वारुणी योग एक अत्यंत ही शुभ एवं उत्तम गति प्रदान करने वाला समय होता है. हिन्दू पंचांग का एक अत्यंत ही पावन शुभ समय मुहूर्त भी है. यह उन शुभ मुहूर्तों की ही तरह है जो अबूझ मुहूर्त के महत्व को दर्शाते हैं. वारुणी योग के समय पर बहुत से धार्मिक कृत्य किए जाते हैं. यह एक ऎसा समय होता है, जिसका हर पल अपने आप में नवीनता और शुभता लाने वाला होता है.

इस योग के प्रत्येक क्षण पवित्रता से भरपूर और शुभ दायक माना गया है. वारुणी योग के महत्व के बारे में धर्म सिंद्धु, काशी इत्यादि ग्रंथों में पढ़ने को मिलता है. इन सभी में इस योग की महत्ता का बहुत ही सुंदर शब्दों में वर्णन किया गया है. उत्तर भारत हो या दक्षिण भारत सभी ओर इस वारुणी योग की धूम रहती है. संपूर्ण भारत वर्ष में इस समय की शुभता का वर्णन विभिन्न भाषाओं के ग्रंथों में प्राप्त होता है.

तीन प्रकार का वारुणी योग

वारुणी योग के विषय में बताया गया है की यह तीन प्रकार से बनता है. जिस कारण इसकी महत्ता क्रमश: आगे बढ़ती जाती है. यह योग माह, नक्षत्र, दिन और शुभ योगों के द्वारा ही अलग-अलग रुप में शुभता को प्रकट करता है.

वारुणी योग में कई तरह के विचार भी मिलते हैं. वारुणी योग में बताए गए माह में फाल्गुन माह, चैत्र माह, मार्गशीर्ष माह में पड़ने वाले महावारुणी योग के विषय में भी बताया गया है.

वारुणी योग

चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को शतभिषा नक्षत्र होने के कारण "वारुणी योग" बनता है.

महावारुणी योग

चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन शतभिषा नक्षत्र का होना और शनिवार का दिन होने पर "महावारुणी योग" बनता है.

महामहावारुणी योग

चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को शतभिषा नक्षत्र, शनिवार और शुभ नामक योग हो तो "महामहावारुणी योग" बनता है.

वारुणी योग पौराणिक महत्व

वारुणी योग के विषय में पौराणिक आख्यानों में बहुत सी परिभाषाएं प्राप्त होती हैं. वारुणी योग के बारे में चैत्र, फाल्गुन, मार्गशीर्ष इत्यादि मासों में इस योग के बनने की बात कही गयी है.

भविष्यपुराण

भविष्यपुराण के अनुसार चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी यदि शनिवार या शतभिषा से युक्त हो तो वह महावारुणी पर्व कहलाता है . इस समय पर किया गया पवित्र नदियों में स्नान, दान एवं श्राद्ध कार्य अक्षय फल देने वाला होता है.

