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तुलसी | Tulsi | Story of Tulsi Marriage

तुलसी के गुणों के विषय में सभी परिचित हैं. दैविक गुणों के साथ इसके औषधीय गुणों के बारे में भी सभी जानते हैं. भारतवर्ष में कोई ही घर होगा जहाँ तुलसी का पौधा ना लगा हो. हर में तुलसी की पूजा की जाती है. तुलसी की उत्पत्ति के बारे में कहा गया है कि जब देव तथा दानव समुद्र मंथन कर रहे थे उस समय जो अमृत धरती पर छलका था, उसी से तुलसी पैदा हुई. उसके बाद ब्रह्मदेव ने तुलसी को भगवान विष्णु को सौंप दिया. भगवान विष्णु, योगेश्वर कृष्ण तथा पांडुरंग(श्री बालाजी) के पूजन के समय तुलसी के पत्तों से बना हार उनकी मूर्तियों को अर्पित किया जाता है.

तुलसी का महत्व | Importance of Tulsi

तुलसी के दर्शन प्रतिदिन करने चाहिए. क्योंकि तुलसी को पाप का नाश करने वाली माना गया है. इसका पूजन करना श्रेष्ठ होता है. इसका पूजन मोक्ष देने वाला होता है. समस्त पूजा तथा धार्मिक कृत्यों में तुलसी का उपयोग किया जाता है. इसके पत्ते से पूजा, व्रत, यज्ञ, जप, होम तथा हवन करने का पुण्य मिलता है. तुलसी की तीन किस्में पाई जाती हैं. पहली कृष्ण तुलसी, दूसरी सफेद तुलसी तथा तीसरी राम तुलसी होती है. इन तीनों तुलसी में से कृष्ण तुलसी सर्वाधिक प्रिय मानी गई है. भगवान श्रीकृष्ण को तुलसी से बेहद लगाव था. श्रीकृष्ण जी को यदि तुलसी के पत्ते नहीं चढा़ए गए तो उनका पूजन अधूरा समझा जाता है. कार्तिक माह में विष्णु जी का पूजन तुलसी दल से करने का बडा़ ही माहात्म्य है. कार्तिक माह में यदि तुलसी विवाह किया जाए तो कन्यादान के समान पुण्य की प्राप्ति होती है.

तुलसी विवाह की कथा | Tulsi Marriage Story

प्राचीन समय में जालंधर नाम का एक राक्षस था. वह बहुत ही वीर तथा साहसी था. उसने सभी ओर हाहाकार मचा रखा था. राक्षस की वीरता का रहस्य उसकी पत्नी वृंदा का पतिव्रता धर्म था. अपनी पत्नी के इस धर्म के कारण ही वह सब जगह विजय प्राप्त करता था. कोई उसे मार नहीं पाता था. जालंधर से डरकर सभी ऋषि-मुनि तथा देवता विष्णु जी के पास गए. उन्हें सारा वृतांत सुनाया और अपनी रक्षा के लिए विनय करने लगे. उनकी बात सुनकर भगवान विष्णु ने वृंदा का सतीत्व भंग करने का निश्चय किया.

भगवान विष्णु ने अपनी माया से जालंधर जैसा मृत शरीर वृंदा के आंगन में फिकवा दिया. वृंदा अपने पति का शव देखकर उस पर गिरकर रोने लगी. तभी वहाँ से एक साधु गुजरे वह वृंदा को रोते देख बोले कि बेटी तुम विलाप नहीं करो. मैं इस मृत शरीर में जान डाल दूंगा और उसने मृत शरीर को जीवित कर दिया. शरीर के जीवित होते ही वृंदा भावुकता में उसका आलिंगन कर लेती है. इस कारण तभी उसका पतिव्रता धर्म नष्ट हो जाता है. उधर वृंदा का पति जालंधर देवताओं से युद्ध में मारा जाता है.

वृंदा को बाद में भगवान के छल का पता चलता है. वह क्रोध में भरकर विष्णु जी को श्राप देती है कि जिस प्रकार आपने मेरे साथ छल करके मुझे पति-वियोग दिया है, ठीक उसी तरह आप अपनी स्त्री के वियोग में दुखी रहेंगें और इस पत्नी वियोग को सहने के लिए आप पृथ्वी लोक पर जन्म लेगें. इसके बाद वृंदा अपने पति की चिता के साथ ही सती हो जाती है. भगवान विष्णु को अपने व्यवहार पर बाद में पश्चाताप होता है. विष्णुजी, देवी पार्वती से वृंदा की चिता की भस्म में आँवला, मालती तथा तुलसी के पौधे लगवाते हैं. भगवान विष्णु तुलसी को ही वृंदा का रुप समझते हैं. समय बितने पर विष्णु जी राम अवतार में धरती पर जन्म लेते हैं और उन्हें जीवनभर अपनी पत्नी सीता जी का वियोग सहना पड़ता है.

