आश्विन कृष्ण पक्ष श्राद्ध 2017 | Ashwin Krishna Paksha Shraddha 2017 | Pitru Paksha Dates 2017

हिन्दू धर्म अनुसार आश्विन माह के कृष्ण पक्ष को श्राद्ध पक्ष के रूप में मनाया जाता है. श्राद्ध संस्कार का वर्णन हिंदु धर्म के अनेक धार्मिक ग्रंथों में किया गया है. श्राद्ध पक्ष को महालय और पितृ पक्ष के नाम से भी जाना जाता है. श्राद्ध का अर्थ अपने देवताओं, पितरों, परिवार, वंश के प्रति श्रद्धा प्रकट करना होता है. प्रतिवर्ष श्राद्ध को भाद्रपद माह की पूर्णिमा से लेकर आश्विन माह की अमावस्या तक मनाया जाता है. पूर्णिमा का श्राद्ध पहला और अमावस्या का श्राद्ध अंतिम होता है. जिस हिन्दु माह की तिथि के अनुसार व्यक्ति मृत्यु पाता है उसी तिथि के दिन उसका श्राद्ध मनाया जाता है. आश्विन कृष्ण पक्ष के 15 दिन श्राद्ध के दिन रहते हैं. जिस व्यक्ति की तिथि याद ना रहे तब उसके लिए अमावस्या के दिन उसका श्राद्ध करने का विधान होता है.

हिंदू धर्म में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि जो स्वजन अपने शरीर को छोड़कर चले जाते हैं. वह चाहे किसी भी रूप में अथवा किसी भी लोक में हों, श्राद्ध पक्ष के समय पृथ्वी पर आते हैं तथा उनकी तृप्ति के लिए श्रद्धा के साथ जो शुभ संकल्प और तर्पण किया जाता है, वह श्राद्ध कहलाता है अत: मान्यता है कि पितृ पक्ष में हम जो भी पितरों के नाम से तर्पण करते हैं उसे हमारे पितर सूक्ष्म रूप में आकर अवश्य ग्रहण करते हैं.

2017 में श्राद्ध की तिथियाँ | 2017 Dates of Sharaddh

श्राद्ध दिनाँक समय दिन
पूर्णिमा 5 सितंबर मंगलवार
प्रतिपदा 6 सितंबर बुधवार
द्वित्तीया 7 सितंबर बृहस्पतिवार
तृतीया 8 सितंबर शुक्रवार
चतुर्थी 9 सितंबर शनिवार
पंचमी 10 सितंबर रविवार
षष्ठी 11 सितंबर सोमवार
सप्तमी 12 सितंबर मंगलवार
अष्टमी 13 सितंबर बुधवार
नवमी 14 सितंबर बृहस्पतिवार
दशमी 15 सितंबर शुक्रवार
एकादशी 16 सितंबर शनिवार
द्वादशी 17 सितंबर रविवार
त्रयोदशी 18 सितंबर सोमवार
चतुर्दशी 19 सितंबर मंगलवार
अमावस 20 सितंबर बुधवार

विशेष | Note

इस बार पंचमी तिथि का क्षय हो रहा है.

श्राद्ध का महत्व | Significance Of Shraddh

हिन्दु धर्म में श्राद्ध का अत्यधिक महत्व माना गया है. ऎसी मान्यता है कि आश्विन कृष्ण पक्ष में पितर पृथ्वी लोक पर आते हैं और अपने हिस्से का भाग अवश्य किसी ना किसी रुप में ग्रहण करते हैं. सभी पितर इस समय अपने वंशजों के द्वार पर आकर अपने हिस्से का भोजन सूक्ष्म रुप में ग्रहण करते हैं. भोजन में जो भी खिलाया जाता है वह पितरों तक पहुंच ही जाता है. यहाँ पितरों से अभिप्राय ऎसे सभी पूर्वजों से है जो अब हमारे साथ नहीं है लेकिन श्राद्ध के समय वह हमारे साथ जुड़ जाते हैं और हम उनकी आत्मा की शांति के लिए अपनी सामर्थ्यानुसार उनका श्राद्ध कर के अपनी श्रद्धा को उनके प्रति प्रकट करते हैं.


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