गुप्त नवरात्रि पर महाविद्या को लगाएं विशेष भोग मिलेगी हर कार्य में सफलता

गुप्त नवरात्रि के दिन दस महाविद्याओं का पूजन किए जाने का विधान रहा है. गुप्त नवरात्रि का पर्व गृहस्थ से अधिक तंत्र, साधना कर्म एवं योग क्रियाओं के लिए उपयुक्त समय माना जाता है. गुप्त नवरात्रि हेतु किए जाने पूजा कर्म में साधारण स्वरुप में दुर्गा के नव रुपों का पूजन भी किया जाता है किंतु विशेष रुप से ये समय महाविद्याओं का पूजन संपन्न होता है. इस समय पर प्रत्येक दिन ब्रह्माणिय शक्ति एवं ऊर्जा का अलग स्तर होता है. प्रत्येक दिवस विशेष होता है तथा साधना को चरण दर चरण पूरा होते देखा जा सकता है.

गुप्त नवरात्रि के दिन महाविद्या के प्रत्येक रुप का पूजन किया जाता है. इस समय पर दसमहाविद्या को विशेष भोग अर्पित करने का विधान रहा है. इस समय पर महाविद्याओं के प्रत्येक रुप का उनके प्रिय भोग के साथ पूजन करने से सर्वकामनाओं की सिद्धि प्राप्त होती है. आइये जानें दस महाविद्याओं को कौन सा भोग अर्पित किया जाए जिससे साधना ओर सिद्धि की प्राप्ति हो संभव. 

दस महाविद्या को लगाए जाने वाले विशेष भोग (प्रसादम) 

माँ महाविद्या काली को लगाएं विशेष भोग 

महाविद्या काली का पूजन विशेष रुप से गुप्त नवरात्रि में साधना सिद्धि हेतु किया जाता है. देवी काली का पूजन भक्त की ऊर्जा को जागृत करने का समय होता है. इस समय पर देवी के समक्ष विभिन्न पूजन अनुष्ठान किए जाते हैं. देवी को श्रीफल विशेष रुप से अर्पित किया जाता है. 

देवी काली की पूजा में भोग स्वरुप शहद का उपयोग विशेष रुप से किया जाता है. माँ काली को शहद अत्यंत प्रिय है. गुप्त नवरात्रि में महाविद्या काली का पूजन करने उपरांत देवी को शहद का भोग विशेष रुप से अर्पित करना चाहिए. 

काली मंत्र 

ॐ क्रीं क्रीं क्रीं हूँ हूँ ह्रीं ह्रीं दक्षिणे कालिके

क्रीं क्रीं क्रीं हूँ हूँ ह्रीं ह्रीं स्वाहा॥

माँ महाविद्या तारा को लगाएं विशेष भोग 

दस महाविद्या की दूसरी शक्ति देवी तारा हैं, माहविद्या तारा को एकजता, उग्रतारा और नीलसरस्वती के नाम से भी पुकारा जाता है. सृष्टि की शक्ति इन्हीं में निहित है. देवी भक्तों को सभी दुखों से तारने वाली हैं. देवी तारा को हिंदू धर्म की ही भांति बौद्ध धर्म में भी अत्यंत पूजनीय माना गया है.

देवी तारा के पूजन में सरसों के तेल में बने पदार्थ, तेजपत्ता चढ़ाएं, नारियल, सूखे मेवे और रेवड़ियों का भोग लगाने से सुख एवं समृद्धि की प्राप्ति होती है.

तारा मंत्र 

ॐ त्रीं ह्रीं, ह्रूं, ह्रीं, हुं फट्॥

महाविद्या ललिता को लगाएं विशेष भोग 

दस महाविद्या में देवी ललिता सुख एवं सौभाग्य की देवी हैं. देवी ललिता का पूजन आर्थिक विपन्नता को दूर करने वाला होता है. ऋषि दुर्वासा एवं आदिगुरू शंकरचार्य भी देवी ललिता के परम भक्त थे. सौन्दर्यलहरी में त्रिपुर सुन्दरी श्रीविद्या की स्तुति का वर्णन अत्यंत मनोरुप से वर्णित है. देवी ललिता के पूजन में  ललिता सहस्त्रनामावली का पाठ करने से सभी कष्ट दूर होते हैं, धन धान्य की प्राप्ति होती है. 

