिए मंगल महादशा का अलग-अलग भावों पर असर

मंगल महादशा का प्रभाव मेष लग्न के लिए बेहद अच्छा माना गया है. मंगल इस लग्न का स्वामी है ओर इस लग्न वालों को जब मंगल दशा मिलती है तो उन्हें यह लग्नेश की दशा के रुप में सहायक भी बनती है. मंगल महादशा का असर मेष लग्न को कई तरह से मिलता है. उनके कार्यों में बेहर रुप से बढ़ोत्तरी देखने को मिलती है. वह अपने आप में नई उर्जा को पाते हैं. संघर्षों से लड़ने की शक्ति भी मेष लग्न में इस महा दशा में दूसरों से अधिक देखने को मिल सकती है. 

प्रथम भाव में मंगल महादशा 

मेष लग्न के लिए प्रथम भाव में मंगल महादशा का प्रभाव व्यक्ति को साहसी, महत्वाकांक्षी और गुस्सैल बनाता है. व्यक्ति अपने काम को लेकर कार्योन्मुखी होता है और अपने काम को जल्द से जल्द पूरा करने की कोशिश करता है. तेज  दिमाग वाला और अच्छी इच्छाशक्ति वाला होता है. प्रथम भाव में मंगल महादशा का असर व्यक्ति को स्वास्थ्य से संबंधी कुछ दिक्कतें भी देता है. अपने प्रेम संबंधों को लेकर अधिक उत्साहित रह सकता है. जीवन साथी से मतभेद भी हो सकता है. मंगल के स्वगृही होने से यह महादशा में व्यक्ति सेवा या व्यवसाय में सर्वोच्च पद पर पहुंचता है. लग्न में मंगल नेतृत्व के गुण देता है और इस दशा में वह दूसरों के लिए काफी एक्टिव भी रहता है. 

दूसरे भाव में मंगल महादशा 

मेष लग्न के लिए मंगल महादशा वृष राशि में दूसरे भाव में ह्ने पर वक्ति को धन प्राप्ति के लिए सभी साधनों का पयोग दे सकती है. अपने धन पर भी घमण्ड हो सकता है जातक को. अपने परिवार के वंश के प्रति सुरक्षात्मक हो सकता है और अपनी पारिवारिक संपत्ति की रक्षा करने का प्रयास भी वह अधिक करता है. भाइयों का प्रतिनिधित्व करता है मंगल इस कारन से इस समय उग्र ग्रह होने के कारण इस दशा में पारिवारिक धन के कारण व्यक्ति का उनसे विवाद हो सकता है. मंगल महादशा की उपस्थिति के कारण पैतृक चीजों का भी योग दिखाता हैं. मंगल महादशा में कठोर भाषा को भी उपयोग कर सकता है जातक जातक जीवन से भरपूर भी होता है और अथक परिश्रम करने का गुण रखता है. 

तीसरे भाव में मंगल महादशा 

मेष लग्न के लिए इस भाव में मंगल की महादशा का प्रभाव व्यक्ति को साहसी और दृढ़ इच्छाशक्ति वाला बनाता है. इस दशा में वह विजयी होता है और अपने विरोधियों पर हावी रहता है. तीसरे भाव में मंगल महादशा व्यक्ति को एक स्व-निर्मित व्यक्ति बनाने वाली होती है. कुंडली में बुध की स्थिति के आधार पर भाइयों से कुछ विवाद हो सकता है. व्यक्ति के पास अच्छा मौखिक और लिखित संचार कौशल होता है. 

चतुर्थ भाव में मंगल महादशा

मंगल महादशा का प्रभाव चतुर्थ भाव में होने के कारण यहां स्थिति अनुकूलता में कमी दिखा सकती है. इस दशा में यह माता के साथ विवाद और माता के प्रति कठोरता दर्शाता है. संपत्ति विवाद भी हो सकता है और परिवार के लोगों के साथ आक्रामकता भी बढ़ सकती है. मंगल की दशम भाव पर सीधी दृष्टि होने के कारण जातक का अपने पिता से मतभेद कर सकता है. मंगल महादशा में जीवनसाथी के साथ विवाद और प्रभुत्व को लेकर संघर्ष का संकेत मिलता है. 

पंचम भाव में मंगल महादशा

मेष लग्न के लिए पंचम में मंगल महादशा का समय एक ऐसे व्यक्ति को दर्शाने वाली होती है जो बुद्धिमान और सक्रिय दिमाग वाले रुप में काम करता है. व्यक्ति पढ़ाई में आक्रामक और प्रतिस्पर्धी दिखाई देता है. खेल गतिविधियों में उसकी रुचि होती है. अभिरुचि के तौर पर कई तरह के मनोरंजन में भी शमैल रहता है. पंचम भाव में मंगल प्रेम संबंधों में वर्चस्व की लड़ाई को भी दिखाने वाला समय होता है. मंगल दशा का प्रभाव व्यक्ति को धनवान बनाने का काम करती है. पंचम भाव में सिंह राशि में मंगल की स्थिति दर्शाती है कि व्यक्ति जीवन शक्ति और जीवन से भरपूर होगा. 

छठे भाव में मंगल महादशा

छठे भाव में मंगल महादशा का प्रभाव प्रतिस्पर्धाओं का गंभीर दौर दे सकता है. अधिक परिश्रम का समय होता है. व्यर्थ के विवादों में शामिल होने का संकेत भी दिखाई दे सकता है. मंगल महादशा समय यह दर्शाता है कि व्यक्ति कानून के क्षेत्र से इस समय अधिक प्रभावित हो सकता है या इस तरह के कामों में उसकी गतिविधियां तेज हो सकती हैं. विवादों को सुलझाना जातक की दैनिक गतिविधियों का रुप भी इस दशा में अधिक देखने को मिल सकता है. 

सातवें भाव में मंगल महादशा

मेष लग्न के लिए मंगल महादशा का प्रभाव सातवें भाव से संबंधित होने पर इस समय जीवन में लोगों की साझेदारी अधिक असर दिखाने वाली होती है. इस समय अविवाहित लोगों का विवाह संपन्न हो सकता है. किसी नए कारोबार को पार्टनर्शीप में आरंभ कर सकते हैं. मंगल महादशा का समय विवाह में प्रभुत्व और आक्रामकता को दर्शाता है. इस दशा के समय विवाह में विवाद हो सक्ता है.  बेवजह की बातें आपसी संबंधों पर भी असर डालने वाली हो सकती हैं. 

आठवें घर में मंगल महादशा

मंगल महादशा का संबंध जब आठवें भाव से होता है तब व्यक्ति के लिए ये दशा कई मायनों में विशेष बन जाती है. इस दशा में लग्नेश अपनी ही राशि में आठवें भाव में स्थित होता है, यह दर्शाता है कि व्यक्ति को जीवन में कई परिवर्तनकारी घटनाओं से गुजरना होगा.  अचानक हुई घटनाएँ और चुनौतियाँ शुरू में परेशान करने वाली हो सकती हैं लेकिन व्यक्ति विजेता के रूप में सामने आता है. इस दशा के समय पर दुर्घटनाओं का असर एवं जीवन में होने वाले आकस्मिक लाभ मिलते हैं. 

नवम भाव में मंगल महादशा

मेष लग्न के लिए मंगल महादशा का प्रभव नवम भाव से संबंधित होने पर अच्छे परिणाम दिखाई देते हैं. व्यक्ति अपने आस पास की स्थिति को लेकर भी काफी सजग होता है. मंगल की मित्र राशि में होने से यह दशा व्यक्ति को भाग्य के द्वारा काम पाने में सहायक बनती है. इस दशा के समय व्यक्ति हठी होगा और दृढ़ इच्छाशक्ति वाला होगा. उसके अपने विश्वास होंगे और उनके बारे में कठोर भी होगा. जातक यात्रा करना पसंद करेगा और साहसिक खेल आदि में हाथ आजमाएगा. 

दशम भाव में मंगल महादशा 

मेष लग्न के लिए दशम भाव में मंगल महा दशा का संबंध कर्मों के अनुसार फल देने वाला समय होता है. यहां व्यक्ति अपने जीवन में पद प्राप्ति एवं उच्च शक्ति को पाने के लिए उत्साहित भी होता है. यहां व्यक्ति कई जगहों की यात्रा भी करता है. करियर में अच्छी सफलता पाने का समय भी देखने को मिलता है. व्यक्ति नेतृत्व गुणों और ताकत के साथ वह शामिल होता है. कार्योन्मुख होते हुए वह जीवन में सफलताओं को पाता है. 

ग्यारहवें भाव में मंगल महादशा

मेष लग्न के लिए ग्यारहवें भाव में मंगल महादश अका प्रभाव व्यक्ति को क्रियाशील और उत्साहित बनाने वाला होता है. व्यक्ति सामाजिक रुप से आगे रहने वाला होता है. इस दशा के समय वह स्वतंत्र रुप से अपने निर्णय लेने के लिए अधिक आगे रहता है. मंगल एक स्वतंत्र होने के कारण बड़े संगठनों में काम करने में बहुत अधिक आतुर दिखाई नहीं देता है. काम करने की कोशिश उसक्जे लिए सदैव बनी रहती है. मित्रों एवं दूसरों के हस्तक्षेप का भी जीवन पर असर पड़ता है. 

