Thursday Vrat

गुरुवार का व्रत विशेष रुप से विवाह मार्ग की बाधाओं में कमी करने के लिये किया जाता है. देव गुरु वृ्हस्पति धन के कारक ग्रह है, इसलिये इस दिन माता लक्ष्मी जी की पूजा उपासना करने से व्यक्ति की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है. 

जिन व्यक्तियों की कुण्डली में गुरु कमजोर होकर स्थित हों, उन व्यक्तियों को यह व्रत विशेष रुप से करना चाहिए. गुरु वृ्हस्पति की पूजा करने से कई प्रकार के फल प्राप्त होते है. गुरुवार की पूजा करते समय यह ध्यान रखना चाहिए.  कि यह पूजा विधि-विधान के अनुसार करनी चाहिए. इससे उपवासक की मनोकामना पूरी होती है. 

गुरुवार व्रत किन उद्देश्यों के लिये किया जा सकता है? | Thursday Fast Significance

गुरुवार का व्रत जल्दी विवाह करने के लिये किया जाता है. जिस व्यक्ति को यह व्रत करना हो, उस व्यक्ति को एक दिन पहले ही इस व्रत के लिये स्वयं को तैयार कर लेना चाहिए. व्रत वाले दिन प्रात: काल में उठकर वृ्हस्पति देव का पूजन करना चाहिए. वृ्हस्पति देव का पूजन पीली वस्तुएं, पीले फूल, चने कि दान, पीली मिठाइ, पीले चावल आदि का भोग लगाकर किया जाता है. अगर कोई व्यक्ति इस व्रत को धन प्राप्ति के लिये करता है, तो उसे वृ्हस्पति देव का पूजन पीली वस्तुओं से करना चाहिए.  

उपवास के दिन वृहस्पति देव का अभिषेक केसर मिले दूध से करना चाहिए. गुरुवार के दिन उपवास कर एक समय का उपवास करना चाहिए.  वृ्हस्पति देव क्योकिं शिक्षा के भी कारक ग्रह है, इसलिये नियमित रुप से इनका पूजन करने से, अथवा जल चढाने से देव प्रसन्न होकर व्यक्ति की मनोइच्छा पूरी करते है. इसके साथ ही वैवाहिक सुख-शान्ति को बनाये रखने के लिये, गुरुवार का व्रत कर पीली मिठाइ का भोग लगाना चाहिए. और देव को चल चढाना शुभ रहता है. 

आर्थिक स्थिति को सुदृढ करने के लिये और अच्छे व्यवसाय के लिये भी गुरुवार का व्रत किया जा सकता है. इस उद्देश्य के लिये व्रत करने के लिये व्यक्ति को गुरुवार का व्रत कर गरीबों को भोजन कराकर उच़ित दक्षिणा देनी चाहिए.

गुरुवार व्रत विधि-विधान | Method of Thursday Fasting 

गुरुवार के व्रत का प्रारम्भ किसी भी मास के शुक्ल पक्ष के पहले गुरवार से किया जा सकता है. इस व्रत को लगातार 16 गुरुवार  से लेकर नियमित रुप से तीन वर्ष तक किया जा सकता है. और व्रत करते समय व्रत से जुडे सभी विधि-विधानों का सख्ती से पालन करना चाहिए.  

व्रत के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि कर, पीले वस्त्र धारण कर पीले फूलों, चने की दाल, पीला चन्दन, बेसन की बर्फी, हल्दी, पीले चावल आदि से भगवान विष्णु की, और गुरु वृ्हस्पति देव की पूजा करनी चाहिए. व्रत करने वाले व्यक्ति को व्रत के दिन सिर नहीं धोना चाहिए. और नमक रहित भोजन करना चाहिए.  

प्रात वृ्हस्पति देव का पूजन करने के बाद पीली मिठाई से देव को भोग लगाना चाहिए.  तथा सायंकाल में पीले वस्त्रों का दान करना चाहिए. व्रत के दिन गुरुवार व्रत की कथा अवश्य सुननी चाहिए.  

आरती वृहस्पति देवता की | Thursday Aarti :   

जय वृहस्पति देवा, ऊँ जय वृहस्पति देवा ।  छिन छिन भोग लगाऊँ, कदली फल मेवा ।।
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी ।  जगतपिता जगदीश्वर, त���म सबके स्वामी ।।
चरणामृत निज निर्मल, सब पातक हर्ता ।  सकल मनोरथ दायक, कृपा करो भर्ता ।।
तन, मन, धन अर्पण कर, जो जन शरण पड़े ।  प्रभु प्रकट तब होकर, आकर द्घार खड़े ।।
दीनदयाल दयानिधि, भक्तन हितकारी ।  पाप दोष सब हर्ता, भव बंधन हारी ।।
सकल मनोरथ दायक, सब संशय हारो ।  विषय विकार मिटाओ, संतन सुखकारी ।।
जो कोई आरती तेरी, प्रेम सहित गावे ।  जेठानन्द आनन्दकर, सो निश्चय पावे ।।