देवी ललिता के पूजन में श्वेत रंग से निर्मित खाद्य पदार्थों का विशेष रुप से भोग निर्मित किया जाता है. इस दिन देवी को खीर, श्वेत मिष्ठान एवं दूध से बने भोग अर्पित करना उत्तम माना गया है. देवी के पूजन के पश्चात भोग अर्पित करके भोग को गरीबों में वितरित करने से रोग दोष शांत होते हैं. जीवन में सुख एव्म सफलता का आगमन होता है. 

ललिता मंत्र

 'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौ: ॐ ह्रीं श्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौ: ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं नम:। '

महाविद्या भुवनेश्वरी को लगाएं विशेष भोग 

महाविद्या भुवनेश्वरी का पूजन सृष्टि के कल्याण एवं समस्त सिद्धियों की प्राप्ति हेतु किया जाता है. देवी भुवनेश्वरी आदि शक्ति का स्वरुप हैं. भुवन की अधिष्ठात्रि देवी शत्रुओं का नाश करने हेतु सदैव सृष्टि में व्याप्त हैं. इनकी शक्ति के द्वारा सृष्टि का संचालन अविरल रुप से गतिमान है. देवी का पूजन करने से संपत्ति से जुड़े सभी विवाद समाप्त होते हैं. महाविद्या भुवनेश्वरी का पूजन करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है. देवी की पूजा से ज्ञान में वृद्धि और सुख की प्राप्ति होती है. पंच तत्वों में समाहित शक्ति को प्रदान करती हैं. 

देवी भुवनेश्वरी की पूजा में माता को मालपुआ का भोग विशेष रुप से अर्पित किया जाता है. 

भुवनेश्वरी मंत्र

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं सौंः क्रीं हूं ह्रीं ह्रीं भुवनेश्वर्यै नमः॥

महाविद्या त्रिपुर भैरवी को लगाएं विशेष भोग 

महाविद्या त्रिपुर भैरवी को काली का स्वरुप माना गया है. त्रिपुर भैरवी के अनेकों नाम हैं ओर देवी की अनेक सहायिकाओं को भैरवी रुप में भी जाना जाता है. देवी का स्वरुप शत्रुओं का नाश करने हेतु विख्यात है. त्रिपुर की सुरक्षा का दायित्व इन्हें प्राप्त है. देवी त्रिपुर भैरवी जी का पूजन तंत्र एवं मंत्र दोनों ही साधनाओं हेतु उपयुक्त होता है. देवी की साधना में शक्ति एवं बल की वृद्धि होती है. 

महाविद्या त्रिपुर भैरवी पूजा में देवी को गुड़, खाण्ड इत्यादि का भोग विशेष रुप से अर्पित किया जाता है. देवी की पूजा में लाल चंदन का उपयोग अवश्य करना चाहिए. देवी को गुड़ का भोग लगाने से शत्रु बाधा शांत होती है. न्यायिक मामलों में विजय की प्राप्ति होती है.

महाविद्या त्रिपुर भैरवी  मंत्र 

ॐ ह्रीं त्रिपुर भैरवी कलौं ह्रीं स्वाहा॥

महाविद्या छिन्नमस्तिका को लगाएं विशेष भोग 

महाविद्या छिन्नमस्तिका को तंत्र में विशेष स्थान प्राप्त है. देवी का पूजन तांत्रिक कर्म में सफलता हेतु किया जाता है. देवी छिन्नमस्तिका का स्वरुप काफी रौद्र है किंतु उनका ममतामयी व्यवहार भक्तों को सिद्धि एवं सुख प्रदान करता है. देवी का पूजन सभी कष्टों का नाश करता है. समस्त कामानों की पूर्ति होती है. देवी को चिंताओं का नाश करने वाला माना गया है और चिंतपूर्णी नाम भी प्राप्त है.

देवी छिन्नमस्तिका के पूजन में माता को मीठे पान का भोग लगाना उत्तम होता है. देवी के पूजन में शहद फर पान को विशेष माना जाता है.

छिन्नमस्तिका मंत्र

ॐ वैरोचन्ये विद्महे छिन्नमस्तायै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्॥

महाविद्या धूमावती  को लगाएं विशेष भोग 

गुप्त नवरात्रि में महाविद्या धूमावती जी का पूजन रोगों के नाश हेतु प्रमुख होता है. देवी का स्वरुप धूम्र की भांति है. देवी का वर्णन रुद्रामल तंत्र में प्राप्त होता है. दस महाविद्याओं में माता सती का ये स्वरुप भगवान शिव को ग्रहण कर लेने के कारण मिला. देवी ने जब भगवान शिव को निगल लिया तब उनकी देह से धुआं व्याप्त होने लगा ऎसे में माता का स्वरुप शोक एवं दुखों को दूर करने वाला होता है. रोग एवं दोषों का नाश देवी के पूजन द्वारा संभव होता है. माता को दुख एवं दारिद्र से मुक्ति पाने हेतु भी पूजा जाता है. 

