केमद्रुम योग कैसे होता है भंग

जन्म कुण्डली में जब चंद्रमा से दूसरे भाव और बारहवें भाव में कोई ग्रह नहीं होता है तो यह स्थिति केमद्रूम योग बनाती है. केमद्रूम योग खराब योगों की श्रेणी में आता है. इस योग के कारण जातक मानसिक और शारीरिक रुप से दबाव की स्थिति झेलता है. यह योग मुख्य से जातक की आर्थिक स्थिति को खराब करता है.

चंद्रमा के आगे और पीछे जब कोई ग्रह नहीं होता तो ये स्थिति चंद्रमा के बल को कमजोर करने वाली होती है. कुण्डली में जब चंद्रमा कमजोर होगा तो व्यक्ति को मानसिक रुप से भी बल नहीं मिल पाएगा. व्यक्ति बहुत सी चीजों के निर्णय लेने में सक्षम नहीं होगा.

जब कुण्डली में कोई अशुभ योग बनता है. तो कुण्डली में उस योग के भंग होने या कमजोर होने की स्थिति भी अगर बनी हुई हो, तो यह स्थिति सकारात्मकता को दिखाने में सहायक होती है. ऎसे में जातक को खराब योग से मिलने वाले फलों में कमी आती है.

जन्म कुण्डली में केमद्रूम कैसे भंग होता है

किसी भी जातक के जीवन में जन्म कुण्डली का महत्व बहुत अधिक होता है. सबसे पहले किसी भी योग के बनने और भंग होने इत्यादि की स्थिति को केवल जन्म कुण्डली से ही देखा जाता है. इसी कुण्डली में योग के प्रभाव और उसकी प्रबलता पर विचार होता है.

जन्म कुण्डली में जो भी योग बन रहा हो वह अपने फल जरुर देता है. पर इसी के साथ कुछ अन्य वर्ग कुण्डलियां भी होती हैं. जो ग्रहों के बल और उनसे मिलने वाले फलों की सूक्ष्म जांच के लिए देखी जाती हैं. ऎसे में इन कुण्डलियों के आधार पर भी जन्म कुण्डली में बने हुए योग की प्रभाव क्षमता कैसी रह सकती है, इस बात को समझने में बल मिलता है.

आइये जानते हैं की जन्म कुण्डली जिसे लग्न कुण्डली भी कहा जाता है. इसमें कैसे होता है केमन्द्रुम योग भंग –

  • जब कुण्डली में लग्न से केन्द्र से चन्द्रमा या कोई ग्रह हो तो केन्द्रुम योग भंग माना जाता है.
  • जन्म कुण्डली में अगर सुनफा योग बन रहा हो, तो केमन्द्रुम योग भंग हो जाता है.
  • जन्म कुण्डली में अगर अनफा योग बन रहा हो, तो केमन्द्रुम योग भंग हो जाता है.
  • जन्म कुण्डली में अगर दुरुधरा योग बन रहा हो, तो केमन्द्रुम योग भंग हो जाता है.
  • चंद्रमा उच्च राशि में स्थिति हो और उसे बृहस्पति या मंगल देख रहे हों.
  • जन्म कुण्डली में अगर चन्द्रमा से केन्द्र में कोई ग्रह हो तब भी यह अशुभ योग भंग हो जाता है. योग भंग होने पर केमन्द्रुम योग के अशुभ फल भी समाप्त होते है और व्यक्ति इस योग के प्रभावों से मुक्त हो जाता है.
  • नवांश कुण्डली में केमद्रुम भंग योग

    नवांश कुण्डली जिसे डी 9 चार्ट भी कहा जाता है. इसे मुख्य रुप से ग्रहों के बल और उनकी शक्ति देखने के लिए उपयोग किया जाता है. नवाम्श कुण्डली में बनने वाली कई स्थितियां इस केमद्रुम योग को भंग करने में सहायक बनती हैं. कुछ अन्य शास्त्रों के अनुसार

  • नवांश कुण्डली में अगर चन्द्रमा के आगे-पीछे ग्रह स्थित हों तो यह योग भंग हो जाता है.
  • नवांश कुण्डली में बृहस्पति से केन्द्र में भी अगर चंद्रमा स्थित होगा तो केमद्रुम योग भंग हो जाता है.
  • नवांश कुण्डली में अगर बृहस्पति के साथ चंद्रमा स्थित है तो केमद्रुम योग भंग हो जाता है.
  • नवांश कुण्डली में केन्द्र या त्रिकोण भाव में वृषभ राशि का चंद्रमा हो और उसे मंगल देख रहा हो तो केमद्रुम योग भंग होता है.
  • चन्द्रमा का शुभ ग्रह राशि में होना – केमद्रुम भंग योग

    केमद्रुम योग होने पर भी जब चन्द्रमा शुभ ग्रह की राशि में हो तो योग भंग हो जाता है. ये स्थिति जन्म कुण्डली और नवांश कुण्डली एवं चंद्र कुण्डली से देखी जा सकती है. शुभ ग्रहों में बुध, गुरु और शुक्र ग्रह माने गये है. इसी के साथ जन्म कुण्डली में अगर कोई अन्य शुभ धन योग बन रहा हो जिसमें लक्ष्मी योग, महाभाग्य योग, पंचमहापुरुष योग इत्यादि बन रहा हो तो भी केमद्रूम योग अपनी क्षमता दिखा नहीं पाता है.

    ऎसे में व्यक्ति संतान और धन से युक्त बनता है. उसे जीवन में सुखों की प्राप्ति होती है. वह अपने संघर्ष से आगे बढ़ता है और परिस्थितियों में स्वयं को ढालते हुए काम करता है और समाज में एक सम्मानित वैभवशाली जीवन भी जीता है.

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    4th भाव- सुख भाव क्या है. | Sukh Bhava Meaning | Fourth House in Horoscope | 4th House in Indian Astrology

    कुण्डली के लग्न भाव से क्रम से गिनने चतुर्थ स्थान में आने वाला भाव चतुर्थ भाव कहलाता है. चतुर्थ भाव माता, घरेलू खुशियां, भू-सम्पति, पैतृ्क भूमि, स्थिर-सम्पति, वाहन, नैतिक सदगुण, ईंमानदारी, निष्ठा, मित्र, शिक्षा, मानसिक शान्ति, सुख-सुविधा, संचय, पशु, अनाज, व्यापार, मौसम, घर, बुद्धिमत्ता, बचत, पशु, अनाज, व्यापार, घर, कार, तम्बू, पवेलियन, झूठे आरोप, खेत, खेती, पशुशाला, फसल, खान, गुप्त सम्बन्ध, रहस्य, गुप्त जीवन, सतीत्व, लोकप्रियता, सगे-संबन्धी, प्रसिद्धि. 

    चतुर्थ भाव के कारक ग्रह कौन से है. ।  What are the Karaka Planets of 4th Bhava 

    चतुर्थ भाव का कारक ग्रह चन्द्र व शुक्र है. चतुर्थ भाव में चन्दमा माता, भावनाओं का कारक ग्रह है.  बुध इस भाव में शिक्षा, ज्ञान का कारक है. शनि इस भाव में भू-सम्पति, मंगल निर्मित भू-सम्पति, शुक्र वाहनों का कारक होता है. 

    चतुर्थ भाव स्थूल रुप क्या प्रकट करता है. |  What does the House of Sukh Explain   

    चतुर्थ भाव स्थूल रुप में सगे-सम्बन्धियों को प्रकट करता है. 

    चतुर्थ भाव सूक्ष्म रुप में क्या प्रकट करता है. | What does the House of Sukh accurately explains.

    चतुर्थ भाव सूक्ष्म रुप मे खुशियां प्रकट करता है. 

    चतुर्थ भाव से कौन से संबन्ध देखे जा सकते है. | 4th House represents which  relationships. 

