Sharad Purnimaआश्चिन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा शरद पूर्णिमा कहलाती है. वर्ष 2011 में शरद पूर्णिमा 11 अक्तूबर की रहेगी. इस पूर्णिमा को कोजोगार पूर्णिमा व्रत और रास पूर्णिमा भी कहा जाता है . इस दिन चन्द्रमा व सत्य भगवान का पूजन, व्रत, कथा की जाती है. शरद पूर्णिमा के विषय में विख्यात है, कि इस दिन कोई व्यक्ति किसी अनुष्ठान को करें, तो उसका अनुष्ठान अवश्य सफल होता है.

तीसरे पहर इस दिन व्रत कर हाथियों की आरती करने पर उतम फल मिलते है. ज्योतिषिय नियमों  के अनुसार इसी दिन चन्द्र अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है. कुछ क्षेत्रों में इस व्रत को कौमुदी व्रत भी कहा जाता है. इस दिन के संदर्भ में एक मान्यता प्रसिद्ध है, कि इस दिन भगवान श्री कृ्ष्ण ने गोपियों के साथ महारास रचा था. इस दिन चन्द्रमा कि किरणों से अमृ्त वर्षा होने की किवदंती प्रसिद्ध है. इसी कारण इस दिन खीर बनाकर रत भर चांदनी में रखकर अगले दिन प्रात: काल में खाने का विधि-विधान है.     

शरद पूर्णिमा व्रत विधि | Sharad Purnima Vrat Vidhi

इस दिन प्रात:काल में व्रत कर अपने इष्ट देव का पूजन करना चाहिए. इस पूर्णिमा को  रात में ऎरावत हाथी पर चढे हुए इन्द्र और महालक्ष्मी जी का पूजन करके घी के दीपक जलाकर उसकी गन्ध पुष्प आदि से पूजा कर दीपावली की तरह रोशनी कि जाती है. इस दिन कम से कम 100 दीपक और अधिक से अधिक एक लाख तक हों. 

इस तरह दीपक जलाकर अगले दिन इन्द्र देव का पूजन किया जाता है. ब्राह्माणों को शक्कर में घी मिला हुआ, ओर खीर का भोजन करायें. धोती, गमच्छा, आदि वस्त्र और दीपक (अगर सम्भव हों, तो सोने का) तथा दक्षिणा दान करें. लक्ष्मी प्राप्ति के लिए इस व्रत को विशेष रुप से किया जाता है. यह माना जाता है, कि इस रात को इन्द्र और लक्ष्मी जी यह देखते है, कि कौन जाग रहा है, इसलिये इस दिन जागरण करने वाले की धन -संपति में वृ्द्धि होती है. 

इस व्रत को मुख्य रुप से स्त्रियों के द्वारा किया जाता है. उपवास करने वाली स्त्रियां इस दिन लकडी की चौकी पर सातिया बनाकर पानी का लोटा भरकर रखती है. एक गिलास में गेहूं भरकर उसके ऊपर रुपया रखा जाता है. और गेहूं के 13 दाने हाथ में लेकर कहानी सुनी जाती है.

गिलास और रुपया कथा कहने वाली स्त्रियों को पैर छुकर दिये जाते है. कहानी सुने हुए पानी का रात को चन्द्रमा को अर्ध्य देना चाहिए. और इसके बाद ही भोजन करना चाहिए.  मंदिर में खीर आदि दान करने का विधि-विधान है. विशेष रुप से इस दिन तरबूज के दो टुकडे करके रखे जाते है. साथ ही कोई भी एक ऋतु का फल रखा और खीर चन्द्रमा की चांदनी में रखा जाता है. ऎसा कहा जाता है, कि इस दिन चांद की चांदनी से अमृ्त बरसता है.  

शरद पूर्णिमा व्रत कथा | Sharad Purnima Vrat Katha in Hindi

एक साहुकार था जिसके यहां दो पुत्रियां थीं. एक पुत्री विधि-विधान से व्रत पूरा करती थी.  और दूसरी पुत्री व्रत तो करती थी, परन्तु अधूरा ही किया करती थी. इसी कारण से दूसरी पुत्री के यहां जो भी संतान होती थी. वह मर जाती थी. यह स्थिति देख कर साहूकार की दूसरी पुत्री से इसका कारण पंडियों से पूछा. तब पंडितों ने बताया की तुम व्र्त अधूरा किया करती हों, इसी कारण से तुम्हारी सन्तान जन्म लेते ही मर जाती है. तुम शरद पूर्णिमा का पूरा व्रत करों, तुम्हारी संतान जीवित रहेगी. 

उसने अपनी संतान क��� एक चारपाई पर लिटा दिया और उसके ऊपर कपडा ढ्क दिया. इसके बाद वह अपनी बडी बहन को बुलाकर लाई और उसे बैठने के लिये कहा, उसकी बडी बहन के वस्त्र उस बालक से छू गयें. और देखते ही देखते मरा हुआ बच्चा रोने लगा. बालक को रोते देख, बडी बहन ने कहा कि अगर गलती से मैं बालक के ऊपर बैठ जाती तो बच्चा मर न जाता. तब छोटी बहन ने कहा की यह तो पहले ही मरा हुआ था. तेरे वस्त्र छूने से यह जीवित हो गया है. उसके बाद से शरद पूर्णिमा का व्रत पूरे विधि-विधान से करने की परम्परा चली आ रही है.   

संतान की लम्बी आयु के साथ-साथ इस व्रत को धन वृ्द्धि के लिये भी किया जाता है.  इस दिन माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित कर षोडषोचार के साथ पूजन करने शुभ रह्ता है. पूरे दिन उपवास्द कर सांयकल में चन्द्र के उदित होने के बाद सोने, चांदी और मिट्टी के घी से भरे हुए 100 दीपक जलायें जाते है. रात्रि में जागरण करते हुए मांगलिक गीत गाये जाते है. अगले दिन स्नान करने के बाद लक्ष्मी जी की प्रतिमा को पूजा करने वाले आचार्य जी को अर्पित कर दिया जाता है.