बारहवें भाव में मंगल महादशा

मेष लग्न के लिए द्वादश भाव में मंगल महादशा का प्रभाव व्यक्ति को व्यस्त अधिक रखता है. जीवन में किसी न किसी कारण से दूसरों का दबाव भी अधिक रहता है. इस दशा के दौरान अधिकांश संभावनाएं इस बात की भी देखने को मिलती हैं कि व्यक्ति अपने घर से दूर रह सकता है और विदेश में निवास कर सकता है. आध्यात्मिक गतिविधियों को आगे बढ़ाने में भी उसकी रुचि रह सकता है. 

Posted in astrology yogas | Tagged | Leave a comment

चंद्रमा के आत्मकारक होने का प्रभाव

जैमिनी ज्योतिष में चंद्रमा का महत्व और प्रभाव बेहद महत्वपूर्ण रहा है क्योंकि चंद्रमा मन का कारक है और बिना दिमाग के कोई भी व्यक्ति चंद्रमा के बिना वही काम नहीं कर सकता ज्योतिष कुछ भी नहीं है. चंद्रमा के आत्मकारक होने की स्थिति को अत्यंत शुभ रुप में जाना जाता है यदि कुंडली में चंद्रमा की स्थिति शुभ है तब यह आत्मकारक भूमिका में व्यक्ति को उच्च बल प्रदान करने में सहायक बनता है. 

चंद्रमा के आत्मकारक होने पर व्यक्ति की कार्यकुशलता के साथ साथ उसकी शक्ति भी अच्छी होती है. जैमिनी ज्योतिष में चंद्रमा को रानी का स्थान प्राप्त है. यह जीवन के पोषण के लिए अत्यंत आवश्यक ग्रह भी है. इसका असर इसी दशा में बहुत अच्छे से दिखाई देता है. चंद्रमा की दशा इसकी कर्क राशि से संबंधित होती है. कर्क राशि की दशा जब आत्मकारक रुप में व्यक्ति को मिलती है तो वह समय जीवन में नए अनुभवों को देने वाला होता है. आत्मकारक रुप में चंद्रमा शुभ ओर अशुभ हर फल उस रुप में देता है जब कुंडली में वह अन्य प्रकार की शुभता एवं अशुभता से प्रभावित होता है. यदि कर्क राशि एक स्वतंत्र रुप से मजबूती में होती है तथा उस पर अन्य खराब असर नहीं होता है तब ऎसे में आत्मकारक के प्रखर गुण भी मिलते हैं. यह स्थिति जीवन में माता का भरपूर स्नेह दे सकती है और व्यक्ति को मानसिक रुप से स्वस्थ एवं संतुष्ट बना सकती है. 

आत्मकारक चंद्रमा का आत्मिक एवं मानसिक प्रभाव 

चंद्रमा के आत्म कारक होने पर यह विशेष रुप से व्यक्ति के मन और उसके भीतर की भावना का प्रतीक भी बनता है. चंद्रमा को स्त्री युक्त ग्रह कहा गया है. इसके द्वारा जीवन में शीतलता एवं मजबूती को देखा जाता है. चंद्रमा के आत्मकारक होने पर यह व्यक्ति के जीवन में उन चीजों को अधिक प्रभावित करेगा जो चंद्रमा के गुणों में निहित होंगी. चंद्रमा को माता, जल, दूध और मानसिक शांति, सार्वजनिक जीवन, उच्च पद, मानसिक अवस्था, व्यवहार और विचारों का कारक है. चंद्रमा का संबंध विदेश यात्रा, परिवर्तन, औषधि, नमक आदि से भी संबंधित होता है.

जैमिनी शास्त्र में आत्मकारक चंद्रमा का बहुत महत्व और प्रभाव माना जाता है. यह समृद्धि और देवत्व से जुड़ा हुआ है. आत्मकारक चंद्रमा के होने पर व्यक्ति आकर्षक और बुद्धिमान होता है.  कभी भी धन की कमी से परेशान नहीं होता है. अपने करीबी रिश्तों के माध्यम से हमेशा कुछ न कुछ सीखते रहते हैं. इनका मुख्य लक्ष्य शांति में रहना और अपनी इच्छा को प्राप्त करने के लिए लगातार काम करना है.

आत्मकारक चंद्रमा का स्वभाव एवं व्यवहार पर असर 

चंद्रमा के आत्मकारक होने पर व्यक्ति अपनी इच्छाओं के लिए अधिक जागरुक दिखाई देता है. वह अपने आस पास के लोगों के साथ बेहतर तालमेल स्थापित करता है. मन का कोमल होने के कारण वह जल्द ही जुड़ाव का अनुभव भी पाता है. यदि चंद्रमा आत्मकारक होकर अपनी उच्च अवस्था का हो, या कुंडली में मूलत्रिकोण राशि या शुभ स्थिति में हो तब यह स्थिति व्यक्ति को स्वाभाविक रुप से मजबूत बनाती है. व्यक्ति में सहानुभूति का गुण मजबूत होता है. व्यक्ति को बेहतर याददाश्त मिलती है, धैर्य उसका गुण बनता है. वह देखभाल करने वाला स्वभाव पाता है.  ग्रहणशीलता जैसे शुभ परिणाम भी आत्मकारक चंद्रमा के मजबूत होने पर मिलते हैं. यह स्थिति प्रबल, प्रसिद्ध, बुद्धिमान, सदाचारी, धनवान, प्रेम में स्थिर देने वाली बनाती है 

आत्मकारक व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन होता है क्योंकि रक्त जिसमें विभिन्न तत्व होते हैं जिसके कारण वह चंद्रमा की ओर आकर्षित होता है. इसलिए ऐसा कहा जाता है कि आत्मकारक चंद्रमा मानसिक शांति का प्रतिनिधित्व करता है.  ज्योतिष शास्त्र में कहा गया है कि “चंद्रमा मनसो जयते” चंद्रमा मनसो जायते अर्थात चंद्रमा मन का प्रतीक है. मनोवैज्ञानिक परिपक्वता के आधार में चंद्रमा संपूर्ण व्यक्तित्व को दर्शाता है.

चंद्रमा को हमारे मन और भावनाओं को नियंत्रित करने वाला माना जाता है और इसलिए यह हमारी भावनाओं पर प्रभाव डालता है. यह हमारे मनोवैज्ञानिक संकाय और हमारी भावनाओं और इंद्रियों से निपटने की क्षमता को निर्धारित करता है. यह हमारी गहरी जरूरतों, आदतों और प्रतिक्रियाओं का प्रतिनिधित्व करता है और हमारे अवचेतन और चेतन मन को नियंत्रित करता है. शुभ सकारात्मक रुप से आत्मकारक चंद्रमा व्यक्ति को अनुकूल स्वभाव आनंद, मानसिक शांति, सहानुभूति के रचनात्मक लक्षण देता है. स्वभाव से धैर्यवान और अधिक समझदार होता है. 

आत्मकारक चंद्रमा का सकारात्मक एवं नकारात्मक असर 

आत्मकारक चंद्रमा का नकारात्मक प्रभाव चिंता और अनावश्यक चिंता का शिकार बना सकता है. यह अवसाद और तनाव को दे सकता है. यहां तक कि आत्मघाती भी बना सकता है. आत्मकारक चंद्रमा कमजोर या पीड़ित होना स्वास्थ्य के संदर्भ में भी परेशानी दे सकता है. फेफड़े, हृदय, अस्थमा, किडनी, पीलिया, गर्भाशय, महामारी, यौन समस्याएं, खून की कमी, नींद, खुजली, सूजन, गले, फेफड़ों में सूजन, बीमारी का डर पैदा कर सकता है 

आत्मकारक चंद्रमा के ज्ञातिकारक के साथ होने पर यह स्थिति संघर्ष एवं लगातार होने वाले प्रभव को दर्शाती है. इसी के साथ जब चंद्रमा शुक्र के साथ हो तब यह जैमिनी ज्योतिष के शुभ योगों का प्रभाव होता है. 

आत्मकारक चंद्रमा का धन योग 

आत्मकारक चंद्रमा का योग जब शुभ अमात्यकारक से बनता है तो ये स्थिति अच्छे धन योग के लिए अनुकूल मानी गई है. आत्मकारक चंद्रमा जब अमात्यकारक से योग बनाता है तो व्यक्ति को जीवन में आर्थिक लाभ अनुकूल रुप से मिल सकते हैं. वहीं आत्मकारक चंद्रमा के साथ यदि राहु केतु का प्रभाव बन रहा हो या फिर शनि इत्यादि का असर है तब उस स्थिति में शुभ प्रभाव कम हो सकते हैं. उस स्थिति में धन योग में कमी का असर पड़ता है. वहीं लाभ के लिए अधिक परिश्रम करने की आवश्यकता है. उसी प्रकार शुक्र का संबंध जब भी आत्मकारक चंद्रमा के साथ बनता है तो यह जीवन में अच्छे धनार्जन के लिए अनुकूल होती है. व्यक्ति दूसरों के द्वारा जीवन में अच्छे लाभ पाता है. 

आत्मकारक चंद्रमा का संबंध जब अमात्यकारक के साथ अनुकूल स्थिति में बनता है तो यह स्थिति करियर के लिए बहुत अनुकूल होती है. इसके द्वारा व्यक्ति अपने मनोकूल काम कर पाता है. वह करियर एवं व्यापार में अच्छे लाभ देख पाता है. व्यक्ति को सफलता प्राप्ति के अच्छे मौके मिल सकते हैं. 

आत्मकाकरक द्वारा धन योग का निर्माण जब होता है तो यह एक शुभ रुप से धन की प्राप्ति को दर्शाने वाला होता है. धन से जुड़े मसलों में सकारात्मक पक्ष पर इसकी विशेष भूमिका दिखने को मिलती है.