    चतुर्थ भाव माता, मामा, भान्जा, सगे-सम्बन्धी आदि का विश्लेषण करने के लिए प्रयोग किया जाता है. 

    चतुर्थ भाव से शरीर के कौन से अंगों का विश्लेषण किया जा सकता है. | 4th House is the Karak House of which body parts.  

    चतुर्थ भाव से छाती, ह्रदय, फेफडे, रक्त वाहिनियां, डायफ्रम, पेट से ऊपर का भाग, द्रेष्कोणों के अनुसार-दायीं नासिका, शरीर का दायां भाग, दायीं जांघ. 

    चतुर्थ भाव अन्य भावेशों के साथ कौन से परिवर्तन योग बनाता है. | 4th Lord Privartan Yoga Results  

    चतुर्थ और पंचमेश का परिवर्तन योग बनने पर व्यक्ति बुद्धिमान होता है. वह शिक्षित होता है. उसकी संतान उत्तम स्तर से स्थापित होती है. तथा उसे संतान से खुशियां प्राप्त होती है. 

    चतुर्थेश और षष्ठेश का परिवर्तन योग बनने पर व्यक्ति को स्वास्थय सम्बन्धी समस्याएं आती है. उसे जीवन में दुर्घटनाओं का सामना करना पडता है. इसके अतिरिक्त इस योग के प्रभाव से व्यक्ति की माता का स्वास्थय भी प्रभावित होता है. 

    चतुर्थेश और सप्तमेश का परिवर्तन योग जीवनसाथी के द्वारा सुख और खुशियां देता है. इस योग से युक्त व्यक्ति पूर्ण घरेलू सुख से युक्त होता है. साथ ही यह योग व्यक्ति को वाहन सुख देने की क्षमता देता है.  

    चतुर्थेश और अष्टमेश का परिवर्तन योग बनने पर व्यक्ति को अच्छा पारिवारिक जीवन प्राप्त होता है. इस योग के व्यक्ति के माता-पिता आपस में अत्यधिक स्नेह रखते है. व्यक्ति को मातृसुख के अवसर कम प्राप्त होते है.  

    चतुर्थेश और नवमेश का परिवर्तन योग व्यकि को वाहन सुख देता है. व्यक्ति शिक्षा प्राप्त करने के लिए विदेश जाता है. उसे श्रेष्ठ सुख व वैवाहिक सुख भी प्राप्त होता है. व्यक्ति के माता-पिता का आपस में अत्यधिक स्नेह होता है.  

    चतुर्थेश और दशमेश दोनों में परिवर्तन योग बन रहा हों, तब व्यक्ति के पास प्रचुर मात्रा में भू-सम्पति होती है. और ऎसा व्यक्ति कई वाहन प्राप्त करने में सफल होता है. इसके अतिरिक्त यह योग सम्पतियां स्वयं क्रय करने में भी सफल होता है. वाहनों और यात्राओं से सम्बन्धी व्यक्ति कार्य कर आय प्राप्त करता है.  

    चतुर्थेश और एकादशेश दोनों भावों के स्वामियों में परिवर्तन योग बन रहा हो, तो व्यक्ति को वाहन सुख, माता से लाभ, सम्पति प्राप्ति, वाहनों और यात्राओं से प्रचुर मात्रा में आय. 

    चतुर्थेश और द्वादशेश दोनो का परिवर्तन होने पर अशुभ योग बनता है. दुर्घटनाओं के प्रति संवेदनशील, माता की आयु और स्वास्थय को दुष्प्रभावित करता है, सम्पतियों की हानि होती है. 

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    वृश्चिक तथा कुम्भ राशि की गणना | Calculation of Scorpio and Aquarius Sign

    पिछले अध्याय में आपको बताया गया था कि जैमिनी चर दशा में वृश्चिक तथा कुम्भ राशि दशा की गणना बाकी अन्य राशियों से भिन्न होती है. इन दोनों राशियों की गणना के लिए कुछ विशेष नियम निर्धारित किए गए हैं. जो निम्नलिखित हैं :- 

     

    वृश्चिक राशि की गणना (सव्य दशा क्रम) | Calculation of Scorpio sign (Direct Dasha Kram)

    वृश्चिक राशि की दशा का क्रम सव्य होता है. 

    (1) किसी भी कुण्डली का आंकलन करने के लिए कुण्डली में मंगल तथा केतु ग्रह को चिन्हित करें कि वह कुण्डली में किस भाव में स्थित हैं. मंगल तथा केतु ग्रह वृश्चिक राशि के स्वामी माने गए हैं. कुण्डली में यदि मंगल ग्रह वृश्चिक राशि में स्थित है और केतु किसी अन्य राशि में है. तब मंगल को छोड़ दें और वृश्चिक राशि से दशा वर्ष की गिनती करके केतु ग्रह तक गिनें. जितने वर्ष प्राप्त होगें उसमें एक वर्ष घटा दें. शेष वर्ष वृश्चिक राशि के दशा वर्ष होगें. 

    अथवा

    (2) यदि वृश्चिक राशि में केतु स्थित है और मंगल किसी अन्य राशि में स्थित है तब आप उपरोक्त गणना को भूल जाएँ. अब आप केतु को अनदेखा करें. वृश्चिक राशि से मंगल ग्रह तक गिनती करें. जो दशा वर्ष आते हैं उसमें से एक वर्ष घटा दें. शेष वर्ष वृश्चिक राशि के दशा वर्ष होगें. 

    अथवा 

    (3) यदि मंगल तथा केतु दोनों ही ग्रह वृश्चिक राशि में स्थित हैं तब वृश्चिक राशि की पूरे बारह वर्ष की दशा होगी. इसमें कोई संख्या घटाई नहीं जाएगी. 

    अथवा 

    (4) उपरोक्त नियमों के अतिरिक्त यदि मंगल तथा केतु दोनों ही अलग-अलग राशियों में स्थित हैं तब यह देखें कि दोनों में से कौन – सा ग्रह अधिक बलवान है. दोनों ग्रहों का बल देखने के लिए कुछ नियम निर्धारित किए गए हैं. 

    (क) दोनों ग्रहों में से यदि एक ग्रह के साथ ग्रह स्थित है तब वह ग्रह बलवान है. जैसे किसी कुण्डली में मंगल के साथ एक अथवा एक से अधिक ग्रह स्थित हैं तब मंगल, केतु से अधिक बलवान माना जाएगा. वृश्चिक राशि की दशा की गणना वृश्चिक से आरम्भ होकर मंगल पर खतम हो जाएगी. 

    (ख) यदि कुण्डली में केतु के साथ ग्रह हैं और मंगल अकेला स्थित है तब वृश्चिक से केतु ग्रह तक गणना की जाएगी. 

    (ग) यदि दोनों ही ग्रहों के साथ समान संख्या में ग्रह हैं तब जिस ग्रह के भोगाँश अधिक होगें वह ग्रह अधिक बली माना जाएगा और वृश्चिक राशि से गणना आरम्भ करके बली ग्रह तक की जाएगी. 

    (घ) यदि कुण्डली में मंगल तथा केतु दोनों ही ग्रह भिन्न राशियों में अकेले स्थित हैं तब भी उनके भोगाँशों के आधार पर बली ग्रह का निर्णय किया जाएगा. यदि दोनों ग्रहों के अंश(Degree) तथा कला(Minutes) समान हैं तब उनकी विकला(Seconds) के आधार पर बली ग्रह का निर्णय किया जाएगा.    

    कुंभ राशि की गणना | Calculation of Aquarius sign 

    कुम्भ राशि की दशा गणना का क्रम अपसव्य होता है. जिस प्रकार आपने वृश्चिक राशि की दशा की गणना का तरीका समझा है उसी प्रकार कुम्भ राशि की गणना होती है. दोनों में केवल ग्रहों का अन्तर है. इस गणना में शनि तथा राहु को लेगें. राशि कुम्भ होगी. कुम्भ राशि से ग्रह तक गणना अपसव्य क्रम में होगी. कुम्भ से मकर की ओर गिनना आरम्भ करेगें. 

