वैशाख पूर्णिमा 2022 - करें इन कामों को मिलेगा मोक्ष

वैशाख पूर्णिमा का उत्सव रोशनी से भरपूर और हर दिशाओं को प्रकाशित करने वाला त्यौहार है. पूर्णिमा का समय "ॐ असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मामृतं गमय ॥" इन पंक्तियों को चरितार्थ करने जैसा है. यह वह समय होता है जब अंधकार का पूर्ण नाश होता है और प्रकृति एवं जीवन में चारों ओर प्रकाश ही प्रवाहित होता है. पूर्णिमा का समय आध्यतमिक और वैज्ञानिक दोनों ही विचारों में एक अत्यंत ही प्रभावशाली समय होता है. जहां वैज्ञानिक इस समय को प्रकृति के होने वाले बदलावों ओर चंद्रमा की आकर्षण शक्ति से जोड़ते हैं, वहीं धार्मिक स्तर पर भी यह समय चंद्रमा-प्रकृति और मनुष्य के संबंध में होने वाले बदलावों को भी दर्शाता है. ऎसे में इस समय की उपयोगिता और प्रभाव को समझने के लिए हमें किसी प्रकार के विरोधाभास पर जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती है.

वैशाख पूर्णिमा में करें चंद्रमा का पूजन

पूर्णिमा पूजन में चंद्रमा के पूजन को महत्व दिया गया शास्त्रों में वर्णित है कि पूर्णिमा समय चंद्रमा अपनी समस्त कलाओं से पूर्ण होता है. संपूर्ण रुप में होने पर सृष्टि को आलोकित करता है. चंद्रमा जल तत्व है ऎसे में उसका पृथ्वी पर सभी जीवों, वनस्पति इत्यादि चीजों पर भी असर पड़ता है. ऎसे में इस समय के दौरान हम पृथ्वी पर मौजूद जल पर भी इसका खास प्रभाव देखते ही है. जैसे की समुद्रों का पानी किस प्रकार इस समय के दौरान ज्वार भाटे की स्थिति में दिखाई देता है. ऎसे में जब शरीर की बात की जाए तो शरीर में भी अधिकांश हिस्सा जल का मौजूद होने के कारण यह भी प्रभावित होता है. इस समय के दौरान जब हम अपनी उर्जा को ध्यान और साधना द्वारा संतुलित करने का प्रयास करते हैं तो यह हआरे लिए अत्यंत ही शुभदायक हो जाता है. इस समय के दौरान जब हम चंद्रमा का पूजन करते हैं तो यह उसकी ऊर्जा से साथ खुद को जोड़ने की प्रक्रिया होती है. चंद्रमा के पूजन में रात्रि समय चंद्रमा को अर्घ्य प्रदान करना चाहिए. उसके समक्ष दीपक जलाने चाहिये. चंद्रमा की रोशनी में खड़े होकर “ ऊँ अमृतंग अन्गाये विधमहे कलारुपाय धीमहि, तन्नो सोम प्रचोदयात ।” मंत्र का जाप करना चाहिये. चंद्रमा का संबंध मानसिक रुप से सदैव ही रहा है. ऎसे में जब चंद्रमा की रोशनी में कुछ समय के लिए वहां खड़े होकर जब इन मंत्रों का उच्चारण किया जाए या फिर शांत होकर वहां बैठा भी जाए तो यह क्रिया शारीरिक संचार को बेहतर बनाने में बहुत सहयोग देती है.जीवन में दरिद्रता अथवा अकाल मृत्यु का भय भी समाप्त होता है.

