भादवा माता मंदिर । Bhadwa Mata Temple

भारत के मध्यप्रदेश में स्थित नीमच जिले से कुछ दूरी पर स्थित है मां भादवा जी का मंदिर जो प्रमुख शक्ति स्थलों में से एक में गिना जाता है. यह एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है जो भक्तों के लिए चमत्कारीक धाम भी है. यहां आने वाले सभी भक्त माता के दर्शनों को पाकर समस्त रोगों से मुक्त हो निरोगी होने का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं.

महामाया भादवा जी का यह मंदिर माता के चमत्कारों से भरा है. समस्त भक्तों को माता के इस चमत्कारी रुप का फल भी प्राप्त होता है. यहां आने वाले रोग ग्रस्त लोग निरोगी होकर लौटते हैं. मां के दर्शनों को पाकर सभी दुखों का नाश होता है तथा हृदय में भक्ति का भाव जागृत हो जाता है. यहां के वातावरण में शांति एवं सुख का आभास समाहित है जो प्रत्येक व्यक्ति को भक्तिमय कर जाता है.

भादवा माता मंदिर चमत्कार | Bhadwa Mata Temple Miracle

भादवा माता के इस मंदिर में  माता कि चमत्कारी एवं मनोहरी प्रतिमा स्थापित है जो चाँदी के सिंहासन पर विराजित हैं. प्रतिमा के पास ही नवदुर्गा के नौ रूप विराजमान हैं. मंदिर में माता कि अखंड जोत भी जल रही है कहा जाता है की यह ज्योत कई वर्षों से प्रज्वलित है और बिना किसी व्यवधान के निरंतर जल रही है यह चमत्कारी ज्योत माता की मूर्ति के समक्ष ही.

माता के इस मंदिर के प्रति लोगों का विश्वास है कि माता रोज ही इस मंदिर में रात के समय विचरण करती हैं एवं सभी के कष्टों को दूर करती हैं उन्हें रोगों से मुक्त करती हैं तथा निरोगी होने का आशीर्वाद प्रदान करती हैं. मंदिर के समीप ही एक प्राचीन जल कुंड स्थापित है.

माना जाता है की इस पवित्र जल में स्नान करके सभी रोगी निरोगी हो जाते हैं शरीर की समस्त व्याधियां दूर हो जाती हैं. मान्यता है कि इस जल कुंड को माता ने स्वयं ही बनाया था व अपने भक्तों को इस जल में स्नान करने से निरोगी होने का आशीर्वाद भी दिया था लोगों के लिए यह जल पवित्र गंगा जल के समान ही है. ऐसे ही अनेकों चमत्कारी रूपों से फलीभूत है यह पवित्र स्थल.

भादवा माता मंदिर उत्सव | Bhadwa Mata Temple Festival

माँ भादवा जी के इस मंदिर में हर समय ही भक्तों की भारी भीड़ देखी जा सकती है. मां की आरती में समस्त श्रद्धालु बहुत ही भक्ति भाव के साथ शामिल होते हैं. मां का यह स्वरूप शक्ति का स्वरूप है जो भक्तों के दुख को दूर करता है. माता के  मंदिर में हर साल चैत्र तथा कार्तिक माह के पावन पर्व एवं नवरात्रा के समय तो यहां की छ्टा अलग ही दिखाई पड़ती है.

इस शुभ समय पर मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है दूर दूर से भक्त लोग यहां माता भादवा जी के दर्शनों हेतु आते हैं. इस अवसर पर मंदिर में भजन किर्तन, जागरण एवं भंडारों का विशेष आयोजन किया जाता है मंदिर में मेले का आयोजन भी होता है. इस विशेष अवसर पर यात्रियों के लिए रहने खाने की व्यवस्था भी की जाती है तथा आने जाने के लिए बसों का भी विशेष इंतज़ाम किया जाता है.

भादवा माता मंदिर महत्व | Bhadwa Mata Temple Importance

भादवा माता के इस मंदिर में लोगों की गहरी आस्था है यह मंदिर भक्तों के अटूट विश्वास का केन्द्र है. लोगों की मान्यता है कि माता के दर्शनों से सभी के कष्ट दूर हो जाते हैं. यहां के पशु भी माता की भक्ति में रमे देखे जा सकते हैं तभी तो आरती समय लोगों की भीड़ में भेडों व मुर्गियों को घूमते देखा जा सकता है.

मान्यता है कि मनोकामना पूर्ण होने पर लोग मंदिर में बकरी, बकरे व मुर्गे छोड़ जाते हैं इसके अतिरिक्त सोने, चांदी की वस्तुएँ व अपनी श्रद्धा अनुसार वस्तुओं का दान किया जाता है.

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पार्श्वनाथ मन्दिर | Parshwanath Temple

भारत के मध्य प्रदेश में छतरपुर ज़िले में स्थित है भारत के खूबसूरत मंदिरों का नगर खजुराहो जो संसार भर में अपनी उत्कृष्ठ कला के लिए जाना जाता है. यह एक एक छोटा सा जिला है परंतु विश्व के मानचित्र में इसने अपनी एक अलग पहचान बनाई है. इसके मंदिरों में पूर्वी समूह के अंतर्गत आने वाला एक मंदिर पार्श्वनाथ मन्दिर है.

खजुराहो के सभी मंदिर अपनी एक अलग पहचान रखते हैं जिनमें से एक पार्श्वनाथ मंदिर भी है. यहाँ निर्मित सभी मंदिर भारती कला के परिचारक हैं. पार्श्वनाथ मंदिर को देखकर हम इस बात का अनुमान लगा सकते हैं की उस समय कि निर्माण कला अपने शिखर पर रही होगी.

चंदेल शासकों की शैली का यह मंदिर है जिसमें अलंकरण सौंदर्य तथा प्रतिमाऑं की सौम्यता दृष्ट्व्य होती है. पार्श्वनाथ मंदिर का निर्माण काल दसवीं शताब्दी के मध्य का माना जाता है. जो राजा की धार्मिक प्रवृति एवं उसके समर्पण भाव का प्रतिनिधित्व करता है पार्श्वनाथ मंदिर प्रथम तीर्थंकर को समर्पित किया गया है.

पार्श्वनाथ मन्दिर स्थापत्य | Parshwanath Temple Architecture

भारत में सबसे ज़्यादा देखे और घूमे जाने वाले पर्यटन स्थलों में से एक एवं प्रमुख स्थान है यह मंदिर समूह का एक भाग है. पार्श्वनाथ मंदिर भारतीय आर्य स्थापत्य और वास्तुकला का बेजोड़ नमूना रहा है जिसकी मिसाल कहीं और देखने को नहीं मिलती. इसकी उत्कृष्ठ बनावट एवं निर्माण शैली से यह मंदिर एक जीवंत रूप में दिखाई पड़ता है कला की एक नायाब मिसाल है.