तुलसी विवाह की इस कथा के विषय में एक अन्य मत यह भी है कि वृंदा अपना सतीत्व भंग होने पर विष्णु जी को पत्थर बनने का श्राप देती है. तब विष्णुजी वृंदा से कहते हैं – तुम मुझे लक्ष्मी जी से भी अधिक प्यारी हो. तुम्हारे सतीत्व के फलस्वरुप तुम सदा तुलसी बनकर मेरे साथ रहोगी. जो मनुष्य तुम्हारे साथ मेरा विवाह करेगा, वह परम धाम को जाएगा. उसी दिन से शालिग्राम की पूजा तुलसी के बिना अधूरी मानी जाती है. शालिग्राम जी विष्णुजी का पत्थर रुप है. इसलिए आज भी तुलसी विवाह का पुण्य फल पाने के लिए मनुष्य कार्तिक माह में तुलसी का विवाह विष्णु जी से अथवा शालिग्राम से रचाते हैं. कार्तिक माह में यह विवाह कराने से पुण्य फलों में वृद्धि होती है.

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कार्तिक माह में तुलसी विवाह | Tulsi Marriage in Kartik Month | Tulsi Vrat Katha

कार्तिक माह का हिन्दु धर्म में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है. इस माह में श्रद्धालु सुबह – सवेरे नदी, तालाब तथा सरोवरों में स्नान करते हैं. इस माह सुबह स्नान तथा कार्तिक माह की कथा सुनने का बडा़ ही महत्व माना गया है. पद्मपुराण के अनुसार कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की नवमी को तुलसी विवाह रचाया जाता है. इस दिन भगवान विष्णु की प्रतिमा बनाकर उनका विवाह तुलसी जी से किया जाता है. विवाह के बाद नवमी, दशमी तथा एकादशी को व्रत रखा जाता है और द्वादशी तिथि को भोजन करने के विषय में लिखा गया है. कई प्राचीन ग्रंथों के अनुसार शुक्ल पक्ष की नवमी को तुलसी की स्थापना की जाती है. कई श्रद्धालु कार्तिक माह की एकादशी को तुलसी विवाह करते हैं और द्वादशी को व्रत अनुष्ठान करते हैं.

कार्तिक माह की देवोत्थान एकादशी से(इसे देवउठनी एकादशी, देवउठनी ग्यारस, प्रबोधिनी एकादशी आदि नाम से भी जाना जाता है) ही विवाह आदि से संबंधित सभी मंगल कार्य आरम्भ हो जाते हैं. इसलिए इस एकादशी के दिन तुलसी विवाह रचाना उचित भी है. कई स्थानों पर विष्णु जी की सोने की प्रतिमा बनाकर उनके साथ तुलसी का विवाह रचाने की बात कही गई है. विवाह से पूर्व तीन दिन तक पूजा करने का विधान है. तुलसी विवाह करने से कन्यादान के समान पुण्यफल की प्राप्ति होती है.

तुलसी विवाह व्रत कथा | Tulsi Vivah Vrat Katha

प्राचीन ग्रंथों में तुलसी विवाह व्रत की अनेक कथाएं दी हुई हैं. उन कथाओं में से एक कथा निम्न है. इस कथा के अनुसार एक कुटुम्ब में ननद तथा भाभी साथ रहती थी. ननद का विवाह अभी नहीं हुआ था. वह तुलसी के पौधे की बहुत सेवा करती थी. लेकिन उसकी भाभी को यह सब बिलकुल भी पसन्द नहीं था. जब कभी उसकी भाभी को अत्यधिक क्रोध आता तब वह उसे ताना देते हुए कहती कि जब तुम्हारा विवाह होगा तो मैं तुलसी ही बारातियों को खाने को दूंगी और तुम्हारे दहेज में भी तुलसी ही दूंगी.

कुछ समय बीत जाने पर ननद का विवाह पक्का हुआ. विवाह के दिन भाभी ने अपनी कथनी अनुसार बारातियों के सामने तुलसी का गमला फोड़ दिया और खाने के लिए कहा. तुलसी की कृपा से वह फूटा हुआ गमला अनेकों स्वादिष्ट पकवानों में बदल गया. भाभी ने गहनों के नाम पर तुलसी की मंजरी से बने गहने पहना दिए. वह सब भी सुन्दर सोने – जवाहरात में बदल गए. भाभी ने वस्त्रों के स्थान पर तुलसी का जनेऊ रख दिया. वह रेशमी तथा सुन्दर वस्त्रों में बदल गया.