Tagged , | Leave a comment

सूर्य का छठे भाव में होना शत्रुओं एवं विरोधियों को करता है समाप्त

छठे भाव में सूर्य आपको संघर्षों को सुलझाने और शत्रुओं पर विजय दिलाएगा. आप अपने प्रतिस्पर्धियों के साथ विलय करेंगे और सौहार्दपूर्ण तरीके से एक साथ काम करेंगे. छठे भाव में स्थित सूर्य आपको संघर्षों को सुलझाने और शत्रुओं पर विजय पाने की ओर सफल रहेगा. दैनिक कार्यों को अनुशासित रुप से करने वाला भी होता है. उन्मुक्त जीवन का प्रतिनिधित्व करता है, विशेष रूप से जन संपर्क के कार्य करने में आगे रह सकता है.

मित्रों और शत्रुओं के साथ रचनात्मकता होकर प्रदर्शन करता है. अपने प्रतिस्पर्धियों के साथ रणनीति के अनुसार काम कर पाता है. मुकदमेबाजी एवं कानूनी कामों में यहां बैठा सूर्य बेहतर परिणाम दिलाने वाला होता है. सूर्य का असर व्यक्ति को एक सफल वकील, राजनेता, चिकित्सक, पशु चिकित्सक, चिकित्सा व्यवसायी, डॉक्टर भी बना सकता है, सूर्य यहां पर व्यक्ति को एक अच्छा मार्गदर्शन देने वाला होता है.

सकारात्मक सूर्य प्रभाव
छठे भाव में सकारात्मक सूर्य आपके शत्रुओं को हराने में मदद्गार होता है. अपने विरोधियों के प्रति व्यक्ति जागरूक रहता है. एक सतर्क व्यक्ति होकर काम करने वाला गुण मिलता है. सूर्य की अच्छी स्थिति है जो व्यक्ति को शक्ति प्रदान करती है. काम के प्रति ईमानदार और दृढ़ भी बनाती है. व्यक्ति को अपने शत्रुओं से भी प्रशंसा प्राप्त होती है.

व्यक्ति एक साहसी और अधिकार संपन्न व्यक्तित्व को पाता है. सफलता प्राप्त कर सकता है. सर्वोच्च पदों में जाता है और अपनी इच्छाओं को पूरा करता है. पथप्रदर्शक भी बनता है दूसरे लोग इनके नेतृत्व क्षमता की प्रशंसा करने वाले होते हैं. व्यक्ति प्रभावशाली और रचनात्मक कार्यों के लिए सम्मानित भी होता है. साहसी रवैया जीवन में खुशियां देने वाला होता है.

नकारात्मक प्रभाव सूर्य प्रभाव
सूर्य, अशुभ होने के कारण, यहां व्यक्ति को शत्रुओं से अधिक प्रभावित कर सकता है. व्यक्ति दूसरों की सेवा करने के लिए अधिक तत्पर दिखाई देता है ऎसे में वह स्वयं को लेकर भी उदासीन हो सकता है. छठे भाव में सूर्य उन शत्रुओं का सामना करता है जो छुप कर वार करने वाले होते हैं. साजिशों का शिकार भी बना सकता है. यदि सूर्य छठे भाव में अच्छी तरह से स्थित नहीं है, तो यह जीवन में बहुत सारी प्रतिकूलताएं दे सकता है. परिस्थितियों के प्रतिैअसंवेदनशील बना सकता है. लोगों के साथ संबंध खराब कर सकता है. अलगाव एवं जीवन साथी के साथ विरोध दे सकता है. पिता का सुख कमजोर कर सकता है. मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ सकता है. कोई कोर्ट केस, विवाद और कानूनी मामलों में जीतने की संभावना कम कर सकता है. स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से प्रभावित कर सकता है. लड़ने की क्षमता को कम करता है, आर्थिक रूप से भी कमजोर कर सकता है.

राशि चक्र की हर राशि पर सूर्य का असर अलग होता है. जन्म कुंडली के छठे भाव में सूर्य इनकी विशिष्ट विशेषताएं, आदतें, शक्ति और कमजोरियां को दर्शाता है.

मेष राशि – मेष राशि में सूर्य व्यक्ति की नौकरी के क्षेत्र में महत्व हासिल करने की इच्छा की बात करता है. ऐसे व्यक्ति की दक्षता अविश्वसनीय रूप से अधिक होती है, कभी-कभी वह अपने कार्य कर्तव्यों को छोड़कर सब कुछ भूल जाता है. काम के प्रति उसका समर्पण उसे वह काम करने के लिए आगे रखता है.

वृषभ राशि – वृष राशि में सूर्य एक व्यक्ति को रूढ़िवादी के गुणों से संपन्न करता है. परिवार और उसका स्वास्थ्य कुछ कमजोर पड़ जाता है, कठोर भाषा एवं अलगाव भी इसका असर दिखाता है. संतान के सुख पर असर पड़ता है.

मिथुन राशि – छठे भाव में सूर्य, मिथुन राशि में होने पर व्यक्ति कुशल एवं रचनात्मक बनता है. विविध प्रकार की रुचियों के साथ बहुमुखी व्यक्तित्व भी प्राप्त होता है. इसका मुख्य कार्य स्थिरता और सुरक्षा को पाने का भी होता

कर्क राशि – कर्क राशि में सूर्य परिवार और जीवन से बंधन देता है. यहां भावनाओं को लेकर वह अधिक पीड़ित रह सकता है. मानसिक रुप से किसी चीजे के प्रति उसकी ताकत अधिक लग सकती है. चीजों के प्रति आस्कत होता है, स्वास्थ्य को लेकर परेशानी झेल सकता है.

सिंह राशि – सिंह राशि पर सूर्य का प्रभाव अच्छा रहता है. व्यक्ति काम के प्रति लगाव रखता है अपने विरोधियों को परास्त कर सकता है. मान्यता और नेतृत्व के लिए प्रयास करता है. व्यक्ति की सभी गतिविधियाँ इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के उद्देश्य से होती हैं.

कन्या राशि – कन्या राशि में सूर्य का असर व्यक्ति को समाजिक कल्याण से जोड़ता है. व्यक्ति परिश्रमी ओर दूसरों के लिए प्रेरणा स्त्रोत भी होता है. कर्मठ एवं शत्रुओं को परास्त करने के साथ उनके साथ मित्र भाव रखने वाला होता है. व्यक्ति केवल स्वयं के लाभ के लिए नहीं, बल्कि अन्य लोगों के लाभ के लिए भी कार्य करने वाला होगा.

तुला राशि – तुला राशि में सूर्य का होना उपयोगी संपर्क और संबंध बनाने की कला देता है. व्यक्ति करियर की आकांक्षाओं को साकार करने में आगे रहता है. रिश्तों के प्रति वह काफी लगाव रखता है स्वास्थ्य को लेकर चिंता रह सकती है. शत्रुओं के द्वारा परेशानी अधिक होती है. मान सम्मान के लिए संघर्ष रहता है.

वृश्चिक राशि – वृश्चिक राशि में सूर्य का होना यहां विकास और परिवर्तन के लिए काम करने की प्रवृत्ति देता है. वह चालाकी से अपने शत्रुओं को हराने में सक्षम होता है. अपने गुढ़ ज्ञान द्वारा वह दूसरों को प्रभावित कर सकता है.

धनु राशि – धनु राशि में छठे भाव में सूर्य व्यक्ति को काफी प्रगतिशील बना सकता है. व्यक्ति की मुख्य जीवन आकांक्षा प्रियजनों की देखभाल करना, अपने घर की रक्षा करना और जीवन को बेहतर रुप से जीने की होती है. अपने विरोधियों को परास्त कर देने में व्यक्ति कुशल होता है.

मकर राशि – छठे भाव में सूर्य के मकर राशि में होने पर व्यक्ति कुछ मामलों में दूसरों के प्रति आक्रामकता और असहिष्णुता हो सकता है. व्यक्ति अपने आप को स्थापित करने के लिए काफी सजग एवं विचारशील होता है. परंपराओं के प्रति वह मजबूत् होता है.

कुंभ राशि – छठे भाव में स्थित सूर्य कुंभ राशि में होने पर व्यक्ति को उत्कृष्ट कार्यकर्ता बनाता है, जो एक ही समय में कई चीजों का प्रबंधन करने में सक्षम होता है. व्यक्ति कुछ लापरवाह भी हो सकता है. व्यक्ति का दृष्टिकोण काफी विस्तारित होता है.

मीन राशि – छठे भाव में सूर्य के मीन राशि में होने पर व्यक्ति काफी बातों को लेकर भावनात्मक हो सकता है. परोपकार से जुड़े कामों को करता है. जीवन में अपनों के प्रति समर्पण का भाव भी रखता है. गुप्त शत्रुओं के द्वारा परेशान हो सकता है.

Posted in astrology yogas, horoscope, jyotish, planets, vedic astrology | Tagged , , | Leave a comment

सूर्य का पंचम भाव में होना बौद्धिकता एवं ज्ञान की अभिव्यक्ति

ज्योतिष में सूर्य सबसे शक्तिशाली ग्रह है, यह हमारे स्वयं को, हमारी समग्र ऊर्जा और हमारे व्यापक अस्तित्व को व्यक्त करने के तरीके को प्रभावित करता है. जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में जाता है, तो यह सूर्य नहीं है जो शारीरिक रूप से गतिमान है, बल्कि इसके बारे में हमारा दृष्टिकोण है और इसलिए, पृथ्वी से इसकी ऊर्जाओं के साथ हमारा संबंध विशेष रहता है. पौराणिक कथाओं में सूर्य, रोमन पौराणिक कथाओं में, सूर्य अपोलो, ग्रीक पौराणिक कथाओं में, हेलियोस, प्रकाश के देवता या सूर्य देवता के साथ जुड़ा हुआ है. सूर्य सिंह राशि से जुड़ा है, जैसे सूर्य सौर मंडल का केंद्र है, वैसे ही लियो सिंह को सभी के ध्यान का केंद्र बनना पसंद है. 