पार्श्वनाथ मंदिर यह मंदिर अलंकृत मंदिरों की श्रेणी में आता है जिसकी वजह से यह देश के बेहतरीन मध्यकालीन स्मारक हैं भी हैं. चंदेल वंश के शासकों ने यहाँ निर्मित सभी मंदिरों को बहुत ही खूबसूरती के साथ बनवाया था जो उनकी वैभवशीलता के प्रतीक बने और जिन्होंने इस वंश को इतिहास के पन्नों में अमर कर दिया है.

पार्श्वनाथ मंदिर खजुराहो में बने जैन मंदिरों की श्रेणी में सबसे उपर है तथा यहां जितने भी जैन मंदिर बने हैं उन सब से यह सबसे विशाल एवं सुंदर माना जाता है. यह मंदिर अपनी साधरणता में भी एक अलग आकर्षण  लिए हुए है जो इसे अन्य मंदिरों से अलग करती है. पार्श्वनाथ मंदिर भू विन्यास में सभी अन्य मंदिरों से विशिष्ट है.

इसमें किसी भी प्रकार का वातायन नहीं है. पूर्वी समूह के अंतर्गत आने वाला पार्श्वनाथ मंदिर काफी चौड़ा है यह मंदिर एक विशाल जगती पर निर्मित किया गया है. इस मंदिर में जैन धर्म के पर्वतक आदिनाथ जी की प्रतिमा स्थापित कि गई थी परंतु वर्तमान में स्थित पार्श्वनाथ प्रतिमा उन्नीसवीं शताब्दी की है. यह जैन मंदिर आदिनाथ जी को समर्पित है.

पार्श्वनाथ मंदिर से प्राप्त अभिलेख साक्ष्यों के आधार पर इस मंदिर का निर्माण ९५० ई. से ९७० ई. के मध्य का माना गया है जिसे यशोवर्मन के पुत्र राजा धंग के शासनकाल के समय में बनवाया गया था. पार्श्वनाथ मंदिर के निर्माण काल में बहुत समय लगा था वर्तमान समय में मंदिर के कुछ भाग खराब हो चुके हैं. जैसे की यह एक ऊँची जगती पर बना हुआ है.

लेकिन उस स्थान की कारीगरी एवं सज्जा में अब ज्यादा कुछ बचा नहीं है पर फिर भी यहाँ पर देखने को बहुत कुछ है. जि समें से मंदिर के प्रमुख भागों में मंडप, अंतराल तथा गर्भगृह निर्मित हैं जिनके पास परिक्रमा मार्ग का निर्माण भी हो रखा है मंदिर मंडप की सज्जा में मूर्तियों की बहुलता देखी जा सकती है जो उसकी सुंदरता को निखारती हैं.

पार्श्वनाथ मन्दिर महत्व | Parshwanath Temple Importance

पार्श्वनाथ मन्दिर अपनी निर्माण कला एवं अपनी कलाकृतियों के लिए बहुत ही प्रसिद्ध है यहाँ के सभी मंदिरों में अपनी महत्ता को दर्शाता पार्श्वनाथ मंदिर विश्व धरोहर भी है. इसके चारों ओर अनगिनत प्रतिमाएँ हैं निर्मित हैं यह सभी प्रतिमाएँ सूक्ष्म रूप से तराशी गई हैं. पार्श्वनाथ मंदिर की मूर्तियों में नारी के सौंदर्य को निखारा गया है इसमें वह आकर्षण में चतुर दिखाई पड़ती हैं.

मंदिर में प्रवेश करने के लिए सप्तशाखायुक्त द्वार बनाए गए हैं जिन पर महीन कारीगरी की गई है जिसमें पुष्पों के चित्र, व्यालों, मिथुनों, बेलबूटों, गंगा और कूमवाहिनी यमुना की आकृतियाँ बनाई हुईं हैं. मंदिर के अंदर उत्कीर्ण की गई मूर्तियों में विभिन्न मुद्राओं में गंधर्व, यक्ष, मंजिरा, शंख, मृदंग तथा वाद्य बजाते हुए देवियों को देखा जा सकता है. मंदिर में शैव तथा वैष्णव प्रतिमाओं के उत्कृण होने से यह धर्म के प्रति उनके समभाव को दर्शाता है.

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श्रीगणेश बहुला चतुर्थी व्रत । Shri Ganesha Chaturthi Vrat

यह व्रत भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है.इस व्रत को श्रीगणेश बहुला चतुर्थी व्रत भी कहा जाता है.

बहुला व्रत का महत्व | Importance of Bahula Fast

इस व्रत को स्त्रियाँ अपने पुत्रों की रक्षा के लिए मनाती हैं. इस व्रत को रखने से संतान का सुख बढ़ता है. संतान की लम्बी आयु की कामना की जाती है. इस दिन गाय माता की पूजा की जाती है. इस दिन दूध तथा दूध से बने पदार्थों का उपयोग नहीं किया जाता है. इस दिन गाय के दूध पर केवल उसके बछडे़ का अधिकार माना जाता है.

व्रत रखने की विधि | Fast – Procedure

इस दिन सुबह सवेरे स्नान आदि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र पहने जाते है. पूरा दिन निराहार रहते हैं. संध्या समय में गाय माता तथा उसके बछडे़ की पूजा की जाती है. भोजन में कई तरह के पकवान बनाए जाते हैं. जिन खाद्य पदार्थों को बनाया जाता है उन्हीं का संध्या समय में गाय माता को भोग लगाया जाता है. देश के कुछ भागों में जौ तथा सत्तू का भी भोग लगाया जाता है. बाद में इसी भोग लगे भोजन को स्त्रियाँ ग्रहण करती हैं. इस दिन गाय तथा सिंह की मिट्टी की मूर्ति का पूजन किया जाता है.

संध्या समय में पूरे विधि-विधान से गणेश जी की पूजा की जाती है. रात्रि में चन्द्रमा के उदय होने पर उन्हें अर्ध्य दिया जाता है. कई स्थानों पर शख्ह में दूध, सुपारी, गंध तथा अक्षत(चावल) से भगवान श्रीगणेश और चतुर्थी तिथि को भी अर्ध्य दिया जाता है. इस प्रकार इस संकष्ट चतुर्थी का पालन जो भी व्यक्ति करता है उसकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं. व्यक्ति को मानसिक तथा शारीरिक कष्टों से छुटकारा मिलता है. जो व्यक्ति संतान के लिए व्रत नहीं रखते हैं उन्हें संकट, विघ्न तथा सभी प्रकार की बाधाएँ दूर करने के लिए इस व्रत को अवश्य करना चाहिए.

बहुला चतुर्थी व्रत कथा | Bahula Chaturthi Katha in Hindi

इस व्रत की कथा इस प्रकार है कि किसी ब्राह्मण के घर में बहुला नामक एक गाय थी. बहुला गाय का एक बछडा़ था. बहुला को संध्या समय में घर वापिस आने में देर हो जाती तो यह बछडा़ व्याकुल हो उठता था. एक दिन बहुला घास चरते हुए अपने झुण्ड से बिछड़ गई और जंगल में पहुंच गई. जंगल में वह अपने घर लौटने का रास्ता खोज रही थी कि अचानक उसके सामने एक खूंखार शेर आ गया. शेर ने बहुला पर झपट्टा मारा. तब बहुला ने उससे विनती करने लगी कि उसका छोटा-सा बछडा़ सुबह से उसकी राह देख रहा है. वह भूखा है और दूध मिलने की प्रतीक्षा कर रहा है. आप कृपया कर मुझे जाने दें. मैं उसे दूध पिलाकर वापिस आ जाऊंगी तब आप मुझे खाकर अपनी भूख को शांत कर लेना.