वैशाख पूर्णिमा समय अन्य पर्व

वैशाख पूर्णिमा भगवान बुद्ध जन्म समय वैशाख पूर्णिमा पर भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था. इस कारण इस तिथि का दिन और भी अधिक महत्वपूर्ण बन जाता है. यह समय बुद्ध को ज्ञान मता है जिसका प्रचार संसार भर में हुआ और आज विश्व भर में इस दिन को भगवान गौतम बुद्ध के जन्मदिवस के रुप में भी मनाया जाता है. भगवान बुध को श्री विष्णु भगवान के मुख्य अवतारों में से एक भी माना गया है. इस कारण भारतवर्ष में इस दिन को बुद्ध पूर्णिमा के रुप में भी उत्साह के साथ मनाया जाता है. वैशाख पूर्णिमा के दिन छिन्नमस्तिका जयंती इस दिन देवी छिन्नमस्तिका का पूजन भी होता है. इसी दिन शक्ति के इस रुप की जयंती मनाई जाती है. माता छिन्नमस्तिका का पूजन करके भक्त अपने सभी संकटों से मुक्ति पाता है. छिन्नमस्तिका जयंती के दिन सधना एवं सिद्धी की प्राप्ति का एक अत्यंत ही उत्तम दिन माना जाता है. इस अवसर पर शक्ति पिठों पर विशेष पूजा अर्चना होती है. ऎसे में वैशाख पूर्णिमा का दिन अत्यंत ही शुभ फलदायी बनता है. प्रकृति का संचरण ग्रहों की शक्ति, भगवान के आशीर्वाद एवं शक्ति की संस्थापना द्वारा ही हो पाता है. ऎसे में यह एक अवसर इन संपूर्ण का संगम बन कर त्रिवेनी रुप लेता है और इस पावन अवसर के दिन यदि भक्त अपनी सामर्थ्य अनुसार जो कुछ भी जप-तप-दान इत्यादि करता है. उस सभी का इस सृष्टि पर एवं स्वयं उस पर गहरा प्रभाव पड़ता है.

वैशाख पूर्णिमा का महात्म्य

धर्म शास्त्रों एवं पौराणिक आख्यानों में पूर्णिमा तिथि के विषय में बहुत सी कथाएं और रहस्यों का पता चलता है. यह तिथि अत्यंत शुद्धता, पवित्रा और शुभ फल देने वाली मानी गई है. वैशाख मास की पूर्णिमा पर पूरे मास में चले आ रहे धार्मिक कृत्यों को यहीं पर आकर ठहराव मिलता है. यह समय वैशाख माह के समय जो भी त्यौहार हुए, वर मनाए गए और स्नान-दान के कार्य किये गए उन सभी का अंतिम स्वरुप इस पूर्णिमा पर आकर संपूर्ण होता है. पौराणिक ग्रंथों के आधार पर कहा जाता है कि यदि संपूर्ण वैशाख माह के नियमादि न कर पाएं तो वैशाख पूर्णिमा के दिन पूजा उपासना एवं दान कार्य कर लेने से ही सहस्त्र गायों के दान करने जितना फल प्राप्त होता है. एक महीने से चला आ रहा वैशाख स्नान एवं विशेष धार्मिक अनुष्ठानों का समापन इस पूर्णिमा के अवसर पर होता है. इस समय पर दान और तप की महत्ता को भी दर्शाया गया है. सभी स्थानों जो भी आध्यात्मिक स्थल हैं वहां पर इस अवसर बहुत बड़े स्तर पर पूजा अर्चना एवं यज्ञ-हवन किए जाते हैं और वैशाख माह की समाप्ति का समय पूर्ण होता है. स्कंद पुराण, भविष्य पुराण, इत्यादि में वैशाख पूर्णिमा और इस तिथि के बारे में भी बताया गया है. इस दिन गंगा में स्नान करने की बहुत ही महत्वता बताई गयी है. इसके अलावा पवित्र धार्मिक स्थलों प्रयाग राज त्रिवेणी में इस स्नान करने की बात कहीं गयी है. नदी सरोवरों में स्नान करने के पश्चात सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है उस के बाद दीपक जलाए जाते हैं और दान इत्यादि का विशेष महत्व बताया गया है. धर्मराज के निमित्त आज के दिन प्रसाद बांटा जाता है. ऎसा करना गौदान के समान फल देने वाला कहा गया है. वैशाखी पूर्णिमा के दिन पर यदि कलश भर कर गुड़ अथवा तिलों का दान किया जाए तो वह दान पूर्व जन्मों के पापों का नाश करता है. अनजान में हुए गलत कर्मों से मुक्ति दिलाने वाला बनता है. वैशाख पूर्णिमा के अवसर पर श्री विष्णु की प्रतिमा के सामने घी का चौमुखी दीपक प्रज्जवलित करना चाहिए. इस्के अलावा गाय के घी से भरा हुआ पात्र, नारियल, तिल को पूजा में रखने से कष्टों का निवारण होता है. मनवांछित फलों की प्राप्ति होती है. इस दिन तिल के तेल का दीपक तुलसी के पौधे के सामने भी जलाना चाहिए.