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    आजीवन आजीविका ज्योतिष के माध्यम से | Professional Life through Astrology | Career According to Vedic Astrology

    प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य वराहमिहिर के अनुसार लग्न, सूर्य अथवा चन्द्र में जो ग्रह सबसे अधिक बली हों, उस ग्रह से दशम भाव का स्वामी, नवाशं में जिस राशि में स्थित हों, उस राशि की दशा और गोचर में व्यक्ति को धनोपार्जन की प्राप्ति होती है.

    इसके अतिरिक्त वराहमिहिर ने यह भी कहा है, कि अगर लग्न, द्वितीय और एकदश भाव में शुभ ग्रह बैठे हो तो व्यक्ति को अनेक साधनों से आय प्राप्त होती है. सरल शब्दों में यह कहा जा सकता है, कि दशम भाव और दशमेश इन दोनों से संबन्ध रखने वाले ग्रहों के अतिरिक्त दशमेश नवांश में जिस राशि में गए, उसके स्वामी भी अपनी दशा और गोचर में व्यक्ति को उचित आय देते है. अपनी आजीविका के विषय में अन्य जानकारी प्राप्त करने के लिये आप life long से आजीविका रिपोर्ट प्राप्त कर सकते है. ग्रह बली होकर दशमेश हो, तो व्यक्ति की आजीविका किन क्षेत्रों से संबन्धित हो सकती है. आईये इस विषय पर विचार करते है-;

    सूर्य | Sun

    सूर्य व्यक्ति की रुचि राजनीतिक शास्त्र जैसे विषयों की ओर उन्मुख करता है. कुण्डली में सूर्य अत्यधिक बली हों तो व्यक्ति को राजनीति कार्यों में महारत प्राप्त होती है. वह आजीविका क्षेत्र व जीवन के अन्य क्षेत्रों से भी राजनीतिक करने की प्रवृ्ति रखता है. यहां राजनितिक प्रवृ्ति से अभिप्राय: अपना कार्य निकालने के लिये मीठे-मीठे वादे करना और कार्य निकल जाने के बाद, अपने वादों को भूल जाने की आदत होती है. 

    सूर्य के मध्यम स्तरीय बली होने पर व्यक्ति को अर्ध-तकनीकी क्षेत्रों के और झुकाव रहता है. इस स्थिति में व्यक्ति उच्चाधिकारी बनने की योग्यता रखता है. आजीविका क्षेत्र में उसे प्रतिष्ठा प्राप्त होती है. साथ ही उसे प्रबन्ध कार्यो को करने में कुशलता प्राप्त होती है. वित्तीय कार्य से जुडे क्षेत्रों से उसे आय हो सकती है. 

    सूर्य के निर्बल होने पर व्यक्ति को आजीविका क्षेत्र में सफल होने के लिये सबसे पहले अपने आत्मविश्वास में वृ्द्धि करनी चाहिए, इसके बाद सूर्य की यह स्थिति उसे भौतिक शास्त्र विषय की ओर ले जा सकती है. 

    चन्द्र | Moon

    जन्म कुण्डली में चन्द्र बली होकर दशमेश हो, तो व्यक्ति को संगीत, फाईन आर्टस जैसे विषय अपनी और आकर्षित करते है.  ग्रहों से जुडे अन्य शिक्षा क्षेत्रों को जानने के लिये आप इस link Edu year इस चन्द्र के फलस्वरुप व्यक्ति विक्रेता बनने कि योग्यता रखते है. ऎसे व्यक्ति ग्रह व्यवस्था में निपुण होते है. चन्द्र मध्यम बली हों, तो व्यक्ति पैरा मेडिकल से जुडे क्षेत्रों में काम करने की संभावनाएं बनती है. इसके अतिरिक्त किसी व्यक्ति की कुण्डली में चन्द्र दशम भाव में बली होकर स्थित हों, परन्तु दशमेश न हों, तो व्यक्ति इंजिनियर बनने की योग्यता रखता है.   

    मंगल | Mars

    मंगल व्यक्ति को अग्नि से जुडे क्षेत्रों में कार्य करने के अवसर दे सकता है. इस्कए अतिरिक्त यह व्यक्ति को शल्य चिकित्सक बनने के गुण देता है. इसके बली होने से व्यक्ति को तर्क शास्त्र में योग्यता प्राप्त होती है. यह दशमेश हो, तो व्यक्ति में तकनीकी कार्य करने का गुण स्वत: आ जाता है. 

    मंगल का प्रभाव व्यक्ति को इंजिनीयर, मशीनों का जानकार बनाता है, औजार में उसकी सामान्य रुचि होती है. इस स्थिति में उसकी आजीविका सैनिक, पुलिस इससे संबन्धित दवा- विक्रता से संबन्धित हो सकती है. दवाई के निर्माण का कार्य भी मंगल के कार्यक्षेत्रों की श्रेणी में आता है.  

    बुद्ध | Mercury

    बुध का दशमेश होकर बली होना, व्यक्ति को एकाउन्टेंसी, पत्रकारिता इससे संबन्धित जैसे विषयों में आजीविका दे सकता है.  बुध से जुडे कार्यक्षेत्रों में पढने-लिखने, अकाउन्टेन्सी से जुडे कार्य आते है. डाक-संचार से संबन्धित लोग, संचार के माध्यमों का कार्य बुध के अन्तर्गत आता है. बुध का बली होना व्यक्ति को संवाददाता, दुभाषिया बनने की योग्यता होती है. 

    गुरु | Jupiter 

    जिस व्यक्ति की कुण्डली में गुरु दशमेश होकर, बली हो, उस व्यक्ति को साहित्य अध्ययन में रुचि रहती है. वह वितिय कार्य करने की योग्यता रखता है. दर्शन शास्त्र जैसे विषय व्यक्ति को सरलता से अपनी ओर खींचते है. इसके अतिरिक्त यह व्यक्ति वितिय सलाहकार बन सकता है. और प्रबन्धन क्षेत्र में कार्य कर आजीविका प्राप्ति कर सकता है.

    गुरु के बली होने से व्यक्ति में न्याय करने का गुण आता है. वह वकील और प्रवक्ता बन सकता है. शिक्षक और धर्म क्षेत्रों में कार्य करना उसके यश में वृ्द्धि करता है. 

    शुक्र | Venus

    शुक्र बली होकर व्यक्ति को नृ्त्य, संगीत, चिकित्सा और कला से जुडे क्षेत्रों में आजीविका प्राप्ति के अवसर देता है. इस योग के व्यक्ति को होटल मैनेजमेन्ट , टूरिज्म आदि के कार्य पसन्द आते है. कमप्यूटर एनिमेशन, ग्राफिक्स आदि कार्य करने से ऎसा व्यक्ति धनोपार्जन कर सकता है. 

    शुक्र के प्रभाव क्षेत्र में आने वाले अन्य कार्यक्षेत्रों में कास्मेटिक्स, कपडे, गहने, सुगन्ध और बनाव-श्रंगार का सामान आता है. सौन्दर्य प्रसाधन सामग्री से जुडे कार्य करने से व्यक्ति को आय हो सकती है. वह फैशन से जुडे क्षेत्रों में कार्य कर सकता है. 