सिंह को बहुला पर विश्वास नहीं था कि वह वापिस आएगी. तब बहुला ने सत्य और धर्म की शपठ ली और सिंहराज को विश्वास दिलाया कि वह वापिस जरुर आएगी. सिंह से बहुला को उसके बछडे़ के पास वापिस जाने दिया. बहुला शीघ्रता से घर पहुंची. अपने बछडे़ को शीघ्रता से दूध पिलाया और उसे बहुत चाटा-चूमा. उसके बाद अपना वचन पूरा करने के लिए सिंहराज के समक्ष जाकर खडी़ हो गई. सिंह को उसे अपने सामने देखकर बहुत हैरानी हुई. बहुला के वचन के सामने उसने अपना सिर झुकाया और खुशी से बहुला को वापिस घर जाने दिया. बहुला कुशलता से घर लौट आई और प्रसन्नता से अपने बछडे़ के साथ रहने लगी. तभी से बहुला चौथ का यह व्रत रखने की परम्परा चली आ रही है.

एक अन्य कथा के अनुसार ब्रज में कामधेनु के कुल की एक गाय बहुला थी. यह नन्दकुल की सभी गायों में सर्वश्रेष्ठ गाय थी. एक बार भगवान कृष्ण ने बहुला की परीक्षा लेने की सोची. एक दिन जब बहुला वन में चर रही थी तभी सिंह के रुप में श्रीकृष्ण भगवान ने उन्हें दबोच लिया. बाकी कीम कथा ऊपर लिखित कथा के आधार पर है. बाद में कृष्ण भगवान ने कहा कि बहुला तुम्हारे प्रभाव से और सत्य के कारण कलयुग में घर-घर में तुम्हारा पूजन किया जाएगा. इसलिए आज भी गायों की पूजा की जाती है और गौ मता के नाम से पुकारी जाती हैं.

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परशुराम जयंती | Parshuram Jayanti

राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका और भृगुवंशीय जमदग्नि के पुत्र,परशुराम जी भगवान विष्णु के अवतार थे. परशुराम भगवान शिव के अनन्य भक्त थे. वह एक परम ज्ञानी तथा महान योद्धा थे इन्ही के जन्म दिवस को परशुराम जयंती के रूप में संपूर्ण भारत में बहुत हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है.भगवान परशुराम जयंती के अवसर पर देश भर में हवन, पूजन, भोग एवं भंडारे का आयोजन किया जाता है तथा परशुराम जी शोभा यात्रा निकली जाती है. विष्णु के अवतार परशुराम जी का पूर्व नाम तो राम था, परंतु को भगवान शिव से प्राप्त अमोघ दिव्य शस्त्र परशु को धारण करने के कारण यह परशुराम कहलाए.

भगवान विष्णु के दस अवतारों में से छठा अवतार के रूप में अवतरित हुए थे धर्म ग्रंथों के आधार पर परशुराम जी का जन्म अक्षय तृतीया, वैशाख शुक्लतृतीया को हुआ था जिसे परशुराम जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस दिन व्रत करने और पर्व मनाने की प्रथा प्राचीन काल से ही चली आ रही है. परम्परा के अनुसार इन्होंने क्षत्रियों का अनेक बार विनाश किया। क्षत्रियों के अहंकारपूर्ण दमन से विश्व को मुक्ति दिलाने के लिए इनका जन्म हुआ था.  परशुराम ने शस्त्र विद्या द्रोणाचार्य से सीखी थी.

भगवान परशुराम जयंती महत्व | Significance of Parshuram Jayanti

वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि त्रेतायुग आरम्भ की तिथि मानी जाती है और इसे अक्षय तृतीया भी कहते है इसी दिन भगवान परशुराम जी का जन्म हुआ था. भागवत अनुसार हैहयवंश राजाओं के निग्रह के लिए अक्षय तृतीया के दिन जन्म परशुराम जी का जन्म हुआ. जमदग्नि व रेणुका की पांचवी सन्तान रूप में परशुराम जी पृथ्वी पर अवतरीत होते हैं इनके चार बड़े भाई रूमण्वन्त, सुषेण, विश्व और विश्वावसु थे अक्षय तृतीया को भगवान श्री परशुराम जी का अवतार हुआ था जिस कारण यह परशुराम जयंती के नाम से विख्यात है.

भगवान परशुराम जी शास्त्र एवम् शस्त्र विद्या के ज्ञाता थे. प्राणी मात्र का हित ही उनका सर्वोपरि लक्ष्य रहा. परशुराम जी  तेजस्वी, ओजस्वी, वर्चस्वी महापुरूष रहे. परशुराम जी अन्याय का निरन्तर विरोध करते रहे उन्होंने दुखियों, शोषितों और पीड़ितों की हर प्रकार से रक्षा व सहायता की. भगवान परशुराम जी की जयंती की अक्षततिथि तृतीया का भी अपना एक अलग महत्त्व है. इस तारीख को किया गया कोई भी शुभ कार्य फलदायक होता है. अक्षत तृतीया तिथि को शुभ तिथि माना जाता है इस तिथि में बिना योग निकाले भी कार्य होते हैं. भगवान परशुराम की जयंती हिंदू धर्मावलंबियों द्वारा बड़ी धूम-धाम से मनाई जाती है. प्राचीन ग्रंथों में इनका चरित्र अलौकिक लगता है. महर्षि परशुराम उनका वास्तविक नाम तो राम ही था जिस वजह से यह भी कहा जाता है कि ‘राम से पहले भी राम हुए हैं’.

परशुराम जन्म कथा । Parshuram Katha

भगवान परशुराम के जन्म के संबंध में दो कथाएं प्रचलित हैं। हरिवंशपुराण के अनुसार उन्हीं में से एक कथा इस प्रकार है-

पोराणिक काल में महिष्मती नगरी पर हैययवंशी क्षत्रिय कार्तवीर्य अर्जुन(सहस्त्रबाहु) का शासन था. वह बहुत अत्याचारी शासक था. जब क्षत्रिय राजाओं का अत्याचार बहुत बढ़ गया तो पृथ्वी माता, भगवान विष्णु के पास गई और अत्याचारियों का नाश करने का आग्रह किया तब भगवान विष्णु ने उन्हें पृथ्वी को वचन दिया कि वह धर्म की स्थापना के लिए महर्षि जमदग्नि के पुत्र में रूप में अवतार लेकर अत्याचारियों का सर्वनाश करेंगे इस प्रकार भगवान, परशुराम रूप में जन्म लेते हैं और पृथ्वी पर से पापियों का नाश कर देते हैं.

