गौरी पूजा : ईसर जी और गौरा माता की पूजा का विशेष समय

गौरी पूजा हिन्दू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो विशेष रूप से महिलाओं द्वारा मनाया जाता है। यह पूजा विशेष रूप से मध्य भारत, महाराष्ट्र, उत्तर भारत, और कर्नाटका में बहुत धूमधाम से मनाई जाती है। गौरी पूजा का आयोजन विशेष रूप से श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को किया जाता है। यह पूजा भगवान शिव की पत्नी देवी पार्वती, जिन्हें गौरी के नाम से भी जाना जाता है, की पूजा अर्चना के रूप में होती है। इस दिन महिलाएँ विशेष रूप से अपनी सुख-समृद्धि, परिवार की भलाई, और पवित्रता की कामना करती हैं।

गौरी पूजा कब होती है?

गौरी पूजा का आयोजन प्रत्येक वर्ष श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को किया जाता है। यह पूजा खासकर महाराष्ट्र, कर्नाटका, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्यों में बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। गौरी पूजा को कुछ स्थानों पर ‘गौरी तृतीया’ भी कहा जाता है, जो विशेष रूप से महिलाओं द्वारा मनाई जाती है। इस दिन महिलाएँ अपनी सुंदरता और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करने के साथ-साथ अपने परिवार की सुख-शांति के लिए भी पूजा करती हैं।

गौरी पूजा विधि:

गौरी पूजा की विधि सरल है, लेकिन इसमें श्रद्धा और विश्वास की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पूजा विधि में निम्नलिखित चरण होते हैं:

स्नान और शुद्धता: पूजा से पहले घर के सभी सदस्य विशेष रूप से महिलाएँ स्नान करके पवित्र होती हैं। इस दिन का उद्देश्य पवित्रता और शुद्धता को बनाए रखना होता है।

गौरी की मूर्ति या चित्र की स्थापना: पूजा के लिए गौरी माता की मूर्ति या चित्र को एक स्वच्छ स्थान पर स्थापित किया जाता है।  

पूजा में आमतौर पर गाय के घी का दीपक जलाया जाता है और ताजे फूलों से देवी का श्रृंगार किया जाता है। इसके साथ-साथ पूजा में मिठाई, फल, चूड़ी, बिन्दी और अन्य श्रृंगार सामग्री भी अर्पित की जाती है।

मंत्रोच्चारण: देवी गौरी की पूजा में विशेष रूप से “ॐ गौरीशंकराय नमः” जैसे मंत्रों का जाप किया जाता है। इसके अलावा कुछ स्थानों पर महिलाएँ खास “गौरी पूजन गीत” भी गाती हैं।

कुमकुम और चूड़ी चढ़ाना: पूजा में महिलाएं कुमकुम, चूड़ी और अन्य श्रृंगार सामग्री चढ़ाकर देवी से सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। इसके बाद वे रिश्तेदारों और मित्रों को भी चूड़ी और अन्य पूजा सामग्री भेंट करती हैं।

प्रसाद वितरण: पूजा समाप्त होने के बाद महिलाएं सभी को प्रसाद वितरित करती हैं। यह प्रसाद खासतौर पर हलवा, पूरियां, और विशेष प्रकार की मिठाइयों का होता है।

व्रत का पालन: कुछ महिलाएं इस दिन व्रत रखती हैं, जो पूरे दिन उपवासी रहकर रात को पूजा करती हैं। व्रत का उद्देश्य देवी से सुख-समृद्धि की प्राप्ति और जीवन में आशीर्वाद की कामना करना होता है।

गणगौर पूजा विशेष

हिन्दू पंचांग के अनुसार, चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को गणगौर पूजा का आयोजन किया जाता है। यह त्योहार मुख्यतः हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न क्षेत्रों में मनाया जाता है। खासकर ब्रज क्षेत्र में इस पर्व को अत्यधिक श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जाता है। गणगौर पूजा का नाम भगवान शिव (गण) और देवी पार्वती (गौर) के नाम से लिया गया है।

गणगौर पूजा के दिन अविवाहित कन्याएं और विवाहित महिलाएं भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करती हैं। कई स्थानों पर शिव को ईसर जी और पार्वती को गौरा माता के रूप में पूजा जाता है। कुछ स्थानों पर इन्हें गवरजा जी भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत का पालन करने से अविवाहित कन्याओं को मनचाहा वर मिलता है, जबकि विवाहित महिलाओं के पतियों की आयु और स्वास्थ्य में सुधार होता है।

गणगौर पूजा में महिलाएं बालू या मिट्टी से गौरा जी की मूर्ति बनाती हैं और उनका श्रृंगार करती हैं। फिर, विधिपूर्वक पूजा करके लोकगीत गाती हैं। इस दिन, कुछ महिलाएं केवल एक बार दूध पीकर उपवास करती हैं, जिससे उन्हें पति, संतान और सुख-समृद्धि मिलती है।

गणगौर व्रत की एक विशेषता यह भी है कि इसे पति से छुपकर किया जाता है, और पूजा का प्रसाद भी पति को नहीं दिया जाता है। इस परंपरा के पीछे एक कथा है, जिसे पढ़कर समझा जा सकता है।

गणगौर पूजा की प्रक्रिया

चैत्र नवरात्रि के तीसरे दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करके व्रत और पूजा करती हैं। इस दिन को “बड़ी गणगौर” भी कहा जाता है। महिलाएं नदी या तालाब के किनारे बालू से माता गौरा की मूर्ति बनाकर उन्हें जल अर्पित करती हैं। इसके बाद, पूजा के अगले दिन मूर्ति का विसर्जन किया जाता है। पूजा स्थल को गणगौर का पीहर (मायका) और विसर्जन स्थल को ससुराल माना जाता है।

गणगौर पूजा के दौरान महिलाएं आटे, बेसन या मैदा में हल्दी मिलाकर गहनों का निर्माण करती हैं, जिन्हें “गुने” कहा जाता है। ये गहने देवी पार्वती को अर्पित किए जाते हैं। मान्यता है कि जितने गुने अर्पित किए जाते हैं, उतना ही अधिक धन और वैभव परिवार में आता है। पूजा समाप्त होने के बाद महिलाएँ ये गुने अपनी सास, ननद, देवरानी या जेठानी को देती हैं। कुछ विद्वान मानते हैं कि “गुने” शब्द गहने का ही अपभ्रंश रूप है।

राजस्थान में गणगौर पर्व

राजस्थान में गणगौर का पर्व 18 दिनों तक मनाया जाता है। यह उत्सव होलिका दहन के अगले दिन, चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से शुरू होकर चैत्र शुक्ल तृतीया तक चलता है। यहाँ महिलाएँ ईसर जी और गवरजा जी की पूजा करती हैं और पारंपरिक गीत “गोर गोर गोमती” गाती हैं।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, माता गवरजा होली के दूसरे दिन अपने मायके आती हैं और अठारह दिनों के बाद ईसर जी उन्हें पुनः लेने आते हैं। चैत्र शुक्ल तृतीया को गवरजा जी की विदाई होती है। इस दिन को विशेष रूप से “गणगौर विदाई” के रूप में मनाया जाता है।

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