    शनि | Saturn

    जिस व्यक्ति की कुण्डली में शनि बली हो, और साथ ही दशमेश भी हों, ऎसे व्यक्ति को मैकेनिकल कार्य करना पसन्द होता है. इंजिनियरिंग के क्षेत्रों में वह शीघ्र योग्यता प्राप्त कर लेता है. शनि व्यक्ति में मेहनत का गुण लाता है, और इसके फलस्वरुप व्यक्ति मेहनत और संघर्ष से पीछे नहीं हटता है. यह व्यक्ति व्यक्ति को उच्च स्तर का इंजिनियर बनाता है.  शनि साढेसाती का प्रभाव व्यक्ति की आजीविका पर विशेष रुप से पडता है. साढेसाती के प्रभाव को जानने के लिये Sadesati  देखा जा सकता है.    

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    आश्लेषा नक्षत्र विशेषताएं | Characteristics of Ashlesha Nakshatra | Ashlesha Nakshatra Career

    आकाश मे तारों के समूह को नक्षत्र कहा जाता  है और भारतीय ज्योतिष में इनका महत्वपूर्ण स्थान रहा है. नक्षत्रों की गणना प्राचीन काल से ही होती आ रही है और जिस व्यक्ति का जन्म जिस नक्षत्र में होता है उसके अनुसार उसके व्यक्तित्व का विश्लेषण प्राप्त होता है. ग्रह और नक्षत्रों के आधार पर ही शुभ और अशुभ का निर्णय होता रहा है. इसी तरह विभिन्न नक्षत्रों मे से एक नक्षत्र है आश्लेषा नक्षत्र.

    आश्लेषा नक्षत्र स्वरूप | Ashlesha Nakshatra Recognition

    आश्लेषा नक्षत्र पांच तारों का एक समूह होता है यह दिखने मे चक्र के समान प्रतीत होता है. आश्लेषा नक्षत्र गणना के क्रम में नवम स्थान पर आता है. यह नकक्ष कर्क राशि के अंतर्गत आता है. आश्लेषा नक्षत्र सूर्य के समीप होने के कारण इसे प्रातः के समय देखा जा सकता है. यह सूर्य के साथ होता है जो सूर्य के एक घर आगे या एक घर पीछे रहता है, बुध् की महादशा की अवधि 17 वर्ष तक चलती है. इस नक्षत्र का स्वामी बुध होता है जिस वजह से इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति पर बुध व चंद्र का विशेष प्रभाव पड़ता है

    आश्लेषा नक्षत्र में जन्मे जातक के नाम के अक्षर चरणानुसार डी डू डे डो है.बुध का रंग हरा होने से इसका शुभ रत्न पन्ना है. अश्लेषा नक्षत्र में पैदा लेने वाले व्यक्ति गण्डमूल से प्रभावित होते  इसलिए इस नक्षत्र के गन्डमूल को “सर्पमूल” भी कहा जाता है यह नक्षत्र विषैला होता है यह नपुंसक ग्रह होने से दूसरे ग्रहों के साथ हो तो उत्तम फल देता है.

    आश्लेषा नक्षत्र विशेषताएं | Ashlesha Nakshatra Characteristics

    आश्लेषा नक्षत्र का स्वामी ग्रह बुध है और बुध को ज्ञान का कारक माना गया है. यह वाणिक ग्रह भी है जिसके फलतः इस नक्षत्र में जन्मे जातक सफल व्यापारी, चतुर अधिवक्ता, भाषण कला में निपुण होते हैं. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति ईमानदार होते हैं इसके साथ ही यह मौक़ापरस्त भी होते हैं. दूसरों पर आसानी से विश्वास नहीं करते. यह स्वभाव मे हठीले एवं जिददी होते हैं और अपनी जिद के आगे किसी की भी नहीं सुनते.इस जातक में नाग देवता का प्रभाव अधिक प्रतीत होता है. फलतः व्यक्ति अपेक्षाकृत क्रोधी होता है. (jordan-anwar)

    आश्लेषा नक्षत्र कैरियर | Ashlesha Nakshatra Career

    आश्लेषा नक्षत्र मे जन्मे जातक योग्य व्यवसायी होते हैं इन्हें नौकरी की अपेक्षा व्यापार करना ज्यादा भाता है और इस कारण यदि यह जातक नौकरी करता भी है.  उसमे ज्यादा समय तक टिक नही पाता और यदि नौकरी करते भी हैं तो साथ ही साथ किसी व्यवसाय से भी जुड़े रहते हैं.

    आश्लेषा नक्षत्र के व्यक्ति मे स्थिरता का अभाव होता है इनमे कुछ न कुछ करते रहने की लगन बनी रहती है. इनका कोई भी पूर्वनिर्धारित स्वरूप नहीं होता. एक तरह से इनका जीवन भी बिल्कुल चलायमान नदी की भांती रहता है. यह अपने कर्यों के प्रति अग्रसर रहते है परंतु अगर अपने उद्देश्य में सफलता नहीं मिलती है तो ये अवसाद से ग्रस्त हो जाते हैं और इस वजह से संसारिकता से दूर होते जाते हैं.

     

    आश्लेषा नक्षत्र में जन्मा जातक अच्छा एवं गुणी लेखक भी होता है. अपने चातुर्य के कारण यह श्रेष्ठ वक्ता भी होता है. भाषण कला में प्रवीण अपने इस गुण के कारण यह दूसरों पर अपनी छाप छोड़ते हैं और लोग इनसे जल्द ही प्रभावित होते हैं. इन्हें अपनी प्रशंसा सुनने की भी बड़ी चाहत रहती है. ओर अपना बखान किए बिना भी नही रहते .यह धन दौलत से परिपूर्ण होते हैं तथा इनका जीवन वैभव से युक्त होता है इनमें अच्छी निर्णय क्षमता पायी जाती है जो इन्हें सफलता तक पहुँचाती है.

    आश्लेषा नक्षत्र महिला व्यक्तित्व | Ashlesha Nakshatra Female Characteristics

    आश्लेषा नक्षत्र में जन्म लेने वाली स्त्री रंग रूप में सामान्य परंतु आकर्षक होती है. अपने स्वभाव से सभी का मोह लेने वाली होती है. यह संस्कारी और सभी का सम्मान करने वाली होती इस नक्षत्र मे जन्मी कन्या बहुत भाग्यशाली होती हैं यह जिस घर में जाती है. वहां लक्ष्मी का वास होता है वह घर धन धान्य से भर जाता है.

    जिनका जन्म इस नक्षत्र में हुआ है उन्हें गण्डमूल नक्षत्र की शांति  के लिए पूजा करवानी करवानी चाहिए व भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए.

    अगर आपना जन्म नक्षत्र और अपनी जन्म कुण्डली जानना चाहते है, तो आप astrobix.com की कुण्डली वैदिक रिपोर्ट प्राप्त कर सकते है. इसमें जन्म लग्न, जन्म नक्षत्र, जन्म कुण्डली और ग्रह अंशो सहित है : आपकी कुण्डली: वैदिक रिपोर्ट

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    व्यवसाय अथवा नौकरी से संबंधित सामान्य नियम | General Rules Related to a Profession or Service

    नौकरी से संबंधित बहुत से प्रश्न प्रश्नकर्त्ता के द्वारा पूछे जाते हैं. तरक्की कब होगी? तरक्की होगी या नहीं होगी? क्या नौकरी में तबादला होगा? तबादला होगा या नहीं होगा? नई नौकरी कब मिलेगी? वर्तमान नौकरी में रहूं या नई नौकरी ज्वाइन कर लूँ. कौन सा व्यवसाय करुँ? इन सभी प्रश्नों के लिए लग्न का विश्लेषण सबसे अधिक महत्व रखता है. उसके बाद दशम भाव का विश्लेषण महत्व रखता है. 

    * दशम भाव कार्य से संबंधित प्रश्न है. 

    * यदि तरक्की का प्रश्न है तब द्वित्तीय तथा एकादश भाव का आंकलन भी अवश्य किया जाएगा. 