परशुराम ने कार्त्तवीर्य अर्जुन का वध कर दिया इसके बाद उन्होंने इस पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से रहित कर दिया और उनके रक्‍त से समन्तपंचक क्षेत्र में पाँच सरोवर भर दिये थे. अन्त में महर्षि ऋचीक ने प्रकट होकर परशुराम को ऐसा घोर कृत्य करने से रोका और तब परशुराम जी ने कश्यप ऋषि को पृथ्वी का दान कर दिया और स्वयं महेन्द्र पर्वत पर निवास करने लगते हैं.

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गोपाष्टमी | Gopashtami

कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को “गोपाष्टमी” के नाम जाना जाता है. यह पर्व ब्रज प्रदेश का मुख्य त्यौहार है. जो गौओं का पालते हैं वह सब भी इस पर्व को मनाते हैं.

गोपाष्टमी पर्व विधि | Rituals of Performing Gopashtami

इस दिन प्रात: काल उठकर नित्य कर्म से निवृत हो स्नान आदि करते हैं. प्रात: काल में ही गौओं को भी स्नान आदि कराया जाता है. इस दिन बछडे़ सहित गाय की पूजा करने का विधान है. प्रात:काल में ही धूप-दीप, गंध, पुष्प, अक्षत, रोली, गुड़, जलेबी, वस्त्र तथा जल से गाय का पूजन किया जाता है और आरती उतारी जाती है. इस दिन कई व्यक्ति ग्वालों को भी उपहार आदि देकर उनका भी पूजन करते हैं. इस दिन गायों को सजाया जाता है. इसके बाद गाय को गो ग्रास देते हैं और गाय की परिक्रमा करते हैं. परिक्रमा करने के बाद गायों के साथ कुछ दूरी तक चलना चाहिए.

संध्या समय में जब गाय घर वापिस आती हैं तब उनका पंचोपचार से पूजन किया जाता है. गाय को साष्टांग प्रणाम किया जाता है. पूजन करने के बाद गाय के चरणों की मिट्टी को माथे से लगाया जाता है. ऎसा करने से व्यक्ति को चिर सौभाग्य की प्राप्ति होती है. इसके बाद गायों को खाने की वस्तुएं दी जाती है.

गोपाष्टमी का महत्व | Significance of Gopashtami

प्राचीन मान्यताओं के अनुसार कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से सप्तमी तिथि तक भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी सबसे छोटी अंगुली पर धारण किया था. आठवें दिन हारकर अहंकारी इन्द्र को श्रीकृष्ण की शरण में आना पडा़ था. इसी दिन अष्टमी के दिन वह भगवान कृष्ण से क्षमा मांगते हैं. उसी दिन से कार्तिक शुक्ल पक्ष की अष्टमी को गोपाष्टमी का यह त्यौहार मनाया जाता है. एक मान्यतानुसार इसी दिन भगवान कृष्ण को गाय चराने के लिए वन में भेजा गया था.

भारत के अधिकतर सभी भागों में यह पर्व मनाया जाता है. विशेष रुप से गोशालाओं में यह पर्व बहुत महत्व रखता है. बहुत से दानी व्यक्ति इस दिन गोशालाओं में दान-दक्षिणा देते हैं. इस दिन सुबह से ही गायों को सजाया जाता है. उसके बाद मेहंदी के थापे तथा हल्दी अथवा रौली से पूजन किया जाता है.

गोपाष्टमी मनाने का कारण | Reason to Celebrate Gopashtami

गौ अथवा गाय भारतीय संस्कृति का प्राण मानी जाती हैं. इन्हें बहुत ही पवित्र तथा पूज्यनीय माना जाता है. हिन्दु धर्म में यह पवित्र नदियों, पवित्र ग्रंथों आदि की तरह पूज्य माना गया है. शास्त्रों के अनुसार गाय समस्त प्राणियों की माता है. इसलिए आर्य संस्कृति में पनपे सभी सम्प्रदाय के लोग उपासना तथा कर्मकाण्ड की पद्धति अलग होने पर भी गाय के प्रति आदर भाव रखते हैं. गाय को दिव्य गुणों की स्वामिनी माना गया है और पृथ्वी पर यह साक्षात देवी के समान है.

गोपाष्टमी को ब्रज संस्कृति का एक प्रमुख उत्सव माना जाता है. भगवान कृष्ण का “गोविन्द” नाम भी गायों की रक्षा करने के कारण पडा़ था. क्योंकि भगवान कृष्ण ने गायों तथा ग्वालों की रक्षा के लिए सात दिन तक गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी अंगुली पर उठाकर रखा था. आठवें दिन इन्द्र अपना अहं त्यागकर भगवान कृष्ण की शरण में आया था. उसके बाद कामधेनु ने भगवान कृष्ण का अभिषेक किया और उसी दिन से इन्हें गोविन्द के नाम से पुकारा जाने लगा. इसी दिन से अष्टमी के दिन गोपाष्टमी का पर्व मनाया जाने लगा.

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मुनि की रेती | Muni Ki Reti

मुनि की रेती पावन गंगा नदी के किनारे हिमालय की तलहटी में स्थित है. यह स्थान एक आध्यात्मिक केन्द्र भी रहा है जहाँ अनेक मंदिर एवं आश्रम स्थित हैं यह पवित्र धाम कभी चार धाम यात्रा का प्रवेश द्वारा माना जाता था. मुनि की रेती भारत के योग तथा अध्यात्म दर्शन का प्रमुख स्थल है जहाँ भारत के कोने कोने से लोग ज्ञान पाने की चाह में यहाँ आते हैं.

यह स्थान भारत का प्रमुख योग केन्द्र भी है जहाँ पर विश्व भर से लोग योग सिखाने आते हैं. प्राचीन मंदिरों, पवित्र पौराणिक का बहुत गहरा संबंध रहा है इस स्थान से. यह स्थान ऋषि मुनीयों की तपोस्थली रहा जहाँ पर भगवान श्री राम जी का आगमन हुआ पवित्र गंगा नदी के तट पर स्थित यह स्थान आध्यात्मिक शांति का ऎहसास कराता है. स्थानीय आकर्षणों से घिरा यह स्थान एक ऐतिहासिक धार्मिक स्थल है.

उत्तराखंड का यह पवित्र ऐतिहासिक स्थल विश्व के मानचित्र पर अपनी छाप छोड़ता प्रतीत होता है. मुनी की रेती  परंपरागत रुप से चार धाम यात्रा का शुरुवाती रूप था जहाँ पर यात्रा आरंभ करने से पहले सभी भक्त लोग एकत्रित हुआ करते थे. परंतु जब से यहाँ का विकास हुआ तब से इस स्थान का यह रूप कम होता गया लेकिन इसका अर्थ यह नहीं की इस स्थान ने अपना महत्व खो दिया हो.

वर्तमान में मुनी की रेती ओर भी ज्यादा विस्तृत होकर सामने आया है. यहां का शत्रुघ्न मंदिर एक प्राचीन व प्रसिद्ध स्थान है पहले चार धाम की यात्रा में जाने वाले सभी लोग यहां आकर सुरक्षित यात्रा की कामना किया करते थे कुछ जानकारों का मत है की इस मंदिर की स्थापना आदि गुरू शंकराचार्य द्वारा की गई थी.