देवी का पूजन करने में सरल एवं गरिष्ठ दोनों प्रकार के भोग लगाने का वर्णन प्राप्त होता है. देवी की पूजा में तेल से बने पदार्थ एवं खिचड़ी को विशेष माना गया है. 

धूमावती मंत्र 

धूं धूं धुर धुर धूमावती क्रों फट् स्वाहा॥

महाविद्या बगलामुखी को लगाएं विशेष भोग 

गुप्त नवरात्रि में महाविद्या बगलामुखी का पूजन विशेष तंत्र साधना का समय होता है. तांत्रिक कर्म में देवी का को मुख्य स्थान प्राप्त होता है. देवी बगलामुखी पीताम्बराके रुप में बःई पूजी जाती है क्योंकि देवी का स्वरुप पीले रंग से अधिक वर्णित होता है. देवी के पूजन में पीले रंग का विशेष उपयोग होता है. देवी को हल्दी की माला विशेष रुप से अर्पित की जाती है. माता स्तंभन की देवी हैं इसलिए जीवन में आने वाला कोई भी संकट इनके स्मरण मात्र से रुक जाता है. कष्ट की स्थिति टल जाती है. जीवन में किसी भी प्रकार के विवाद में विजय पाने के लिए बगलामुखी का पूजन किया जाता है. यह आठवी महाविद्या के रुप में पूजी जाती हैं. 

महाविद्या बगलामुखी को विशेष रुप से पीले रंग के मिष्ठान अर्पित किए जाते हैं. बेसन ओर हल्दी से निर्मित भोग अर्पित किया जाना उत्तम होता है.

महाविद्या बगलामुखी मंत्र 

ह्लीं बगलामुखी विद्महे दुष्टस्तंभनी धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्॥

महाविद्या मातंगी को लगाएं विशेष भोग 

देवी महाविद्या मातंगी शुभ एवं कोमल स्वरुप होती हैं. देवी का पूजन नवें दिन पर प्रमुख रुप से होता है. कला एवं संगीत का स्वर इन्हीं में विराजित है. देवी को प्रकृति का स्वरुप संगीतमय है. माता सभी सुखों के साथ जीवन में शुभता को प्रदान करने वाली होती हैं. वाणी से संबंधित कोई भी परेशानी से बचाव के लिए मातंगी का पूजन बहुत शुभ माना जाता है. प्राणियों के जीवन में आनंद एवं संगीत का उद्घोष देवी के आशिर्वाद से ही संपन्न होता है. देवी जीवन में सुखों का नाश करती हैं दांपत्य जीवन में सुख प्रदान करने वाली होती हैं. 

देवी मातंगी को भोग स्वरुप मिष्ठान एवं श्रीफल से बने भोग अर्पित किए करना बहुत ही शुभ माना जाता है. 

मंत्र

ॐ ह्रीं क्लीं हूं मातंग्यै फट् स्वाहा॥

महाविद्या कमला को लगाएं विशेष भोग 

देवी कमला का स्वरुप अत्यंत शुभदायक होता है. देवी को महाविद्याओं में दसवीं शक्ति के रुप में माना जाता है. देवी का स्वरुप सभी तरह के ज्ञान एवं बुद्धि को प्रदान करने वाला माना जाता है. 

देवी के पूजन से अन्न धन की प्राप्ति होती है. जीवन में अभाव की समाप्ति होती है. देवी कमला श्री का स्वरुप हैं. लक्ष्मी रुपा हैं इसलिए आर्थिक तंगी एवं कर्ज से जुड़ी समस्याओं को हल करने के लिए इनका पूजन विशेष होता है. 

देवी कमला को खीर का भोग एवं केसर अर्पित करना शुभ होता है. 