    * यदि तरक्की के प्रश्न में ओहदा बढ़ने की बात पूछी जा रही है तब दशम भाव का विश्लेषण किया जाएगा. 

    * यदि प्रश्नकर्त्ता अपने तबादले के संबंध में प्रश्न कर रहा है तब तृत्तीय तथा नवम भाव का विश्लेषण किया जाता है. इसमें घर से कम दूरी पर तबादला होता है.  

    * यदि दूर परिवर्तन की बात है अथवा विदेश की बात है तब अष्टम तथा द्वादश भाव का विश्लेषण किया जाएगा.  

    * विदेश के लिए चतुर्थ भाव का पीड़ित होना आवश्यक होता है. 

    * प्रश्न के समय का लग्न, वर्तमान नौकरी तथा वर्तमान बॉस को दर्शाता है. सप्तम भाव भविष्य में होने वाली नौकरी तथा भविष्य के बॉस को दिखाता है. 

    * द्वादश भाव से सेवानिवृति(Retirement) देखी जाती है. नौकरी में बना रहेगा अथवा नहीं रहेगा. 

     सिद्धि के योग | Yogas of Sidhi

    * प्रश्न का लग्न बली है तब प्रश्नकर्त्ता जो चाहता है वो हो जाएगा. 

    * दशम भाव का स्वामी तथा दशमेश बली हैं तो प्रश्नकर्त्ता जो चाहता है वह हो जाएगा. 

    * प्रश्न के समय चन्द्रमा बली है तो जातक को मानसिक संतुष्टि रहेगी. 

    * प्रश्न के समय द्वित्तीयेश तथा द्वित्तीय भाव, एकादशेश तथा एकादश भाव बली हैं तो जातक जो चाहता है वह हो जाएगा. 

    * प्रश्न के समय यदि चतुर्थ भाव में शुभ ग्रह हैं तो प्रश्नकर्त्ता जहाँ है वहाँ सुखी है. 

    * प्रश्न के समय यदि चतुर्थ भाव में अशुभ ग्रह स्थित हैं तब प्रश्नकर्त्ता जहाँ है वहाँ सुखी नहीं है. 

    * चतुर्थ भाव से आमदनी का आंकलन भी करते हैं इसलिए प्रश्न के समय शुभ ग्रह यदि चतुर्थ भाव में है तब प्रश्नकर्त्ता के लिए शुभ है.  

    नौकरी अथवा व्यवसाय के योग | Yogas of Job Or Business

    नौकरी से संबंधित कुछ योगों की चर्चा हम इस पाठ में करेंगें. इन योगों के आधार पर प्रश्नकर्त्ता के सामान्य प्रश्नों का उत्तर आप आसानी से दे सकते हैं. नौकरी के सामान्य नियम आप प्रश्न कुण्डली पर लागू करें. सूक्ष्मता से अध्ययन करने के लिए आप प्रश्न कुण्डली की दशमाँश कुण्डली का अध्ययन भी कर सकते हैं. नौकरी अथवा व्यवसाय के योग निम्नलिखित हैं :- 

    * यदि नौकरी से संबंधित प्रश्न है तब प्रश्न के समय यदि दशमेश लग्न में है या लग्नेश दशम में है तब नौकरी जल्दी लग जाएगी. यदि प्रश्न आगे बढ़ने का है तब जल्दी आगे बढे़गा. 

    * दशमेश तथा लग्नेश एक साथ स्थित है तो कार्यसिद्धि शीघ्र होगी. दशमेश तथा लग्नेश का शुभ इत्थशाल है तो कार्य जल्दी सिद्ध होगा. इत्थशाल में जितने अंशों का अंतर होगा उतने दिन, महीने बाद नौकरी लगेगी. 

    * प्रश्नकर्त्ता ने किसी ग्रह के वक्री होने पर नौकरी छोडी़ है तब उस ग्रह के मार्गी होने पर पुन: नौकरी लग जाएगी. 

    * यदि किसी ग्रह के राशि परिवर्तन के समय नौकरी छोडी़ है तब उस ग्रह के अगली राशि बदलने पर नौकरी लग जाएगी. 

    * नए स्थान पर नौकरी आरम्भ करने से पूर्व प्रश्नकर्त्ता के नक्षत्र से कम्पनी के नाम के नक्षत्र का मिलान कर सकते हैं. इसमें दोनों की नाडी़ एक ही होनी चाहिए. 

    वर्तमान नौकरी में बना रहे या बदले? | Should one continue with the same job or change it

    * चर लग्न शुभ दृष्ट तो वर्तमान नौकरी से संतुष्ट होगा.  

    * चर लग्न यदि अशुभ ग्रहों से दृष्ट होगा तो दूसरी नौकरी में असंतोष होगा. 

    * प्रश्न के समय स्थिर लग्न है और पाप दृष्ट भी है तब प्रश्नकर्त्ता नौकरी नहीं बदल पाएगा और वर्तमान समय में भी समस्या का सामना करना पड़ सकता है. 

    * प्रश्न के समय स्थिर लग्न शुभ दृष्ट तो वर्तमान नौकरी में संतोष बना रहेगा और प्रश्नकर्त्ता तरक्की भी करेगा. 

    * प्रश्न के समय चन्द्रमा का इत्थशाल लग्नेश से होता है तो जातक वर्तमान नौकरी में बना रहेगा. 

    * प्रश्न के समय चन्द्रमा सप्तमेश से होगा तो नौकरी में परिवर्तन होगा. 

    * प्रश्न के समय चन्द्रमा का इत्थशाल द्वित्तीयेश से होगा तो प्रश्नकर्त्ता वर्तमान नौकरी में बना रहेगा. 

    * प्रश्न के समय चन्द्रमा का इत्थशाल अष्टमेश से होता है तो नौकरी में परिवर्तन होता है. जातक नौकरी बदलेगा. 

    * प्रश्न के समय शनि की दृष्टि चतुर्थ भाव या दशम भाव पर है तो स्थान से हट जाएगा. शनि की तीसरी दृष्टि हटाने क काम अधिक करेगी. 

    * विदेश के प्रश्न में यदि कुण्डली में अधिकतर ग्रह चर राशि में और देखने वाले ग्रह भी चर राशि में हैं तब भाग्य विदेश में उदय होगा. 

    * यदि अधिकतर ग्रह स्थिर राशि में हैं और देखने वाले ग्रह भी स्थिर राशि में हैं तब भाग्योदय स्वदेश में ही उदय होगा. 

    * लग्न के बली होने पर पुरनी नौकरी में बने रहने में लाभ है. सप्तम भाव के बली होने पर नौकरी बदलने में फायदा होगा. 

    * नौकरी में बना रहूंगा या छोड़ दूंगा के प्रश्न में, प्रश्न के समय चर लग्न और चर नवाँश होने पर वर्तमान नौकरी छूट सकती है. लग्नेश के अस्त होने पर भी नौकरी छूट सकती है. 

    * प्रश्न के समय लग्नेश या दशमेश नीचे के ग्रहों से संबंधित है तो नौकरी छूट सकती है. 

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    ब्रह्मगुप्त ज्योतिषाचार्य का ज्योतिष में योगदान

    ब्रह्मगुप्त का नाम भारत के महान गणितज्ञों में लिया जाता है. इनके द्वारा दिए गए सूत्रों को आज भी उपयोग में लाया जाता है. ब्रह्म गुप्त न केवल गणित के जानकार थे बल्कि वे एक बहुत योग्य ज्योतिषी भी थे. उन्हों ने अपने ग्रंथों में गणित और ज्योतिष के समन्वय को भी दिखाया और ज्योतिष को एक बहुत ही महत्वपूर्ण आधार एवं सार्थक सत्य का परिचय भी दिया.