मुनि की रेती पौराणिक महत्व | Muni Ki Reti Mythological Importance

मुनि की रेती को रामायण काल से जोड़ कर देखा जाता है. इस स्थान व इसके आस-पास का क्षेत्र अनेक धार्मिक संदर्भों से जुडा़ हुआ है. यहाँ पर स्थित कई मंदिर व स्थान रामायण के पात्रों के नामों से भी संबोधित किए जाते हैं. इस क्षेत्र के विषय में धार्मिक कथाओं से ज्ञात होता है कि जब भगवान श्री राम ने लंका विजय के पश्चात वनवास समाप्त करके अयोध्या लौट जाते हैं.

वर्षो तक शासन करने के उपरांत श्री राम अपना सभी कुछ अपने उत्तराधिकारियों में बाँट कर अपने अंतिम दिनों में तपस्या के लिए उत्तराखंड की ओर गमन करते हैं. यहाँ उनके साथ उनके भाई व गुरु वशिष्ठ भी आते हैं तथा उनके साथ अन्य ऋषि मुनि भी साथ में चल पडते हैं. कहा जाता है कि उस समय यहाँ पर कोई नहीं था व उन लोगों का स्वागत यहाँ की रेत ने किया जिस कारण इस क्षेत्र का नाम मुनि की रेती कहलाने लगा.

एक अन्य मान्यता अनुसार रैम्या मुनि ने इस स्थान पर मौन धारण करके कठोर तपस्या की थी. उनकी मौन साधना ने इस स्थान को मौन की रेती का नाम दिया तथा वर्तमान में यह स्थान मुनि की रेती कहा जाने लगा. मुनि की रेती प्राचीन समय से ही ज्ञान का एक केन्द्र रहा है. संपूर्ण भारत से लोग यहाँ ज्ञान प्राप्ति साधना एवं चार धाम यात्रा करने के लिए यहाँ आते रहे हैं.

मुनि की रेती महत्व | Muni Ki Reti Importance

मुनि की रेती की प्राकृतिक सुंदरता तथा इसका धार्मिक व ऎतिहासिक स्वरूप इसे महत्वपूर्ण बनाता है. इसके आस पास अनेक आकर्षण केन्द्र हैं जिसमें गरुड़ चट्टी जलप्रपात, गरुड़ मंदिर, कुंजादेवी मंदिर है, नीलकंठ महादेव मंदिर तथा लक्ष्मण झूला इत्यादि प्रसिद्ध स्थान हैं यहाँ पर अनेक उत्सवों का आयोजन भी किया जाता है.

यहाँ पर पुरी की प्रसिद्व जगन्नाथ रथ यात्रा का लघुरुप मनाया जाता है. जिसे देखने के लिए भक्तों की भारी भीड़ जुटती है. इसके साथ ही मुनी की रेती योग साधना तथा साहसिक खेलकुदों का केन्द्र भी हैं जहाँ पर लोग रोमांचक अनुभवों को पाते हैं. इतिहास के सभी रूपों में मुनि की रेती का योगदान रहा है जिस कारण यह ज्ञान का केन्द्र रहा है.

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मार्गशीर्ष पूर्णिमा | Margashirsha Purnima

मार्गशीर्ष का महीना श्रद्धा एवं भक्ति से पूर्ण होता है.मार्गशीर्ष माह में पूरे महीने प्रात:काल समय में भजन मण्डलियाँ, भजन, कीर्तन करती हुई निकलती हैं. इस माह में श्रीकृष्ण भक्ति का विशेष महत्व होता है तथा गीता में स्वयं भगवान ने कहा है कि महीनों मे ‘मैं मार्गशीर्ष माह हूँ’ तथा सत युग में देवों ने मार्ग-शीर्ष मास की प्रथम तिथि को ही वर्ष का प्रारम्भ किया था. मार्गशीर्ष में नदी स्नान के लिए तुलसी की जड़ की मिट्टी व तुलसी के पत्तों से स्नान करना चाहिए। स्नान के समय नमो नारायणाय या गायत्री मंत्र का उच्चारण कना फलदायी होता है.

मार्गशीर्ष पूर्णिमा पूजन | Margshisha Purnima Pooja

मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन व्रत एवं पूजन करने सभी सुखों की प्राप्ति होती है. मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु नारायण की पूजा कि जाती है. नियमपूर्वक पवित्र होकर स्नान करके सफेद कपडे पहने और आचमन करें इसके बाद व्रत रखने वाला ”ऊँ नमो नारायण“ मंत्र का उच्चारण करें. चाकोर वेदी बनाकर हवन किया जाता है, हवन की समाप्ति के पश्चात के बाद भगवान का पूजन करना चाहीए तथा प्रसाद को सभी जनों में बांट कर स्वयं भी ग्रहण करें ब्राह्यणों को भोजन कराये और सामर्थ्य अनुसार दान भी दें.

मार्गशीर्ष की पूर्णिमा को चन्द्रमा की पूजा अवश्य की जानी चाहिए, क्योंकि इसी दिन चन्द्रमा को अमृत से सिंचित किया गया था. इस दिन माता, बहिन, पुत्री और परिवार की अन्य स्त्रियों को वस्त्र प्रदान करने चाहिए.

मार्गशीर्ष पूर्णिमा महत्व | Significance of Margashirsha Purnima

जिस प्रकार कार्तिक ,माघ, वैशाख आदि महीने गंगा स्नान के लिए अति शुभ एवं उत्तम माने गए हैं. उसी प्रकार मार्गशीर्ष माह में भी गंगा स्नान का विशेष फल प्राप्त होता है. मार्गशीर्ष माह की पूर्णिमा का आध्यात्मिक महत्व खूब रहा है. जिस दिन मार्गशिर्ष माह में पूर्णिमा तिथि हो, उस दिन मार्गशिर्ष पूर्णिमा का व्रत करते हुए श्रीसत्यनारायण भगवान की पूजा और कथा की जाती है जो अमोघ फलदायी होती है.

जब यह पूर्णिमा ‘उदयातिथि’ के रूप में सूर्योदय से विद्यमान हो, उस दिन नदियों या सरोवरों में स्नान करने तथा साम‌र्थ्य के अनुसार दान करने से सभी पाप क्षय हो जाते हैं तथा पुण्य कि प्राप्ति होती है. मान्यता है कि इस दिन दान-पुण्य करने से वह बत्तीस गुना फल प्राप्त होता है अत: इसी कारण मार्गशीर्ष पूर्णिमा को बत्तीसी पूनम भी कहा जाता है.

मार्गशीर्ष माह | Margashirsha Month

समस्त महिनों में मार्गशीर्ष श्रीकृष्ण का ही स्वरूप है. मार्गशीर्ष माह के संदर्भ में कहा गया है कि इस माह का संबंध मृगशिरा नक्षत्र से होता है. ज्योतिष अनुसार 27 नक्षत्रों में से एक है मृगशिरा नक्षत्र तथा इस माह की पूर्णिमा मृगशिरा नक्षत्र से युक्त होती है जिस कारण से इस मास को मार्गशीर्ष मास कहा जाता है.

