प्रश्न कुण्डली निर्माण में सहायक बातें | Important points in preparing the Prashna Kundali

प्रश्न कुण्डली की विद्या उन व्यक्तियों के लिए बहुत ही फ़ायदेमंद होती है जिन व्यक्तियों को अपने जन्म समय के विषय में उचित रुप से कुछ ज्ञात नहीं होता है. प्रश्न कुंडली आपके प्रश्न का उत्तर बिना जन्म समय और तिथि के देती है. इसमें केवल प्रश्न कब पूछा गया है उसी समय को आधार बनाकर कुंडली बनाई जाती है और प्रश्न करने वाले को उत्तर दिए जाते हैं.

जिस प्रकार जन्म कुण्डली से ग्रहों के आधार पर कुंडली निर्माण होता है और उसके द्वार फल कथन किया जाता है, ठिक उसी प्रकार प्रश्न कुण्डली द्वारा ग्रहों के आधार पर फल कथन किया जाता है. ऐसे में प्रश्न कुंडली कैसे बने और इसे बनाते समय किन बातों का ध्यान रखा जाए जिससे की यह उत्तम फल कथन में सहायक हो.

प्रश्न कुण्डली के मुख्य तथ्य | Key facts of Prashna Kundali

जब भी कोई प्रश्न कर्ता आपके समक्ष प्रश्न पूछने आता है तो बहुत से ऎसे तथ्यों का ध्यान रखने की आवश्यकता होती है जिनके आधार पर आप प्रश्न कुण्डली को उचित प्रकार से बना सकते हैं अथवा उसके फलों का विवेचन कर सकते हैं.

1 - प्रश्न पूछने वाले व्यक्ति के मुख से जो प्रथम वाक्य निकले उसके आदि के अक्षर पर ध्यान देनी की आवश्यकता होती है, इस अक्षर पद से ध्वज, धूम इत्यादि आठ प्रकार से विचार करके उनके ध्रुवांको पर से फल का विचार होता है.

2 - जब कोई व्यक्ति प्रश्न कुण्डली विशेषज्ञ के समक्ष आता है तो प्रश्न करते समय वह यदि अपने शरीर का कोई अंग स्पर्श करता हो तो उससे संयुक्त एवं असंयुक्त इत्यादि आठ प्रकार के फल का विचार करके अनुमान लगाया जा सकता है.

3 - प्रश्न करता जब प्रश्न करे उस समय को नोट करके उस समय द्वारा कुण्डली का निर्माण होता है. घडी़ के समय को स्थानीय समय में बदल कर उस स्थानीय समय का लग्न निकाल कर उस लग्न के आधार पर प्रश्न की कुण्डली को ही प्रश्न कुण्डली कहा जाता है.

4 - प्रश्न पूछने वाला किस दिशा में बैठा उसका मुख किस दिशा की ओर है इस बात के आधार पर आरुढ़ लग्न, छत्र लग्न इत्यादि निकाल कर भी प्रश्न कुण्डली का विवेचन करने में सहायता मिलती है.

5 - प्रश्न कुण्डली में प्रश्न कर्ता जब प्रश्न करता है तब वह व्यक्ति अपनी नासिका के किस ओर से श्वास ले रहा होता है, अर्थात नासिका से कौन सा स्वर चल रहा होता है उससे स्वरोदय के अनुसार विचार किया जाता है.

6 - प्रश्न करने वाला जब प्रश्न कर रहा होता है तो वह कितनी दूरी पर स्थित होता है, खड़ा है या बैठा हुआ है. भूमि पर अथवा किस आसन या स्थान पर बैठा है. उसका मुख किस दिशा की ओर है. प्रश्न कुण्डली निर्माण में इन बातों की भी आवश्यकता पड़ती है.

7 - प्रश्न पूछने वाली की मानसिक और शारीरिक स्थिति व चेष्टाएं किस प्रकार की हैं. इन बातों का भी प्रभाव पड़ता है.

8 - प्रश्न पूछने का समय और वातावरण या परिस्थिति कैसी रही है. शगुन इत्यादि बातों को भी ध्यान में रखने की आवश्यकता होती है. इन कुछ महत्व पूर्ण तथ्यों का निर्धारण करते हुए प्रश्न कर्ता के लिए प्रश्न कुण्डली का निर्माण होता है. यह तथ्य फल निर्माण में बहुत सहायक बनते हैं. प्रश्न कुंडली में मुख्य बात यह होती है की आप प्रश्न पूछे जाने के समय से बना ली जाए, उसके पश्चात उस समय के ग्रह स्पष्ट कर लेना , नवांश एवं द्रेष्काण कुण्डली बना ली जाए. इन सभी कुण्डलियों द्वारा फल निर्धारण किए जाने में सफलता प्राप्त होती है.

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