ज्योतिष शास्त्र में, सिंह राशि के लोगों को आकर्षण और गर्मजोशी के साथ चकाचौंध करने के लिए जाना जाता है. सूर्य इन सभी विशेषताओं का भौतिक रूप है. सूर्य अभिव्यक्ति के पंचम भाव पर स्थित होता है. पांचवां घर रचनात्मकता और मस्ती को प्रोत्साहित करता है, यह घर, सूर्य और सिंह की तरह, नए अनुभवों के लिए खुला है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य एक ग्रह है और सभी ग्रहों का राजा माना जाता है. ऐसा इसलिए है क्योंकि सौरमंडल के सभी ग्रह सूर्य के प्रकाश से चमकते हैं. इसलिए, यह ज्योतिष में एक आवश्यक भूमिका निभाता है और सबसे शक्तिशाली और आधिकारिक ग्रह है.

पंचम भाव का अन्य भावों से अंतर्संबंध

पंचम भाव के अन्य भावों को कुंडली के अन्य भावों से जोड़ा जा सकता है. इसका संबंध जीवन के उन क्षेत्रों से होता है जो जीवन की गति एवं उसके विकास में मुख्य भूमिका को निभाते हैं. पंचम भाव बच्चों के लिए विशेष स्थान होता है. यह कला, मीडिया, रचनात्मकता, मंच प्रदर्शन, सिनेमा, खुशी और मनोरंजन से संबंधित बातों को दर्शाता है. इस भाव स्थान को प्रेम एवं रोमांस के लिए भी देखा जाता है. अस्थायी आश्रय या आवास का प्रतिनिधित्व करता है. सीखने की प्रेरणा इसी पंचम भाव के द्वारा समझ आती है. पंचम भाव उन चीजों का प्रतिनिधित्व करता है जो आप इस जीवन में सीखते हैं. यह भाव गणित, विज्ञान, कला आदि का प्रतिनिधित्व करता है और इन पर विशिष्ट पकड़ देता है. कुंडली के पंचम भाव से शेयर बाजार, सट्टा लाभ, सिनेमा, धन लाभ या हानि देखी जाती है.

पंचम भाव राजनीति, मंत्रियों, अपने घर की जमीन, अचल संपत्ति, अपने परिवार की संपत्ति से कुछ कमाने की कोशिश का प्रतिनिधित्व करता है. परिवार के पास कितना धन है यह कुंडली के पांचवें भाव से देखा जाता है. पंचम भाव छोटे भाई-बहनों की बुद्धिमत्ता, अहंकार और संचार क्षमता, माता के धन और लाभ,  बच्चों के खर्च, साथी की इच्छा और लाभ,  जीवनसाथी के बड़े भाई-बहनों का प्रतिनिधित्व करता है. गुप्त हुए ज्ञान का प्रतिनिधित्व करता है. यह धर्म का उच्चतम स्थन भी माना जाता है. दर्शन, धार्मिक विश्वास, आध्यात्मिक विश्वास और गुरुओं से प्राप्त किया जाने वाला ज्ञान भी महत्वपूर्ण है. इस घर को कर्म और पुनर्जन्म का प्रतिनिधित्व करता है. नौकरी प्राप्त करने एवं नौकरियों में नए अवसर पाने की स्थिति को दर्शाता है. इच्छा का अंत, इच्छा को समाप्त करना, मुक्ति या मोक्ष पाने की कोशिश में बाधाएं या आध्यात्मिक प्रगति में बाधा.

वैदिक ज्योतिष में पांचवां घर आनंद के बारे में है. जो खुशी अक्सर आपके द्वारा किए जाने वाले कार्यों का परिणाम रुप ही होती है, इसलिए पंचम भाव आत्म-अभिव्यक्ति से संबंधित है जो आपको प्रसन्न करता है. यह मानसिक बुद्धिमत्ता, नया करने की क्षमता, नए विचारों को पुरानी अवधारणाओं में होने का प्रतीक है. कला और लेखन सहित रचनात्मक अभिव्यक्ति के सभी रूपों पर इस घर का अधिकार होता है. पिछले जन्मों में आपके द्वारा किए गए अच्छे कर्म और यह आपकी कलात्मक क्षमताओं के रूप में कैसे प्रकट होते हैं, इसे भी पंचम भाव से देखा जा सकता है. संतान होने की क्षमता, संतान की संभावनाएं, गर्भाधान, गर्भपात, बच्चों के साथ संबंध और उनका स्वास्थ्य सभी कुंडली में पंचम भाव से नियंत्रित होता है. पुत्र जन्म का भी संकेत देता है, इसलिए वैदिक ज्योतिष में इसे पुत्र भाव कहा गया है.

अब हम सूर्य और अन्य ग्रहों के बीच संबंध को जानते हैं, कि इन ग्रहों के साथ सूर्य की युति पंचम भाव में होने पर कैसा असर दिखाती है.

पंचम भाव में सूर्य का होना और उसका प्रभाव 

पंचम सूर्य का प्रभाव जीवन को एक अलग ही रंग रुप देने वाला होता है. इस भाव में सूर्य का प्रकाश भाव के गुणों को भी प्रकाशित कर देने वाला होता है. इस भाव में सूर्य की स्थिति आध्यात्मिक रुप से विशेष फल देने वाली होती है. सुर्य जो आत्मा एवं शक्ति का प्रतिक है पंचम भाव में सूर्य शैक्षणिक क्षेत्र में अच्छा देता है. बौद्धिक क्षमताओं के प्रति अत्यधिक अच्छे होते हैं. यह भाव व्यक्ति को नेता बनाने की दिशा में काम करता है. सूर्य पंचम भाव में सहज महसूस करता है, जो कि सूर्य की स्वाभाविक राशि सिंह है. जब सूर्य पंचम भाव में स्थित होता है, तो यह अहंकार, आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है, यह विचारों, राजनीति, रचनात्मकता, दर्शन, प्राचीन पाठ, और वह सब कुछ जो आपका अवचेतन अन्वेषण करने के लिए संपन्न हो रहा है, को प्रकाशित करता है. बौद्धिक क्षेत्र में उच्च स्तर का आत्मविश्वास देता है.  ज्ञान, व्यावसायिक क्षमता, रचनात्मकता को प्रतिष्ठित तरीके से व्यक्त करते हैं. 

सूर्य और चंद्रमा पंचम भाव में

पंचम में सूर्य और चंद्रमा एक साथ होने पर व्यक्ति दृढ़निश्चयी, केंद्रित और दृढ़ इच्छाशक्ति वाला हो सकता है. ऊर्जा से जीवन भरा होता है, जो कुछ भी चाहते हैं उसे पूरा करने के लिए अथक परिश्रम करने की कोशिश भी करते हैं.  

सूर्य और बुध पंचम भाव में

सूर्य और बुध पंचम भाव में होने पर अच्छा बुधादित्य योग बनता है. इस योग के द्वारा बुद्धि और ज्ञान प्राप्त होता है.  सीखने और समझने की क्षमता कई क्षेत्रों में प्रगति करने में मदद करने वाली होती है.

सूर्य और मंगल पंचम भाव में

सूर्य और मंगल का पंचम में होना अंगारक दोष बनता है. व्यक्ति क्रोधी स्वभाव को पाता है. अक्सर अपना आपा खो देते हैं लेकिन गुस्सा कुछ ही समय के लिए ही रहता है. आवेगी और अचानक लिए गए फैसले किसी दिन किसी समस्या का कारण बन सकते हैं.  

सूर्य और गुरु पंचम भाव में

पंचम में सूर्य और बृहस्पति अच्छा आध्यात्मिक प्रभाव देता है. बृहस्पति वैदिक ज्योतिष के अनुसार हमारे आंतरिक स्व का प्रतिनिधित्व करता है. इसलिए यह योग जातकों में धार्मिक गतिविधियों और आध्यात्मिकता के प्रति झुकाव देता है.

सूर्य और शुक्र पंचम भाव में

पंचम में सूर्य और शुक्र के होने से ऊर्जा का संचार होता है. सुख और वैभव पर अधिकार जताने की चाह एवं रिश्तों में अपना वर्चस्व पाने की इच्छा होती है. संतान सुख में थोड़ा देर भी हो सकती है. प्रेम संबंधों में कुछ असंतोष हो सकता है.  

सूर्य और शनि पंचम भाव में

सूर्य के पुत्र हैं शनि देव और उनके बीच संबंध अनुकूल नहीं हैं. अत: जब यह संयोग करता है तो श्रापित दोष बनता है. इसलिए व्यक्ति को अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है. पिता और पुत्र के साथ संबंध मधुर नहीं रह सकते हैं.  