ननद की ससुराल में उसके दहेज की बहुत प्रशंसा की गई. यह बात भाभी के कानों तक भी पहुंची. उसे बहुत आश्चर्य हुआ. उसे अब तुलसी माता की पूजा का महत्व समझ आया. भाभी की एक लड़की थी. वह अपनी लड़की से कहने लगी कि तुम भी तुलसी की सेवा किया करो. तुम्हें भी बुआ की तरह फल मिलेगा. वह जबर्दस्ती अपनी लड़की से सेवा करने को कहती लेकिन लड़की का मन तुलसी सेवा में नहीं लगता था.

लड़की के बडी़ होने पर उसके विवाह का समय आता है. तब भाभी सोचती है कि जैसा व्यवहार मैने अपनी ननद के साथ किया था वैसा ही मैं अपनी लड़की के साथ भी करती हूं तो यह भी गहनों से लद जाएगी और बारातियों को खाने में पकवान मिलेंगें. ससुराल में इसे भी बहुत इज्जत मिलेगी. यह सोचकर वह बारातियों के सामने तुलसी का गमला फोड़ देती है. लेकिन इस बार गमले की मिट्टी, मिट्टी ही रहती है. मंजरी तथा पत्ते भी अपने रुप में ही रहते हैं. जनेऊ भी अपना रुप नहीम बदलता है. सभी लोगों तथा बारातियों द्वारा भाभी की बुराई की जाती है. लड़की के ससुराल वाले भी लड़की की बुराई करते हैं.

भाभी कभी ननद को नहीं बुलाती थी. भाई ने सोचा मैं बहन से मिलकर आता हूँ. उसने अपनी पत्नी से कहा और कुछ उपहार बहन के पास ले जाने की बात कही. भाभी ने थैले में ज्वार भरकर कहा कि और कुछ नहीं है तुम यही ले जाओ. वह दुखी मन से बहन के पास चल दिया. वह सोचता रहा कि कोई भाई अपने बहन के घर जुवार कैसे ले जा सकता है. यह सोचकर वह एक गौशला के पास रुका और जुवार का थैला गाय के सामने पलट दिया. तभी गाय पालने वाले ने कहा कि आप गाय के सामने हीरे-मोती तथा सोना क्यों डाल रहे हो. भाई ने सारी बात उसे बताई और धन लेकर खुशी से अपनी बहन के घर की ओर चल दिया. दोनों बहन-भाई एक-दूसरे को देखकर अत्यंत प्रसन्न होते हैं.

तुलसी पूजा | Tulsi Puja

हिन्दुओं के संस्कार अनुसार सभी कार्यों में तुलसी का पत्ता अनिवार्य माना गया है. प्रतिदिन तुलसी में जल देना तथा उसकी पूजा करना अनिवार्य माना गया है. तुलसी के पौधे को अर्ध्य देने के बाद शुद्ध घी का दीया जलाना चाहिए. धूप, सिंदूर, चंदन लगाना चाहिए. फिर नैवेद्य तथा पुष्प अर्पित करने चाहिए. तुलसी घर-आँगन के वातावरण को सुखमय तथा स्वास्थ्यवर्धक बनाती है.

तुलसी जी के नाम | Names of Tulsi

तुलसी जी को कई नामों से पुकारा जाता है. इनके आठ नाम मुख्य हैं – वृंदावनी, वृंदा, विश्व पूजिता, विश्व पावनी, पुष्पसारा, नन्दिनी, कृष्ण जीवनी और तुलसी.

तुलसी नामाष्टक | Tulsi Namashtakam

तुलसी को देवी रुप में हर घर में पूजा जाता है. इसकी नियमित पूजा से व्यक्ति को पापों से मुक्ति तथा पुण्य फल में वृद्धि मिलती है. यह बहुत पवित्र मानी जाती है और सभी पूजाओं में देवी तथा देवताओं को अर्पित की जाती है. तुलसी पूजा करने के कई विधान दिए गए हैं. उनमें से एक तुलसी नामाष्टक का पाठ करने का विधान दिया गया है. जो व्यक्ति तुलसी नामाष्टक का नियमित पाठ करता है उसे अश्वमेघ यज्ञ के समान पुण्य फल मिलता है. इस नामाष्टक का पाठ पूरे विधान से करना चाहिए. विशेष रुप से कार्तिक माह में इस पाठ को अवश्य ही करना चाहिए.

नामाष्टक पाठ | Namashtakam Path

वृन्दा वृन्दावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी.

पुष्पसारा नन्दनीच तुलसी कृष्ण जीवनी.

एतभामांष्टक चैव स्तोत्रं नामर्थं संयुतम.

य: पठेत तां च सम्पूज सौsश्रमेघ फलंलमेता.

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