श्री सत्यनारायण पूजा | Shri Satyanarayana Puja | Satyanarayan Vrat Katha

भगवान सत्यनारायण विष्णु के ही रूप हैं कथा के अनुसार इन्द्र का दर्प भंग करने के लिए विष्णु जी ने नर और नारायण के रूप में बद्रीनाथ में तपस्या किया था वही नारायण सत्य को धारण करते हैं अत: सत्य नारायण कहे जाते हैं. इनकी पूजा में केले के पत्ते व फल के अलावा पंचामृत, पंच गव्य, सुपारी, पान, तिल, मोली, रोली, कुमकुम, दूर्वा की आवश्यक्ता होती है जिनसे भगवान की पूजा होती है.

सत्यनारायण की पूजा के लिए दूध, मधु, केला, गंगाजल, तुलसी पत्ता, मेवा मिलाकर पंचामृत तैयार किया जाता है. यह भगवान को काफी पसंद है इन्हें प्रसाद रुप में फल, मिष्टान के अलावा आटे को भून कर उसमें चीनी मिलाकर एक प्रसाद बनता वह भी भोग लगता है.

श्री सत्यनारारण कथा | Shri Satyanarayan Katha

भगवान की पूजा के विषय में स्कन्द पुराण के रेवाखंड में विस्तार पूर्वक बताया गया है. श्री सत्यनारायण की कई कथाएं है जिसमें से एक को सूत जी ने सनकादि ऋषियों के कहने पर कहा था.  इनसे पूर्व नारद मुनि को स्वयं भगवान विष्णु ने यह कथा सुनाई थी. कथा के अनुसार एक ग़रीब ब्राह्मण था वह ब्राह्मण भिक्षा के लिए दिन भर भटकता रहता था.

भगवान विष्णु को उस ब्राह्मण की दीनता पर दया आई और एक दिन भगवान स्वयं ब्राह्मण वेष धारण कर उस विप्र के पास पहुंचते हैं विप्र से वह उसकी व्यथा को सुनते हैं. वह ब्राह्मण को सत्यनारायण पूजा की विधि बताकर उसे भली प्रकार पूजन करने की सलाह देते हैं. ब्राह्मण ने श्रद्धा पूर्वक सत्यनिष्ठ होकर सत्यनारायण की पूजा एवं कथा की.

इसके प्रभाव से उसकी दरिद्रता समाप्त हो गयी और वह धन धान्य से सम्पन्न हो गया. इस अध्याय में एक लकड़हाड़े की भी कथा है जिसने विप्र को सत्यनारायण की कथा करते देखा तो उनसे पूजन विधि जानकर भगवान की पूजा की जिससे वह धनवान बन गया. यह लोग सत्यनारायण की पूजा से मृत्यु पश्चात उत्तम लोक गये और कालान्तर में विष्णु की सेवा में रहकर मोक्ष के भागी बने.

श्री सत्यनारायण पूजन विधि | Shri Satyanarayana Puja Vidhi

सत्यनारायण की पूजा का संकल्प लेते हुए दिन भर व्रत रखना होता है. पूजन स्थल को गाय के गोबर से पवित्र करके वहां एक अल्पना बनाते हैं और उस पर पूजा की चकी रखी जाती है. इस चकी के चारों पाये के पास केले का वृक्ष लगाए जाते हैं. इस चकी पर ठाकुर जी और श्री सत्यनारायण की प्रतिमा स्थापित करते हैं और पूजा करते समय सबसे पहले गणपति की पूजा भी करते हैं.

तत्पपश्चात इन्द्रादि दशदिक्पाल की और क्रमश: पंच लोकपाल, सीता सहित राम, लक्ष्मण की, राधा कृष्ण की पूजा भी कि जाती है. इनकी पूजा के पश्चात ठाकुर जी व सत्यनारायण की पूजा करते हैं. इसके बाद लक्ष्मी माता की और अंत में महादेव और ब्रह्मा जी की पूजा करते हैं.पूजा के पश्चात समस्त देवों की आरती कि जाती है और चरणामृत लेकर प्रसाद वितरण करते हैं.

श्री विष्णु पूजा महत्व | Significance of Shri Vishnu Puja

श्री विष्णु पर ब्रह्मा, निर्विकार एवं निराकार हैं, श्री विष्णु का स्वरुप चतुर्भुज कहा गया है क्षीर समुद्र में शेषनाग की शय्या पर शयन करते भगवान् विष्णु अपने हाथो में शंख, चक्र, गदा और पदम लिए हुए होते हैं देवताओं में ब्रह्मा सत्व गुण संपन्न श्री विष्णु अपने भक्तों के समस्त संकटों का नाश करते हैं.


Categories:

Comment(s): 0:

Leave a comment


(Will not be shown)
(Optional)