सूर्य और राहु पंचम भाव में

सूर्य के साथ छाया ग्रहों की युति शुभ नहीं मानी जाती है. यह ग्रहण दोष बनाता है. सूर्य पूर्वजों का प्रतिनिधित्व करता है और पंचम भाव भी कर्म से संबंधित होता है तो, सूर्य और राहु या केतु की युति भी पितृदोष बनाती है. सफलता और विकास का मार्ग बाधाओं से भरा है

Posted in astrology yogas, planets, vedic astrology | Tagged , | Leave a comment

सूर्य चतुर्थ भाव में परिवार, करियर और सुख को करता है प्रभावित

सूर्य का चतुर्थ भाव में होना, मिले-जुले फल मिलते हैं जिसमें आप को भौतिक सुख सुविधाओं की प्राप्ति तो होती है . साथ में जिम्मेदारियों को भी आप अवश्य पाते हैं. चतुर्थ भाव में सूर्य व्यक्ति को  अपने परिवार से जुड़ा हुआ पाता है लेकिन परिवार के लोगों के प्रति अधिक समर्पण कम ही मिल पाता है. लोग व्यक्ति को अभिमानी एवं अहंकारी भी समझ सकते हैं. सूर्य कुछ ऎसी स्थिति देता है की व्यक्ति स्वयं को काफी मजबूत व्यक्तित्व के रुप में स्थापित कर लेता है. सूर्य की स्थिति का प्रभव व्यक्ति के खुद के जीवन के साथ साथ ओरों पर भी पड़ता है. व्यक्ति अपने मनोकूल परिणामों को पाने के लिए संघर्ष भी अधिक करता है. 

चौथे भाव में सूर्य का विशेष प्रभाव 

चतुर्थ भाव में सूर्य घर और परिवार के सदस्यों से जोड़ता है. मकान या बड़े भूभाग की प्राप्ति का भी योग बनता है. सुख-सुविधाओं की प्राप्ति के लिए समय बेहद विशेष होता है. इस समय के दोरान व्यक्ति को कई तरह के आय के स्त्रोत भी प्राप्त हो सकते हैं. उसके पास कुछ पुराणि वस्तुओं का भी संग्रह दिखाई दे सकता है. घर को सुंदर रुप में सजाना और व्यवस्थित रखना भी व्यक्ति को पसंद होता है. व्यक्ति कुछ मामलों में अपने रहन सहन का दिखावा भी कर सकता है. 

काल पुरुष कुंडली में सूर्य चतुर्थ भाव में 

चतुर्थ भाव में सूर्य की स्थिति को यदि कालपुरुष कुंडली के अनुसार देखा जाए तो यह चंद्रमा का स्थान बन जाता है जहां उसका मित्र सूर्य विराजमान है. ज्योतिष में चतुर्थ भाव स्थान को खुशी एवं सुख से संबंधित माना गया है. इस घर के द्वारा जीवन की कई चीजों की पूर्ति संभव हो पाती है. इसे माता का घर भी माना जाता है. यह निजी जीवन, घर के भीतर की छवि, परिवार के लोगों के साथ संबंध, सुख-सुविधाओं और स्कूली शिक्षा को दिखाता है.  यह मन की शांति, गृहस्थ जीवन, निजी संबंधियों, घर, आत्म-समृद्धि, भोग-विलास, वाहन, भूमि और पैतृक संपत्ति, सामान्य सुख, शिक्षा, वाहन का प्रतिनिधित्व करता है. यह स्थान जड़ी बूटियों, खजाने और छिद्रों और गुफाओं में प्रवेश को दर्शाता है. 

यह घरेलू वातावरण और सामान्य स्थिति से संबंधित होता है. यह हमारे घर, गृह मामलों, रहस्यों की छिपी हुई चीजों का प्रतिनिधित्व करता है.  उत्तर कलामृत में यह भाव विद्या, माता, तेल, स्नान, संबंध, जाति, रिक्शा जैसे वाहन, छोटी नाव, छोटा कुआं, पानी, दूध, गाय, दुधारु पशुओं, अनाज, लाभ आदि को दर्शाता है. आर्द्रभूमि में, चिकित्सा, महान अलौकिक प्रभावकारिता, विश्वास, झूठा आरोप, मंडप, एक तालाब या कुआँ खोदना और सार्वजनिक उपयोग के लिए उसकी स्थापना, हवेली, कला, एक घर में प्रवेश करना, निष्कर्ष, किसी के आवास की हानि, पैतृक संपत्ति , आकाशीय भोजन, चोरी की संपत्ति कहा होगी यह पता लगाने की कला, और वैदिक ग्रंथों का विकास भी इसी से देखा जाता है. 

चौथा घर विवाह के बाद आपके परिवार, बच्चों, पत्नी आदि और आपकी संयुक्त संपत्ति का भाग्य, ससुराल वालों का भाग्य, सट्टा व्यवसाय के माध्यम से लाभ हानि, माता पक्ष के लिए लाभ, ऋण, रोग और शत्रुओं पर काबू पाने को दर्शाता है , शत्रुओं के माध्यम से लाभ. यह घर आपके जीवनसाथी के करियर या पेशे,  जीवनसाथी के बॉस, समाज में  जीवनसाथी की छवि या प्रतिष्ठा,  पिता की सर्जरी, छिपे हुए रहस्य और धन, उच्च अध्ययन या लंबे समय तक आपके नैतिक मूल्यों और विश्वास प्रणाली में परिवर्तन की यात्रा का स्थान भी होता है. मालिकों की कानूनी साझेदारी का प्रतिनिधित्व करता है. यह बड़े भाई-बहनों के स्वास्थ्य, ऋण और शत्रुओं का प्रतिनिधित्व करता है,  शत्रुओं के माध्यम से आशाओं और इच्छाओं की पूर्ति को भी दिखाता है.

चतुर्थ भाव में सूर्य का विशेष प्रभाव 

चतुर्थ भाव में सूर्य घर और परिवार के सदस्यों से जोड़ता है. मकान या बड़े भूभाग की प्राप्ति का भी योग बनता है. सुख-सुविधाओं की प्राप्ति के लिए समय बेहद विशेष होता है. इस समय के दोरान व्यक्ति को कई तरह के आय के स्त्रोत भी प्राप्त हो सकते हैं. उसके पास कुछ पुराणि वस्तुओं का भी संग्रह दिखाई दे सकता है. घर को सुंदर रुप में सजाना और व्यवस्थित रखना भी व्यक्ति को पसंद होता है. व्यक्ति कुछ मामलों में अपने रहन सहन का दिखावा भी कर सकता है. यहां स्थित सूर्य माता को पिता के समक्ष स्थापित कर देने का काम करत अहै. जिसके फलस्वरुप माता परिवार में पिता की भूमिका निभाते हुए दिखाई दे सकती है. चतुर्थ भाव में सूर्य रात के जन्म समय और सूर्य के प्रकाश की अनुपस्थिति को दर्शाता है, जिसका अर्थ है कि जीवन में पिता की ओर से कुछ कमी अनुभव हो सकती है. घर परिवार में सख्त और अनुशान भी मिल सकता है. जीवन के प्रारंभिक समय में एक कठिन जीवन शैली का समय भी प्राप्त हो सकता है. कुछ मामलों में व्यक्ति अपने लक्ष्यों से भटक सकता है. सूर्य जीवन शक्ति का स्रोत होने के कारण आत्मविश्वास भी देता है. 

चतुर्थ भाव में सूर्य का राशि प्रभाव 

सूर्य चतुर्थ में मेष राशि 

मेष राशि वाले में सूर्य व्यक्ति को साहसी नेता बनाता है, उसे जीवन का आनंद लेने के लिए आगे रखता हैं. व्यक्ति में उत्साह उन्हें लगातार सीखने और तलाशने जारी रहती है. व्यक्ति आवेगशीलता, निडरता और मित्रता के कारण लोगों के मध्य आकर्षण पाता है. प्रतिबद्धता और आत्मविश्वास का गुण मिलता है.

सूर्य चतुर्थ में वृष राशि

सूर्य के चतुर्थ भाव में वृष राशि में होने पर धीमा और स्थिर बनाता है. सोच-समझकर किए गए कार्य, प्रमुख होंगे. ठोस और स्थिर ऊर्जा, और धैर्य अच्छा होगा. आसानी से संतुष्ट स्वभाव और ऐसा जीवन बनाने की इच्छा के कारण उत्कृष्ट मित्र और भागीदार भी मिलते हैं. आरामदायक और संतुलित रिश्तों को निभाने का होता है. 

सूर्य चतुर्थ में मिथुन राशि 

सूर्य हमारी आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है और स्वयं के बारे में दृढ़ता देता है. नेतृत्व करता है या ध्यान आकर्षित करने में सक्षम होता है. लोगों के साथ संबंध बनाने एवं घूमने फिरने का शौक रखता है. व्यक्ति कई तरह की रचनात्मक गतिविधियों में शामिल होता है. 

सूर्य चतुर्थ में कर्क राशि 

मधुर और समर्पित रिश्तों के प्रति आकर्षण होता है. अंतर्ज्ञान और अप्रत्याशित कोमलता भी होती है. दूसरों के पोषण के लिए तत्पर रहता है. अक्सर महत्वाकांक्षी और सुरक्षा की इच्छा रखते हैं,  व्यक्ति का दूसरों पर अधिक भरोसा भी रहता है. विचारशील और सक्षम होता है.

सूर्य चतुर्थ में सिंह राशि

सूर्य के सिंह राशि में होने के कारण व्यक्ति की आभा बहुत होती है. आत्मविश्वास, साहस और आकर्षण भी होता है. व्यक्ति अक्सर बहिर्मुखी भी होता है. शिक्षा और गुरुजनों के ज्ञान को पाने के लिए ललायित भी होता है. लोगों के मध्य विशेष रहना पसंद करते हैं और अपने पार्टनर की ओर से प्रशंसा जीवन में उनकी सबसे बड़ी इच्छाओं में से एक है.