    ब्रह्मगुप्त का का समय काल 598 ई. पूर्व का बताया जाता है. इनके विषय में उल्लेखनीय है की ये उज्जैन में स्थिति खगोल प्रयोगशाला में एक प्रमुख पद पर आसीन रहे थे. ब्रह्म गुप्त के द्वारा रचित ज्योतिष और गणित के कई नियमों को भास्कराचार्य, ने अपने सिद्धांत के लिए उपयोग किया किया ओर उनके विचरओं और सूत्रों की बहुत प्रशंसा भी की.

    भारतीय प्राचीन इतिहास में मध्यकालीन यात्री अलबरूनी ने भी अपने लेखों में ब्रह्मगुप्त का उल्लेख किया है.

    ब्रह्मगुप्त द्वारा रचित रचनाएं

    ब्रह्मागुप्ता “ब्रह्मस्फुट सिद्धान्त” व खण्डखाद्यक नाम के दो ज्योतिष ग्रन्थों की रचना की. यह माना जाता है, कि जिस समय इन ग्रन्थों की रचना हुई उस समय बौद्ध धर्मालम्बियों व सनातनधर्मियों में आपस में मतभेद रहा करते थे.

    इन विवादों को बढाने के लिए किसी बौद्ध शास्त्री ने लवणमुष्टि नाम के एक ग्रन्थ की रचना कि. इस शास्त्र ने उस विवाद को भटकाने में आग में घी के समान कार्य किया.

    ऎसे में ब्रह्मागुप्ता जी ने ज्योतिष का एक शास्त्र लिखा और जिसका नाम इन्होने खण्डखाद्यक रखा. इस ग्रन्थ को लोगों में मिठास बांटने वाला कहा गया. ब्रह्मागुप्ता ने ज्योतष के शास्त्रों के अलावा बीजगणित के कई नियमों का आविष्कार किया. अपने समय में ये एक प्रसिद्ध गणित शास्त्री के रुप में सामने आयें. इनके द्वारा लिखे गए, शास्त्र अरब देशों में असिन्द हिन्द और खण्डखाद्यक के नाम से प्रसिद्ध हुए.

    ज्योतिषाचार्य ब्रह्मागुप्ता जी ने पृ्थ्वी को स्थिर माना है तथा ये आर्यभटट के पृथ्वी चलन के सिद्धान्त का विरोध करते रहें. ब्रह्मागुप्ता जी के द्वारा लिखा गया खण्डखाद्यक शास्त्र करण ज्योतिष नियमों का उल्लेख करता है.

    ब्रह्मगुप्त और उनके सूत्र

    ब्रह्मगुप्त ने ज्योतिष में कई प्रयोग किए और वैदिक गणित में अपना योगदान भी दिया. उनके द्वारा लिखे गए ग्रंथों में ग्रहों की गणना और नक्षत्रों पर विचार और ज्योतिष में बनने वाले अनेक योग इत्यादि भी बताए.

    ब्रह्मगुप्त ने धर्म ओर कर्मकाण्ड की विचारधारा से खुद को बहुत अलग नहीं किया. ग्रहण से संबंधित जब वह अपने धार्मिक विचारों को रखते हैं तो अल्बुरुनी ने इसका विरोध करते हुए लिए की – “ अगर धार्मिक कर्म काण्डों को ही मानना है तो क्यों चंद्रमा के सूर्य को ग्रहण लगाने की व्याख्या करने के लिए पृथ्वी की छाया के व्यास की गणना क्यों करते हो”. ऎसे में कुछ चीजों के प्रति उनकी आलोचना भी हुई पर उनके गणितिय और ज्योतिषी सिद्धातों ने सभी के समक्ष उनकी योग्यता को प्रभावशाली ढंग से दिखाया .

  • चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से लंका क्षेत्र में सूर्य के उत्पन्न होने से रवि के दिन में सृष्टि की उत्पत्ति का आरंभ हुआ. इसी समय से ही दिन, माह, वर्ष, युग और कल्प का आरंभ होता है. अर्थात इन सभी की उत्पत्ति का समय चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा तिथि थी.
  • सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण के समय का मापन कैसे निकाला जाए.
  • ब्रह्मगुप्त जी ने शून्य के बारे में अपने विचार दिए जिसमें उन्होंने एक स्वतंत्र अंक बताया था. शून्य के उपयोग पर बात की पर 0 पर दिए गए उनके सिद्धांत में कमी रही जिसे स्वीकारा नहीं गया.
  • ब्रह्मगुप्त की रचनाओं का बाद में अरबी भाषा में भी अनुवाद किया गया और सिन्दहिन्द और अकरन्द नाम दिया गया.
  • ब्रह्मगुप्त ने त्रिभुज तथा चक्रीय चतुर्भुज के क्षेत्रफल ज्ञात करने का सूत्र दिया.
  • चक्रीय चतुर्भुज की भुजाएँ और उनके कर्णों की लम्बाई कैसे जानें यह भी बताया.
  • पृथ्वी की परिधि ज्ञात करने का नियम दिया जो आधुनिक मान के निकट बैठता है.
  • विशेष :

    ब्रह्मगुप्त द्वारा बताए गए बहुत से नियमों को आने वाले आचार्यों ने अपनाया. इसमें से भास्कराचार्य ने ब्रह्मगुप्त के द्वारा बताए गए नियमों को अपने ग्रन्थ का आधार भी बनाया. इनकी रचनाओं का बाद में अरबी में अनुवाद भी हुआ उन्होंने ब्रह्मगुप्त के ब्रह्मस्फुट ग्रन्थ को सिन्दहिन्द और खंड खाद्यक को अल अकरन्द नाम भी दिया.

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    नाग करण

    पंचांग के पांच अंगों में एक मुख्य अंग करण है. 1 तिथि में 2 करण होते हैं, अर्थात तिथि का पहला भाग और दूसरा भाग दो करणों में बंटा होता है. करण ग्यारह होते हैं, जिनमें से सात करण बार-बार आते हैं और चार ऎसे होते हैं जिनकी पुनरावृत्ति नहीं होती है. करणों की गणना गणित के आधार पर होती है. करण तिथि का आधा भाग होता है. एक दिन में दो करण आते हैं. चार करण महीने में एक बार आते हैं 7 करणों की पुनरावृत्ति बार-बार होती रहती है.

    नाग – स्थाई करण है

    चार करणों को स्थायी कहा गया है क्योंकि यह बदलते नहीं हैं. इनका तिथि में स्थान निश्चित होता है. इस में एक मुख्य नाग करण है. नाग करण को कम शुभ करण की श्रेणी में रखा गया है. इस करण का प्रभाव जातक को कठोर बनाता है. व्यक्ति निष्ठुर हो सकता है और क्रोधी भी होता है.

    नाग करण कब होता है

    नाग करण अमावस्या तिथि के उत्तरार्ध में आता है. नाग करण का प्रतीक सर्प को बताया गया है. अत: सर्प जैसा प्रभाव भी इस करण को मिलता है. इस करण की अवस्था सुप्त कही गई हैं और इस कारण इसमें कोई शुभ फल का प्रभाव मिलना कम ही दिखाई देता है.

    नाग करण में क्या काम नहीं करें

    इस करण में किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्यों को नहीं करने की सलाह दी जाती है. किसी भी नए काम की शुरुआत भी इस करण में नहीं करने की सलाह दी जाती है. इस करण अवधि मे कोई भी व्यापारिक कार्य प्रारम्भ करना शुभ नहीं माना जाता है.

    नाग करण में क्या काम करें

    इस करण के समय दान के कार्य उत्तम होते हैं. मंत्र जाप और प्रभु सुमिरन करना अनुकूल होता है. गरीबों को सामर्थ्य अनुसार भोजन इत्यादि का दान करना शुभ होता है. इस नक्षत्र में किसी को प्रताडी़त करना, मारना, विष देना इत्यादि कार्य अनुकूल कहे गए हैं.