इसके अतिरिक्त इस महीने को मगसर, अगहन या अग्रहायण माह भी कहा जाता है. मार्गशीर्ष के महीने में स्नान एवं दान का विशेष महत्व होता है. श्रीकृष्ण ने गोपियां को मार्गशीर्ष माह की महत्ता बताई थी तथा उन्होंने कहा था कि मार्गशीर्ष के महीने में यमुना स्नान से मैं सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ अत: इस माह में नदी स्नान का विशेष महत्व माना गया है.

दत्तात्रेय जयंती | Dattatreya Jayanti

मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा को दत्त जयंती के रूप में भी मनाई जाती है. धार्मिक मान्यता अनुसार इस दिन भगवान दत्तात्रेय का जन्म हुआ था. धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भगवान दत्तात्रेय को ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों का स्वरूप माना जाता है. दत्तात्रेय में ईश्वर एवं गुरु दोनों रूप समाहित हैं जिस कारण इन्हें श्री गुरुदेवदत्त भी कहा जाता है.

मान्यता अनुसार दत्तात्रेय का जन्म मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा को प्रदोषकाल में हुआ था. श्रीमद्भगावत ग्रंथों के अनुसार दत्तात्रेय जी ने चौबीस गुरुओं से शिक्षा प्राप्त की थी. भगवान दत्त के नाम पर दत्त संप्रदाय का उदय हुआ .  दक्षिण भारत में इनके अनेक प्रसिद्ध मंदिर भी हैं. मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा को भगवान दत्तात्रेय के निमित्त व्रत करने एवं उनके दर्शन-पूजन करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.

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वैशाख पूर्णिमा पूजन | Vaishakh Purnima Pooja

हिंदू धर्म ग्रथों में वैशाख माह के स्नान, दान, तप, व्रत कथा आदि के श्रवण-मनन का विशेष महत्व कहा गया है. हिंदु पंचांग में माघ, वैशाख और कार्तिक माह की विशेष महिमा को व्यक्त किया गया है. वैशाख मास में भगवान विष्णु का पंचोपचार और षोडशोपचार पूजन करना चाहिए.

वैशाखी पूर्णिमा को ब्रह्मा जी ने श्वेत तथा कृष्ण तिलों का निर्माण किया था. अतएव उस दिन दोनों प्रकार के तिलों से युक्त जल से व्रती स्नान करे, अग्नि में तिलों की आहुति दे, तिल, मधु तथा तिलों से भरा हुआ पात्र दान में दे. इसी प्रकार के विधि-विधान का विस्तृत विवरण विष्णुधर्म में भी प्राप्त होता है.

वैशाख पूर्णिमा पूजन | Vaishakh Purnima Pooja

वैशाख पूर्णिमा के दिन व्रत एवं पूजन करने सभी प्रकार के पापों से मुक्ति प्राप्त होती है. धार्मिक मान्यता के अनुसार वैशाख पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए ऎसा करने से गोदान के समान फल प्राप्त होता है. भविष्य पुराण के अनुसार वैशाख की पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु ने अपने 24 अवतारों में से कच्छप रूप में अवतार लिया था अत: इस दिन भगवान विष्णु के रूप की पूजा की जाती है और वैशाख पूर्णिमा पर तिल, तेल आदि का दान किया जाता है सोना, चांदी, तांबा या मिट्टी के पात्र में सुगंधित वस्तुओं जैसे कपूर, इत्र आदि डालकर भगवान विष्णु को जल में शयन कराना चाहिए.

घी, शकर, तिल से भगवान विष्णु के समक्ष प्रार्थना करें तिल, शकर और घी से हवन करें, तिल व शहद का दान करें, तिल के तेल का दीपक जलाकर जल व तेल का तर्पण करना चाहिए, गंगा, नर्मदा आदि पवित्र नदियों में स्नान करने से सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है. ऊं नमो भगवते वासुदेवाय नम: मंत्र के साथ पूजन करना चाहिए, सत्यनारायण भगवान का व्रत करने से संपत्ति, यश में वृद्धि तथा श्रीलक्ष्मी की प्राप्ति होती है. इस दिन सूर्यास्त के बाद पात्र में जल भरकर उसमें भगवान का शयन कराकर चारों प्रहरों की पूजा करने से विशेष लाभ होता है. वैशाख की पूर्णिमा पर शिवालयों में भगवान भोलेनाथ को जलमग्न किया जाता है.

बुद्ध पूर्णिमा | Budh Purnima

वैशाख पूर्णिमा का दिन विश्व भर में बुद्ध पूर्णिमा के रूप में भी मनाया जाता है. वैशाख पूर्णिमा के दिन को त्रिविध पावन  दिन भी कह सकते हैं क्योंकि इसी दिन बुद्ध का लुंबिनी में जन्म, बोधगया में बुद्धत्व प्राप्ति और कुशीनगर में महार्निवाण हुआ था. इस दिन बौद्ध अनुयायी घरों में दीपक जलाए जाते हैं तथा फूलों से घरों को सजाते हैं विश्व भर से बौद्ध धर्म के अनुयायी बोधगया आते हैं और बौद्ध धर्म ग्रंथों का पाठ व प्रार्थनाएँ करते हैं.

मंदिरों व घरों में बुद्ध की मूर्ति पर फल-फूल चढ़ाते हैं और दीपक जलाकर पूजा करते हैं साथ ही साथ बोधिवृक्ष की भी पूजा की जाती है. गौतम बुद्ध को गया में पीपल के पेड के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई थी प्राप्त हुआ तथा पूर्णिमा के दिन ही कुशीनगर के घने जंगलों में पेड के नीचे महापरिनिर्वाणहुआ यह एक असाधारण घटना थी। इसीलिए हर साल वैशाख पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा भी कहा जाता है.

वैशाख पूर्णिमा महत्व | Vaishakh Purnima Importance

भारतीय हिंदु पंचाग अनुसार  हिन्दू वर्ष का दूसरा माह वैशाख कहलाता है. भारतीय संस्कृति में वैशाख माह का आध्यात्मिक महत्व रहा है,. धार्मिक ग्रंथों में वैशाख की महिमा का गुणगान मिलता है  स्कंदपुराणका अनुसार वैशाख के समान कोई मास नहीं है. वैशाख की प्रशंसा में देव ऋषि नारद कहते हैं कि सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने द्वादश महीनों में  वैशाख को सर्वोत्तम बताया है.

वैसाख माह में धर्म, यज्ञ, क्रिया और तपस्या का सार समाहित होता है यह माह देवताओं के द्वारा भी पूजित है. जो व्यक्ति वैशाख में सूर्योदय से पूर्व स्नान करता है, उसके सभी पाप क्षय हो जाते हैं और कीर्ति प्राप्त होती है वैशाख भगवान विष्णु को परमप्रिय होने के कारण सर्वश्रेष्ठ माह बन गया है. सब प्रकार के दानों से जो पुण्य प्राप्त होता है और सब तीर्थो में जो फल मिलता है, वह सभी कुछ व्यक्ति को वैशाख माह में केवल जलदान करके प्राप्त किया जा सकता है.