सूर्य चतुर्थ में कन्या राशि 

सूर्य के कन्या राशि में यहां होने से व्यक्ति व्यावहारिक, मेहनती और कुशल होता है.  जीवन में शांत संगठनात्मक संरचनाओं और दिनचर्या की तलाश कर सकते हैं. व्यक्ति सही काम करने में दृढ़ता से विश्वास रखता है दूसरों की देखभाल एवं समर्पण के प्रति भी जागरक होते हैं. 

सूर्य चतुर्थ में तुला राशि 

तुला राशि में सूर्य का होना व्यक्ति को निष्पक्ष, संतुलित और ईमानदार बनाता है. लोगों के साथ व्यक्ति मध्यस्था कर पाने में सक्षम होता है. उनके आचरण में शांत और सौम्य भाव भी होता है.  दूसरों को अपने तरीके से राजी करना आसान हो जाता है. व्यक्ति सत्य और ज्ञान की तलाश करने में आगे रह सकता है. भावनात्मक रुप से ये लोग कुछ कमजोर हो सकते हैं. 

सूर्य चतुर्थ में धनु राशि

सूर्य के धनु राशि में होने पर व्यक्ति साहसी और ऊर्जावान होता है. दुनिया में अपनी अलग चमक चाहता है. हर चीज से प्रेरित होता है. कुछ ऐसा करते हैं जिससे दूसरे उन पर अवश्य ध्यान देते हैं. बेपरवाह भी हो सकते हैं और कुछ जिद को दिखा सकते हैं. 

Posted in astrology yogas, jyotish, planets | Tagged , , , | Leave a comment

शुक्र और शनि की युति प्रभाव

ज्योतिष के अनुसार शुक्र और शनि की युति सभी लाभ देती है और यह युति अनुकूल मानी जाती है. शुक्र और शनि की युति के मध्य में कुछ द्वंद भी देखने को मिल सकता है. यहां विचारों एवं इनकी ऊर्जाओं में यह स्थिति अधिक देखने को मिलती है. यह दोनों ग्रह के दूसरे से विपरित गुण धर्म के होते हैं. जहां शुक्र का कार्य भौतिकता से संबम्धित है वहीं शनि का संबंध कर्मठता एवं संघर्ष से होता है.यह योग जब कुंडली में बनता है तो जिस भाव पर इसका प्रभाव अधिक होता है उस भव से संबंधित परिणाम भी व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण बन जाते हैं. कुछ भाव स्थानों में जहां इन दोनों का युति योग बेहतर परिणाम दे सकता है वहीं खराब स्थानों पर इनका होना फलों को कमजोर कर देने वाला होता है. 

जन्म कुडली के विभिन्न भाव स्थान पर शुक्र शनि का योग 

ज्यादातर मामलों में, शनि-शुक्र की युति सकारात्मक परिणाम देती है. लेकिन कभी-कभी, यह मिलन नकारात्मक परिणाम भी देने वाली हो सकती है. शुक्र का शनि के साथ मित्र भाव रहा है. जिसके फलस्वरुप कुछ अनुकूल प्रभावों को देख पाना संभव होता है. शुक्र और शनि युति होने पर व्यक्ति यथार्थवादी होता है. जमीन से जुड़ा होने पर उसकी सोच में मजबूत धारणा का असर भी दिखाई देता है. चीजों को लेकर गहराई से प्रतिबद्ध होता है. शुक्र पर शनि का परिपक्व व्यवहार चीजों को उचित रुप से करने की विचारधारा देता है. यह योग व्यक्ति को आगे बढ़ने के अवसरों पर काम करने की योग्यता देता है. 

शुक्र शुभ ग्रह और शनि अशुभ है. जिन लोगों की कुंडली में शुक्र और शनि एक साथ एक घर में होते हैं, वे अक्सर कलात्मक रूप से प्रवृत्त होते हैं. व्यक्ति को ललित कलाओं विशेषकर ड्राइंग या पेंटिंग में अच्छी निपुणता हासिल कर सकता है. शनि और शुक्र की युति भी व्यक्ति को बौद्धिक बनाती है. घूमने फिरने और दुनिया को एक्सप्लोर करने का शौक होता है. साहस अच्छा होता है और चुनौतियों से लड़ने के लिए व्यक्ति हमेशा तैयार रहता है. नकारात्मक रुप से यह योग कभी-कभी प्रियजनों से अलगाव का कारण भी बन सकता है. वैवाहिक जीवन शांतिपूर्ण नहीं हो पाता है. पार्टनर के साथ अक्सर अनबन और प्यार में शारीरिक संतुष्टि की कमी का अनुभव हो सकता है. व्यक्ति कई बार अपनी भावनाओं के कारण एकाकी अर्थहीन जीवन जीने को विवश हो सकता है. 

शुक्र और शनि का योग पहले भाव में

जन्म कुंडली के पहले भाव में शुक्र और शनि की युति होना विशेष होता है. यहां व्यक्ति अपनी इच्छाओं हेतु संघर्ष करने के लिए आगे रहता है. परिश्रम द्वारा धीमी गति के पश्चात कुछ अनुकूल परिणाम व्यक्ति को प्राप्त होते हैं. स्वास्थ्य और पारिवारिक जीवन पर इसक अकुछ कमजोर पक्ष दिखाई दे सकता है. व्यक्ति बहुत परेशानियों से गुजरता है और मानसिक रुप से उसकी क्षमताएं सीमित रहती हैं.  जीवन में वह स्वयं के प्रति काफी अधिक सोच विचार रखने वाला है ओर जीवन को बेहतर स्थिति पर ले जाने की इच्छा रखता है. 

शुक्र और शनि का योग दूसरे भाव में

जन्म कुंडली के दूसरे घर में शुक्र और शनि की युति का होना व्यक्ति को काफी प्रबल स्म्चार दे सकता है. व्यवहार कुशलता का गुण भी प्राप्त होता है. व्यक्ति को प्रतिष्ठा भी प्राप्त होती है और उच्च पदों पर स्थापित होने का अवसर मिलता है. व्यक्ति परिवार में अपनी स्थिति को बेहतर करने में सक्षम होता है. वाहन और संपत्ति सभी सुख मिलते हैं अपने प्रयासों के द्वारा वह उन चीजों को पाने में सक्षम बनता है जो अन्य लोगों की पहुंच से दुर रहती हैं.यह योग आर्थिक दृष्टि से बहुत अच्छा माना जाता है.

.शुक्र और शनि का योग तीसरे भाव में

तीसरे भाव में शुक्र और शनि की युति होने से व्यक्ति अपने परिश्रम द्वारा ही धन कमाता है. उसे परिवार का सहयोग मिलता है. पैतृक संपत्ति से भी कुछ लाभ प्राप्त होता है.  ससुराल पक्ष का सहयोग काम आता है. जीवन में अपने स्म्चार के द्वारा अच्छी आय को अर्जित कर पाता है. 

शुक्र और शनि का योग चतुर्थ भाव में

चतुर्थ भाव में शुक्र और शनि की युति कुछ अच्छे और कुछ कमजोर पक्ष को दिखा सकती है. अच्छे भवन की प्राप्ति होती है लेकिन पुरातन चीजों की प्राप्ति भी होती है. व्यक्ति को अपने बड़ों की ओर से कठोर अनुशासन भी प्राप्त हो सकता है. काम काज को लेकर व्यक्ति बहुत अधिक कर्मठ भी होता है. व्यक्ति कारोबार में अच्छी स्थिति को पाने में सक्षम होता है. 

शुक्र और शनि का योग पंचम भाव में 

पंचम भाव में शुक्र के साथ शनि का योग शिक्षा के क्षेत्र में अच्छे परिणाम देने वाला होता है. वह कला एवं रचनात्मक क्षेत्र में काफी अच्छे से आगे बढ़ सकता है. संतान सुख व्यक्ति का सामान्य रहता है. कई बर मनोकूल चीजों की प्राप्ति उचित रुप से नहीं हो पाती है. आर्थिक रुप से कर्मठ एवं काफी प्रगतिशील होता है.

शुक्र और शनि का योग छठे भाव में 

शुक्र के साथ शनि का युति योग छठे भाव में होने पर प्रतिस्पर्धाओं में विजय की प्राप्ति को दर्शाता है.  समृद्धि और सफलता के लिए किए जाने वाले प्रयासों का अनुकूल परिणाम मिल पाता है. . इस योग के प्रभाव स्वरुप विभिन्न स्रोतों से धन लाभ होने की संभावना होती है. पैतृक या पारिवारिक संपत्ति की प्राप्ति भी संभव है. नई व्यावसायिक संभावनाएं होंगी और इस समय आपकी वित्तीय स्थिति कुछ बेहतर होती है. 

शुक्र और शनि का योग सप्तम भाव में

सप्तम भाव में शुक्र और शनि की युति हो तो वैवाहिक सुख का मिलाजुला असर देखने को मिलता है. विवाह जल्दी या फिर देर से होने के योग निर्मित होते हैं जीवन साथी के साथ विचारों में अलगाव की स्थिति भी रहती है. साथी के सहयोग में कमी रहसकती है या फिर उसके साथ व्यर्थ की दूरी परेशानी दे सकती है. 