    नाग करण का मुहूर्त में महत्व

    नाग करण को ज्योतिष में अशुभ माना गया है. ज्योतिष में मुहूर्त इत्यादि के लिए इस करण को शुभ कार्यों में त्यागना ही शुभ माना गया है. अत: किसी कार्य का प्रारम्भ करने के लिए शुभ मुहूर्त के लिए शुभ करण का होना भी अत्यंत आवश्यक होता है. नाग करण के समय यदि मूल नक्षत्र भी पड़ रहा हो तो कोई भी शुभ कार्य इस समय पर बिलकुल भी नहीं करना चाहिए. इस समय पर शुभता की हानि होती है.

    नाग करण में जन्मा जातक

    नाग करण अपने नाम के अनुरुप फल देता है. नाग जिसे हम सर्प के रुप में जानते ही हैं, इसके कारण मन में एक प्रकार के डर की कल्पना स्वभाविक ही दिखाई देती है. ऎसे में इस करण में जन्में जातक का प्रभाव भी लोगों के मध्य भय देने वाला हो सकता है. जातक अपने कार्यों द्वारा लोगों पर उसका एकाधिकार भी रखने वाला हो सकता है. अपनी मर्जी और अपनी जिद के कारण आगे बढ़ता जाता है. दूसरों की सुनना जातक को पसंद नहीं होता है.

    नाग करण में जन्म लेने वाला व्यक्ति जल और समुद्री क्षेत्रों से आय प्राप्त करने वाला होता है. वह कर्मवादी होता है, और मेहनत के फल उसे आय के रुप में प्राप्त होते है. परन्तु भाग्य के भरोसे अपनी सफलता को छोडने पर उसे जीवन में असफलता का मुंह देखना पडता है. भाग्य में कमी उसे कभी-कभी निराशा भाव में ले जाती है. वह चंचल नेत्र युक्त होता है. उसके नेत्र उसके सौन्दर्य में वृद्धि करते है.

    इस करण में जिनका जन्म होता है उन को अपने जीवन में संघर्ष अधिक करना पड़ता है. मेहनत के बावजूद भी सफलता प्राप्ति नहीं हो पाती है. चीज मिल जाने पर भी उस का लाभ नहीं मिल पाता है. अपने से बिछड़ने का भय रहता है. भाग्य अधिक साथ नहीं देता अपने शुभ कर्मों से ही व्यक्ति जीवन में आगे बढ़ सकता है.

    चालाकी से युक्ति काम करने वाला, झूठ बोलने में निपुण होता है. गलत कार्यों की ओर जल्द ही आकर्षित होता है. कर्ज की स्थिति जीवन में जरूर आती है.

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    7वां भाव-विवाह भाव क्या है. | Jaya Bhava Meaning | Seventh House in Horoscope | 7th House in Indian Astrology

    कुण्डली के सांतवें भाव को विवाह भाव या जया भाव के नाम से जाना जाता है. यह भाव व्यक्ति के जीवन साथी की व्याख्या करता है. इसके अतिरिक्त इस भाव से यौनाचार की इच्छायें, विवाह, विदेश यात्रायें, संतान, सामान्य खुशियां, व्यापारिक साझेदारी, रोगों से मुक्ति, आम लोगों व जनसमूह से संबन्ध, मुकदमेबाजी, दूसरा जीवन साथी, खोई भी संपति की पुन: प्राप्ति, सक्रिय उर्जा, हार्निया, यौनरोग, कूटनीति और विदेश में सम्मान, व्यापार और दाव लगाना, वैवाहिक खुशियां, चोरी, चोर का विवरण, विदेशी मामले, समाज में पारस्परिक सम्बन्ध, सामाजिक और आधिकारिक प्रतिष्ठा, गोद लिया हुआ पुत्र, सौतेले बच्चें.  

    सप्तम भाव का कारक ग्रह कौन है. | What are the Karaka Planets of 7th Bhava 

    सप्तम भाव का कारक्ग्रह शुक्र है. इस भाव से मंगल यौन आचार प्रकट करता है. 

    सप्तम भाव से स्थूल रुप में किस विषय का विश्लेषण किया जाता है. | What does the House of Marriage Bhava Explain.  

    सप्तम भाव से विशेष रुप से साझेदारों का विचार करने के लिए देखा जाता है.  

    सप्तम भाव से सूक्ष्म रुप में किस विषय का विचार किया जाता है. | What does the House of Marriage accurately explains.

    सप्तम भाव सूक्ष्म रुप में काम भाव के रुप में देखा जाता है.  

    सप्तम भाव से कौन से सगे-सम्बन्धी प्रकट होते है. | Marriage’s House represents which  relationships.  

    सप्तम भाव से जीवन साथी, शत्रु, सौतेले, बच्चे, व्यापारिक, साझेदार,द्वेष, दूसरी संन्तान आदि सम्बन्ध देखे जाते है.  

    सप्तम भाव शरीर के कौन से अंगों का प्रतिनिधित्व करता है. | 7th House is the Karak House of which body parts. 

     सप्तम भाव से गर्भाशय, ब्लेडर, अण्डाशय, मूत्रमार्ग, मूत्र सम्बन्धित अंग, गुदा मार्ग, वीर्य, पेट और जांघ के बीच के भाग का विश्लेषण किया जाता है.  द्रेष्कोणौं के अनुसार इस भाव से मुंह, नाभि और पांवों का विचार किया जाता है.  

    सप्तम भाव के अन्य कौन से नाम है. | 7th House other’s Name

    सप्तम भाव कलत्रभाव, कामस्थान, मारकस्थान, द्विस्वभाव लग्न के लिए बाधक स्थान के रुप में जाना जाता है. 

    सप्तमेश का अन्य भाव स्वामियों के साथ परिवर्तन योग से किस प्रकार के फल प्राप्त होते है. | 7th Lord Privartan Yoga Results 

    सप्तमेश और अष्टमेश का परिवर्तन योग होने पर अशुभ योग बनता है. इस योग से व्यक्ति के जीवन साथी की मृ्त्यु होती है. उसका सुखहीन पारिवारिक जीवन हो सकता है. 

    सप्तमेश और नवमेश परिवर्तन योग व्यकि को सुखी वैवाहिक जीवन देता है. ऎसे व्यक्ति को व्यवसाय और व्यापार में सफलता प्राप्त होती है. इस योग से युक्त व्यक्ति और उसका जीवन साथी दोनों ही धार्मिक आस्था युक्त होते है. 

    सप्तमेश और दशमेश परिवर्तन योग बना रहे हों, तो व्यक्ति व्यवसाय व व्यापार से लाभ प्राप्त करता है. उसे व्यापार में जीवन साथी और साझेदार दोनों का सहयोग प्राप्त होता है. 

    सप्तमेश और एकादशेश परिवर्तन योग में शामिल हों, तो व्यक्ति को जीवन साथी के सहयोग से लाभ होता है. विदेशी व्यापार में भी उसे सफलता मिलती है. इस योग वाले व्यक्ति को नौकरी करने से बचना चाहिए.  

    सप्तमेश और द्वादशेश परिवर्तन योग बनायें, तो व्यकि को जीवन साथी को खोना पड सकता है. व्यापारिक साझेदार मध्य में छोडने पड सकते है. और विदेश में विवाह हो सकता है. इस योग के व्यक्ति को विदेश में यात्रायें, व जीवन साथी पर व्यय करने के योग बनते है.  

    सांतवा भाव या सप्तमेश के साथ अन्य ग्रहों का सम्बन्ध होने पर बनने वाले योग 

    सांतवा भाव या इसके स्वामी अगर दूसरे या ग्याहरवें भाव से सम्बन्धित हों, तो व्यक्ति के विवाह के बाद उसकी आर्थिक स्थिति प्रबल होती है. 