मंत्र

ॐ ह्रीं हूं हां ग्रें क्षों क्रों नमः॥

दस महाविद्या स्तोत्र  

दुर्ल्लभं मारिणींमार्ग दुर्ल्लभं तारिणींपदम्।

मन्त्रार्थ मंत्रचैतन्यं दुर्ल्लभं शवसाधनम्।।

श्मशानसाधनं योनिसाधनं ब्रह्मसाधनम्।

क्रियासाधनमं भक्तिसाधनं मुक्तिसाधनम्।।

तव प्रसादाद्देवेशि सर्व्वाः सिध्यन्ति सिद्धयः।।

नमस्ते चण्डिके चण्डि चण्डमुण्डविनाशिनी।

नमस्ते कालिके कालमहाभयविनाशिनी।।

शिवे रक्ष जगद्धात्रि प्रसीद हरवल्लभे। 

प्रणमामि जगद्धात्रीं जगत्पालनकारिणीम्।।

जगत्क्षोभकरीं विद्यां जगत्सृष्टिविधायिनीम्।

करालां विकटां घोरां मुण्डमालाविभूषिताम्।।

हरार्च्चितां हराराध्यां नमामि हरवल्लभाम्।

गौरीं गुरुप्रियां गौरवर्णालंकार भूषिताम्।।

हरिप्रियां महामायां नमामि ब्रह्मपूजिताम्।

सिद्धां सिद्धेश्वरीं सिद्धविद्याधरगणैर्युताम्।

मंत्रसिद्धिप्रदां योनिसिद्धिदां लिंगशोभिताम्।।

प्रणमामि महामायां दुर्गा दुर्गतिनाशिनीम्।।

उग्रामुग्रमयीमुग्रतारामुग्रगणैर्युताम्।

नीलां नीलघनाश्यामां नमामि नीलसुंदरीम्।।

श्यामांगी श्यामघटितांश्यामवर्णविभूषिताम्।

प्रणमामि जगद्धात्रीं गौरीं सर्व्वार्थसाधिनीम्।।

विश्वेश्वरीं महाघोरां विकटां घोरनादिनीम्।

आद्यमाद्यगुरोराद्यमाद्यनाथप्रपूजिताम्।।

श्रीदुर्गां धनदामन्नपूर्णां पद्मा सुरेश्वरीम्।

प्रणमामि जगद्धात्रीं चन्द्रशेखरवल्लभाम्।।

त्रिपुरासुंदरी बालमबलागणभूषिताम्।

शिवदूतीं शिवाराध्यां शिवध्येयां सनातनीम्।।

सुंदरीं तारिणीं सर्व्वशिवागणविभूषिताम्।

नारायणी विष्णुपूज्यां ब्रह्माविष्णुहरप्रियाम्।।

सर्वसिद्धिप्रदां नित्यामनित्यगुणवर्जिताम्।

सगुणां निर्गुणां ध्येयामर्च्चितां सर्व्वसिद्धिदाम्।।

दिव्यां सिद्धि प्रदां विद्यां महाविद्यां महेश्वरीम्।

महेशभक्तां माहेशीं महाकालप्रपूजिताम्।।

प्रणमामि जगद्धात्रीं शुम्भासुरविमर्दिनीम्।।

रक्तप्रियां रक्तवर्णां रक्तबीजविमर्दिनीम्।

भैरवीं भुवनां देवी लोलजीह्वां सुरेश्वरीम्।।

चतुर्भुजां दशभुजामष्टादशभुजां शुभाम्।

त्रिपुरेशी विश्वनाथप्रियां विश्वेश्वरीं शिवाम्।।

अट्टहासामट्टहासप्रियां धूम्रविनाशीनीम्।

कमलां छिन्नभालांच मातंगीं सुरसंदरीम्।।

षोडशीं विजयां भीमां धूम्रांच बगलामुखीम्।

सर्व्वसिद्धिप्रदां सर्व्वविद्यामंत्रविशोधिनीम्।।

प्रणमामि जगत्तारां सारांच मंत्रसिद्धये।।

इत्येवंच वरारोहे स्तोत्रं सिद्धिकरं परम्।

पठित्वा मोक्षमाप्नोति सत्यं वै गिरिनन्दिनी।।

कुजवारे चतुर्द्दश्याममायां जीववासरे।

शुक्रे निशिगते स्तोत्रं पठित्वा मोक्षमाप्नुयात्।

त्रिपक्षे मंत्रसिद्धिः स्यात्स्तोत्रपाठाद्धि शंकरि।।

चतुर्द्दश्यां निशाभागे शनिभौमदिने तथा।

निशामुखे पठेत्स्तोत्रं मंत्रसिद्धिमवाप्नुयात्।।

केवलं स्तोत्रपाठाद्धि मंत्रसिद्धिरनुत्तमा।

जागर्तिं सततं चण्डी स्तोत्रपाठाद्भुजंगिनी।।

इति महाविद्या स्तोत्र समाप्तम् |