शुक्र शनि का योग नवम भाव में  

शुक्र के साथ शनि की युति अनुकूल रह सकति है. नवम भाव में होने पर  मेहनत का फल अपने कार्यस्थल पर मिलता है. नौकरी में प्रगति देख पाते हैं तथा उच्च पद प्राप्ति के प्रस्ताव देख पाते हैं. गे. साथ ही आपके सुख-सुविधाओं में वृद्धि होगी और आपको भाग्य का पूरा साथ मिलेगा. आप नई साइटों पर जाएंगे और सभी सुविधाओं का उपयोग करेंगे. अतिरिक्त निवेश की भी संभावनाएँ होंगी, और अब फर्म को आगे बढ़ाने का क्षण है.

शुक्र शनि का योग दशम भाव में  

शुक्र के साथ शनि का योग दशम भाव में होने पर यह मेहनत से अपने जीवन के लक्ष्यों को पाने की प्रेरणा देने वाला होता है. शनि शारीरिक श्रम का प्रतिनिधित्व करता है और शुक्र कला का प्रतिनिधित्व करता है ऎसे में व्यक्ति  डिजाइनिंग, पेंटिंग और कंप्यूटर एनीमेशन से लेकर अभिनय जैसी भौतिक कला तक एक कलात्मक शिल्पकला से अपनी आजिविका को प्राप्त कर सकता है.रचनात्मक रूप से अपने समय से आगे रह सकता है.

शुक्र शनि का योग एकादश भाव में 

शुक्र के साथ शनि की युति एकादश भाव में होने पर लाभ के मौके मिलते हैं. इस स्थान को आय भाव कहा जाता है. ऐसे में खोया हुआ पैसा वापस मिलता और निवेश किया हुआ पैसा अच्छे लाभ उत्पन्न करने में सहायक बनता है. नौकरी में प्रमोशन या इंक्रीमेंट की संभावना है व्यक्ति के लिए खुली रहती है. व्यापार में मुनाफा हो सकता है. वहीं, शेयर बाजार, सट्टा या लॉटरी में पैसा लगाना बेहतर लाभ देने वाला होता है. यह युति आराम और समृद्धि को बढ़ाने का कम भी करती है. 

शुक्र शनि का योग द्वादश भाव में

शुक्र के साथ शनि का योग बारहवें भाव में होने के कारण व्यक्ति को आध्यात्मिकता और भौतिकता के मध्य संघर्ष दे सकता है. कर्म के नियमों के माध्यम से सिखाने की शनि की प्रकृति के कारण व्यक्ति कई बार अपने प्रेम से भी अलग हो जाता है और देर से विवाह का कारण भी बन सकता है. इसी के साथ व्यक्ति आर्थिक खर्चों को लेकर भी काफी ध्यान पूर्वक काम करने वाला होता है. 

Posted in astrology yogas, planets, vedic astrology | Tagged , , | Leave a comment

सूर्य का तीसरे भाव में फल

तीसरे भाव में सूर्य का होना प्रबलता का सूचक होता है यह सुखद स्थिति कहीं जा सकती है. एक नियम के रूप में, तीसरे भाव में सूर्य वाले लोग बहिर्मुखी होते हैं, लेकिन इनका अंतर्मन इतना प्रबल होता है की इनके भीतर को जान पाना मुश्किल होता है फिर चाहे ये बहिर्मुखी क्यों न दिखाई देते हों. सूर्य यहां बैठ कर कई तर से प्रभाव डालता है. इसके द्वारा उत्पन्न प्रभाव व्यक्ति के जीवन को बदल देने वाले भी होते हैं. सूर्य यहां बैठ कर संचार से ऊर्जा को उत्सर्जित करता है और अपनी ओर खींचता है. सूर्य व्यक्ति को प्र्यासशील बनाता है.

सूर्य के यहां होने के कारण व्यक्ति हमेशा जीवन की प्रगति के लिए प्रयास करते हैं, दूसरों से प्यार करते हैं और सामाजिक नेटवर्क का बहुत सक्रिय रूप से उपयोग करते हैं. यदि ऎसे में उसके सामने वाला भाव अर्थात नवम भाव भी प्रबल हो तो ऎसा व्यक्ति संपर्क बनाने में सफल होता है. सभी के साथ मेल जोल की स्थिति को पाएगा. विश्व उसके लिए घर के समान होगा. सूर्य के साथ को पर व्यक्ति सभी के साथ में संपर्क करने वाला होता है , सक्रिय रूप से लोगों के साथ व्यवहार करता है. यात्रा करने का इच्छुक होता है. सभी ओर दोस्त ढूंढ लेता है और जहां कोई पहुंच नहीं सकता है यह वहां भी पहुंच बना सकता है. 

तीसरे भाव में सूर्य के ज्योतिषिय प्रभाव 

तीसरे भाव में सूर्य की स्थिति व्यक्ति को स्वस्थ, धनवान और बुद्धिमान बनाती है. व्यक्ति प्रसिद्ध, दयालु, शांत, विनम्र और राजा के समान होता है. सूर्य यहां मौजूद होकर साहस और दृढ़ मन के कारण सफलता प्राप्ति को दर्शाता है. चतुराई से काम करते हुए साधन संपन्न बनने के लिए उत्साह देता है. कभी-कभी बातूनी, बेचैन, अधीर और चिंतित भी बनाता है. तीसरे भाव में सूर्य के होने के कारण व्यक्ति बहादुर और दानी भी होता है. व्यक्ति के पास वाहन, विलासिता की सुविधाएं होती हैं. तीसरे भाव में स्थित सूर्य सुखद परिणाम देता है और कुंडली की एक शक्तिशाली संपत्ति के रूप में माना जाता है, लेकिन फिर भी भाइयों से व्यक्ति को परेशानी भी देता है. तीसरे भाव में सूर्य के होने के परिणाम राशि के अनुसार बदल सकते हैं. इसके अलावा जिस पर ग्रह की दृष्टि है और यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि सूर्य लग्न के लिए कितना फायदेमंद होगा. 

सकारात्मक सूर्य प्रभाव

तीसरे भाव में शुभ सूर्य यात्रा करने का शौक़ देता है और व्यक्ति अपने बारे में बात करना पसंद करता है. लोगों के साथ सामूह में रहते हैं और नेतृत्व भी मिलता है. एक ऐसा काम चुन सकते हैं जो शिक्षा और संचार, कलात्मक और नाटकीय क्षेत्रों जैसे प्रदर्शन कलाओं के प्रति प्रयासों या रुचियों को प्राथमिकता देता है. तेज़ दिमाग होता है और नेतृत्व की गुणवत्ता भी अच्छी होती है, जो दूसरों को आपकी बात सुनने के लिए झुका देती है.   सूर्य यहां बैठ कर व्यक्ति को अपनी शक्ति और स्थिति का सर्वोत्तम उपयोग करने के लिए ज्ञान और साहस भी देता है. अपने भाई-बहनों और चचेरे भाई-बहनों के प्रति हमेशा दयालु और सहायक व्यक्तित्व प्रदान करता है. 

नकारात्मक सूर्य प्रभाव

तीसरे भाव में एक नकारात्मक सूर्य भाई-बहनों के बीच अलगाव का कारण बनता है. परिवार में शत्रुता को उत्पन्न कर सकता है. चरित्र से कमजोर बना सकता है. गलत कार्यों में लिप्त करवा सकता है. पीड़ित अधिक होने पर व्यभिचार में भी डाल सकता है. धन और प्रतिष्ठा को खराब करने वाला होता है. परिवार में कमजोर बनाता है परिवार के सदस्यों द्वारा अपमान और शोषण का सामना करना पड़ सकता है. भावनात्मक और शारीरिक समस्याएं परेशानी देती हैं. यौन जीवन में असंतुष्ट बनाता है और बेवफाई भी दे सकता है. 

सूर्य का जीवन के आरंभिक समय पर असर 

सूर्य की स्थिति तीसरे भाव में होने पर जीवन का आरंभिक काल बेहद विशेष बन जाता है. अगर बच्चों की कुंडली में सूर्य तीसरे भाव में हो तो माता-पिता को लगातार इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उनका बच्चा क्या कर रहा है. ऎसा इसलिए क्योंकि जिज्ञासा अधिक होती है और सभी से जुड़ने की ललक भी होती है. नई सूचनाओं से जुड़ने की ललक होती है ऎसे में उन पर निगरानी की भी सख्त जरूरत होती है. यदि अभी के समय को देखा जाए तो इंटरनेट पर सभी चीजों तक पहुंच आसान है ऎसे में बच्चा किसी चीज से सीमित नहीं रह पाताहै, और स्वाभाविक रूप से प्रभावशाली तरीके से हर चीज से जुड़ सकता है ओर सूर्य के तीसरे भाव में होने पर यह प्रबलता भी अपना असर डालती है. इन सभी बातों का उसके मनोविज्ञान पर असर भी पड़ेगा.  उसके विकास को प्रभावित कर सकता है, ऎसे में जरूरी है की बच्चों की इन गतिविधियों पर नजर बराबर रखी जाए. बाल्यकाल में सूर्य क आसर बच्चे के माता-पिता को भी प्रभावित करता है.  यहां पर पिता को पद प्राप्ति हो सकती है अथवा किसी नए स्थान पर जाने को मिल सकता है. 

सूर्य देता है बेहतर गुण 

सूर्य के तीसरे भाव में होने का असर व्यक्ति को गुणवान बनाता है. इन में अध्ययन करने की कला होती है.ये लोग लगातार काम करते रहने वाले होते हैं. यदि एक कारण से व्यवधान बने हुए हैं तो उन्हें दूर करने के लिए सदैव कोशिश में लगे रहते हैं. आलस्य या कठिन जीवन परिस्थितियों से लड़ने की क्षमता इनमें होती है. लेकिन यदि वे ऐसा नहीं करते हैं, तो वे जीवन में उचित स्थिति को नहीं पाते हैं. लेकिन तीसरा घर उन्हें सदैव आगे रखने में सहायक बनता है. तीसरे भाव में सूर्य के होने पर व्यक्ति आसानी से हार नहीं मानता है. समय-समय पर खुद को अच्छी तरह से व्यवस्थित करना जानते हैं .  