    कुण्डली का तीसरे, छ्ठे, दशवें व ग्यारहवें भाव में स्थित सप्तमेश व्यक्ति को विवाह के बाद भाग्यवान बनाता है.  

    सांतवें भाव में राहू, शुक्र, मंगल प्रेम विवाह के योग बनाते है.  

    नीचभंग राजयोग बनाने वाला सप्तमेश निर्धन परिवार का जीवन साथी देता है. 

    सांतवें भाव में वृ्श्चिक राशि का शुक्र या सांतवें भाव में वृषभ राशि का बुध साझेदार से हानि के योग बनाता है.  

    सातवें भाव में एक धीमी गति का ग्रह और साप्तमेश एक धीमी के ग्रह के साथ युति कर रहे हो, तो व्यक्ति का विवाह देरी से होता है.  

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    छठा भाव – ऋण भाव क्या है. | Gyati Bhava Meaning | Sixth House in Horoscope | 6th House in Indian Astrology

    वैदिक ज्योतिष में कुण्डली का छठा भाव रोग भाव, त्रिक भाव, दु:स्थान, उपचय, अपोक्लिम व त्रिषाडय भाव के नाम से जाना जाता है. इस भाव का निर्बल होना अनुकुल माना जाता है. छठा भाव जिसे ज्ञाति भाव भी कहते है. यह भाव व्यक्ति के शत्रु संबन्ध दर्शाता है. इस भाव से ऋण, रोग, नौकरी, पेशा, दुर्दशा, सन्ताप, चोट, चिन्ताएं, असफलताएं, बिमारियां, दुर्घटनाएं, अवरोध,षडयन्त्र, मानसिक पीडा, घाव, कारावास, क्रूर कार्य, न्यूनता, और चाह्त का भाव, मानसिक स्थिरता, इमारती लकडी, पत्थर, औजार, अस्पताल, जेल, सौतेली मां, दण्ड, क्रूर आदेशों का पालन, प्रतियोगिताओं में अनुकल परिणाम, काम, क्रोध, मोह, अहंकार, ईर्ष्या, निवेश में हानि, साझेदारी. क्रय-विक्रय, भौतिक समृ्द्धि और अस्वस्थता. 

    छठा भाव का कारक ग्रह कौन सा है. । What are the Karaka planets of 6th Bhava  

    छठे भाव का कारक मंगल ग्रह है. मंगल से इस भाव से शत्रु, शत्रुता, मुकदमेबाजी, अवरोध, चोट आदि देखे जाते है. शनि इस भाव से रोग, शोक, ऋण आदि प्रकट करता है. व बुध षष्ट भाव में भाई-बन्धु, मामा और चाचा का प्रतिनिधित्व करता है.  

    छठे भाव से स्थूल रुप में किस विषय का विश्लेषण किया जाता है. | What does the House of Loan Explain.   

    छठा भाव शत्रु भाव के रुप में विशेष रुप से जाना जाता है. इस भाव से स्थूल रुप में व्यक्ति के शत्रुओं का विचार किया जाता है.  

    छठे भाव से सूक्ष्म रुप में क्या देखा जाता है. | What does the House of Loan accurately explains.

    छठे भाव से व्यक्ति के नुकसान देखे जाते है. 

    छठा भाव कौन से संबन्धों को प्रकट करता है. | 6th House represents which  relationships. 

    छठे भाव से मामा, नौकर, पालतु जानवार, पिता के सगे-सम्बन्धी आदि का विचार किया जाता है. 

    छठा भावेश अन्य भाव स्वामियों के साथ कौन से परिवर्तन योग बनाता है. | 6th Lord Privartan Yoga Results  

    षष्ठेश और सप्तमेश का परिवर्तन योग व्यक्ति को जीवन में उतार-चढाव देता है. उसके वैवाहिक जीवन के लिए यह योग शत्रु समान फल देता है. जिस प्रकार शत्रु व्यक्ति की जीवन में बाधाएं उत्पन्न करते रहते है, ठिक उसी प्रकार यह योग होने पर व्यक्ति का जीवन साथी वैवाहिक जीवन की खुशियों में परेशानियों का कारण बनता है.  

    षष्ठेश और अष्टमेश का परिवर्तन योग एक प्रकार का विपरीत राजयोग है. ऎसा व्यक्ति भौतिक प्राप्तियां प्राप्त करता है. 

    लेकिन स्वास्थय के लिए अनुकुल नहीं होता है.

    षष्ठेश और नवमेश में परिवर्तन योग बन रहा हों, तो व्यक्ति धार्मिक आस्थावान कम होता है. उसके पिता का स्वास्थय भी पीडित होता है. यात्राओं के दौरान सुख में कमी होती है. व्यक्ति को विदेशी व्यापार में हानियां होती है. 

    षष्ठेश और दशमेश में परिवर्तन योग होने पर व्यक्ति के व्यापार और व्यवसाय के लिए अच्छा नहीं होता है. इस योग से युक्त व्यक्ति लाभ कमाकार ऊंचा उठता है. व्यक्ति की पैतृ्क संपति में कमी होती है. 

    षष्ठेस ओर एकादशेश में जब परिवर्तन योग बनता है, तब व्यक्ति केवल नौकरी से आय प्राप्त करता है. उसके अपने मित्रों, भाई बहनों के साथ संबन्धों में तनाव रहता है. 

    षष्ठेश और द्वादशेश में परिवर्तन योग एक विपरीत राजयोग है. इस योग में व्यक्ति अपने व्ययों के लिए बडे ऋण लेता है. और जीवन भर विध्न, समृ्द्धि, अस्वस्थ रहता है. विदेश यात्राएं करता है.  

    सूर्य पीडित होकर छठे भाव में हों, तो कौन सा रोग देता है.  

    सूर्य पीडित हो, तथा रोग भाव में स्थित हों, तो व्यक्ति को फोडे, सिरदर्द, रक्तचाप, तपेदिक आदि दे सकता है. ये रोग व्यक्ति को सूर्य की दशा अवधि या फिर छठे भाव के स्वामी की दशा अवधि में प्राप्त होते है. 

    चन्द्रमा का निर्बल होकर रोग भाव में स्थित होना, व्यक्ति को अपच या पेट की गडबड, शरीर में द्रव्यों की मात्रा स्थिर होने संबन्धी रोग दे सकता है.  

    मंगल पीडित अवस्था में रोग भाव में हो, तो व्यक्ति को मासँ पेशियों प्रणाली के कारण होने वाला ताप और जलन, चर्म रोग, जहरबाद, अण्डवृ्द्धि, हार्निया, शल्यचिकित्सा आदि देता है.  

    बुध व्यक्ति को चिडचिडापन और चिन्ताओं के कारण होने वाले नाडियों और मानसिक शिकायतें, खांसी-जुकाम अस्थमा, जोडों में दर्द, सिरदर्द, हाथ-पांवों में दर्द दे सकता है. 

    गुरु रोग भाव में पीडित अवस्था में स्थित हों, तो व्यक्ति को जिगर संबन्धी रोग होते है. पावों और पंजों में दर्द के साथ पेट की शिकायत होती है.

    शुक्र के कमजोर होने पर व्यक्ति को गुरदे कि समस्याएं, जन्म देने की समस्याएं, बहुमूत्र आदि समस्याएं देता है.  

    शनि के कमजोर होने पर यह ग्रह घबराहट, गठिया, सम्बन्धी, शिकायतें, मिरगी. 

    राहू के कारण व्यक्ति को मिरगी, शीतला, और कोढ आदि हो सकते है.  

    केतु इस स्थिति में व्यक्ति को त्वचा पर पपडी, खुजली, चेचक, दाद आदि देता है.  

    उपरोक्त सभी प्रकार के रोग व्यक्ति को षष्टेश की दशा- अन्तर्दशा में प्राप्त होते है.  

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