प्यासे पथिक को शीतल जल प्रदान करने से राजसूय यज्ञों का फल प्राप्त होता है. वैशाख में गंगा नदी-स्नान करने से कई जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं. पद्मपुराण में वैशाख के महत्व के विषय में विस्तार पूर्वक कहा गया है इसमें कहा गया है कि वह मनुष्य ही पुण्यात्मा और धन्य हैं, जो वैशाख में प्रात:काल स्नान करके विधि-विधान से यज्ञ, दान, उपवास तथा लक्ष्मीपतिविष्णु की पूजा करता है  वैशाख में स्नान ही अश्वमेध यज्ञ के समान फल देगा.

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बडे गणेशजी मंदिर | Bade Ganesh Ji Temple

भारत के हर कोने में भगवान गणेश जी के मंदिरों को देखा जा सकता है और उनके प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है बडे गणेश जी का मंदिर जो उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर के निकट हरसिध्दि मार्ग पर स्थित है. इस मंदिर में भगवान गणेश जी को बडे गणेश जी के नाम से जाना जाता है.

गणेश भगवान जो विध्नहर्ता के रूप मे जाने जाते हैं जिनका गज जैसा सिर होने के कारण गजानन भी कहा जाता है हिंदुओं के परम पूज्य देव हैं. भगवान गणेश जी हिन्दू शास्त्रों के अनुसार किसी भी कार्य के लिये पहले पूज्य देव माने जाते हैं.

जो भी शुभ कार्य की शुरूवात हम करते हैं सर्वप्रथम भगवान गणेश जी को स्मरण किया जाता है. जिस कारण यह आदिपूज्य भी कहे जाते हैं. चारों दिशाओं में सर्वव्यापकता के प्रतीक भगवान गणेश लंबोदर भी कहे जाते हैं. विघ्नहर्ता श्रीगणेश जी की आराधना करने से श्रद्धालुओं को सभी सुख-समृद्धि प्राप्त होती है.

बडे गणेशजी मंदिर कथा । Bade Ganesh Ji Temple Story In Hindi

इस मंदिर में विराजित गणेश जी की भव्य और कलापूर्ण मूर्ति प्रतिष्ठित है. यह एक बहुत बडी़ मुर्ति है जिस कारण से इसे बडे़ गणेश जी के नाम से पुकारा जाता है. इस मंदिर की प्रसिद्धि दूर दूर तक फैली हुई है. गणेश जी की इस भव्य प्रतिमा का निर्माण पं. नारायण जी व्यास के अथक प्रयासों द्वारा हो सका. यहां स्थापित गणेश जी की यह प्रतिमा विश्व की सबसे ऊँची और विशाल गणेश जी की मूर्ति के रूप में विख्यात है.

इस शहर के पश्चिम क्षेत्र में मल्हारगंज में यह गणेश प्रतिमा विराजमान है. जिसे उज्जैन के चिंतामण गणेश जी की प्रेरणा से नारायण जी ने निर्मित करवाया. नारायण जी भगवान गणेश जी के अनन्य भक्त थे वह गणेश जी की सेवा में हर समय लगे रहते थे. गणेश भगवान जी की भक्ति में रमे नारायण जी बच्चन से ही श्री गणेश जी के प्रति श्रद्धा भाव रखते थे. जिस कारण प्रभु की इन पर पूर्ण कृपा थी.

एक बार नारायण जी को भगवान गणेश जी ने स्वप्न में अपने विराट रूप के दर्शन दिए. भगवान गणेश जी का स्वप्न में देखा यह रूप नारायण जी के मन में बस गया था तथा उनकी इच्छा प्रभु के इस रूप को साकार रूप देने की हुई. अब वह इसी धुन में लग चुके थे की भगवान गणेश जी की एक विशाल प्रतिमा का निर्माण हो सके ओर इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अनेक प्रयास करते हैं.

वह हर बुधवार को उज्जैन से कुछ किलोमीटर दूर स्थित भगवान गणेश जी के चिंतामणी मन्दिर में जाकर प्रार्थना किया करते थे. उनका यह निश्चय अटल रूप में था ओर इसके लिए वह चिंतामणी मंदिर में जहाँ गणेश भगवान को चिंतामणी नाम से जाना जाता है. जिनके दर्शनों को करके सभी की चिंताएं दूर हो जाती है. इसी बात को मन में लिए वह गणेश जी के दर्शन किया करते थे. और एक दिन उनका यह सपना साकार हो सका जब वह इंदौर में आए तब बोंदरजी पटेल से उन्हें जमीन प्राप्त हुई.

बडे गणेशजी प्रतिमा | Bade Ganesh Ji Statue

बडे गणेशजी की यह प्रतिमा अपने अनेक महत्वपूर्ण तथ्य देखे जा सकते हैं. इसके निर्माण में अनेक प्रकार के प्रयोग किए गए थे जैसे  की यह विशाल गणेश प्रतिमा सीमेंट से नहीं बल्की ईंट, चूने, बालू रेत से बनी हैं और इससे भी विचित्र बात यह है कि इस प्रतिमा को बनाने में गुड़ व मेथीदाने का मसाला भी उपयोग में लाया गया था.

इसके साथ साथ ही इसको बनाने में सभी पवित्र तीर्थ स्थलों का जल मिलाया गया था तथा सात मोक्षपुरियों मथुरा, माया, अयोध्या, काँची, उज्जैन, काशी, व द्वारका से लाई गई मिट्टी भी मिलाई गई है जो इसकी महत्ता को दर्शाती है. इस प्रतिमा के निर्माण में ढाई वर्ष का समय लगा जिसके बाद यह मूर्ति अपने विशाल रूप में सबके समक्ष प्रत्यक्ष रूप से विराजमान है.

बडे गणेशजी मंदिर महत्व । Bade Ganesh Ji Temple Importance

बडे गणेशजी का मंदिर भक्तों के लिए एक पावन धाम है जहाँ पर आकर वह अपनी सभी चिंताओं से मुक्त हो जाते हैं. इस मंदिर में सप्तधातु की पंचमुखी हनुमान जी की मूर्ति भी स्थापित है इसके अतिरिक्त म्म्दिर परिसर में नवग्रह मंदिर भी बना है. बडे गणेश जी की प्रतिमा को बहुत दूर से भी देखा जा सकता है.

इसकी विशालता से प्रभावित हो लोग देश भर से यहाँ मूर्तिको देखने के लिए आते हैं. बडे गणेश जी के अनेकों भक्त हैं जो यहाँ दर्शन करने के लिए देश-विदेश से आते रहते हैं गणेश चतुर्थी के पावन समय यहाँ भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है बडे गणेश जी के दर्शनो को करके सभी की चिंताओं का हरण होता है तथा सुख समृद्धि प्राप्त होती है.