चैत्रे मासि सिताष्टम्यां शनौ शतभिषा यदि ।

गंगाया यदि लभ्येत सूर्यग्रहशतैः समा ।।

सेयं महावारुणीति ख्याता कृष्णत्रयोदशी ।

अस्यां स्नानं च दानं च श्राद्धं वाक्षयमुच्यते ।।

नारदपुराण

वारुणेन समायुक्ता मधौ कृष्णा त्रयोदशी ।।

गंगायां यदि लभ्येत सूर्यग्रहशतैः समा ।।

स्कन्दपुराण

वारुणेन समायुक्ता मधौ कृष्णा त्रयोदशी।

गङ्गायां यदि लभ्येत सूर्यग्रहशतैः समा॥

शनिवारसमायुक्ता सा महावारुणी स्मृता।

गङ्गायां यदि लभ्येत कोटिसूर्यग्रहैः समा॥

देवीभागवत पुराण

वारुणं कालिकाख्यञ्च शाम्बं नन्दिकृतं शुभम्।

सौरं पाराशरप्रोक्तमादित्यं चातिविस्तरम्॥

वारुणी योग स्नान पूजा

वारुणी योग में प्रात:काल स्नान करने के बाद श्री विष्णु का पूजन करना चाहिए. भगवान शिव का पूजन करना चाहिए. सुर्य नमस्कार और पूजन किया जाता है. इसके अलावा राधा-कृष्ण का पूजन, तुलसी, पीपल, आंवला वृक्ष का पूजन करना चाहिए. प्रात:काल तुलसी के समक्ष दीपक जलाना चाहिए. इस समय पर धार्मिक ग्रंथों गीता, भागवत, रामायण, पुराण इत्यादि का पाठ करना चाहिए. वारुणी योग में भजन कीर्तन कथा को करना उत्तम होता है. इस उपासना में भी में ईष्ट पूजन और तुलसी की पूजा करते हैं. नदी, तलाब या घर के बाहर दीपदान भी करना चाहिए.

वारुणी योग में जो व्यक्ति स्नान के साथ-साथ पूजा उपासना, जप इत्यादि करता है उसे अक्षय पुण्य फलों की प्राप्ति होती है. इस पावन अवसर पर दिन भर व्रत धारण करके रात्रि में तारों को अर्ध्य देकर भोजन करने की परंपरा भी रही है.

वारुणी योग में गंगा स्नान का महत्व

वारुणी योग में स्नान की परंपरा भी बहुत ही प्राचीन काल से चली आ रही है. प्रायः इस दिन स्नान और दान की परंपरा रही है. स्नान करने का अत्यंत ही शुभ फल बताया गया है. इस दिन को गंगा स्नान के लिए बहुत ही शुभ माना जाता है. स्नान करने के साथ ही इस संपूर्ण योग में तप करने का भी विधान बताया गया है. साथ ही मौन साधना और ध्यान का भी इस समय पर बहुत ही शुभ महत्व होता है.

वारुणी योग के आरंभ से ही स्नान और धार्मिक उपदेश व कथा का संगम होने पर शुब फल मिलते हैं. धारणाओं और मान्यताओं के अनुसार सृष्टि चक्र अपने शुभ स्तर पर होता है. इसलिए इसे देवताओं के लिए भी असाध्य और कठिन बताया गया है क्योंकि उन्हें भी इस स्नान का फल लेने के लिए पृथ्वी पर आना ही पड़ेगा.

वारुणी योग के लिए प्रत्येक दिन गंगा, यमुना या किसी नदी, घाट या सरोवर इत्यादि में स्नान करना चाहिए. यदि यह संभव नही हो पाता है. ऎसे में घर पर ही स्नान करना चाहिए. स्नान करने के पश्चात अपने भगवान का पूजन व मंत्र जाप भी करना चाहिए. इस समय में नक्षत्र और शुभ योग का संगम हो तो महावारूणी का समय होता है. ये समय स्नान के लिए अत्यंत ही शुभदायक माना गया है. इसके अतिरिक्त समस्त नक्षत्रों का ध्यान करते हुए स्नान भी अपना विशेष फलदायी प्रभाव देता है.

वारुणी योग में दान का आध्यात्मिक प्रभाव

शास्त्रों में वारुणी योग की बड़ी महिमा बताई गई है. इस दिन पवित्र नदी, सरोवर या कुंड में स्नान करके नक्षत्र आराधना करते हैं. शास्त्रोक्त अनुसार स्नान करने से सुख, स्वास्थ्य लाभ और समृद्धि की प्राप्ति होती है.

दान और संयम का पालन करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं. तीर्थाटन के समान शुभफल की प्राप्ति होती है. इस समय पर सामर्थ्य अनुसार और शुद्ध मन से किया गया दान अक्षय होता है.

वारुणी योग की महिमा के बारे में पौराणिक ग्रंथों में विस्तार से उल्लेख प्राप्त होता है. इस दिन के स्नान, तप को मोक्ष प्रदान करने वाला कहा गया है. दान और जाप करने से स्वर्ग के द्वार खुलते हैं. पाप कर्म समाप्त होते हैं. गंगा स्नान, दीप दान, हवन, यज्ञ और विभिन्न अनुष्ठान आदि करने से पाप और ताप का शमन होता है. इस दिन किए जाने वाला अन्न,धन और वस्त्र दान का शुभता देने वाला है.