Bhriguऋषि भृ्गु उन 18 ऋषियों में से एक है. जिन्होने ज्योतिष का प्रादुर्भाव किया था. ऋषि भृ्गु के द्वारा लिखी गई भृ्गु संहिता ज्योतिष के क्षेत्र में माने जाने वाले बहुमूल्य ग्रन्थों में से एक है. भृ्गु संहिता के विषय में यह मान्यता है, कि इस शास्त्र को पूजन, आरती इत्यादि करने के बाद ही भविष्य कथन के लिए प्रयोग किया जाता है. यह सब करने के बाद जब प्रश्न ज्योतिष के अनुसार इस शास्त्र का कोई पृ्ष्ठ खोला जाता है, और पृ्ष्ठ के अनुसार प्रश्नकर्ता की जिज्ञासा का समाधान किया जाता है. 

फलित करने वाला व्यक्ति प्रश्नकर्ता के विषय में आधारभूत जानकारी देने के बाद उसके यहां आने का कारण, व्यक्ति के जन्म की पृ्ष्ठभूमि इत्यादि का उल्लेख करता है.  इस ज्योतिष में आने वाले व्यक्ति को उसके परिवार के सदस्यों के नाम भी बताए जाते है. भृ्गि संहिता कुछ प्रतियां ही शेष है, जिसमें से एक प्रति पंजाब में सुल्तानपुर स्थान में है. 

भृ्गु रचित ग्रन्थ | Bhrigu Scriptures

ऋषि भृ्गु ने अनेक ज्योतिष ग्रन्थों की रचना की. जिसमें से भृ्गु स्मृ्ति (Bhragu Smriti), भृ्गु संहिता ज्योतिष (Bhrigu Samhita Jyotish), भृ्गु संहिता शिल्प (Bhrigu Shilpa-Samhita), भृ्गु सूत्र (Bhrigu Sutras), भृ्गु उपनिषद  (Bhrigu Upanishads), भृ्गु गीता ( Bhrigu Geeta) आदि प्रमुख है. 

वर्तमान में भृ्गु संहिता की जो भी प्रतियां उपलब्ध है, वे अपूर्ण अवस्था में है. इस शास्त्र से प्रत्येक व्यक्ति की तीन जन्मों की जन्मपत्री बनाई जा सकती है. प्रत्येक जन्म का विवरण इस ग्रन्थ में दिया गया है. यहां तक की जिन लोगों  ने अभी तक जन्म भी नहीं लिया है, उनका भविष्य बताने में भी यह ग्रन्थ समर्थ है. 

भृ्गु संहिता ज्योतिष क एक विशाल ग्रन्थ है. इस ग्रन्थ की मूल प्रति आज भी नेपाल में सुरक्षित है. प्राचीन काल में इन ग्रन्थों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए गाडियों का प्रयोग किया जाता था.  ऋषि भृ्गु को देव ब्रह्मा जी का मानस पुत्र माना जाता है. 

भास्काराचार्य शास्त्री 

ज्योतिष की इतिहास की पृ्ष्ठभूमि में वराहमिहिर और ब्रह्मागुप्त के बाद भास्काराचारय के समान प्रभावशाली, सर्वगुणसम्पन्न दूसरा ज्योतिषशास्त्री नहीं हुआ है. इन्होने ज्योतिष की प्रारम्भिक शिक्षा अपने पिता से घर में ही प्राप्त की. 

 

भास्काराचार्य रचित ज्योतिष ग्रन्थ | Bhaskar Acharya Shastri Scriptures

भास्काराचार्य जी ने ब्रह्मास्फूट सिद्धान्त को आधार मानते हुए, एक शास्त्र की रचना की, जो सिद्धान्तशिरोमणि के नाम से जाना जाता है. इनके द्वारा लिखे गए अन्य शास्त्र, लीलावती (Lilavati), बीजगणित, करणकुतूहल (Karana-kutuhala)  और सर्वोतोभद्र ग्रन्थ (Sarvatobhadra Granth) है. 

इनके द्वारा लिखे गए शस्त्रों से उ़स समय के सभी शास्त्री सहमति रखते थें. प्राचीन शास्त्रियों के साथ गणित के नियमों का संशोधन और बीजसंस्कार नाम की पुस्तक की रचना की. भास्काराचार्य जी न केवल एक प्रसिद्ध ज्योतिषी थें, बल्कि वे उत्तम श्रेणी के कवियों में से एक थें.

ज्योतिष् गणित में इन्होनें जिन मुख्य विषयों का विश्लेषण किया, उसमें सूर्यग्रहण का गणित स्पष्ट, क्रान्ति, चन्द्रकला साधन, मुहूर्तचिन्तामणि (Muhurtha Chintamani)  और पीयूषधारा (Piyushdhara) नाम के टीका शास्त्रों में भी इनके द्वारा लिखे गये शास्त्रों का वर्णन मिलता है. यह माना जाता है, कि इन्होनें फलित पर एक पुस्तक की रचना की थी. परन्तु आज वह पुस्तक उपलब्ध नहीं है.