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छठ पर्व । Chhath Festival

श्रद्धा और आस्था का छठ त्यौहार सूर्योपासना के लिए प्रसिद्ध रहा है. सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है, छ्ठ का महोत्सव वर्ष में दो बार मनाया जाता है पहली बार चैत्र माह में और दूसरी बार कार्तिक माह के समय में, चैत्र शुक्लपक्ष षष्ठीपर मनाए जाने वाले छठ पर्व को चैती छठ व कार्तिक शुक्लपक्ष षष्ठीपर मनाए जानेवाले त्यौहार को कार्तिकी छठ के नाम से जाना जाता है. सुख-स्मृद्धि तथा मनोकामनाओं की पूर्ति का यह त्यौहार स्त्री और पुरुष दोनों ही समान रूप से मनाते हैं.

छठ पूजा का महत्व सनातन काल से ही देखा जा सकता है. प्राचीन धार्मिक संदर्भ में यदि इस पर दृष्टि डालें तो पाएंगे कि छठ पूजा का आरंभ महाभारत काल में कुंती द्वारा सूर्य की आराधना तथा सूर्य के आशीर्वाद स्वरूप उन्हें पुत्र कर्ण की प्राप्ति होने के समय से ही माना जाता है. इसी प्रकार द्रोपदी ने भी छठ पूजा की थी जिस कारण पांडवों के सभी कष्ट दूर हो गए और उन्हें उनका राज्य पुन: प्राप्त होता है.

मान्यता है कि छठ देवी सूर्य देव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए भगवान सूर्य की आराधना कि जाती है तथा गंगा-यमुना या किसी भी पवित्र नदी या पोखर के किनारे पानी में खड़े होकर यह पूजा संपन्न कि जाती है.

छठ पूजा । Chhath Puja

छठ व्रत को सभी हिंदू अत्यंत भक्ति भाव व श्रद्धा से मनाते हैं. इस पूजा का आरंभ कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से होता है तथा कार्तिक शुक्ल सप्तमी को इसका समापन्न होता है. प्रथम दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी ‘नहाय-खाय’ के रूप में मनाया जाता है नहाए-खाए के दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी को खरना किया जाता है.

पंचमी को दिनभर खरना का व्रत रखने वाले व्रती शाम के समय गुड़ से बनी खीर, रोटी और फल का सेवन प्रसाद रूप में करते हैं  इसके उपरांत व्रती 36 घंटे का निर्जला व्रत करते हैं व्रत समाप्त होने के बाद ही व्रती अन्न और जल ग्रहण करते हैं. खरना पूजन से ही घर में देवी षष्ठी का आगमन हो जाता है.

इस प्रकार भगवान सूर्य के इस पावन पर्व में शक्ति व ब्रह्मा दोनों की उपासना का फल एक साथ प्राप्त होता है. षष्ठी के दिन घर के समीप ही की सी नदी या जलाशय के किनारे पर एकत्रित होकर पर अस्ताचलगामी और दूसरे दिन उदीयमान सूर्य को अर्ध्य समर्पित कर पर्व की समाप्ति होती है.

सूर्य महत्व | Chhath – Sun Importance

छठ का त्यौहार सूर्य की आराधना का पर्व है, हिंदू धर्म के देवताओं में सूर्य देव का अग्रीण स्थान है और हिंदू धर्म में इन्हें विशेष स्थान प्राप्त है. प्रात:काल में सूर्य की पहली किरण और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण को अघ्र्य देकर दोनों का नमन किया जाता है सूर्योपासना की परंपरा ऋग वैदिक काल से होती आ रही है सूर्य की पूजा महत्व के विषय में विष्णु पुराण, भगवत पुराण, ब्रह्मा वैवर्त पुराण आदि में विस्तार पूर्वक उल्लेख प्राप्त होता है.

सृष्टि और पालन शक्ति के कारण सूर्य की उपासना सभ्यता के अनेक विकास क्रमों में देखी जा सकती है. पौराणिक काल से ही सूर्य को आरोग्य के देवता माना गया है वैज्ञानिक दृष्टि से भी सूर्य की किरणों में कई रोगों को समाप्त करने की क्षमता पाई गई है .सूर्य की वंदना का उल्लेख ऋगवेद में मिलता है तथा अन्य सभी वेदों के साथ ही उपनिषद आदि वैदिक ग्रंथों में इसकी महत्ता व्यक्त कि गई है.

सांस्कृतिक महत्व | Cultural Significance

छठ पूजा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इसकी सादगी पवित्रता है भक्ति और आध्यात्म से परिपूर्ण यह पर्व बाँस निर्मित सूप, टोकरी, मिट्टी के बरतनों, गन्ने के रस, गुड़,चावल और गेहूँ से निर्मित प्रसाद, और सुमधुर लोकगीतों का गाया जाता है.

छठ पूजा का आयोजन आज बिहार व पूर्वी उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त देश के कोने-कोने में देखा जा सकता है. प्रशासन इसके आयोजन के लिए विशेष प्रबंध करता है देश के साथ-साथ अब विदेशों में रहने वाले लोग भी इस पर्व को बहुत धूम धाम से मनाते हैं.

छ्ठ का महत्व | Importance of Chhath Festival

मान्यता अनुसार सूर्य देव और छठी मइया भाई-बहन है, छठ त्यौहार का धार्मिक ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी बहुत महत्व माना गया है इस कथन के अनुसार षष्ठी तिथि (छठ) एक विशेष खगौलीय अवसर होता है इस समय सूर्य की पराबैगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती हैं उसके संभावित कुप्रभावों से रक्षा करने का सामर्थ्य इस परंपरा में रहा है. छठ व्रत नियम तथा निष्ठा से किया जाता है  भक्ति-भाव से किए गए इस व्रत द्वारा नि:संतान को संतान सुख प्राप्त होता है. इसे करने से धन-धान्य की प्राप्ति होती है तथा जीवन सुख-समृद्धि से परिपूर्ण रहता है.

छठ गीत | Chhath Songs

केरवा जे फरेला गवद से ओह पर सुगा मंडराय

उ जे खबरी जनइबो अदिक से सुगा देले जुठियाए

उ जे मरबो रे सुगवा धनुक से सुगा गिरे मुरझाय

उ जे सुगनी जे रोवे ले वियोग से आदित होइ ना सहाय

काचि ही बांस कै बहिंगी लचकत जाय

भरिहवा जै होउं कवनरम, भार घाटे पहुँचाय

बाटै जै पूछेले बटोहिया ई भार केकरै घरै जाय

आँख तोरे फूटै रे बटोहिया जंगरा लागै तोरे घूम

छठ मईया बड़ी पुण्यात्मा ई भार छठी घाटे जाय.

छठ के दौरान लोग सूर्य देव की पूजा करतें हैं , इसके लिए जल में खड़े होकर कमर तक पानी में डूबे लोग, दीप प्रज्ज्वलित किए नाना प्रसाद से पूरित सूप उगते और डूबते सूर्य को अर्ध्य देते हैं और छठी मैया के गीत गाए जाते हैं.

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