जिन जन्म कुंडली में सूर्य तीसरे भाव में स्थित होता है, वहां बुध की स्थिति का आकलन करना भी महत्वपूर्ण होता है. यदि यह मिथुन या कन्या राशि में स्थित है तो व्यक्ति मानसिक कार्य करने वाला, विद्वान होता है. वह हर समय अध्ययन करता है, घटनाओं से जुड़े रहने की कोशिश करता है और अक्सर उसके पास असाधारण क्षमताएं होती हैं. वह तुरंत स्थिति का आकलन कर सकता है और एक कठिन परिस्थिति से बाहर निकलने का रास्ता खोज सकता है. कभी-कभी वे बस आश्चर्यजनक होते हैं कि वे जितना जानते हैं उससे अधिक उनके दिमाग में छुपा हुआ है.

Posted in astrology yogas, horoscope, jyotish, planets | Tagged , , | Leave a comment

सूर्य दूसरे भाव में जीवन को कैसे करता है प्रभावित

सूर्य की स्थिति का प्रभाव जीवन के हर क्षेत्र में बेहद उपयोगी माना गया है. जन्म कुंडली में दूसरे भाव का प्रभाव और यहां सूर्य की स्थिति का होना बहुत अच्छे प्रभाव देने वाला होता है. जन्म कुंडली के दूसरे भाव का सूर्य नेतृत्व करवाने के लिए बहुत उपयोगी बनता है. सूर्य आत्मा का कारक है और दूसरे भाव में यहां आत्मा की स्थिति मनोभावों को अभिव्यक्त करने के लिए उपयोगी होती है. कुंडली के दूसरे भाव में बैठा सूर्य अपने परिवार और पैतृक कर्ज से मुक्ति का आधार भी बनता है. दूसरे भाव में सूर्य आपके उदार स्वभाव को बढ़ा सकता है, आधिकारिक स्थिति और सही तरीके से पैसा बनाने की क्षमता के लिए भी यह अच्छा होता है. जीवन प्रतिष्ठा को प्राप्त कर सकता है. सभी ओर  सम्मान होगा. आप अपनी आजीविका के लिए कभी भी दूसरों पर निर्भर नहीं रहेंगे और आप कई तरह के काम करने में निपुण होंगे.

सफलता और अधिकार का क्षेत्र होता है प्रभावित

सूर्य यहां धन भाव में होने के कारण व्यक्ति को पैसा कमाने के लिए उत्साहित करता है. व्यक्ति अपने जीवन में धन का अधिकांश हिस्सा महंगी चीजों पर खर्च करता है. परिवार के लिए भौतिक  साधनों को एकत्रित करने की उसकी इच्छा बहुत होती है. आर्थिक निवेश उम्मीद के मुताबिक मुनाफ़ा भी देता है. प्रभावशाली लोगों से मिलने और उनके सहयोग की प्राप्ति का भी समय होता है. 

सूर्य का असर व्यक्ति को लालसा देता है, इसके कारण लगातार बड़ी मात्रा में धन कमाने की ललक बनी भी रहती है. जीवन में धन का महत्व बहुत रहता है और इसके द्वारा ही सफलता भी निर्धारित करते देखे जाते हैं. व्यक्ति धन की दौड़ में कई बार अपनों को भी उचित समय नहीं दे पाता है. 

कुंडली का दूसरा भाव और उसका असर 

वैदिक ज्योतिष में कुंडली का दूसरा घर संपत्ति का घर होता है यह धन का घर भी होता है इसलिए इसे धन भाव भी कहते हैं. यह वाणी का घर भी होता है इस कारण वाणी भाव भी कहलाता है.  यह घर उन सभी चीजों के लिए है जो हमारे पास हैं और हम उन्हें कैसे उपयोग कर पाते हैं. जैसे कि भौतिक सामान, धन और रिश्ते. इसी तरह से दूसरा भाव हमारी भावनाओं, अभिव्यक्ति का भी घर होता है. अपने भाई-बहनों और अन्य निकट  प्रिय लोगों से कैसे संबंध हैं इन बातों पर भी दूसरे घर की स्थिति विशेष मानी गई है. इस लिए जब दूसरे भाव में सूर्य मौजूद होता है, तो यह जीवन के इन सभी क्षेत्रों को प्रमुखता से प्रभावित करता है.  

व्यक्ति सूर्य के द्वारा सफलता को पाने वाला बनता है लेकिन उसके भीतर अधिकार जताने की स्थिति भी काफी महत्वपूर्ण होती है. ऎसे में लोगों के साथ रहने पर नियम अनुशासन जैसी कड़ी प्रतिबंधता जीवन पर अपना असर डालती है. सूर्य एक क्रूर ग्रह है और इसका असर व्यक्ति को काफी निडर भी बनाता है. व्यक्ति अपने वादों को कभी भी तोड़ना पसंद नहीं करता है. वाकपटुता के कारण आपकी प्रशंसा होगी. आप बौद्धिक खोज के लिए एक जुनून भी साझा करेंगे और एक अच्छी अकादमिक पृष्ठभूमि होगी. भौतिक सुख-सुविधाओं के प्रति आसक्त होने के कारण, महंगी वस्तुओं पर बहुत अधिक खर्च करना पसंद कर सकता है. धन को बचाने की समस्या भी इसी के कारण उत्पन्न हो सकती है. व्यक्ति को दूसरों के कारण सावधान रहने की आवश्यकता होती है.  

सूर्य के दूसरे भाव में होना देता है चुनौतियों 

सूर्य का दूसरे भाव में होना व्यक्ति को कई मामलों में काफी दृढ़ भी बना सकता है. अपने स्वभाव के चलते भी कई बार जोखिम लेने के कारण आर्थिक नुकसान जैसी स्थिति का सामना करना पड़ जाता है.  सूर्य के असर से कई बार पैतृक संपत्ति के मामले भी चिंता को बढ़ा सकते हैं. व्यर्थ की दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है. वैवाहिक जीवन में भी साथी की कठोरता के साथ परेशानी होती है.  सुखी जीवन में बाधा का सामना करना पड़ेगा. दूसरों के द्वारा छल और कपट का सामना करना पड़ सकता है. अपनों के द्वारा भी धोखे की स्थिति बन सकती है. 

आपको धोखा देने और आपके द्वारा दूसरे लोग कमाई करने के रास्ते पाएंगे. अपनों के कारण धोखे और चाल से बच पाना भी आसान नहीं होगा.  सूर्य के खराब होने या पाप प्रभवैत होने के कारण कुछ रोग भी परेशान कर सकते हैं. नेत्र के रोग परेशानी दे सकते हैं. कई कारणों से आपको आंखों की रोशनी कम होने का सामना करना पड़ सकता है.

सूर्य के दूसरे भाव में सकारात्मक और नकारात्मक फल 

 द्वितीय भाव में सूर्य का प्रभाव व्यक्ति को नैतिक मूल्यों के प्रति सजग बनाता है. आर्थिक पक्ष से व्यक्ति काफी मजबूत होता है. व्यक्ति के सामाजिक रुप से खुद को अच्छे से स्थापित करने की इच्छा रखता है. उसके द्वारा किए जाने वाले कार्य ही उसे बड़ी संख्या में लोगों का प्रिय बनाते हैं. अपने मित्रोम एवं लोगों के लिए वह सदैव आगे रह सकता है. मित्रों के साथ वह कई तरह के नवीन काम करता है. व्यक्ति एक अच्छे मार्गदर्शक के रुप में भी सामने होता है. काफी तार्किक और जिम्मेदार रुप से काम करने वाला होता है. 

इसके अलावा, दूसरे भाव में सूर्य का होना व्यक्ति को अच्छी धन संपदा भी प्रदान करने में सहायक बन सकता है. व्यक्ति के पास बहुत पैसा और संपत्ति भी होती है.आर्थिक उन्नति का होना व्यक्ति के आत्मविश्वास को बढ़ाने का भी काम करता है. आत्म-सम्मान भी इनमें अच्छा होता है. दूसरों से अधिक सहायता की इच्छा यह नहीं रखना चाहते हैं.  अपने कार्यक्षेत्र में इनकी स्थिति बेहद मजबूत होती है. अपने धन का व्यर्थ में प्रदर्शन करना पसंद नहीं करते हैं. 

 दूसरे भाव में सूर्य का अन्य किसी पाप ग्रह से यदि प्रभावित होता है. सूर्य यहां यदि निर्बल होता है तो कई नकारात्मक रुप से काम भी करता है. इसके प्रभाव के चलते व्यक्ति को धन के प्रति अधिक सावधान रहने की आवश्यकता होती है. संपत्तियां विवाद का कारण बन सकती हैं. अत्यधिक धन खर्च के कारण कर्ज की स्थिति भी असर डालती है. दूसरे भाव में सूर्य के कारण व्यक्ति सही काम या सही तरीके से काम करने के लिए जुनूनी हो सकता है जिसके कारण दूसरों के साथ विवाद भी होता है. लोग जब इनके विचारों से सहमत नहीं हो पाते हैं तो परस्पर विरोध की स्थिति उत्पन्न होने की संभावना भी बनी रहती है.

Posted in horoscope, planets, vedic astrology | Tagged , , , | Leave a comment